नागपुर, 26 अप्रैल 2026। नाग भूषण अवॉर्ड फाउंडेशन द्वारा आयोजित नाग भूषण समारोह-२०२५ समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि यश पाना ही सब कुछ नहीं है। यश पाने के साथ-साथ व्यक्ति का सार्थक बनना भी ज़रूरी है, और यशस्विता का उपयोग सबकी भलाई के लिए करना चाहिए।
समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, महाराष्ट्र के वित्त और योजना राज्य मंत्री आशीष जयसवाल, पूर्व सांसद तथा फाऊंडेशन के अध्यक्ष अजय संचेती भी उपस्थित थे। समारोह में सोलर इंडस्ट्री इंडिया के चेयरमैन पद्मश्री सत्यनारायण नुवाल को प्रतिष्ठित नाग भूषण पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया, जबकि ‘आयरन मैन ऑस्ट्रेलिया’ कॉम्पिटिशन के विजेता दक्ष खंते को सम्मानित किया गया।
सरसंघचालक जी ने कहा कि दुनिया में शक्ति बहुत ज़रूरी है। इसके बिना कुछ नहीं हो सकता। लेकिन, अगर शक्ति को फलदायिनी बनाना है, तो शक्तिमान लोगों को सिर्फ़ यश पाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए। यश दूसरों को प्रेरित करता है और यह ज़्यादा ज़रूरी है। जब शक्ति के साथ विनम्रता हो, तभी वह सफल होती है। सफलता के साथ विनम्रता, कृतज्ञता का भाव ज़रूरी है। यश पाते हुए इंसान का सार्थक बनना भी उतना ही ज़रूरी है। पिछले 200 वर्षों में हमारे देश में जितने भी महान लोग हुए हैं, उनके जीवन में 90 परसेंट परस्पिरेशन और 10 परसेंट इन्सपिरेशन का सूत्र देखा गया है। मैं और मेरा परिवार के दायरे से बाहर निकलकर अपनेपन के दायरे को बढ़ाएंगे, उतना ही मिला हुआ यश सार्थक होगा।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी ने कहा कि कठिन और चुनौतीपूर्ण हालात में भी कितना बड़ा काम किया जा सकता है और कामयाबी की ऊंचाई तक पहुंचा जा सकता है, यह उदाहरण सत्यनारायण नुवाल ने प्रस्तुत किया है। नुवाल जी ने इस क्षेत्र में ऐसे समय में कदम रखा था, जब देश के डिफेंस इक्विपमेंट प्रोडक्शन के फील्ड में प्राइवेट सेक्टर कितनी तरक्की करेगा, इस बारे में कोई पक्का नहीं था, और अब यह इंडस्ट्री कामयाबी की ऊंचाई पर पहुंच रही है। इस मौके पर हमने दिखाया है कि भारत भी दुनिया में सबसे अच्छी क्वालिटी के हथियार बना सकता है। ऑपरेशन सिंदूर में भी सोलर इंडस्ट्री के योगदान ने बहुत अहम भूमिका निभाई है। दक्ष खंते ने जो कामयाबी हासिल की है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक रोल मॉडल हैं, वह नई पीढ़ी को भी इसी तरह प्रेरित करेंगे।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जी ने कहा कि भारत की डिफेंस ताकत को बढ़ाना बहुत ज़रूरी है ताकि दुनिया में शांति बनी रहे, अच्छी ताकतों का असर बना रहे और बुरी ताकतों पर लगातार नियंत्रण रहे। इसी को ध्यान में रखते हुए देश में डिफेंस टेक्नोलॉजी का डेवलपमेंट किया जा रहा है।
नीति समन्वय, जिम्मेदार एआई नवाचार को प्रोत्साहन देने और श्रम बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव को संबोधित करने के लिए यह एक उच्च स्तरीय अंतर-मंत्रालयी निकाय है
भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) ने एआई नियमन एवं आर्थिक समूह (एआईजीईजी) का गठन किया, जो एक उच्च स्तरीय अंतर-मंत्रालयी निकाय है और एआई नियमन नीति विकास और समन्वय के लिए भारत के केंद्रीय संस्थागत तंत्र के तौर पर कार्य करेगा।
एआईजीईजी के गठन से भारत के एआई नियामक दिशानिर्देशों और आर्थिक सर्वेक्षण में की गई संस्थागत सिफारिशों को औपचारिक रूप दिया गया है।
दिशानिर्देशों में एआई नियमन के लिए समग्र सरकारी दृष्टिकोण को निर्देशित करने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी निकाय की स्थापना की सिफारिश की गई है, जिससे मंत्रालयों, विभागों, नियामकों और सलाहकार निकायों की कार्रवाइयों को एक सुसंगत राष्ट्रीय रणनीति के अनुरूप बनाया जा सके। वहीं, आर्थिक सर्वेक्षण में एआई के इस्तेमाल को श्रम संबंधी वास्तविकताओं और सामाजिक स्थिरता की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाने में सक्षम एक समन्वय प्राधिकरण की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी, रेल एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव एआईजीईजी की अध्यक्षता करेंगे, जबकि इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी व वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद उपाध्यक्ष के तौर पर कार्यभार देखेंगे। एआईजीईजी की सदस्यता में नीति निर्माण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सुरक्षा एवं आर्थिक मामलों से जुड़े सरकार के वरिष्ठ हितधारक शामिल हैं।
एआईजीईजी भारत के एआई नियामक संस्थागत ढांचे के भीतर सर्वोच्च अंतर-मंत्रालयी निकाय के तौर पर कार्य करेगा। इसे एक प्रौद्योगिकी और नीति विशेषज्ञ समिति (टीपीईसी) का सहयोग प्राप्त होगा, जो एआईजीईजी को वैश्विक घटनाक्रमों, उभरती प्रौद्योगिकियों, जोखिमों, विनियमन और एआई नीति एवं शासन से संबंधित अन्य विकसित प्राथमिकताओं पर विशेषज्ञ सलाह प्रदान करेगी।
एआईजीईजी की संरचना और कार्यक्षेत्र के विवरण के लिए, कृपया देखें:
साहित्य अकादमी द्वारा LGBTQ लेखक सम्मेलन का आयोजन एक गहरे वैचारिक विमर्श और टकराव का संकेत है। दुखद है कि यह सम्मेलन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वाधान में हो रहा है। संस्कृति मंत्रालय को देखना चाहिए कि क्या हमारी संस्कृति के सभी सिरमौर विषयों पर साहित्य अकादमी ने चर्चा सम्पन्न करा ली है? केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को साहित्य आकादमी से पूछना होगा कि “भारतीय ज्ञान परंपरा की कितनी चर्चा और कितने लेखक सम्मेलन ‘साहित्य अकादमी’ ने करा लिए हैं? क्या हमारे सभी ज्वलंत और आवश्यक सांस्कृतिक प्रश्न उत्तर पा चुके हैं जो इस प्रकार के विषय को चर्चा केंद्र में रखने का निर्णय लिया गया? प्रश्न यह नहीं है कि किसी विषय पर चर्चा क्यों हो रही है, बल्कि यह है कि किन विषयों को प्राथमिकता दी जा रही है और उसके पीछे कौन-सी वैचारिक शक्तियाँ सक्रिय हैं?
