डॉक्टर जी ने जब संघ प्रारंभ किया, तब ‘हिन्दुत्व’ शब्द प्रचलन में नहीं था। स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ने 1927 से इस शब्द का प्रयोग करना प्रारंभ किया। इसके पहले स्वामी विवेकानंद जी ने हिन्दुत्व के लिए ‘हिन्दुइज़्म’ शब्द का प्रयोग किया था। ‘इज़्म’ यानि वाद अर्थात ‘हिन्दू वाद’। यह शब्द बाद में भी अनेकों बार प्रयोग किया गया। डॉक्टर जी ने ‘हिन्दुत्व’ के समानार्थी शब्द के रूप में ‘हिन्दू हुड’ (Hindu hood) शब्द का प्रयोग किया है (brother hood जैसा)।
मद्रास के डॉक्टर नायडू ने तमिळनाडु में हिन्दू महासभा कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया था। ‘इस कॉन्फ्रेंस में डॉक्टर जी ने उपस्थित रहना चाहिए’, ऐसा आग्रह करने वाला पत्र डॉक्टर नायडू ने डॉक्टर जी को लिखा। किंतु स्वास्थ्य ठीक न होने से डॉक्टर जी बिहार के राजगीर में गए थे। अर्थात् उनका मद्रास जाना संभव नहीं था। इस संदर्भ में अपनी मृत्यु से तीन महीने पहले, अर्थात 1940 के 17 मार्च को, डॉक्टर जी ने मद्रास के डॉक्टर नायडू को पत्र लिखा। ‘हिन्दू समाज में हिन्दू जनजागरण के कार्य की आवश्यकता’, इस पत्र में डॉक्टर जी ने अधोरेखित किया है। डॉक्टर जी लिखते हैं – “To arouse the dormant spirit of Hinduhood among our brethren of the South”. (‘दक्षिण के बंधुओं मे हिन्दुत्व की सुप्त भावनाओं को जगाने का यह कार्य है’)
19 अक्तूबर, 1929 को डॉक्टर जी ने नीलकंठ राव सदाफळ जी को एक पत्र भेजा है। इसमें डॉक्टर जी लिखते हैं, “स्वयंसेवकों के मन में राष्ट्रीयत्व का पूर्णतः संचार करके, हिन्दुत्व और राष्ट्रीयत्व में कोई भेद नहीं है, यह दोनों बातें एक ही हैं, यह तर्कपूर्ण ढंग से समझाना, यह संघ शाखाओं का काम है।”
डॉक्टर जी ने एक जगह लिखा है –
सामर्थ्य है हिन्दुत्व का, प्रत्येक हिन्दू राष्ट्रीय का।
किंतु उसे संगठन का.., अधिष्ठान चाहिये..।
वे आगे लिखते हैं, “हिंदुस्तान में आसेतु हिमाचल बसने वाले अखिल हिन्दुओं का एकरूप और मजबूत संगठन खड़ा करना यही हमारा वर्तमान धर्म है। हम लोगों में राष्ट्रीयत्व की भावना निर्माण करके,
हिन्दू यह सब एक राष्ट्र के अंग हैं तथा हिन्दू समाज के विभिन्न मत – पंथों के आचार – विचार एक ही प्रकार के है, यह वैज्ञानिक दृष्टी से समझाकर, प्रत्यक्ष कार्य करना है।”
डॉक्टर जी का हिन्दुत्व समझने के लिये अत्यंत सरल, सीधा और सुगम था। स्व. दादाराव परमार्थ, उनके ‘परम पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार’ लेख में लिखते हैं, “यह देश हिन्दुओं का है, यह तो हम सब का विश्वास था। हिन्दू बाहर से आये हैं, यह कल्पना हमें मान्य नहीं थी। मूलतः हिन्दू इसी देश के हैं तथा अपने त्याग, समर्पण और कर्तृत्व से यह राष्ट्र उन्होंने खड़ा किया है। इस देश का राष्ट्रीयत्व यह हिन्दुत्व है, इस पर डॉक्टर जी की अटूट श्रद्धा थी। इसलिये, इस देश पर पूर्ण समर्पित भाव से प्रेम करने वाला हिन्दू है। इस देश की प्रगति के लिये अपने आपको झोंककर काम करने वाला हिन्दू है। इस देश की सर्वांगीण उन्नति के लिए प्रयत्न की पराकाष्ठा करने वाला हिन्दू है। और ऐसे सारे हिन्दुओं का संगठन बांधना यह डॉक्टर जी का ध्येय था। इतने सीधे, सरल और स्वच्छ नजरों से देखने के कारण डॉक्टर जी को हिन्दू समाज के भेद-विभेद, जाति-पाती कभी दिखी ही नहीं। हिन्दुओं का संगठन करते समय यह विचार गलती से भी उनके मन में नहीं आया।”
और इसलिये जाति-पाती के चश्मे से जो लोग हिन्दू समाज को देखते थे, उनको बड़ा आश्चर्य लगता था। महात्मा गांधी जी को भी इसका आश्चर्य लगा था। वर्ष 1934 के दिसंबर में वर्धा में संघ का शीतकालीन शिविर लगा था। उन दिनों महात्मा गांधी जी का मुकाम वर्धा शहर में था। महात्मा जी के बंगले के पास ही यह शिविर स्थल था, इसलिए महात्मा जी को संघ के डेढ़ हजार स्वयंसेवकों के अनुशासित शिविर को देखने की इच्छा हुई। उनकी सुविधानुसार समय तय हुआ। 25 दिसंबर 1934 मंगलवार को प्रातः छह बजे महात्मा जी शिविर में आएंगे, यह निश्चित हुआ।
महात्मा जी तय समय पर शिविर में आए। वे वहां लगभग डेढ़ – दो घंटे रुके। उन्होंने शिविर की सारी जानकारी ली। सभी स्वयंसेवक एक साथ रहते हैं, एक ही पंक्ति में भोजन करते हैं, यह सुनकर और देखकर उन्हें आश्चर्य लगा। जो दिख रहा है, उसमें कितना तथ्य है, यह जानने के लिए कुछ स्वयंसेवकों से प्रश्न भी पूछे। तब, “ये महार, ये ब्राह्मण, ये मराठा, ये दर्जी ऐसा भेदभाव हम नहीं मानते। हमारे बगल में किस जाति का स्वयंसेवक बैठा है, इसकी कोई जानकारी हमें नहीं रहती और ना ही वैसी जानकारी लेने की हम में से किसी की भी इच्छा रहती है। हम सब हिन्दू हैं और इसीलिए बंधु हैं। अतः आपसी व्यवहार में ऊंच-नीच सोच रखने की कल्पना भी हम नहीं करते।” इस प्रकार के उत्तर महात्मा जी को स्वयंसेवकों से मिले।
यह है डॉक्टर हेडगेवार जी का हिन्दुत्व। बिलकुल सीधा और सरल। “हम सब हिन्दू हैं, इसलिये बंधु हैं”, इस एक वाक्य ने हिन्दुओं का संगठन खड़ा किया, जो आज विश्व का सबसे बड़ा संगठन है।
डॉक्टर जी के संपूर्ण कार्यकाल में वह तात्विक या बौद्धिक विवादों में बहुत ज्यादा नहीं उलझे। उनका जोर, प्रत्यक्ष कार्य पर था। संघ प्रारंभ होने से पहले उन्होंने ऐसे सभी विचार प्रवाहों का विस्तृत अध्ययन किया था। हिन्दू समाज की कमियां, मुस्लिम आक्रांताओं के कारण हिन्दू समाज में आई कुरीतियां, कुछ प्राचीन, अप्रासंगिक परंपराएं… इन सबसे वे अच्छी तरह परिचित थे। किंतु इन सब बातों के विरोध में बोलते रहने की अपेक्षा प्रत्यक्ष कार्य कर, कृति रूप उत्तर देने में उनका विश्वास था।
विभिन्न वैचारिक प्रवाहों में, संस्थाओं में, राजनीतिक दल में कार्य करने के कारण उनके विचारों में पारदर्शिता और स्पष्टता थी। ‘क्या करना है’ यह उनको अवगत था। इसलिये, संघ स्थापना के बाद उनके 15 वर्षों के कालखंड में, और बाद में भी, संघ पर अनेक संकट आने के बावजूद संघ बढ़ता ही रहा। संघ के प्रारंभिक काल से इस बात की स्पष्टता थी, कि संघ का संगठन, हिन्दुओं के संरक्षण के लिए बना हुआ कोई रक्षक दल नहीं है। इसका अर्थ कि हिन्दू समाज ने अपने संरक्षण के लिये संघ को, आज की भाषा में, आऊटसोर्स किया हुआ नहीं है। संघ के स्वयंसेवक संकटों का सामना करेंगे, संघर्ष करेंगे और बाकी हिन्दू समाज इस संघर्ष का मजा देखता रहेगा, यह उन्हें अभिप्रेत नहीं था।
संघ का उद्देश्य हिन्दू समाज का संगठन कर संपूर्ण समाज को सक्षम बनाना यह था/है। इसलिये ‘समाज ही सब कुछ करेगा’ यह भूमिका पहले से आज तक कायम है। यही संघ के यश का सूत्र भी रहा है। संघ ने सही अर्थों में हिन्दू समाज का सक्षमीकरण (empowerment) करना, यह डॉक्टर हेडगेवार जी को अभिप्रेत था। इसलिये 1925 के बाद इस देश पर आए सभी संकटों का सामना संघ ने पूरे समाज को साथ लेकर किया है। चार – पांच वर्ष पहले के करोना में भी संघ स्वयंसेवकों ने आगे बढ़कर अनेक काम किये। संघ ने कोरोना के संघर्ष में संपूर्ण समाज को साथ लेकर सक्रिय किया।
और यही डॉक्टर हेडगेवार जी की दूरदृष्टी सामने आती है। हिन्दू संगठन की रचना बनाते समय उन्होंने अत्यंत स्पष्ट और साफ शब्दों में कहा था, “हमें पूरे हिन्दू समाज का संगठन करना है, समाज में संगठन नहीं करना है”। यह अत्यंत महत्व का सूत्र है। डॉक्टर जी के पहले भी हिन्दू समाज में हिन्दू हितों के लिए काम करने वाली अनेक संस्थाएं और संगठन तैयार हुए थे। किंतु इन सबकी मर्यादाएं थीं। समाज के एक प्रवाह जैसे यह संगठन / संस्थाएं थीं। किंतु प्रारंभ से ही डॉक्टर जी ने संघ को हिन्दू समाज का एक पंथ या प्रवाह न बनाते हुए, ‘संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन’ इसी स्वरूप में खड़ा किया। इसलिये पहले जो संघ के विरोधक थे, वही बाद में संघ के सक्रिय स्वयंसेवक बने।
हिन्दुओं का संगठन यह असंभव कल्पना है, ऐसा पहले बोला जाता था। किंतु डॉक्टर हेडगेवार जी ने इस बात को गलत सिद्ध करके बताया। संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करने के लिये उन्होंने जो संघ की कार्यपद्धति बनायी, उसकी विश्व में कोई तुलना ही नहीं है। इसके कारण एकरूप, एकसमान सोच के, अपनी भारत माता को वैभव के परम शिखर पर पहुंचाने के ध्येय से प्रेरित, ऐसे करोड़ों हिन्दुओं का, विश्व का सबसे बड़ा अभियान खड़ा हुआ। यह संगठन, डॉक्टर जी की मृत्यु के पश्चात भी 85 वर्ष सतत वर्धिष्णु हो रहा है।
दूरदृष्टी के, भविष्य को देखने की क्षमता रखने वाले डॉक्टर हेडगेवार जी का यह निर्विवाद यश है..!
