राष्ट्रपति ने संथाली भाषा में भारत का संविधान जारी किया

 

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (25 दिसंबर, 2025) राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में संथाली भाषा में भारत का संविधान जारी किया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि यह सभी संथाली लोगों के लिए गर्व और खुशी की बात है कि भारत का संविधान अब संथाली भाषा में, ओल चिकी लिपि में उपलब्ध है। इससे वे संविधान को अपनी भाषा में पढ़ और समझ सकेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि इस वर्ष हम ओल चिकी लिपि की शताब्दी मना रहे हैं। उन्होंने विधि एवं न्याय मंत्री और उनकी टीम की प्रशंसा की, जिन्होंने शताब्दी वर्ष में भारत के संविधान को ओल चिकी लिपि में प्रकाशित करवाया।

इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति श्री सीपी राधाकृष्णन और केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल शामिल थे।

संथाली भाषा, जिसे 2003 के 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, भारत की सबसे प्राचीन जीवित भाषाओं में से एक है। यह झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार में बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों द्वारा बोली जाती है।

 

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने विजय दिवस पर, युद्ध में अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर शहीदों को नमन किया

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने विजय दिवस पर, युद्ध में अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर शहीदों को नमन किया।

X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा “वर्ष 1971 में आज ही के दिन सुरक्षा बलों ने अदम्य साहस और सटीक रणनीति के बल पर पाकिस्तानी सेना को परास्त कर उसे आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया था। इस विजय ने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ ढाल बन, विश्वभर में मानवता की रक्षा का आदर्श उदाहरण पेश किया और भारतीय सेनाओं की अद्वितीय सैन्य क्षमता और पराक्रम का लोहा मनवाया। विजय दिवस पर, युद्ध में अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर शहीदों को नमन करता हूँ।”

असम में चौथे सहकारिता मेला 2025 का उद्घाटन

केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री श्री कृष्ण पाल गुर्जर ने महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव और महापुरुष माधवदेव की सांस्कृतिक विरासत को सहकारिता पुनर्जागरण की आधारशिला बताया

असम सरकार के सहकारिता विभाग द्वारा, भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय के मार्गदर्शन में आयोजित चौथे सहकारिता मेला 2025 का आज चांदमारी स्थित एईआई ग्राउंड में उद्घाटन किया गया। यह तीन दिवसीय मेला 13 से 15 दिसंबर 2025 तक आयोजित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य असम में सहकारिता आंदोलन की शक्ति, विविधता और संभावनाओं को प्रदर्शित करना है।

इस मेले का औपचारिक उद्घाटन भारत सरकार के केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री श्री कृष्ण पाल गुर्जर ने असम सरकार के सहकारिता मंत्री श्री जोगेन मोहन की गरिमामयी उपस्थिति में किया।

गुवाहाटी में आयोजित सहकारिता मेले को संबोधित करते हुए केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री ने कहा कि असम में सहकारिता आंदोलन राज्य की गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं का स्वाभाविक विस्तार है। उन्होंने क्षेत्र के महान संत विभूतियों महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव और महापुरुष माधवदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि एकता, समानता और समाज सेवा पर आधारित उनकी शिक्षाएं ही सहकारिता की भावना की मूल आधारशिला हैं।

केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के निर्णायक नेतृत्व और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह के मार्गदर्शन में सहकार से समृद्धि की राष्ट्रीय परिकल्पना, सशक्त वास्तविकता में परिवर्तित हो रही है। उन्होंने वर्ष 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना को एक ऐतिहासिक कदम बताया, जिसने भारत में वर्ष 2047 तक एक सर्वांगीण, विश्वस्तरीय सहकारिता प्रणाली के निर्माण के लिए आवश्यक संस्थागत प्रोत्साहन और स्पष्ट रोडमैप प्रदान किया है।

श्री गुर्जर ने विशेष रूप से असम में सहकारिता क्षेत्र में हो रहे तेज़ सुधारों की सराहना करते हुए मुख्यमंत्री डॉहिमंत बिस्वा सरमा के गतिशील नेतृत्व और राज्य के सहकारिता मंत्री श्री जोगेन मोहन के समर्पित प्रयासों को इसका श्रेय दिया। उन्होंने कहा कि राज्य स्तर पर सक्रिय और प्रभावी क्रियान्वयन के चलते असम प्रमुख राष्ट्रीय पहलों में अग्रणी बनकर उभरा है।

उन्होंने बताया कि प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) के 100 प्रतिशत कंप्यूटरीकरण की दिशा में असम ने उल्लेखनीय प्रगति की है, जहां 800 से अधिक पैक्स ने नए मॉडल उपविधियों को अपनाया है। इस प्रगति से युवाओं और महिलाओं को सशक्त किया जा रहा है, विभिन्न क्षेत्रों में उद्यमिता को बढ़ावा मिल रहा है और 32 लाख से अधिक सदस्यों को वित्तीय समावेशन का लाभ मिल रहा है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि असम अब राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के उस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के अनुरूप पूरी तरह अग्रसर है, जिसके अंतर्गत वर्ष 2026 तक प्रत्येक गांव में एक सहकारी संस्था की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने राज्य के लिए एक समृद्ध, आत्मनिर्भर और सहकारिता-आधारित भविष्य के निर्माण हेतु सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया।

चौथे सहकारिता मेले में अपने संबोधन में असम सरकार के सहकारिता मंत्री श्री जोगेन मोहन ने इस मेले को जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण का एक जीवंत मंच बताया। उन्होंने प्रतिभागियों की विशेष रूप से सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर अपशिष्ट को उपयोगी संसाधनों में बदलते हुए आत्मनिर्भरता और अद्भुत नवाचार क्षमता का परिचय दिया है।

उन्होंने बताया कि ये सहकारी संस्थाएं आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन से लेकर महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और युवाओं की सफलता तक, विभिन्न क्षेत्रों में लोगों को व्यापक लाभ पहुंचा रही हैं।

इस सहकारिता मेले में 160 सहकारी संस्थाओं की भागीदारी है, जो हथकरघा, मत्स्य पालन, डेयरी, कृषि तथा युवा एवं महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों जैसे प्रमुख क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। यह मेला स्थानीय उत्पादों, नवाचारों और सहकारिता की सफलता की कहानियों को प्रदर्शित करने के लिए एक सशक्त मंच प्रदान कर रहा है।

मेला आगामी दो दिनों तक जारी रहेगा, जिसमें प्रदर्शनियां, संवाद और ज्ञान-साझा सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनका उद्देश्य राज्य में सहकारिता आधारित विकास को और अधिक प्रोत्साहित करना है।

वीर सावरकर-स्वतंत्रता संग्राम में जीवन देने वाले राष्ट्रभक्तों की आकाशगंगा का दीप्तिमान तारा हैं – डॉ. मोहन भागवत जी

सावरकर

स्वातंत्र्यवीर सावरकर के गीत ‘सागरा प्राण तळमळला’ के 115 वर्ष पूर्ण

श्री विजयपुरम्, 12 दिसंबर 2025। स्वातंत्र्यवीर सावरकर के गीत ‘सागरा प्राण तळमळला’ के 115 वर्ष पूर्ण होने पर अंडमान और निकोबार के श्री विजयपुरम् में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इससे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने वीर सावरकर की आदमकद प्रतिमा का अनावरण और ‘वीर सावरकर प्रेरणा पार्क’ का उद्घाटन किया।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और सावरकर जी के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। उनके जीवन और दर्शन पर एक कॉफी टेबल बुक भी जारी की गई।

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि प्रतिमा और कविता पाठ, हालांकि सार्थक है, लेकिन वे केवल प्रतीक स्वरूप हैं। हर नागरिक को सावरकर जी के विज़न को साकार करने के लिए सक्रिय रूप से काम करना चाहिए।

उन्होंने सावरकर जी को “भारत के देशभक्तों में एक चमकता सितारा” बताया, जिनका बलिदान और कष्ट भारत के प्रति उनके गहरे प्रेम को दर्शाते हैं। उन्होंने नागरिकों से सावरकर जी जैसी ही राष्ट्रीय समर्पण की भावना विकसित करने का आग्रह किया। “तेरे टुकड़े” का नारा कहाँ से आता है?”, यह पूछते हुए, उन्होंने विभाजनकारी प्रवृत्तियों को अस्वीकार करने और एकता को बल देने का आह्वान किया। “सावरकर जी के लिए, राष्ट्र ही देवता था”, और सभी से अपने सभी कार्यों के केंद्र में भारत को रखने के लिए कहा। उन्होंने युवाओं को  प्रोत्साहित किया राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को कभी न भूलने के लिए । साथ ही वीर सावरकर जी के गुणों को स्वयं के जीवन में उतारने को कहा और उनके जीवन में अदम्य साहस एवं संयम का जो दर्शन होता है उससे आज के युवाओं को प्रेरणा लेने को भी कहा l 

