नागपुर, 26 अप्रैल 2026। नाग भूषण अवॉर्ड फाउंडेशन द्वारा आयोजित नाग भूषण समारोह-२०२५ समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि यश पाना ही सब कुछ नहीं है। यश पाने के साथ-साथ व्यक्ति का सार्थक बनना भी ज़रूरी है, और यशस्विता का उपयोग सबकी भलाई के लिए करना चाहिए।
समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, महाराष्ट्र के वित्त और योजना राज्य मंत्री आशीष जयसवाल, पूर्व सांसद तथा फाऊंडेशन के अध्यक्ष अजय संचेती भी उपस्थित थे। समारोह में सोलर इंडस्ट्री इंडिया के चेयरमैन पद्मश्री सत्यनारायण नुवाल को प्रतिष्ठित नाग भूषण पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया, जबकि ‘आयरन मैन ऑस्ट्रेलिया’ कॉम्पिटिशन के विजेता दक्ष खंते को सम्मानित किया गया।
सरसंघचालक जी ने कहा कि दुनिया में शक्ति बहुत ज़रूरी है। इसके बिना कुछ नहीं हो सकता। लेकिन, अगर शक्ति को फलदायिनी बनाना है, तो शक्तिमान लोगों को सिर्फ़ यश पाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए। यश दूसरों को प्रेरित करता है और यह ज़्यादा ज़रूरी है। जब शक्ति के साथ विनम्रता हो, तभी वह सफल होती है। सफलता के साथ विनम्रता, कृतज्ञता का भाव ज़रूरी है। यश पाते हुए इंसान का सार्थक बनना भी उतना ही ज़रूरी है। पिछले 200 वर्षों में हमारे देश में जितने भी महान लोग हुए हैं, उनके जीवन में 90 परसेंट परस्पिरेशन और 10 परसेंट इन्सपिरेशन का सूत्र देखा गया है। मैं और मेरा परिवार के दायरे से बाहर निकलकर अपनेपन के दायरे को बढ़ाएंगे, उतना ही मिला हुआ यश सार्थक होगा।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी ने कहा कि कठिन और चुनौतीपूर्ण हालात में भी कितना बड़ा काम किया जा सकता है और कामयाबी की ऊंचाई तक पहुंचा जा सकता है, यह उदाहरण सत्यनारायण नुवाल ने प्रस्तुत किया है। नुवाल जी ने इस क्षेत्र में ऐसे समय में कदम रखा था, जब देश के डिफेंस इक्विपमेंट प्रोडक्शन के फील्ड में प्राइवेट सेक्टर कितनी तरक्की करेगा, इस बारे में कोई पक्का नहीं था, और अब यह इंडस्ट्री कामयाबी की ऊंचाई पर पहुंच रही है। इस मौके पर हमने दिखाया है कि भारत भी दुनिया में सबसे अच्छी क्वालिटी के हथियार बना सकता है। ऑपरेशन सिंदूर में भी सोलर इंडस्ट्री के योगदान ने बहुत अहम भूमिका निभाई है। दक्ष खंते ने जो कामयाबी हासिल की है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक रोल मॉडल हैं, वह नई पीढ़ी को भी इसी तरह प्रेरित करेंगे।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जी ने कहा कि भारत की डिफेंस ताकत को बढ़ाना बहुत ज़रूरी है ताकि दुनिया में शांति बनी रहे, अच्छी ताकतों का असर बना रहे और बुरी ताकतों पर लगातार नियंत्रण रहे। इसी को ध्यान में रखते हुए देश में डिफेंस टेक्नोलॉजी का डेवलपमेंट किया जा रहा है।
एकता, प्रेम व मानवीय जीवन मूल्यों के साथ अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदि शंकराचार्य जी की जयंती पर विश्व हिन्दू परिषद ने एक संकल्प लिया कि गत 1000 वर्षों में किन्हीं कारणों से हिन्दू धर्म से बिछड़े बंधुओं को हम स्वधर्म में लाएंगे। विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने आदि शंकराचार्य जी की, कालड़ी में स्थित पावन जन्मभूमि (कोच्चि – एर्नाकुलम के निकट) पर एकत्र श्रद्धालुओं से कहा कि पूज्य आदि शंकराचार्य जी ने संपूर्ण मानवता और उनके कल्याण के लिए काम किया। वहीं दूसरी ओर विश्व में कुछ लोग आज सिर्फ किसी एक पुस्तक या विचार से बंधकर और बांधकर अपने कट्टरपंथी विचार थोपना चाहते हैं जो मानवता के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
“दुनिया के कुछ हिस्सों में, कुछ लोग कट्टरपंथी विचारों को थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जो मानवता के लिए एक गंभीर खतरा है। हम दुनिया को ऐसी विनाशकारी विचारधाराओं से बचाने और उन लोगों को वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो अपने मूल विश्वास से अलग हो गए हैं।”
“हम शंकराचार्य की उस परंपरा का पालन करते हैं, जिनमें इतनी महानता थी कि उन्होंने अत्यंत वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति को भी अपना गुरु स्वीकार कर लिया। हम हिन्दू समाज में आज भी व्याप्त जातिगत भेदभाव की बुराई को पूरी तरह से मिटाने के लिए कृतसंकल्प हैं।”
उन्होंने वहां निकाली गई एक पवित्र धार्मिक यात्रा में भी सहभागिता की। कार्यक्रम में विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल के सदस्य पूज्य स्वामी सतस्वरूपानंद जी महाराज, पूज्य स्वामी तीर्थानंद जी महाराज, कोचिंग शिपयार्ड के सेवानिवृत्त अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक डॉ. मधु एस नायर जी, अलुवा जिला संघचालक जस्टिस सुंदरम गोविंद जी तथा पद्मश्री कुंजोल मास जी भी उपस्थित थे।
नीति समन्वय, जिम्मेदार एआई नवाचार को प्रोत्साहन देने और श्रम बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव को संबोधित करने के लिए यह एक उच्च स्तरीय अंतर-मंत्रालयी निकाय है
भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) ने एआई नियमन एवं आर्थिक समूह (एआईजीईजी) का गठन किया, जो एक उच्च स्तरीय अंतर-मंत्रालयी निकाय है और एआई नियमन नीति विकास और समन्वय के लिए भारत के केंद्रीय संस्थागत तंत्र के तौर पर कार्य करेगा।
एआईजीईजी के गठन से भारत के एआई नियामक दिशानिर्देशों और आर्थिक सर्वेक्षण में की गई संस्थागत सिफारिशों को औपचारिक रूप दिया गया है।
दिशानिर्देशों में एआई नियमन के लिए समग्र सरकारी दृष्टिकोण को निर्देशित करने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी निकाय की स्थापना की सिफारिश की गई है, जिससे मंत्रालयों, विभागों, नियामकों और सलाहकार निकायों की कार्रवाइयों को एक सुसंगत राष्ट्रीय रणनीति के अनुरूप बनाया जा सके। वहीं, आर्थिक सर्वेक्षण में एआई के इस्तेमाल को श्रम संबंधी वास्तविकताओं और सामाजिक स्थिरता की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाने में सक्षम एक समन्वय प्राधिकरण की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी, रेल एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव एआईजीईजी की अध्यक्षता करेंगे, जबकि इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी व वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद उपाध्यक्ष के तौर पर कार्यभार देखेंगे। एआईजीईजी की सदस्यता में नीति निर्माण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सुरक्षा एवं आर्थिक मामलों से जुड़े सरकार के वरिष्ठ हितधारक शामिल हैं।
