यश व सफलता के साथ विनम्रता, कृतज्ञता का भाव ज़रूरी है – डॉ. मोहन भागवत जी

नागपुर, 26 अप्रैल 2026। नाग भूषण अवॉर्ड फाउंडेशन द्वारा आयोजित नाग भूषण समारोह-२०२५ समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि यश पाना ही सब कुछ नहीं है। यश पाने के साथ-साथ व्यक्ति का सार्थक बनना भी ज़रूरी है, और यशस्विता का उपयोग सबकी भलाई के लिए करना चाहिए।

समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, महाराष्ट्र के वित्त और योजना राज्य मंत्री आशीष जयसवाल, पूर्व सांसद तथा फाऊंडेशन के अध्यक्ष अजय संचेती भी उपस्थित थे। समारोह में सोलर इंडस्ट्री इंडिया के चेयरमैन पद्मश्री सत्यनारायण नुवाल को प्रतिष्ठित नाग भूषण पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया, जबकि ‘आयरन मैन ऑस्ट्रेलिया’ कॉम्पिटिशन के विजेता दक्ष खंते को सम्मानित किया गया।

सरसंघचालक जी ने कहा कि दुनिया में शक्ति बहुत ज़रूरी है। इसके बिना कुछ नहीं हो सकता। लेकिन, अगर शक्ति को फलदायिनी बनाना है, तो शक्तिमान लोगों को सिर्फ़ यश पाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए। यश दूसरों को प्रेरित करता है और यह ज़्यादा ज़रूरी है। जब शक्ति के साथ विनम्रता हो, तभी वह सफल होती है। सफलता के साथ विनम्रता, कृतज्ञता का भाव ज़रूरी है। यश पाते हुए इंसान का सार्थक बनना भी उतना ही ज़रूरी है। पिछले 200 वर्षों में हमारे देश में जितने भी महान लोग हुए हैं, उनके जीवन में 90 परसेंट परस्पिरेशन और 10 परसेंट इन्सपिरेशन का सूत्र देखा गया है। मैं और मेरा परिवार के दायरे से बाहर निकलकर अपनेपन के दायरे को बढ़ाएंगे, उतना ही मिला हुआ यश सार्थक होगा।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी ने कहा कि कठिन और चुनौतीपूर्ण हालात में भी कितना बड़ा काम किया जा सकता है और कामयाबी की ऊंचाई तक पहुंचा जा सकता है, यह उदाहरण सत्यनारायण नुवाल ने प्रस्तुत किया है। नुवाल जी ने इस क्षेत्र में ऐसे समय में कदम रखा था, जब देश के डिफेंस इक्विपमेंट प्रोडक्शन के फील्ड में प्राइवेट सेक्टर कितनी तरक्की करेगा, इस बारे में कोई पक्का नहीं था, और अब यह इंडस्ट्री कामयाबी की ऊंचाई पर पहुंच रही है। इस मौके पर हमने दिखाया है कि भारत भी दुनिया में सबसे अच्छी क्वालिटी के हथियार बना सकता है। ऑपरेशन सिंदूर में भी सोलर इंडस्ट्री के योगदान ने बहुत अहम भूमिका निभाई है। दक्ष खंते ने जो कामयाबी हासिल की है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक रोल मॉडल हैं, वह नई पीढ़ी को भी इसी तरह प्रेरित करेंगे।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जी ने कहा कि भारत की डिफेंस ताकत को बढ़ाना बहुत ज़रूरी है ताकि दुनिया में शांति बनी रहे, अच्छी ताकतों का असर बना रहे और बुरी ताकतों पर लगातार नियंत्रण रहे। इसी को ध्यान में रखते हुए देश में डिफेंस टेक्नोलॉजी का डेवलपमेंट किया जा रहा है।

बिछड़े बंधुओं को स्वधर्म में लाएंगे, सभी को गले लगाएंगे – विहिप अध्यक्ष

कालड़ी (केरलम)।

एकता, प्रेम व मानवीय जीवन मूल्यों के साथ अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदि शंकराचार्य जी की जयंती पर विश्व हिन्दू परिषद ने एक संकल्प लिया कि गत 1000 वर्षों में किन्हीं कारणों से हिन्दू धर्म से बिछड़े बंधुओं को हम स्वधर्म में लाएंगे। विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने आदि शंकराचार्य जी की, कालड़ी में स्थित पावन जन्मभूमि (कोच्चि – एर्नाकुलम के निकट) पर एकत्र श्रद्धालुओं से कहा कि पूज्य आदि शंकराचार्य जी ने संपूर्ण मानवता और उनके कल्याण के लिए काम किया। वहीं दूसरी ओर विश्व में कुछ लोग आज सिर्फ किसी एक पुस्तक या विचार से बंधकर और बांधकर अपने कट्टरपंथी विचार थोपना चाहते हैं जो मानवता के लिए चुनौती बनता जा रहा है।

“दुनिया के कुछ हिस्सों में, कुछ लोग कट्टरपंथी विचारों को थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जो मानवता के लिए एक गंभीर खतरा है। हम दुनिया को ऐसी विनाशकारी विचारधाराओं से बचाने और उन लोगों को वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो अपने मूल विश्वास से अलग हो गए हैं।”

“हम शंकराचार्य की उस परंपरा का पालन करते हैं, जिनमें इतनी महानता थी कि उन्होंने अत्यंत वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति को भी अपना गुरु स्वीकार कर लिया। हम हिन्दू समाज में आज भी व्याप्त जातिगत भेदभाव की बुराई को पूरी तरह से मिटाने के लिए कृतसंकल्प हैं।”

उन्होंने वहां निकाली गई एक पवित्र धार्मिक यात्रा में भी सहभागिता की। कार्यक्रम में विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल के सदस्य पूज्य स्वामी सतस्वरूपानंद जी महाराज, पूज्य स्वामी तीर्थानंद जी महाराज, कोचिंग शिपयार्ड के सेवानिवृत्त अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक डॉ. मधु एस नायर जी, अलुवा जिला संघचालक जस्टिस सुंदरम गोविंद जी तथा पद्मश्री कुंजोल मास जी भी उपस्थित थे।

बस्तर को सिर्फ शांत नहीं, समर्थ बनाना होगा

दिलचस्प बात यह है कि बस्तर शब्द में ही उसकी विकास-यात्रा के संकेत छिपे हैं। एक मत यह है कि “बस्तर” शब्द “वस्त्र” से बना है। यदि ऐसा हैतो यह केवल भाषिक संयोग नहींबल्कि इस भूभाग की सांस्कृतिक और आर्थिक दिशा की ओर संकेत है। बस्तर का कोसा केवल एक कपड़ा नहींबल्कि उसकी पहचानउसका शिल्प और उसकी बड़ी आर्थिक संभावना है।

तारन प्रकाश सिन्हा

बस्तर को हमने बहुत लंबे समय तक एक ही नजर से देखा – संघर्ष, नक्सल, बंदूक और असुरक्षा। इतनी लंबी अवधि तक यही तस्वीर हमारे सामने रखी गई कि बस्तर का दूसरा चेहरा, जो कहीं अधिक गहरा, पुराना और जीवंत है, लगभग ओझल हो गया। जबकि सच यह है कि बस्तर केवल संघर्ष का भूगोल नहीं है; वह सभ्यता, स्मृति, श्रम, जंगल, जल, कला और समुदाय का क्षेत्र है। अब जब हालात पूरी तरह बदल गए हैं, भय और असुरक्षा की रात व्यतीत हो गई। तब बड़ा प्रश्न यही कि अब आगे क्या? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है, अब बस्तर का रास्ता कैसा हो?

