संस्कृत विषय के प्रमाणपत्रीय पाठ्यक्रम का उद्‌घाटन एवं दीक्षारंभ समारोह का हुआ आयोजन

पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा IKS में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के द्वारा संस्कृत भाषा में एक सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स शुरू किया गया है l इसी समबन्ध में प्रमाण पत्रीय पाठ्यक्रम का उद्घाटन एवं दीक्षारंभ कार्यक्रम का आयोजन हुआ l

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० साच्चिदानन्द शुक्ला , तथा कार्य परिषद के वरिष्ठ सदस्य एवं विप्र महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ० मेघेश तिवारी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।समारोह में मुख्य वक्ता श्री दुधाधारी महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ० प्रवीण कुमार झारी थे।

कुलपति प्रो० साच्चिदानन्द शुक्लान कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक विरासत की मूलधारा है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल भारत की लगभग सभी महान ग्रंथ— वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत, रामायण, पुराण, आयुर्वेद, योग, ज्योतिष, वास्तु, दर्शनशास्त्र—सब संस्कृत में हैं। इन ग्रंथों की सही समझ केवल संस्कृत के माध्यम से ही संभव है। संस्कृत विज्ञान और गणित की प्राचीन तथा उन्नत भाषा है l संस्कृत में वैज्ञानिक भाषा की सबसे बड़ी विशेषता है: स्पष्टता (Precision) , बिना भ्रम के अभिव्यक्ति, कंप्यूटर-फ्रेंडली संरचना l NASA और कई विश्व के भाषाविदों ने इसे सबसे लॉजिकल और स्ट्रक्चर्ड लैंग्वेज माना है। संस्कृत भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत 80% से अधिक भारतीय भाषाओं की आधारभूत भाषा है।
यदि संस्कृत मजबूत होगी, तो हिन्दी, मराठी, बंगाली, उड़िया, कन्नड़, सभी भाषाएं समृद्ध होंगी। यह योग व आयुर्वेद की प्रामाणिक भाषा है l आज पूरी दुनिया योग और आयुर्वेद अपना रही है, पर उनकी असली व्याख्या और सूत्र संस्कृत में ही हैं।
उदाहरण: पतंजलि योगसूत्र, चरक-संहिता, सुश्रुत-संहिता आदि l संस्कृत भाषाई कौशल को बढ़ाती है संस्कृत सीखने से: तर्कशक्ति विकसित होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है, उच्चारण सुधरता है, व्याकरण और भाषा-ज्ञान में गहराई आती हैl संस्कृत राष्ट्र की एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है l भारत विविध भाषाओं वाला देश है। संस्कृत एक ऐसी भाषा है जो सभी क्षेत्रों को कुल-धर्म भाषा (Pan-Indian Language) की तरह जोड़ सकती हैl आज दुनिया भर में संस्कृत के

  • विश्वविद्यालय,
  • शोध केंद्र,
  • डिजिटल प्रोजेक्ट
  • भाषावैज्ञानिक अध्ययन
    तेजी से बढ़ रहे हैं। जिससे विश्व में संस्कृत भाषा की प्रतिष्ठा बढ़ रही है l
    यह इसकी वैश्विक महत्ता को प्रमाणित करता है l संस्कृत भारत की पहचान, बौद्धिक शक्ति, सांस्कृतिक मूल, वैज्ञानिक दृष्टि और आत्मगौरव की भाषा है। इसे अपनाना भारत की आत्मा को अपनाना है l

प्रो. ब्रम्हे ने बताया कि कार्यक्रम में 100 से अधिक विद्यार्थि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन केंन्द्र की शिक्षिका निशा मिश्रा ने किया। डॉ. मेघेश तिवारी ने छात्रों के लिए संस्निकृत के नियमित अध्ययन के साथ संस्कृत में प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम को उपयोगी बताया। विवि० के कुलअनुषासक प्रो. आशीष कुमार श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापित कर कार्यक्रम का समापन किया।

भारत का भविष्य केवल अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि संस्कृति, चरित्र और समन्वित ज्ञान से निर्धारित होगा – सुनील आंबेकर जी

काशी, 16 नवम्बर। काशी में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले साहित्यिक समागम “काशी शब्दोत्सव” के तृतीय संस्करण का शुभारम्भ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन सभागार में हुआ। समागम के उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी, मुख्य अतिथि श्रीहनुमन्निवास अयोध्या के श्रीमहंत आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत चतुर्वेदी थे।

सुनील आंबेकर जी ने कहा कि काशी में आधुनिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा का जो अद्वितीय संगम दिखाई देता है, वह हमारे राष्ट्र की वास्तविक शक्ति और दृष्टि का प्रतीक है। भारत की सांस्कृतिक धारा में नवीनता और परंपरा कभी परस्पर विरोधी नहीं रही; बल्कि नई परिस्थितियों के अनुरूप पुराने ज्ञान का पुनर्मूल्यांकन ही हमारी परंपरा का स्वभाव रहा है। समय चाहे कितना भी बदल जाए, भारत ने हमेशा यही दृष्टि रखी है कि पुराना और नया अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही प्रवाह के दो आयाम हैं। इसी विमर्श हेतु काशी में आयोजित काशी शब्दोत्सव आधुनिक विश्व के कल्याण का मंत्र देगा।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के समय भी यही भावना केंद्रीय थी- भारत के पारंपरिक ज्ञान को दुनिया के किसी भी कोने से आने वाले आधुनिक विज्ञान और तकनीक से जोड़कर एक समन्वित शिक्षा प्रणाली का निर्माण। इसी समन्वय ने पूरे देश में राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की और महाराष्ट्र सहित देश के कई भागों में राष्ट्रीय विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना हुई।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार स्वयं इसी राष्ट्रीय शिक्षा परंपरा का हिस्सा रहे। अंग्रेज़ी शासन के नील सिटी विद्यालय से वंदे मातरम् कहने पर निकाले जाने के बाद उनकी शिक्षा यवतमाल के राष्ट्रीय विद्यालय में हुई। आगे चलकर उन्होंने कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज में भी अध्ययन किया। जहाँ भारतीय परंपरा और विश्व के नवीनतम ज्ञान का संगम था। यह दर्शाता है कि, भारत ने दुनिया के नए ज्ञान को अपनाते हुए भी अपनी स्वयं की ज्ञानधारा को कभी छोड़ा नहीं, बल्कि उसे और समृद्ध किया।