एआईजीईजी भारत के एआई नियामक संस्थागत ढांचे के भीतर सर्वोच्च अंतर-मंत्रालयी निकाय के तौर पर कार्य करेगा। इसे एक प्रौद्योगिकी और नीति विशेषज्ञ समिति (टीपीईसी) का सहयोग प्राप्त होगा, जो एआईजीईजी को वैश्विक घटनाक्रमों, उभरती प्रौद्योगिकियों, जोखिमों, विनियमन और एआई नीति एवं शासन से संबंधित अन्य विकसित प्राथमिकताओं पर विशेषज्ञ सलाह प्रदान करेगी।
एआईजीईजी की संरचना और कार्यक्षेत्र के विवरण के लिए, कृपया देखें:
अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
भारत की स्वदेशी जीवन-शैली में निहित ‘स्व’ के भारत में निर्मित वस्तुओं का प्रधानतः उपयोग करने के साथ अनेक महत्वपूर्ण पहलू हैं।
भारत की शिक्षा-पद्धति के मूल्यांकन के लिए 1964–1966 के दौरान डॉ. डी. एस. कोठारी के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग का एक प्रमुख निष्कर्ष यह था कि भारत का वैचारिक जगत यूरोप-केंद्रित हो गया है, जबकि उसे भारत-केंद्रित होना चाहिए। इस तथ्य को समझने के लिए कुछ समकालीन उदाहरणों पर दृष्टि डालना उपयोगी होगा।
दृष्टिकोण का परिवर्तन : यूरोप से भारत की ओर –
मध्य – पूर्व नहीं, पश्चिम एशिया
आज इज़राइल और हमास के बीच जो युद्ध चल रहा है, उसे भारत सहित पूरी दुनिया की मीडिया “मध्य-पूर्व (Middle East)” क्षेत्र का युद्ध कह रही है। स्वतंत्रता के बाद भी भारत लंबे समय तक उस भूभाग को इसी नाम से संबोधित करता रहा। किंतु हाल ही में भारत के विदेश मंत्रालय ने उसे “पश्चिम एशिया” कहना आरंभ किया है। प्रश्न उठता है – क्या वहाँ युद्ध का स्थान बदल गया? नहीं। बदला है तो हमारा दृष्टिकोण।
खाड़ी के क्षेत्र को “मध्य-पूर्व” कहना दर्शाता है कि हम वैचारिक रूप से यूरोप में बैठकर दुनिया को देख रहे हैं। यूरोप के लिए भारत “पूर्व” है, जापान “सुदूर पूर्व (Far East)” और खाड़ी का क्षेत्र “मध्य-पूर्व” है। लेकिन भारत अब स्वतंत्र है। अब हमारी परिभाषाएँ हमारे दृष्टिकोण से होंगी, पश्चिम की नकल से नहीं। इसलिए भारत के लिए यूरोप पश्चिम है, जापान पूर्व है, और खाड़ी का क्षेत्र पश्चिम एशिया है।
सोच की यह आधारभूमि भारत की होगी, यूरोप की नहीं। यही स्वदेशी चेतना है।
शासन से न्याय की ओर
अंग्रेज भारत में शासन करने आए थे – To Rule over the People here, इसलिए उन्होंने लोगों को दंडित करने की दृष्टि से अनेक नियम बनाए, जिन्हें Indian Penal Code (IPC) कहा गया। आज भारत में जनता का शासन है। अब उद्देश्य दंड देना नहीं, न्याय प्रदान करना है। इसी भाव से IPC का नाम बदलकर भारतीय न्याय संहिता (BNS) किया गया। यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का परिवर्तन है। ऐसे अनेक परिवर्तन सरकार द्वारा किए जा रहे हैं और आगे भी होंगे।
कालगणना और भारतीय चेतना
अंग्रेजों के आने से पहले भारत में सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की गति पर आधारित शास्त्रसम्मत कालगणना प्रचलित थी। महीनों के नाम भी नक्षत्रों पर आधारित थे। हमारे शास्त्रज्ञ 50–100 वर्षों बाद होने वाले सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की भी सटीक गणना कर लेते थे। पश्चिम का ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रारंभ में केवल दस महीनों का था। सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर – इन नामों के अर्थ ही सातवाँ, आठवाँ, नौवाँ और दसवाँ हैं। बाद में गिनती पूरी करने के लिए जूलियस सीज़र ने जुलाई और सम्राट ऑगस्टस ने ऑगस्ट महीना जोड़ा। इस प्रकार सातवाँ कहलाने वाला महीना नौवाँ बन गया।
भारतीय तिथि और जीवन के संस्कार — आज भी भारत में हमारे सभी पर्व अंग्रेज़ी तारीख़ से नहीं, बल्कि भारतीय तिथि से ही मनाए जाते हैं, जैसे –
रामनवमी चैत्र शुक्ल नवमी को, रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को, जन्माष्टमी श्रावण/ भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को, नवरात्रि अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को, और विजयादशमी अश्विन शुक्ल दशमी को ही। अंग्रेज़ी तारीख़ चाहे जो हो, पर्व तिथि के अनुसार ही होते हैं।
तो प्रश्न यह है कि – क्या हम अपने जन्मदिन और विवाह की वर्षगाँठ भी भारतीय तिथि के अनुसार नहीं मना सकते? विवाह का दिन तय करते समय हम पंडित से शुभ मुहूर्त पूछते हैं, फिर उसकी वर्षगाँठ केवल अंग्रेज़ी तारीख़ से क्यों? यह आग्रह इसलिए है क्योंकि यह हमारी कालगणना है – प्राचीन, शास्त्रीय और वैज्ञानिक। यह हमारा ‘स्व’ है।
जन्मदिन का भाव बदलता है..
अंग्रेज़ी तारीख़ के अनुसार जन्मदिन मनाने में आधी रात तक प्रतीक्षा करना, फिर केक काटना और चेहरे पर केक का क्रीम लगाने जैसी भद्दी परंपराएँ चल पड़ी हैं।
भारतीय परंपरा में दिन का आरंभ ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) में होता है।
यदि तिथि के अनुसार जन्मदिन मनाया जाए, तो पूरा भाव-विश्व बदल जाता है –
सुबह जल्दी उठना, स्नान कर ईश्वर के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करना, घर के बुजुर्गों को प्रणाम करना, कोई अच्छा संकल्प लेना, और समाज के लिए कुछ करने का निश्चय करना।
ऐसा जन्मदिन मनाने से पूरे कुटुंब में आनंद, संस्कार और उत्सव का वातावरण बनता है।
यही भारत की स्वदेशी जीवन-शैली है – जहाँ सोच, समय, संस्कार और व्यवहार – सब कुछ अपने ‘स्व’ से जुड़ा हुआ हो। कम खर्च में, बिना किसी के विरोध के, केवल दृष्टि बदलकर हम अपने जीवन को अधिक अर्थपूर्ण और भारतीय बना सकते हैं।
पढ़ाई, सीख और जीवन का उद्देश्य : भारत का ‘स्व’ दृष्टिकोण
हाल ही में एक लेख पढ़ने को मिला। उसमें लेखक लिखता है –
“मैंने ऐसे अनेक लोगों को देखा है जो अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं, पर जीवन में बहुत कुछ सीख चुके हैं। और ऐसे भी लोगों को देखा है जो बहुत पढ़े-लिखे हैं, पर जीवन की सीख से बिल्कुल वंचित हैं। पढ़ाई (Education) और सीख (Learning) – दोनों एक जैसी नहीं हैं।
पढ़ाई से आजीविका का साधन मिलता है, पर सीख से जीवन को उद्देश्य (Purpose) मिलता है। जब जीवन का उद्देश्य स्पष्ट होता है, तो जीवन की दिशा तय होती है।
दिशा तय होने पर प्राथमिकताएँ स्पष्ट होती हैं। और जब उस उद्देश्य की दिशा में निरंतर प्रयास होते हैं, तो जीवन नदी के प्रवाह की तरह सहज रूप से बहने लगता है।
नदी अपने दोनों किनारों की मर्यादा में बहती है, क्योंकि उसे अपना गंतव्य पता होता है – उसे सागर से मिलना है।
इसके विपरीत, केवल पढ़ाई करके पैसा कमाने वाले व्यक्ति का जीवन तालाब के पानी जैसा हो जाता है – ऊपर से बड़ा और स्थिर दिखता है, पर भीतर ठहरा हुआ होने के कारण सड़ने लगता है और दुर्गंध फैलाता है।
किताबें हमें सीखने में सहायता करती हैं। कहा भी गया है – “पहले हम पढ़ना सीखते हैं, और बाद में सीखने के लिए पढ़ते हैं।” (First we learn to read, then we read to learn.)