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य के शतवर्ष पूर्ण करने वाली इस विजयादशमी के निमित्त हम यहाँ एकत्रित है । संयोग है कि यह वर्ष श्री गुरु तेग बहादुर जी महाराज के पावन देहोत्सर्ग का तीनसौ पचास वाँ वर्ष है । हिन्द की चादर बनकर उनके उस बलिदान ने विदेशी विधर्मी अत्याचार से हिन्दू समाज की रक्षा की । अंग्रेजी दिनांक के अनुसार आज स्व. महात्मा गांधी जी का जन्मदिवस है । अपनी स्वतंत्रता के शिल्पकारों में वे अग्रणी हैं ही, भारत के ‘स्व’ के आधार पर स्वातंत्र्योत्तर भारत की संकल्पना करने वाले दार्शनिकों में भी उनका स्थान विशिष्ट है । सादगी, विनम्रता, प्रामाणिकता तथा दृढ़ता के धनी व देशहित में अपने प्राण तक न्यौछावर करने वाले हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्मदिवस भी आज ही है ।
भक्ति, समर्पण व देशसेवा के ये उत्तुंग आदर्श हम सभी के लिए अनुकरणीय हैं । मनुष्य वास्तविक दृष्टि से मनुष्य कैसे बने और जीवन को जिये यह शिक्षा हमें इन महापुरुषों से मिलती है ।
आज की देश व दुनिया की परिस्थिति भी हम भारतवासियों से इसी प्रकार से व्यक्तिगत व राष्ट्रीय चारित्र्य से सुसंपन्न जीवन की माँग कर रही है । गत वर्ष भर के कालावधि में हम सब ने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जो राह तय की है उसके पुनरावलोकन से यह बात ध्यान में आती है।
वर्तमान परिदृश्य– आशा और चुनौतियाँ
यह बीती कालावधि एक तरफ विश्वास तथा आशा को अधिक बलवान बनाने वाली है तथा दूसरी ओर हमारे सम्मुख उपस्थित पुरानी व नयी चुनौतियों को अधिक स्पष्ट रूप में उजागर करते हुए हमारे लिए विहित कर्तव्य पथ को भी निर्देशित करने वाली है ।
गत वर्ष प्रयागराज में संपन्न महाकुंभ ने श्रद्धालुओं की सर्व भारतीय संख्या के साथ ही उत्तम व्यवस्थापन के भी सारे कीर्तिमान तोड़कर एक जागतिक विक्रम प्रस्थापित किया। संपूर्ण भारत में श्रद्धा व एकता की प्रचण्ड लहर जगायी।
दिनांक 22 अप्रैल को पहलगाम में सीमापार से आये आतंकवादियों के हमले में 26 भारतीय यात्री नागरिकों की उनका हिन्दू धर्म पूछ कर हत्या कर दी गई । संपूर्ण भारतवर्ष में नागरिकों में दु:ख और क्रोध की ज्वाला भड़की । भारत सरकार ने योजना बनाकर मई मास में इसका पुरजोर उत्तर दिया । इस सब कालावधि में देश के नेतृत्व की दृढ़ता तथा हमारी सेना के पराक्रम तथा युद्ध कौशल के साथ-साथ ही समाज की दृढ़ता व एकता का सुखद दृश्य हमने देखा । परन्तु अपनी तरफ से सबसे मित्रता की नीति व भाव रखते हुए भी हमें अपने सुरक्षा के विषय में अधिकाधिक सजग रहना व समर्थ बनते रहना पड़ेगा यह बात भी हमें समझ में आ गई ।
विश्व में बाकी सब देशों के इस प्रसंग के संबंध में जो नीतिगत क्रियाकलाप बने उससे विश्व में हमारे मित्र कौन-कौन औंर कहाँ तक हैं इसकी परीक्षा भी हो गई ।
देश के अन्दर उग्रवादी नक्सली आन्दोलन पर शासन तथा प्रशासन की दृढ़ कारवाई के कारण तथा लोगों के सामने उनके विचार का खोखलापन व क्रूरता अनुभव से उजागर होने के कारण, बड़ी मात्रा में नियंत्रण आया है । उन क्षेत्रों में नक्षलियों के पनपने के मूल में वहाँ चल रहा शोषण व अन्याय, विकास का अभाव तथा शासन-प्रशासन में इन सब बातों के प्रति संवेदना का अभाव ये कारण थे । अब यह बाधा दूर हुई है तो उन क्षेत्रों में न्याय, विकास, सद्भावना, संवेदना तथा सामरस्य स्थापन करने के लिए कोई व्यापक योजना शासन-प्रशासन के द्वारा बने इसकी आवश्यकता रहेगी ।
आर्थिक क्षेत्र में भी प्रचलित परिमाणों के आधार पर हमारी अर्थ स्थिति प्रगति कर रही है, ऐसा कहा जा सकता है । अपने देश को विश्व में सिरमौर देश बनाने का सर्व सामान्य जनों में बना उत्साह हमारे उद्योग जगत में और विशेष कर नई पीढ़ी में दिखता है । परंतु इस प्रचलित अर्थ प्रणाली के प्रयोग से अमीरी व गरीबी का अंतर बढ़ना, आर्थिक सामर्थ्य का केंद्रीकृत होना, शोषकों के लिए अधिक सुरक्षित शोषण का नया तंत्र दृढ़मूल होना, पर्यावरण की हानि, मनुष्यों के आपसी व्यवहार में संबंधों की जगह व्यापारिक दृष्टि व अमानवीयता बढ़ना, ऐसे दोष भी विश्व में सर्वत्र उजागर हुए हैं । इन दोषों की बाधा हमें न हों तथा अभी अमेरिका ने अपने स्वयं के हित को आधार बनाकर जो आयात शुल्क नीति चलायी उसके चलते, हमको भी कुछ बातों का पुनर्विचार करना पड़ने वाला है । विश्व परस्पर निर्भरता पर जीता है । परंतु स्वयं आत्मनिर्भर होकर, विश्व जीवन की एकता को ध्यान में रखकर हम इस परस्पर निर्भरता को अपनी मजबूरी न बनने देते हुए अपने स्वेच्छा से जिएं, ऐसा हमको बनना पड़ेगा । स्वदेशी तथा स्वावलंबन को कोई पर्याय नहीं है ।
जड़वादी पृथगात्म दृष्टि पर आधारित विकास की संकल्पना को लेकर जो विकास की जड़वादी व उपभोगवादी नीति विश्व भर में प्रचलित है उसके दुष्परिणाम सब ओर उत्तरोत्तर बढ़ती मात्रा में उजागर हो रहे हैं । भारत में भी वर्तमान में उसी नीति के चलते वर्षा का अनियमित व अप्रत्याशित वर्षामान, भूस्खलन, हिमनदियों का सूखना आदि परिणाम गत तीन-चार वर्षो में अधिक तीव्र हो रहे हैं । दक्षिण पश्चिम एशिया का सारा जलस्रोत हिमालय से आता है । उस हिमालय में इन दुर्घटनाओं का होना भारतवर्ष और दक्षिण एशिया के अन्य देशों के लिए खतरे की घंटी माननी चाहिए ।
गत वर्षों में हमारे पड़ोसी देशों में बहुत उथल-पुथल मची है । श्रीलंका में, बांग्लादेश में और हाल ही में नेपाल में जिस प्रकार जन-आक्रोश का हिंसक उद्रेक होकर सत्ता का परिवर्तन हुआ वह हमारे लिए चिंताजनक है । अपने देश में तथा दुनिया में भी भारतवर्ष में इस प्रकार के उपद्रवों को चाहनेवाली शक्तियाँ सक्रीय हैं । शासन प्रशासन का समाज से टूटा हुआ सम्बन्ध, चुस्त व लोकाभिमुख प्रशासकीय क्रिया-कलापों का अभाव यह असंतोष के स्वाभाविक व तात्कालिक कारण होते हैं । परन्तु हिंसक उद्रेक में वांच्छित परिवर्तन लाने की शक्ति नहीं होती । प्रजातांत्रिक मार्गों से ही समाज ऐसे आमूलाग्र परिवर्तन ला सकता है । अन्यथा ऐसे हिंसक प्रसंगों में विश्व की वर्चस्ववादी ताकतें अपना खेल खेलने के अवसर ढूँढे, यह संभावना बनती है । यह हमारे पड़ोसी देश सांस्कृतिक दृष्टि से तथा जनता के नित्य संबंधों की दृष्टि से भी भारत से जुड़े हैं । एक तरह से हमारा ही परिवार है । वहाँ पर शांति रहे, स्थिरता रहे, उन्नति हो, सुख और सुविधा की व्यवस्था हो, यह हमारे लिए हमारे हितरक्षण से भी अधिक हमारी स्वाभाविक आत्मीयताजन्य आवश्यकता है ।
विश्व में सर्वत्र ज्ञान-विज्ञान की प्रगति, सुख-सुविधा तकनीकी का मनुष्य जीवन में कई प्रकार की व्यवस्थाओं को आरामदायक बनाने वाला स्वरूप, संचार माध्यमों व आंतरराष्ट्रीय व्यापार के कारण दुनिया के राष्ट्रों में बढ़ी हुई निकटता जैसे परिस्थिति का सुखदायक रूप दिखता है । परन्तु विज्ञान एवं तकनीकी की प्रगति की गति व मनुष्यों की इन से तालमेल बनाने की गति इस में बड़ा अंतर है । इसलिए सामान्य मनुष्यों के जीवन में बहुत सारी समस्याएँ उत्पन्न होती दिखाई दे रही हैं । वैसे ही सर्वत्र चल रहे युद्धों सहित अन्य छोटे बड़े कलह, पर्यावरण के क्षरण के कारण प्रकृति के उग्र प्रकोप, सभी समाजों में तथा परिवारों में आई हुई टूटन, नागरिक जीवन में बढ़ता हुआ अनाचार व अत्याचार ऐसी समस्याएँ भी साथ में चलती हुई दिखाई देती हैं । इन सबके उपाय के प्रयास हुए हैं परंतु वे इन समस्याओं की बढ़त को रोकने में अथवा उनका पूर्ण निदान देने में असफल रहे हैं । मानव मात्र में इसके चलते आई हुई अस्वस्थता, कलह और हिंसा को और बढ़ाते हुए, सभी प्रकार के मांगल्य, संस्कृति, श्रद्धा, परंपरा आदि का संपूर्ण विनाश ही, आगे अपने आप इन समस्याओं को ठीक करेगा, ऐसा विकृत और विपरीत विचार लेकर चलने वाली शक्तियों का संकट भी, सभी देशों में अनुभव में आ रहा है । भारतवर्ष में भी कम-अधिक प्रमाण में इन सब परिस्थितियों को हम अनुभव कर रहे हैं । अब विश्व इन समस्याओं के समाधान के लिए भारत की दृष्टि से निकले चिंतन में से उपाय की अपेक्षा कर रहा है ।
हम सब की आशा और आश्वस्ति बढाने वाली बात यह है कि अपने देश में सर्वत्र तथा विशेषकर नई पीढ़ी में देशभक्ति की भावना अपने संस्कृति के प्रति आस्था व विश्वास का प्रमाण निरंतर बढ़ रहा है । संघ के स्वयंसेवकों सहित समाज में चल रही विविध धार्मिक, सामाजिक संस्थाएं तथा व्यक्ति समाज के अभावग्रस्त वर्गों की नि:स्वार्थ सेवा करने के लिए अधिकाधिक आगे आ रहे है, और इन सब बातों के कारण समाज का स्वयं सक्षम होना और स्वयं की पहल से अपने सामने की समस्याओं का समाधान करना व अभावों की पूर्ति करना बढ़ा है । संघ के स्वयंसेवकों का यह अनुभव है कि संघ और समाज के कार्यों में प्रत्यक्ष सहभागी होने की इच्छा समाज में बढ़ रही है । समाज के बुद्धिजीवियों में भी विश्व में प्रचलित विकास तथा लोकप्रबंधन के प्रतिमान के अतिरिक्त अपने देश के जीवन दृष्टि, प्रकृति तथा आवश्यकता के आधार पर अपना स्वतन्त्र और अलग प्रकार का कोई प्रतिमान कैसा हो सकता है इसकी खोज का चिंतन बढ़ा है ।
भारतीय चिन्तन दृष्टि
भारत का तथा विश्व का विचार भारतीय दृष्टि के आधार पर करने वाले हमारे सभी आधुनिक मनीषी, स्वामी विवेकानंद से लेकर तो महात्मा गांधीजी, दीनदयालजी उपाध्याय, राम मनोहर लोहिया जी, ऐसे हमारे समाज का नेतृत्व करने वाले सभी महापुरुषों ने, उपरोक्त सभी समस्याओं का परामर्श करते हुए, एक समान दिशा का दिग्दर्शन किया है। आधुनिक विश्व के पास जो जीवन दृष्टि है वह पूर्णतः गलत नहीं, अधूरी है । इसलिए उसके चलते मानव का भौतिक विकास तो कुछ देशों और वर्गों के लिए आगे बढ़ा हुआ दिखता है । सबका नहीं । सबको छोडिये, अकेले भारत को अमेरिका जैसा तथाकथित समृद्ध और प्रगत भौतिक जीवन जीना है तो और पांच पृथ्वियों की आवश्यकता होगी ऐसा कुछ अभ्यासक कहते हैं । आज की इस प्रणाली से भौतिक विकास के साथ-साथ मानव का मानसिक व नैतिक विकास नहीं हुआ । इसलिए प्रगति के साथ-साथ ही मानव व सृष्टि के सामने नयी-नयी समस्याएँ प्राण संकट बन खड़ी हो रही हैं । इसका कारण – वही दृष्टि का अधूरापन !