मेरे विचार से इसका उत्तर सीधा है, बस्तर को विकास चाहिए। लेकिन ऐसा विकास नहीं जो बाहर से लाकर उस पर रख दिया जाए, बल्कि ऐसा जो यहीं की मिट्टी से निकले, यहीं के लोगों की आकांक्षाओं से बने और यहीं के समाज की भागीदारी से आकार ले। बस्तर को कागजों, फाइलों और योजनाओं से नहीं समझा जा सकता। उसे समझना हो तो उसके गांवों, उसके लोक विश्वास, उसकी निर्णय-प्रणाली और उसके सामाजिक ढांचे को समझना होगा।

उदाहरण के लिए बड़े डोंगर को देखिए। वहां जब राजा नहीं रहा, तो लोगों ने नींबू को ही “लिमऊ राजा” का प्रतीक मान लिया। एक चट्टान पर बैठकर, धूप-दीप के साथ, लोग सामूहिक रूप से निर्णय लेते हैं। यह परंपरा आज भी जीवित है। यह कोई साधारण लोककथा नहीं, बल्कि बस्तर की सामुदायिक बुद्धि का प्रमाण है। यह बताती है कि यहां निर्णय ऊपर से थोपे नहीं जाते, बल्कि साथ बैठकर लिए जाते हैं। यही वह बुनियादी बात है, जिसे हमें बस्तर के विकास में भी समझना होगा।

दिलचस्प बात यह है कि बस्तर शब्द में ही उसकी विकास-यात्रा के संकेत छिपे हैं। एक मत यह है कि “बस्तर” शब्द “वस्त्र” से बना है। यदि ऐसा है, तो यह केवल भाषिक संयोग नहीं, बल्कि इस भूभाग की सांस्कृतिक और आर्थिक दिशा की ओर संकेत है। बस्तर का कोसा केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान, उसका शिल्प और उसकी बड़ी आर्थिक संभावना है। आज जब दुनिया प्राकृतिक, हस्तनिर्मित और टिकाऊ वस्त्रों की ओर लौट रही है, तब बस्तर का कोसा केवल परंपरा भर नहीं रह जाता; वह रोजगार, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण उद्योग और वैश्विक बाजार तक पहुंच का अवसर बन सकता है। यदि इसे सही डिज़ाइन, ब्रांडिंग, गुणवत्ता, विपणन और ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए, तो कोसा बस्तर की अर्थव्यवस्था का बड़ा स्तंभ बन सकता है।

बस्तर शब्द की एक और लोक-व्याख्या “बांस तरी” से भी जुड़ती है, अर्थात बाँसों के नीचे या बाँसों के बीच बसा भूभाग। यह व्याख्या भी केवल भाषा की जिज्ञासा नहीं, बल्कि बस्तर की भौगोलिक और आर्थिक सच्चाई की ओर संकेत करती है। बस्तर में बाँस हर जगह है, लेकिन बाँस आधारित उद्योग अभी भी अपनी पूरी संभावना तक नहीं पहुंचा। जबकि आज बाँस केवल टोकरी या परंपरागत उपयोग की चीज नहीं रह गया है। उससे फर्नीचर, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, सजावटी उत्पाद, अगरबत्ती स्टिक, पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग, निर्माण सामग्री और कई प्रकार के सूक्ष्म उद्योग खड़े किए जा सकते हैं। बस्तर में बाँस केवल वन-उत्पाद नहीं, बल्कि एक बड़ी हरित अर्थव्यवस्था की बुनियाद बन सकता है।

बस्तर की असली पूंजी जल, जमीन, जंगल और हाट-बाजार हैं। ये केवल संसाधन नहीं, बल्कि यहां के जीवन-तंत्र के चार स्तंभ हैं। हम अक्सर हाट-बाजार को सिर्फ एक बाजार मान लेते हैं, जबकि बस्तर में हाट का अर्थ कहीं अधिक व्यापक है। हाट यहां आर्थिक संस्था भी है, सामाजिक मंच भी और सांस्कृतिक स्पंदन भी। वहीं खरीद-बिक्री होती है, वहीं खबरें चलती हैं, वहीं रिश्ते बनते हैं, वहीं समाज अपने को देखता है। कई जगहों पर आज भी भरोसा नकद से बड़ा माध्यम है। इसलिए यदि बस्तर की स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है, तो हाट-बाजार को मजबूत करना ही होगा, बेहतर व्यवस्था, भंडारण, स्थानीय उत्पादों के लिए जगह, महिला समूहों के लिए मंच और बाजार से सीधा जुड़ाव देकर।

जल की दृष्टि से भी बस्तर बेहद महत्वपूर्ण संभावना वाला क्षेत्र है। यह इलाका गोदावरी और महानदी के बीच फैला है। दक्षिण बस्तर में कई स्थानों पर भूमि की प्रकृति ऐसी है कि पानी बहुत गहराई तक समाने के बजाय बहकर निकल जाता है। इसका अर्थ है कि यहां जल-संचयन की संभावना अत्यंत बड़ी है। पुरानी कहावत “सात आगर सात कोरी” यूं ही नहीं बनी। यह उस जल-संस्कृति की याद है, जिसमें तालाब, आगर और सामुदायिक जल-संरचनाएं जीवन का हिस्सा थीं। बारसूर और बड़े डोंगर आज भी इस परंपरा की गवाही देते हैं। यदि हम फिर से इस दिशा में गंभीरता से काम करें, तो तालाब, सिंचाई और मछली पालन तीनों मिलकर बस्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दे सकते हैं।

खेती की दृष्टि से भी बस्तर को नए नजरिए से देखने की जरूरत है। यहां समस्या खेती की कमी नहीं, बल्कि खेती की दिशा की है। कोदो, कुटकी, रागी और अन्य मोटे अनाज यहां की ताकत हैं। यही इस मिट्टी और जलवायु के सबसे स्वाभाविक साथी हैं। आज जब पूरा विश्व मिलेट्स की ओर लौट रहा है, तब बस्तर के पास एक तैयार अवसर मौजूद है। लेकिन इसे केवल उत्पादन तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। जब तक प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच नहीं बनेगी, तब तक किसान को उसका पूरा लाभ नहीं मिलेगा।

बस्तर केवल संसाधनों का भूगोल नहीं, कौशल की सभ्यता भी है। यहां कोसा है, बाँस शिल्प है, धातु कला है, लकड़ी और चमड़े का पारंपरिक काम है। यहां हाथ केवल श्रम नहीं करते, वे सृजन भी करते हैं। जरूरत इस बात की है कि इन कौशलों को “हुनर” कहकर छोड़ न दिया जाए, बल्कि इन्हें उद्योग, डिज़ाइन, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ा जाए। यही वह रास्ता है, जहां बस्तर का भविष्य केवल कृषि या वन पर नहीं, बल्कि ग्रामीण रचनात्मक अर्थव्यवस्था पर भी टिक सकता है।

फिर सवाल उठता है कि इतनी संभावनाएं होने के बावजूद हम अभी भी पूरी रफ्तार से आगे क्यों नहीं बढ़ पाए? शायद इसलिए कि हमने कई बार संसाधनों को देखा, लेकिन लोगों की भागीदारी को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। हमने योजनाएं बनाईं, लेकिन हर बार यह सुनिश्चित नहीं किया कि लोग उनके निर्माता भी बनें। हमने ढांचे खड़े किए, लेकिन हमेशा यह नहीं देखा कि उनमें स्थानीय समाज का स्वामित्व कितना है। और बस्तर में यही अंतर सबसे निर्णायक है।

बस्तर में काम करना है, तो बस्तर के तरीके से करना होगा। यहां बैठना होगा, सुनना होगा, समझना होगा। यहां गांव को लाभार्थी नहीं, भागीदार मानना होगा। ग्राम सभा, पारंपरिक संस्थाएं, महिला समूह, युवा, वन समितियां और स्थानीय उत्पादक समूह, इन्हें विकास की प्रक्रिया का केंद्र बनाना होगा। बस्तर में प्रशासन की भूमिका सबसे प्रभावी तब होगी जब वह केवल लागू करने वाला तंत्र न रहकर विश्वास का सेतु बने।