जैसे मछली पानी में रहती है, वैसे ही हम समय में रहते हैं। मछली यह नहीं कह सकती कि “मेरे पास पानी नहीं है।” उसी प्रकार कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि “मेरे पास समय नहीं है।” वास्तव में समस्या समय की नहीं, कार्य-प्रबंधन (Task management) की – कार्य की प्राथमिकता की होती है।
जब हम अपने कार्यों को प्राथमिकता से, सही ढंग से व्यवस्थित करते हैं और उपलब्ध समय का उचित नियोजन करते हैं, तो जीवन के उद्देश्य के लिए समय स्वतः उपलब्ध हो जाता है।
फिर उस योजना को क्रियान्वित करना आवश्यक होता है।
इसलिए जीवन में केवल धन अर्जन ही नहीं, बल्कि कोई उच्च उद्देश्य होना चाहिए।
उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, सूर्योदय से पहले उठने का संकल्प, फिर उसका प्रयास और बाद में अभ्यास आवश्यक है। जब उठने का समय तय हो जाता है, तो सोने का समय अपने आप तय हो जाता है। इन दो किनारों के बीच जब जीवन बहता है, तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य स्वतः संतुलित रहता है। यदि प्रत्येक घर में, घर के सभी सदस्य सूर्योदय से पहले उठने की परंपरा अपनाएँ, तो जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं। रात्रि-पारी में काम करने वाले या बीमार लोग अपवाद हो सकते हैं। नियमित व्यायाम, योग, सूर्य नमस्कार स्वतः जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। यह भी भारत के ‘स्व’ का ही एक स्वरूप है।
“थोड़ा अधिक देना”: भारत का मौन संस्कार
अंग्रेज़ शासन से पहले भारत में एकीकृत शासन नहीं था। भाषा, पूजा-पद्धति और जीवन-शैली में विविधता थी। फिर भी एक परंपरा पूरे भारत में सदियों से देखने को मिलती है –
जब कोई द्रव पदार्थ (दूध, तेल आदि) मापकर दिया जाता है, तो पूरा माप भरने के बाद थोड़ा ऊपर से अधिक देना। तराजू में तौलते समय भी कांटा बीच में आने के बाद मुट्ठी भर थोड़ा अधिक देना – यह परंपरा आज भी विशेषकर ग्रामीण भारत में जीवित है।
यह केवल व्यापार की शैली नहीं, बल्कि भारत का ‘स्व’भाव है। इसके पीछे की भावना स्पष्ट है – “मैं जो मूल्य ले रहा हूँ, उसके बदले समाज को किसी भी स्थिति में कम नहीं, बल्कि थोड़ा अधिक ही दूँ।”
समाज को अधिक लौटाने का भाव – यही भारत है।
भ्रष्टाचार का स्थायी समाधान
दुर्भाग्यवश आधुनिक शिक्षा व्यक्ति को अधिक आत्म-केंद्रित और केवल आर्थिक लाभ के दृष्टिकोण से सोचने वाला बना रही है। जबकि भारत का सामान्य जन समाज को अधिक देने में सहज आनंद अनुभव करता है। यही भारत का ‘स्व’भाव है। यदि इस ‘स्व’भाव का जागरण हो, और इसे व्यवहार में उतारा जाए, तो भ्रष्टाचार के लिए स्थान ही नहीं बचेगा। भाव स्पष्ट है – मैं अपने कार्य के लिए जो वेतन या मूल्य लेता हूँ, उससे अधिक समाज को लौटाना है, कम किसी भी स्थिति में नहीं। यही भारत की स्वदेशी जीवन-शैली और भारत के ‘स्व’ का सच्चा प्रकटीकरण है।
स्वामी विवेकानंद की आयरिश मूल की शिष्या भगिनी निवेदिता ने समाज जीवन से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही है। उनका कहना है कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम से अर्जित पारिश्रमिक को केवल अपने तक सीमित न रखकर समाज के हित में अर्पित करते हैं, वहाँ सामूहिक प्रयास से एक प्रकार की सामाजिक पूँजी (social capital) का निर्माण होता है। इसी सामाजिक पूँजी के बल पर समाज समृद्ध बनता है और समाज का प्रत्येक व्यक्ति भी समृद्ध बनता है। यही धर्म है – यह धर्म किसी पंथ या रिलीजन तक सीमित नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और परस्पर एक सूत्र में बाँधने वाली जीवन-दृष्टि है।
निवेदिता आगे कहती हैं कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का फल केवल स्वयं के लिए संचित करते हैं और समाज को लौटाते नहीं हैं, उस समाज में कुछ व्यक्ति तो संपन्न दिखाई दे सकते हैं, किंतु समाज दरिद्र बना रहता है। इसलिए यदि इस विचार को स्वदेशी जीवनशैली का अभिन्न अंग बना लिया जाए, तो समाज का संपूर्ण स्वरूप ही बदल सकता है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति का सजग और सक्रिय सहयोग आवश्यक है।
भारत का विचार और आचरण सदा से यह रहा है – उत्पादन में प्रचुरता, वितरण में समानता और उपभोग में संयम। अपने उपभोग को संयमित कर, अपने अधिकार का ही बचा हुआ समाज के हित में आत्मीयता से समर्पित करना ही धर्म है। वहीं, दूसरों को कष्ट पहुँचाकर या उनके अधिकारों को छीनकर अपना स्वार्थ साधना पाप है। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्रता के बाद भारत के नेतृत्व ने कुछ प्रतीकात्मक और विचार प्रधान निर्णय लिए। लोकसभा का आदर्श वाक्य है – “धर्मचक्र प्रवर्तनाय”, राज्यसभा का – “सत्यम् वद, धर्मम् चर”, और भारत के सर्वोच्च न्यायालय का बोध वाक्य है – “यतो धर्मस्ततो जयः”। यहाँ तक कि हमारे राष्ट्रध्वज में स्थित चक्र भी धर्मचक्र का प्रतीक है। भारत मूलतः धर्मप्राण राष्ट्र है। जब धर्म के अनुशासन में अर्थ और काम – ये पुरुषार्थ चलते हैं, तब मोक्ष स्वाभाविक हो जाता है।
दया धर्म है, अहंकार पाप है। इसलिए जीवन में एक ओर, एकांत में आत्म साधना और दूसरी ओर, (लोकांत में) समाज के बीच सेवा – दोनों का संतुलन आवश्यक है। स्वामी विवेकानंद ने इसी भाव को “शिवभाव से जीव सेवा” अर्थात To serve man is to serve God के सूत्र द्वारा स्पष्ट किया और दरिद्र नारायण की सेवा को ईश्वर-पूजा के समान माना।
यही भारत का ‘स्व’ है – यही हमारी स्वदेशी जीवनशैली है।
भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में कहा गया है – “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः”
और “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः” अर्थात मनुष्य अपने स्वधर्म रूपी कर्म में रत रहकर सिद्धि प्राप्त करता है और अपने कर्मों के माध्यम से ईश्वर की आराधना करता है।
संत ज्ञानेश्वर इसे और सरल शब्दों में कहते हैं – “तेया सर्वात्मका ईश्वरा, स्वकर्म कुसुमांची वीरा, पूजा केली होय अपारा, तोषा लागी।” (अर्थ- यह है कि समाजरूपी सर्वव्यापक ईश्वर की अपने कर्मरूपी पुष्पों से की गई पूजा उसे प्रसन्न करती है।)
इन सभी विचारों का सार यही है कि हमारा प्रत्येक कार्य समाज-पूजा के भाव से किया जाए। जिस प्रकार पूजा के लिए हम ताजे, सुगंधित और श्रेष्ठ पुष्प चुनते हैं, उसी प्रकार समाज के लिए किए जा रहे हमारे सभी कर्म भी उत्कृष्ट, शुद्ध और सर्वोत्तम होने चाहिए।
यही भारत का ‘स्व’ है। यही हमारा ‘स्व’भाव बने। यही हमारी जीवनशैली का अंतरंग हिस्सा बने। तब हमारा समाज-जीवन और राष्ट्र-जीवन कितना सुंदर, समृद्ध और मनभावन होगा !