सरसंघचालक जी ने कहा कि वीर सावरकर आजादी की लड़ाई में जीवन समर्पित करने वाले देशभक्तों की आकाशगंगा में सबसे दीप्तिमान तारा हैं। उनका जीवन पूर्ण, अनुकरणीय और राष्ट्रभक्ति का जीवंत उदाहरण है। हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए उनकी कल्पना के भारत के निर्माण के लिए काम करना होगा। सावरकर जैसे सूर्य न बन पाएं तो भी दीपक अवश्य बनें। यही उनको सच्ची श्रद्धांजली होगी।

उन्होंने कहा कि सावरकर जी के व्यक्तित्व की व्याख्या करने के लिए अनेक विशेषणों की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि उनका जीवन उत्कट समर्पण, प्रेम, त्याग और अदम्य साहस का अनूठा संगम था। उनके इन्हीं गुणों के कारण वे तनमय अवस्था में पहुंच गए थे, जहां अपना दुख भूलकर व्यक्ति देश और समाज के दुख से जुड़ जाता है। इसे ही भक्ति कहा जाता है। 

सावरकर जी का स्मरण केवल इतिहास का पुन: आवाहन नहीं, बल्कि सच्ची देशभक्ति को जगाने का माध्यम है। यदि हमें सावरकर जी के सपनों का भारत बनाना है, तो उनके समर्पण और अनुशासन को अपने जीवन में उतारना होगा। आज की आवश्यकता गुलामी के कालखंड की तरह किसी (अंग्रेजों) के खिलाफ काम करने की नहीं, बल्कि अपने राष्ट्र के लिए कार्य करने की है। उनका जीवन उत्कट समर्पण, प्रेम, त्याग और अदम्य साहस का अनूठा संगम था। 

समारोह में लेफ्टिनेंट गवर्नर एडमिरल देवेंद्र कुमार जोशी, महाराष्ट्र के संस्कृति मंत्री एडवोकेट आशीष शेलार, पंडित हृदयनाथ मंगेशकर, अभिनेता रणदीप हुड्डा और शरद पोंक्से और इतिहासकार डॉ. विक्रम संपत सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए।

कार्यक्रम में पंडित हृदयनाथ मंगेशकर के संगीत निर्देशन में सावरकर जी की रचनाओं जय देव जय देव, हे हिन्दू नृसिंह प्रभु शिवाजी राजा, जयोस्तुते और सदाबहार सागर प्राण तळमळला की भावपूर्ण प्रस्तुतियाँ दी गईं।

कार्यक्रम में सावरकर जी की रचनाओं जय देव जय देव, हे हिन्दू नृसिंह प्रभु शिवाजी राजा, जयोस्तुते और सदाबहार सागर प्राण तळमळला की भावपूर्ण प्रस्तुतियाँ दी गईं।

जय माँ भारती तुझे शत शत नमन l 

सावरकर कौन थे ?

सावरकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे l 

सावरकर ने ‘सागरा प्राण तळमळला’ गीत लिखा था l 

115 साल

भारत की जनगणना 2027 – केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने दी मंजूरी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज 11,718.24 करोड़ रुपये की लागत से भारत की जनगणना 2027 कराने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है ।

योजना का विवरण:

  • भारतीय जनगणना विश्‍व की सबसे बड़ी प्रशासनिक और सांख्यिकीय कार्ययोजना है। भारत की जनगणना दो चरणों में आयोजित की जाएगी: ( i ) घरों की सूची बनाना (हाउसलिस्टिंग) और आवास (हाउसिंग) जनगणना – अप्रैल से सितंबर, 2026 और (ii) जनसंख्‍या की गणना (पीई) – फरवरी 2027 (केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के बर्फ से प्रभावित गैर-समकालिक क्षेत्रों और हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड राज्यों के लिए, पीई सितंबर, 2026 में की जाएगी)।
  • लगभग 30 लाख प्रक्षेत्र कर्मचारी राष्ट्रीय महत्व के इस विशाल कार्य को पूरा करेंगे।
  • डेटा संग्रह के लिए मोबाइल ऐप और मॉनिटरिंग के लिए सेंट्रल पोर्टल का उपयोग करने से बेहतर गुणवत्ता का डेटा सुनिश्चित होगी।
  • डाटा प्रसार बेहतर और अधिक यूज़र फ्रेंडली तरीके से होगा ताकि नीति निर्माण के लिए आवश्‍यक मानकों पर सभी प्रश्‍न एक बटन क्लिक करते ही प्राप्‍त हो जाए।
  • जनगणना एक सेवा के रूप में (सीएएएस) मंत्रालयों को डेटा स्‍पष्‍ट, मशीन से पढ़े जा सकने वाले और कार्रवाई करने योग्‍य प्रारूप में प्रदान करेंगे।

लाभ: 

भारत की जनगणना 2027 में देश की समस्‍त जनसंख्‍या को शामिल किया जाएगा।

कार्यान्‍वयन कार्यनीति और लक्ष्य:

  • जनगणना प्रक्रिया में हर घर में जाना और हाउसलिस्टिंग तथा हाउसिंग जनगणना और जनसंख्या गणना के लिए अलग-अलग प्रश्नावली तैयार करना शामिल है।
  • गणनाकार (एन्यूमेरेटर) जो आम तौर पर सरकारी शिक्षक होते हैं और जिन्हें राज्य सरकार नियुक्‍त करती है, अपनी नियमित ड्यूटी के अतिरिक्‍त जनगणना का फील्ड वर्क भी करेंगे।
  • उप-जिला, जिला और राज्‍य स्‍तरों पर दूसरे जनगणना अधिकारियों को भी राज्‍य /जिला प्रशासन द्वारा नियुक्‍त किया जाएगा।
  • जनगणना 2027 के लिए उठाए गए नए कदम इस प्रकार हैं:

( i ) देश में डिजिटल माध्‍यम से पहली जनगणना। डेटा का संग्रह मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग करके किया जाएगा जो एन्‍डरॉएड और आईओएस दोनों वर्जनों के लिए उपलब्ध होंगे।

(ii)    पूरी जनगणना प्रक्रिया को वास्‍तविक समय आधार पर प्रबंधित और निगरानी करने के लिए एक समर्पित पोर्टल, जिसका नाम सेंसस मैनेजमेंट एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (सीएमएमएस) है, डेवलप किया गया है।

(iv)    हाउसलिस्टिंग ब्लॉक (एचएलबी) क्रिएटर वेब मैप एप्लीकेशन: जनगणना 2027 के लिए एक और इनोवेशन एचएलबी क्रिएटर वेब मैप एप्लीकेशन है, जिसका उपयोग प्रभारी अधिकारी करेंगे।

(v) जनता को स्‍वयं गिनती करने का विकल्‍प दिया जाएगा।

(vi)    इस विशाल डिजिटल अभियान के लिए सटीक सुरक्षा फ़ीचर प्रदान किया गया है।

(vii)    जनगणना 2027 के लिए पूरे देश में जागरूकता, सबको साथ लेकर चलने वाली भागीदारी, सभी का सहयोग और प्रक्षेत्र अभियानों में सहायता के लिए एक केंद्रि‍त और व्‍यापक प्रचारित अभियान संचालित किया जाएगा। इसमें सटीक, प्रमाणिक और समय पर जानकारी साझा करने पर बल दिया जाएगा और समावेशी तथा प्रभावी लोकसंपर्क प्रयास सुनिश्चित किया जाएगा।

(viii) राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति ने 30 अप्रैल 2025 को अपनी बैठक में आगामी जनगणना यानी जनगणना 2027 में जाति गणना को शामिल करने का निर्णय किया। हमारे देश में भारी सामाजिक और जनसांख्यिकीय विविधता तथा संबंधित चुनौतियों के साथ, जनगणना 2027 के दूसरे चरण यानी जनसंख्या गणना (पीई) में जाति डेटा को इलेक्ट्रॉनिक रूप से भी शामिल किया जाएगा।