इसी समन्वित दृष्टि के कारण भारत में ज्ञान की अनेक शाखाएँ विदेशी आक्रमणों और कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहीं। यदि यह प्रयास न होते, तो पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों का वह षड्यंत्र सफल होता जो भारतीय ज्ञान और संस्कृति को पूरी तरह समाप्त करना चाहते थे। परंतु हमारी परंपरा की शक्ति के कारण सरस्वती की धारा पुनः प्रवाहित हुई और आज भी हम उसके लाभार्थी हैं। काशी विश्वविद्यालय इसी अखंड परंपरा का सशक्त वाहक है।

आज दुनिया अत्याधुनिक तकनीकों – विशेषतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में प्रवेश कर चुकी है। पिछले तीन सौ वर्षों में तकनीक, मशीनों और बाज़ारों ने मानव जीवन को सुविधा तो दी, परंतु अनेक स्थानों पर मनुष्य और प्रकृति के बीच की संवेदनशीलता को क्षीण भी किया। दुनिया के कई देशों में ‘पारिवारिक ढाँचे, सामाजिक रिश्ते और पर्यावरण’ गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। मानव जीवन का मूल प्रश्न केवल तकनीकी उन्नति नहीं है, बल्कि यह है कि, तकनीक को नियंत्रित कौन करेगा? क्या मनुष्य तकनीक का चयन करेगा, या तकनीक और बाज़ार मनुष्य के जीवन का निर्धारण करेंगे? यही आगामी शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

भारत के सामने यह चुनौती है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाते हुए भी वह अपने ‘सांस्कृतिक मूल्यों – सात्विकता, करुणा, वसुधैव कुटुंबकम् और संतुलित जीवन’ को बनाए रखे। हमारी परंपरा में शक्ति और सात्विकता का मेल ही जीवन को कल्याणकारी बनाता है। शक्ति बिना सात्विकता के विनाश का कारण बनती है; परंतु शक्ति का उपयोग यदि नैतिकता, संयम और विश्व-कल्याण के लिए किया जाए, तो वह सृजन का आधार बनता है।

भारत ने कोविड-19 महामारी के समय इसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिया। विश्व के अनेक शक्तिशाली और सम्पन्न राष्ट्र वैक्सीन को बाज़ार और लाभ के दृष्टिकोण से देखते रहे, वहीं भारत ने उसे सेवा और मानवता के दृष्टिकोण से दुनिया के लिए उपलब्ध कराया। यह हमारे सांस्कृतिक संस्कारों का ही परिणाम था।

सुनील जी ने कहा कि आज भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार में निरंतर प्रगति हो रही है। लेकिन आर्थिक प्रगति के साथ-साथ एक नया विकास मॉडल तैयार करना आवश्यक है। जो केवल GDP आधारित न होकर संस्कृति, पर्यावरण, परिवार, नैतिकता और मानवता पर आधारित हो। पश्चिम के कई देशों ने यह भूल की है कि आर्थिक उन्नति ही जीवन का अंतिम उद्देश्य है और आज वे उसके दुष्परिणाम भोग रहे हैं। भारत को यह भूल दोहरानी नहीं चाहिए।

हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों तक समृद्धि और उत्कृष्ट संस्कृति – दोनों को साथ रखकर दिखाया था। आज हमें पुनः वही अवसर प्राप्त हो रहा है। इस अवसर को तभी सार्थक बनाया जा सकता है, जब हम तकनीकी प्रगति को भारतीय जीवन मूल्यों से जोड़ें। इस प्रक्रिया में चरित्र निर्माण सर्वोपरि है। चरित्रहीनता किसी भी समाज, संगठन या राष्ट्र की एकता को नष्ट कर देती है। अच्छे चरित्र का निर्माण भी किसी अन्य कौशल की तरह अभ्यास से ही होता है जो बचपन से शुरू होकर आजीवन चलता है।

भारत हजारों वर्षों तक विविधताओं के बावजूद इसलिए एकजुट रहा, क्योंकि उसके लोगों में उच्च चरित्र और नैतिकता थी। यदि आज समाज में तनाव, विभाजन और प्रवंचना दिखाई देती है, तो उसका मूल कारण चरित्र और संस्कारों की कमी है। इसलिए ‘व्यक्ति का चरित्र और राष्ट्र की आराधना’ दोनों साथ-साथ चलते हैं।

IIT मुंबई में चल रहा एआई और भारतीय ज्ञान–परंपरा का संयुक्त प्रकल्प इस बात का प्रमाण है कि भारत आधुनिक तकनीक को भी सांस्कृतिक दृष्टि से एकात्म करने की क्षमता रखता है। धर्म और संस्कृति को आधुनिक संदर्भ में समझना भी आज अत्यंत आवश्यक है। भारतीय संस्कृति बाइनरी या विभाजनकारी दृष्टि पर आधारित नहीं है। हम मुकाबले में नहीं, बल्कि परस्पर-पूरक दृष्टि में विश्वास रखते हैं। शहर-गाँव, पुरुष-स्त्री, परंपरा-आधुनिकता, विज्ञान-अध्यात्म, भाषा, ये सब विरोध नहीं, बल्कि एक ही अखंड संस्कृति के विविध रूप हैं।

उन्होंने कहा कि संवाद ही हमारी संस्कृति का मूल है। बिना संवाद परिवार, समाज और राष्ट्र नहीं टिक सकते। आज दुनिया में अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ केवल राजनीतिक संतुलन ढूँढती हैं। परंतु शांति का वास्तविक आधार संवाद, समझ और सहानुभूति ही है। भाषाई विवाद, क्षेत्रीय राजनीति, जातीय विभाजन – ये सब भारत की एकता के विरुद्ध षड्यंत्र हैं। काशी–तमिल संगम जैसी पहल यह दर्शाती है कि संवाद और संस्कृति के माध्यम से भारत की एकात्मता और अखंडता और अधिक सुदृढ़ हो सकती है।

अतः आधुनिक विकास और भारतीय संस्कृति को अलग-अलग देखना एक गंभीर भूल होगी। दोनों को जोड़कर ही भारत दुनिया को एक नया मानवीय, संतुलित और कल्याणकारी विकास मॉडल दे सकता है। इसी दिशा में काशी का यह उत्सव- भारतीय विचार, संस्कृति, संवाद और आधुनिक दृष्टि-सभी को एक मंच पर लाकर हमें मार्गदर्शन देता है और बताता है कि, भारत का भविष्य केवल अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि संस्कृति, चरित्र और समन्वित ज्ञान से निर्धारित होगा।