अब बस्तर के लिए यह पर्याप्त नहीं है कि हम सिर्फ यह कहें कि “स्थिति सुधर रही है।” असली सवाल यह है कि क्या बस्तर अब आर्थिक रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से आत्मविश्वासी और सांस्कृतिक रूप से सम्मानित दिशा में बढ़ रहा है? स्थायी शांति केवल सुरक्षा से नहीं आती। वह तब आती है, जब समाज को महसूस हो कि व्यवस्था में उसका हिस्सा है, निर्णय में उसकी आवाज़ है और विकास में उसका सम्मान है। इसलिए बस्तर को अब सिर्फ शांत नहीं, बल्कि समर्थ बनाना होगा।

बस्तर इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। वह अंधेरे से पूरी तरह बाहर नहीं आया है, लेकिन अब वह केवल अंधेरे की कहानी भी नहीं रह गया। यही वह समय है, जब हमें बहुत सावधानी से तय करना होगा कि बस्तर के लिए अगला कदम क्या हो। हमें सिर्फ यह नहीं देखना है कि वहां क्या बनाना है, बल्कि यह भी तय करना है कि कैसे बनाना है, किसके साथ बनाना है और किसकी शर्तों पर बनाना है।

अगर बस्तर की असली ताकत को एक वाक्य में कहा जाए, तो वह यह है कि यहां विकास की जमीन मौजूद है, बस उसे बस्तर की भाषा में पढ़ने की जरूरत है। और बस्तर की भाषा क्या है? जल की भाषा, जंगल की भाषा, हाट की भाषा, कोसा की भाषा, बाँस की भाषा और सबसे बढ़कर समुदाय की भाषा।

भारत की राष्ट्रीय एआई नियमन रणनीति का नेतृत्व करने के लिए सरकार ने एआई नियमन एवं आर्थिक समूह (एआईजीईजी) का गठन किया

नीति समन्वय, जिम्मेदार एआई नवाचार को प्रोत्साहन देने और श्रम बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव को संबोधित करने के लिए यह एक उच्च स्तरीय अंतर-मंत्रालयी निकाय है

भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) ने एआई नियमन एवं आर्थिक समूह (एआईजीईजीका गठन किया, जो एक उच्च स्तरीय अंतर-मंत्रालयी निकाय है और एआई नियमन नीति विकास और समन्वय के लिए भारत के केंद्रीय संस्थागत तंत्र के तौर पर कार्य करेगा।

एआईजीईजी के गठन से भारत के एआई नियामक दिशानिर्देशों और आर्थिक सर्वेक्षण में की गई संस्थागत सिफारिशों को औपचारिक रूप दिया गया है।

दिशानिर्देशों में एआई नियमन के लिए समग्र सरकारी दृष्टिकोण को निर्देशित करने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी निकाय की स्थापना की सिफारिश की गई है, जिससे मंत्रालयों, विभागों, नियामकों और सलाहकार निकायों की कार्रवाइयों को एक सुसंगत राष्ट्रीय रणनीति के अनुरूप बनाया जा सके। वहीं, आर्थिक सर्वेक्षण में एआई के इस्तेमाल को श्रम संबंधी वास्तविकताओं और सामाजिक स्थिरता की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाने में सक्षम एक समन्वय प्राधिकरण की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी, रेल एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव एआईजीईजी की अध्यक्षता करेंगे, जबकि इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी व वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद उपाध्यक्ष के तौर पर कार्यभार देखेंगे। एआईजीईजी की सदस्यता में नीति निर्माण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सुरक्षा एवं आर्थिक मामलों से जुड़े सरकार के वरिष्ठ हितधारक शामिल हैं।

एआईजीईजी भारत के एआई नियामक संस्थागत ढांचे के भीतर सर्वोच्च अंतर-मंत्रालयी निकाय के तौर पर कार्य करेगा। इसे एक प्रौद्योगिकी और नीति विशेषज्ञ समिति (टीपीईसी) का सहयोग प्राप्त होगा, जो एआईजीईजी को वैश्विक घटनाक्रमों, उभरती प्रौद्योगिकियों, जोखिमों, विनियमन और एआई नीति एवं शासन से संबंधित अन्य विकसित प्राथमिकताओं पर विशेषज्ञ सलाह प्रदान करेगी।

एआईजीईजी की संरचना और कार्यक्षेत्र के विवरण के लिए, कृपया देखें:

https://d12aarmt01l54a.cloudfront.net/cms/files/constitution-of-aigeg/1776346498.pdf

महिला आरक्षण से आधी आबादी को मिलेगा उनका पूरा हक, निर्णय प्रक्रिया में बढ़ेगी भागीदारी – मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने आज राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में नई दिल्ली के विज्ञान भवन से प्रसारित ‘नारी शक्ति वंदन सम्मेलन’ में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के उद्बोधन को सुना। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि यह देश की मातृशक्ति के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है, जो भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को और अधिक समावेशी एवं सशक्त बनाने की दिशा में निर्णायक साबित होगा।

महिला आरक्षण से आधी आबादी को मिलेगा उनका पूरा हक, निर्णय प्रक्रिया में बढ़ेगी भागीदारी  -  मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि ‘पंचायत से पार्लियामेंट तक’ नारी की भागीदारी सुनिश्चित करने का यह प्रयास नए भारत की स्पष्ट झलक प्रस्तुत करता है। उन्होंने प्रधानमंत्री के इस दृष्टिकोण को रेखांकित किया कि निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की सीधी भागीदारी ही विकसित भारत की सशक्त नींव है।

उन्होंने कहा कि 16 अप्रैल को संसद में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर होने वाली चर्चा इस ऐतिहासिक पहल को मूर्त रूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा में नारी को सदैव उच्च स्थान दिया गया है। वैदिक काल से लेकर वर्तमान समय तक महिलाओं की भूमिका समाज के निर्माण और विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। हमारी डबल इंजन सरकार की विभिन्न योजनाओं ने इस परंपरा को आधुनिक संदर्भ में सशक्त रूप दिया है, जिससे महिलाएं आत्मनिर्भरता और सम्मान के साथ आगे बढ़ रही हैं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ में महिलाओं के सशक्तिकरण को प्राथमिकता देते हुए कई प्रभावी कदम उठाए गए हैं। स्थानीय निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण के माध्यम से महिलाओं को नेतृत्व का अवसर मिला है, जिसका सकारात्मक प्रभाव जमीनी स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। साथ ही ‘महतारी वंदन योजना’ जैसी पहल माताओं-बहनों को आर्थिक और सामाजिक रूप से सुदृढ़ बना रही हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह सुखद संयोग है कि जब देश में महिला आरक्षण पर ऐतिहासिक चर्चा हो रही है, उसी समय छत्तीसगढ़ ‘महतारी गौरव वर्ष’ मना रहा है। उन्होंने कहा कि ‘छत्तीसगढ़ महतारी’ का सम्मान और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी प्रदेश की पहचान बन चुकी है।
उन्होंने प्रदेश की मातृशक्ति और महिला संगठनों से आह्वान किया कि वे हर मंच पर अपनी आवाज़ बुलंद करें और इस परिवर्तन यात्रा में सक्रिय भागीदारी निभाएं। उन्होंने विश्वास जताया कि महिलाओं की बढ़ती सहभागिता से लोकतंत्र और अधिक मजबूत होगा तथा समाज में सकारात्मक बदलाव की नई दिशा स्थापित होगी।

मुख्यमंत्री श्री साय ने अंत में कहा कि जब नारी सशक्त होती है, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है। यह समय देश की आधी आबादी को उनका पूरा अधिकार दिलाने और उन्हें विकास की मुख्यधारा में निर्णायक भूमिका देने का है।

इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवाल, राज्यसभा सांसद श्रीमती लक्ष्मी वर्मा, विधायक श्री पुरंदर मिश्रा सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

भारत की ‘स्व’देशी जीवन-शैली में ‘स्व’ के आयाम

डॉ. मनमोहन वैद्य

अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

भारत की स्वदेशी जीवन-शैली में निहित ‘स्व’ के भारत में निर्मित वस्तुओं का प्रधानतः उपयोग करने के साथ अनेक महत्वपूर्ण पहलू हैं।