हम एलजीबीटीक्यू के मौलिक अधिकारों के विरोध में नहीं हैं, किंतु इनके कंधों पर रखकर भारतीय मूल्यों, देशज अधिष्ठानों, हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं पर जिस प्रकार बंदूक चलाई जा रही है, उसके विरोध में हैं। भारत में LGBTQ के माध्यम से वैचारिक नक्सलाइट्स बहुधा ही गंद फैलाते रहते हैं। यह उनके प्रति संवेदना के लिए नहीं, अपितु देश में अनावश्यक वितंडा खड़ा करने के लिए किया जाता है।
हमें यह देखना चाहिए कि वे कौन सी छिपी हुई शक्तियाँ हैं जो भारत में बालक, बालिकाओं के लिए एक से बाथरूम चाहती हैं? इस लेखक सम्मेलन का लक्ष्य केवल भारतीय परंपराओं पर तोप दागना ही तो होगा। गे और लेस्बियन सेक्स के ऊपर लेखक सम्मेलन में किस प्रकार की चर्चा आएगी, इसकी कल्पना से हृदय सिहर उठता है।
लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर की चर्चा केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तत्वाधान वाले, साहित्य अकादमी के आयोजन में आना एक खतरनाक वैचारिक विस्फोट है। यह वैचारिक बारूदी सुरंग है जो हमारे वैचारिक अधिष्ठान के नीचे लगातार बिछाई जा रही है।
ट्रांसजेंडर या किन्नर समाज के प्रति सदैव ही हमारे भारतीय समाज का, शास्त्रों का, ऋषि परंपरा का संवेदनशील मंतव्य रहा है। ये हमारी परंपराओं में स्थायी रूप से सम्मानपूर्वक बसे हैं। समय के साथ-साथ इनके विषय में आवश्यक निर्णय लिए जाने चाहिए, जो शासन से लेकर समाज तक लिए भी गए हैं। किंतु ट्रांसजेंडर के अतिरिक्त जो लोग हैं, इनका स्थान हमारे समाज में कहाँ होना चाहिए?
आज भारत में एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि यह पूरा विमर्श तथाकथित “कल्चरल मार्क्सिज़्म” की रणनीति का हिस्सा है। इस विचारधारा का मूल उद्देश्य हमारे समाज की पारंपरिक संरचनाओं, परिवार, धर्म, संस्कृति और नैतिकता, को दुर्बल करना ही है। हमारी ऋषि परंपरा और सनातनी संस्कृति को हटाकर उनकी जगह एक नए प्रकार की वैचारिक संरचना स्थापित करना ही ऐसे आयोजनों का लक्ष्य होता है।
भारतीय संस्कृति की जड़ें अत्यंत गहरी और संतुलित हैं। यहाँ मनुष्य को केवल उसकी इच्छाओं या प्रवृत्तियों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके धर्म, कर्तव्य और सामाजिक उत्तरदायित्व के आधार पर देखा गया है। ऋषि परंपरा ने जीवन को चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – में संतुलित किया है। इस व्यवस्था में ‘काम’ मर्यादा और संतुलन के भीतर है, न कि उच्छृंखल अभिव्यक्ति के रूप में। ‘काम आनंद’ की एक परिपूर्ण परिभाषा, परिधि, प्रतीति, अभिव्यक्ति हमारे पास युगों से है। हमारी ‘विवाह संस्था’ को चोटिल करने का दुष्प्रयास है यह लेखक सम्मेलन। हमारी चिति पर यह नई विध्वंसक मान्यताएँ लादकर वैचारिक बलात्कार किया जा रहा है?
LGBTQ जैसे विषयों को जिस प्रकार से आज शो-ऑफ किया जा रहा है, वह भारतीय दृष्टिकोण से अधिक पश्चिमी अवधारणाओं से प्रेरित है। यह केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं है, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों पर भी इसका प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव पड़ता है। इस दुष्प्रभाव की चिंता करनी चाहिए।
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि देश में राजनीतिक स्तर पर परिवर्तन हुआ है और राष्ट्रीय विचारधारा को समर्थन मिला है। लेकिन क्या वास्तव में व्यवस्था बदली है? हमारी शासन व्यवस्था राष्ट्रीयता की उपेक्षा क्यों करती है? अनजाने में हमारी सत्ता क्यों पश्चिमी मूल्यों की पक्षधर बनकर खड़ी हो जाती है? यह एक गंभीर प्रश्न है।
कई उदाहरण संकेत देते हैं कि शैक्षणिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थानों में अब भी वामपंथी विचारधारा का गहरा प्रभाव बना हुआ है। चाहे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम हों, इतिहास लेखन हो या साहित्यिक संस्थाओं के कार्यक्रम, बहुधा वही दृष्टिकोण प्रमुख होता है जो भारत की परंपरागत मान्यताओं से भिन्न है और उसके विरोध में है।
साहित्य अकादमी का निर्णय भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। प्रश्न स्वाभाविक है कि जब देश में ग्रामीण साहित्य, वेद-उपनिषद, भारतीय भाषाओं के संरक्षण, या राष्ट्रीय साहित्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, तब LGBTQ जैसे विषय को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है?