साहित्य अकादमी द्वारा LGBTQ लेखक सम्मेलन का आयोजन एक गहरे वैचारिक विमर्श और टकराव का संकेत है। दुखद है कि यह सम्मेलन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वाधान में हो रहा है। संस्कृति मंत्रालय को देखना चाहिए कि क्या हमारी संस्कृति के सभी सिरमौर विषयों पर साहित्य अकादमी ने चर्चा सम्पन्न करा ली है? केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को साहित्य आकादमी से पूछना होगा कि “भारतीय ज्ञान परंपरा की कितनी चर्चा और कितने लेखक सम्मेलन ‘साहित्य अकादमी’ ने करा लिए हैं? क्या हमारे सभी ज्वलंत और आवश्यक सांस्कृतिक प्रश्न उत्तर पा चुके हैं जो इस प्रकार के विषय को चर्चा केंद्र में रखने का निर्णय लिया गया? प्रश्न यह नहीं है कि किसी विषय पर चर्चा क्यों हो रही है, बल्कि यह है कि किन विषयों को प्राथमिकता दी जा रही है और उसके पीछे कौन-सी वैचारिक शक्तियाँ सक्रिय हैं?
हम एलजीबीटीक्यू के मौलिक अधिकारों के विरोध में नहीं हैं, किंतु इनके कंधों पर रखकर भारतीय मूल्यों, देशज अधिष्ठानों, हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं पर जिस प्रकार बंदूक चलाई जा रही है, उसके विरोध में हैं। भारत में LGBTQ के माध्यम से वैचारिक नक्सलाइट्स बहुधा ही गंद फैलाते रहते हैं। यह उनके प्रति संवेदना के लिए नहीं, अपितु देश में अनावश्यक वितंडा खड़ा करने के लिए किया जाता है।
हमें यह देखना चाहिए कि वे कौन सी छिपी हुई शक्तियाँ हैं जो भारत में बालक, बालिकाओं के लिए एक से बाथरूम चाहती हैं? इस लेखक सम्मेलन का लक्ष्य केवल भारतीय परंपराओं पर तोप दागना ही तो होगा। गे और लेस्बियन सेक्स के ऊपर लेखक सम्मेलन में किस प्रकार की चर्चा आएगी, इसकी कल्पना से हृदय सिहर उठता है।
लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर की चर्चा केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तत्वाधान वाले, साहित्य अकादमी के आयोजन में आना एक खतरनाक वैचारिक विस्फोट है। यह वैचारिक बारूदी सुरंग है जो हमारे वैचारिक अधिष्ठान के नीचे लगातार बिछाई जा रही है।
ट्रांसजेंडर या किन्नर समाज के प्रति सदैव ही हमारे भारतीय समाज का, शास्त्रों का, ऋषि परंपरा का संवेदनशील मंतव्य रहा है। ये हमारी परंपराओं में स्थायी रूप से सम्मानपूर्वक बसे हैं। समय के साथ-साथ इनके विषय में आवश्यक निर्णय लिए जाने चाहिए, जो शासन से लेकर समाज तक लिए भी गए हैं। किंतु ट्रांसजेंडर के अतिरिक्त जो लोग हैं, इनका स्थान हमारे समाज में कहाँ होना चाहिए?
आज भारत में एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि यह पूरा विमर्श तथाकथित “कल्चरल मार्क्सिज़्म” की रणनीति का हिस्सा है। इस विचारधारा का मूल उद्देश्य हमारे समाज की पारंपरिक संरचनाओं, परिवार, धर्म, संस्कृति और नैतिकता, को दुर्बल करना ही है। हमारी ऋषि परंपरा और सनातनी संस्कृति को हटाकर उनकी जगह एक नए प्रकार की वैचारिक संरचना स्थापित करना ही ऐसे आयोजनों का लक्ष्य होता है।
भारतीय संस्कृति की जड़ें अत्यंत गहरी और संतुलित हैं। यहाँ मनुष्य को केवल उसकी इच्छाओं या प्रवृत्तियों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके धर्म, कर्तव्य और सामाजिक उत्तरदायित्व के आधार पर देखा गया है। ऋषि परंपरा ने जीवन को चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – में संतुलित किया है। इस व्यवस्था में ‘काम’ मर्यादा और संतुलन के भीतर है, न कि उच्छृंखल अभिव्यक्ति के रूप में। ‘काम आनंद’ की एक परिपूर्ण परिभाषा, परिधि, प्रतीति, अभिव्यक्ति हमारे पास युगों से है। हमारी ‘विवाह संस्था’ को चोटिल करने का दुष्प्रयास है यह लेखक सम्मेलन। हमारी चिति पर यह नई विध्वंसक मान्यताएँ लादकर वैचारिक बलात्कार किया जा रहा है?