(ix)    लगभग 30 लाख फील्ड कर्मचारियों को, जिनमें एन्यूमरेटर, सुपरवाइज़र, मास्टर ट्रेनर, प्रभारी अधिकारी और प्रधान/जिला जनगणना अधिकारी शामिल हैं, डेटा कलेक्शन, मॉनिटरिंग और जनगणना अभियान के पर्यवेक्षण के लिए तैनात किया जाएगा। सभी जनगणना कर्मचारियों को जनगणना के काम के लिए उपयुक्‍त मानदेय प्रदान किया जाएगा क्योंकि वे अपने नियमित कार्य के अतिरिक्‍त यह काम भी करेंगे।

रोजगार सृजन क्षमता सहित प्रमुख प्रभाव:

  • वर्तमान में प्रयास यह है कि आगामी जनगणना डेटा पूरे देश में कम से कम समय में उपलब्ध कराया जाए। जनगणना परिणामों को अधिक कस्टमाइज़्ड विज़ुअलाइज़ेशन टूल्स के साथ प्रसारित करने की भी कोशिश की जाएगी। डेटा सबसे निचली प्रशासनिक इकाई यानी गांव/वार्ड स्‍तर तक सभी के साथ साझा किया जाएगा।
  • जनगणना 2027 को सफलतापूर्वक संचालित करने के लिए अलग-अलग दायित्‍वों को पूरा करने हेतु, स्‍थानीय स्‍तर पर लगभग 550 दिनों के लिए लगभग 18,600 तकनीकी श्रमबल का उपयोग किया जाएगा। दूसरे शब्दों में, लगभग 1.02 करोड़ मानव दिवसों का रोजगार सृजित होगा। इसके अतिरिक्‍त प्रभारी/जिला/राज्य स्‍तर पर तकनीकी श्रमबल देने के प्रावधान का परिणाम क्षमता निर्माण के रूप में भी आएगा क्योंकि कार्य की प्रकृति डिजिटल डेटा हैंडलिंग, मॉनिटरिंग और कोऑर्डिनेशन से जुड़ी होगी। इससे इन लोगों के भविष्य में रोज़गार की संभावनाओं में भी मदद मिलेगी।

पृष्ठभूमि:

जनगणना 2027 देश में 16वीं जनगणना और स्‍वतंत्रता के बाद की 8वीं जनगणना  होगी। जनगणना गांव, शहर और वार्ड स्‍तर पर प्राथमिक डेटा उपलब्‍ध कराने का सबसे बड़ा स्रोत है, जो घर की स्थिति; सुविधाएं और परिसंपत्तियां, जनसांख्यिकीय, धर्म, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, भाषा, साक्षरता और शिक्षा, आर्थिक कार्यकलाप, प्रवासन और उर्वरता जैसे अलग-अलग मानकों पर सूक्ष्‍म स्‍तर डेटा प्रदान करता है। जनगणना अधिनियम, 1948 और जनगणना नियमावली, 1990 जनगणना के संचालन के लिए कानूनी संरचना प्रदान करते हैं।

राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के नये उद्देश्य

सहकारिता मंत्रालय ने राज्यों/संघ राज्यक्षेत्रों के सहकारी समिति अधिनियमों में मौजूद किसी कानूनी या नियामक कमी की पहचान नहीं की है जिसके कारण राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2025 के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है।

जब कभी राज्‍य/संघ राज्‍यक्षेत्र राज्‍य-स्‍तरीय सहकारी डेटाबेस के राष्‍ट्रीय सहकारी डेटाबेस (NCD) के साथ एकीकरण के लिए तैयार होते हैं, तब उन्‍हें आवश्‍यक तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है।

सहकारिता मंत्रालय ने राज्‍यों के लिए सहकारी समितियों का डाटा एनसीडी पोर्टल से प्राप्‍त करने हेतु एक मानक API विकसित किया और दिनांक 27.05.2025 को मानक API विनिर्देशन दस्‍तावेज एवं डेटाबेस schema को साझा किया है । तदुपरांत, आरसीएस अनुप्रयोगों से एनसीडी पोर्टल पर लाइव, इवेंट-ड्रिवन डाटा पुशिंग के लिए पुश APIs को विकसित किया गया और सभी संबंधित दस्‍तावेजों और मानक प्रचालन प्रक्रियाओं को राज्‍यों के साथ दिनांक 22.09.2025 को साझा किया गया । RCS कंप्‍यूटरीकरण पूर्ण होने और API एकीकरण की परामर्शिका के साथ एक व्‍यापक चेकलिस्‍ट भी दिनांक 14.11.2025 को जारी की गई । राजस्‍थान, एनसीडी पोर्टल के साथ API एकीकरण का कार्य पूरा कर चुका है । एकीकरण योजना के अनुसार, सफल दो-तरफा एकीकरण और सहकारी डाटा के सिंक्रोनाइजेंशन के लिए राज्‍यों/संघ राज्‍यक्षेत्रों को रिवर्स/पुल API का विकास और संपूर्ण RCS कंप्‍यूटरीकरण सुनिश्चित करना आवश्‍यक है ।

सहकारी क्षेत्र में महिलाओं, युवाओं, अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों और कमजोर वर्ग  की अधिक प्रतिभागिता सुनिश्चित करने के लिए निम्‍नलिखित कदम उठाए गए हैं –

  1. मौजूदा कानून के अनुसमर्थन और सतानवेवां संविधान संशोधन के उपबंधों की अंतर्विष्‍टी द्वारा बहुराज्‍य सहकारी समितियों में शासन सशक्‍त करने, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने तथा निर्वाचन प्रक्रिया में सुधार, आदि के लिए बहुराज्‍य सहकारी सोसाइटी (संशोधन) अधिनियम और नियम, 2023 को क्रमश: दिनांक 03.08.2023 और 04.08.2023 को अधिसूचित किया गया ।   

बहुराज्‍य सहकारी समितियों में महिलाओं और अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों की प्रतिभागिता बढ़ाने के लिए बहुराज्‍य सहकारी समितियों के बोर्ड में महिलाओं के लिए दो सीट और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए एक सीट पर आरक्षण का उपबंध किया गया है ।

  1. महिलाओं और अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों को पर्याप्‍त प्रतिनिधित्‍व देकर प्राथमिक कृषि क्रेडिट समितियों (पैक्‍स) की सदस्‍यता को भी अधिक समावेशी और व्‍यापक बनाया गया है । अब तक, 32 राज्‍यों/संघ राज्‍यक्षेत्रों ने आदर्श उपविधियां अपना ली हैं या उनकी मौजूदा उपविधियां, आदर्श उपविधियों के अनुरूप हैं ।
  2. राष्‍ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC), सहकारी क्षेत्र में महिलाओं, युवाओं, अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों और अन्‍य कमजोर वर्गों की प्रतिभागिता बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठा रहा है जिनका ब्‍योरा निम्‍नानुसार है:

NCDC द्वारा नंदिनी सहकार, स्‍वयं शक्ति सहकार, आयुष्‍मान सहकार और युवा सहकार जैसी समर्पित योजनाएं चलाई जा रही हैं जो महिला-नेतृत्‍व वाली, युवा नेतृत्‍व वाली, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और नवोन्‍मेषी सहकारी समितियों को रियायती वित्तीयन, ब्‍याज अनुदान और स्‍टार्ट-अप सहयोग प्रदान करती हैं । इनका ब्‍योरा निम्‍नानुसार है-

वर्ष 2024-25 के दौरान, महिला सहकारी समितियों को ₹1,355.61 करोड़ की सहायता प्रदान की गई जिससे 41 लाख से अधिक महिला सदस्‍य लाभान्वित हुईं । दिनांक 31.03.2025 के अनुसार, एनसीडीसी ने महिलाओं द्वारा विशिष्‍ट रूप से प्रवर्तित सहकारी सम‍ितियों के विकास के लिए संचयी रूप से ₹7,781.97 करोड़ की वित्तीय सहायता का संवितरण किया है ।