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि एवं अयोध्या हनुमन्ननिवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदनी शरण जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति “शब्दों में साँस लेती है”। कोई भी समाज अपने शब्दों को सहेजकर अपनी पहचान सुरक्षित रखता है। कबीर और रामानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि इनके माध्यम से काशी से समरसता का संदेश गया। आज की पीढ़ी अक्सर शब्दों को उतना महत्व नहीं देती, जितना देना चाहिए। हर शब्द की अपनी गर्माहट और शीतलता होती है, और शब्दोत्सव इन सूक्ष्मताओं को पुनः अनुभव कराने में सहायक है।

बीएचयू के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि यह उत्सव भारतीय संस्कृति के पुनरोद्धार और उसकी उन्नति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। उन्होंने प्रख्यात उड़िया रचनाकार उपेंद्र भज्ज के कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज के समाज को सांस्कृतिक दृष्टा चाहिए। इसी तरह के विमर्श से समाज को अगला कबीर और अगला शंकराचार्य मिलेगा जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन, और ज्ञानवर्धन करेगा। उन्होंने कहा कि शब्दोत्सव समाज को शब्दों, विचारों और भारत की शाश्वत सांस्कृतिक धरोहर को गहराई से जोड़ता है।

कार्यक्रम के संयोजक डॉ. हरेंद्र कुमार राय ने मंचस्थ सभी अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मंगलाचरण, द्वीप प्रज्ज्वलन एवं बीएचयू के छात्रों द्वारा कुलगीत की प्रस्तुति से हुआ। कार्यक्रम का संचालन डॉ. शुचिता त्रिपाठी ने किया।

लोकहित प्रकाशन लखनऊ द्वारा प्रकाशित पुस्तकों –  “कृतिरूप संघ दर्शन” के साथ ही “हिन्दू, हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति”, प्रो. उदय प्रताप सिंह की पुस्तक ”भक्त कालीन साहित्य और चित्तिमूलक विमर्श”, प्रो. रचना शर्मा की पुस्तक ”आजादी के रणबांकुरे और काशी”, डॉ. लहरीराम मीणा की पुस्तक “The Hope I left with” का लोकार्पण हुआ।

रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने ‘पंडुम कैफे’ का किया शुभारंभ

पंडुम कैफे का शुभारंभ बस्तर में नक्सल उन्मूलन की दिशा में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का प्रेरक प्रतीक – मुख्यमंत्री श्री साय

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने बस्तर में सामाजिक-आर्थिक बदलाव के नए अध्याय की शुरुआत करते हुए आज जगदलपुर में ‘पंडुम कैफ़े’ का शुभारंभ किया। यह कैफ़े नक्सली हिंसा के पीड़ितों और समर्पण कर चुके सदस्यों के पुनर्वास हेतु छत्तीसगढ़ सरकार की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसने हिंसा का मार्ग छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वालों को सम्मानजनक और स्थायी आजीविका प्रदान करने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है। यह अनूठी पहल संघर्ष से सहयोग तक के प्रेरणादायक सफर को दर्शाती है।‘पंडुम कैफ़े’ जगदलपुर के पुलिस लाइन परिसर में स्थित है।

 मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने 'पंडुम कैफे' का किया शुभारंभ

मुख्यमंत्री श्री साय ने ‘पंडुम कैफे’   में कार्यरत नारायणपुर की फगनी, सुकमा की पुष्पा ठाकुर, बीरेंद्र ठाकुर, बस्तर की आशमती और प्रेमिला बघेल के साथ सौहार्दपूर्ण बातचीत की। उन्होंने नई शुरुआत के लिए उनका हौसला बढ़ाया और ‘पंडुम कैफ़े’ के बेहतर संचालन के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं भी दीं।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि पंडुम कैफ़े का शुभारंभ बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का एक प्रेरक प्रतीक है। मुख्यमंत्री ने श्री साय ने कहा कि पंडुम कैफे आशा, प्रगति और शांति का उज्ज्वल प्रतीक है। कैफे में कार्यरत युवा, जो नक्सली हिंसा के पीड़ित तथा हिंसा का मार्ग छोड़ चुके सदस्य हैं, अब शांति के पथ पर अग्रसर हो चुके हैं। जिला प्रशासन और पुलिस के सहयोग से उन्हें आतिथ्य सेवाओं, कैफ़े प्रबंधन, ग्राहक सेवा, स्वच्छता मानकों, खाद्य सुरक्षा और उद्यमिता कौशल का गहन प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।

हिंसा का मार्ग छोड़कर शांति के पथ पर लौटे और कैफ़े में कार्यरत एक महिला ने इस अवसर पर भावुक होकर इस पुनर्वास पहल से हुए बदलाव की बात दोहराई। एक पूर्व माओवादी कैडर ने कहा कि,“हमने अपने अतीत में अंधेरा देखा था। आज हमें समाज की सेवा करने का यह अवसर मिला है, यह हमारे लिए एक नया जन्म है। बारूद की जगह कॉफी परोसना और अपनी मेहनत की कमाई से जीना—यह एहसास हमें शांति और सम्मान दे रहा है।”

एक अन्य सहयोगी ने अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि,“पहले हम अपने परिवार को सम्मानजनक जीवन देने का सपना भी नहीं देख सकते थे। अब हम अपनी मेहनत से कमाए पैसों से घर के सदस्यों का भविष्य संवार सकते हैं। यह सब प्रशासन और इस कैफ़े की वजह से संभव हुआ है।”

एक अन्य सदस्य ने समुदाय के सहयोग पर जोर देते हुए कहा कि,“हमें लगा था कि मुख्यधारा में लौटना आसान नहीं होगा, लेकिन पुलिस और जिला प्रशासन ने हमें प्रशिक्षण दिया और हमारा विश्वास जीता। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अब पीड़ितों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे हमें अपने अतीत के अपराधों को सुधारने और शांति स्थापित करने का अवसर मिला है।”

उन्होंने यह भी बताया कि ‘पंडुम’ बस्तर की सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाता है, और इसकी टैगलाइन “जहाँ हर कप एक कहानी कहता है” इस बात का प्रतीक है कि यहाँ परोसी गई कॉफी सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष पर विजय और एक नई शुरुआत की कहानी भी अपने साथ लेकर आती है।

