राज्य सरकार जल संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने के लिए प्रतिबद्ध – मुख्यमंत्री श्री साय

जल संरक्षण को दिनचर्या का हिस्सा बनाने, जल संरचनाओं की रक्षा और जल के प्रति जिम्मेदार सोच अपनाने का मुख्यमंत्री ने किया आह्वान

मुख्यमंत्री श्री साय और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटिल की संयुक्त अध्यक्षता में “जल संचय-जन भागीदारी 2.0” अभियान के क्रियान्वयन की हुई गहन समीक्षा

केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री ने छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण के क्षेत्र में हो रहे कार्यों और नवाचारों की सराहना की

31 मई तक 10 लाख जल संरचनाओं का लक्ष्य, जल सुरक्षा को मिलेगा नया आधार

डबरी निर्माण से बढ़ेगा भू-जल स्तर, किसानों को मिलेगा अतिरिक्त लाभ

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटिल की संयुक्त अध्यक्षता में आज नवा रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में आयोजित बैठक में प्रदेश में “जल संचय-जन भागीदारी 2.0” अभियान के क्रियान्वयन की गहन समीक्षा की गई। केंद्रीय मंत्री श्री पाटिल इस बैठक में वर्चुअली शामिल हुए और बैठक को संबोधित किया। इस दौरान बिलासपुर, दुर्ग और सूरजपुर जिले के कलेक्टरों ने अपने-अपने जिलों में अभियान के अंतर्गत संचालित कार्यों और गतिविधियों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि जल संकट 21वीं सदी की केवल गंभीर पर्यावरणीय ही नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और विकासात्मक चुनौती भी बन चुका है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण को स्थायी और प्रभावी बनाने के लिए जनभागीदारी अनिवार्य है।उन्होंने देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के उस संदेश का उल्लेख किया, जिसमें पानी के उपयोग को प्रसाद के समान मानते हुए जल के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन से प्रेरित होकर राज्य सरकार जल संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने के लिए प्रतिबद्ध है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि अभियान के पहले चरण में छत्तीसगढ़ ने देशभर में द्वितीय स्थान प्राप्त किया तथा विभिन्न जिलों को भी अलग-अलग श्रेणियों में पुरस्कार मिले। पहले चरण में सामुदायिक भागीदारी के मॉडल पर कार्य करते हुए बड़े पैमाने पर बोरवेल रिचार्ज, रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, रिचार्ज शाफ्ट, सोक पिट और ओपनवेल रिचार्ज जैसी संरचनाओं का निर्माण किया गया। श्री साय ने कहा कि प्रदेश में वर्तमान में 5 क्रिटिकल और 21 सेमी-क्रिटिकल भू-जल ब्लॉक चिन्हित हैं। वर्ष 2024 की तुलना में 2025 में इनमें से 5 ब्लॉकों में भू-जल निकासी में कमी और भू-जल स्तर में सुधार दर्ज किया गया है, जो जल संरक्षण प्रयासों के सकारात्मक परिणामों का संकेत है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि अभियान के दूसरे चरण “जल संचय-जन भागीदारी 2.0” के अंतर्गत तकनीक आधारित और अधिक परिणाममूलक रणनीति अपनाई जा रही है। राज्य सरकार ने 31 मई 2026 तक 10 लाख जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया है। मुख्यमंत्री ने इसे जल सुरक्षा की दिशा में प्रदेश का ऐतिहासिक कदम बताया। उन्होंने कहा कि राज्य के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर एक विशेष पहल के तहत 10 एकड़ से अधिक भूमि वाले चार लाख से अधिक किसानों को अपने खेतों में डबरी निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस कार्य में जिला प्रशासन के साथ-साथ औद्योगिक समूहों का सहयोग भी लिया जा रहा है। इन डबरियों से भू-जल स्तर में वृद्धि के साथ किसानों को सिंचाई एवं मछली पालन जैसी अतिरिक्त सुविधाएँ मिलेंगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि दूसरे चरण में सभी जल संरचनाओं की जियोटैगिंग, ग्राम पंचायतों के वॉटर बजट तथा जल सुरक्षा योजनाओं के निर्माण पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। साथ ही गांवों के युवाओं को “जल मित्र” के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा, ताकि अभियान को गति मिल सके। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि क्रिटिकल और सेमी-क्रिटिकल ब्लॉकों पर विशेष फोकस रखते हुए सेमी-क्रिटिकल ब्लॉकों में 40 प्रतिशत तथा क्रिटिकल ब्लॉकों में 65 प्रतिशत जल संरक्षण कार्यों का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उन्होंने प्रदेशवासियों से जल संरक्षण को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने, जल संरचनाओं की रक्षा करने और जल के प्रति जिम्मेदार सोच अपनाने का आह्वान भी किया।

केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटिल ने छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण के क्षेत्र में हो रहे कार्यों और नवाचारों की सराहना की। उन्होंने कहा कि गत वर्ष जल संरक्षण के प्रयासों में छत्तीसगढ़ देशभर में दूसरे स्थान पर रहा, जो राज्य के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2024 को सूरत से ‘जल संचय जन भागीदारी अभियान’ की शुरुआत की थी और ‘कर्मभूमि से मातृभूमि के लिए जल संचयन में सहयोग’ का आह्वान किया था। इस अभियान का उद्देश्य जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप देना है।

केंद्रीय मंत्री श्री पाटिल ने प्रदेश के समस्त कलेक्टरों से मनरेगा के तहत जल संचय कार्यों के लिए प्राप्त राशि का पूर्ण और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने को कहा। उन्होंने राजनांदगांव प्रवास के दौरान एक महिला सरपंच द्वारा स्वयं के प्रयासों से जल संचयन के लिए किए गए उल्लेखनीय कार्यों की प्रशंसा की। इसके साथ ही उन्होंने जल संचय में व्यापक जनभागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया।