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति सहकारी समितियों की योजनाएं उन्‍हें विपणन, कार्यशील पूंजी और अवसंरचना निर्माण में सहायता प्रदान करती हैं । वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान अनुसूचित जाति सहकारी समितियों को ₹0.18 करोड़ की धनराशि और अनुसूचित जनजाति सहकारी समितियों को ₹29.63 करोड़ की धनराशि का संवितरण किया गया । दिनांक 31.03.2025 के अनुसार, अनुसूचित जाति सहकारी समितियों को ₹323.52 करोड़ और अनुसूचित जनजाति सहकारी समितियों को ₹5308.02 करोड़ का संचयी संवितरण किया गया।

इसके अलावा, एनसीडीसी मात्स्यिकी, पशुधन, हथकरघा, रेशम उत्‍पादन और श्रमिक क्षेत्रों में दुर्बल वर्ग की सहकारी समितियों को सहायता प्रदान करता है जिससे लाखों सदस्‍य लाभान्वित होते हैं, जिनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला सदस्‍य भी शामिल हैं । एनसीडीसी ने महिला सशक्‍तीकरण, सहकारी समितियों के डिजिटलीकरण और ग्रामीण स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल पर विशेष बल देते हुए सहकारी क्षेत्र की उभरती जरूरतों के साथ संरेखित क्षेत्र विशिष्‍ट योजनाओं और केंद्रीकृत उत्‍पादों की शुरूआत की है ।

विहिप केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल की बैठक में देशभर से जुटे लगभग 300 संत

नई दिल्ली, दिसंबर 9, 2025। विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की द्वि-दिवसीय बैठक मंगलवार सायंकाल 3 बजे इंद्रप्रस्थ नगरी (दिल्ली) के पंजाबी बाग में प्रारंभ हुई। ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज की अध्यक्षता में प्रारंभ हुए उद्घाटन सत्र में विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार जी ने हिन्दू समाज के समक्ष चुनौतियों के बारे में बताते हुए पूज्य संतों से विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन का आग्रह किया –

  • हिन्दू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्ति।
  • देश भर में धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं पर विराम हेतु प्रभावी उपाय।
  • धर्म स्वातंत्र्य कानून को संपूर्ण देश में एक समान रूप से लागू करना।
  • देश में बढ़ती जिहादी मानसिकता, कट्टरता और हिंसक घटनाएं।
  • सीमांत क्षेत्रों में बढ़ती सामाजिक समस्याओं और नशामुक्ति अभियान।
  • आगामी जनगणना में सभी हिन्दू अपना धर्म ‘हिन्दू’ ही लिखें।

बैठक में अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री पूज्य स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती जी ने कहा कि कुछ समूह आज जिहाद और आतंकी मानसिकता को उचित ठहराने का दुस्साहस कर रहे हैं। दिल्ली में हुए आतंकी हमले के आरोपी का समर्थन करने की प्रवृत्ति अत्यंत चिंताजनक है। उन्होंने मांग की कि देश की संसद कठोर और प्रभावी कानून लाए। उन्होंने देवालयों की सरकारी अधिग्रहण से मुक्ति तथा जनसंख्या नियंत्रण कानून की आवश्यकता पर भी बल दिया।

बंगाल से पधारे पूज्य संतों ने राज्य की गंभीर स्थिति पर चिंता व्यक्त की और कहा कि कट्टरपंथियों द्वारा सार्वजनिक रूप से दिए जा रहे जिहादी बयान, हिन्दुओं को धमकी व अत्याचार न सिर्फ बंगाल बल्कि सम्पूर्ण देश के लिए चेतावनी है।

सुधांशु जी महाराज ने राममंदिर निर्माण की 500 वर्षों की तपस्या और संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की असली ऊर्जा हमारे संतों और सांस्कृतिक परंपराओं में निहित है। आज समय की आवश्यकता है कि गुरुकुल, पुजारी परंपरा, आश्रम और संस्कार केंद्रों को सशक्त बनाया जाए तथा सनातन समाज अपनी सांस्कृतिक शक्ति के लिए संगठित हो।

बैठक में पूज्य जगद्गुरु स्वामी राम कमलचार्य जी, अटल पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती जी महाराज, आचार्य महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी विशोकानंद जी महाराज, पूज्य स्वामी विवेकानंद जी महाराज, गीता मनीषी ज्ञानानंद जी महाराज, विहिप उपाध्यक्ष ओमप्रकाश सिंघल, संरक्षक दिनेश चंद्र, सह संगठन मंत्री विनायक राव व केन्द्रीय मंत्री अशोक तिवारी सहित देशभर से पधारे अनेक पूजनीय संत और विहिप पदाधिकारी उपस्थित रहे।

वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे – लोकसभा में प्रधानमंत्री के भाषण का मूल पाठ

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

मैं आपका और सदन के सभी माननीय सदस्यों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं कि हमने इस महत्वपूर्ण अवसर पर एक सामूहिक चर्चा का रास्ता चुना है, जिस मंत्र ने, जिस जय घोष ने देश की आजादी के आंदोलन को ऊर्जा दी थी, प्रेरणा दी थी, त्याग और तपस्या का मार्ग दिखाया था, उस वंदे मातरम का पुण्य स्मरण करना, इस सदन में हम सब का यह बहुत बड़ा सौभाग्य है। और हमारे लिए गर्व की बात है कि वंदे मातरम के 150 वर्ष निमित्त, इस ऐतिहासिक अवसर के हम साक्षी बना रहे हैं। एक ऐसा कालखंड, जो हमारे सामने इतिहास के अनगिनत घटनाओं को अपने सामने लेकर के आता है। यह चर्चा सदन की प्रतिबद्धता को तो प्रकट करेगी ही, लेकिन आने वाली पीढियां के लिए भी, दर पीढ़ी के लिए भी यह शिक्षा का कारण बन सकती है, अगर हम सब मिलकर के इसका सदुपयोग करें तो।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यह एक ऐसा कालखंड है, जब इतिहास के कई प्रेरक अध्याय फिर से हमारे सामने उजागर हुए हैं। अभी-अभी हमने हमारे संविधान के 75 वर्ष गौरवपूर्व मनाए हैं। आज देश सरदार वल्लभ भाई पटेल की और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती भी मना रहा है और अभी-अभी हमने गुरु तेग बहादुर जी का 350वां बलिदान दिवस भी बनाया है और आज हम वंदे मातरम की 150 वर्ष निमित्त सदन की एक सामूहिक ऊर्जा को, उसकी अनुभूति करने का प्रयास कर रहे हैं। वंदे मातरम 150 वर्ष की यह यात्रा अनेक पड़ावों से गुजरी है।

लेकिन आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम को जब 50 वर्ष हुए, तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था और वंदे मातरम के 100 साल हुए, तब देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। जब वंदे मातरम 100 साल के अत्यंत उत्तम पर्व था, तब भारत के संविधान का गला घोट दिया गया था। जब वंदे मातरम 100 साल का हुआ, तब देशभक्ति के लिए जीने-मरने वाले लोगों को जेल के सलाखों के पीछे बंद कर दिया गया था। जिस वंदे मातरम के गीत ने देश को आजादी की ऊर्जा दी थी, उसके जब 100 साल हुए, तो दुर्भाग्य से एक काला कालखंड हमारे इतिहास में उजागर हो गया। हम लोकतंत्र के (अस्पष्ट) गिरोह में थे।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

150 वर्ष उस महान अध्याय को, उस गौरव को पुनः स्थापित करने का अवसर है और मैं मानता हूं, सदन ने भी और देश ने भी इस अवसर को जाने नहीं देना चाहिए। यही वंदे मातरम है, जिसने 1947 में देश को आजादी दिलाई। स्वतंत्रता संग्राम का भावनात्मक नेतृत्व इस वंदे मातरम के जयघोष में था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आपके समक्ष आज जब मैं वंदे मातरम 150 निमित्त चर्चा के लिए आरंभ करने खड़ा हुआ हूं। यहां कोई पक्ष प्रतिपक्ष नहीं है, क्योंकि हम सब यहां जो बैठे हैं, एक्चुअली हमारे लिए ऋण स्वीकार करने का अवसर है कि जिस वंदे मातरम के कारण लक्ष्यावादी लोग आजादी का आंदोलन चला रहे थे और उसी का परिणाम है कि आज हम सब यहां बैठे हैं और इसलिए हम सभी सांसदों के लिए, हम सभी जनप्रतिनिधियों के लिए वंदे मातरम के ऋण स्वीकार करने का यह पावन पर्व है। और इससे हम प्रेरणा लेकर के वंदे मातरम की जिस भावना ने देश की आजादी का जंग लड़ा, उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम पूरा देश एक स्वर से वंदे मातरम बोलकर आगे बढ़ा, फिर से एक बार अवसर है कि आओ, हम सब मिलकर चलें, देश को साथ लेकर चलें, आजादी का दीवानों ने जो सपने देखे थे, उन सपनों को पूरा करने के लिए वंदे मातरम 150 हम सब की प्रेरणा बने, हम सब की ऊर्जा बने और देश आत्मनिर्भर बने, 2047 में विकसित भारत बनाकर के हम रहें, इस संकल्प को दोहराने के लिए यह वंदे मातरम हमारे लिए एक बहुत बड़ा अवसर है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