इस अवसर पर वन मंत्री श्री केदार कश्यप, शिक्षा मंत्री श्री गजेन्द्र यादव, सांसद श्री महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक श्री किरण सिंह देव, चित्रकोट विधायक श्री विनायक गोयल, बेवरेज कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष श्री श्रीनिवास राव मद्दी, अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष श्री रूपसिंह मंडावी, जगदलपुर महापौर श्री संजय पांडे, जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती वेदवती कश्यप, संभागायुक्त श्री डोमन सिंह, पुलिस महानिरीक्षक श्री सुन्दरराज पी., कलेक्टर श्री हरिस एस., पुलिस अधीक्षक श्री शलभ सिन्हा सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण एवं वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारीगण भी उपस्थित थे।

सनातन विचार ही एकात्म मानव दर्शन है – डॉ. मोहन भागवत जी

जयपुर, 15 नवम्बर। आज एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान की ओर से आयोजित दीनदयाल स्मृति व्याख्यान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि सनातन विचार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने देश, काल, परिस्थिति के अनुसार एकात्म मानव दर्शन का नया नाम देकर लोगों के समक्ष रखा। यह विचार नया नहीं है, 60 वर्ष बाद भी वर्तमान समय में यह एकात्म मानव दर्शन पूरे विश्व के लिए प्रासंगिक है।

एकात्म मानव दर्शन को एक शब्द में समझना है तो वह शब्द है धर्म। इस धर्म का अर्थ रिलिजन, मत, पंथ, संप्रदाय नहीं है। इस धर्म का तात्पर्य गंतव्य से है, सब की धारणा करने वाला धर्म है। वर्तमान समय में दुनिया को इसी एकात्म मानव दर्शन के धर्म से चलना होगा। सरसंघचालक जी ने कहा कि भारतीय जब भी बाहर गए किसी को लूटा नहीं, किसी को पीटा नहीं, सबको सुखी किया।

भारत में भी पिछले कई दशकों में रहन-सहन, खानपान, वेशभूषा सब बदला होगा, किंतु सनातन विचार नहीं बदला। वह सनातन विचार ही एकात्म मानव दर्शन है और उसका आधार यह है कि सुख बाहर नहीं, हमारे भीतर ही होता है। हम अंदर का सुख देखते हैं, तब समझ में आता है कि पूरा विश्व एकात्म है। इस एकात्म मानव दर्शन में अतिवाद नहीं है।

उन्होंने कहा कि सत्ता की भी मर्यादा है। सबका हित साधते हुए अपना विकास करना यह वर्तमान समय की आवश्यकता है। पूरे विश्व में अनेक बार आर्थिक उठापटक होती हैं, लेकिन भारत पर इसका असर सबसे कम होता है क्योंकि भारत के अर्थतंत्र का आधार यहां की परिवार व्यवस्था है।

डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि वर्तमान में विज्ञान की प्रगति चरम पर जा रही है। विज्ञान के आधार पर सबका जीवन भौतिक सुविधाओं से संपन्न हो, ऐसे प्रयास हो रहे हैं। लेकिन क्या मनुष्य के मन में शांति और संतोष भी बढ़ रहा है। विज्ञान की प्रगति के कारण बहुत सी नई दवाइयां बनी हैं, किंतु क्या स्वास्थ्य पहले की तुलना में अधिक ठीक हुआ है। कुछ बीमारियों का तो कारण ही कुछ दवाइयां हैं।

उन्होंने कहा कि हमारे यहां प्रारंभ से ही अनेक विषयों में विविधता रही है, लेकिन हमारे यहां की विविधता कभी झगड़े का कारण नहीं बनी। अपितु हमारे यहां की विविधता उत्सव का विषय बनी। हमारे यहां पहले से अनेक देवी देवता थे, कुछ और भी आ गए तो हमें कोई समस्या नहीं हुई। उन्होंने कहा कि दुनिया यह तो जानती है कि शरीर, बुद्धि और मन का सुख होता है। लेकिन उसे एक साथ कैसे प्राप्त किया जाए, यह दुनिया नहीं जानती। यह केवल भारत जानता है क्योंकि भारत में शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा सभी के सुख का विचार है।

कार्यक्रम की प्रस्तावना एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा ने रखी। उन्होंने कहा कि संपूर्ण सृष्टि एकात्म है। सृष्टि का एक कण भी हिलता है तो संपूर्ण सृष्टि पर असर दिखता है। इस समय वंदे मातरम् की रचना का 150वां वर्ष चल रहा है और वर्तमान परिस्थितियों में पूरा वंदे मातरम् गाना अत्यंत आवश्यक है।

स्वास्थ्य कल्याण ग्रुप के निदेशक डॉ. एस.एस. अग्रवाल ने आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया एवं डॉ. नर्बदा इंदौरिया ने कार्यक्रम का संचालन किया।

ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म की सामग्री का नियमन हो

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि समाज की गरिमा और नैतिकता को नष्ट करने की छूट दी जाए

17वां राष्ट्रीय अधिवेशन, 7, 8, 9 नवंबर 2025 – रीवा

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के रीवा अधिवेशन -2025 में पारित प्रस्ताव

परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई, और परोपकराय सताम् विभूतयः की मान्यता पर आधारित हमारी संस्कृति आज अति भौतिकता से प्रभावित होकर बाजारवाद का संत्रास झेल रही है। आज हम जिस घोर व्यावसायिक समय में जी रहे हैं, उसने जीवन के मूलभूत संसाधनों को व्यापार में परिवर्तित कर दिया है। तकनीकों पर बाजारवादी शक्तियों का नियंत्रण है। इसी की परिणति है कि डिजिटल मीडिया का एक अति विशाल उद्योगतंत्र खड़ा हो गया है तथा पारंपरिक प्रसारण माध्यमों की जगह ऑनलाइन स्ट्रीमिंग ने ले ली है। ओवर-द-टॉप (ओटीटी) के सभी प्लेटफॉर्म और गेमिंग एप्स पर अधिकांश मनोरंजन की सामग्री का स्वरूप बदलकर नकारात्मक एवं जीवन मूल्यों रहित होता जा रहा है।