बैठक में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री सुबोध कुमार सिंह, जल संसाधन विभाग के सचिव श्री राजेश सुकुमार टोप्पो तथा जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव श्री कांताराव और छत्तीसगढ़ के समस्त कलेक्टर वर्चुअली उपस्थित थे।

भारत के ज़िम्मेदार एआई विज़न को मज़बूत ग्लोबल समर्थन के साथ इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 भारत मंडपम में सम्पन्न

अवसंरचना का वादा $250 अरब के पार;  $20 अरब की डीप-टेक प्रतिबद्धता भारत के एआई इकोसिस्टम में दुनिया के भरोसे को दिखाती हैं

118 देशों के 20 से ज़्यादा सरकार के प्रमुखों और प्रतिनिधियों ने ऐतिहासिक एआई आयोजन में हिस्सा लिया

5 लाख से ज़्यादा प्रतिभागियों और 550 प्री-समिट आयोजनों ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट को दुनिया की सबसे बड़े एआई सम्मेलनों में से एक बनाया

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 आज भारत मंडपम, नई दिल्ली में सम्पन्न हो गया। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को संबोधित किया और पांच दिन के ग्लोबल आयोजन के पैमाने, नतीजों और खास घोषणाओं को संक्षेप में बताया।  संवाददाता सम्मेलन में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव श्री एस. कृष्णन, भारत के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता श्री रणधीर जायसवाल और भारत सरकार के प्रधान प्रवक्ता और पत्र सूचना कार्यालय के प्रधान महानिदेशक श्री धीरेंद्र ओझा भी शामिल हुए।

सम्मेलन में अभूतपूर्व भागीदारी देखी गई जिससे ग्लोबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बातचीत को आकार देने में भारत के बढ़ते नेतृत्व की फिर से पुष्टि हुई। उद्घाटन में 118 देशों के सरकारी प्रतिनिधियों के साथ-साथ 20 से ज़्यादा सरकार के प्रमुख और 59 मंत्री स्तर के प्रतिनिधि शामिल हुए। समिट में 100+ ग्लोबल एआई लीडर, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सीएक्सओ, और दुनिया भर के 500 से ज़्यादा बड़े एआई विशेषज्ञ भी शामिल हुए।

भारत के एआई ट्रैजेक्टरी में दुनिया भर की ज़बरदस्त दिलचस्पी को दिखाते हुए, समिट में 5 लाख से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया।  इस आयोजन के लिए वैश्विक स्तर पर रुचि बन रही थी, शिखर सम्मेलन से पहले 30 देशों में 550 सम्मेलन और कार्यक्रम आयोजित किए गए। मुख्य शिखर सम्मेलन के दिनों में 500 से अधिक साइड इवेंट आयोजित की गई। इससे यह अब तक के सबसे व्यापक बहु-हितधारक एआई कार्यक्रमों में से एक बन गया।

इस अवसर पर संबोधन में मजबूत वैश्विक भागीदारी, भारत के जिम्मेदार एआई दृष्टिकोण के व्यापक समर्थन और देश की तकनीकी क्षमताओं में बढ़ते विश्वास की जानकारी देते हुए, श्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “संख्या महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वास्तव में महत्वपूर्ण यह है कि दुनिया को नए एआई युग में भारत की भूमिका पर भरोसा है। भागीदारी की गुणवत्ता, संवाद की गहराई और जिम्मेदार और संप्रभु एआई के प्रति हमारे दृष्टिकोण का वैश्विक समर्थन यह दर्शाता है कि भारत सिर्फ इस परिवर्तन में भाग नहीं ले रहा है, हम इसे आकार देने में मदद कर रहे हैं।”

मंत्री ने एआई समिट को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भारत के  वैश्विक नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण पल बताया। उन्होंने दुनिया के बड़े एआई प्लेयर्स की भागीदारी, मंत्रियों की मज़बूत भागीदारी और युवाओं की अभूतपूर्व भागीदारी पर ज़ोर दिया।  इसमें 2.5 लाख से ज़्यादा विद्यार्थियों ने ज़िम्मेदार और नैतिक एआई पर चर्चा में हिस्सा लिया, जिसका परिणाम  गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के रूप में सामने आया।

श्री वैष्णव ने कहा कि अवसंरचना से जुड़े निवेश के वादे $250 अरब को पार कर गए हैं, साथ ही लगभग $20 अरब की डीप-टेक वेंचर प्रतिबद्धता भी हैं। यह भारत के एआई इंफ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम में बढ़ते वैश्विक भरोसे को दिखाता है। उन्होंने भारत की सॉवरेन एआई मॉडल स्ट्रैटेजी के मज़बूत अंतरराष्ट्रीय समर्थन पर भी ज़ोर दिया और कम नवाचार से बनाए गए देसी मॉडल्स की गुणवत्ता की तारीफ़ की।

उन्होंने इन घटनाक्रमों को देश को 2047 तक “विकसित भारत” बनाने के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के बड़े विज़न के रूप में वर्णित किया। श्री वैष्णव ने समिट को भारत में दीर्घावधि प्रौद्योगिकीय और सेमीकंडक्टर क्षमता बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। 

OpenAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की

OpenAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) श्री सैम ऑल्टमैन ने आज प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की।

बैठक के बाद, प्रधानमंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत एआई में बहुत तरक्की कर रहा है और प्रतिभा एवं  नवाचार के लिए ग्लोबल हब बनने की ओर अग्रसर है।

प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत के प्रतिभावान युवाओं में निवेश करने और इस बदलाव लाने वाले क्षेत्र में जोश भरने का निमंत्रण दिया।

X पर सैम ऑल्टमैन की पोस्ट के जवाब में श्री मोदी ने कहा:

“यह सच में बहुत अच्छी बैठक थी। भारत एआई की दुनिया में बहुत तरक्की कर रहा है। हम दुनिया को अपने प्रतिभावान युवाओं में निवेश करने और इस क्षेत्र में जोश भरने के लिए निमंत्रण देते हैं।

श्री गुरुजी का आर्थिक चिंतन : पश्चिमी राष्ट्रों का लक्ष्य केवल भौतिक सुख

मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है? अथवा मनुष्य अपने सामने जीवन का लक्ष्य कौन सा रखे? इस बारे में लगभग सभी लोगों का मत है कि सुख ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। परंतु, प्रश्न यह है कि सुख से आशय क्या है और मनुष्य को यह सुख कैसे मिल सकता है?

इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी के अनुसार पश्चिमी चिन्तन और हिन्दू दर्शन पर आधारित भारतीय चिन्तन में मूलभूत अन्तर है। इस अन्तर को स्पष्ट करते हुए श्री गुरुजी ने अनेक प्रकार से समझाया है कि सुख के बारे में पश्चिमी विचार अधूरा, एकांगी, अस्थायी एवं क्षणभंगुर है, वस्तुतः तो वह सुख का क्षणिक आभास देते हुए अन्ततः दुखकारी ही है। इसके विपरीत सुख की हिन्दू परिकल्पना समग्र, संतुलित एवं अधिक स्थायी है।

पश्चिमी राष्ट्रों का लक्ष्य – केवल भौतिक सुख

पश्चिमी राष्ट्रों ने सुख की परिकल्पना केवल भौतिक एवं ऐहिक सुख के रूप में ही की है। इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी ने कहा है – ‘‘दुनिया भर की राज्य व्यवस्था एवं राष्ट्र व्यवस्था में मनुष्य मात्र के जीवन का लक्ष्य ऐहिक सुख समृद्धि माना हुआ है। अर्थात् खाना-पीना, वस्त्र प्रावरण, निवास के स्थान, सुखोपभोग, वासना की वृद्धि, वासना संतुष्ट करने के साधनों की वृद्धि, उन साधनों की उपलब्धि, भिन्न-भिन्न मनोविनोद के साधन, यही जगत के सब देशों में सर्वसाधारण लक्ष्य रखा गया है, ऐसा दिखता है। जिसका बड़ा प्रगतिमान वर्णन किया जाता है, वहाँ सामान्य आदमी के यहाँ भी टेलीविजन, रेडियो, मोटर, मोटर साइकिल आदि ऐहिक सुख के लक्षण ही प्रगति के मापदण्ड माने जाते हैं। पर ये वास्तव में मानव की प्रगति के मापदण्ड हैं क्या?’’

भौतिक सुख की यह अवधारणा अधूरी है और यह अंततोगत्वा असंतोष, अशान्ति एवं संघर्ष का ही कारण बनती है, इस बात पर श्री गुरुजी कहते हैं कि मनुष्य मात्र को सुख की प्राप्ति करवा देने का ध्येय सामने रखकर चलने का दावा करने वाली बहुत सी जीवन रचनाएं आज संसार में विद्यमान हैं। भौतिक कामनाओं की पूर्ति में ही सुख है, इसी बात को लेकर अनेक आधुनिक विचार प्रणालियाँ उत्पन्न हुई हैं। परन्तु कुछ काल के लिए होने वाली वासनापूर्ति आगे चलकर मनुष्य को अशान्त करती हुई दिखाई देती है।

श्री गुरुजी के अनुसार इसके कई कारण है – (1) एक तो विषय वासनाओं की पूर्ति सर्वथा असम्भव है। उनको तुष्ट करने की जितनी ही चेष्टा की जाती है, उतनी ही वे बढ़ती हैं। ‘‘अनुभव यह बताता है कि मनुष्य दैहिक आनन्द प्राप्त करने का जितना अधिक प्रयास करता है, उसकी भूख उतनी ही तीव्र होती जाती है। उसे कभी संतुष्टि का अनुभव नहीं होता। इच्छाओं के तुष्टिकरण की चेष्टा जितनी अधिक होगी, उतना ही असंतोष बढे़गा। भौतिक सुख साधनों का संग्रह करने की इच्छा जितनी ही प्रबल होगी, निराशा भी उतनी अधिक होगी। हमारे शास्त्रों ने घोषणा की है – ‘न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति’ (महा0 आदिपर्व)। विषय भोगों से कामनाओं का शमन नहीं होता। शरीर के जीर्णशीर्ण हो जाने पर भी इच्छाएं पूर्ववत् युवा बनी रहती हैं। भर्तृहरि ने भी कहा है – ‘तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः’ (वैराग्य शतक) – यही वास्तविक दुर्दशा है, जिसमें आधुनिक मानव स्वयं को फँसा हुआ पाता है। इस प्रकार वासनापूर्ति असम्भव होने के कारण मानव जीवन दुःखी होता हुआ दिखाई देता है।

(2) भौतिक पदार्थों से अपनी वासनापूर्ति में लगे मनुष्य को प्रारम्भ में भले ही कुछ संतुष्टि मिले पर, ‘‘आगे चलकर वह समझ जाता है कि इन आपाततः सुख देने वाली वस्तुओं में वास्तविक सुख देने की कोई शक्ति नहीं है। सुख तो अपने ही अन्दर समय-समय पर उठने वाली वासना-तंरगों की शांति से होता है। यानि सुख बाह्य वस्तु में नहीं, वासना पूर्ति में भी नहीं; किन्तु वासना के शांत होने में है।’’

(3) श्री गुरुजी का मानना था कि ‘‘व्यक्ति व समाज के लिए वासनाओं का उत्तरोत्तर बढ़ते जाना और उस पर सदा असंतोष का बना ही रहना, यही जगत में बार-बार होने वाले भयंकर युद्धों का प्रमुख कारण है। जगत में अशांति तथा असुख बनाएं रखने में, यही प्रबल कारण है।’’