भारत की शिक्षा-पद्धति के मूल्यांकन के लिए 1964–1966 के दौरान डॉ. डी. एस. कोठारी के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग का एक प्रमुख निष्कर्ष यह था कि भारत का वैचारिक जगत यूरोप-केंद्रित हो गया है, जबकि उसे भारत-केंद्रित होना चाहिए। इस तथ्य को समझने के लिए कुछ समकालीन उदाहरणों पर दृष्टि डालना उपयोगी होगा।

दृष्टिकोण का परिवर्तन : यूरोप से भारत की ओर –

मध्य – पूर्व नहींपश्चिम एशिया

आज इज़राइल और हमास के बीच जो युद्ध चल रहा है, उसे भारत सहित पूरी दुनिया की मीडिया “मध्य-पूर्व (Middle East)” क्षेत्र का युद्ध कह रही है। स्वतंत्रता के बाद भी भारत लंबे समय तक उस भूभाग को इसी नाम से संबोधित करता रहा। किंतु हाल ही में भारत के विदेश मंत्रालय ने उसे “पश्चिम एशिया” कहना आरंभ किया है। प्रश्न उठता है – क्या वहाँ युद्ध का स्थान बदल गया? नहीं। बदला है तो हमारा दृष्टिकोण।

खाड़ी के क्षेत्र को “मध्य-पूर्व” कहना दर्शाता है कि हम वैचारिक रूप से यूरोप में बैठकर दुनिया को देख रहे हैं। यूरोप के लिए भारत “पूर्व” है, जापान “सुदूर पूर्व (Far East)” और खाड़ी का क्षेत्र “मध्य-पूर्व” है। लेकिन भारत अब स्वतंत्र है। अब हमारी परिभाषाएँ हमारे दृष्टिकोण से होंगी, पश्चिम की नकल से नहीं। इसलिए भारत के लिए यूरोप पश्चिम है, जापान पूर्व है, और खाड़ी का क्षेत्र पश्चिम एशिया है।

सोच की यह आधारभूमि भारत की होगी, यूरोप की नहीं। यही स्वदेशी चेतना है।

शासन से न्याय की ओर

अंग्रेज भारत में शासन करने आए थे – To Rule over the People here, इसलिए उन्होंने लोगों को दंडित करने की दृष्टि से अनेक नियम बनाए, जिन्हें Indian Penal Code (IPC) कहा गया। आज भारत में जनता का शासन है। अब उद्देश्य दंड देना नहीं, न्याय प्रदान करना है। इसी भाव से IPC का नाम बदलकर भारतीय न्याय संहिता (BNS) किया गया। यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का परिवर्तन है। ऐसे अनेक परिवर्तन सरकार द्वारा किए जा रहे हैं और आगे भी होंगे।

कालगणना और भारतीय चेतना

अंग्रेजों के आने से पहले भारत में सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की गति पर आधारित शास्त्रसम्मत कालगणना प्रचलित थी। महीनों के नाम भी नक्षत्रों पर आधारित थे। हमारे शास्त्रज्ञ 50–100 वर्षों बाद होने वाले सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की भी सटीक गणना कर लेते थे। पश्चिम का ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रारंभ में केवल दस महीनों का था। सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर – इन नामों के अर्थ ही सातवाँ, आठवाँ, नौवाँ और दसवाँ हैं। बाद में गिनती पूरी करने के लिए जूलियस सीज़र ने जुलाई और सम्राट ऑगस्टस ने ऑगस्ट महीना जोड़ा। इस प्रकार सातवाँ कहलाने वाला महीना नौवाँ बन गया।

भारतीय तिथि और जीवन के संस्कार — आज भी भारत में हमारे सभी पर्व अंग्रेज़ी तारीख़ से नहीं, बल्कि भारतीय तिथि से ही मनाए जाते हैं, जैसे –

रामनवमी चैत्र शुक्ल नवमी को, रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को, जन्माष्टमी श्रावण/ भाद्रपद  कृष्ण अष्टमी को, नवरात्रि अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को, और विजयादशमी अश्विन शुक्ल दशमी को ही। अंग्रेज़ी तारीख़ चाहे जो हो, पर्व तिथि के अनुसार ही होते हैं।

तो प्रश्न यह है कि – क्या हम अपने जन्मदिन और विवाह की वर्षगाँठ भी भारतीय तिथि के अनुसार नहीं मना सकते? विवाह का दिन तय करते समय हम पंडित से शुभ मुहूर्त पूछते हैं, फिर उसकी वर्षगाँठ केवल अंग्रेज़ी तारीख़ से क्यों? यह आग्रह इसलिए है क्योंकि यह हमारी कालगणना है – प्राचीन, शास्त्रीय और वैज्ञानिक। यह हमारा ‘स्व’ है।

जन्मदिन का भाव बदलता है..

अंग्रेज़ी तारीख़ के अनुसार जन्मदिन मनाने में आधी रात तक प्रतीक्षा करना, फिर केक काटना और चेहरे पर केक का क्रीम लगाने जैसी भद्दी परंपराएँ चल पड़ी हैं।

भारतीय परंपरा में दिन का आरंभ ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) में होता है।

यदि तिथि के अनुसार जन्मदिन मनाया जाए, तो पूरा भाव-विश्व बदल जाता है –

सुबह जल्दी उठना, स्नान कर ईश्वर के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करना, घर के बुजुर्गों को प्रणाम करना, कोई अच्छा संकल्प लेना, और समाज के लिए कुछ करने का निश्चय करना।

ऐसा जन्मदिन मनाने से पूरे कुटुंब में आनंद, संस्कार और उत्सव का वातावरण बनता है।

यही भारत की स्वदेशी जीवन-शैली है – जहाँ सोच, समय, संस्कार और व्यवहार – सब कुछ अपने ‘स्व’ से जुड़ा हुआ हो। कम खर्च में, बिना किसी के विरोध के, केवल दृष्टि बदलकर हम अपने जीवन को अधिक अर्थपूर्ण और भारतीय बना सकते हैं।

पढ़ाईसीख और जीवन का उद्देश्य : भारत का ‘स्व’ दृष्टिकोण

हाल ही में एक लेख पढ़ने को मिला। उसमें लेखक लिखता है –

“मैंने ऐसे अनेक लोगों को देखा है जो अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं, पर जीवन में बहुत कुछ सीख चुके हैं। और ऐसे भी लोगों को देखा है जो बहुत पढ़े-लिखे हैं, पर जीवन की सीख से बिल्कुल वंचित हैं। पढ़ाई (Education) और सीख (Learning) – दोनों एक जैसी नहीं हैं।

पढ़ाई से आजीविका का साधन मिलता है, पर सीख से जीवन को उद्देश्य (Purpose) मिलता है। जब जीवन का उद्देश्य स्पष्ट होता है, तो जीवन की दिशा तय होती है।

दिशा तय होने पर प्राथमिकताएँ स्पष्ट होती हैं। और जब उस उद्देश्य की दिशा में निरंतर प्रयास होते हैं, तो जीवन नदी के प्रवाह की तरह सहज रूप से बहने लगता है।

नदी अपने दोनों किनारों की मर्यादा में बहती है, क्योंकि उसे अपना गंतव्य पता होता है – उसे सागर से मिलना है।

इसके विपरीत, केवल पढ़ाई करके पैसा कमाने वाले व्यक्ति का जीवन तालाब के पानी जैसा हो जाता है – ऊपर से बड़ा और स्थिर दिखता है, पर भीतर ठहरा हुआ होने के कारण सड़ने लगता है और दुर्गंध फैलाता है।

किताबें हमें सीखने में सहायता करती हैं। कहा भी गया है – “पहले हम पढ़ना सीखते हैं, और बाद में सीखने के लिए पढ़ते हैं।” (First we learn to read, then we read to learn.)