मनोरंजन के नाम पर इनके द्वारा जो हिंसक, अश्लील एवं मर्यादाहीन सामग्रियां परोसी जा रही हैं, वे अत्यंत लज्जास्पद एवं निंदनीय हैं। ये युवावर्ग और बालमन व मस्तिष्क में उग्रता, अश्लीलता, विकृत यौनाचार और नशाखोरी जैसे दुराचारों को महिमा मंडित कर उन्हें अधोपतन की ओर अग्रसित कर रही हैं। इन माध्यमों में प्रदर्शित अधिकांश दृश्य, वोकिज़्म और नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाली होती हैं। आज इस तरह के प्लेटफॉर्म और गेमिंग एप्स युवाओं को आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रहे हैं। साथ ही अधिकांश प्लेटफॉर्म भारत के सांस्कृतिक मूल्यों एवं परम्पराओं पर आघात कर उनको विकृत रूप में चित्रित करती हैं। इनका अनियंत्रित प्रसारण समाज एवं राष्ट्र जीवन के लिए अत्यधिक घातक है।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जो भारतीय साहित्य, संस्कृति और चिंतन के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए समर्पित है, इस गंभीर स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। परिषद का यह मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि समाज की गरिमा और नैतिकता को नष्ट करने की छूट दी जाए। स्वतंत्रता और अनुशासन, सृजन और मर्यादा, ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

अतः यह अधिवेशन भारत सरकार तथा सभी राज्य सरकारों से मांग करता है कि –

  1. ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म एवं गेमिंग एप्स पर प्रसारित होने वाली प्रत्येक सामग्री के परीक्षण, नियमन, और वर्गीकरण हेतु शासन द्वरा एक सशक्त, स्वायत्त विधायी नियामक संस्था का गठन किया जाए।
  2. डिजिटल माध्यमों में प्रस्तुत किसी भी दृश्य, संवाद या विचार जो भारत की संविधानिक गरिमा, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक मूल्यों या सामाजिक मर्यादा और सनातन परंपरा को आहत करते हों, उन पर कड़ी निगरानी रखी जाए।
  3. किशोरों और युवाओं के लिए उपयुक्त सामग्री के आयु आधारित नियंत्रण तंत्र को अनिवार्य बनाया जाए।
  4. जो मंच या माध्यम अश्लीलता, हिंसा, नशाखोरी या विकृत जीवन मूल्यों का प्रचार करते हैं, उनके विरुद्ध कठोर कानूनी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
  5. भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संवर्धन हेतु भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक मनोरंजन माध्यमों को प्रोत्साहित किया जाए।

अंत में, अखिल भारतीय साहित्य परिषद का मानना है कि साहित्य, संस्कृति और समाज की शुचिता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब जनमानस में सजगता, संवेदनशीलता और नैतिकता बनी रहे। अतः अखिल भारतीय साहित्य परिषद भारत सरकार तथा सभी राज्य सरकारों से यह मांग करती है कि उपर्युक्त सभी विषयों का संज्ञान लेकर इस दिशा में उचित कदम उठाए।

सहकार, कृषि और उद्योग हमारे विकास के आधार स्तंभ – डॉ. मोहन भागवत जी

संघ शताब्दी के उपलक्ष्य में कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में ‘उद्यमी संवाद – नए क्षितिज की ओर’ कार्यक्रम

विविधताओं को कैसे संभालना है, यह भारत को पूरी दुनिया को सिखाना है

राष्ट्र को परम वैभव संपन्न बनाने के लिए सबको साथ चलना है

जयपुर, 13 नवम्बर । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा कि विविधताओं को कैसे संभालना है, यह हमें दुनिया को सिखाना है क्योंकि दुनिया के पास ऐसा तंत्र नहीं है जो भारत के पास है।

सरसंघचालक जी गुरुवार को संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर ‘100 वर्ष की संघ यात्रा श्रृंखला’ के अंतर्गत कॉन्स्टीट्यूशन क्लब, जयपुर के पृथ्वीराज चौहान सभागार में ‘उद्यमी संवाद – नए क्षितिज की ओर’ कार्यक्रम में राजस्थान के प्रमुख उद्यमियों को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संघ को प्रत्यक्ष अनुभव किए बिना संघ के बारे में राय मत बनाइए। संघ से जुड़ने के लिए शाखा में आइए, जो आपको अनुकूल लगे वह काम आप कर सकते हैं। संघ पूरे समाज को ही संगठित करना चाहता है। पूरा समाज संघ बन जाए यानी प्रमाणिकता से, निःस्वार्थ बुद्धि से सब लोग देश के लिए जिएं।

उन्होंने कहा कि संघ के 100 वर्ष की यात्रा पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम कोई सेलिब्रेशन नहीं है, बल्कि आगे के चरण की दृष्टि से अपने कार्य की वृद्धि का विचार करने के लिए कार्यक्रम किए जा रहे हैं। राष्ट्र को परम वैभव संपन्न और विश्वगुरु बनाना किसी एक व्यक्ति के वश में नहीं है। यह सबका काम है और इसके लिए सबको साथ लेकर चलना है।

उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना किसी एक विषय को लेकर नहीं हुई। संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार क्रांतिकारी थे। वे इंडियन नेशनल कांग्रेस के बहुत सक्रिय कार्यकर्ता थे। उसके आंदोलनों में संघ स्थापना के पहले और एक बार स्थापना के बाद, दो बार जेल गए। जो देश हित और समाज हित में चल रहा था, उसमें वह सक्रिय रहे। असहयोग आंदोलन में उन पर राजद्रोह का अभियोग लगा। उन्होंने बचाव में पक्ष रखना चुना क्योंकि इससे दोबारा भाषण का मौका मिलता। उनके बचाव भाषण को सुनकर जज को कहना पड़ा कि उनका बचाव भाषण पहले भाषण से भी अधिक राजद्रोही है। डॉ. हेडगेवार ने अनुभव किया कि समाज में डेढ़ हजार साल से जो दुर्गुण आ रहे थे, उन्हें दूर करना जरूरी है। उन्हें महसूस हुआ कि संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित किए बिना भारत इस पुरानी बीमारी से मुक्त नहीं होगा। इसलिए उन्होंने एक दशक तक विचार और प्रयोगों के बाद संघ की स्थापना की।

सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ किसी को नष्ट करने के लिए नहीं बना है। भारत वर्ष में हमारी पहचान हिन्दू है। हिन्दू शब्द सबको एक करने वाला है। हमारा राष्ट्र संस्कृति के आधार पर एक है, न कि राज्य के आधार पर। पुराने समय में जब राज्य अनेक थे तब भी हम एक देश थे, पराधीन थे तब भी एक देश थे। उन्होंने कहा कि समाज की स्वस्थ अवस्था का नाम समाज का संगठन है। संघ व्यक्ति निर्माण का काम करता है। संघ स्वयंसेवक तैयार करता है, स्वयंसेवक बाकी सब काम करते हैं।