श्री गुरुजी ने इसी बात को विस्तार से समझाया है, कहा है कि – ‘‘पश्चिम के सुख की अवधारणा पूर्णतया प्रकृतिजन्य इच्छाओं की संतुष्टि पर ही केन्द्रित है, अतः उनके ‘जीवन स्तर को उठाने’ का अर्थ भी केवल भौतिक आनन्द की वस्तुओं को अधिकाधिक जुटाना है। इससे व्यक्ति अन्य विचारों एवं एषणाओं को छोड़कर केवल इसी में पूर्णतया संलग्न हो जाता है। भौतिक सुख-साधनों की प्राप्ति की इच्छा धन-संग्रह को जन्म देती है। अधिकाधिक धन प्राप्ति हेतु शक्ति आवश्यक हो जाती है; किन्तु भौतिक सुख की अतृप्त क्षुधा व्यक्ति को अपनी राष्ट्रीय सीमाओं तक ही नहीं रुकने देती। सबल राष्ट्र राज्य शक्ति के आधार पर दूसरों के दमन व शोषण का भी प्रयास करते हैं। इसमें से संघर्ष व विनाश का जन्म होता है। एक बार यह प्रक्रिया प्रारम्भ हुई कि समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। सभी नैतिक बंधन विच्छिन्न हो जाते हैं। सामान्य मानवीय संवेदनाएं सूख जाती हैं। मनुष्य और पशु में अन्तर स्थापित करने वाले मूल्य एवं गुण समाप्त हो जाते हैं।’’

1992 का बारा नरसंहार – नक्सली आतंक की वह काली खौफनाक रात

नक्सली-माओवादियों का हिंसक चेहरा सबके समक्ष है। इसी हिंसात्मक प्रवृत्ति का एक उदाहरण मात्र है, सन् 1992 का बारा नरसंहार।

12 फरवरी, 1992 की रात गया जिले के बारा गांव (बिहार) में हिंसक कहर ने सारे देश को झकझोर दिया था। माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी के आतंकियों ने अचानक हमला कर 34 निर्दोष ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर दी थी। नक्सली हिंसा के इस क्रूर चेहरे को भुला पाना आसान नहीं है।

टेकरी प्रखंड का बारा गांव गया शहर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है। गांव में करीब 50 घर थे, लगभग 40 परिवार भूमिहार समाज के थे। इनके अलावा छह ब्राह्मण, एक बढ़ई, एक तेली और दो अनुसूचित जाति के परिवार थे। अधिकांश परिवारों के पास तीन से चार बीघा तक जमीन थी। गांव का कुल रकबा लगभग 300 बीघा था। आसपास के खुलुनी, देहुरा और नेन बिगहा जैसे गांवों में अनुसूचित जाति समुदाय की आबादी रहती थी।

12 फरवरी की रात करीब साढ़े नौ बजे गांव में अचानक बम धमाकों की आवाज गूंजी। 500 हमलावरों की भीड़ ने गांव को चारों ओर से घेर लिया था। हमलावरों ने घरों में आग लगाई और “एमसीसी जिंदाबाद” के नारे लगाए। उन्होंने सवर्ण लिबरेशन फ्रंट के कमांडर रामाधार सिंह उर्फ डायमंड और उनके सहयोगी हरद्वार सिंह के बारे में पूछताछ शुरू की।

कुछ हमलावर जबरन घरों में घुसे। उन्होंने तलाशी का बहाना बनाया, लेकिन जल्द ही उनका असली चेहरा सामने आ गया। उन्होंने गांव के पुरुषों को घरों से बाहर निकाला, उनके हाथ बांध दिए और महिलाओं व बच्चों को अलग कर दिया। करीब 100 पुरुषों को पास की नहर के किनारे ले जाया गया। वहां उनके पैरों को भी बांध दिया गया।

इसके बाद हमलावरों ने पूछा कि कौन भूमिहार नहीं है। एक व्यक्ति ने खुद को अलग बताया और छूट गया। एक अन्य व्यक्ति ने खुद को एमसीसी समर्थक बताया, लेकिन हमलावरों ने उसे भी नहीं बख्शा।

हमलावरों ने महिलाओं और बच्चों को वहां से हटने को कहा। और उसके बाद नहर किनारे चीखें गूंज उठीं। हमलावरों ने बंधकों के गले तेज हथियारों से काट दिए। जो लोग भागने की कोशिश करते, उन्हें गोली मार दी। पोस्टमार्टम में 34 लोगों की मौत की पुष्टि हुई। चार लोगों को गोली लगी थी, जबकि बाकी को धारदार हथियार से मारा गया था। यहां तक कि जिन लोगों को गोली लगी थी, उनके भी गले काटे गए थे। इस क्रूरता ने पूरे इलाके को सन्न कर दिया।

उस दौर में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में सक्रिय था। ये संगठन खुद को गरीबों का हितैषी बताता था, लेकिन अपने विरोधियों को खत्म करने के लिए हिंसा को हथियार बनाया। लंबे समय तक हिंसा के रास्ते पर चलता रहा। बारा नरसंहार भी उसी रणनीति का हिस्सा था।

वर्ष 2004 में एमसीसी ने पीपुल्स वार ग्रुप के साथ मिलकर भाकपा माओवादी का गठन किया। केंद्र सरकार ने भाकपा माओवादी और उससे जुड़े संगठनों को आतंकी घोषित किया था।

बारा नरसंहार ने स्पष्ट कर दिया कि नक्सली विचारधारा डर और खून-खराबे पर टिकी है। विचारधारा के नाम पर निर्दोष लोगों को निशाना बनाया। उन्होंने न्याय का नारा लगाया, लेकिन मानवता को रौंद दिया। उन्होंने सामाजिक संघर्ष का दावा किया, लेकिन सिर्फ और सिर्फ आतंक फैलाया।

बारा की वह काली रात आज भी याद दिलाती है कि जब विचारधारा पर हिंसा हावी हो जाती है, तब सबसे पहले इंसानियत मरती है।

बस्तर की धरती के सेवाव्रती डॉ. रामचंद्र और सुनीता ताई गोडबोले

छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल अपनी सघन वनराशि, विशिष्ट जनजातीय संस्कृति और प्रकृति से आत्मीय संबंध के लिए जाना जाता है। किंतु बीते कई दशकों से यह क्षेत्र नक्सल हिंसा, सशस्त्र संघर्ष, भय और अविश्वास के वातावरण से भी जूझता रहा है। ऐसे कठिन हालात में यदि कोई व्यक्ति अपना संपूर्ण जीवन निःस्वार्थ भाव से जनजाति समाज की सेवा में अर्पित कर दे, तो वह केवल चिकित्सक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संवाहक बन जाता है। ऐसे ही प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी सहधर्मचारिणी सुनीता ताई – जिन्होंने बस्तर को ही अपना कर्मक्षेत्र और घर बना लिया।