दादा तबीयत तो ठीक है ना! नहीं कभी-कभी इस उम्र में हो जाता है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम की इस यात्रा की शुरुआत बंकिम चंद्र जी ने 1875 में की थी और गीत ऐसे समय लिखा गया था, जब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज सल्तनत बौखलाई हुई थी। भारत पर भांति-भांति के दबाव डाल रहे थी, भांति-भांति के ज़ुल्म कर रही थी और भारत के लोगों को मजबूर किया जा रहा था अंग्रेजों के द्वारा और उस समय उनका जो राष्ट्रीय गीत था, God Save The Queen, इसको भारत में घर-घर पहुंचाने का एक षड्यंत्र चल रहा था। ऐसे समय बंकिम दा ने चुनौती दी और ईट का जवाब पत्थर से दिया और उसमें से वंदे मातरम का जन्म हुआ। इसके कुछ वर्ष बाद, 1882 में जब उन्होंने आनंद मठ लिखा, तो उस गीत का उसमें समावेश किया गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम ने उस विचार को पुनर्जीवित किया था, जो हजारों वर्ष से भारत की रग-रग में रचा-बसा था। उसी भाव को, उसी संस्कारों को, उसी संस्कृति को, उसी परंपरा को उन्होंने बहुत ही उत्तम शब्दों में, उत्तम भाव के साथ, वंदे मातरम के रूप में हम सबको बहुत बड़ी सौगात दी थी। वंदे मातरम, यह सिर्फ केवल राजनीतिक आजादी की लड़ाई का मंत्र नहीं था, सिर्फ हम अंग्रेज जाएं और हम खड़े हो जाएं, अपनी राह पर चलें, इतनी मात्र तक वंदे मातरम प्रेरित नहीं करता था, वो उससे कहीं आगे था। आजादी की लड़ाई इस मातृभूमि को मुक्त कराने का भी जंग था। अपनी मां भारती को उन बेड़ियों से मुक्ति दिलाने का एक पवित्र जंग था और वंदे मातरम की पृष्ठभूमि हम देखें, उसके संस्कार सरिता देखें, तो हमारे यहां वेद काल से एक बात बार-बार हमारे सामने आई है। जब वंदे मातरम कहते हैं, तो वही वेद काल की बात हमें याद आती है। वेद काल से कहा गया है “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” अर्थात यह भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूं।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यही वह विचार है, जिसको प्रभु श्री राम ने भी लंका के वैभव को छोड़ते हुए कहा था “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”। वंदे मातरम, यही महान सांस्कृतिक परंपरा का एक आधुनिक अवतार है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

बंकिम दा ने जब वंदे मातरम की रचना की, तो स्वाभाविक ही वह स्वतंत्रता आंदोलन का स्वर बन गया। पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण वंदे, मातरम हर भारतीय का संकल्प बन गया। इसलिए वंदे मातरम की स्‍तुति में लिखा गया था, “मातृभूमि स्वतंत्रता की वेदिका पर मोदमय, मातृभूमि स्वतंत्रता की वेदिका पर मोदमय, स्वार्थ का बलिदान है, ये शब्द हैं वंदे मातरम, है सजीवन मंत्र भी, यह विश्व विजयी मंत्र भी, शक्ति का आह्वान है, यह शब्द वंदे मातरम। उष्ण शोणित से लिखो, वक्‍तस्‍थलि को चीरकर वीर का अभिमान है, यह शब्द वंदे मातरम।”

आदरणीय अध्यक्ष जी,

कुछ दिन पूर्व, जब वंदे मातरम 150 का आरंभ हो रहा था, तो मैंने उस आयोजन में कहा था, वंदे मातरम हजारों वर्ष की सांस्‍कृतिक ऊर्जा भी थी। उसमें आजादी का जज्बा भी था और आजाद भारत का विजन भी था। अंग्रेजों के उस दौर में एक फैशन हो गई थी, भारत को कमजोर, निकम्मा, आलसी, कर्महीन इस प्रकार भारत को जितना नीचा दिखा सकें, ऐसी एक फैशन बन गई थी और उसमें हमारे यहां भी जिन्होंने तैयार किए थे, वह लोग भी वही भाषा बोलते थे। तब बंकिम दा ने उस हीन भावना को भी झंकझोरने के लिए और सामर्थ्य का परिचय कराने के लिए, वंदे मातरम के भारत के सामर्थ्यशाली रूप को प्रकट करते हुए, आपने लिखा था, त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी। नमामि त्वां नमामि कमलाम्, अमलाम् अतुलां सुजलां सुफलां मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ अर्थात भारत माता ज्ञान और समृद्धि की देवी भी हैं और दुश्मनों के सामने अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली चंडी भी हैं।

अध्यक्ष जी,

यह शब्द, यह भाव, यह प्रेरणा, गुलामी की हताशा में हम भारतीयों को हौसला देने वाले थे। इन वाक्यों ने तब करोड़ों देशवासियों को यह एहसास कराया की लड़ाई किसी जमीन के टुकड़े के लिए नहीं है, यह लड़ाई सिर्फ सत्ता के सिंहासन को कब्जा करने के लिए नहीं है, यह गुलामी की बेड़ियों को मुक्त कर हजारों साल की महान जो परंपराएं थी, महान संस्कृति, जो गौरवपूर्ण इतिहास था, उसको फिर से पुनर्जन्म कराने का संकल्प इसमें है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम, इसका जो जन-जन से जुड़ाव था, यह हमारे स्वतंत्रता संग्राम के एक लंबी गाथा अभिव्यक्त होती है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जब भी जैसे किसी नदी की चर्चा होती है, चाहे सिंधु हो, सरस्वती हो, कावेरी हो, गोदावरी हो, गंगा हो, यमुना हो, उस नदी के साथ एक सांस्कृतिक धारा प्रवाह, एक विकास यात्रा का धारा प्रवाह, एक जन-जीवन की यात्रा का प्रवाह, उसके साथ जुड़ जाता है। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि आजादी जंग के हर पड़ाव, वो पूरी यात्रा वंदे मातरम की भावनाओं से गुजरता था। उसके तट पर पल्लवित होता था, ऐसा भाव काव्य शायद दुनिया में कभी उपलब्ध नहीं होगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

अंग्रेज समझ चुके थे कि 1857 के बाद लंबे समय तक भारत में टिकना उनके लिए मुश्किल लग रहा था और जिस प्रकार से वह अपने सपने लेकर के आए थे, तब उनको लगा कि जब तक, जब तक भारत को बाटेंगे नहीं, जब तक भारत को टुकडों में नहीं बाटेंगे, भारत में ही लोगों को एक-दूसरे से लड़ाएंगे नहीं, तब तक यहां राज करना मुश्किल है और अंग्रेजों ने बाटों और राज करो, इस रास्ते को चुना और उन्होंने बंगाल को इसकी प्रयोगशाला बनाया क्यूंकि अंग्रेज़ भी जानते थे, वह एक वक्त था जब बंगाल का बौद्धिक सामर्थ्‍य देश को दिशा देता था, देश को ताकत देता था, देश को प्रेरणा देता था और इसलिए अंग्रेज भी चाहते थे कि बंगाल का यह जो सामर्थ्‍य है, वह पूरे देश की शक्ति का एक प्रकार से केंद्र बिंदु है। और इसलिए अंग्रेजों ने सबसे पहले बंगाल के टुकड़े करने की दिशा में काम किया। और अंग्रेजों का मानना था कि एक बार बंगाल टूट गया, तो यह देश भी टूट जाएगा और वो यावच चन्द्र-दिवाकरौ राज करते रहेंगे, यह उनकी सोच थी। 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, लेकिन जब अंग्रेजों ने 1905 में यह पाप किया, तो वंदे मातरम चट्टान की तरह खड़ा रहा। बंगाल की एकता के लिए वंदे मातरम गली-गली का नाद बन गया था और वही नारा प्रेरणा देता था। अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन के साथ ही भारत को कमजोर करने के बीज और अधिक बोने की दिशा पकड़ ली थी, लेकिन वंदे मातरम एक स्वर, एक सूत्र के रूप में अंग्रेजों के लिए चुनौती बनता गया और देश के लिए चट्टान बनता गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