LGBTQ जैसे विषयों को जिस प्रकार से आज शो-ऑफ किया जा रहा है, वह भारतीय दृष्टिकोण से अधिक पश्चिमी अवधारणाओं से प्रेरित है। यह केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं है, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों पर भी इसका प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव पड़ता है। इस दुष्प्रभाव की चिंता करनी चाहिए।
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि देश में राजनीतिक स्तर पर परिवर्तन हुआ है और राष्ट्रीय विचारधारा को समर्थन मिला है। लेकिन क्या वास्तव में व्यवस्था बदली है? हमारी शासन व्यवस्था राष्ट्रीयता की उपेक्षा क्यों करती है? अनजाने में हमारी सत्ता क्यों पश्चिमी मूल्यों की पक्षधर बनकर खड़ी हो जाती है? यह एक गंभीर प्रश्न है।
कई उदाहरण संकेत देते हैं कि शैक्षणिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थानों में अब भी वामपंथी विचारधारा का गहरा प्रभाव बना हुआ है। चाहे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम हों, इतिहास लेखन हो या साहित्यिक संस्थाओं के कार्यक्रम, बहुधा वही दृष्टिकोण प्रमुख होता है जो भारत की परंपरागत मान्यताओं से भिन्न है और उसके विरोध में है।
साहित्य अकादमी का निर्णय भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। प्रश्न स्वाभाविक है कि जब देश में ग्रामीण साहित्य, वेद-उपनिषद, भारतीय भाषाओं के संरक्षण, या राष्ट्रीय साहित्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, तब LGBTQ जैसे विषय को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है?
भारत का “कथित बुद्धिजीवी” वर्ग सदैव ही स्वयं को प्रगतिशील और उदारवादी बताता है, लेकिन इसके विचारों में एक स्पष्ट झुकाव वामपंथी सोच की ओर होता है। यह वर्ग भारतीय परंपराओं को पिछड़ा बताने में संकोच नहीं करता, जबकि पश्चिमी विचारों को आधुनिकता का प्रतीक मानता है। यह वही वर्ग है जो रामायण और महाभारत पर प्रश्न उठाता है। यह वर्ग परंपरागत परिवार व्यवस्था को चुनौती देता है। यह वर्ग भारतीय संस्कृति को “पितृसत्तात्मक” या “रूढ़िवादी” कहकर खारिज करने का प्रयास करता है।
LGBTQ लेखक सम्मेलन जैसे आयोजन इनके लिए केवल साहित्यिक मंच नहीं, बल्कि एक वैचारिक विध्वंस और बारूदी सुरंग फैला देने का माध्यम है। कल्चरल मार्क्सिज्म की अवधारणा कहती है कि यदि किसी समाज को बदलना है, तो उसकी संस्कृति को बदलें। भारत में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे विभिन्न माध्यमों से चल रही है, फिल्मों, वेब सीरीज, शिक्षा और अब साहित्यिक मंचों के माध्यम से। इनका सीधा सा उद्देश्य है — हमारे पारंपरिक मूल्यों को “पुराना” और “अप्रासंगिक” साबित करना, नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर करना, और जड़विहीन पहचान निर्मित करना।
चरित्र से मजबूत होता है राष्ट्र, संघ मूल्य आधारित संगठन – ले. जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल जी
कुरुक्षेत्र – 28 फरवरी 2026।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण संघ कार्य का मूल आधार हैं। स्पष्ट किया कि नैतिक मूल्यों, आचरण, संस्कार और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के साथ पुरुषार्थ का समन्वय आवश्यक है, तभी स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। सरसंघचालक जी शनिवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त प्रमुख जन गोष्ठी में हरियाणा प्रदेश के प्रमुख शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान मंच पर सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस. जायसवाल जी, उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल जी और प्रांत संघचालक प्रताप सिंह जी उपस्थित रहे ।
सरसंघचालक जी ने परिवार की भूमिका पर विशेष बल देते हुए कहा कि घरों में मंगल संवाद की परंपरा विकसित होनी चाहिए, जहां मन से मन का संवाद हो और बच्चों को उचित-अनुचित का बोध कराया जाए। केवल उपदेश नहीं, बल्कि संवाद और संस्कारयुक्त वातावरण ही व्यक्ति को भटकाव से बचाता है। संपत्ति के समय साथ खड़े होने वाले बहुत होते हैं, लेकिन विपत्ति में साथ देने वाला कौन है, यह परिवार और समाज के संस्कार तय करते हैं। यदि कोई भी इंसान असफल हो जाए या बुरी संगति में पड़ जाए, तो उसे मार्गदर्शन देने वाला, समझाने वाला और संभालने वाला अपना परिवार और समाज ही होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कुटुंब और समाज में संस्कारों का वातावरण निर्माण करना समय की आवश्यकता है, क्योंकि यही वातावरण जिम्मेदार, संवेदनशील और चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ को समझना है तो संघ में आकर ही समझना पड़ेगा। केवल बाहर से देखकर, कल्पना से और फैलाये जा रहे नैरेटिव से नहीं समझ सकते, क्योंकि संघ का जैसा काम है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं है। आज पांचों महाद्वीपों से महत्वपूर्ण लोग संघ को देखने, जानने और समझने के लिए आते हैं। वे भी अपने देश के युवाओं के लिए इस तरह का विचार संगठन खड़ा करने के लिए सहयोग मांगते हैं, क्योंकि उनके पास ऐसा ढांचा नहीं है।
उन्होंने कहा कि जिस तरह से सूर्य जैसा कोई दूसरा सूर्य नहीं, आकाश जैसा दूसरा आकाश नहीं है, उसी तरह से संघ जैसा दूसरा संगठन नहीं है। अगर कोई दूर से देखकर संघ को जानना चाहता है, तो पता नहीं लगेगा। उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवक देश में एक लाख 30 हजार सेवा कार्य चलाते हैं, इसके बाद भी संघ सर्विस आर्गेनाइजेशन नहीं है। कला से लेकर क्रीड़ा तक और विविध क्षेत्रों से लेकर राजनीति तक संघ विचार के कार्यकर्ता हैं, पर संघ एक राजनीतिक संगठन नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ के बारे में एक बात समझने की है कि वह स्पर्धा के भाव से शुरु नहीं हुआ। संघ किसी एक परिस्थिति की प्रतिक्रिया में या विरोध में नहीं चला, बल्कि राष्ट्र के लिए प्रतिबद्धता के साथ समाज को जोड़ने के लिए कार्य करता है। संघ को किसी पर कोई प्रभाव नहीं जमाना, ना ही उसे सत्ता की आवश्यकता है। समाज और देश के लिए संघ के कार्य चलता है, उन सब को पूर्ण करने वाला काम ही संघ है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश आक्रांताओं के खिलाफ हार हुई थी। भारत का एक लंबा कालखंड रहा, जब आक्रांता हम पर राज करते रहे और हम अपनी ही जमीन पर उनसे क्यों हार रहे हैं…इस पर विचार हुआ था। तब किसी ने सोचा था कि एक बार हार गये तो क्या हुआ…। इसी विचार से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए तब 1860 में क्रांतिकारी वासुदेव बलंवत फड़के ने एक भाव जागृत किया। उनका मानना था कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में एक मोर्चा हारा है, देश नहीं, फिर से स्वतंत्रता के लिए लड़ेंगे। इसके बाद स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रभक्तों की लंबी श्रृंखला डॉ. हेडगेवार जी से भगत सिंह, राजगुरु, नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक आगे आई और यह प्रयास लगातार जारी रहे। वासुदेव बलवंत फड़के को आज भी महाराष्ट्र में आद्य क्रांतिकारी कहा जाता है।