महाराष्ट्र के सतारा जिले में जन्मे डॉ. गोडबोले ने आयुर्वेदिक चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। लगभग 18–19 वर्ष की आयु में अल्बर्ट श्वाइत्ज़र के जीवन पर आधारित एक पुस्तक पढ़ी, जिसने उनके सोचने की दिशा ही बदल दी। युवावस्था में ही उनके मन में समाज सेवा का बीज अंकुरित हो गया था। डॉ. गोडबोले ने तय कर लिया कि चिकित्सा उनके लिए आजीविका नहीं, बल्कि साधना होगी।

पढ़ाई पूरी करने के बाद वे वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े और नासिक जिले के कनाशी स्थान पर निवास करने वाले भील जनजाति समाज के बीच स्वास्थ्य सेवा का कार्य प्रारंभ किया। कुछ वर्षों बाद, मात्र 28 वर्ष की आयु में, उन्हें छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बारसूर गांव भेजा गया, जहां एक स्वास्थ्य केंद्र लंबे समय से बंद पड़ा था। यही स्थान उनकी स्थायी कर्मभूमि बन गया।

कल्याण आश्रम ने उन्हें अकेले न जाने की सलाह दी और पहले विवाह करने का सुझाव दिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात पुणे की सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता पुराणिक से हुई, जो महिला सशक्तिकरण और साक्षरता अभियानों में सक्रिय थीं। सुनीता ताई भी वनवासी कल्याण आश्रम के रायगढ़ जिले में स्थित जांभिवली केंद्र पर कार्य कर रही थी। दोनों के विचार और सेवा-भावना में समानता थी। विवाह के मात्र दो सप्ताह बाद ही दोनों सुदूर क्षेत्र बस्तर पहुंच गए और जनजाति समाज के साथ जीवन को आत्मसात कर लिया।

आज डॉ. गोडबोले और उनकी पत्नी बारसूर गांव में एक साधारण दो-कमरे के मकान में रहते हैं – ईंट की दीवारें, टीन की छत और चारों ओर फैला घना जंगल। उनके घर से कुछ दूरी पर खड़ी एम्बुलेंस उनकी सेवा-प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

डॉ. गोडबोले कहते हैं, – “यहां के लोगों के पास दवाइयों के पैसे भी मुश्किल से होते हैं, परिवहन की व्यवस्था तो लगभग नहीं के बराबर है। इसलिए यह जिम्मेदारी हमें स्वयं उठानी पड़ी।”

शुरुआती वर्षों में जनजाति समाज में आधुनिक चिकित्सा के प्रति गहरा संदेह था। बीमार होने पर पहले मांत्रिकों और ओझा-गुनियों से उपचार कराया जाता था। जब वे असफल होते, तब डॉक्टर को बुलाया जाता। वह भी सीधे क्लिनिक आने की परंपरा नहीं थी – जंगल में आग जलाकर धुआं किया जाता, ताकि डॉक्टर उस संकेत को देखकर मरीज तक पहुंचे। बाहरी दुनिया का भय इतना गहरा था कि एक बार डॉ. गोडबोले एक मरीज को इलाज के लिए जगदलपुर ले गए, तो वह फिर कभी गांव नहीं लौटा। बाद में पता चला कि शहर उनके लिए किसी अनजान देश जैसा था – भाषा, कागजी प्रक्रिया और पैसों की कमी उन्हें डरा देती थी।

इन्हीं अनुभवों से डॉ. गोडबोले निष्कर्ष पर पहुंचे कि स्वास्थ्य सेवा गांव में ही, सरल और न्यूनतम खर्च पर उपलब्ध कराना ही एकमात्र व्यवहारिक समाधान है। उन्होंने स्थानीय हलबी भाषा सीखी, लोगों के साथ समय बिताया और धैर्यपूर्वक विश्वास अर्जित किया। धीरे-धीरे उनके क्लिनिक में नियमित मरीज आने लगे। इसी दौरान सुनीता गोडबोले ने जनजाति महिलाओं का एक समूह गठित किया, जो महुआ, इमली, कच्चे आम जैसे वनोपज को उचित मूल्य पर बेचने में सहायक बना।

 राष्ट्रपति भवन में छत्तीसगढ़ की झांकी कलाकारों का सम्मान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सराही जनजातीय कला, कलाकार हुए भावविभोर

गणतंत्र दिवस के अवसर पर कर्तव्य पथ पर छत्तीसगढ़ की झांकी में शामिल कलाकारों को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात का गौरव प्राप्त हुआ। राष्ट्रपति से स्नेहपूर्ण मुलाकात के दौरान कलाकार भावविभोर और अभिभूत नजर आए।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने छत्तीसगढ़ की झांकी की प्रशंसा करते हुए कहा कि झांकी के माध्यम से देश की समृद्ध जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रभावशाली प्रदर्शन हुआ है। उन्होंने कलाकारों के समर्पण, मेहनत और जीवंत प्रस्तुति की सराहना करते हुए छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया भी कहा।

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले से आए जनजातीय कलाकारों ने गणतंत्र दिवस परेड के दौरान छत्तीसगढ़ की झांकी के साथ पारंपरिक मंदार नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति दी थी, जिसने कर्तव्य पथ पर मौजूद दर्शकों के साथ-साथ देश-दुनिया का ध्यान आकर्षित किया।

कलाकारों ने राष्ट्रपति से मुलाकात को अपने जीवन का अविस्मरणीय क्षण बताते हुए कहा कि यह सम्मान उन्हें अपनी कला, संस्कृति और परंपराओं को और अधिक निष्ठा के साथ आगे बढ़ाने की नई प्रेरणा देगा।