उन्होंने संघ कार्य के आगामी चरण के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि सारा समाज देश हित में जिए, ये संघ का आगे का काम है। समाज की सज्जन शक्ति जागृत हो, सामाजिक समरसता का वातावरण बने और मंदिर, पानी, शमशान सबके लिए खुले होने चाहिए। परिवार के सभी सदस्य सप्ताह में कम से कम एक बार एकत्र आएं और अपना भोजन एवं भजन, अपनी भाषा और अपनी परंपरा के अनुसार करें। पानी बचाने, पेड़ लगाने और प्लास्टिक हटाने जैसे पर्यावरण संरक्षण के कार्यों के लिए भी हमें आगे आना चाहिए। स्व का बोध और स्वदेशी का भाव सबके मन में जागृत हो, देश स्वनिर्भर बने। नागरिक कर्तव्य और नागरिक अनुशासन के प्रति हम सजग बनें और नियम, कानून, संविधान का पालन करें।

सारा समाज एक बनकर अपना-अपना काम अपनी-अपनी पद्धति से करे ताकि हम सभी एक दूसरे के बाधक नहीं, बल्कि पूरक बनें।

उन्होंने कहा कि सहकार, कृषि और उद्योग हमारे विकास के आधार स्तंभ हैं। कृषि, व्यापार, उद्योग परस्पर साथ आकर, परस्पर निर्भर होकर तीनों एक साथ प्रगति करें। छोटे और मध्यम उद्योग अर्थव्यवस्था को विकेंद्रित करते हैं। इन उद्योगों को अपने देश के अंदर सुचारू रूप से चलने का वातावरण देना, ये बड़े उद्योगों का काम है। छोटे उद्योगों को रोजगार, कौशल, उत्पादन की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ाना चाहिए।

इससे पूर्व राजस्थान क्षेत्र संघचालक रमेश चंद्र अग्रवाल ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखी। कार्यक्रम का संचालन डॉ. हेमंत सेठिया ने किया।

स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी अधीनता से मुक्ति नहीं, स्वदेशी तंत्र का निर्माण करना भी है – पराग अभ्यंकर जी

भुवनेश्वर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भुवनेश्वर महानगर द्वारा उत्कल विश्वविद्यालय के दीक्षांत ऑडिटोरियम में आयोजित युवा सम्मेलन के समापन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख पराग अभ्यंकर ने कहा कि स्वतंत्रता का सच्चा अर्थ केवल विदेशी अधीनता से मुक्ति नहीं है, बल्कि अपनी उन्नति और राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए स्वदेशी तंत्र का निर्माण करना भी है।

उन्होंने कहा कि 15 अगस्त, 1947 को स्वाधीनता मिल गई अर्थात् किसी की अधीनता से मुक्त हो गए, आजाद हो गए। अपने निर्णय लेने के लिए अंग्रेज वायसराय पर डिपेंडेंट नहीं थे, इसलिए हम इंडिपेंडेंट कहलाए। अपनी नियति डेस्टिनी का निर्णय करने के लिए सक्षम हो गए। परन्तु स्वतंत्रता का सच्चा अर्थ है अपनी वास्तविक उन्नति, लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अपना तंत्र निर्माण कर लेना। उन्होंने कहा कि आज भी हमारी पहचान “इंडिया दैट इज़ भारत” के रूप में होती है, जबकि केवल “भारत” या “हिंदुस्तान” नाम ही स्वीकार करना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों तक जिस शिक्षा, न्याय और आर्थिक नीति के तंत्र के माध्यम से हमने विश्वगुरु तथा सोने की चिड़िया का दर्जा प्राप्त किया था, उसे भूलकर गुलामी के दौर की ही शिक्षा, न्याय और आर्थिक नीति पर हमारा शासन तंत्र गत 75 वर्षों तक चला। अर्थात्, हमने अपने तंत्र को अपनाने के बजाय विदेशी तंत्र को स्वीकार किया। जब हम प्राचीन भारतीय नीतियों को अपनाएंगे, तभी हम वास्तव में स्वतंत्र कहलाएंगे। जब भारत अपने प्राचीन भारतीय नीतिगत तंत्र को पुनः स्थापित करेगा, तभी हम सच्चे अर्थों में स्वतंत्र कहलाएंगे।

भारत की विश्व के प्रति क्या भूमिका है, यह स्वामी विवेकानंद जी ने 1897 में लाहौर के भाषण में बताया था। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के 1897 के लाहौर भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की नियति विश्व बंधुत्व और शांति के जीवन मूल्यों को पूरे विश्व में फैलाने की है। इन जीवन मूल्यों को समाज के प्रत्येक व्यक्ति के भीतर जागृत करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा “जब त्याग और सेवा की भावना समाज तथा शासन – दोनों के तंत्र में प्रतिष्ठित होगी, तभी हम कह सकेंगे कि सच्चा स्वातंत्र्य प्राप्त हुआ है।”

उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गत 100 वर्षों से इसी कार्य में लगा हुआ है। युवाओं की सहभागिता से इसे आगे बढ़ाना है।

उत्कल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यज्ञेश्वर दण्डपाट समापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इससे पहले सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. श्रीकांत मिश्र ने कहा कि संघ अपने 100 वर्षों के कार्यकाल में अपने लक्ष्य की दिशा में निरंतर प्रगति कर रहा है। मुख्य वक्ता ओडिशा (पूर्व) प्रांत के बौद्धिक प्रमुख तन्मय महापात्र ने कहा कि भारत की महान संस्कृति, शिक्षा, इतिहास और स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण विदेशों में भी प्रतिष्ठित थी। देश के निर्माण में युवाओं की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण रही है और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान युवाओं का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सदैव वैज्ञानिक रही है। जब संपूर्ण विश्व अंधकार में था, तब भारत का ज्ञान-विज्ञान विश्व को नया मार्ग दिखा रहा था।

“पंच परिवर्तन” विषय पर प्रश्न मंच का आयोजन किया गया, तथा स्वच्छता और पर्यावरण पर आधारित नाटकों का मंचन भी हुआ। युवा सम्मेलन में 1,700 से अधिक युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण था मनोज़ साहू का सैंड आर्ट प्रदर्शन। इसके अलावा, युवाओं ने देशभक्ति गीतों और नृत्य कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