डॉ. मोहन भागवत जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्हें जन्मजात देशभक्त बताया। उन्होंने कहा कि बाल्यकाल से ही बालक केशव के मन में राष्ट्रभाव प्रखर था। मात्र 11 वर्ष की आयु में बालक केशव ने गुलामी के प्रतीक के रूप में बांटी गई मिठाई को कचरे में डाल दिया था, जो उनके स्वाभिमानी स्वभाव का संकेत था। उनके माता-पिता भी सेवा भाव से प्रेरित थे और प्लेग पीड़ितों की सेवा में लगे रहते थे, जिसका गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। छात्र जीवन में ही उन्होंने वंदे मातरम् आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उनकी प्रतिभा और राष्ट्रनिष्ठा को देखकर नागपुर के राष्ट्रीय विचार के नेताओं ने उन्हें चिकित्सा शिक्षा के लिए भेजा, जहां उन्होंने प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की और क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े। वे अनुशीलन समिति से भी जुड़े और स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।
सरसंघचालक जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार जी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौर में कई राष्ट्रभक्तों से संवाद किया और क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग किया। बालक केशव से लेकर संघ संस्थापक बनने तक का उनका सफर राष्ट्र चिंतन, प्रयोग और संगठन निर्माण से जुड़ा रहा। लंबे ऐतिहासिक पराधीनता काल के बाद डॉ. हेडगेवार जी ने यह विचार किया कि केवल राजनीतिक परिवर्तन पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज का संगठन और चरित्र निर्माण आवश्यक है। इसी सोच के तहत उन्होंने 10-11 वर्षों तक विभिन्न प्रयोग किए और एक विशिष्ट कार्यपद्धति विकसित की, जिसके आधार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई।
उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना के बाद प्रारंभिक वर्षों में किए गए प्रयोगों से जो कार्यपद्धति विकसित हुई, उसी से संगठन का स्वरूप मजबूत हुआ। उनका मानना था कि समाज को संगठित किए बिना राष्ट्र निर्माण संभव नहीं और देश का कार्य किसी एक संस्था या व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। डॉ. हेडगेवार जी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि महापुरुषों के प्रयास तात्कालिक प्रेरणा देते हैं, लेकिन स्थायी परिवर्तन समाज के आचरण और पुरुषार्थ से आता है। व्यवस्था परिवर्तन के लिए समाज परिवर्तन आवश्यक है और इसके लिए वातावरण निर्माण करने वाले चरित्रवान व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।
उन्होंने कहा कि संघ का मूल कार्य व्यक्तित्व निर्माण और समाज का संगठन है। संघ स्वयं को उद्धारक नहीं मानता, बल्कि समाज को सक्षम बनाने का कार्य करता है। उनके अनुसार, प्रत्येक गांव और बस्ती में ऐसे लोगों का निर्माण जरूरी है जो राष्ट्रीय चरित्र के उदाहरण बनें और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करें। संघ संपूर्ण समाज को जोड़ने की बात करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दू किसी संकीर्ण पहचान का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और गुणात्मक जीवन दृष्टि का प्रतीक है, जिसका मूल आधार संस्कार, आचरण और राष्ट्रहित है।
संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल ने वंदे मातरम् के उद्घोष से शुरुआत की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा को असाधारण बताया। उन्होंने कहा कि विश्व में शायद ही कोई ऐसा संगठन हो जो इतने वर्षों से निरंतर विस्तार और प्रभाव के साथ कार्य कर रहा हो। इस कार्यक्रम में उपस्थित होकर उन्हें नैतिक मूल्यों से प्रेरित वातावरण का अनुभव हुआ। जायसवाल ने संघ को एक मूल्य-आधारित संगठन बताते हुए कहा कि सेना की तरह संघ भी अनुशासन, संस्कार और राष्ट्रीयता के भाव से परिपूर्ण है। उन्होंने हिन्दू संस्कृति को भारत की पहचान बताते हुए कहा कि यदि संस्कृति समाप्त हो जाए तो केवल भूमि रह जाएगी, चरित्र नहीं। उन्होंने कहा कि संघ के माध्यम से राष्ट्र के प्रति निष्ठा और चरित्र निर्माण का कार्य निरंतर बढ़ रहा है।
संघ में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता और यही उसका मूल मंत्र है। उन्होंने महात्मा गांधी के वर्धा प्रवास का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी संघ की शाखा में समानता का भाव देखने को मिला था। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल सेना और उद्योग से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र से तय होती है, और चरित्र निर्माण संघ का मूल आधार है। राष्ट्रीय जिम्मेदारी के संदर्भ में उन्होंने विभाजन काल, भूदान आंदोलन, 1962 के युद्ध और कारगिल युद्ध के दौरान संघ स्वयंसेवकों की सेवा गतिविधियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राहत शिविर, ट्रैफिक नियंत्रण और रक्तदान जैसे कार्यों के माध्यम से संघ ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी सराहा था।
उन्होंने वीर सावरकर के कथन का उल्लेख करते हुए भारतीय सभ्यता को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता बताया। साथ ही कहा कि भारतीय सेना में धर्म नहीं, बल्कि वर्दी और तिरंगा सर्वोपरि होते हैं और सर्वधर्म समभाव की भावना ही उसकी पहचान है। जायसवाल ने विभाजनकारी सोच को त्यागने का आह्वान करते हुए कहा कि अस्पताल में रक्त की पहचान ही सबसे बड़ी होती है, इसलिए समाज में भी एकता का भाव होना चाहिए। संघ में अनुशासन और संस्कार को ही वास्तविक धर्म माना जाता है।
उन्होंने भारत को विश्वगुरु बनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया और कहा कि संघ के मूल मूल्यों पर चलकर ही राष्ट्र की विजय सुनिश्चित हो सकती है। उन्होंने “जय हिंद” के साथ अपने वक्तव्य का समापन किया।
वृत्तचित्र, प्रदर्शनी और संघ की यात्रा
इस अवसर पर परिसर में संघ की 100 वर्ष की यात्रा पर आधारित एक प्रदर्शनी, अस्थाई साहित्य केंद्र, स्वदेशी उत्पाद केंद्र, पंचगव्य उत्पाद केंद्र स्थापित किया गया। संघ की प्रदर्शनी में संघ की क्रमिक विकास यात्रा के साथ इनमें संघ वृक्ष के बीज डॉ. हेडगेवार जी से वटवृक्ष बनने तक की सचित्र यात्रा दिखी। इसी के साथ स्वदेशी जागरण मंच, राष्ट्र सेविका समिति, नर सेवा नारायण सेवा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, विद्या भारती, संस्कार भारती, हिन्दू जागरण मंच, विश्व हिन्दू परिषद, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम तथा भारतीय किसान संघ की झलक देखने को मिली।
सभागार में कार्यक्रम के शुभारंभ से पहले संघ की सौ वर्ष की यात्रा, वृत्त चित्र के माध्यम से प्रस्तुत की गई। इसमें संघ के जनक की जीवनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी प्रमुख घटनाओं को दर्शाया गया। इसमें संघ के गठन से लेकर वर्तमान तक की यात्रा शामिल रही। डॉ. हेडगेवार जी का मूलमंत्र -संगठन कागजों में नहीं, लोगों के दिल में, इस वृत्त चित्र में सामने था।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज ‘केरल’ राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद, राष्ट्रपति द्वारा केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 को केरल राज्य विधानसभा को संविधान के अनुच्छेद 3 के प्रावधान के तहत विचार-विमर्श हेतु भेजा जाएगा। केरल राज्य विधानसभा की राय प्राप्त होने के बाद, भारत सरकार आगे की कार्रवाई करेगी और संसद में केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने हेतु केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 को लागू करने के लिए राष्ट्रपति की अनुशंसा प्राप्त की जाएगी।
केरल विधानसभा ने 24.06.2024 को एक प्रस्ताव पारित कर राज्य का नाम बदलकर “केरलम” करने का निर्णय लिया, जो इस प्रकार है:
