मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने आज राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ पूरे उत्साह और उमंग के साथ होली का पर्व मनाया। पारंपरिक फाग गीतों और हर्षोल्लास के वातावरण में रंग और उल्लास से सराबोर इस अवसर पर सभी ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएँ दीं। अधिकारियों और कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री श्री साय को गुलाल लगाकर उन्हें बधाई दी, वहीं मुख्यमंत्री श्री साय ने भी आत्मीयता के साथ सभी को गुलाल लगाकर रंगोत्सव की शुभकामनाएँ दीं और स्नेह, विश्वास तथा आपसी भाईचारे का संदेश दिया।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सद्भाव और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यह पर्व समाज में एकता, भाईचारे और सकारात्मकता की भावना को सुदृढ़ करता है तथा जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के पर्व हमें आपसी मतभेद भुलाकर मिल-जुलकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आज मुख्यमंत्री निवास में आयोजित होली मिलन समारोह में सभी से आत्मीय भेंट कर उन्हें अत्यंत प्रसन्नता हुई। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों, साथियों और प्रदेशवासियों के साथ स्नेह, विश्वास और अपनत्व के रंग साझा करना इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने कहा कि प्रदेशवासियों का स्नेह और आशीर्वाद ही जनसेवा के उनके संकल्प को और अधिक सशक्त बनाता है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हुए सभी को होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि रंगों का यह पावन पर्व सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और नई ऊर्जा का संचार करे तथा हमारा छत्तीसगढ़ निरंतर विकास और खुशहाली के नए आयाम स्थापित करता रहे।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री सुबोध कुमार सिंह, पुलिस महानिदेशक श्री अरुण देव गौतम, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक श्री अमित कुमार, रायपुर के पुलिस कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला सहित मुख्यमंत्री सचिवालय एवं निवास कार्यालय के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज धरसींवा विधानसभा क्षेत्र में विधायक श्री अनुज शर्मा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल हुए और क्षेत्रवासियों के साथ होली की खुशियाँ साझा कीं। मुख्यमंत्री ने आयोजन में आमंत्रित किए जाने पर विधायक श्री अनुज शर्मा का आभार व्यक्त करते हुए सभी उपस्थितजनों को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे को मजबूत करने का पर्व है। यह हमें मन-मुटाव भुलाकर एक-दूसरे के साथ मिलकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि होलिका बुराई का प्रतीक है, जिसका दहन कर हमें जीवन में अच्छाई, सकारात्मकता और खुशहाली को अपनाना है तथा सबके सहयोग से छत्तीसगढ़ को विकास के पथ पर आगे बढ़ाना है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इस वर्ष 4 मार्च को होली का पर्व है और इसका उत्साह अभी से दिखाई देने लगा है। उन्होंने बताया कि हाल ही में कृषक उन्नति योजना के अंतर्गत किसानों के खातों में राशि अंतरित की गई है, जिससे किसानों में विशेष उत्साह है और इस बार प्रदेश में होली का पर्व और अधिक उल्लासपूर्ण माहौल में मनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि होली सामाजिक और पारिवारिक जुड़ाव का अवसर भी है, जो समाज में आत्मीयता और विश्वास को मजबूत करता है।