बंगाल का विभाजन तो हुआ, लेकिन एक बहुत बड़ा स्वदेशी आंदोलन खड़ा हुआ और तब वंदे मातरम हर तरफ गूंज रहा था। अंग्रेज समझ गए थे कि बंगाल की धरती से निकला, बंकिम दा का यह भाव सूत्र, बंकित बाबू बोलें अच्छा थैंक यू थैंक यू थैंक यू आपकी भावनाओं का मैं आदर करता हूं। बंकिम बाबू ने, बंकिम बाबू ने थैंक यू दादा थैंक यू, आपको तो दादा कह सकता हूं ना, वरना उसमें भी आपको ऐतराज हो जाएगा। बंकिम बाबू ने यह जो भाव विश्व तैयार किया था, उनके भाव गीत के द्वारा, उन्होंने अंग्रेजों को हिला दिया और अंग्रेजों ने देखिए कितनी कमजोरी होगी और इस गीत की ताकत कितनी होगी, अंग्रेजों ने उसको कानूनी रूप से प्रतिबंध लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा था। गाने पर सजा, छापने पर सजा, इतना ही नहीं, वंदे मातरम शब्द बोलने पर भी सजा, इतने कठोर कानून लागू कर दिए गए थे। हमारे देश की आजादी के आंदोलन में सैकड़ों महिलाओं ने नेतृत्व किया, लक्ष्यावधि महिलाओं ने योगदान दिया। एक घटना का मैं जिक्र करना चाहता हूं, बारीसाल, बारीसाल में वंदे मातरम गाने पर सर्वाधिक जुल्म हुए थे। वो बारीसाल आज भारत का हिस्सा नहीं रहा है और उस समय बारीसाल के हमारे माताएं, बहने, बच्चे मैदान उतरे थे, वंदे मातरम के स्वाभिमान के लिए, इस प्रतिबंध के विरोध में लड़ाई के मैदान में उतरी थी और तब बारीसाल कि यह वीरांगना श्रीमती सरोजिनी घोष, जिन्होंने उस जमाने में वहां की भावनाओं को देखिए और उन्होंने कहा था की वंदे मातरम यह जो प्रतिबंध लगा है, जब तक यह प्रतिबंध नहीं हटता है, मैं अपनी चूड़ियां जो पहनती हूं, वो निकाल दूंगी। भारत में वह एक जमाना था, चूड़ी निकालना यानी महिला के जीवन की एक बहुत बड़ी घटना हुआ करती थी, लेकिन उनके लिए वंदे मातरम वह भावना थी, उन्होंने अपनी सोने की चूड़ियां, जब तक वंदे मातरम प्रतिबंध नहीं हटेगा, मैं दोबारा नहीं धारण करूंगी, ऐसा बड़ा व्रत ले लिया था। हमारे देश के बालक भी पीछे नहीं रहे थे, उनको कोड़े की सजा होती थी, छोटी-छोटी उम्र में उनको जेल में बंद कर दिया जाता था और उन दिनों खास करके बंगाल की गलियों में लगातार वंदे मातरम के लिए प्रभात फेरियां निकलती थी। अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था और उस समय एक गीत गूंजता था बंगाल में जाए जाबे जीवोनो चोले, जाए जाबे जीवोनो चोले, जोगोतो माझे तोमार काँधे वन्दे मातरम बोले (In Bengali) अर्थात हे मां संसार में तुम्हारा काम करते और वंदे मातरम कहते जीवन भी चला जाए, तो वह जीवन भी धन्य है, यह बंगाल की गलियों में बच्चे कह रहे थे। यह गीत उन बच्चों की हिम्मत का स्वर था और उन बच्चों की हिम्मत ने देश को हिम्मत दी थी। बंगाल की गलियों से निकली आवाज देश की आवाज बन गई थी। 1905 में हरितपुर के एक गांव में बहुत छोटी-छोटी उम्र के बच्चे, जब वंदे मातरम के नारे लगा रहे थे, अंग्रेजों ने बेरहमी से उन पर कोड़े मारे थे। हर एक प्रकार से जीवन और मृत्यु के बीच लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। इतना अत्याचार हुआ था। 1906 में नागपुर में नील सिटी हाई स्कूल के उन बच्चों पर भी अंग्रेजों ने ऐसे ही जुल्म किए थे। गुनाह यही था कि वह एक स्वर से वंदे मातरम बोल करके खड़े हो गए थे। उन्होंने वंदे मातरम के लिए, मंत्र का महात्म्य अपनी ताकत से सिद्ध करने का प्रयास किया था। हमारे जांबाज सपूत बिना किसी डर के फांसी के तख्त पर चढ़ते थे और आखिरी सांस तक वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम, यही उनका भाव घोष रहता था। खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, रोशन सिंह, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रामकृष्ण विश्वास अनगिनत जिन्होंने वंदे मातरम कहते-कहते फांसी के फंदे को अपने गले पर लगाया था। लेकिन देखिए यह अलग-अलग जेलों में होता था, अलग-अलग इलाकों में होता था। प्रक्रिया करने वाले चेहरे अलग थे, लोग अलग थे। जिन पर जुल्म हो रहा था, उनकी भाषा भी अलग थी, लेकिन एक भारत, श्रेष्ठ भारत, इन सबका मंत्र एक ही था, वंदे मातरम। चटगांव की स्वराज क्रांति जिन युवाओं ने अंग्रेजों को चुनौती दी, वह भी इतिहास के चमकते हुए नाम हैं। हरगोपाल कौल, पुलिन विकाश घोष, त्रिपुर सेन इन सबने देश के लिए अपना बलिदान दिया। मास्टर सूर्य सेन को 1934 में जब फांसी दी गई, तब उन्होंने अपने साथियों को एक पत्र लिखा और पत्र में एक ही शब्द की गूंज थी और वह शब्द था वंदे मातरम।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

हम देशवासियों को गर्व होना चाहिए, दुनिया के इतिहास में कहीं पर भी ऐसा कोई काव्य नहीं हो सकता, ऐसा कोई भाव गीत नहीं हो सकता, जो सदियों तक एक लक्ष्य के लिए कोटि-कोटि जनों को प्रेरित करता हो और जीवन आहूत करने के लिए निकल पड़ते हों, दुनिया में ऐसा कोई भाव गीत नहीं हो सकता, जो वंदे मातरम है। पूरे विश्व को पता होना चाहिए कि गुलामी के कालखंड में भी ऐसे लोग हमारे यहां पैदा होते थे, जो इस प्रकार के भाव गीत की रचना कर सकते थे। यह विश्व के लिए अजूबा है, हमें गर्व से कहना चाहिए, तो दुनिया भी मनाना शुरू करेगी। यह हमारी स्वतंत्रता का मंत्र था, यह बलिदान का मंत्र था, यह ऊर्जा का मंत्र था, यह सात्विकता का मंत्र था, यह समर्पण का मंत्र था, यह त्याग और तपस्या का मंत्र था, संकटों को सहने का सामर्थ्य देने का यह मंत्र था और वह मंत्र वंदे मातरम था। और इसलिए गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने लिखा था, उन्होंने लिखा था, एक कार्ये सोंपियाछि सहस्र जीवन—वन्दे मातरम् (In Bengali) अर्थात एक सूत्र में बंधे हुए सहस्त्र मन, एक ही कार्य में अर्पित सहस्त्र जीवन, वंदे मातरम। यह रविंद्रनाथ टैगोर जी ने लिखा था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

उसी कालखंड में वंदे मातरम की रिकॉर्डिंग दुनिया के अलग-अलग भागों में पहुंची और लंदन में जो क्रांतिकारियों की एक प्रकार से तीर्थ भूमि बन गया था, वह लंदन का इंडिया हाउस वीर सावरकर जी ने वहां वंदे मातरम गीत गाया और वहां यह गीत बार-बार गूंजता था। देश के लिए जीने-मरने वालों के लिए वह एक बहुत बड़ा प्रेरणा का अवसर रहता था। उसी समय विपिन चंद्र पाल और महर्षि अरविंद घोष, उन्होंने अखबार निकालें, उस अखबार का नाम भी उन्होंने वंदे मातरम रखा। यानी डगर-डगर पर अंग्रेजों के नींद हराम करने के लिए वंदे मातरम काफी हो जाता था और इसलिए उन्होंने इस नाम को रखा। अंग्रेजों ने अखबारों पर रोक लगा दी, तो मैडम भीकाजी कामा ने पेरिस में एक अखबार निकाला और उसका नाम उन्होंने वंदे मातरम रखा!