“मलयालम भाषा में हमारे राज्य का नाम ‘केरलम‘ है। 1 नवंबर, 1956 को भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ था। केरल पिरवी दिवस भी 1 नवंबर को ही मनाया जाता है। राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही मलयालम भाषी लोगों के लिए संयुक्त केरल के गठन की प्रबल मांग रही है। लेकिन संविधान की पहली अनुसूची में हमारे राज्य का नाम ‘केरल‘ ही दर्ज है। यह विधानसभा सर्वसम्मति से केंद्र सरकार से संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार तत्काल कदम उठाकर राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम‘ करने की अपील करती है।”
इसके बाद, केरल सरकार ने भारत सरकार से संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार ‘केरल’ राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के लिए संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन करने हेतु आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया है।
संविधान के अनुच्छेद 3 में मौजूदा राज्यों के नाम परिवर्तन का प्रावधान है। अनुच्छेद 3 के अनुसार, संसद विधि द्वारा किसी भी राज्य का नाम बदल सकती है। अनुच्छेद 3 में आगे प्रावधान है कि इस उद्देश्य से कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना प्रस्तुत नहीं किया जाएगा, और यदि विधेयक में निहित प्रस्ताव किसी राज्य के क्षेत्रफल, सीमाओं या नाम को प्रभावित करता है, तो राष्ट्रपति द्वारा विधेयक को उस राज्य के विधानमंडल को निर्दिष्ट अवधि के भीतर या राष्ट्रपति द्वारा अनुमत अतिरिक्त अवधि के भीतर उस पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए संदर्भित किया जाना चाहिए और इस प्रकार निर्दिष्ट या अनुमत अवधि समाप्त हो जानी चाहिए।
भारत सरकार के गृह मंत्रालय में केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के विषय पर विचार किया गया और केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह की स्वीकृति से, केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के लिए मंत्रिमंडल के समक्ष मसौदा ज्ञापन को विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधि मामलों और विधायी विभाग को उनकी टिप्पणियों के लिए भेजा गया। विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधि और विधायी विभाग ने केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव से सहमति व्यक्त की है।
अवसंरचना का वादा $250 अरब के पार; $20 अरब की डीप-टेक प्रतिबद्धता भारत के एआई इकोसिस्टम में दुनिया के भरोसे को दिखाती हैं
118 देशों के 20 से ज़्यादा सरकार के प्रमुखों और प्रतिनिधियों ने ऐतिहासिक एआई आयोजन में हिस्सा लिया
5 लाख से ज़्यादा प्रतिभागियों और 550 प्री-समिट आयोजनों ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट को दुनिया की सबसे बड़े एआई सम्मेलनों में से एक बनाया
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 आज भारत मंडपम, नई दिल्ली में सम्पन्न हो गया। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को संबोधित किया और पांच दिन के ग्लोबल आयोजन के पैमाने, नतीजों और खास घोषणाओं को संक्षेप में बताया। संवाददाता सम्मेलन में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव श्री एस. कृष्णन, भारत के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता श्री रणधीर जायसवाल और भारत सरकार के प्रधान प्रवक्ता और पत्र सूचना कार्यालय के प्रधान महानिदेशक श्री धीरेंद्र ओझा भी शामिल हुए।
सम्मेलन में अभूतपूर्व भागीदारी देखी गई जिससे ग्लोबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बातचीत को आकार देने में भारत के बढ़ते नेतृत्व की फिर से पुष्टि हुई। उद्घाटन में 118 देशों के सरकारी प्रतिनिधियों के साथ-साथ 20 से ज़्यादा सरकार के प्रमुख और 59 मंत्री स्तर के प्रतिनिधि शामिल हुए। समिट में 100+ ग्लोबल एआई लीडर, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सीएक्सओ, और दुनिया भर के 500 से ज़्यादा बड़े एआई विशेषज्ञ भी शामिल हुए।
भारत के एआई ट्रैजेक्टरी में दुनिया भर की ज़बरदस्त दिलचस्पी को दिखाते हुए, समिट में 5 लाख से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। इस आयोजन के लिए वैश्विक स्तर पर रुचि बन रही थी, शिखर सम्मेलन से पहले 30 देशों में 550 सम्मेलन और कार्यक्रम आयोजित किए गए। मुख्य शिखर सम्मेलन के दिनों में 500 से अधिक साइड इवेंट आयोजित की गई। इससे यह अब तक के सबसे व्यापक बहु-हितधारक एआई कार्यक्रमों में से एक बन गया।
इस अवसर पर संबोधन में मजबूत वैश्विक भागीदारी, भारत के जिम्मेदार एआई दृष्टिकोण के व्यापक समर्थन और देश की तकनीकी क्षमताओं में बढ़ते विश्वास की जानकारी देते हुए, श्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “संख्या महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वास्तव में महत्वपूर्ण यह है कि दुनिया को नए एआई युग में भारत की भूमिका पर भरोसा है। भागीदारी की गुणवत्ता, संवाद की गहराई और जिम्मेदार और संप्रभु एआई के प्रति हमारे दृष्टिकोण का वैश्विक समर्थन यह दर्शाता है कि भारत सिर्फ इस परिवर्तन में भाग नहीं ले रहा है, हम इसे आकार देने में मदद कर रहे हैं।”
मंत्री ने एआई समिट को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भारत के वैश्विक नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण पल बताया। उन्होंने दुनिया के बड़े एआई प्लेयर्स की भागीदारी, मंत्रियों की मज़बूत भागीदारी और युवाओं की अभूतपूर्व भागीदारी पर ज़ोर दिया। इसमें 2.5 लाख से ज़्यादा विद्यार्थियों ने ज़िम्मेदार और नैतिक एआई पर चर्चा में हिस्सा लिया, जिसका परिणाम गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के रूप में सामने आया।
श्री वैष्णव ने कहा कि अवसंरचना से जुड़े निवेश के वादे $250 अरब को पार कर गए हैं, साथ ही लगभग $20 अरब की डीप-टेक वेंचर प्रतिबद्धता भी हैं। यह भारत के एआई इंफ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम में बढ़ते वैश्विक भरोसे को दिखाता है। उन्होंने भारत की सॉवरेन एआई मॉडल स्ट्रैटेजी के मज़बूत अंतरराष्ट्रीय समर्थन पर भी ज़ोर दिया और कम नवाचार से बनाए गए देसी मॉडल्स की गुणवत्ता की तारीफ़ की।
उन्होंने इन घटनाक्रमों को देश को 2047 तक “विकसित भारत” बनाने के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के बड़े विज़न के रूप में वर्णित किया। श्री वैष्णव ने समिट को भारत में दीर्घावधि प्रौद्योगिकीय और सेमीकंडक्टर क्षमता बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
OpenAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) श्री सैम ऑल्टमैन ने आज प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की।
बैठक के बाद, प्रधानमंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत एआई में बहुत तरक्की कर रहा है और प्रतिभा एवं नवाचार के लिए ग्लोबल हब बनने की ओर अग्रसर है।
प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत के प्रतिभावान युवाओं में निवेश करने और इस बदलाव लाने वाले क्षेत्र में जोश भरने का निमंत्रण दिया।
X पर सैम ऑल्टमैन की पोस्ट के जवाब में श्री मोदी ने कहा:
“यह सच में बहुत अच्छी बैठक थी। भारत एआई की दुनिया में बहुत तरक्की कर रहा है। हम दुनिया को अपने प्रतिभावान युवाओं में निवेश करने और इस क्षेत्र में जोश भरने के लिए निमंत्रण देते हैं।
मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है? अथवा मनुष्य अपने सामने जीवन का लक्ष्य कौन सा रखे? इस बारे में लगभग सभी लोगों का मत है कि सुख ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। परंतु, प्रश्न यह है कि सुख से आशय क्या है और मनुष्य को यह सुख कैसे मिल सकता है?
इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी के अनुसार पश्चिमी चिन्तन और हिन्दू दर्शन पर आधारित भारतीय चिन्तन में मूलभूत अन्तर है। इस अन्तर को स्पष्ट करते हुए श्री गुरुजी ने अनेक प्रकार से समझाया है कि सुख के बारे में पश्चिमी विचार अधूरा, एकांगी, अस्थायी एवं क्षणभंगुर है, वस्तुतः तो वह सुख का क्षणिक आभास देते हुए अन्ततः दुखकारी ही है। इसके विपरीत सुख की हिन्दू परिकल्पना समग्र, संतुलित एवं अधिक स्थायी है।
पश्चिमी राष्ट्रों का लक्ष्य – केवल भौतिक सुख
पश्चिमी राष्ट्रों ने सुख की परिकल्पना केवल भौतिक एवं ऐहिक सुख के रूप में ही की है। इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी ने कहा है – ‘‘दुनिया भर की राज्य व्यवस्था एवं राष्ट्र व्यवस्था में मनुष्य मात्र के जीवन का लक्ष्य ऐहिक सुख समृद्धि माना हुआ है। अर्थात् खाना-पीना, वस्त्र प्रावरण, निवास के स्थान, सुखोपभोग, वासना की वृद्धि, वासना संतुष्ट करने के साधनों की वृद्धि, उन साधनों की उपलब्धि, भिन्न-भिन्न मनोविनोद के साधन, यही जगत के सब देशों में सर्वसाधारण लक्ष्य रखा गया है, ऐसा दिखता है। जिसका बड़ा प्रगतिमान वर्णन किया जाता है, वहाँ सामान्य आदमी के यहाँ भी टेलीविजन, रेडियो, मोटर, मोटर साइकिल आदि ऐहिक सुख के लक्षण ही प्रगति के मापदण्ड माने जाते हैं। पर ये वास्तव में मानव की प्रगति के मापदण्ड हैं क्या?’’
भौतिक सुख की यह अवधारणा अधूरी है और यह अंततोगत्वा असंतोष, अशान्ति एवं संघर्ष का ही कारण बनती है, इस बात पर श्री गुरुजी कहते हैं कि मनुष्य मात्र को सुख की प्राप्ति करवा देने का ध्येय सामने रखकर चलने का दावा करने वाली बहुत सी जीवन रचनाएं आज संसार में विद्यमान हैं। भौतिक कामनाओं की पूर्ति में ही सुख है, इसी बात को लेकर अनेक आधुनिक विचार प्रणालियाँ उत्पन्न हुई हैं। परन्तु कुछ काल के लिए होने वाली वासनापूर्ति आगे चलकर मनुष्य को अशान्त करती हुई दिखाई देती है।
श्री गुरुजी के अनुसार इसके कई कारण है – (1) एक तो विषय वासनाओं की पूर्ति सर्वथा असम्भव है। उनको तुष्ट करने की जितनी ही चेष्टा की जाती है, उतनी ही वे बढ़ती हैं। ‘‘अनुभव यह बताता है कि मनुष्य दैहिक आनन्द प्राप्त करने का जितना अधिक प्रयास करता है, उसकी भूख उतनी ही तीव्र होती जाती है। उसे कभी संतुष्टि का अनुभव नहीं होता। इच्छाओं के तुष्टिकरण की चेष्टा जितनी अधिक होगी, उतना ही असंतोष बढे़गा। भौतिक सुख साधनों का संग्रह करने की इच्छा जितनी ही प्रबल होगी, निराशा भी उतनी अधिक होगी। हमारे शास्त्रों ने घोषणा की है – ‘न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति’ (महा0 आदिपर्व)। विषय भोगों से कामनाओं का शमन नहीं होता। शरीर के जीर्णशीर्ण हो जाने पर भी इच्छाएं पूर्ववत् युवा बनी रहती हैं। भर्तृहरि ने भी कहा है – ‘तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः’ (वैराग्य शतक) – यही वास्तविक दुर्दशा है, जिसमें आधुनिक मानव स्वयं को फँसा हुआ पाता है। इस प्रकार वासनापूर्ति असम्भव होने के कारण मानव जीवन दुःखी होता हुआ दिखाई देता है।
(2) भौतिक पदार्थों से अपनी वासनापूर्ति में लगे मनुष्य को प्रारम्भ में भले ही कुछ संतुष्टि मिले पर, ‘‘आगे चलकर वह समझ जाता है कि इन आपाततः सुख देने वाली वस्तुओं में वास्तविक सुख देने की कोई शक्ति नहीं है। सुख तो अपने ही अन्दर समय-समय पर उठने वाली वासना-तंरगों की शांति से होता है। यानि सुख बाह्य वस्तु में नहीं, वासना पूर्ति में भी नहीं; किन्तु वासना के शांत होने में है।’’
(3) श्री गुरुजी का मानना था कि ‘‘व्यक्ति व समाज के लिए वासनाओं का उत्तरोत्तर बढ़ते जाना और उस पर सदा असंतोष का बना ही रहना, यही जगत में बार-बार होने वाले भयंकर युद्धों का प्रमुख कारण है। जगत में अशांति तथा असुख बनाएं रखने में, यही प्रबल कारण है।’’
श्री गुरुजी ने इसी बात को विस्तार से समझाया है, कहा है कि – ‘‘पश्चिम के सुख की अवधारणा पूर्णतया प्रकृतिजन्य इच्छाओं की संतुष्टि पर ही केन्द्रित है, अतः उनके ‘जीवन स्तर को उठाने’ का अर्थ भी केवल भौतिक आनन्द की वस्तुओं को अधिकाधिक जुटाना है। इससे व्यक्ति अन्य विचारों एवं एषणाओं को छोड़कर केवल इसी में पूर्णतया संलग्न हो जाता है। भौतिक सुख-साधनों की प्राप्ति की इच्छा धन-संग्रह को जन्म देती है। अधिकाधिक धन प्राप्ति हेतु शक्ति आवश्यक हो जाती है; किन्तु भौतिक सुख की अतृप्त क्षुधा व्यक्ति को अपनी राष्ट्रीय सीमाओं तक ही नहीं रुकने देती। सबल राष्ट्र राज्य शक्ति के आधार पर दूसरों के दमन व शोषण का भी प्रयास करते हैं। इसमें से संघर्ष व विनाश का जन्म होता है। एक बार यह प्रक्रिया प्रारम्भ हुई कि समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। सभी नैतिक बंधन विच्छिन्न हो जाते हैं। सामान्य मानवीय संवेदनाएं सूख जाती हैं। मनुष्य और पशु में अन्तर स्थापित करने वाले मूल्य एवं गुण समाप्त हो जाते हैं।’’