हमारी सनातन, आध्यात्मिक, समग्र व एकात्म दृष्टि में मनुष्य के भौतिक विकास के साथ-साथ मन, बुद्धि तथा आध्यात्मिकता का विकास, व्यक्ति के साथ-साथ मानव समूह व सृष्टि का विकास, मनुष्य की आवश्यकताओं – इच्छाओं के अनुरूप आर्थिक स्थिति के साथ-साथ ही, उसके समूह और सृष्टि को लेकर कर्तव्य बुद्धि का तथा सब में अपनेपन के साक्षात्कार को अनुभव करने के स्वभाव का विकास करने की शक्ति है । क्योंकि हमारे पास सबको जोड़ने वाले तत्त्व का साक्षात्कार है । उसके आधार पर सहस्त्रों वर्षों तक इस विश्व में हमने एक सुंदर, समृद्ध और शांतिपूर्ण, परस्पर संबंधों को पहचानने वाला, मनुष्य और सृष्टि का सहयोगी जीवन प्रस्थापित किया था । उस हमारी समग्र तथा एकात्म दृष्टि के आधार पर, आज के विश्व की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए, आज विश्व जिन समस्याओं का सामना कर रहा है, उनका शाश्वत निदान देने वाली एक नई रचना की विश्व को आवश्यकता है । अपने उदाहरण से उस रचना का अनुकरणीय प्रतिमान विश्व को देना यह कार्य नियति हम भारतवासियों से चाहती है ।
संघ का चिन्तन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने कार्य के शतवर्ष पूर्ण कर चुका है । संघ में विचार व संस्कारों को प्राप्त कर समाज जीवन के विभिन्न आयामों में, विविध संगठनों में, संस्थाओं में, तथा स्थानीय स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक स्वयंसेवक सक्रिय हैं । समाज जीवन में सक्रिय अनेक सज्जनों के साथ भी स्वयंसेवकों का सहयोग व संवाद चलते रहता है । उन सबके संकलित अनुभव के आधार पर संघ के कुछ निरीक्षण व निष्कर्ष बने हैं ।
१) भारत वर्ष के उत्थान की प्रक्रिया गति पकड़ रही है । परन्तु अभी भी हम उसी नीति व व्यवस्था के दायरों में ही सोच रहे हैं जिस का अधूरापन उस नीति के जो परिणाम आज मिल रहे हैं उन से उजागर हो चुका है । यह बात सही है कि उन तरीकों पर विश्व के साथ हम भी इतना आगे पहले ही बढ़ गये हैं कि एकदम परिवर्तन करना संभव नहीं होगा । एक लम्बे वृत्त में धीरे-धीरे ही मुड़ना पड़ेगा । परन्तु हमारे सहित विश्व के सामने खड़ी समस्याओं तथा भविष्य के खतरों से बचने का दूसरा उपाय नहीं है । हमें अपनी समग्र व एकात्म दृष्टि के आधार पर अपना विकास पथ बनाकर, विश्व के सामने एक यशस्वी उदाहरण रखना पड़ेगा । अर्थ व काम के पीछे अंधी होकर भाग रही दुनिया को पूजा व रीति रिवाजों के परे, सबको जोड़ने वाले, सबको साथ में लेकर चलने वाले, सबकी एक साथ उन्नति करने वाले धर्म का मार्ग दिखाना ही होगा ।
२) संपूर्ण देश का ऐसा आदर्श चित्र विश्व के सामने खड़ा करने का काम केवल देश की व्यवस्थाओं का ही नहीं है । क्योंकि व्यवस्थाओं का अपने में परिवर्तन का सामर्थ्य व इच्छा, दोनों मर्यादित होती है । इन सब की प्रेरणा व इन सब का नियंत्रण समाज की प्रबल इच्छा से ही होता है । इसलिए व्यवस्था परिवर्तन के लिए समाज का प्रबोधन तथा उसके आचरण का परिवर्तन यह व्यवस्था परिवर्तन की पूर्वशर्तें हैं । समाज के आचरण में परिवर्तन भाषणों से या ग्रंथों से नहीं आता । समाज का व्यापक प्रबोधन करना पड़ता है तथा प्रबोधन करने वालों को स्वयं परिवर्तन का उदाहरण बनना पड़ता है । स्थान-स्थान पर ऐसे उदाहरण स्वरूप व्यक्ति, जो समाज के लिए उसके अपने हैं, उनके जीवन में पारदर्शिता है, नि:स्वार्थता है और जो संपूर्ण समाज को अपना मानकर समाज के साथ अपना नित्य व्यवहार करते हैं, समाज को उपलब्ध होने चाहिए । समाज में सबके साथ रहकर अपने उदाहरण से समाज को प्रेरणा देने वाला ऐसा स्थानीय सामाजिक नेतृत्व चाहिए । इसलिए व्यक्ति निर्माण से समाज परिवर्तन और समाज परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन यह देश में और विश्व में परिवर्तन लाने का सही पथ है यह स्वयंसेवकों का अनुभव है ।
३) ऐसे व्यक्तियों के निर्माण की व्यवस्था भिन्न-भिन्न समाजों में सक्रिय रहती है । हमारे समाज में आक्रमण की लंबी अवधि में यह व्यवस्थाएँ ध्वस्त हो गईं । इसलिए इसकी युगानुकूल व्यवस्था घर में, शिक्षा पद्धति में व समाज के क्रियाकलापों में फिर से स्थापित करनी पड़ेगी । यह कार्य करने वाले व्यक्ति तैयार करने पड़ेंगे । मन बुद्धि से इस विचार को मानने के बाद भी उनको आचरण में लाने के लिए मन, वचन, कर्म, की आदत बदलनी पड़ती है, उसके लिए व्यवस्था चाहिए । संघ की शाखा वह व्यवस्था है । सौ वर्षों से सब प्रकार की परिस्थितियों में आग्रहपूर्वक इस व्यवस्था को संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा सतत चलाया गया है और आगे भी ऐसे ही चलाना है । इसलिए स्वयंसेवकों को नित्य शाखा के कार्यक्रमों को मन लगाकर करते हुए अपनी आदतों में परिवर्तन करने की साधना करनी पड़ती है । व्यक्तिगत सद्गुणों की तथा सामूहिकता की साधना करना तथा समाज के क्रियाकलापों में सहभागी, सहयोगी होते हुए समाज में सद्गुणों का व सामूहिकता का वातावरण निर्माण करने के लिए ही संघ की शाखा है ।
४) किसी भी देश के उत्थान में सबसे महत्वपूर्ण कारक उस देश के समाज की एकता है । हमारा देश विविधताओं का देश है । अनेक भाषाएँ अनेक पंथ, भौगोलिक विविधता के कारण रहन-सहन, खान-पान के अनेक प्रकार, जाति-उपजाति आदि विविधताएँ पहले से ही हैं । पिछले हजार वर्षों में भारतवर्ष की सीमा के बाहर के देशों से भी यहाँ पर कुछ विदेशी संप्रदाय आ गए । अब विदेशी तो चले गए लेकिन उन संप्रदायों को स्वीकार कर आज भी अनेक कारणों से उन्हीं पर चलने वाले हमारे ही बंधु भारत में विद्यमान हैं । भारत की परंपरा में इन सब का स्वागत और स्वीकार्य है । इनको हम अलगता की दृष्टि से नहीं देखते । हमारी विविधताओं को हम अपनी अपनी विशिष्टताएँ मानते हैं और अपनी-अपनी विशिष्टता पर गौरव करने का स्वभाव भी समझते हैं । परंतु यह विशिष्टताएँ भेद का कारण नहीं बननी चाहिए । अपनी सब विशिष्टताओं के बावजूद हम सब एक बडे समाज के अंग हैं । समाज, देश, संस्कृति तथा राष्ट्र के नाते हम एक हैं । यह हमारी बड़ी पहचान हमारे लिए सर्वोपरि है यह हमको सदैव ध्यान में रखना चाहिए । उसके चलते समाज में सबका आपस का व्यवहार सद्भावनापूर्ण व संयमपूर्ण रहना चाहिए । सब की अपनी-अपनी श्रद्धाएँ, महापुरुष तथा पूजा के स्थान होते हैं । मन, वचन, कर्म से आपस में इनकी अवमानना न हो इसका ध्यान रखना चाहिए । इसलिए प्रबोधन करने की आवश्यकता है । नियम पालन, व्यवस्था पालन करना व सद्भावपूर्वक व्यवहार करना यह इसीलिए अपना स्वभाव बनना चाहिये । छोटी-बड़ी बातों पर या केवल मन में संदेह है इसलिए, कानून हाथ में लेकर रास्तोंपर निकल आना, गुंडागर्दी, हिंसा करना यह प्रवृत्ति ठीक नहीं । मन में प्रतिक्रिया रखकर अथवा किसी समुदाय विशेष को उकसाने के लिए अपना शक्ति प्रदर्शन करना ऐसी घटनाओं को योजनापूर्वक कराया जाता है । उनके चंगुल में फ़सने का परिणाम, तात्कालिक और दीर्घकालिक, दोनों दृष्टी से ठीक नहीं है । इन प्रवृत्तियों की रोकथाम आवश्यक है । शासन-प्रशासन अपना काम बिना पक्षपात के तथा बिना किसी दबाव में आये, नियम के अनुसार करें । परन्तु समाज की सज्जन शक्ति व तरुण पीढ़ी को भी सजग व संगठित होना पडेगा, आवश्यकतानुसार हस्तक्षेप भी करना पडेगा ।
५) हमारी इस एकता के आधार को डॉक्टर अंबेडकर साहब ने Inherent cultural unity (अन्तर्निहित सांस्कृतिक एकता) कहा है । भारतीय संस्कृति प्राचीन समय से चलती आई हुई भारत की विशेषता है । वह सर्व समावेशक है । सभी विविधताओं का सम्मान और स्वीकार करने की सीख देती है क्योंकि वह भारत के आध्यात्मिक सत्य तथा करुणा, शुचिता व तप के सदाचार पर यानी धर्म पर आधारित है । इस देश के पुत्र रूप हिंदू समाज ने इसे परंपरा से अपने आचरण में जतन किया है, इसलिए उसे हिंदू संस्कृति भी कहते हैं । प्राचीन भारत में ऋषियों ने अपने तपोबल से इस को नि:सृत किया । भारत के समृद्ध तथा सुरक्षित परिवेश के कारण उनसे यह कार्य हो पाया । हमारे पूर्वजों के परिश्रम, त्याग व बलिदानों के कारण यह संस्कृति फली-फूली व अक्षुण्ण रहकर आज हम तक पहुँची है । उस हमारी संस्कृति का आचरण, उसका आदर्श बनें हमारे पूर्वजों का मन में गौरव व कृति में विवेकपूर्ण अनुसरण तथा यह सब जिसके कारण संभव हुआ उस हमारे पवित्र मातृभूमि की भक्ति यह मिलकर हमारी राष्ट्रीयता हैं । विविधताओं के संपूर्ण स्वीकार व सम्मान के साथ हम सब को एक माल में मिलानेवाली यह हिन्दू राष्ट्रीयता ही हमें सदैव एक रखती आयी है । हमारी ‘Nation State’ जैसी कल्पना नहीं है । राज्य आते हैं और जाते हैं, राष्ट्र निरन्तर विद्यमान है । हम सब की एकता का यह आधार हमें कभी भी भूलना नहीं चाहिए ।
६) संपूर्ण हिंदू समाज का बल संपन्न, शील संपन्न संगठित स्वरूप इस देश के एकता, एकात्मता, विकास व सुरक्षा की गारंटी है। हिंदू समाज इस देश के लिए उत्तरदायी समाज है, हिंदू समाज सर्व-समावेशी है । ऊपर के अनेकविध नाम और रूपों को देखकर, अपने को अलग मानकर, मनुष्यों में बटवारा व अलगाव खडा करने वाली ‘हम और वे’ इस मानसिकता से मुक्त है और मुक्त रहेगा । ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की उदार विचारधारा का पुरस्कर्ता व संरक्षक हिंदू समाज है । इसलिए भारतवर्ष को वैभव संपन्न व संपूर्ण विश्व में अपना अपेक्षित व उचित योगदान देने वाला देश बनाना, यह हिंदू समाज का कर्तव्य बनता है । उसकी संगठित कार्य शक्ति के द्वारा, विश्व को नयी राह दे सकने वाले धर्म का संरक्षण करते हुए, भारत को वैभव संपन्न बनाना, यह संकल्प लेकर संघ सम्पूर्ण हिंदू समाज के संगठन का कार्य कर रहा है । संगठित समाज अपने सब कर्तव्य स्वयं के बलबूते पूरे कर लेता है । उसके लिए अलग से अन्य किसी को कुछ करने की आवश्यकता नहीं रहती ।
७) उपरोक्त समाज का चित्र प्रत्यक्ष साकार होना है तो व्यक्तिओं में, समूहों में व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय चारित्र्य, दोनों के सुदृढ़ होने की आवश्यकता रहेगी । अपने राष्ट्र स्वरूप की स्पष्ट कल्पना व गौरव संघ की शाखा में प्राप्त होता है । नित्य शाखा में चलने वाले कार्यक्रमों से स्वयंसेवकों में व्यक्तित्व, कर्तृत्व, नेतृत्व, भक्ति व समझदारी का विकास होता है ।