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम ने भारत को स्वावलंबन का रास्ता भी दिखाया। उस समय माचिस के डिबिया, मैच बॉक्स, वहां से लेकर के बड़े-बड़े शिप उस पर भी वंदे मातरम लिखने की परंपरा बन गई और बाहरी कंपनियों को चुनौती देने का एक माध्यम बन गया, स्वदेशी का एक मंत्र बन गया। आजादी का मंत्र स्वदेशी के मंत्र की तरह विस्तार होता गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मैं एक और घटना का जिक्र भी करना चाहता हूं। 1907 में जब वी ओ चिदंबरम पिल्लई, उन्होंने स्वदेशी कंपनी का जहाज बनाया, तो उस पर भी लिखा था वंदेमातरम। राष्ट्रकवि सुब्रमण्यम भारती ने वंदे मातरम को तमिल में अनुवाद किया, स्तुति गीत लिखे। उनके कई तमिल देशभक्ति गीतों में वंदे मातरम की श्रद्धा साफ-साफ नजर आती है। शायद सभी लोगों को लगता है, तमिलनाडु के लोगों को पता हो, लेकिन सभी लोगों को यह बात का पता ना हो कि भारत का ध्वज गीत वी सुब्रमण्यम भारती ने ही लिखा था। उस ध्वज गीत का वर्णन जिस पर वंदे मातरम लिखा हुआ था, तमिल में इस ध्वज गीत का शीर्षक था। Thayin manikodi pareer, thazhndu panintu Pukazhnthida Vareer! (In Tamil) अर्थात देश प्रेमियों दर्शन कर लो, सविनय अभिनंदन कर लो, मेरी मां की दिव्य ध्वजा का वंदन कर लो।

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

मैं आज इस सदन में वंदे मातरम पर महात्मा गांधी की भावनाएं क्या थी, वह भी रखना चाहता हूं। दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित एक साप्ताहिक पत्रिका निकलती थी, इंडियन ओपिनियन और और इस इंडियन ओपिनियन में महात्मा गांधी ने 2 दिसंबर 1905 जो लिखा था, उसको मैं कोट कर रहा हूं। उन्होंने लिखा था, महात्मा गांधी ने लिखा था, “गीत वंदे मातरम जिसे बंकिम चंद्र ने रचा है, पूरे बंगाल में अत्यंत लोकप्रिय हो गया है, स्वदेशी आंदोलन के दौरान बंगाल में विशाल सभाएं हुईं, जहां लाखों लोग इकट्ठा हुए और बंकिम का यह गीत गाया।” गांधी जी आगे लिखते हैंं, यह बहुत महत्वपूर्ण है, वह लिखते हैं यह 1905 की बात है। उन्होंने लिखा, “यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया है, जैसे यह हमारा नेशनल एंथम बन गया है। इसकी भावनाएं महान हैं और यह अन्य राष्ट्रों के गीतों से अधिक मधुर है। इसका एकमात्र उद्देश्य हम में देशभक्ति की भावना जगाना है। यह भारत को मां के रूप में देखता है और उसकी स्तुति करता है।”

अध्यक्ष जी,

जो वंदे मातरम 1905 में महात्मा गांधी को नेशनल एंथम के रूप में दिखता था, देश के हर कोने में, हर व्यक्ति के जीवन में, जो भी देश के लिए जीता-जागता, जिस देश के लिए जागता था, उन सबके लिए वंदे मातरम की ताकत बहुत बड़ी थी। वंदे मातरम इतना महान था, जिसकी भावना इतनी महान थी, तो फिर पिछली सदी में इसके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हुआ? वंदे मातरम के साथ विश्वासघात क्यों हुआ? यह अन्याय क्यों हुआ? वह कौन सी ताकत थी, जिसकी इच्छा खुद पूज्‍य बापू की भावनाओं पर भी भारी पड़ गई? जिसने वंदे मातरम जैसी पवित्र भावना को भी विवादों में घसीट दिया। मैं समझता हूं कि आज जब हम वंदे मातरम के 150 वर्ष का पर्व बना रहे हैं, यह चर्चा कर रहे हैं, तो हमें उन परिस्थितियों को भी हमारी नई पीडिया को जरूर बताना हमारा दायित्व है। जिसकी वजह से वंदे मातरम के साथ विश्वासघात किया गया। वंदे मातरम के प्रति मुस्लिम लीग की विरोध की राजनीति तेज होती जा रही थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्टूबर 1937 को वंदे मातरम के विरुद्ध का नारा बुलंद किया। फिर कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा। बजाय कि नेहरू जी मुस्लिम लीग के आधारहीन बयानों को तगड़ा जवाब देते, करारा जवाब देते, मुस्लिम लीग के बयानों की निंदा करते और वंदे मातरम के प्रति खुद की भी और कांग्रेस पार्टी की भी निष्ठा को प्रकट करते, लेकिन उल्टा हुआ। वो ऐसा क्यों कर रहे हैं, वह तो पूछा ही नहीं, न जाना, लेकिन उन्होंने वंदे मातरम की ही पड़ताल शुरू कर दी। जिन्ना के विरोध के 5 दिन बाद ही 20 अक्टूबर को नेहरू जी ने नेताजी सुभाष बाबू को चिट्ठी लिखी। उस चिट्ठी में जिन्ना की भावना से नेहरू जी अपनी सहमति जताते हुए कि वंदे मातरम भी यह जो उन्होंने सुभाष बाबू को लिखा है, वंदे मातरम की आनंद मठ वाली पृष्ठभूमि मुसलमानों को इरिटेट कर सकती है। मैं नेहरू जी का क्वोट पढ़ता हूं, नेहरू जी कहते हैं “मैंने वंदे मातरम गीत का बैकग्राउंड पड़ा है।” नेहरू जी फिर लिखते हैं, “मुझे लगता है कि यह जो बैकग्राउंड है, इससे मुस्लिम भड़केंगे।”

साथियों,

इसके बाद कांग्रेस की तरफ से बयान आया कि 26 अक्टूबर से कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक कोलकाता में होगी, जिसमें वंदे मातरम के उपयोग की समीक्षा की जाएगी। बंकिम बाबू का बंगाल, बंकिम बाबू का कोलकाता और उसको चुना गया और वहां पर समीक्षा करना तय किया। पूरा देश हतप्रभ था, पूरा देश हैरान था, पूरे देश में देशभक्तों ने इस प्रस्ताव के विरोध में देश के कोने-कोने में प्रभात फेरियां निकालीं, वंदे मातरम गीत गाया लेकिन देश का दुर्भाग्य कि 26 अक्टूबर को कांग्रेस ने वंदे मातरम पर समझौता कर लिया। वंदे मातरम के टुकड़े करने के फैसले में वंदे मातरम के टुकड़े कर दिए। उस फैसले के पीछे नकाब ये पहना गया, चोला ये पहना गया, यह तो सामाजिक सद्भाव का काम है। लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेक दिए और मुस्लिम लीग के दबाव में किया और कांग्रेस का यह तुष्टीकरण की राजनीति को साधने का एक तरीका था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

तुष्टीकरण की राजनीति के दबाव में कांग्रेस वंदे मातरम के बंटवारे के लिए झुकी, इसलिए कांग्रेस को एक दिन भारत के बंटवारे के लिए झुकना पड़ा। मुझे लगता है, कांग्रेस ने आउटसोर्स कर दिया है। दुर्भाग्य से कांग्रेस के नीतियां वैसी की वैसी ही हैं और इतना ही नहीं INC चलते-चलते MMC हो गया है। आज भी कांग्रेस और उसके साथी और जिन-जिन के नाम के साथ कांग्रेस जुड़ा हुआ है सब, वंदे मातरम पर विवाद खड़ा करने की कोशिश करते हैं।