जैसे मछली पानी में रहती है, वैसे ही हम समय में रहते हैं। मछली यह नहीं कह सकती कि “मेरे पास पानी नहीं है।” उसी प्रकार कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि “मेरे पास समय नहीं है।” वास्तव में समस्या समय की नहीं, कार्य-प्रबंधन (Task management) की – कार्य की प्राथमिकता की होती है।

जब हम अपने कार्यों को प्राथमिकता से, सही ढंग से व्यवस्थित करते हैं और उपलब्ध समय का उचित नियोजन करते हैं, तो जीवन के उद्देश्य के लिए समय स्वतः उपलब्ध हो जाता है।

फिर उस योजना को क्रियान्वित करना आवश्यक होता है।

इसलिए जीवन में केवल धन अर्जन ही नहीं, बल्कि कोई उच्च उद्देश्य होना चाहिए।

उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, सूर्योदय से पहले उठने का संकल्प, फिर उसका प्रयास और बाद में अभ्यास आवश्यक है। जब उठने का समय तय हो जाता है, तो सोने का समय अपने आप तय हो जाता है। इन दो किनारों के बीच जब जीवन बहता है, तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य स्वतः संतुलित रहता है। यदि प्रत्येक घर में, घर के सभी सदस्य सूर्योदय से पहले उठने की परंपरा अपनाएँ, तो जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं। रात्रि-पारी में काम करने वाले या बीमार लोग अपवाद हो सकते हैं। नियमित व्यायाम, योग, सूर्य नमस्कार स्वतः जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। यह भी भारत के ‘स्व’ का ही एक स्वरूप है।

थोड़ा अधिक देना”: भारत का मौन संस्कार

अंग्रेज़ शासन से पहले भारत में एकीकृत शासन नहीं था। भाषा, पूजा-पद्धति और जीवन-शैली में विविधता थी। फिर भी एक परंपरा पूरे भारत में सदियों से देखने को मिलती है –

जब कोई द्रव पदार्थ (दूध, तेल आदि) मापकर दिया जाता है, तो पूरा माप भरने के बाद थोड़ा ऊपर से अधिक देना। तराजू में तौलते समय भी कांटा बीच में आने के बाद मुट्ठी भर थोड़ा अधिक देना – यह परंपरा आज भी विशेषकर ग्रामीण भारत में जीवित है।

यह केवल व्यापार की शैली नहीं, बल्कि भारत का ‘स्व’भाव है। इसके पीछे की भावना स्पष्ट है – “मैं जो मूल्य ले रहा हूँ, उसके बदले समाज को किसी भी स्थिति में कम नहीं, बल्कि थोड़ा अधिक ही दूँ।”

समाज को अधिक लौटाने का भाव – यही भारत है।

भ्रष्टाचार का स्थायी समाधान

दुर्भाग्यवश आधुनिक शिक्षा व्यक्ति को अधिक आत्म-केंद्रित और केवल आर्थिक लाभ के दृष्टिकोण से सोचने वाला बना रही है। जबकि भारत का सामान्य जन समाज को अधिक देने में सहज आनंद अनुभव करता है। यही भारत का ‘स्व’भाव है। यदि इस ‘स्व’भाव का जागरण हो, और इसे व्यवहार में उतारा जाए, तो भ्रष्टाचार के लिए स्थान ही नहीं बचेगा। भाव स्पष्ट है – मैं अपने कार्य के लिए जो वेतन या मूल्य लेता हूँ, उससे अधिक समाज को लौटाना है, कम किसी भी स्थिति में नहीं। यही भारत की स्वदेशी जीवन-शैली और भारत के ‘स्व’ का सच्चा प्रकटीकरण है।

स्वामी विवेकानंद की आयरिश मूल की शिष्या भगिनी निवेदिता ने समाज जीवन से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही है। उनका कहना है कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम से अर्जित पारिश्रमिक को केवल अपने तक सीमित न रखकर समाज के हित में अर्पित करते हैं, वहाँ सामूहिक प्रयास से एक प्रकार की सामाजिक पूँजी (social capital) का निर्माण होता है। इसी सामाजिक पूँजी के बल पर समाज समृद्ध बनता है और समाज का प्रत्येक व्यक्ति भी समृद्ध बनता है। यही धर्म है – यह धर्म किसी पंथ या रिलीजन तक सीमित नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और परस्पर एक सूत्र में बाँधने वाली जीवन-दृष्टि है।

निवेदिता आगे कहती हैं कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का फल केवल स्वयं के लिए संचित करते हैं और समाज को लौटाते नहीं हैं, उस समाज में कुछ व्यक्ति तो संपन्न दिखाई दे सकते हैं, किंतु समाज दरिद्र बना रहता है। इसलिए यदि इस विचार को स्वदेशी जीवनशैली का अभिन्न अंग बना लिया जाए, तो समाज का संपूर्ण स्वरूप ही बदल सकता है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति का सजग और सक्रिय सहयोग आवश्यक है।

भारत का विचार और आचरण सदा से यह रहा है – उत्पादन में प्रचुरता, वितरण में समानता और उपभोग में संयम। अपने उपभोग को संयमित कर, अपने अधिकार का ही बचा हुआ समाज के हित में आत्मीयता से समर्पित करना ही धर्म है। वहीं, दूसरों को कष्ट पहुँचाकर या उनके अधिकारों को छीनकर अपना स्वार्थ साधना पाप है। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्रता के बाद भारत के नेतृत्व ने कुछ प्रतीकात्मक और विचार प्रधान निर्णय लिए। लोकसभा का आदर्श वाक्य है –  “धर्मचक्र प्रवर्तनाय”, राज्यसभा का –  “सत्यम् वद, धर्मम् चर”, और भारत के सर्वोच्च न्यायालय का बोध वाक्य है – “यतो धर्मस्ततो जयः”। यहाँ तक कि हमारे राष्ट्रध्वज में स्थित चक्र भी धर्मचक्र का प्रतीक है। भारत मूलतः धर्मप्राण राष्ट्र है। जब धर्म के अनुशासन में अर्थ और काम – ये पुरुषार्थ चलते हैं, तब मोक्ष स्वाभाविक हो जाता है।

दया धर्म है, अहंकार पाप है। इसलिए जीवन में एक ओर, एकांत में आत्म साधना और दूसरी ओर, (लोकांत में) समाज के बीच सेवा – दोनों का संतुलन आवश्यक है। स्वामी विवेकानंद ने इसी भाव को “शिवभाव से जीव सेवा” अर्थात To serve man is to serve God के सूत्र द्वारा स्पष्ट किया और दरिद्र नारायण की सेवा को ईश्वर-पूजा के समान माना।

यही भारत का ‘स्व’ है – यही हमारी स्वदेशी जीवनशैली है।

भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में कहा गया है – “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः”

और “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः” अर्थात मनुष्य अपने स्वधर्म रूपी कर्म में रत रहकर सिद्धि प्राप्त करता है और अपने कर्मों के माध्यम से ईश्वर की आराधना करता है।

संत ज्ञानेश्वर इसे और सरल शब्दों में कहते हैं – “तेया सर्वात्मका ईश्वरा, स्वकर्म कुसुमांची वीरा, पूजा केली होय अपारा, तोषा लागी।” (अर्थ- यह है कि समाजरूपी सर्वव्यापक ईश्वर की अपने कर्मरूपी पुष्पों से की गई पूजा उसे प्रसन्न करती है।)

इन सभी विचारों का सार यही है कि हमारा प्रत्येक कार्य समाज-पूजा के भाव से किया जाए। जिस प्रकार पूजा के लिए हम ताजे, सुगंधित और श्रेष्ठ पुष्प चुनते हैं, उसी प्रकार समाज के लिए किए जा रहे हमारे सभी कर्म भी उत्कृष्ट, शुद्ध और सर्वोत्तम होने चाहिए।

यही भारत का ‘स्व’ है। यही हमारा ‘स्व’भाव बने। यही हमारी जीवनशैली का अंतरंग हिस्सा बने। तब हमारा समाज-जीवन और राष्ट्र-जीवन कितना सुंदर, समृद्ध और मनभावन होगा !