राष्ट्रपति से मुलाकात करने वालों में टीम लीडर तेज बहादुर भुवाल के नेतृत्व में नारायणपुर जिले के ग्राम नयनार से आए 13 सदस्यीय दल में जेनू राम सलाम, लच्छू राम, जैतू राम सलाम, राजीम सलाम, दिनेश करंगा, जयनाथ सलाम, मानसिंग करंगा, चन्द्रशेखर पोटाई, धनश्याम सलाम, जगनाथ सलाम, सुरेश सलाम तथा घोड़लापारा, ग्राम नयनार निवासी दिलीप गोटा शामिल रहे।

उल्लेखनीय है कि बस्तर अंचल की इस पारंपरिक कला टोली ने अपनी लोक-संस्कृति और नृत्य शैली से राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ की विशिष्ट पहचान को सशक्त रूप से प्रस्तुत किया।

संघ शताब्दी – राष्ट्रीय संकट के समय दिया एकजुटता का संदेश

1962 के भारत-चीन युद्ध को हम आज भी भूल नहीं पाते हैं। चीन ने भारत के विश्वास का कत्ल किया था। ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के नारे को धुंए में उड़ाकर चीन की कम्युनिस्ट सत्ता ने भारत पर अप्रत्याशित युद्ध थोप दिया था। हमारी सेना ने यथासंभव प्रतिकार किया। चीन को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया। भारतीय सेना के शौर्य को देखकर चीन को अपने कदम रोकने पड़े। हालांकि, इस युद्ध में हमने बहुत कुछ खो दिया था। राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी चीन के साथ खड़ी थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण संदेश दिया। संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिक अनुशासन, प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सहयोग, घायल जवानों के प्राणों की रक्षा के लिए रक्त की आपूर्ति, युद्ध क्षेत्र में सैन्य रसद पहुँचाने में सहयोग एवं हवाई पट्टियों की सुरक्षा सहित कई महत्वपूर्ण कार्यों में आगे बढ़कर सहयोग किया। संकट के समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति को देखकर संघ के विरोधी रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का हृदय भी परिवर्तित हो गया। यही कारण रहा कि सरकार ने 26 जनवरी, 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए अन्य नागरिक संगठनों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समविचारी संगठन भारतीय मजदूर संघ को भी राजपथ पर आमंत्रित किया। स्वयंसेवकों ने राष्ट्रीय एकजुटता के लिए अपने कर्तव्यों के निर्वहन का संदेश दिया।

राजपथ (अब कर्तव्य पथ) 26 जनवरी, 1963 की राष्ट्रीय परेड कई कारणों से महत्वपूर्ण है। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद देश का मनोबल डगमगाया हुआ था। ऐसे समय में राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन आवश्यक था। प्रश्न यह था कि जब भारतीय सेना सहित अन्य सुरक्षा बल भी सीमारेखा पर हैं, तब राष्ट्रीय परेड किस प्रकार सम्पन्न की जाए। सुरक्षा कारणों से सेना को वापस भी नहीं बुलाया जा सकता था और राष्ट्रीय परेड की परंपरा को भी नहीं तोड़ सकते थे। तब विचार आया कि उन नागरिक संगठनों को परेड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाए, जिन्होंने इस संकट की घड़ी में देश को संभालने में अपना योगदान दिया है। लोकसभा में 31 मार्च 1998 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह तथ्य सबके सामने रखा कि ऐसी परिस्थिति में किसी ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को सुझाव दिया कि इस बार परेड में ‘जनता का मार्च’ होना चाहिए। दिल्ली नगर निगम के महापौर द्वारा स्थापित ‘सर्वदलीय नागरिक परिषद’ ने विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, जिसे संघ के स्थानीय अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया। सरकार के आमंत्रण पर, केवल दो दिन की तैयारी में संघ के लगभग 3000 स्वयंसेवक राजपथ पर कदम से कदम मिलाकर संचलन कर रहे थे, जिसमें लगभग 100 स्वयंसेवकों का घोष दल भी शामिल था। अगले दिन समाचार पत्रों में स्वयंसेवकों की तस्वीरें भी प्रकाशित हुईं और संवाददाताओं ने यह भी संकेत दिया कि जनता के बीच सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र स्वयंसेवकों का अनुशासित दल ही था। दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ ने परेड की जो तस्वीरें प्रकाशित की, उसमें स्वयंसेवकों के संचलन की तस्वीर भी शामिल थी। हिन्दुस्तान में प्रकाशित समाचार में लिखा गया कि “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों का प्रदर्शन बहुत आकर्षक रहा”। इसी प्रकार, द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक समाचार में उल्लेख किया गया है कि संघ के अनुषांगिक संगठन ‘भारतीय मजदूर संघ’ ने भी परेड में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।

कुछ वर्षों तक कम्युनिस्ट एवं कांग्रेस समर्थित लेखकों/पत्रकारों ने 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के शामिल होने को सिरे से खारिज किया। लेकिन, जब उस समय के समाचारपत्रों में प्रकाशित चित्र, समाचार और सिलेक्टिव वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू में प्रकाशित सामग्री सामने आई, तब नए प्रकार के कुतर्क गढ़े जा रहे हैं। इस सबके बीच निर्विवाद सच यही है कि संकट के समय में संघ ने अपने कर्तव्यों का पालन किया और राष्ट्रीय परेड में हिस्सा लेकर राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। संघ विरोधी खेमे में यह खलबली उस समय भी थी, जब यह जानकारी सामने आई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय परेड में शामिल हो रहा है। दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ ने 25 जनवरी, 1963 को “रा. स्व. संघ भी परेड में भाग लेगा” शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया। कई लोगों ने संघ के स्वयंसेवकों को रोकने के लिए भरसक प्रयास किए, लेकिन उनको सफलता नहीं मिली।