विधायक श्री अनुज शर्मा ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय द्वारा किसानों के खातों में सहायता राशि अंतरित किए जाने से किसानों में खुशी का माहौल है और वे इस वर्ष होली का त्योहार अधिक आनंद और उत्साह के साथ मना रहे हैं। उन्होंने कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक फाग गीत प्रस्तुत कर वातावरण को उत्सवमय बना दिया, जिससे पूरा परिसर होली के रंग में सराबोर हो गया।
सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल ने भी क्षेत्रवासियों को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की।
इस अवसर पर विधायक श्री मोतीलाल साहू, श्री पुरंदर मिश्रा, फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष सुश्री मोना सेन सहित अन्य जनप्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में गणमान्यजन उपस्थित थे।
चरित्र से मजबूत होता है राष्ट्र, संघ मूल्य आधारित संगठन – ले. जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल जी
कुरुक्षेत्र – 28 फरवरी 2026।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण संघ कार्य का मूल आधार हैं। स्पष्ट किया कि नैतिक मूल्यों, आचरण, संस्कार और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के साथ पुरुषार्थ का समन्वय आवश्यक है, तभी स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। सरसंघचालक जी शनिवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त प्रमुख जन गोष्ठी में हरियाणा प्रदेश के प्रमुख शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान मंच पर सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस. जायसवाल जी, उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल जी और प्रांत संघचालक प्रताप सिंह जी उपस्थित रहे ।
सरसंघचालक जी ने परिवार की भूमिका पर विशेष बल देते हुए कहा कि घरों में मंगल संवाद की परंपरा विकसित होनी चाहिए, जहां मन से मन का संवाद हो और बच्चों को उचित-अनुचित का बोध कराया जाए। केवल उपदेश नहीं, बल्कि संवाद और संस्कारयुक्त वातावरण ही व्यक्ति को भटकाव से बचाता है। संपत्ति के समय साथ खड़े होने वाले बहुत होते हैं, लेकिन विपत्ति में साथ देने वाला कौन है, यह परिवार और समाज के संस्कार तय करते हैं। यदि कोई भी इंसान असफल हो जाए या बुरी संगति में पड़ जाए, तो उसे मार्गदर्शन देने वाला, समझाने वाला और संभालने वाला अपना परिवार और समाज ही होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कुटुंब और समाज में संस्कारों का वातावरण निर्माण करना समय की आवश्यकता है, क्योंकि यही वातावरण जिम्मेदार, संवेदनशील और चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ को समझना है तो संघ में आकर ही समझना पड़ेगा। केवल बाहर से देखकर, कल्पना से और फैलाये जा रहे नैरेटिव से नहीं समझ सकते, क्योंकि संघ का जैसा काम है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं है। आज पांचों महाद्वीपों से महत्वपूर्ण लोग संघ को देखने, जानने और समझने के लिए आते हैं। वे भी अपने देश के युवाओं के लिए इस तरह का विचार संगठन खड़ा करने के लिए सहयोग मांगते हैं, क्योंकि उनके पास ऐसा ढांचा नहीं है।
उन्होंने कहा कि जिस तरह से सूर्य जैसा कोई दूसरा सूर्य नहीं, आकाश जैसा दूसरा आकाश नहीं है, उसी तरह से संघ जैसा दूसरा संगठन नहीं है। अगर कोई दूर से देखकर संघ को जानना चाहता है, तो पता नहीं लगेगा। उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवक देश में एक लाख 30 हजार सेवा कार्य चलाते हैं, इसके बाद भी संघ सर्विस आर्गेनाइजेशन नहीं है। कला से लेकर क्रीड़ा तक और विविध क्षेत्रों से लेकर राजनीति तक संघ विचार के कार्यकर्ता हैं, पर संघ एक राजनीतिक संगठन नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ के बारे में एक बात समझने की है कि वह स्पर्धा के भाव