भारत का “कथित बुद्धिजीवी” वर्ग सदैव ही स्वयं को प्रगतिशील और उदारवादी बताता है, लेकिन इसके विचारों में एक स्पष्ट झुकाव वामपंथी सोच की ओर होता है। यह वर्ग भारतीय परंपराओं को पिछड़ा बताने में संकोच नहीं करता, जबकि पश्चिमी विचारों को आधुनिकता का प्रतीक मानता है। यह वही वर्ग है जो रामायण और महाभारत पर प्रश्न उठाता है। यह वर्ग परंपरागत परिवार व्यवस्था को चुनौती देता है। यह वर्ग भारतीय संस्कृति को “पितृसत्तात्मक” या “रूढ़िवादी” कहकर खारिज करने का प्रयास करता है।
LGBTQ लेखक सम्मेलन जैसे आयोजन इनके लिए केवल साहित्यिक मंच नहीं, बल्कि एक वैचारिक विध्वंस और बारूदी सुरंग फैला देने का माध्यम है। कल्चरल मार्क्सिज्म की अवधारणा कहती है कि यदि किसी समाज को बदलना है, तो उसकी संस्कृति को बदलें। भारत में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे विभिन्न माध्यमों से चल रही है, फिल्मों, वेब सीरीज, शिक्षा और अब साहित्यिक मंचों के माध्यम से। इनका सीधा सा उद्देश्य है — हमारे पारंपरिक मूल्यों को “पुराना” और “अप्रासंगिक” साबित करना, नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर करना, और जड़विहीन पहचान निर्मित करना।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा दक्षिण असम में आयोजित चुनावी रैली के दौरान दिए गए कथित अपमानजनक, उकसावेपूर्ण एवं साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील बयान को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की उत्तर असम प्रांत एवं दक्षिण असम प्रांत इकाइयों ने विधिक कार्रवाई की मांग करते हुए क्रमशः दिसपुर पुलिस थाना तथा सिलचर पुलिस थाना में औपचारिक पुलिस शिकायत दर्ज कराई है।
शिकायतों के अनुसार, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने श्रीभूमि जिले के करीमगंज दक्षिण विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत नीलामबाजार में आयोजित चुनावी सभा में विवादास्पद टिप्पणी की। उन्होंने आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की विचारधारा की तुलना “ज़हरीले साँप” से करते हुए उसे समाप्त किए जाने का आह्वान किया।
शिकायत में उद्धृत कथन के अनुसार, खड़गे ने कहा – “यदि आप नमाज़ अदा कर रहे हों और आपके सामने एक ज़हरीला साँप आ जाए, तो आपको नमाज़ रोककर पहले उस साँप को मारने के लिए दौड़ना चाहिए – क़ुरान यही सिखाती है। मैं कहता हूँ कि आरएसएस और भाजपा उसी ज़हरीले साँप की तरह हैं; यदि आप आरएसएस और भाजपा जैसे ज़हरीले साँप को समाप्त नहीं करेंगे, तो आप जीवित नहीं रह पाएंगे।”
संघ ने इस प्रकार के वक्तव्य पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की टिप्पणियाँ चुनावी अभियान के दौरान धार्मिक भावनाओं का उपयोग करते हुए आरएसएस एवं भाजपा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के विरुद्ध शत्रुता, भय तथा हिंसा को उकसा सकती हैं।
शिकायतों में कहा गया है कि यह बयान जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 83 के अंतर्गत भ्रष्ट चुनावी आचरण की श्रेणी में आता है तथा इससे जनता को आपराधिक रूप से भयभीत करने और विभिन्न राजनीतिक एवं सामाजिक समूहों के समर्थकों के बीच वैमनस्य फैलाने का प्रयास किया गया है। आरएसएस एवं भाजपा की विचारधारा को “ज़हरीला” बताना तथा उनके उन्मूलन की बात करना संगठन के सदस्यों एवं समर्थकों को शारीरिक क्षति पहुँचाने के लिए उकसाने के रूप में देखा जा सकता है।
यह बयान हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने का प्रयास प्रतीत होता है, जिससे असम में सार्वजनिक शांति एवं सौहार्द प्रभावित हो सकता है तथा चुनावी वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। शिकायतों में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो इस प्रकार के वक्तव्य साम्प्रदायिक तनाव या टकराव का कारण बन सकते हैं।
आरएसएस ने बल देकर कहा है कि लोकतांत्रिक संवाद संवैधानिक एवं विधिक मर्यादाओं के भीतर रहना चाहिए तथा चुनावी राजनीति में ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं होना चाहिए जो सामाजिक सद्भाव और सार्वजनिक शांति को खतरे में डाले।
शिकायतें निम्नलिखित पदाधिकारियों ने प्रस्तुत की —
1. श्री खगेन सैकिया
प्रांत कार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
उत्तर असम प्रांत, गुवाहाटी (दिसपुर पुलिस थाना में शिकायत दर्ज)
चरित्र से मजबूत होता है राष्ट्र, संघ मूल्य आधारित संगठन – ले. जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल जी
कुरुक्षेत्र – 28 फरवरी 2026।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण संघ कार्य का मूल आधार हैं। स्पष्ट किया कि नैतिक मूल्यों, आचरण, संस्कार और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के साथ पुरुषार्थ का समन्वय आवश्यक है, तभी स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। सरसंघचालक जी शनिवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त प्रमुख जन गोष्ठी में हरियाणा प्रदेश के प्रमुख शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान मंच पर सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस. जायसवाल जी, उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल जी और प्रांत संघचालक प्रताप सिंह जी उपस्थित रहे ।