इसलिए शताब्दि वर्ष में व्यक्ति निर्माण का कार्य देश में भौगोलिक दृष्टि से सर्वव्यापी हो तथा सामाजिक आचरण में सहज परिवर्तन लाने वाला पंच परिवर्तन कार्यक्रम स्वयंसेवकों के उदाहरण से समाजव्यापी बने यह संघ का प्रयास रहेगा । सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व बोध तथा स्वदेशी व नियम, कानून, नागरिक अनुशासन व संविधान का पालन इन पांच विषयों में व्यक्ति व परिवार, कृतिरूप से स्वयं के आचरण में परिवर्तन लाने में सक्रिय हो तथा समाज में उनके उदाहरणों का अनुकरण हो ऐसा यह कार्यक्रम है । इसमें अंतर्भूत कृतियाँ आचरण के लिए सरल और सहज है । गत दो-तीन वर्षों में समय-समय पर संघ के कार्यक्रमों में इसका विस्तृत विवेचन हुआ है । संघ के स्वयंसेवकों के अतिरिक्त समाज में अनेक अन्य संगठन व व्यक्ति भी इन्ही प्रकार के कार्यक्रम चला रहे है । उन सब के साथ संघ के स्वयंसेवकों का सहयोग व समन्वय साधा जा रहा है।
विश्व के इतिहास में समय-समय पर भारत का महत्वपूर्ण अवदान, विश्व का खोया हुआ संतुलन वापस लाने वाला, विश्व के जीवन में संयम और मर्यादा का भान उत्पन्न करने वाला विश्व धर्म देना, यही रहा है । हमारे प्राचीन पूर्वजों ने भारत भूमि में निवास करने वाले विविधतापूर्ण समाज को संगठित कर एक राष्ट्र के रूप में इसी कर्तव्य के बारंबार आपूर्ति करने के साधन के नाते खड़ा किया था । हमारे स्वातंत्र्य संग्राम के तथा राष्ट्रीय नवोत्थान के पुरोधाओं के सामने स्वतन्त्र भारत की समृद्धि व क्षमताओं के विकास के मंगल परिणाम का यही चित्र था।
हमारे बंगाल प्रांत के पूर्ववर्ती संघचालक स्व. केशवचन्द्र चक्रवर्ती महाशय ने बहुत सुन्दर काव्य पंक्तियों में इसका वर्णन किया है –
बाली सिंघल जबद्वीपे
प्रांतर माझे उठे ।
कोतो मठ कोतो मन्दिर
कोतो प्रस्तरे फूल फोटे ।।
तादेर मुखेर मधुमय बानी
सुने थेमें जाय सब हानाहानी ।
अभ्युदयेर सभ्यता जागे
विश्वेर घरे-घरे ।।
(सिंहल और जावा-द्वीप तक भारतीय संस्कृति का प्रभाव फैला हुआ था । जगह-जगह मठ-मंदिर थे, जहाँ जीवन की सुगंध फूलों-सी बिखरती थी । भारत की मधुर और ज्ञानमयी वाणी सुनकर अन्य देशों में भी वैर-भाव और अशांति समाप्त हो जाती थी)
आइए, भारत का यही आत्मस्वरूप आज की देश-काल-परिस्थिति से सुसंगत शैली में फिरसे विश्व में खडा करना है । पूर्वज प्रदत्त इस कर्तव्य को, विश्व की आज की आवश्यकता को, पूर्ण करने के लिए हम सब मिलकर, साथ चलकर, अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर होने के लिए आज की विजयादशमी के मुहूर्त पर सीमोल्लंघन को संपन्न करें ।
सहकार भारती के तत्वाधान में बुनकर प्रकोष्ठ का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का समापन, समापन सत्र में राज्यपाल रामेन डेका और कृषि मंत्री रामविचार नेताम हुए शामिल, अधिवेशन में 14 प्रस्ताव पारित हुए, अधिवेशन में 17 राज्यों के 650 बुनकर प्रतिनिधि शामिल हुए।
रायपुर 24 अगस्त 202. सहकार भारती के तत्वाधान में राजधानी में चल रहे बुनकर प्रकोष्ठ का राष्ट्रिय अधिवेशन भव्यता के साथ सम्प्पन हुआ। अधिवेशन में देशभर से आये बुनकर प्रतिनिधियों ने अपनी समस्याओ और सरकारी योजनाओ को लेकर चर्चा किया। अधिवेशन का उद्देश्य हथकरघा और हस्तशिल्प में बढ़ते मशीनो के उपयोग, घटते बुनकरो की संख्या, सरकारी अनुदान में कमी सहित अनेक विषयो पर चर्चाये हुई। अधिवेशन में केरल, महाराष्ट्र, बिहार मध्यप्रदेश, आसाम, पक्षिम बंगाल, सहित कुल 17 राज्यों के प्रतिधि शामिल हुए। अधिवेशन के दूसरे दिन बुनकरों ने 13 मांगो का प्रस्ताव पारित किया जिसे भारत सरकार को भेजा जायेगा। प्रस्ताव को बुनकर प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक अनंत मिश्रा ने रखा जिसे देशभर से आये बुनकर प्रतिनिधियों ने दोनों हाथ उठाकर समर्थन दिया।
नक्सलगढ़ की छवि अब सुधरेगी- कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए वरिष्ठ मंत्री रामविचार नेताम ने छत्तीसगढ़ शांति का टापू है, यह बाबा गुरुघासीदास, बिरसामुंडा की धरती है। साल 2000 में छत्तीसगढ़ का उदय हुआ तो प्रदेश की बीजेपी सरकार ने इसे विकसित राज्य बनाने की कोशिश की, जिसका परिणाम है समकालीन राज्यों में छत्तीसगढ़ तेजी से विकसित हो रहा है। छत्तीसगढ़ को दूर से देखने वाले नक्सलगढ़ समझते है, पर यह शांति का टापू है। जल्द ही नक्सल समस्या का संधान भी हो जायेगा। छत्तीसगढ़ में बुनकरों की स्थिति बेहद अच्छी नहीं है, आजा भी हमारे द्वारा उपयोग किये जाने वाला राजकीय गमछा मशीनों से बना होता है, जबकि उसे हथकरघा से बना होना चाहिए। हमें अच्छी क्वालिटी के उत्पाद तैयार करने जरूरत है।
राज्यपाल बोले- मै स्वयं बुनकरों के गाँव से आता हूँ। समापन सत्र में राज्यपाल डॉ रमेन डेका ने आयोजन के लिए सहकर भारती और बुनकर प्रकोष्ट को बधाई देते हुए कहा कि ऐसा आयोजन निश्चित रूप से बुनकरों के जीवन में आमूल चूल परिवर्तन लाने वाला है। मेरे गाँव में बुनकरों की संख्या अधिक है, जिसके चलते उसे बुनकरों का गाँव कहा जाता है। भारत एक बड़े बाजार में रूप में उभरा है ऐसे में यहाँ बुनकर समितियों और पावरलूम में व्यापक संभावनाएं है। छत्तीसग़ढ का कोसा देशभर में प्रसिद्ध है उसे और बढ़ाने की जरुरत है, उन्होंने अमूल और लिज्जत पापड़ का उदारः देते हुए उनके जैसे काम करने की नसीहत दी। आसाम से आये बुनकर प्रतिनिधियों का राजभवन में अतिथि सत्कार किया गया।
बुनकरों के हित में 13 प्रस्ताव पारित हुए दो दिवसीय अधिवेशन में देशभर से आये बुनकरों से चर्चा और मंथन उपरांत उनकी समस्याओ के निराकरण हेतु 13 प्रस्ताव पारित हुए जिसे भारत सरकार को भेजा जायेगा। सहकर भारती के राष्ट्रीय महामंत्री दीपक पाचपोर ने प्रस्तावों के संबंध में बताया कि बुनकरों के कल्याण हेतु राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र बुनकर कल्याण बोर्ड का गठन किया जाये जहां सरकारी योजनाओ की निगरानी और शिकायतों का समाधान हो। हथकरघा क्लस्टर और कॉमन फसलेटी सेंटर का गठन, हथकरघा वस्त्रो के निर्माण में लगने वाले जीएसटी को माफ़ करते हुए जीएसटी मुक्त किया जाये। राष्ट्रीय हथकरघा निति बनाने की मांग, बुनकरों के लिए पर्यटन सहित 13 प्रस्ताव पारित किया गया।
राष्ट्रीय बुनकर प्रकोष्ठ का पुनर्गठन- सहकर भारती के राष्टीय अध्यक्ष उदय जोशी ने राष्ट्रीय बुनकर प्रकोष्ठ का पुनर्गठन किया, जिसमे अनंत मिश्रा को संयोजक बनाते हुए आसाम गुजरात महाराष्ट्र, उड़ीसा छत्तीसगढ़ के बुनकरों को सदस्य बनाने की घोषणा की। कार्यक्रम में सहकर भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय जोशी, राष्ट्रीय महामंत्री दीपक चौरसिया, संगठन मंत्री श्री पाचपोर, राष्ट्रीय संयोजक अनंत मिश्रा, आरबीआई के निदेशक सतीश मराठे, छत्तीसगढ़ सहकर भारती महामंत्री कनीराम जी, कार्यक्रम संयोजक सुरेंद्र पाटनी सहित कार्यक्रम से जुड़े सभी कार्यकर्ता मौजूद रहे।
आदिवासी अंचलों में डिजिटल क्रांति, आधार संचालक श्री लखन लाल साहू को मिला आधार एक्सीलेंस अवॉर्ड
रायपुर : धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान बनी जनजातीय सशक्तिकरण की मिसाल
2340 नागरिकों को मिला आधार समाधान आदिवासी अंचलों में डिजिटल क्रांति, आधार संचालक श्री लखन लाल साहू को मिला आधार एक्सीलेंस अवॉर्ड रायपुर 01 जुलाई 2025
मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले में धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान जनजातीय समुदाय के जीवन में आशा की नई किरण बनकर उभरी है। इस योजना के अंतर्गत लगाए जा रहे शिविरों के माध्यम से दूरस्थ अंचलों तक आधार से संबंधित सेवाएं पहुँचाई जा रही हैं, जिससे हजारों नागरिकों को घर के पास ही राहत मिल रही है। अब तक जिले में आयोजित शिविरों के माध्यम से 2340 से अधिक जनजातीय नागरिकों को आधार कार्ड बनाया, अद्यतन एवं समस्याओं का समाधान सफलतापूर्वक किया जा चुका है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धरती आबा योजना केवल एक सरकारी पहल नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के लिए एक डिजिटल सशक्तिकरण अभियान बन गई है। जिले के आधार सेवा संचालक श्री लखन लाल साहू को जिला अंतर्गत राज्य में Best performing Operator in Aadhaar Enrolment &Update services in LWE Districts of Chhattisgarh State यह पुरस्कार UIDAI REGIONAL OFFICE HYDERABAD द्वारा 20 जून 2025 को रायपुर में आयोजित सम्मान समारोह में प्रदान किया गया।
धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान अंतर्गत नागरिकों को डिजिटल सेवा आधार, आय, जाति, निवास, बिजली की बिल भुगतान, गैस रिफिलिंग, ट्रेन टिकट, बैंकिग, किसानों का फसल बीमा, किसान पंजीयन, वोटर आईडी कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पेन कार्ड, आदि सेवाएं जनजातीय समुदाय के नागरिकों को धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान शिविर में ग्राम स्तर पर ही मुहैया हो रहा है। धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान आज ग्राम विकास, जन सुविधा और डिजिटल समावेश का प्रतीक बन चुकी है। यह पहल न केवल आधार जैसी महत्वपूर्ण सेवा को सुलभ बना रही है, बल्कि जनजातीय अंचलों को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो रही है।
मुख्यमंत्री संविधान हत्या दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में हुए शामिल: आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित प्रदर्शनी का किया अवलोकन
रायपुर, 25 जून 2025
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज राजधानी रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित संविधान हत्या दिवस कार्यक्रम में शामिल हुए।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि यह अत्यंत आवश्यक है कि लोकतंत्र की हत्या के उस काले दिन को हमारी भावी पीढ़ी भी जाने, समझे और उससे सीख ले। आपातकाल के दौर को याद करते हुए भावुक हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वह कालखंड मेरे जीवन से गहराई से जुड़ा है। यह मेरे लिए मात्र एक घटना नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत पीड़ा है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि उनके बड़े पिताजी स्वर्गीय श्री नरहरि प्रसाद साय आपातकाल के दौरान 19 माह तक जेल में रहे। उस समय लोकतंत्र सेनानियों के घरों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी—कई बार घर में चूल्हा तक नहीं जलता था। ऐसे अनेक परिवारों को मैंने स्वयं देखा है। उन्होंने कहा कि निरंकुश सत्ता ने उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दिया था, नागरिक अधिकार छीन लिए गए थे। वास्तव में, वह लोकतंत्र का काला दिन था, जिसका दंश हमारे परिवार ने झेला है और जिसे मैंने स्वयं जिया है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कार्यक्रम के दौरान लोकतंत्र सेनानी परिवारों के सदस्यों से भेंट कर उन्हें सम्मानित किया तथा शॉल, श्रीफल एवं प्रतीक चिन्ह भेंट किए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार लोकतंत्र सेनानी परिवारों को सम्मान देने का कार्य कर रही है। इन परिवारों को प्रतिमाह 10 हजार से 25 हजार रुपए तक की सम्मान राशि दी जा रही है—यह उनके संघर्ष और बलिदान को नमन करने का एक विनम्र प्रयास है।