से शुरु नहीं हुआ। संघ किसी एक परिस्थिति की प्रतिक्रिया में या विरोध में नहीं चला, बल्कि राष्ट्र के लिए प्रतिबद्धता के साथ समाज को जोड़ने के लिए कार्य करता है। संघ को किसी पर कोई प्रभाव नहीं जमाना, ना ही उसे सत्ता की आवश्यकता है। समाज और देश के लिए संघ के कार्य चलता है, उन सब को पूर्ण करने वाला काम ही संघ है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश आक्रांताओं के खिलाफ हार हुई थी। भारत का एक लंबा कालखंड रहा, जब आक्रांता हम पर राज करते रहे और हम अपनी ही जमीन पर उनसे क्यों हार रहे हैं…इस पर विचार हुआ था। तब किसी ने सोचा था कि एक बार हार गये तो क्या हुआ…। इसी विचार से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए तब 1860 में क्रांतिकारी वासुदेव बलंवत फड़के ने एक भाव जागृत किया। उनका मानना था कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में एक मोर्चा हारा है, देश नहीं, फिर से स्वतंत्रता के लिए लड़ेंगे। इसके बाद स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रभक्तों की लंबी श्रृंखला डॉ. हेडगेवार जी से भगत सिंह, राजगुरु, नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक आगे आई और यह प्रयास लगातार जारी रहे। वासुदेव बलवंत फड़के को आज भी महाराष्ट्र में आद्य क्रांतिकारी कहा जाता है।
डॉ. मोहन भागवत जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्हें जन्मजात देशभक्त बताया। उन्होंने कहा कि बाल्यकाल से ही बालक केशव के मन में राष्ट्रभाव प्रखर था। मात्र 11 वर्ष की आयु में बालक केशव ने गुलामी के प्रतीक के रूप में बांटी गई मिठाई को कचरे में डाल दिया था, जो उनके स्वाभिमानी स्वभाव का संकेत था। उनके माता-पिता भी सेवा भाव से प्रेरित थे और प्लेग पीड़ितों की सेवा में लगे रहते थे, जिसका गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। छात्र जीवन में ही उन्होंने वंदे मातरम् आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उनकी प्रतिभा और राष्ट्रनिष्ठा को देखकर नागपुर के राष्ट्रीय विचार के नेताओं ने उन्हें चिकित्सा शिक्षा के लिए भेजा, जहां उन्होंने प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की और क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े। वे अनुशीलन समिति से भी जुड़े और स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।
सरसंघचालक जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार जी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौर में कई राष्ट्रभक्तों से संवाद किया और क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग किया। बालक केशव से लेकर संघ संस्थापक बनने तक का उनका सफर राष्ट्र चिंतन, प्रयोग और संगठन निर्माण से जुड़ा रहा। लंबे ऐतिहासिक पराधीनता काल के बाद डॉ. हेडगेवार जी ने यह विचार किया कि केवल राजनीतिक परिवर्तन पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज का संगठन और चरित्र निर्माण आवश्यक है। इसी सोच के तहत उन्होंने 10-11 वर्षों तक विभिन्न प्रयोग किए और एक विशिष्ट कार्यपद्धति विकसित की, जिसके आधार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई।
उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना के बाद प्रारंभिक वर्षों में किए गए प्रयोगों से जो कार्यपद्धति विकसित हुई, उसी से संगठन का स्वरूप मजबूत हुआ। उनका मानना था कि समाज को संगठित किए बिना राष्ट्र निर्माण संभव नहीं और देश का कार्य किसी एक संस्था या व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। डॉ. हेडगेवार जी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि महापुरुषों के प्रयास तात्कालिक प्रेरणा देते हैं, लेकिन स्थायी परिवर्तन समाज के आचरण और पुरुषार्थ से आता है। व्यवस्था परिवर्तन के लिए समाज परिवर्तन आवश्यक है और इसके लिए वातावरण निर्माण करने वाले चरित्रवान व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।