यही स्वदेशी जीवनशैली है।

संस्कृति पर आक्रमण; पश्चिमी विचारधारा की बिसात

साहित्य अकादमी का एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मेलन

साहित्य अकादमी द्वारा LGBTQ लेखक सम्मेलन का आयोजन एक गहरे वैचारिक विमर्श और टकराव का संकेत है। दुखद है कि यह सम्मेलन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वाधान में हो रहा है। संस्कृति मंत्रालय को देखना चाहिए कि क्या हमारी संस्कृति के सभी सिरमौर विषयों पर साहित्य अकादमी ने चर्चा सम्पन्न करा ली है? केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को साहित्य आकादमी से पूछना होगा कि “भारतीय ज्ञान परंपरा की कितनी चर्चा और कितने लेखक सम्मेलन ‘साहित्य अकादमी’ ने करा लिए हैं? क्या हमारे सभी ज्वलंत और आवश्यक सांस्कृतिक प्रश्न उत्तर पा चुके हैं जो इस प्रकार के विषय को चर्चा केंद्र में रखने का निर्णय लिया गया? प्रश्न यह नहीं है कि किसी विषय पर चर्चा क्यों हो रही है, बल्कि यह है कि किन विषयों को प्राथमिकता दी जा रही है और उसके पीछे कौन-सी वैचारिक शक्तियाँ सक्रिय हैं?

हम एलजीबीटीक्यू के मौलिक अधिकारों के विरोध में नहीं हैं, किंतु इनके कंधों पर रखकर भारतीय मूल्यों, देशज अधिष्ठानों, हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं पर जिस प्रकार बंदूक चलाई जा रही है, उसके विरोध में हैं। भारत में LGBTQ के माध्यम से वैचारिक नक्सलाइट्स बहुधा ही गंद फैलाते रहते हैं। यह उनके प्रति संवेदना के लिए नहीं, अपितु देश में अनावश्यक वितंडा खड़ा करने के लिए किया जाता है।

हमें यह देखना चाहिए कि वे कौन सी छिपी हुई शक्तियाँ हैं जो भारत में बालक, बालिकाओं के लिए एक से बाथरूम चाहती हैं? इस लेखक सम्मेलन का लक्ष्य केवल भारतीय परंपराओं पर तोप दागना ही तो होगा। गे और लेस्बियन सेक्स के ऊपर लेखक सम्मेलन में किस प्रकार की चर्चा आएगी, इसकी कल्पना से हृदय सिहर उठता है।

लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर की चर्चा केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तत्वाधान वाले, साहित्य अकादमी के आयोजन में आना एक खतरनाक वैचारिक विस्फोट है। यह वैचारिक बारूदी सुरंग है जो हमारे वैचारिक अधिष्ठान के नीचे लगातार बिछाई जा रही है।

ट्रांसजेंडर या किन्नर समाज के प्रति सदैव ही हमारे भारतीय समाज का, शास्त्रों का, ऋषि परंपरा का संवेदनशील मंतव्य रहा है। ये हमारी परंपराओं में स्थायी रूप से सम्मानपूर्वक बसे हैं। समय के साथ-साथ इनके विषय में आवश्यक निर्णय लिए जाने चाहिए, जो शासन से लेकर समाज तक लिए भी गए हैं। किंतु ट्रांसजेंडर के अतिरिक्त जो लोग हैं, इनका स्थान हमारे समाज में कहाँ होना चाहिए?

आज भारत में एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि यह पूरा विमर्श तथाकथित “कल्चरल मार्क्सिज़्म” की रणनीति का हिस्सा है। इस विचारधारा का मूल उद्देश्य हमारे समाज की पारंपरिक संरचनाओं, परिवार, धर्म, संस्कृति और नैतिकता, को दुर्बल करना ही है। हमारी ऋषि परंपरा और सनातनी संस्कृति को हटाकर उनकी जगह एक नए प्रकार की वैचारिक संरचना स्थापित करना ही ऐसे आयोजनों का लक्ष्य होता है।

भारतीय संस्कृति की जड़ें अत्यंत गहरी और संतुलित हैं। यहाँ मनुष्य को केवल उसकी इच्छाओं या प्रवृत्तियों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके धर्म, कर्तव्य और सामाजिक उत्तरदायित्व के आधार पर देखा गया है। ऋषि परंपरा ने जीवन को चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – में संतुलित किया है। इस व्यवस्था में ‘काम’ मर्यादा और संतुलन के भीतर है, न कि उच्छृंखल अभिव्यक्ति के रूप में। ‘काम आनंद’ की एक परिपूर्ण परिभाषा, परिधि, प्रतीति, अभिव्यक्ति हमारे पास युगों से है। हमारी ‘विवाह संस्था’ को चोटिल करने का दुष्प्रयास है यह लेखक सम्मेलन। हमारी चिति पर यह नई विध्वंसक मान्यताएँ लादकर वैचारिक बलात्कार किया जा रहा है?

LGBTQ जैसे विषयों को जिस प्रकार से आज शो-ऑफ किया जा रहा है, वह भारतीय दृष्टिकोण से अधिक पश्चिमी अवधारणाओं से प्रेरित है। यह केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं है, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों पर भी इसका प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव पड़ता है। इस दुष्प्रभाव की चिंता करनी चाहिए।

यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि देश में राजनीतिक स्तर पर परिवर्तन हुआ है और राष्ट्रीय विचारधारा को समर्थन मिला है। लेकिन क्या वास्तव में व्यवस्था बदली है? हमारी शासन व्यवस्था राष्ट्रीयता की उपेक्षा क्यों करती है? अनजाने में हमारी सत्ता क्यों पश्चिमी मूल्यों की पक्षधर बनकर खड़ी हो जाती है? यह एक गंभीर प्रश्न है।

कई उदाहरण संकेत देते हैं कि शैक्षणिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थानों में अब भी वामपंथी विचारधारा का गहरा प्रभाव बना हुआ है। चाहे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम हों, इतिहास लेखन हो या साहित्यिक संस्थाओं के कार्यक्रम, बहुधा वही दृष्टिकोण प्रमुख होता है जो भारत की परंपरागत मान्यताओं से भिन्न है और उसके विरोध में है।

साहित्य अकादमी का निर्णय भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। प्रश्न स्वाभाविक है कि जब देश में ग्रामीण साहित्य, वेद-उपनिषद, भारतीय भाषाओं के संरक्षण, या राष्ट्रीय साहित्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, तब LGBTQ जैसे विषय को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है?

भारत का “कथित बुद्धिजीवी” वर्ग सदैव ही स्वयं को प्रगतिशील और उदारवादी बताता है, लेकिन इसके विचारों में एक स्पष्ट झुकाव वामपंथी सोच की ओर होता है। यह वर्ग भारतीय परंपराओं को पिछड़ा बताने में संकोच नहीं करता, जबकि पश्चिमी विचारों को आधुनिकता का प्रतीक मानता है। यह वही वर्ग है जो रामायण और महाभारत पर प्रश्न उठाता है। यह वर्ग परंपरागत परिवार व्यवस्था को चुनौती देता है। यह वर्ग भारतीय संस्कृति को “पितृसत्तात्मक” या “रूढ़िवादी” कहकर खारिज करने का प्रयास करता है।

LGBTQ लेखक सम्मेलन जैसे आयोजन इनके लिए केवल साहित्यिक मंच नहीं, बल्कि एक वैचारिक विध्वंस और बारूदी सुरंग फैला देने का माध्यम है। कल्चरल मार्क्सिज्म की अवधारणा कहती है कि यदि किसी समाज को बदलना है, तो उसकी संस्कृति को बदलें। भारत में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे विभिन्न माध्यमों से चल रही है, फिल्मों, वेब सीरीज, शिक्षा और अब साहित्यिक मंचों के माध्यम से। इनका सीधा सा उद्देश्य है — हमारे पारंपरिक मूल्यों को “पुराना” और “अप्रासंगिक” साबित करना, नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर करना, और जड़विहीन पहचान निर्मित करना।

डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी,

क्षेत्र महामंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद्

कांग्रेस अध्यक्ष के घृणास्पद बयान को लेकर आरएसएस ने दिसपुर एवं सिलचर पुलिस थानों में शिकायत दर्ज कराई