कार्यक्रम में उपस्थित छात्र-छात्राओं और युवाओं को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि संविधान की रक्षा हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे आपातकाल के इतिहास को जानें, पढ़ें और समझें कि किस प्रकार उस कालखंड में संविधान को कुचला गया था। लोकतंत्र को जीवित रखने और सशक्त करने के लिए जन-जागरूकता और सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि भारत के संविधान और लोकतंत्र पर आपातकाल एक ऐसा कलंक है, जिसे इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज किया गया है। आपातकाल थोपकर न केवल संविधान को निष्क्रिय कर दिया गया, बल्कि मौलिक अधिकारों को समाप्त कर लोकतंत्र की आत्मा को कुचल दिया गया। उन्होंने कहा कि उस समय देश को एक खुली जेल में बदल दिया गया था, जिसमें भय और आतंक का वातावरण था। एक लाख से अधिक लोगों को बिना न्यायिक प्रक्रिया के जेलों में बंद कर दिया गया, और उन्हें यातनाएं दी गईं। यह केवल राजनीतिक दमन का दौर नहीं था, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक चेतना को समाप्त करने का सुनियोजित प्रयास था। डॉ. सिंह ने युवाओं से आह्वान किया कि वे आपातकाल के विषय में शोध करें, पढ़ें और समझें कि लोकतंत्र की रक्षा हेतु कितने लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। भविष्य में लोकतंत्र को सुरक्षित बनाए रखने के लिए हमें सदैव जागरूक और सजग रहना होगा।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र का सबसे शर्मनाक और काला दिन था। इस दिन संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को जिस तरह से कुचला गया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में नहीं मिलता। संविधान में मनमाने ढंग से संशोधन किए गए, जिससे देश की आत्मचेतना और नागरिक अधिकारों का दमन हुआ।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री साय ने आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित जनजागरूकता रैली में भी भाग लिया।
मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष ने आपातकाल पर आयोजित विशेष प्रदर्शनी का किया अवलोकन
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आधारित विशेष प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस प्रदर्शनी में आपातकाल के दौरान की दमनकारी नीतियों, मानवाधिकारों के उल्लंघन और लोकतंत्र के हनन को चित्रों एवं दस्तावेजों के माध्यम से दर्शाया गया।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय है, जिसे विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए। ऐसी प्रदर्शनी नई पीढ़ी को लोकतंत्र और संविधान के महत्व को समझाने में सहायक सिद्ध होगी।
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रदर्शनी लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वालों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
इस अवसर पर उद्योग मंत्री श्री लखन लाल देवांगन, विधायकगण श्री पुरंदर मिश्रा, गुरु खुशवंत साहेब, श्री मोतीलाल साहू, सीएसआईडीसी के अध्यक्ष श्री राजीव अग्रवाल, छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के अध्यक्ष श्री नीलू शर्मा, लोकतंत्र सेनानी संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सच्चिदानंद उपासने, प्रदेश अध्यक्ष श्री दिवाकर तिवारी, छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री शशांक शर्मा तथा संचालक संस्कृति श्री विवेक आचार्य सहित बड़ी संख्या में विद्वान, लोकतंत्र सेनानी और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
वर्ष 1925 में प्रारंभ हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा इस वर्ष विजयादशमी पर अपनी शताब्दी का मील का पत्थर प्राप्त करेगी। आज संघ सबसे अनूठा, व्यापक और राष्ट्रव्यापी संगठन बन गया है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के बाद संघ का जो संकल्प और आह्वान सामने आया, उसमें इस यात्रा के मूल्यांकन, आत्ममंथन और संघ के मूल विचार के प्रति पुनः समर्पण का आह्वान किया गया है। संघ की कार्यप्रणाली कैसी है और इसके आयाम क्या हैं? वे कौन से मोड़ थे, वे कौन सी घटनाएं थीं, जिनसे गुजरकर संघ आज इस रूप में हमारे सामने खड़ा है। संघ के विरोधी क्या सोचते हैं और संघ अपने विरोधियों के बारे में क्या सोचता है? संघ आज क्या है और संघ कल क्या होगा? इन सभी सवालों और आगे की राह जानने के लिए, ऑर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर, पांचजन्य संपादक हितेश शंकर, मराठी साप्ताहिक विवेक की संपादक अश्विनी मयेकर और मलयालम दैनिक जन्मभूमि के सह संपादक एम. बालाकृष्णन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत से विस्तृत बातचीत की। (यह बातचीत 21-23 मार्च, 2025 को आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की पृष्ठभूमि में और ऑपरेशन सिंदूर से पहले की गई थी)। संपादित अंश —
प्र – आप संघ के एक स्वयंसेवक एवं सरसंघचालक के नाते संघ की 100 वर्ष की यात्रा को कैसे देखते हैं?
डॉ. हेडगेवार जी ने संघ का कार्य बहुत सोच समझकर शुरू किया । देश के सामने जो कठिनाईयाँ दिखती हैं, उनका क्या उपाय करना चाहिए यह प्रयोगों के आधार पर निश्चित किया गया और वह उपाय अचूक रहा । संघ की कार्य पद्धति से काम हो सकता है और मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को पार कर संघ आगे बढ़ सकता है, यह अनुभव से सिद्ध होने को 1950 तक का समय लग गया । उसके बाद संघ का देशव्यापी विस्तार और उसके स्वयंसेवकों का समाज में अभिसरण शुरू हुआ । आगे चार दशक तक संघ के स्वयंसेवकों ने समाज जीवन के अन्यान्य क्षेत्रों में उत्तम रीति से कार्य करते हुए अपने कर्तृत्व, अपनत्व तथा शील के आधार पर समाज का विश्वास अर्जित किया तथा 1990 के पश्चात इस विचार एवं गुण संपदा के आधार पर देश को चलाया जा सकता है, यह सिद्ध कर दिखाया। अब इसके आगे हमारे लिए करणीय कार्य यह है कि इसी गुणवत्ता का तथा विचार का अवलंबन कर पूरा समाज सब भेद भूलकर प्रामाणिकता व नि:स्वार्थ बुद्धि से देश के लिए स्वयं कार्य करने लगे, और देश को बड़ा बनाए।
प्र – 100 वर्ष की इस यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव क्या थे?
संघ के पास कुछ नहीं था। विचार की मान्यता नहीं थी, प्रचार का साधन नहीं था, समाज में उपेक्षा और विरोध ही था। कार्यकर्ता भी नहीं थे। संगणक में इस जानकारी को डालते तो, वह भविष्यवाणी करता कि यह जन्मते ही मर जाने वाला है। लेकिन देश विभाजन के समय हिंदुओं की रक्षा की चुनौती व संघ पर प्रतिबन्ध की कठिन विपत्तियों में से संघ सफल होकर निकला और 1950 तक यह सिद्ध हो गया कि संघ का काम चलेगा, बढ़ेगा। इस पद्धति से हिन्दू समाज को संगठित किया जा सकता है। आगे संघ का पहले से भी अधिक विस्तार हो गया। इस संघ शक्ति का महत्त्व 1975 के आपातकाल में संघ की जो भूमिका रही, उसके कारण समाज के ध्यान में आया। आगे एकात्मता रथ यात्रा, कश्मीर के सम्बन्ध में समाज में जनजागरण तथा श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन व विवेकानंद सार्धशति जैसे अभियानों के माध्यमों से तथा सेवा कार्यों के प्रचंड विस्तार से संघ विचार तथा संघ के प्रति विश्वसनीयता का भाव समाज में अच्छी मात्रा में विस्तारित हुआ।
प्र – 1948 और 1975 में संघ पर जो संकट आए, संगठन ने उससे क्या सीखा?
यह दोनों प्रतिबन्ध लगने के पीछे राजनीति थी। प्रतिबन्ध लगाने वाले भी जानते थे कि संघ से नुकसान कुछ नहीं, अपितु संघ से लाभ ही है। इतने बड़े समाज में स्वाभाविक ही चलने वाली विचारों की प्रतिस्पर्धा में अपना राजनैतिक वर्चस्व बनाए रखने का प्रयास करने वाले सत्तारूढ़ लोगों ने संघ पर प्रतिबन्ध लगाया। पहले प्रतिबन्ध में सभी बातें संघ के विपरीत थीं। संघ को समाप्त हो जाना था। परन्तु सब विपरीतता के बावजूद संघ उस प्रतिबन्ध में से बाहर आया और आगे 15-20 वर्षों में पूर्ववत होकर पूर्व से भी आगे बढ़ गया। संघ के स्वयंसेवक जो केवल शाखाएं चलाते थे, समाज के क्रियाकलापों में बड़ी भूमिका नहीं रखते थे, वे समाज के अन्यान्य क्रियाकलापों में सहभागी होकर वहां अपनी भूमिका सुनिश्चित करने लगे। 1948 के प्रतिबन्ध से संघ को यह लाभ हुआ कि हमने अपने सामर्थ्य को जाना और समाज में और व्यवस्थाओं में परिवर्तन लाने की ओर स्वयंसेवक योजना बनाकर अग्रसर हुए। संघ के विचार में पहले से तय था कि संघ कार्य केवल एक घंटे की शाखा तक मर्यादित नहीं है, बल्कि शेष 23 घंटे के अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सार्वजनिक तथा आजीविका के क्रियाकलापों में संघ के संस्कारों की अभिव्यक्ति भी करनी है। आगे चलकर 1975 के प्रतिबन्ध में समाज ने संघ के इस बढ़े हुए दायरे की शक्ति का अनुभव किया। जब अच्छे-अच्छे लोग निराश होकर बैठ गए थे, तब सामान्य स्वयंसेवक भी यह संकट जाएगा और इसमें से हम सब सही सलामत बाहर आएंगे, ऐसा विश्वासपूर्वक सोचता था। 1975 के आपातकाल के समय अपने प्रतिबन्ध को मुद्दा न बनाते हुए संघ ने प्रजातंत्र की रक्षा के लिए काम किया, संघ के ऊपर टीका टिप्पणी करने वालों का भी साथ दिया। उस समय समाज में, विशेष कर समाज के विचारशील लोगों में एक विश्वासपात्र वैचारिक ध्रुव के नाते संघ का स्थान बना। आपातकाल के पश्चात संघ कई गुना अधिक बलशाली होकर बाहर आया।
प्र – भौगोलिक और संख्यात्मक दृष्टि से संघ बढ़ता गया है। इसके बावजूद गुणवत्तापूर्ण कार्य व स्वयंसेवकों का गुणवत्ता प्रशिक्षण करने में संघ सफल रहा है। इसके क्या कारण है?