उन्होंने कहा कि संघ का मूल कार्य व्यक्तित्व निर्माण और समाज का संगठन है। संघ स्वयं को उद्धारक नहीं मानता, बल्कि समाज को सक्षम बनाने का कार्य करता है। उनके अनुसार, प्रत्येक गांव और बस्ती में ऐसे लोगों का निर्माण जरूरी है जो राष्ट्रीय चरित्र के उदाहरण बनें और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करें। संघ संपूर्ण समाज को जोड़ने की बात करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दू किसी संकीर्ण पहचान का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और गुणात्मक जीवन दृष्टि का प्रतीक है, जिसका मूल आधार संस्कार, आचरण और राष्ट्रहित है।
संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल ने वंदे मातरम् के उद्घोष से शुरुआत की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा को असाधारण बताया। उन्होंने कहा कि विश्व में शायद ही कोई ऐसा संगठन हो जो इतने वर्षों से निरंतर विस्तार और प्रभाव के साथ कार्य कर रहा हो। इस कार्यक्रम में उपस्थित होकर उन्हें नैतिक मूल्यों से प्रेरित वातावरण का अनुभव हुआ। जायसवाल ने संघ को एक मूल्य-आधारित संगठन बताते हुए कहा कि सेना की तरह संघ भी अनुशासन, संस्कार और राष्ट्रीयता के भाव से परिपूर्ण है। उन्होंने हिन्दू संस्कृति को भारत की पहचान बताते हुए कहा कि यदि संस्कृति समाप्त हो जाए तो केवल भूमि रह जाएगी, चरित्र नहीं। उन्होंने कहा कि संघ के माध्यम से राष्ट्र के प्रति निष्ठा और चरित्र निर्माण का कार्य निरंतर बढ़ रहा है।
संघ में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता और यही उसका मूल मंत्र है। उन्होंने महात्मा गांधी के वर्धा प्रवास का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी संघ की शाखा में समानता का भाव देखने को मिला था। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल सेना और उद्योग से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र से तय होती है, और चरित्र निर्माण संघ का मूल आधार है। राष्ट्रीय जिम्मेदारी के संदर्भ में उन्होंने विभाजन काल, भूदान आंदोलन, 1962 के युद्ध और कारगिल युद्ध के दौरान संघ स्वयंसेवकों की सेवा गतिविधियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राहत शिविर, ट्रैफिक नियंत्रण और रक्तदान जैसे कार्यों के माध्यम से संघ ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी सराहा था।
उन्होंने वीर सावरकर के कथन का उल्लेख करते हुए भारतीय सभ्यता को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता बताया। साथ ही कहा कि भारतीय सेना में धर्म नहीं, बल्कि वर्दी और तिरंगा सर्वोपरि होते हैं और सर्वधर्म समभाव की भावना ही उसकी पहचान है। जायसवाल ने विभाजनकारी सोच को त्यागने का आह्वान करते हुए कहा कि अस्पताल में रक्त की पहचान ही सबसे बड़ी होती है, इसलिए समाज में भी एकता का भाव होना चाहिए। संघ में अनुशासन और संस्कार को ही वास्तविक धर्म माना जाता है।
उन्होंने भारत को विश्वगुरु बनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया और कहा कि संघ के मूल मूल्यों पर चलकर ही राष्ट्र की विजय सुनिश्चित हो सकती है। उन्होंने “जय हिंद” के साथ अपने वक्तव्य का समापन किया।
वृत्तचित्र, प्रदर्शनी और संघ की यात्रा