सरसंघचालक जी ने परिवार की भूमिका पर विशेष बल देते हुए कहा कि घरों में मंगल संवाद की परंपरा विकसित होनी चाहिए, जहां मन से मन का संवाद हो और बच्चों को उचित-अनुचित का बोध कराया जाए। केवल उपदेश नहीं, बल्कि संवाद और संस्कारयुक्त वातावरण ही व्यक्ति को भटकाव से बचाता है। संपत्ति के समय साथ खड़े होने वाले बहुत होते हैं, लेकिन विपत्ति में साथ देने वाला कौन है, यह परिवार और समाज के संस्कार तय करते हैं। यदि कोई भी इंसान असफल हो जाए या बुरी संगति में पड़ जाए, तो उसे मार्गदर्शन देने वाला, समझाने वाला और संभालने वाला अपना परिवार और समाज ही होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कुटुंब और समाज में संस्कारों का वातावरण निर्माण करना समय की आवश्यकता है, क्योंकि यही वातावरण जिम्मेदार, संवेदनशील और चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ को समझना है तो संघ में आकर ही समझना पड़ेगा। केवल बाहर से देखकर, कल्पना से और फैलाये जा रहे नैरेटिव से नहीं समझ सकते, क्योंकि संघ का जैसा काम है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं है। आज पांचों महाद्वीपों से महत्वपूर्ण लोग संघ को देखने, जानने और समझने के लिए आते हैं। वे भी अपने देश के युवाओं के लिए इस तरह का विचार संगठन खड़ा करने के लिए सहयोग मांगते हैं, क्योंकि उनके पास ऐसा ढांचा नहीं है।
उन्होंने कहा कि जिस तरह से सूर्य जैसा कोई दूसरा सूर्य नहीं, आकाश जैसा दूसरा आकाश नहीं है, उसी तरह से संघ जैसा दूसरा संगठन नहीं है। अगर कोई दूर से देखकर संघ को जानना चाहता है, तो पता नहीं लगेगा। उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवक देश में एक लाख 30 हजार सेवा कार्य चलाते हैं, इसके बाद भी संघ सर्विस आर्गेनाइजेशन नहीं है। कला से लेकर क्रीड़ा तक और विविध क्षेत्रों से लेकर राजनीति तक संघ विचार के कार्यकर्ता हैं, पर संघ एक राजनीतिक संगठन नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ के बारे में एक बात समझने की है कि वह स्पर्धा के भाव से शुरु नहीं हुआ। संघ किसी एक परिस्थिति की प्रतिक्रिया में या विरोध में नहीं चला, बल्कि राष्ट्र के लिए प्रतिबद्धता के साथ समाज को जोड़ने के लिए कार्य करता है। संघ को किसी पर कोई प्रभाव नहीं जमाना, ना ही उसे सत्ता की आवश्यकता है। समाज और देश के लिए संघ के कार्य चलता है, उन सब को पूर्ण करने वाला काम ही संघ है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश आक्रांताओं के खिलाफ हार हुई थी। भारत का एक लंबा कालखंड रहा, जब आक्रांता हम पर राज करते रहे और हम अपनी ही जमीन पर उनसे क्यों हार रहे हैं…इस पर विचार हुआ था। तब किसी ने सोचा था कि एक बार हार गये तो क्या हुआ…। इसी विचार से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए तब 1860 में क्रांतिकारी वासुदेव बलंवत फड़के ने एक भाव जागृत किया। उनका मानना था कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में एक मोर्चा हारा है, देश नहीं, फिर से स्वतंत्रता के लिए लड़ेंगे। इसके बाद स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रभक्तों की लंबी श्रृंखला डॉ. हेडगेवार जी से भगत सिंह, राजगुरु, नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक आगे आई और यह प्रयास लगातार जारी रहे। वासुदेव बलवंत फड़के को आज भी महाराष्ट्र में आद्य क्रांतिकारी कहा जाता है।
डॉ. मोहन भागवत जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्हें जन्मजात देशभक्त बताया। उन्होंने कहा कि बाल्यकाल से ही बालक केशव के मन में राष्ट्रभाव प्रखर था। मात्र 11 वर्ष की आयु में बालक केशव ने गुलामी के प्रतीक के रूप में बांटी गई मिठाई को कचरे में डाल दिया था, जो उनके स्वाभिमानी स्वभाव का संकेत था। उनके माता-पिता भी सेवा भाव से प्रेरित थे और प्लेग पीड़ितों की सेवा में लगे रहते थे, जिसका गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। छात्र जीवन में ही उन्होंने वंदे मातरम् आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उनकी प्रतिभा और राष्ट्रनिष्ठा को देखकर नागपुर के राष्ट्रीय विचार के नेताओं ने उन्हें चिकित्सा शिक्षा के लिए भेजा, जहां उन्होंने प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की और क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े। वे अनुशीलन समिति से भी जुड़े और स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।
सरसंघचालक जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार जी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौर में कई राष्ट्रभक्तों से संवाद किया और क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग किया। बालक केशव से लेकर संघ संस्थापक बनने तक का उनका सफर राष्ट्र चिंतन, प्रयोग और संगठन निर्माण से जुड़ा रहा। लंबे ऐतिहासिक पराधीनता काल के बाद डॉ. हेडगेवार जी ने यह विचार किया कि केवल राजनीतिक परिवर्तन पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज का संगठन और चरित्र निर्माण आवश्यक है। इसी सोच के तहत उन्होंने 10-11 वर्षों तक विभिन्न प्रयोग किए और एक विशिष्ट कार्यपद्धति विकसित की, जिसके आधार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई।
उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना के बाद प्रारंभिक वर्षों में किए गए प्रयोगों से जो कार्यपद्धति विकसित हुई, उसी से संगठन का स्वरूप मजबूत हुआ। उनका मानना था कि समाज को संगठित किए बिना राष्ट्र निर्माण संभव नहीं और देश का कार्य किसी एक संस्था या व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। डॉ. हेडगेवार जी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि महापुरुषों के प्रयास तात्कालिक प्रेरणा देते हैं, लेकिन स्थायी परिवर्तन समाज के आचरण और पुरुषार्थ से आता है। व्यवस्था परिवर्तन के लिए समाज परिवर्तन आवश्यक है और इसके लिए वातावरण निर्माण करने वाले चरित्रवान व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।