गुवाहाटी/सिलचर, 07 अप्रैल 2026

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा दक्षिण असम में आयोजित चुनावी रैली के दौरान दिए गए कथित अपमानजनक, उकसावेपूर्ण एवं साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील बयान को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की उत्तर असम प्रांत एवं दक्षिण असम प्रांत इकाइयों ने विधिक कार्रवाई की मांग करते हुए क्रमशः दिसपुर पुलिस थाना तथा सिलचर पुलिस थाना में औपचारिक पुलिस शिकायत दर्ज कराई है।

शिकायतों के अनुसार, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने श्रीभूमि जिले के करीमगंज दक्षिण विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत नीलामबाजार में आयोजित चुनावी सभा में विवादास्पद टिप्पणी की। उन्होंने आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की विचारधारा की तुलना “ज़हरीले साँप” से करते हुए उसे समाप्त किए जाने का आह्वान किया।

शिकायत में उद्धृत कथन के अनुसार, खड़गे ने कहा – “यदि आप नमाज़ अदा कर रहे हों और आपके सामने एक ज़हरीला साँप आ जाए, तो आपको नमाज़ रोककर पहले उस साँप को मारने के लिए दौड़ना चाहिए – क़ुरान यही सिखाती है। मैं कहता हूँ कि आरएसएस और भाजपा उसी ज़हरीले साँप की तरह हैं; यदि आप आरएसएस और भाजपा जैसे ज़हरीले साँप को समाप्त नहीं करेंगे, तो आप जीवित नहीं रह पाएंगे।”

संघ ने इस प्रकार के वक्तव्य पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की टिप्पणियाँ चुनावी अभियान के दौरान धार्मिक भावनाओं का उपयोग करते हुए आरएसएस एवं भाजपा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के विरुद्ध शत्रुता, भय तथा हिंसा को उकसा सकती हैं।

शिकायतों में कहा गया है कि यह बयान जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 83 के अंतर्गत भ्रष्ट चुनावी आचरण की श्रेणी में आता है तथा इससे जनता को आपराधिक रूप से भयभीत करने और विभिन्न राजनीतिक एवं सामाजिक समूहों के समर्थकों के बीच वैमनस्य फैलाने का प्रयास किया गया है। आरएसएस एवं भाजपा की विचारधारा को “ज़हरीला” बताना तथा उनके उन्मूलन की बात करना संगठन के सदस्यों एवं समर्थकों को शारीरिक क्षति पहुँचाने के लिए उकसाने के रूप में देखा जा सकता है।

यह बयान हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने का प्रयास प्रतीत होता है, जिससे असम में सार्वजनिक शांति एवं सौहार्द प्रभावित हो सकता है तथा चुनावी वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। शिकायतों में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो इस प्रकार के वक्तव्य साम्प्रदायिक तनाव या टकराव का कारण बन सकते हैं।

आरएसएस ने बल देकर कहा है कि लोकतांत्रिक संवाद संवैधानिक एवं विधिक मर्यादाओं के भीतर रहना चाहिए तथा चुनावी राजनीति में ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं होना चाहिए जो सामाजिक सद्भाव और सार्वजनिक शांति को खतरे में डाले।

शिकायतें निम्नलिखित पदाधिकारियों ने प्रस्तुत की —

1. श्री खगेन सैकिया

प्रांत कार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

उत्तर असम प्रांत, गुवाहाटी (दिसपुर पुलिस थाना में शिकायत दर्ज)

बस्तर 2.0 की शुरुआत : मुख्यमंत्री साय ने पीएम मोदी को दिया आमंत्रण, विकास का ब्लूप्रिंट सौंपा

बस्तर के लिए 360° प्लान-टूरिज्म, स्टार्टअप, इंफ्रा और इनोवेशन पर फोकस

पीएम का बस्तर दौरा बनेगा टर्निंग पॉइंट, बड़े प्रोजेक्ट्स की सौगात

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर बस्तर के भविष्य की एक नई तस्वीर पेश की। इस मुलाकात में मुख्यमंत्री ने न केवल नक्सलवाद के अंत के बाद प्रदेश में आई शांति के लिए प्रधानमंत्री का आभार जताया, बल्कि बस्तर के समग्र विकास का एक विस्तृत और दूरदर्शी ब्लूप्रिंट भी सौंपा। साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री को मानसून के बाद बस्तर आने का आमंत्रण दिया, जहां उनकी मौजूदगी में कई बड़ी परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण प्रस्तावित है।

उन्होंने बताया कि बस्तर समेत पूरे राज्य में नक्सलवाद समाप्त हो चुका है और अब शांति स्थापित है। शिक्षा व स्वास्थ्य सुधार के तहत नए एजुकेशन सिटी, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बनाए जा रहे हैं, जबकि इंद्रावती नदी पर बैराज, रेल लाइन और एयरपोर्ट विस्तार से कनेक्टिविटी मजबूत हो रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस ब्लूप्रिंट के जरिए बस्तर में अब विकास, रोजगार और बेहतर सुविधाओं का नया दौर शुरू होगा।

मुख्यमंत्री ने अपने विकास दस्तावेज़ में उल्लेख किया कि एक दशक पहले प्रधानमंत्री द्वारा बस्तर के लिए देखा गया शांति और विकास का सपना अब जमीन पर साकार हो रहा है। नक्सलवाद खत्म होने के बाद अब लोगों में डर नहीं, बल्कि उम्मीद और विकास की नई चमक है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन से बस्तर को नई दिशा और गति मिलेगी, जिससे क्षेत्र में विश्वास और उत्साह बढ़ेगा।

मुख्यमंत्री द्वारा प्रस्तुत विकास ब्लूप्रिंट ‘सैचुरेशन, कनेक्ट, फैसिलिटेट, एम्पावर और एंगेज’ रणनीति पर आधारित है। इसके तहत बस्तर में बुनियादी सुविधाओं को तेजी से विस्तार देने का लक्ष्य रखा गया है। सड़कों के व्यापक जाल के माध्यम से दूर-दराज के गांवों को जोड़ा जाएगा। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अधूरे कार्यों को 2027 तक पूरा करने के साथ-साथ नई 228 सड़कों और 267 पुलों का निर्माण प्रस्तावित है। इसके अलावा 61 नई परियोजनाओं के लिए विशेष केंद्रीय सहायता की मांग भी की गई है।

ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भी बड़े बदलाव की योजना है। हर घर तक बिजली पहुंचाने के कार्य तेज होंगे। शिक्षा के क्षेत्र में 45 पोटा केबिन स्कूलों को स्थायी भवनों में बदला जाएगा। युवाओं के लिए 15 स्टेडियम और 2 मल्टीपर्पज हॉल बनाए जाएंगे, जबकि स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार और डॉक्टरों के लिए ट्रांजिट हॉस्टल बनाए जा रहे हैं।

कृषि और सिंचाई के क्षेत्र में इंद्रावती नदी पर दो बड़े प्रोजेक्ट देउरगांव और मटनार में स्वीकृत किए गए हैं, जिनसे 31,840 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। यह परियोजनाएं बस्तर की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगी।

आजीविका और आय बढ़ाने के लिए सरकार ने तीन वर्षीय योजना तैयार की है, जिसका लक्ष्य 2029 तक 85% परिवारों की मासिक आय 15,000 रुपये से बढ़ाकर 30,000 रुपये करना है। ‘नियद नेल्ला नार 2.0’ योजना के तहत अब अधिक जिलों को जोड़ा जा रहा है, जिससे विकास का लाभ व्यापक स्तर पर पहुंचेगा। 10 जिलों में शुरू की गई यह योजना अब 7 जिलों और 3 नए जिलों (गरियाबंद, मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई) तक विस्तारित हो रही है।

 ‘अंजोर विजन 2047’ और ‘विकसित भारत@2047’ के तहत स्टार्टअप नीति भी लागू की गई है, जिसमें 2030 तक 5,000 स्टार्टअप तैयार करने का लक्ष्य है।