गुणवत्ता और संख्या में आप केवल गुणवत्ता बढ़ाएंगे और संख्या नहीं बढ़ाएंगे अथवा केवल संख्या बढ़ाएंगे और गुणवत्ता नहीं बढ़ाएंगे तो गुणवत्ता का बढ़ना या संख्या का टिकना यह संभव नहीं। इसी बात को समझकर संघ ने पहले से इस पर ध्यान रखा है कि संघ को सम्पूर्ण समाज को संगठित करना है, लेकिन संगठित करना इसका एक अर्थ है। एक व्यक्ति को कैसे तैयार करना है, इन सब व्यक्तियों का गठबंधन या संगठन कैसा होना चाहिए, ‘हम’ भावना कैसी होनी चाहिए, इसके लिए पहले से कुछ मानक तय किये हैं। उन मानकों को तोड़े बिना संख्या बढ़ानी है और मानकों पर समझौता नहीं करना है, इसका अर्थ लोगों को संगठन के बाहर रखना नहीं। एक उदाहरण है, एक बड़े संगठन के प्रारम्भ के दिनों का। उस संगठन में मूल समाजवादी विचारधारा के एक व्यक्ति कार्यकर्ता बने। उनको लगातार सिगरेट पीने की आदत थी। पहली बार वो अभ्यास वर्ग में आए। सिगरेट तो छोड़िये, वहां सुपारी खाने वाला भी कोई नहीं था। वे दिन भर तड़पते रहे। रात को बिस्तर पर लेटे तो नींद नहीं आ रही थी। इतने में संगठन मंत्री आये और कहा कि नींद नहीं आ रही है तो बाहर चलो। थोड़ा टहल आते हैं। बाहर ले जाकर उन्होंने उस नए व्यक्ति को यह भी कहा कि उधर चौक पर सिगरेट मिलेगी। मन भरकर पी लो और वापस आ जाओ। वर्ग के अन्दर सिगरेट नहीं मिलेगी। वे नए कार्यकर्ता टिक गए, बहुत अच्छे कार्यकर्ता बने और सिगरेट भी छूट गयी। उस संगठन को उन्होंने उस प्रदेश में बहुत ऊँचाई तक पहुंचाया। व्यक्ति जैसा है, वैसा स्वीकार करना है। यह लचीलापन हम रखते हैं। परन्तु हमें जैसा चाहिए, वैसा उसको बनाने वाली आत्मीयता की कला भी हम रखते हैं। यह हिम्मत और ताकत हम रखते हैं। इस कारण संख्या बढ़ाने के साथ ही गुणवत्ता कायम रही। हमें संगठन में गुणवत्ता चाहिए, लेकिन हमें पूरे समाज को ही गुणवत्तापूर्ण बनाना है, इसका भान हम रखते हैं।
प्र – संघ आज भी डॉक्टर हेडगेवार जी एवं श्री गुरुजी के मूल विचारों के अनुरूप चल रहा है। परिस्थिति की आवश्यकता के अनुरूप इस में कैसे रूपांतरण किया है?
डॉक्टर साहब, श्री गुरूजी या बाळासाहब के विचार सनातन परम्परा या संस्कृति से अलग नहीं हैं। प्रगाढ़ चिंतन व कार्यकर्ताओं के प्रत्यक्ष प्रयोगों के अनुभव से संघ की पद्धति पक्की हुई और चल रही है। पहले से ही उसमें पोथी निष्ठा, व्यक्ति निष्ठा व अंधानुकरण की कोई जगह नहीं है। हम तत्वप्रधान हैं। महापुरुषों के गुणों का, उनकी बताई दिशा का अनुसरण करना है, परन्तु हर देश-काल-परिस्थिति में अपना मार्ग स्वयं बनाकर चलना है। इसलिए नित्यानित्य विवेक होना चाहिए। संघ में नित्य क्या है? एक बार बाळासाहब ने कहा था कि ‘हिन्दुस्थान हिन्दू राष्ट्र है’, इस बात को छोड़कर बाकी सब कुछ संघ में बदल सकता है। सम्पूर्ण हिन्दू समाज इस देश के प्रति उत्तरदायी समाज है। इस देश का स्वभाव व संस्कृति हिन्दुओं की संस्कृति है। इसलिए यह हिन्दू राष्ट्र है। इस बात को पक्का रखकर सब करना है। इसलिए स्वयंसेवक की प्रतिज्ञा में “अपना पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति व हिन्दू समाज का संरक्षण करते हुए हिन्दू राष्ट्र के सर्वांगीण उन्नति” की बात कही गयी है। हिन्दू की अपनी व्याख्या भी व्यापक है। उसकी चौखट में अपनी दिशा कायम रखते हुए देश-काल-परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन करते हुए चलने का पर्याप्त अवसर है। प्रतिज्ञा में “मैं संघ का घटक हूँ”, यह भी कहा जाता है। घटक यानी संघ को गढ़ने वाला, संघ का लघुरूप और संघ का अभिन्न अंग, इसलिए अलग-अलग मत होने पर भी चर्चा में उनकी अभिव्यक्ति का पूर्ण स्वातंत्र्य है। एक बार सहमति बनकर निर्णय होने पर सब लोग अपना-अपना मत उस निर्णय में विलीन कर एक दिशा में चलते हैं। जो निर्णय होता है उसको मानना है। इसलिए सबको कार्य करने की स्वतंत्रता भी है और सबकी दिशा भी एक है। नित्य को हम कायम रखते हैं और अनित्य को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बदलकर चलते है।
प्र – संघ को जो बाहर से देखते हैं, जिन्होंने अनुभव नहीं किया है, उन्हें संगठन का ढांचा समझ में आता है, लेकिन इतनी लंबी यात्रा में विचार-विमर्श और आत्मचिंतन की प्रक्रिया कैसी रहती है!
उसकी एक पद्धति बनायी है, जिसमें उद्देश्य और आशय निश्चित है। लेकिन उनको देने की पद्धति अलग-अलग हो सकती है। ढांचा तो बदल सकता है, लेकिन ढांचे के अन्दर क्या है वह पक्का है। परिस्थिति के साथ-साथ मनस्थिति का भी महत्त्व है। इसलिए हमारे प्रशिक्षणों में देश की स्थिति, चुनौतियाँ आदि बहुत सारा विचार रहता है। जिसके साथ-साथ ही उनके सन्दर्भ में स्वयंसेवक को कैसे होना चाहिए, संगठन किन गुणों के आधार पर बनाता है, स्वयं में उन गुणों का विकास करने के लिए हम क्या करते हैं, आदि बातों का भी विचार होता है। प्रार्थना में हमारे सामूहिक संकल्प का और प्रतिज्ञा में प्रत्येक स्वयंसेवक का व्यक्तिगत संकल्प नित्य प्रतिदिन स्मरण किया जाता है। स्वयंसेवक का अर्थ ही स्वयं से प्रारम्भ करने वाला, यह है। संघ का घटक शब्द का अर्थ है ‘जैसा मैं हूँ, वैसा संघ है और जैसा संघ है, वैसा मैं हूँ’। जैसे समुद्र की हर बूंद समुद्र जैसी है और सब बूंदों से मिलकर ही समुद्र बनता है। यह ‘एक’ और ‘पूर्ण’ का सबंध संघ में प्रारम्भ से ही चल रहा है। स्वयंसेवक का आत्मचिंतन सतत चलता है। सफलता का श्रेय पूरे संघ का होता है। असफलता की स्थिति में ‘मैं कहाँ कम पड़ा’ इसको हर स्वयंसेवक सोचता है। यही प्रशिक्षण स्वयंसेवकों का होता है।
प्र – समाज बदला, जीवनशैली बदली, क्या आज की परिस्थिति में संघ की दैनिक शाखा का मॉडल उतना ही प्रभावी है या इसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी है?
शाखा के कार्यक्रमों के विकल्प हो सकते हैं, और उसको हम स्वीकार करते हैं। लेकिन शाखा जो तत्व है – इकट्ठा आना, सद्गुणों की सामूहिक उपासना करना और प्रतिदिन मन में इस संकल्प को जाग्रत करना कि हम मातृभूमि के लिए काम कर रहे हैं, परमवैभव के लिए काम कर रहे हैं। यह जो आधार है, मिलना-जुलना, एक-दूसरे का सहयोग, यह मूल है। इसका विकल्प नहीं है। सामान्य आदमी सामान्य है। वह असामान्य तब होता है, जब वह जुड़ा रहता है। और फिर सामान्य व्यक्ति भी असामान्य कार्य कर डालता है, असामान्य त्याग भी करता है। लेकिन, उसके लिए एक वातावरण होना चाहिए और फिर उस वातावरण से जुड़ना। उदाहरण और आत्मीयता, यह परिवर्तन के कारक हैं और कोई नहीं। दुनिया में कहीं भी जाओ, कभी भी परिवर्तन होता है तो कोई एक मॉडल रहता है, जिसमें पहले अपने आपको परिवर्तन करना पड़ता है, उसको देखकर लोगों में परिवर्तन होता है। यह दूर रहकर नहीं चलता, वह आप्त होना पड़ता है, पास होना पड़ता है। महापुरुष बहुत हैं, उन्हें जानते भी है । उनके प्रति हमारी श्रद्धा है, सम्मान है। लेकिन मैं जिसकी संगति में हूं, वह जैसा चलता है, मैं वैसा चलता हूं। करता मैं वही हूं, जिसकी संगति मुझे है। मेरा अपना मित्र, लेकिन मेरे से थोड़ा अच्छा है, उसी का अनुसरण करता हूं। यह परिवर्तन की सिद्ध पद्धति है। इसमें कहीं बदल नहीं हुआ है, तब तक तो शाखा का दूसरा मॉडल नहीं है। कार्यक्रम और बाकी सब बदल सकता है। शाखा का समय बदलता है, वेश बदलता है। शाखा में तरह-तरह के कार्यक्रम करने की अनुमति पहले से है, लेकिन शाखा का विकल्प नहीं है। शाखा कभी अप्रासंगिक नहीं होती। आज हमारे शाखा मॉडल के बारे में प्रगत देशों के लोग आकर अध्ययन कर रहे हैं, उसके बारे में पूछ रहे हैं। हर दस साल पर हम चिंतन करते हैं कि क्या दूसरा कोई विकल्प है? ऐसे चिंतनों में मैं आज तक 6-7 बार उपस्थित रहा हूं, लेकिन जो हमको करना है, उसको करने वाला कोई विकल्प अभी तक नहीं मिला है।
प्र – संघ वनवासी क्षेत्रों में कैसे बढ़ रहा है?
वनवासी क्षेत्रों में पहला काम है कि जनजातीय बंधुओं को सशक्त करना। उनकी सेवा करना । बाद में यह भी जुड़ गया कि उनके हितों की रक्षा के लिए प्रयास करना । हम चाहते हैं कि जनजातीय समाज में से ही उनका ऐसा नेतृत्व खड़ा हो जो अपने जनजातीय समाज की चिंता करे और सम्पूर्ण राष्ट्र जीवन का वह एक अंग है, यह समझकर उनको आगे बढ़ाए। इन क्षेत्रों में काम करने वाले स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ रही है । जनजाति क्या है, उनकी जड़ें कहाँ हैं, जनजातीय समाज से निकले महापुरुष, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले जनजातीय समाज के नायक, इन सब बातों के बारे में उनको शिक्षित करते हुए धीरे धीरे राष्ट्रीय स्वर में बोलने वाले, योगदान करने वाले कार्यकर्ता व नेतृत्व वहां खड़ा हो, इसका प्रयास चल रहा है। पूर्वोत्तर के साथ ही अन्य जनजातीय क्षेत्रों में संघ की शाखाएं बढ़ रही हैं।
प्र – भारत के पड़ोसी देशों में हिन्दुओं का उत्पीड़न हो रहा है, उनके विरुद्ध हिंसा हो रही है । विश्व में मानवाधिकार की चिंता करने वाले क्या हिन्दुओं की वैसी चिंता कर रहे हैं? संघ की प्रतिनिधि सभा में भी यह विषय उठा है । आपका इस पर क्या मत है?
हिन्दू की चिंता तब होगी, जब हिन्दू इतना सशक्त बनेगा – क्योंकि हिन्दू समाज और भारत देश जुड़े हैं, हिन्दू समाज का बहुत अच्छा स्वरूप भारत को भी बहुत अच्छा देश बनाएगा – जो अपने आप को भारत में हिन्दू नहीं कहते उनको भी साथ लेकर चल सकेगा क्योंकि वे भी हिन्दू ही थे। भारत का हिन्दू समाज सामर्थ्यवान होगा तो विश्व भर के हिन्दुओं को अपने आप सामर्थ्य लाभ होगा । यह काम चल रहा है, परन्तु पूरा नहीं हुआ है । धीरे-धीरे वह स्थिति आ रही है । बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार पर आक्रोश का प्रकटीकरण इस बार जितना हुआ है, वैसा पहले नहीं होता था। यही नहीं, वहां के हिन्दुओं ने यह भी कहा है कि वे भागेंगे नहीं, बल्कि वहीं रहकर अपने अधिकार प्राप्त करेंगे । अब हिन्दू समाज का आतंरिक सामर्थ्य बढ़ रहा है । एक तरह से संगठन बढ़ रहा है, उसका परिणाम अपने आप आएगा । तब तक इसके लिए लड़ना पड़ेगा । दुनिया में जहां-जहां भी हिन्दू हैं, उनके लिए हिन्दू संगठन के नाते अपनी मर्यादा में रहकर जो कुछ कर सकते हैं वो सब कुछ करेंगे, उसी के लिए संघ है । स्वयंसेवक की प्रतिज्ञा ही ‘धर्म, संस्कृति और समाज का संरक्षण कर राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति’ करना है।
प्र – वैश्विक व्यवस्था में सैन्य शक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक ताकत का अपना एक महत्व है। संघ इसके बारे में क्या सोचता है?