उन्होंने कहा कि संघ का मूल कार्य व्यक्तित्व निर्माण और समाज का संगठन है। संघ स्वयं को उद्धारक नहीं मानता, बल्कि समाज को सक्षम बनाने का कार्य करता है। उनके अनुसार, प्रत्येक गांव और बस्ती में ऐसे लोगों का निर्माण जरूरी है जो राष्ट्रीय चरित्र के उदाहरण बनें और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करें। संघ संपूर्ण समाज को जोड़ने की बात करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दू किसी संकीर्ण पहचान का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और गुणात्मक जीवन दृष्टि का प्रतीक है, जिसका मूल आधार संस्कार, आचरण और राष्ट्रहित है।
संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल ने वंदे मातरम् के उद्घोष से शुरुआत की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा को असाधारण बताया। उन्होंने कहा कि विश्व में शायद ही कोई ऐसा संगठन हो जो इतने वर्षों से निरंतर विस्तार और प्रभाव के साथ कार्य कर रहा हो। इस कार्यक्रम में उपस्थित होकर उन्हें नैतिक मूल्यों से प्रेरित वातावरण का अनुभव हुआ। जायसवाल ने संघ को एक मूल्य-आधारित संगठन बताते हुए कहा कि सेना की तरह संघ भी अनुशासन, संस्कार और राष्ट्रीयता के भाव से परिपूर्ण है। उन्होंने हिन्दू संस्कृति को भारत की पहचान बताते हुए कहा कि यदि संस्कृति समाप्त हो जाए तो केवल भूमि रह जाएगी, चरित्र नहीं। उन्होंने कहा कि संघ के माध्यम से राष्ट्र के प्रति निष्ठा और चरित्र निर्माण का कार्य निरंतर बढ़ रहा है।
संघ में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता और यही उसका मूल मंत्र है। उन्होंने महात्मा गांधी के वर्धा प्रवास का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी संघ की शाखा में समानता का भाव देखने को मिला था। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल सेना और उद्योग से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र से तय होती है, और चरित्र निर्माण संघ का मूल आधार है। राष्ट्रीय जिम्मेदारी के संदर्भ में उन्होंने विभाजन काल, भूदान आंदोलन, 1962 के युद्ध और कारगिल युद्ध के दौरान संघ स्वयंसेवकों की सेवा गतिविधियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राहत शिविर, ट्रैफिक नियंत्रण और रक्तदान जैसे कार्यों के माध्यम से संघ ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी सराहा था।
उन्होंने वीर सावरकर के कथन का उल्लेख करते हुए भारतीय सभ्यता को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता बताया। साथ ही कहा कि भारतीय सेना में धर्म नहीं, बल्कि वर्दी और तिरंगा सर्वोपरि होते हैं और सर्वधर्म समभाव की भावना ही उसकी पहचान है। जायसवाल ने विभाजनकारी सोच को त्यागने का आह्वान करते हुए कहा कि अस्पताल में रक्त की पहचान ही सबसे बड़ी होती है, इसलिए समाज में भी एकता का भाव होना चाहिए। संघ में अनुशासन और संस्कार को ही वास्तविक धर्म माना जाता है।
उन्होंने भारत को विश्वगुरु बनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया और कहा कि संघ के मूल मूल्यों पर चलकर ही राष्ट्र की विजय सुनिश्चित हो सकती है। उन्होंने “जय हिंद” के साथ अपने वक्तव्य का समापन किया।
वृत्तचित्र, प्रदर्शनी और संघ की यात्रा
इस अवसर पर परिसर में संघ की 100 वर्ष की यात्रा पर आधारित एक प्रदर्शनी, अस्थाई साहित्य केंद्र, स्वदेशी उत्पाद केंद्र, पंचगव्य उत्पाद केंद्र स्थापित किया गया। संघ की प्रदर्शनी में संघ की क्रमिक विकास यात्रा के साथ इनमें संघ वृक्ष के बीज डॉ. हेडगेवार जी से वटवृक्ष बनने तक की सचित्र यात्रा दिखी। इसी के साथ स्वदेशी जागरण मंच, राष्ट्र सेविका समिति, नर सेवा नारायण सेवा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, विद्या भारती, संस्कार भारती, हिन्दू जागरण मंच, विश्व हिन्दू परिषद, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम तथा भारतीय किसान संघ की झलक देखने को मिली।
सभागार में कार्यक्रम के शुभारंभ से पहले संघ की सौ वर्ष की यात्रा, वृत्त चित्र के माध्यम से प्रस्तुत की गई। इसमें संघ के जनक की जीवनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी प्रमुख घटनाओं को दर्शाया गया। इसमें संघ के गठन से लेकर वर्तमान तक की यात्रा शामिल रही। डॉ. हेडगेवार जी का मूलमंत्र -संगठन कागजों में नहीं, लोगों के दिल में, इस वृत्त चित्र में सामने था।
अवसंरचना का वादा $250 अरब के पार; $20 अरब की डीप-टेक प्रतिबद्धता भारत के एआई इकोसिस्टम में दुनिया के भरोसे को दिखाती हैं
118 देशों के 20 से ज़्यादा सरकार के प्रमुखों और प्रतिनिधियों ने ऐतिहासिक एआई आयोजन में हिस्सा लिया
5 लाख से ज़्यादा प्रतिभागियों और 550 प्री-समिट आयोजनों ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट को दुनिया की सबसे बड़े एआई सम्मेलनों में से एक बनाया
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 आज भारत मंडपम, नई दिल्ली में सम्पन्न हो गया। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को संबोधित किया और पांच दिन के ग्लोबल आयोजन के पैमाने, नतीजों और खास घोषणाओं को संक्षेप में बताया। संवाददाता सम्मेलन में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव श्री एस. कृष्णन, भारत के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता श्री रणधीर जायसवाल और भारत सरकार के प्रधान प्रवक्ता और पत्र सूचना कार्यालय के प्रधान महानिदेशक श्री धीरेंद्र ओझा भी शामिल हुए।