पर्यटन के क्षेत्र में बस्तर की पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में भी तेजी से काम हो रहा है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी नेशनल पार्क, एडवेंचर टूरिज्म, कैनोपी वॉक और ग्लास ब्रिज जैसी परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे आयोजन क्षेत्र को नई पहचान दे रहे हैं। वहीं, एक लाख से अधिक युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिनमें से 40 हजार को रोजगार भी मिल चुका है।

नक्सलवाद से मुक्त बस्तर के विकास के लिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज प्रधानमंत्री के सामने जो कार्ययोजना प्रस्तुत की, उसमें ‘बस्तर मुन्ने’ (अग्रणी बस्तर) कार्यक्रम एक अहम पहल है। इस कार्यक्रम के तहत हर ग्राम पंचायत में शिविर लगाए जाएंगे, जहाँ अधिकारियों की मौजूदगी में लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे दिया जाएगा, जरूरी दस्तावेज वहीं बनाए जाएंगे और उनकी समस्याओं का मौके पर ही समाधान किया जाएगा। इसका उद्देश्य है कि हर व्यक्ति तक सरकार की योजनाएँ आसानी से पहुँचें और बस्तर तेजी से विकास की राह पर आगे बढ़े।

प्रधानमंत्री के प्रस्तावित दौरे के दौरान जिन प्रमुख परियोजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण की योजना है, उनमें रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन, जगदलपुर एयरपोर्ट का विस्तार, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, दंतेवाड़ा में मेडिकल कॉलेज, जगरगुंडा और ओरछा में एजुकेशन सिटी जैसी महत्वपूर्ण पहल शामिल हैं। ये परियोजनाएं बस्तर को शिक्षा, स्वास्थ्य और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगी।

दशकों के वामपंथी उग्रवाद की समाप्ति

दशकों से फैले वामपंथी लाल आतंकी हिंसा के घनघोर अंधकार की समाप्ति की औपचारिक घोषणा हो चुकी है। अधिकांश नक्सलवादियों ने हथियार डाल दिए हैं। शांति के कपोत अब खुले आसमान में निर्भय उड़ान भर रहे हैं। राष्ट्र की देह में पल रहे इस बुरे नासूर की शल्य चिकित्सा कर दी गई है। यह मात्र एक राजनीतिक विजय नहीं, बल्कि लाखों जनजातीय परिवारों की मुक्ति, हजारों जवानों के सर्वोच्च बलिदान का फल और एक राष्ट्र की सामूहिक आस्था की जीत है।

पीछे देखते हैं तो नक्सलवाद की कहानी शुरू होती है वर्ष 1967 से, जब पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव में एक छोटा सा किसान विद्रोह भड़का। उस समय के कम्युनिस्ट नेताओं चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में गरीब किसानों और आदिवासियों ने जमींदारों के खिलाफ हथियार उठा लिए। नक्सलबाड़ी आंदोलन ने वामपंथी विचारधारा को हिंसक रूप दिया। सीपीआई एमएल जैसी पार्टियां बनीं। 1970 के दशक में यह बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश तक पहुंच गया। 1980 के दशक में पीपुल्स वॉर ग्रुप और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर जैसे संगठन सक्रिय हुए। 2004 में इनका विलय होकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया माओइस्ट बना। छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और आंध्र जैसे राज्यों के जंगलों में यह संगठन राज करने लगा।

जनजातीय के रहवास वनों में अपना डेरा डाला और छिपने की जगह बनाई और शोषण के विरोध के नाम पर वनवासी युवाओं को बंदूकें थमाई। नक्सली कहते थे कि वे वनवासियों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। पर वास्तव में नक्सलियों ने वनों की धरती को वनवासियों के रक्त से ही लाल किया, उन्हें ही अपना शिकार बनाया। उन्होंने स्कूल जलाए, सड़कें तोड़ीं, विकास कार्य रोके और अपनी ही जनता पर अत्याचार किए। यह लाल अंधकार धीरे-धीरे राष्ट्र की देह में कैंसर की तरह फैलता गया।

अब बात करते हैं हत्याओं की, नक्सलियों द्वारा की गई हत्याओं की संख्या दिल दहला देने वाली है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2004 से नवंबर 2025 तक लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म ने 8956 लोगों को मार डाला। इनमें अधिकांश वनों में रहने वाले थे, जिन्हें नक्सली पुलिस मुखबिर बताकर क्रूरता से मारते थे। 2010 में दंतेवाड़ा हमले में अकेले 76 सीआरपीएफ जवान बलिदान हो गए। बस्तर में सैकड़ों ग्रामीणों को जिंदा जलाया गया। एर्राबोर के नृशंस सामूहिक हत्याकांड को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

नक्सल जनित हर हत्या के पीछे एक परिवार का आंसू था, एक मां का रोना था, एक बच्चे का भविष्य छिन जाना था। यह मात्र आंकड़े नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में जहां कभी वनवासी गीत गुनगुनाते थे, नृत्य करते थे, अपने त्योहार मनाते थे, वहां नक्सली आतंक के कारण चुप्पी थी। गांवों से लोगों ने अपने बच्चों को शहर भेज दिया ताकि वे नक्सलियों के हाथों न पड़ जाएं। मैंने अनुभव किया है कि शहरों में रहने वाले बच्चे अब बड़े होकर अपने समुदाय की बोली और संस्कृति तथा देवी देवता भूल चुके हैं, जिन्हें पीढियों से उनके पुरखे मानते आए हैं।

पूर्व सरकारों ने समस्या को हल करने की कोई अधिक कोशिश नहीं की। कभी सिर्फ बातचीत, कभी सिर्फ ऑपरेशन। नतीजा यह हुआ कि नक्सलवाद 100 से अधिक जिलों में फैल गया। 2014 के बाद सरकार ने नीति में बदलाव किया। सुरक्षा बलों को आधुनिक हथियार दिए गए। खुफिया तंत्र को मजबूत किया गया। सबसे महत्वपूर्ण, विकास को हथियार बनाया गया। सड़कें बनीं, बिजली पहुंची, मोबाइल टावर लगे, स्कूल खुले और स्थानीय निवासियों के लिए रोजगार के साधन उपलब्ध कराए और नक्सली कैडरों को सरेंडर पैकेज देकर पुनर्वास पर जोर दिया गया।

छत्तीसगढ़ सरकार ने लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई। बस्तर पंडुम जैसी योजनाएं शुरू हुईं। स्थानीय पुलिस और केंद्रीय बलों का समन्वय बढ़ा। 2023 के बाद से छत्तीसगढ़ में अभियान तेज हुए। बस्तर रेंज में सैकड़ों कैडरों ने हथियार डाले। महिलाएं भी मुख्यधारा में आईं। सरकार ने कहा कि जनजातीय को बंदूक नहीं, विकास चाहिए। पुनर्वास पैकेज बढ़ाया, कौशल विकास केंद्र खोले और ट्राइबल युवाओं को आईटीआई में प्रशिक्षण दिया। यह स्थानीय स्तर की लड़ाई थी जो राष्ट्र स्तर की जीत बन गई।

गृह मंत्रालय के अनुसार 2014 से अब तक 10000 से अधिक नक्सली मुख्यधारा में आए।

यह संयोग नहीं, बल्कि इतिहास का न्याय है। लाल अंधकार चीरकर शांति की किरणें निकल रही हैं। कोई डर नहीं, कोई गोली नहीं, सिर्फ विकास की हवा। भीतर के क्षेत्रों में सड़कें बनेंगी, सड़कों के माध्यम से मूलभूत सुविधाएं गांवों तक पहुंचेंगी, सड़कों पर निर्भय होकर वाहन चलेंगे। मोबाइल के टावर लगने से ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी सुविधाओं का लाभ उठाएंगे।

वामपंथी उग्रवाद को लोगों ने नकार दिया और समर्पण करने वाले नक्सली भी अब समझ गये हैं कि हथियारों के बल पर सत्ता हासिल नहीं की जा सकती, जिसने भी यह प्रयास किया, उसे एक दिन पराजित होना ही पड़ा है। यहां किसी भी प्रकार की हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है।