बल संपन्न होना ही पड़ेगा । संघ प्रार्थना की पंक्ति ही है –अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम् – हमें कोई जीत ना सके इतना सामर्थ्य होना ही चाहिए । अपना स्वयं का बल ही वास्तविक बल है । सुरक्षा के मामले में हम किसी पर निर्भर न हों, हम अपनी सुरक्षा स्वयं कर लें, हमें कोई जीत न सके, सारी दुनिया मिलकर भी हमें जीत न सके, इतना सामर्थ्य संपन्न हमको होना ही है। क्योंकि विश्व में कुछ दुष्ट लोग हैं जो स्वभाव से आक्रामक हैं । सज्जन व्यक्ति केवल सज्जनता के कारण सुरक्षित नहीं रहता। सज्जनता के साथ शक्ति चाहिए। केवल अकेली शक्ति दिशाहीन होकर हिंसा का कारण बन सकती है। इसलिए उसके साथ ही सज्जनता चाहिए। इन दोनों की आराधना हमको करनी पड़ेगी। भारतवर्ष अजेय बने। ‘परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम्’ ऐसा सामर्थ्य हो । कोई उपाय नहीं चलेगा, तब दुष्टता को बलपूर्वक नष्ट करना ही पड़ेगा । परन्तु साथ में स्वभाव की सज्जनता है तो रावण को नष्ट कर उस जगह विभीषण को राजा बनाकर वापस आ जाएंगे । यह सारा, सारे विश्व के कारोबार पर हमारी छाया पड़े, इसलिए हम नहीं कर रहे । सभी का जीवन निरामय हो, समर्थ हो, इसलिए कर रहे हैं । हमें शक्ति संपन्न होना ही पड़ेगा क्योंकि दुष्ट लोगों की दुष्टता का अनुभव हम अपनी सभी सीमाओं पर ले रहे हैं।
प्र – भारत की भाषिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए संघ समावेशता को कैसे बढ़ावा दे रहा है?
संघ में आकर देखिये। सब भाषाओं के, पंथ संप्रदायों के लोग बहुत आनंद के साथ मिलकर संघ में काम करते हैं । संघ के गीत केवल हिंदी में नहीं हैं । बल्कि अनेक भाषाओं में हैं । हर भाषा में संघ गीत गाने वाले गीत गायक, गीतों की रचना करने वाले कवि, संगीत रचनाकार हैं । फिर भी सब लोग संघ शिक्षा वर्गों में जो तीन गीत दिए जाते हैं, वह भारत वर्ष में सर्वत्र गाते हैं । सभी लोग अपनी अपनी विशिष्टताओं को कायम रखकर अपने एक राष्ट्रीयत्व का सम्मान तथा सम्पूर्ण समाज की एकता का भान सुरक्षित रखकर चल रहे हैं। यही संघ है । इतनी विविधताओं से भरे समाज को एक सूत्र में पिरोने वाला सूत्र ही हम देते हैं ।
प्र – संघ सामाजिक समरसता की बात करता है और उसके लिए काम भी करता है। मगर कुछ लोग हैं जो समानता की बात करते हैं। आप इन दोनों में भेद कैसे देखते हैं?
समानता आर्थिक है, राजनैतिक है और सामाजिक समानता आनी चाहिए । नहीं तो इनका कोई अर्थ नहीं रहेगा । बंधुभाव ही समरसता है । स्वातंत्र्य और समता दोनों का आधार बंधुता है । समता बिना स्वतंत्रता के संकोच लाती है और टिकाऊ होनी है तो बंधुभाव का आधार चाहिए । यह बंधुभाव ही समरसता है । वह समता की पूर्व शर्त है । जात-पात और छुआ-छूत के विरोध में कानून होने के पश्चात भी विषमता नहीं जाती क्योंकि उसका निवास मन में रहता है । उसे मन से निकालना है । सब अपने हैं, इसलिए हम सब समान हैं, ये मानना है । दिखने में समान नहीं हैं तो भी हम एक-दूसरे के हैं, अपनत्व में बंधे हैं, इसी को समरसता कहते हैं । प्रेमभाव, बंधुभाव को ही समरसता कहते हैं ।
प्र – संघ में महिलाओं की भागीदारी को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। उसके बारे में आप क्या कहेंगे?
संघ के प्रारम्भिक दिनों में, 1933 के आस पास, यह व्यवस्था बनी कि महिलाओं में व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का काम राष्ट्र सेविका समिति के द्वारा ही होगा । वह व्यवस्था चल रही है । जब राष्ट्र सेविका समिति कहेगी कि संघ भी महिलाओं में यह काम करे, तभी हम उसमें जाएंगे । दूसरी बात ये है कि संघ की शाखा का कार्यक्रम पुरुषों के लिए है । उन कार्यक्रमों को देखने के लिए महिलाएं आ सकती हैं और आती भी हैं । परन्तु संघ का कार्य केवल कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं चलता । हमारी माता-बहनों का हाथ लगता है, तभी संघ चलता है । संघ के स्वयंसेवक के घर में जितनी भी महिलाएं हैं, उतनी महिलाएं संघ में हैं । विभिन्न संगठनों में भी महिलाएं संघ के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर काम करती हैं । संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में भी उनका प्रतिनिधित्व और सक्रिय सहभागिता है । इन महिलाओं ने पहली बार भारत के महिला जगत का व्यापक सर्वेक्षण किया, जिसको शासन ने भी स्वीकारा है । उन्हीं के द्वारा पिछले वर्ष सारे देश में बहुत बड़े महिला सम्मलेन हुए, जिनमें लाखों महिलाओं ने भाग लिया । इन सब कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन व सहयोग रहा । हम यह मानते हैं कि महिलाओं का उद्धार पुरुष नहीं कर सकते । महिलाएं स्वयं अपना उद्धार करेंगी, उसमें सबका उद्धार हो जाएगा । इसलिए हम उन्हीं को प्रमुखता देते हैं और जो वे करना चाहती हैं, उसके लिए उनको सशक्त बनाते हैं।
प्र – संघ के शताब्दी वर्ष में पंच परिवर्तन का संकल्प आया है। इसे लेकर कोई कार्य योजना बनाई है, इस के आधार पर आगे क्या कर सकते हैं?
आचरण के परिवर्तन के लिए आवश्यक बात है मन का भाव। जो काम करने से मन का भाव बदलता है, स्वभाव परिवर्तित हो जाता है, वह काम देना है। और जीवन भी ठीक हो जाता है। इसलिए पंच परिवर्तन की बात है। एक तो समरसता की बात है, अपने समाज में प्रेम उत्पन्न हो। विविध प्रकार का समाज है, विविध अवस्था में है, विविध भौगोलिक क्षेत्रों में है, समस्याएं हैं। एक नियम आपके लिए बना है, मेरे लिए ठीक होगा ही, ऐसा नहीं है। इतना बड़ा देश है। इसमें से अगर रास्ता निकालना है, तो जो भी प्रावधान करने पड़ेंगे, वे प्रावधान मन से होंगे तो सुरक्षित रहेंगे और प्रेम बढ़ेगा। सामाजिक समरसता का व्यवहार करना है। उसमें सामाजिक समरसता का प्रचार अभिप्रेत नहीं है। प्रत्यक्ष समाज के बाहर जितने प्रकार माने जाते हैं, हम तो एक मानते हैं, सब प्रकार के मेरे मित्र होने चाहिए, मेरे कुटुंब के मित्र होने चाहिए। जहां अपना प्रभाव है वहां मंदिर, पानी, श्मशान एक हों, यह प्रारंभ है, इसको बढ़ाते जाना है। ऐसे ही कुटुंब प्रबोधन है। जो संसार को राहत देने वाली बातें हैं, जिन आवश्यक परंपरागत संस्कारों से आती हैं, हमारी कुल-रीति में हैं और देश की रीति-नीति में भी हैं। उन पर बैठ कर चर्चा करना और उस पर सहमति बनाकर परिवार के आचरण में लाना, यह कुटुंब प्रबोधन है। पर्यावरण के लिए तो आंदोलन सहित बहुत सारी बातें चलती हैं। लेकिन, आदमी अपने घर में पानी व्यर्थ जाता है, चिंता नहीं करता। पहले करो। पेड़ लगाओ, प्लास्टिक हटाओ, पानी बचाओ। यह करने से समझ विकसित होती है, वह सोचने लगता है। ऐसे ही स्व के आधार पर करो। अपने स्व के आधार पर व्यवहार करना चाहिए। हमारा सबका जो राष्ट्रीय स्व है, उस के आधार पर चलो। अपने घर के अंदर भाषा, भूषा, भोजन, भजन, भ्रमण यह अपना होना चाहिए। घर की चौखट के बाहर परिस्थिति के अनुसार करना पड़ता है। घर में तो हम हैं, वो रहेगा तो उसके कारण संस्कार भी बचेंगे। स्व-निर्भर देश को होना है तो हम बने तक अपने देश की वस्तुओं में काम चलाएं। इसकी आदत रखें। इसका अर्थ यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बंद करो। उसका एक संतुलन है, मेरा चल सकता है उसको चलाऊँगा। देश की आवश्यकता है, कोई जीवनावश्यक काम है और बाहर देश से लाना पड़ेगा तो लाओ, लेकिन अपनी शर्तों पर, किसी के दबाव में नहीं। यह सब बातें बनेंगी, स्व का आचरण। कानून, संविधान, सामाजिक भद्रता का पालन। ये पांच बातें लेकर स्वयंसेवक उस पथ पर आगे बढ़ेंगे और शताब्दी वर्ष समाप्त होने के बाद इसको शाखाओं के द्वारा समाज में ले जाएंगे। यह आचरण बनेगा तो वातावरण बनेगा, और वातावरण बनने से परिवर्तन आएगा। और बहुत सी बातें आगे की हैं, वो यहां से जाएंगी धीरे-धीरे शुरू होकर। ऐसा सोचा है। देखते हैं क्या होता है।
प्र – आने वाले 25 वर्ष के लिए क्या संकल्प है?
संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करना और देश को परमवैभव संपन्न बनाना, उसके आगे एक अनकही बात है कि सम्पूर्ण विश्व को ऐसा बनाना है । डॉ. हेडगेवार के समय से ही यह दृष्टि है । उन्होंने 1920 में प्रस्ताव दिया था कि ‘भारत का सम्पूर्ण स्वातंत्र्य हमारा ध्येय है और स्वतन्त्र भारत दुनिया के देशों को पूंजीवाद के चंगुल से मुक्त करेगा’ ऐसा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को कहना चाहिए ।
प्र – संघ के 100 वर्ष होना और देश की आजादी के 100 वर्ष 2047 में पूरे होंगे । भारत विश्व गुरु कैसे बनेगा! कुछ लोग तरह-तरह से भेद उत्पन्न करने का प्रयास करेंगे । इन सबको कैसे देखते हैं?
जो हमारी प्रक्रिया है, उसमें इन सब बातों की चिंता की गयी है । आत्मविस्मृति, स्वार्थ और भेद इन तीन बातों से लड़ते-लड़ते हम बढ़ रहे हैं। आज समाज के विश्वासपात्र बने हैं । यही प्रक्रिया आगे चलेगी । अपनत्व के आधार पर समाज के सभी लोग एक मानसिकता में आ जाएंगे । एक और एक मिलकर दो होने के बजाय ग्यारह होगा । भारतवर्ष को संगठित और बल संपन्न बनाने का काम 2047 तक सर्वत्र व्याप्त हो जाएगा और चलते रहेगा । समरस, सामर्थ्य संपन्न भारत के विश्व जीवन में समृद्ध योगदान को देखकर सब लोग उसके उदाहरण का अनुकरण करने के लिए आगे बढ़ेंगे । 1992 में हमारे एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा था कि “इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देखकर दुनिया के अन्यान्य देशों के लोग उस देश का अपना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खड़ा करेंगे। जिससे पूरे विश्व के जीवन में परिवर्तन आएगा”। यह प्रक्रिया 2047 के बाद प्रारम्भ होगी और इसे पूरा होने में 100 वर्ष नहीं लगेंगे । अगले 20-30 वर्षों में यह पूरी हो जाएगी।
प्र – शताब्दी वर्ष में जो हिन्दू-हितैषी वर्ग है, संघ का शुभचिंतक वर्ग है, इस राष्ट्र का हित चिंतक वर्ग है । उसके लिए आपका संदेश क्या होगा?