सम्मेलन में अभूतपूर्व भागीदारी देखी गई जिससे ग्लोबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बातचीत को आकार देने में भारत के बढ़ते नेतृत्व की फिर से पुष्टि हुई। उद्घाटन में 118 देशों के सरकारी प्रतिनिधियों के साथ-साथ 20 से ज़्यादा सरकार के प्रमुख और 59 मंत्री स्तर के प्रतिनिधि शामिल हुए। समिट में 100+ ग्लोबल एआई लीडर, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सीएक्सओ, और दुनिया भर के 500 से ज़्यादा बड़े एआई विशेषज्ञ भी शामिल हुए।
भारत के एआई ट्रैजेक्टरी में दुनिया भर की ज़बरदस्त दिलचस्पी को दिखाते हुए, समिट में 5 लाख से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। इस आयोजन के लिए वैश्विक स्तर पर रुचि बन रही थी, शिखर सम्मेलन से पहले 30 देशों में 550 सम्मेलन और कार्यक्रम आयोजित किए गए। मुख्य शिखर सम्मेलन के दिनों में 500 से अधिक साइड इवेंट आयोजित की गई। इससे यह अब तक के सबसे व्यापक बहु-हितधारक एआई कार्यक्रमों में से एक बन गया।
इस अवसर पर संबोधन में मजबूत वैश्विक भागीदारी, भारत के जिम्मेदार एआई दृष्टिकोण के व्यापक समर्थन और देश की तकनीकी क्षमताओं में बढ़ते विश्वास की जानकारी देते हुए, श्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “संख्या महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वास्तव में महत्वपूर्ण यह है कि दुनिया को नए एआई युग में भारत की भूमिका पर भरोसा है। भागीदारी की गुणवत्ता, संवाद की गहराई और जिम्मेदार और संप्रभु एआई के प्रति हमारे दृष्टिकोण का वैश्विक समर्थन यह दर्शाता है कि भारत सिर्फ इस परिवर्तन में भाग नहीं ले रहा है, हम इसे आकार देने में मदद कर रहे हैं।”
मंत्री ने एआई समिट को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भारत के वैश्विक नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण पल बताया। उन्होंने दुनिया के बड़े एआई प्लेयर्स की भागीदारी, मंत्रियों की मज़बूत भागीदारी और युवाओं की अभूतपूर्व भागीदारी पर ज़ोर दिया। इसमें 2.5 लाख से ज़्यादा विद्यार्थियों ने ज़िम्मेदार और नैतिक एआई पर चर्चा में हिस्सा लिया, जिसका परिणाम गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के रूप में सामने आया।
श्री वैष्णव ने कहा कि अवसंरचना से जुड़े निवेश के वादे $250 अरब को पार कर गए हैं, साथ ही लगभग $20 अरब की डीप-टेक वेंचर प्रतिबद्धता भी हैं। यह भारत के एआई इंफ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम में बढ़ते वैश्विक भरोसे को दिखाता है। उन्होंने भारत की सॉवरेन एआई मॉडल स्ट्रैटेजी के मज़बूत अंतरराष्ट्रीय समर्थन पर भी ज़ोर दिया और कम नवाचार से बनाए गए देसी मॉडल्स की गुणवत्ता की तारीफ़ की।
उन्होंने इन घटनाक्रमों को देश को 2047 तक “विकसित भारत” बनाने के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के बड़े विज़न के रूप में वर्णित किया। श्री वैष्णव ने समिट को भारत में दीर्घावधि प्रौद्योगिकीय और सेमीकंडक्टर क्षमता बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
OpenAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) श्री सैम ऑल्टमैन ने आज प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की।
बैठक के बाद, प्रधानमंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत एआई में बहुत तरक्की कर रहा है और प्रतिभा एवं नवाचार के लिए ग्लोबल हब बनने की ओर अग्रसर है।
प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत के प्रतिभावान युवाओं में निवेश करने और इस बदलाव लाने वाले क्षेत्र में जोश भरने का निमंत्रण दिया।
X पर सैम ऑल्टमैन की पोस्ट के जवाब में श्री मोदी ने कहा:
“यह सच में बहुत अच्छी बैठक थी। भारत एआई की दुनिया में बहुत तरक्की कर रहा है। हम दुनिया को अपने प्रतिभावान युवाओं में निवेश करने और इस क्षेत्र में जोश भरने के लिए निमंत्रण देते हैं।
मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है? अथवा मनुष्य अपने सामने जीवन का लक्ष्य कौन सा रखे? इस बारे में लगभग सभी लोगों का मत है कि सुख ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। परंतु, प्रश्न यह है कि सुख से आशय क्या है और मनुष्य को यह सुख कैसे मिल सकता है?
इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी के अनुसार पश्चिमी चिन्तन और हिन्दू दर्शन पर आधारित भारतीय चिन्तन में मूलभूत अन्तर है। इस अन्तर को स्पष्ट करते हुए श्री गुरुजी ने अनेक प्रकार से समझाया है कि सुख के बारे में पश्चिमी विचार अधूरा, एकांगी, अस्थायी एवं क्षणभंगुर है, वस्तुतः तो वह सुख का क्षणिक आभास देते हुए अन्ततः दुखकारी ही है। इसके विपरीत सुख की हिन्दू परिकल्पना समग्र, संतुलित एवं अधिक स्थायी है।
पश्चिमी राष्ट्रों का लक्ष्य – केवल भौतिक सुख
पश्चिमी राष्ट्रों ने सुख की परिकल्पना केवल भौतिक एवं ऐहिक सुख के रूप में ही की है। इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी ने कहा है – ‘‘दुनिया भर की राज्य व्यवस्था एवं राष्ट्र व्यवस्था में मनुष्य मात्र के जीवन का लक्ष्य ऐहिक सुख समृद्धि माना हुआ है। अर्थात् खाना-पीना, वस्त्र प्रावरण, निवास के स्थान, सुखोपभोग, वासना की वृद्धि, वासना संतुष्ट करने के साधनों की वृद्धि, उन साधनों की उपलब्धि, भिन्न-भिन्न मनोविनोद के साधन, यही जगत के सब देशों में सर्वसाधारण लक्ष्य रखा गया है, ऐसा दिखता है। जिसका बड़ा प्रगतिमान वर्णन किया जाता है, वहाँ सामान्य आदमी के यहाँ भी टेलीविजन, रेडियो, मोटर, मोटर साइकिल आदि ऐहिक सुख के लक्षण ही प्रगति के मापदण्ड माने जाते हैं। पर ये वास्तव में मानव की प्रगति के मापदण्ड हैं क्या?’’