लखनऊ की महिला डॉक्टर की कार से AK-47 और कारतूस बरामद, पुलिस ने किया गिरफ्तार

लखनऊ की एक महिला डॉक्टर शाहीन शाहिद को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सोमवार को गिरफ्तार किया। शाहीन के कब्जे से एके-47 बरामद हुई है। डाक्टर शाहीन को जम्मू-कश्मीर पुलिस अपने साथ ले गई है।

जानकारी के अनुसार, डॉ. शाहीन शाहिद लखनऊ में लालबाग मोहल्ले की रहने वाली है। पुलिस को जानकारी मिली कि शाहीन, फरीदाबाद आतंकी साजिश में गिरफ्तार डॉक्टर मुजम्मिल की सहयोगी है। मुजम्मिल जिस कार का इस्तेमाल करता था। वह कार डॉ. शाहीन के नाम पर है। शाहीन की कार से ही एके-47 राइफल और कुछ जिंदा कारतूस और अन्य संदिग्ध सामग्री बरामद की गई है।

पुलिस की विवेचना में पाया गया कि डॉ. शाहीन शाहिद कई संदिग्ध आतंकियों के संपर्क में थी। शाहीन, पाकिस्तान के आतंकियों के भी संपर्क में थी। पुलिस का कहना है कि भारत के कई हिस्सों में आतंकी गतिविधियों को संचालित करने का षड्यंत्र रचा जा रहा था। अभी तक इस मॉड्यूल से सम्बन्धित सात अभियुक्तों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गिरफ्तार आठ आरोपियों में तीन डॉक्टर शामिल हैं और इस कार्रवाई में 2,900 किलोग्राम विस्फोटक बरामद किया गया है। जांच में पता चला है कि यह ‘व्हाइट कॉलर’ आतंकी मॉड्यूल जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवत-उल-हिंद जैसे संगठनों से जुड़ा हुआ है।

जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और हरियाणा पुलिस के साथ केंद्रीय एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई में यह बड़ी सफलता मिली है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मॉड्यूल का खुलासा तब हुआ, जब पुलिस ने दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में सरकारी मेडिकल कॉलेज (GMC) में काम कर चुके डॉ. आदिल अहमद को गिरफ्तार किया। डॉ. आदिल की गिरफ्तारी सहारनपुर से हुई थी। डॉ. आदिल की निशानदेही पर ही डॉ. मुजम्मिल शकील को पकड़ा गया। GMC अस्पताल में डॉ. आदिल के लॉकर से पुलिस ने AK-47 राइफल और अन्य हथियार बरामद किए गए थे। जांच में सामने आया कि डॉ. आदिल आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा हुआ था और कश्मीर में जैश नेटवर्क को फिर से खड़ा करने की साजिश रच रहा था।

वंदे मातरम् – राष्ट्र चेतना का अमर मंत्र

राष्ट्र गीत “वंदे मातरम्” ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और यह 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था। “वंदे मातरम्” संस्कृत पद है, जिसका अर्थ “मैं तेरी वंदना करता हूँ, हे मातृभूमि” अथवा “हे माँ, मैं तुझे नमन करता हूँ”, है।

अभी हाल ही में जबलपुर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने मातृभूमि की आराधना और राष्ट्र जीवन में चेतना का संचार करने वाले इस दिव्य मंत्र वंदे मातरम् की रचना के 150वें वर्ष पर इसके रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए कृतज्ञ श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस पावन अवसर पर संघ ने सभी स्वयंसेवकों एवं देशवासियों से आह्वान किया है कि वे अपने हृदय में वंदे मातरम् की प्रेरणा जागृत करें और “स्व” की भावना पर आधारित राष्ट्र पुनर्निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लें। सरकार्यवाह जी ने कहा कि इस प्रेरणादायी यात्रा में सभी जन उत्साहपूर्वक सहभागी बनें, जिससे यह भावी पीढ़ियों के लिए राष्ट्रीय एकता, समर्पण और गौरव का प्रकाश स्तंभ बनी रहे।

1875 में रचित वंदे मातरम् भारत जागरण की घोषणा बन गया। 1896 में कोलकाता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने स्वरबद्ध कर गाया, जिससे पूरा सभागार देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत हो उठा। उस क्षण से वंदे मातरम् मात्र एक गीत नहीं रहा – यह भारत माता की आराधना का मंत्र, राष्ट्रीय उद्घोष, राष्ट्रीय चेतना की वाणी और राष्ट्रात्मा की अनुगूंज बन गया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदे मातरम् ने स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों और सामान्य जन को उत्साह और बलिदान की भावना से एक सूत्र में बांध दिया। बंग-भंग आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक, यह उद्घोष हर देशभक्त की प्रेरणा बना रहा।

इसका व्यापक प्रभाव इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि महर्षि अरविंद, मैडम भीकाजी कामा, महाकवि सुब्रह्मण्य भारती, लाला हरदयाल और लाला लाजपत राय जैसे महान व्यक्तित्वों ने अपने पत्र-पत्रिकाओं में वंदे मातरम् को अपनाया। महात्मा गांधी भी वर्षों तक अपने पत्रों का समापन वंदे मातरम् से करते थे।

राष्ट्रात्मा का गीत

वंदे मातरम् केवल शब्दों का संग्रह नहीं – यह राष्ट्रात्मा का गीत है, जो हर भारतीय हृदय को प्रेरित करता है। इसकी दिव्य अनुगूंज आज भी समाज में मातृभूमि के प्रति समर्पण, एकता और गौरव की भावना भरती है, यहाँ तक कि 150 वर्षों के बाद भी।

जब क्षेत्र, भाषा और जाति के आधार पर विभाजन बढ़ते दिखाई देते हैं, तब वंदे मातरम् वह एक सूत्र है जो संपूर्ण समाज को “भारतत्व” की एक ही भावना में जोड़ता है। यह भारत के सभी प्रांतों, समुदायों और भाषाओं में समान रूप से स्वीकार्य है – इसीलिए यह राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक एकात्मता का सशक्त प्रतीक बन गया है।

राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रनिर्माण के पुनर्जागरण काल में वंदे मातरम् की भावना को आत्मसात कर जीवन में उतारना आवश्यक है। इसका उच्चारण केवल वाणी का कार्य नहीं, बल्कि यह देशभक्ति का आध्यात्मिक साधन और सांस्कृतिक मूल्यों का स्रोत है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर जी) के लिए वंदे मातरम् केवल नारा नहीं, बल्कि देशभक्ति, संगठन और स्वतंत्रता का मूल मंत्र था।