इस अवसर पर परिसर में संघ की 100 वर्ष की यात्रा पर आधारित एक प्रदर्शनी, अस्थाई साहित्य केंद्र, स्वदेशी उत्पाद केंद्र, पंचगव्य उत्पाद केंद्र स्थापित किया गया। संघ की प्रदर्शनी में संघ की क्रमिक विकास यात्रा के साथ इनमें संघ वृक्ष के बीज डॉ. हेडगेवार जी से वटवृक्ष बनने तक की सचित्र यात्रा दिखी। इसी के साथ स्वदेशी जागरण मंच, राष्ट्र सेविका समिति, नर सेवा नारायण सेवा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, विद्या भारती, संस्कार भारती, हिन्दू जागरण मंच, विश्व हिन्दू परिषद, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम तथा भारतीय किसान संघ की झलक देखने को मिली।
सभागार में कार्यक्रम के शुभारंभ से पहले संघ की सौ वर्ष की यात्रा, वृत्त चित्र के माध्यम से प्रस्तुत की गई। इसमें संघ के जनक की जीवनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी प्रमुख घटनाओं को दर्शाया गया। इसमें संघ के गठन से लेकर वर्तमान तक की यात्रा शामिल रही। डॉ. हेडगेवार जी का मूलमंत्र -संगठन कागजों में नहीं, लोगों के दिल में, इस वृत्त चित्र में सामने था।
2011 की जनगणना बताती है कि केरल में मुस्लिम आबादी 26.56 प्रतिशत थी, जबकि 1951 में यह 17.4 प्रतिशत थी। 2001 से 2011 के बीच मुस्लिम आबादी वृद्धि दर 12.8 प्रतिशत रही, जबकि राज्य की कुल जनसंख्या वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत थी। उसी अवधि में हिन्दुओं की वृद्धि दर 2.23 प्रतिशत और ईसाइयों की 1.38 प्रतिशत रही। स्पष्ट है कि वृद्धि दर में अंतर है।
जब किसी फिल्म से इतना भय पैदा हो जाए कि उसकी रिलीज से पहले न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़े तो समझ लीजिए कि मामला सच सामने आने के बाद असहजता से संबंधित है। द केरल स्टोरी 2, ठीक उसी मोड़ पर खड़ी है। 27 फरवरी, 2026 को रिलीज होने से पहले ही केरल उच्च न्यायालय ने अस्थायी रोक लगा दी। हालांकि, उच्च न्यायालय की बड़ी पीठ ने फिल्म की रिलीज को हरी झंडी दिखा दी है। फिल्म को लेकर याचिकाएं दायर हुईं आरोप लगे कि फिल्म राज्य की छवि खराब करेगी, सांप्रदायिक तनाव फैलाएगी, समाज को बांटेगी। किंतु, मूल प्रश्न कोई पूछने को तैयार नहीं कि क्या केरल विधानसभा में रखी गई रिपोर्ट भी प्रोपगैंडा हो सकती है?
फिल्म 2023 में आई द केरल स्टोरी का सीक्वल है। पहली फिल्म की तरह इसका विषय भी छल से धर्मांतरण है, लेकिन इस बार कथा केरल से आगे बढ़कर मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक जाती है। ट्रेलर में कहा गया है कि यह वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है। यह कहते ही हंगामा शुरू हो गया। कुछ फिल्मकारों और अपने आपको सेक्युलर कहने वालों ने इसे प्रोपगैंडा बताया। न्यायालय में फिल्म को चुनौती देने पहुंचे याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फिल्म केरल को सांप्रदायिक रंग में रंगती है और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाती है। तब निर्देशक ने सार्वजनिक रूप से चुनौती दी कि यदि कुछ भी गलत सिद्ध हो जाए तो वे फिल्म निर्माण छोड़ देंगे। कहना होगा कि यह आत्मविश्वास यूं ही नहीं आता है, इसके पीछे तथ्य होते हैं।
25 फरवरी, 2026 को केरल उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई और न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस की एकल पीठ ने निर्माताओं से कहा कि अंतिम निर्णय तक फिल्म के अधिकार जारी न किए जाएं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा दिए गए यू\ए प्रमाणपत्र पर भी सवाल उठाए गए। न्यायालय ने पूछा कि यदि विषय इतना संवेदनशील है तो ए प्रमाणपत्र क्यों नहीं दिया गया। लेकिन यह प्रश्न बड़ा है कि क्या किसी राज्य का नाम शीर्षक में आ जाना ही उसकी गरिमा पर हमला है? अगर ऐसा है तो फिर गो गोवा गॉन, वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई या दिल्ली बेली जैसी फिल्मों ने भी अपने-अपने शहरों की छवि बिगाड़ी होगी?