भौतिक सुख की यह अवधारणा अधूरी है और यह अंततोगत्वा असंतोष, अशान्ति एवं संघर्ष का ही कारण बनती है, इस बात पर श्री गुरुजी कहते हैं कि मनुष्य मात्र को सुख की प्राप्ति करवा देने का ध्येय सामने रखकर चलने का दावा करने वाली बहुत सी जीवन रचनाएं आज संसार में विद्यमान हैं। भौतिक कामनाओं की पूर्ति में ही सुख है, इसी बात को लेकर अनेक आधुनिक विचार प्रणालियाँ उत्पन्न हुई हैं। परन्तु कुछ काल के लिए होने वाली वासनापूर्ति आगे चलकर मनुष्य को अशान्त करती हुई दिखाई देती है।
श्री गुरुजी के अनुसार इसके कई कारण है – (1) एक तो विषय वासनाओं की पूर्ति सर्वथा असम्भव है। उनको तुष्ट करने की जितनी ही चेष्टा की जाती है, उतनी ही वे बढ़ती हैं। ‘‘अनुभव यह बताता है कि मनुष्य दैहिक आनन्द प्राप्त करने का जितना अधिक प्रयास करता है, उसकी भूख उतनी ही तीव्र होती जाती है। उसे कभी संतुष्टि का अनुभव नहीं होता। इच्छाओं के तुष्टिकरण की चेष्टा जितनी अधिक होगी, उतना ही असंतोष बढे़गा। भौतिक सुख साधनों का संग्रह करने की इच्छा जितनी ही प्रबल होगी, निराशा भी उतनी अधिक होगी। हमारे शास्त्रों ने घोषणा की है – ‘न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति’ (महा0 आदिपर्व)। विषय भोगों से कामनाओं का शमन नहीं होता। शरीर के जीर्णशीर्ण हो जाने पर भी इच्छाएं पूर्ववत् युवा बनी रहती हैं। भर्तृहरि ने भी कहा है – ‘तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः’ (वैराग्य शतक) – यही वास्तविक दुर्दशा है, जिसमें आधुनिक मानव स्वयं को फँसा हुआ पाता है। इस प्रकार वासनापूर्ति असम्भव होने के कारण मानव जीवन दुःखी होता हुआ दिखाई देता है।
(2) भौतिक पदार्थों से अपनी वासनापूर्ति में लगे मनुष्य को प्रारम्भ में भले ही कुछ संतुष्टि मिले पर, ‘‘आगे चलकर वह समझ जाता है कि इन आपाततः सुख देने वाली वस्तुओं में वास्तविक सुख देने की कोई शक्ति नहीं है। सुख तो अपने ही अन्दर समय-समय पर उठने वाली वासना-तंरगों की शांति से होता है। यानि सुख बाह्य वस्तु में नहीं, वासना पूर्ति में भी नहीं; किन्तु वासना के शांत होने में है।’’
(3) श्री गुरुजी का मानना था कि ‘‘व्यक्ति व समाज के लिए वासनाओं का उत्तरोत्तर बढ़ते जाना और उस पर सदा असंतोष का बना ही रहना, यही जगत में बार-बार होने वाले भयंकर युद्धों का प्रमुख कारण है। जगत में अशांति तथा असुख बनाएं रखने में, यही प्रबल कारण है।’’
श्री गुरुजी ने इसी बात को विस्तार से समझाया है, कहा है कि – ‘‘पश्चिम के सुख की अवधारणा पूर्णतया प्रकृतिजन्य इच्छाओं की संतुष्टि पर ही केन्द्रित है, अतः उनके ‘जीवन स्तर को उठाने’ का अर्थ भी केवल भौतिक आनन्द की वस्तुओं को अधिकाधिक जुटाना है। इससे व्यक्ति अन्य विचारों एवं एषणाओं को छोड़कर केवल इसी में पूर्णतया संलग्न हो जाता है। भौतिक सुख-साधनों की प्राप्ति की इच्छा धन-संग्रह को जन्म देती है। अधिकाधिक धन प्राप्ति हेतु शक्ति आवश्यक हो जाती है; किन्तु भौतिक सुख की अतृप्त क्षुधा व्यक्ति को अपनी राष्ट्रीय सीमाओं तक ही नहीं रुकने देती। सबल राष्ट्र राज्य शक्ति के आधार पर दूसरों के दमन व शोषण का भी प्रयास करते हैं। इसमें से संघर्ष व विनाश का जन्म होता है। एक बार यह प्रक्रिया प्रारम्भ हुई कि समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। सभी नैतिक बंधन विच्छिन्न हो जाते हैं। सामान्य मानवीय संवेदनाएं सूख जाती हैं। मनुष्य और पशु में अन्तर स्थापित करने वाले मूल्य एवं गुण समाप्त हो जाते हैं।’’
1962 के भारत-चीन युद्ध को हम आज भी भूल नहीं पाते हैं। चीन ने भारत के विश्वास का कत्ल किया था। ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के नारे को धुंए में उड़ाकर चीन की कम्युनिस्ट सत्ता ने भारत पर अप्रत्याशित युद्ध थोप दिया था। हमारी सेना ने यथासंभव प्रतिकार किया। चीन को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया। भारतीय सेना के शौर्य को देखकर चीन को अपने कदम रोकने पड़े। हालांकि, इस युद्ध में हमने बहुत कुछ खो दिया था। राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी चीन के साथ खड़ी थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण संदेश दिया। संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिक अनुशासन, प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सहयोग, घायल जवानों के प्राणों की रक्षा के लिए रक्त की आपूर्ति, युद्ध क्षेत्र में सैन्य रसद पहुँचाने में सहयोग एवं हवाई पट्टियों की सुरक्षा सहित कई महत्वपूर्ण कार्यों में आगे बढ़कर सहयोग किया। संकट के समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति को देखकर संघ के विरोधी रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का हृदय भी परिवर्तित हो गया। यही कारण रहा कि सरकार ने 26 जनवरी, 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए अन्य नागरिक संगठनों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समविचारी संगठन भारतीय मजदूर संघ को भी राजपथ पर आमंत्रित किया। स्वयंसेवकों ने राष्ट्रीय एकजुटता के लिए अपने कर्तव्यों के निर्वहन का संदेश दिया।
राजपथ (अब कर्तव्य पथ) 26 जनवरी, 1963 की राष्ट्रीय परेड कई कारणों से महत्वपूर्ण है। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद देश का मनोबल डगमगाया हुआ था। ऐसे समय में राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन आवश्यक था। प्रश्न यह था कि जब भारतीय सेना सहित अन्य सुरक्षा बल भी सीमारेखा पर हैं, तब राष्ट्रीय परेड किस प्रकार सम्पन्न की जाए। सुरक्षा कारणों से सेना को वापस भी नहीं बुलाया जा सकता था और राष्ट्रीय परेड की परंपरा को भी नहीं तोड़ सकते थे। तब विचार आया कि उन नागरिक संगठनों को परेड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाए, जिन्होंने इस संकट की घड़ी में देश को संभालने में अपना योगदान दिया है। लोकसभा में 31 मार्च 1998 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह तथ्य सबके सामने रखा कि ऐसी परिस्थिति में किसी ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को सुझाव दिया कि इस बार परेड में ‘जनता का मार्च’ होना चाहिए। दिल्ली नगर निगम के महापौर द्वारा स्थापित ‘सर्वदलीय नागरिक परिषद’ ने विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, जिसे