नागपुर में छात्र जीवन के आरंभिक काल से ही डॉक्टर जी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से गहराई से प्रभावित थे। उस समय ब्रिटिश शासन में वंदे मातरम् कहना अपराध माना जाता था। किंतु डॉक्टर जी के नेतृत्व में विद्यार्थियों ने एक ब्रिटिश निरीक्षक का स्वागत “वंदे मातरम्” के उद्घोष से किया। इस कार्य के लिए उन्हें विद्यालय से निलंबित कर दिया गया और सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पर रोक लगा दी गई – यही वह क्षण था जब उनके भीतर राष्ट्रीयता की ज्वाला प्रज्वलित हुई, जिसने आगे चलकर एक महान संगठन की स्थापना की राह दिखाई।

1925 में जब डॉक्टर जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, तब वंदे मातरम् की भावना संघ की प्रत्येक गतिविधि, प्रार्थना और अनुशासन का अभिन्न अंग बन गई। उनका दृढ़ विश्वास था – “हमारा राष्ट्र केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, वह हमारी माता है। वंदे मातरम् उसके प्रति हमारी श्रद्धा की वाणी है।”

अपने प्रारंभ से लेकर आज तक वंदे मातरम् को प्रत्येक स्वयंसेवक के जीवन में राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान का स्थान प्राप्त है। आज भी कई कार्यक्रमों और सभाओं का समापन स्वयंसेवकों द्वारा इसके श्रद्धापूर्ण गायन से होता है। खेल और प्रशिक्षण के समय भी गण-शिक्षक (प्रशिक्षक) स्वयंसेवकों के साथ मिलकर वंदे मातरम् का सामूहिक उच्चारण कराते हैं – यह अनुशासन, एकता और मातृभूमि के प्रति प्रेम का प्रतीक है। इसके माध्यम से संघ निरंतर देशभक्ति, सेवा और अनुशासन की भावना का विकास करता आ रहा है।

डॉ. हेडगेवार के लिए वंदे मातरम् केवल क्रांति का प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आध्यात्मिक आधारशिला थी। वे इसे राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्र की जीवंत आत्मा के जागरण के रूप में देखते थे।

डॉक्टर जी स्वयंसेवकों से कहा करते थे कि यह पवित्र उद्घोष प्रत्येक भारतीय हृदय में भक्ति, अनुशासन और त्याग की भावना जागृत करे। उनका विश्वास था कि जब तक भारतीयों के हृदय से वंदे मातरम् की गूंज उठती रहेगी, तब तक भारत की आत्मा जीवित रहेगी।

आज जब हम वंदे मातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने का उत्सव मना रहे हैं, तब डॉ. हेडगेवार का यह वाक्य स्मरणीय है – “हमारा कर्तव्य केवल वंदे मातरम् गाना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में जीना है।”

हमारी यही प्रार्थना और प्रेरणा है कि –

हर मुख से एक स्वर में वंदे मातरम् की गूंज उठे।

इस अनादि प्रेरणा से हर नागरिक समर्पित देशभक्त बने, और एक सशक्त, एकात्म व आत्मनिर्भर भारत की रचना में योगदान दे।

हर हृदय और भारत के हर कोने से एक ही स्वर उठे —

वंदे मातरम्! भारत माता की जय!

बिनन्दा खुन्द्राकपम

सह प्रान्त प्रचारक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मणिपुर प्रान्त

राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के 150 वर्ष होने पर माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक
30-31 अक्टूबर-1 नवम्बर 2025, जबलपुर
 
माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य

राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के 150 वर्ष
मातृभूमि की आराधना और संपूर्ण राष्ट्र जीवन में चेतना का संचार करने वाले अद्भुत मन्त्र “वंदेमातरम्” की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के शुभ अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रगीत के रचयिता श्रद्धेय बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता है। 1875 में रचित इस गीत को 1896 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राष्ट्रकवि श्रद्धेय रविंद्रनाथ ठाकुर ने सस्वर प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था। तब से यह गीत देशभक्ति का मंत्र ही नहीं अपितु राष्ट्रीय उद्घोष, राष्ट्रीय चेतना तथा राष्ट्र की आत्मा की ध्वनि बन गया।
तत्पश्चात बँग-भंग आंदोलन सहित भारत के स्वाधीनता संग्राम के सभी सैनानियों का घोष मंत्र “वंदेमातरम्” ही बन गया था। इस महामंत्र की व्यापकता को इस बात से समझा जा सकता है कि देश के अनेक विद्वानों और महापुरुषों जैसे महर्षि श्रीअरविंद, मैडम भीकाजी कामा, महाकवि सुब्रमण्यम भारती, लाला हरदयाल, लाला लाजपत राय आदि ने अपने पत्र पत्रिकाओं के नाम में वंदेमातरम् जोड़ लिया था। महात्मा गांधी भी अनेक वर्षों तक अपने पत्रों का समापन “वंदेमातरम्” के साथ करते रहे।
“वंदेमातरम्” राष्ट्र की आत्मा का गान है जो हर किसी को प्रेरणा देता है। वंदेमातरम् अपने दिव्य प्रभाव के कारण 150 वर्षों के बाद भी संपूर्ण समाज को राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना से ओत-प्रोत करने की सामर्थ्य रखता है। आज जब क्षेत्र, भाषा, जाति आदि संकुचितता के आधार पर विभाजन करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब “वंदेमातरम्” वह सूत्र है, जो समाज को एकता के सूत्र में बांधकर रख सकता है। भारत के सभी क्षेत्रों, समाजों एवं भाषाओं में इसकी सहज स्वीकृति है। यह आज भी समाज की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक पहचान और एकात्म भाव का सशक्त आधार है। राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण और राष्ट्र निर्माण की इस पावन बेला में इस महामंत्र के भावों को हृदयंगम करने की आवश्यकता है।
“वंदेमातरम्” गीत की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सभी स्वयंसेवकों सहित सम्पूर्ण समाज से आवाहन् करता है कि वंदेमातरम् की प्रेरणा को प्रत्येक हृदय में जागृत करते हुए “स्व” के आधार पर राष्ट्र निर्माण कार्य हेतु सक्रिय हों और इस अवसर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों को उत्साहपूर्वक भागीदारी करें।
 

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