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

किसी भी राष्ट्र का चरित्र उसके जीवटता उसके अच्छे कालखंड से ज्यादा, जब चुनौतियों का कालखंड होता है, जब संकटों का कालखंड होता है, तब प्रकट होती हैं, उजागर होती हैं और सच्‍चे अर्थ में कसौटी से कसी जाती हैं। जब कसौटी का काल आता है, तब ही यह सिद्ध होता है कि हम कितने दृढ़ हैं, कितने सशक्त हैं, कितने सामर्थ्यवान हैं। 1947 में देश आजाद होने के बाद देश की चुनौतियां बदली, देश के प्राथमिकताएं बदली, लेकिन देश का चरित्र, देश की जीवटता, वही रही, वही प्रेरणा मिलती रही। भारत पर जब-जब संकट आए, देश हर बार वंदे मातरम की भावना के साथ आगे बढ़ा। बीच का कालखंड कैसा गया, जाने दो। लेकिन आज भी 15 अगस्त, 26 जनवरी की जब बात आती है, हर घर तिरंगा की बात आती है, चारों तरफ वो भाव दिखता है। तिरंगे झंडे फहरते हैं। एक जमाना था, जब देश में खाद्य का संकट आया, वही वंदे मातरम का भाव था, मेरे देश के किसानों के अन्‍न के भंडार भर दिए और उसके पीछे भाव वही है वंदे मातरम। जब देश की आजादी को कुचलना की कोशिश हुए, संविधान की पीठ पर छुरा घोप दिया गया, आपातकाल थोप दिया गया, यही वंदे मातरम की ताकत थी कि देश खड़ा हुआ और परास्त करके रहा। देश पर जब भी युद्ध थोपे गए, देश को जब भी संघर्ष की नौबत आई, यही वंद मातरम का भाव था, देश का जवान सीमाओं पर अड़ गया और मां भारती का झंडा लहराता रहा, विजय श्री प्राप्त करता रहा। कोरोना जैसा वैश्विक महासंकट आया, यही देश उसी भाव से खड़ा हुआ, उसको भी परास्त करके आगे बढ़ा।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यह राष्ट्र की शक्ति है, यह राष्ट्र को भावनाओं से जोड़ने वाला सामर्थ्‍यवान एक ऊर्जा प्रवाह है। यह चेतना परवाह है, यह संस्कृति की अविरल धारा का प्रतिबिंब है, उसका प्रकटीकरण है। यह वंदे मातरम हमारे लिए सिर्फ स्मरण करने का काल नहीं, एक नई ऊर्जा, नई प्रेरणा का लेने का काल बन जाए और हम उसके प्रति समर्पित होते चलें और मैंने पहले कहा हम लोगों पर तो कर्ज है वंदे मातरम का, वही वंदे मातरम है, जिसने वह रास्ता बनाया, जिस रास्ते से हम यहां पहुंचे हैं और इसलिए हमारा कर्ज बनता है। भारत हर चुनौतियों को पार करने में सामर्थ्‍य है। वंदे मातरम के भाव की वो ताकत है। वंदे मातरम यह सिर्फ गीत या भाव गीत नहीं, यह हमारे लिए प्रेरणा है, राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के लिए हमें झकझोरने वाला काम है और इसलिए हमें निरंतर इसको करते रहना होगा। हम आत्मनिर्भर भारत का सपना लेकर के चल रहे हैं, उसको पूरा करना है। वंदे मातरम हमारी प्रेरणा है। हम स्वदेशी आंदोलन को ताकत देना चाहते हैं, समय बदला होगा, रूप बदले होंगे, लेकिन पूज्य गांधी ने जो भाव व्यक्त किया था, उस भाव की ताकत आज भी हमें मौजूद है और वंदे मातरम हमें जोड़ता है। देश के महापुरुषों का सपना था स्वतंत्र भारत का, देश की आज की पीढ़ी का सपना है समृद्ध भारत का, आजाद भारत के सपने को सींचा था वंदे भारत की भावना ने, वंदे भारत की भावना ने, समृद्ध भारत के सपने को सींचेगा वंदे मातरम के भवना, उसी भावनाओं को लेकर के हमें आगे चलना है। और हमें आत्मनिर्भर भारत बनाना, 2047 में देश विकसित भारत बन कर रहे। अगर आजादी के 50 साल पहले कोई आजाद भारत का सपना देख सकता था, तो 25 साल पहले हम भी तो समृद्ध भारत का सपना देख सकते हैं, विकसित भारत का सपना देख सकते हैं और इस सपने के लिए अपने आप को खपा भी सकते हैं। इसी मंत्र और इसी संकल्प के साथ वंदे मातरम हमें प्रेरणा देता रहे, वंदे मातरम का हम ऋण स्वीकार करें, वंदे मातरम की भावनाओं को लेकर के चलें, देशवासियों को साथ लेकर के चलें, हम सब मिलकर के चलें, इस सपने को पूरा करें, इस एक भाव के साथ यह चर्चा का आज आरंभ हो रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि दोनों सदनों में देश के अंदर वह भाव भरने वाला कारण बनेगा, देश को प्रेरित करने वाला कारण बनेगा, देश की नई पीढ़ी को ऊर्जा देने का कारण बनेगा, इन्हीं शब्दों के साथ आपने मुझे अवसर दिया, मैं आपका बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

राष्ट्र निर्माण में युवा सक्रिय भूमिका निभाएं – दत्तात्रेय होसबाले जी

ऊधमपुर, 07 दिसम्बर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में रविवार को रिवायत हॉल में ”100 वर्ष की यात्रा और भविष्य की दिशा” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा, राष्ट्र निर्माण में युवा सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने भारत के गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराया और बताया कि किस प्रकार हमारे पूर्वजों ने विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया और हमारी सभ्यता एवं सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा। उन्होंने बीते 100 वर्षों में समाज के लिए संघ स्वयंसेवकों द्वारा किए गए निःस्वार्थ सेवाकार्यों और योगदान पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि पिछले एक शताब्दी से संघ ने दैनिक शाखाओं, सेवा गतिविधियों, शैक्षणिक पहलों एवं सामाजिक सुधार कार्यक्रमों के माध्यम से मूल स्तर पर राष्ट्र निर्माण का कार्य सतत् किया है। संघ का मूल उद्देश्य एक सशक्त, आत्मविश्वासी, सांस्कृतिक रूप से दृढ़ एवं एकजुट भारत का निर्माण रहा है। स्वयंसेवकों ने अनुशासन, चरित्र-निर्माण और निःस्वार्थ सेवा के आदर्श पर चलते हुए राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

भविष्य की दिशा पर बात करते हुए उन्होंने ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा पर विशेष बल दिया, उन्होंने इसे भविष्य के सशक्त भारत का आधार बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि पंच परिवर्तन सामाजिक सद्भाव की भावना को मजबूत करने, परिवार को राष्ट्र विकास की मूल इकाई के रूप में सुदृढ़ करने, पर्यावरण संरक्षण को जीवन-शैली का हिस्सा बनाने, स्वदेशी आधारित आत्मनिर्भरता के माध्यम से आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने और प्रत्येक नागरिक को राष्ट्र एवं समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करने पर केंद्रित है। उन्होंने आग्रह किया कि आरएसएस के शताब्दी वर्ष को राष्ट्र सेवा की गौरवशाली यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखते हुए समाज के प्रत्येक वर्ग को राष्ट्र उन्नति के लिए अपनी भूमिका तय करनी चाहिए।

उन्होंने युवा एकत्रीकरण में बड़ी संख्या में उपस्थित युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने तथा नशीली दवाओं एवं अन्य सामाजिक बुराइयों से दूर रहने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है और यदि युवा सही दिशा का चयन करें तो राष्ट्र विकास के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच सकता है। युवा अपने आस-पास होने वाली गतिविधियों के प्रति सजग और जागरूक रहें तथा समाज हित में आगे आएं।

उन्होंने पंच परिवर्तन के संदेश को स्थानीय बैठकों और चर्चाओं के माध्यम से हर घर तक पहुंचाने पर बल दिया। नशा, जबरन धर्मांतरण एवं अन्य सामाजिक विकृतियां आज बड़ी चुनौतियां हैं और इनसे निपटने में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे सकारात्मक परिवर्तन के अग्रदूत बनें, सामाजिक समरसता को मजबूत करें और भारत को उसके उज्ज्वल तथा गौरवमयी भविष्य की ओर अग्रसर करें।