संघ के स्थानीय अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया। सरकार के आमंत्रण पर, केवल दो दिन की तैयारी में संघ के लगभग 3000 स्वयंसेवक राजपथ पर कदम से कदम मिलाकर संचलन कर रहे थे, जिसमें लगभग 100 स्वयंसेवकों का घोष दल भी शामिल था। अगले दिन समाचार पत्रों में स्वयंसेवकों की तस्वीरें भी प्रकाशित हुईं और संवाददाताओं ने यह भी संकेत दिया कि जनता के बीच सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र स्वयंसेवकों का अनुशासित दल ही था। दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ ने परेड की जो तस्वीरें प्रकाशित की, उसमें स्वयंसेवकों के संचलन की तस्वीर भी शामिल थी। हिन्दुस्तान में प्रकाशित समाचार में लिखा गया कि “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों का प्रदर्शन बहुत आकर्षक रहा”। इसी प्रकार, द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक समाचार में उल्लेख किया गया है कि संघ के अनुषांगिक संगठन ‘भारतीय मजदूर संघ’ ने भी परेड में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।
कुछ वर्षों तक कम्युनिस्ट एवं कांग्रेस समर्थित लेखकों/पत्रकारों ने 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के शामिल होने को सिरे से खारिज किया। लेकिन, जब उस समय के समाचारपत्रों में प्रकाशित चित्र, समाचार और सिलेक्टिव वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू में प्रकाशित सामग्री सामने आई, तब नए प्रकार के कुतर्क गढ़े जा रहे हैं। इस सबके बीच निर्विवाद सच यही है कि संकट के समय में संघ ने अपने कर्तव्यों का पालन किया और राष्ट्रीय परेड में हिस्सा लेकर राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। संघ विरोधी खेमे में यह खलबली उस समय भी थी, जब यह जानकारी सामने आई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय परेड में शामिल हो रहा है। दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ ने 25 जनवरी, 1963 को “रा. स्व. संघ भी परेड में भाग लेगा” शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया। कई लोगों ने संघ के स्वयंसेवकों को रोकने के लिए भरसक प्रयास किए, लेकिन उनको सफलता नहीं मिली।
जनवरी को कांग्रेस की एक बैठक में इस विषय में काफी चर्चा हुई। इसका विवरण सिलेक्टिव वर्क ऑफ जवाहरलाल नेहरू में प्रकाशित है। बैठक में पंडित नेहरू ने बताया था कि “कुछ कांग्रेसियों ने उनसे शिकायत की थी कि संघ वाले गाजियाबाद और मेरठ से वर्दीधारी लोग (स्वयंसेवक) जमा कर रहे हैं”। कांग्रेस के नेताओं ने पंडित के सामने यह दु:ख भी जाहिर किया कि हमारे पास इतनी वर्दी नहीं है। कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ता भी परेड में दिखायी नहीं दिए। तब प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उन लोगों को स्पष्ट कहा कि “मैं तो नहीं रोक सकता आरएसएस को आने से, (किसी को भी आने से रोकना) बहुत गलत बात है”। इसका अर्थ है कि सब प्रकार से जानकारी होने और कांग्रेसियों का विरोध होने के बाद भी नेहरू जी ने संघ को राष्ट्रीय परेड में शामिल होने दिया।
स्मरण रहे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1962 के युद्ध के समय ही नहीं, बल्कि उसके बाद हुए युद्धों में भी भारत सरकार के साथ खड़े रहकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी संघ ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था, रणनीतिक ठिकानों की पहरेदारी, सैनिकों के लिए भोजन एवं रसद की आपूर्ति, नागरिक सुरक्षा एवं अनुशासन का पालन कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने स्वयंसेवकों के कार्य की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की और आकाशवाणी पर उनके योगदान का जिक्र किया। याद हो कि युद्ध प्रारंभ होते ही राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ के साथ ऐतिहासिक चर्चा भी की थी। 1971 के युद्ध के दौरान सैनिकों के लिए 24 घंटे भोजन एवं दवा की आपूर्ति, अपनी जान बचाकर भारत आए हिन्दू एवं मुस्लिम शरणार्थियों के लिए राहत शिविर, युद्ध में घायलों के लिए रक्तदान महायज्ञ और हवाई पट्टियों की मरम्मत जैसे कार्य स्वयंसेवकों ने किए। उनकी देशभक्ति एवं निःस्वार्थ सेवाभाव को देखकर सेना प्रमुख जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) सैम मानेकशॉ ने कहा था कि “इन युवाओं की निःस्वार्थ सेवा, फुर्ती और अनुशासन देखकर मुझे गर्व होता है। अगर सेना के बाद देश में कोई सबसे अनुशासित संगठन है, तो वह यही है”।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर भारत सरकार ने जिस स्मृति डाक टिकट को जारी किया है, उसमें भी 1963 की गणतंत्र दिवस में शामिल स्वयंसेवकों के समूह का चित्र शामिल किया गया है। इसके साथ ही एक दूसरे चित्र में सेवा एवं राहत कार्य करते स्वयंसेवक दिखायी दे रहे हैं। संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर सरकार ने एक बार फिर ‘राष्ट्र सेवा के 100 वर्ष’ की संघ यात्रा का स्मरण देशवासियों को कराया।
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (25 दिसंबर, 2025) राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में संथाली भाषा में भारत का संविधान जारी किया।
इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि यह सभी संथाली लोगों के लिए गर्व और खुशी की बात है कि भारत का संविधान अब संथाली भाषा में, ओल चिकी लिपि में उपलब्ध है। इससे वे संविधान को अपनी भाषा में पढ़ और समझ सकेंगे।
राष्ट्रपति ने कहा कि इस वर्ष हम ओल चिकी लिपि की शताब्दी मना रहे हैं। उन्होंने विधि एवं न्याय मंत्री और उनकी टीम की प्रशंसा की, जिन्होंने शताब्दी वर्ष में भारत के संविधान को ओल चिकी लिपि में प्रकाशित करवाया।
इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति श्री सीपी राधाकृष्णन और केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल शामिल थे।
संथाली भाषा, जिसे 2003 के 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, भारत की सबसे प्राचीन जीवित भाषाओं में से एक है। यह झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार में बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों द्वारा बोली जाती है।