जनवरी को कांग्रेस की एक बैठक में इस विषय में काफी चर्चा हुई। इसका विवरण सिलेक्टिव वर्क ऑफ जवाहरलाल नेहरू में प्रकाशित है। बैठक में पंडित नेहरू ने बताया था कि “कुछ कांग्रेसियों ने उनसे शिकायत की थी कि संघ वाले गाजियाबाद और मेरठ से वर्दीधारी लोग (स्वयंसेवक) जमा कर रहे हैं”। कांग्रेस के नेताओं ने पंडित के सामने यह दु:ख भी जाहिर किया कि हमारे पास इतनी वर्दी नहीं है। कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ता भी परेड में दिखायी नहीं दिए। तब प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उन लोगों को स्पष्ट कहा कि “मैं तो नहीं रोक सकता आरएसएस को आने से, (किसी को भी आने से रोकना) बहुत गलत बात है”। इसका अर्थ है कि सब प्रकार से जानकारी होने और कांग्रेसियों का विरोध होने के बाद भी नेहरू जी ने संघ को राष्ट्रीय परेड में शामिल होने दिया।

स्मरण रहे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1962 के युद्ध के समय ही नहीं, बल्कि उसके बाद हुए युद्धों में भी भारत सरकार के साथ खड़े रहकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी संघ ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था, रणनीतिक ठिकानों की पहरेदारी, सैनिकों के लिए भोजन एवं रसद की आपूर्ति, नागरिक सुरक्षा एवं अनुशासन का पालन कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने स्वयंसेवकों के कार्य की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की और आकाशवाणी पर उनके योगदान का जिक्र किया। याद हो कि युद्ध प्रारंभ होते ही राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ के साथ ऐतिहासिक चर्चा भी की थी। 1971 के युद्ध  के दौरान सैनिकों के लिए 24 घंटे भोजन एवं दवा की आपूर्ति, अपनी जान बचाकर भारत आए हिन्दू एवं मुस्लिम शरणार्थियों के लिए राहत शिविर, युद्ध में घायलों के लिए रक्तदान महायज्ञ और हवाई पट्टियों की मरम्मत जैसे कार्य स्वयंसेवकों ने किए। उनकी देशभक्ति एवं निःस्वार्थ सेवाभाव को देखकर सेना प्रमुख जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) सैम मानेकशॉ ने कहा था कि “इन युवाओं की निःस्वार्थ सेवा, फुर्ती और अनुशासन देखकर मुझे गर्व होता है। अगर सेना के बाद देश में कोई सबसे अनुशासित संगठन है, तो वह यही है”।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर भारत सरकार ने जिस स्मृति डाक टिकट को जारी किया है, उसमें भी 1963 की गणतंत्र दिवस में शामिल स्वयंसेवकों के समूह का चित्र शामिल किया गया है। इसके साथ ही एक दूसरे चित्र में सेवा एवं राहत कार्य करते स्वयंसेवक दिखायी दे रहे हैं। संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर सरकार ने एक बार फिर ‘राष्ट्र सेवा के 100 वर्ष’ की संघ यात्रा का स्मरण देशवासियों को कराया।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने India EU Trade Deal की सराहना की

India EU Trade Deal दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौतों के जरिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ के मिशन को मजबूत करता है

भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता भारत के वैश्विक व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक सफलता हासिल करता हुआ निर्णायक क्षण

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के ‘इंडिया फर्स्ट’ के सिद्धांत के नेतृत्व में भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता संबंधित सेक्टरों की सुरक्षा करता है

यह समझौता 99% भारतीय निर्यात के लिए अभूतपूर्व पहुंच हासिल कर समृद्धि के एक नए युग की शुरुआत है

यह समझौता टेक्सटाइल, कपड़े, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न, आभूषण, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान, चिकित्सा उपकरण, प्लास्टिक, रबर और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए नए अवसर उपलब्ध कराता है

‘पीपल फ्रेंडली’ व्यापार समझौतों के लिए एक नया बेंचमार्क स्थापित करते हुए यह कृषि निर्यात के लिए तरजीही बाज़ार पहुंच सुनिश्चित करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तेज़ी और महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि के लिए मंच तैयार करता है
भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के माध्यम से मोदी जी विभिन्न क्षेत्रों में अवसरों को खोलने, नई नौकरियाँ पैदा करने, नवाचार को बढ़ावा देने और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाकर हमारे युवाओं की वैश्विक आकांक्षाओं को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे

‘विकसित भारत 2047’ के विज़न के साथ तालमेल बिठाते हुए यह समझौता 17 उप-क्षेत्रों के स्वतंत्र पेशेवरों की सेवाएं प्रदान करके पूरे यूरोप में भारत की प्रतिभा को शक्ति प्रदान करता है

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता (India EU Trade Deal) भारत के वैश्विक व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक सफलता हासिल करता हुआ निर्णायक क्षण है। गृह मंत्री ने कहा कि वैश्विक प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की दूरदर्शी कूटनीतिक सोच को प्रदर्शित करती हुई यह डील दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौतों के माध्यम से एक भरोसेमंद, परस्पर लाभकारी और संतुलित साझेदारी सुनिश्चित करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ के भारत के मिशन को मजबूत करती है।

केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने X पर किए गए सिलसिलेवार पोस्ट में कहा, “India EU Trade Deal भारत के वैश्विक व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक सफलता हासिल करता हुआ निर्णायक क्षण है। एक वैश्विक प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की दूरदर्शी कूटनीतिक सोच को प्रदर्शित करती हुई यह डील दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौतों के माध्यम से एक भरोसेमंद, परस्पर लाभकारी और संतुलित साझेदारी सुनिश्चित करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ के भारत के मिशन को मजबूत करती है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए मोदी जी का हृदय से धन्यवाद और भारत के लोगों को बधाई।”