हिन्दू समाज को अब जागृत होना ही पड़ेगा । अपने सारे भेद और स्वार्थ भूलकर हिन्दुत्व के शाश्वत धर्म मूल्यों के आधार पर अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और आजीविका के जीवन को आकार देकर एक सामर्थ्य संपन्न, नीति संपन्न तथा सब प्रकार से वैभव संपन्न भारत खड़ा करना पड़ेगा क्योंकि विश्व को नई राह की प्रतिक्षा है और उसको देना यह भारत का यानी हिन्दू समाज का ईश्वर प्रदत्त कर्तव्य है। कृषि क्रांति हो गयी, उद्योग क्रांति हो गयी, विज्ञान और तकनीक की क्रांति हो गयी, अब धर्म क्रान्ति की आवश्यकता है । मैं रिलीजन की बात नहीं कर रहा हूँ। सत्य, शुचिता, करुणा व तपस के आधार पर मानव जीवन की पुनर्रचना हो, इसकी विश्व को आवश्यकता है और भारत उसका पथ प्रदर्शक हो, यह अपरिहार्य है। संघ कार्य के महत्त्व को हम समझें, ‘मैं और मेरा परिवार’ के दायरे से बाहर आकर और अपने जीवन को उदाहरण बनाकर सक्रिय होकर हम सबको साथ में आगे बढ़ना चाहिए, इसकी आवश्यकता है। सरसंघचालक
उत्तरप्रदेश के वाराणसी में आयोजित मध्य क्षेत्रीय परिषद की 25वीं बैठक में मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि यह परिषद केन्द्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय का सशक्त मंच बन चुकी है, जिसके माध्यम से छत्तीसगढ़ सहित मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विकास को नई दिशा मिली है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में मध्य क्षेत्रीय परिषद ने ठोस योगदान दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य की अर्थव्यवस्था, आंतरिक सुरक्षा, सांस्कृतिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास में परिषद की भूमिका निर्णायक रही है।
नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक बढ़त, बस्तर में विकास का नया युग
मुख्यमंत्री श्री साय ने नक्सल समस्या पर बोलते हुए कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह की दृढ़ इच्छाशक्ति और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय से छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के विरुद्ध बड़ी सफलता मिली है। बसवराजू और सुधाकर जैसे शीर्ष नक्सली नेताओं के न्यूट्रलाइज होने को उन्होंने नक्सलवाद की रीढ़ टूटने जैसा करार दिया। उन्होंने बताया कि बस्तर के विकास के लिए बोधघाट-महानदी इंद्रावती लिंक जैसी कई हजार करोड़ की परियोजनाओं पर भी हम काम कर रहे हैं। रावघाट-जगदलपुर रेललाइन परियोजना को मिली मंजूरी भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
विकास और सुशासन की दिशा में ठोस कार्य
मुख्यमंत्री ने परिषद को अवगत कराया कि पिछली बैठक में दिए गए सुझावों पर तेजी से अमल हुआ है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 28 नई बैंक शाखाएं, डॉयल-112 सेवा का विस्तार, 82 हजार से अधिक बच्चों को कुपोषण से बाहर निकालना जैसी उपलब्धियाँ राज्य के विकास के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों ने स्थानीय खेल और सांस्कृतिक प्रतिभाओं को मंच दिया है। आयुष्मान भारत योजना के तहत 87.2 प्रतिशत नागरिकों को कार्ड वितरित किए जा चुके हैं, और 1075 में से 1033 शासकीय अस्पताल इससे जोड़े जा चुके हैं।
ऊर्जा, निवेश और औद्योगिक विकास में राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर छत्तीसगढ़
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि नई औद्योगिक नीति लागू होने के बाद राज्य को अब तक 5.5 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिनमें 3.5 लाख करोड़ पावर सेक्टर से हैं। छत्तीसगढ़ देश में विद्युत उत्पादन में दूसरे स्थान पर है और 2030 तक प्रथम स्थान का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में 23 घंटे 27 मिनट और शहरी क्षेत्रों में 23 घंटे 51 मिनट की औसत विद्युत आपूर्ति राज्य के ऊर्जा प्रबंधन की दक्षता को दर्शाता है। प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत 6 लाख घरों को सौर ऊर्जा से जोड़ने का कार्य प्रगति पर है।
सुगम सेवाएँ, सशक्त पंचायतें और नई श्वेत क्रांति
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ में डेढ़ लाख से अधिक सोलर कृषि पंप किसानों को सिंचाई सुविधा प्रदान कर रहे हैं। एनडीडीबी के साथ हुए एमओयू से राज्य में दुग्ध उत्पादन में नया विस्तार होगा। अटल डिजिटल सुविधा केंद्र पंचायतों में डिजिटल सुशासन के सेतु बन रहे हैं और लोक सेवा गारंटी अधिनियम 2011 के प्रभावी क्रियान्वयन से सेवाओं की पारदर्शी और समयबद्ध डिलीवरी सुनिश्चित हुई है।
विकास और सुशासन में छत्तीसगढ़ बना मॉडल राज्य
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के नेतृत्व में भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के अभियान में पूरी निष्ठा से सहभागी है। मध्य क्षेत्रीय परिषद के माध्यम से संवाद और समन्वय का यह मंच छत्तीसगढ़ को और भी आगे ले जाने में सहायक सिद्ध हो रहा है।
रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं मंत्रिमंडल का चिंतन शिविर 2.0 शुरू
आईआईएम रायपुर में दो दिवसीय शिविर का आयोजन रायपुर, 8 जून 2025
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों का दो दिवसीय चिंतन शिविर 2.0 आज आईआईएम रायपुर में प्रारंभ हो गया है। छत्तीसगढ़ शासन के सुशासन एवं अभिसरण विभाग द्वारा भारतीय प्रबंधन संस्थान, रायपुर (आईआईएम) के सहयोग से दो दिवसीय चिंतन शिविर 2.0 का आयोजन किया गया है। कार्यक्रम के शुभारंभ के पश्चात आज ‘परिवर्तनकारी नेतृत्व और दूरदर्शी शासन’, संस्कृति, सुशासन और राष्ट्र निर्माण तथा सक्षमता से सततता तक: विकास के लिए सार्वजनिक वित्त पर पुनर्विचार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सत्र का आयोजित किया जा रहा है। दो दिवसीय शिविर के दौरान भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे, प्रो. हिमांशु राय (डायरेक्टर आईआईएम इंदौर), डॉ. रविंद्र ढोलकिया (आईआईएम अहमदाबाद), श्री संजीव सान्याल (प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद सदस्य), पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक उदय माहुरकर, ग्लोबल डिजिटल स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र प्रताप गुप्ता जैसे ख्यातिप्राप्त विशेषज्ञ विभिन्न सत्रों को संबोधित करेंगे। 1368
नई दिल्ली. कश्मीर घाटी में धर्म पूछकर हिन्दू पर्यटकों का नरसंहार करने की घटना ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था. आतंकियों की ओर से किए गए इस बर्बर हमले से पूरा देश उबल पड़ा. हर तरफ से बदला लेने की आवाज उठने लगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कर दिया था कि इस कायराना हरकत करने वाले और उनको बचाने वालों को मिट्टी में मिला दिया जाएगा. इंडियन आर्म्ड फोर्सेज को आतंकवादियों और दुश्मनों को जवाब देने की खुली छूट दे दी गई. इसके बाद भारतीय सुरक्षाबलों ने ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया. पाकिस्तान में मौजूद आतंकी शिविरों को निशाना बनाते हुए उन्हें तबाह कर दिया. आतंकियों का आका पाकिस्तान इससे बौखला गया और भारत पर ड्रोन और मिसाइल से हमला करना शुरू कर दिया, जिन्हें बेअसर कर दिया गया. इसके बाद इंडिया ने जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान के 11 एयरबेस को तबाह कर दिया. इनमें नूर खान एयरबेस भी शामिल है, जिसके पास ही पाकिस्तान का न्यूक्लियर वेपन रखा गया है. इससे पाकिस्तान के पसीने छूट गया. भारत ने ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल से स्ट्राइक करते हुए आतंकियों के आका को घुटनों पर ला दिया. अब ब्रह्मोस मिसाइल के इस्तेमाल पर एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है.
क्या आपको पता है कि ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत ने पाकिस्तानी सरजमीं पर कितनी ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलें पटकीं? सूत्रों के हवाले से बड़ी खबर सामने आई है. ब्रह्मोस मिसाइल की प्रचंडता को देखकर पाकिस्तान का मनोबल भरभरा कर गिर गया और वह सीजफायर के लिए गिड़गिड़ाने लगा. भारत अपनी शर्तों पर सीजफायर के लिए तैयार हुआ. भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत अभी तक पाकिस्तान पर 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी हैं. ब्रह्मोस मिसाइल की गिनती दुनिया के घातक मिसाइलों में होती है. पाकिस्तान ने इसके अचूक निशाने वाले प्रहार और प्रचंडता का अनुभव किया है. यही वजह है कि पड़ोसी देश दुनिया की शरण में चला गया और उनसे भारत को मनाने की गुहार लगाने लगा. इसके बाद भारत सीजफायर के लिए सहमत हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में स्पष्ट तौर पर कह दिया कि भारत में किसी भी तरह के आतंकी हमले अब एक्ट ऑफ वॉर (युद्ध की घोषणा) माना जाएगा.
सुपरसोनिक स्पीड: ब्रह्मोस मिसाइल की गति मैक 2.8 से मैक 3 (3430 किमी/घंटा तक) तक होती है, जो इसे दुनिया की सबसे तेज़ क्रूज मिसाइलों में से एक बनाती है.
मल्टी-प्लेटफॉर्म कैपेबिलिटी: ब्रह्मोस मिसाइल को थल (भूमि), जल (नौसेना) और वायु (वायुसेना) तीनों माध्यमों से दागा जा सकता है. इसे युद्धपोतों, पनडुब्बियों, ट्रकों और लड़ाकू विमानों (जैसे कि सुखोई-30MKI) से लॉन्च किया जा सकता है.
हाई एक्यूरेसी: ब्रह्मोस की सटीकता बहुत अधिक है. इसकी CEP (Circular Error Probability) केवल 1 मीटर के आसपास है, यानी यह अपने लक्ष्य के लगभग बिल्कुल सटीक केंद्र पर वार करती है.
वॉरहेड कैपेसिटी: ब्रह्मोस मिसाइल लगभग 200 से 300 किलोग्राम तक का पारंपरिक (conventional) या सेमी आर्मर (semi-armor piercing) वॉरहेड ले जा सकती है.
स्टील्थ तकनीक: इसमें लो-रेडार सिग्नेचर टेक्नोलॉजी है, जिससे यह दुश्मन की रडार निगरानी से बच निकलती है.
आधुनिक गाइडेंस सिस्टम: ब्रह्मोस में अत्याधुनिक INS (Inertial Navigation System) और GPS/GLONASS गाइडिंग सिस्टम है, जो इसे चलते-फिरते लक्ष्यों पर भी हमला करने में सक्षम बनाती है.
रेंज: पहले इसकी रेंज लगभग 290 किमी थी, लेकिन MTCR (Missile Technology Control Regime) में भारत की सदस्यता के बाद इसकी रेंज 450 किमी से बढ़ाकर अब 800 किमी तक की जा रही है.
फायर एंड फॉरगेट सिस्टम: लॉन्च के बाद मिसाइल को नियंत्रित करने की जरूरत नहीं होती है. यह खुद ही लक्ष्य को खोजकर हमला करती है.
पाकिस्तान के 11 एयरबेस तबाह
बता दें कि भारत ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकी शिविरों को निशाना बनाया था, लेकिन पाकिस्तान ने इंडियन एयरबेस को टारगेट बनाना शुरू कर दिया. इसके बाद भारत ने भी जवाबी कार्रवाई करनी शुरू कर दी. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान पर 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागीं गईं थीं. सूत्रों का दावा है कि पाकिस्तान के 11 एयरबेस को निशाना बनाया गया था. IAF ने ब्रह्मोस और स्कैल्प मिसाइलें दागीं थीं. भारत ने पाकिस्तान पर 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी थीं. ऑपरेशन सिंदूर के तहत इसे अंजाम दिया गया था.
बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें
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