गृह मंत्री ने कहा, “प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के ‘इंडिया फर्स्ट’ के सिद्धांत के नेतृत्व में India EU Trade Deal संबंधित सेक्टरों की सुरक्षा करता है, साथ ही 99% भारतीय निर्यात के लिए अभूतपूर्व पहुंच हासिल करके समृद्धि के एक नए युग की शुरुआत करता है, जिससे टेक्सटाइल, कपड़े, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न, आभूषण, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान, चिकित्सा उपकरण और उपकरण, प्लास्टिक और रबर, और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए अवसरों की एक पूरी नई दुनिया खुलेगी। लोगों के अनुकूल व्यापार समझौतों के लिए एक नया बेंचमार्क स्थापित करते हुए यह कृषि निर्यात के लिए तरजीही बाजार पहुंच सुनिश्चित करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उछाल और महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि के लिए मंच तैयार करता है।”

श्री अमित शाह ने कहा, “India EU Trade Deal के माध्यम से मोदी जी हमारे युवाओं की वैश्विक आकांक्षाओं को नए ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए विभिन्न सेक्टरों में अवसरों को खोल रहे हैं, नई नौकरियां पैदा कर रहे हैं, इनोवेशन को बढ़ावा दे रहे हैं, और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ा रहे हैं। ‘विकसित भारत 2047’ के विजन के साथ तालमेल बिठाते हुए यह समझौता 17 उप-सेक्टरों के स्वतंत्र पेशेवरों को EU क्लाइंट्स को सेवाएं प्रदान करने में निश्चितता प्रदान करके, ज्ञान-आधारित व्यापार में रास्ते बनाकर, और भारत में प्रशिक्षित आयुष चिकित्सकों को EU सदस्य देशों में सेवाएं प्रदान करने का अवसर प्रदान करके पूरे यूरोप में भारत की प्रतिभा को शक्ति प्रदान करता है।”

ओडिशा – 30 जनजाति परिवारों के 151 लोगों ने की सनातन में वापसी

भुवनेश्वर। जनजाति बहुल जिले मयुरभंज के ठाकुरमुंडा प्रखंड में ईसाइयत में मतांतरित हुए 30 जनजाति परिवारों के 151 पुरुष व महिलाओं ने स्व-धर्म सनातन में वापसी की। घर वापसी करने वाले लोगों में संथाल, हो व गोंड जनजाति के लोग शामिल हैं। ये लोग मिशनरियों के बहकावे में आकर ईसाई बन गए थे, अब पारंपरिक रीति नीति के साथ स्वधर्म में वापसी की। कार्यक्रम में उपस्थित जनजाति समाज के अन्य लोगों ने घर वापसी करने वालों का स्वागत किया। रविवार 4 जनवरी को आयोजित घर वापसी कार्यक्रम में सैकड़ों पुरुष और महिलाएं शामिल हुए।

घर वापसी करने वाले परिवारों के सदस्यों ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व पादरियों के बहकावे में आकर अपनी मूल संस्कृति और परंपराओं से दूर हो गए थे। उस समय पादरियों द्वारा स्वास्थ्य को लेकर किए गए भ्रामक दावों के कारण उन्होंने कनवर्जन का निर्णय लिया था। परिवार के कुछ सदस्य जब गंभीर रूप से अस्वस्थ थे, तब पादरियों ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि ईसाई धर्म अपनाने से उनकी बीमारियां ठीक हो जाएंगी। इसी झांसे में आकर उन्होंने मतांतरण कर लिया।

हालांकि, मतांतरण के बाद उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक अलगाव का सामना करना पड़ा। वे अपने समाज से कट गए और अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों, त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों में भाग नहीं ले पा रहे थे। धीरे-धीरे उन्हें यह महसूस होने लगा कि वे अपनी ही जड़ों और अपने ही लोगों से दूर होते जा रहे हैं, जिससे मानसिक असंतोष और पीड़ा बढ़ती चली गई।

घर वापसी करने वाले प्रमुख व्यक्ति बंशीधर कालुंडिया ने बताया कि इस दौरान वनवासी कल्याण आश्रम और जनजाति सुरक्षा मंच के कार्यकर्ताओं ने उनसे लगातार संवाद बनाए रखा। कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान कनवर्जन में नहीं, बल्कि उचित उपचार और जागरूकता में है। कनवर्जन के नाम पर लोगों को उनके पूर्वजों की संस्कृति से काटना एक साजिश है। इसके बाद उन्हें वास्तविकता का बोध हुआ और उन्होंने घर वापसी का निर्णय लिया। अपने मूल धर्म और संस्कृति में लौटकर संतोष महसूस कर रहे हैं।

स्थानीय कार्यकर्ता शिव प्रसाद हेम्ब्रम ने बताया कि राज्य में गैर कानूनी तरीके से कनवर्जन पर रोक लगाने के लिए कानून बना हुआ है। लेकिन इस कानून का सही रूप से अनुपालन नहीं हो रहा है। यही कारण है कि मिशनरियां जनजातीय लोगों को विभिन्न प्रकार का झांसा देकर कनवर्ट कर रहे हैं। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि राज्य में कनवर्जन को रोकने के लिए जो कानून है, उसे सख्ती से लागू करे ताकि जनजातीय समुदाय के लोगों को अपने पूर्वजों की संस्कृति से उखाड़ने का जो प्रयास हो रहा, वह सफल न हो।

घर वापसी करने के बाद इन लोगों का जनजाति सुरक्षा मंच की ओर से स्वागत किया गया। यह कार्यक्रम मयूरभंज जिले के ठाकुरमुंडा ब्लॉक अंतर्गत बागदफा, जामनांडा और डंगाडिहा गांवों में आयोजित किया गया। हो जनजाति के धर्मगुरु मानाय पूर्ति ने इस अवसर पर आशीर्वचन प्रदान किया।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री विश्वेश्वर टुडु ने घर वापसी करने वाले परिवारों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि भारत के महापुरुषों जैसे स्वामी विवेकानंद से लेकर महात्मा गांधी तक कनवर्जन के खिलाफ थे। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ शक्तियां विभिन्न उपायों से भोले-भाले वनवासियों का कनवर्जन कराने के प्रयास में लगे हुए हैं तथा उनके पूर्वजों की संस्कृति से काट रहे हैं। इससे वनवासी समाज को सचेत रहने की आवश्यकता है।