वस्तुत: इस संदर्भ में कहना होगा कि यह विवाद नया नहीं है। 2023 में आई “द केरल स्टोरी” भी कानूनी चुनौतियों से गुजरी थी। उससे पहले 2022 में “द कश्मीर फाइल्स” को लेकर भी देश भर में याचिकाएं दायर हुईं। हर बार तर्क यही था कि फिल्म से सामाजिक सद्भाव बिगड़ेगा। हर बार अदालतों ने संतुलन साधते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी महत्व दिया।
अब आइए मूल प्रश्न पर आते हैं, छल से धर्मांतरण का मुद्दा। किसी का धर्म बदलने का अर्थ यह नहीं है कि बल, प्रलोभन या धोखे से धर्म परिवर्तन किया जाए। संविधान इसकी अनुमति नहीं देता। इसी कारण उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों ने विशेष कानून बनाए हैं। यह कानून यूं ही नहीं बने, इसके पीछे शिकायतें और हजारों की संख्या में अब तक दर्ज मामले रहे।
राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो जबरन धर्मांतरण का अलग से समेकित आंकड़ा जारी नहीं करता। इसलिए बहस अक्सर भावनात्मक हो जाती है। लेकिन जहां राज्य कानून हैं, वहां दर्ज आंकड़े मौजूद हैं और केरल का मामला तो विधानसभा में रखी गई रिपोर्टों से भी जुड़ा है।
2011 की जनगणना बताती है कि केरल में मुस्लिम आबादी 26.56 प्रतिशत थी, जबकि 1951 में यह 17.4 प्रतिशत थी। 2001 से 2011 के बीच मुस्लिम आबादी वृद्धि दर 12.8 प्रतिशत रही, जबकि राज्य की कुल जनसंख्या वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत थी। उसी अवधि में हिन्दुओं की वृद्धि दर 2.23 प्रतिशत और ईसाइयों की 1.38 प्रतिशत रही। स्पष्ट है कि वृद्धि दर में अंतर है। इसके पीछे केवल धर्मांतरण कारण नहीं, मुसलमानों की उच्च प्रजनन दर, सामाजिक संरचना और अन्य कारक भी हैं। लेकिन धर्मांतरण को पूरी तरह नकार देना भी तथ्यों से आंख मूंदना होगा।
2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने केरल विधानसभा में बताया कि 2006 से 2012 के बीच 7713 लोगों ने इस्लाम धर्म अपनाया, जिनमें 2667 लड़कियां थीं। रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर मामले अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े थे। यह कोई फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि सरकार द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक सूचना थी। 2015 में केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल के मुखपत्र जाग्रता ने दावा किया कि 2005 से 2012 के बीच लगभग चार हजार लड़कियों का धर्मांतरण हुआ, जिनमें ज्यादातर ने इस्लाम स्वीकार किया।
स्वाभाविक है कि यदि किसी अवधि में हजारों लोग धर्म बदलते हैं तो समाजशास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता होती है और उसमें भी, जब विशेष वर्ग के प्रति अचानक से आकर्षण दिखे, तब संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। ऐसे में केरल की इस सच्चाई को आज कोई भी नकार नहीं सकता है। इसलिए फिल्म में जो दिखाया गया है, वह वास्तव में उन तमाम युवतियों का भोगा हुआ यथार्थ है, जिससे वे दिनरात गुजरी हैं। ये सच है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है, लेकिन वह निरर्थक भी नहीं है। यदि हर संवेदनशील विषय पर रोक लगेगी तो सिनेमा केवल मनोरंजन का खोखला माध्यम बनकर रह जाएगा। अदालतें कानून देखेंगी, सार्वजनिक व्यवस्था शालीनता और नैतिकता। लेकिन समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि क्या वह कठिन प्रश्नों का सामना करने को तैयार है।
सच यह है कि धर्मांतरण का प्रश्न बहुआयामी है; फिर भी यदि आधिकारिक आंकड़े मौजूद हैं, यदि विधानसभा में रिपोर्ट रखी गई है, यदि मीडिया ने धर्मांतरण के रुझानों पर विश्लेषण किया है तो इस विषय पर फिल्म बनाना अवैध कैसे हो सकता है? “द केरल स्टोरी 2” को न्यायालय में चुनौती दीजिए, जरूर दीजिए, तथ्यों की जांच कीजिए प्रमाणपत्र पर बहस कीजिए। किंतु यह मत कहिए कि विषय अस्तित्वहीन है। क्योंकि आंकड़े मौजूद हैं जनगणना के, विधानसभा के और मीडिया रिपोर्टों के।
अब यह बहस रुकेगी नहीं। और शायद यही लोकतंत्र की असली ताकत है सवाल पूछने की, असहमति जताने की और तथ्यों को परखने की स्वतंत्रता सभी को समान रूप से भारतीय संविधान देता है। कहना होगा कि सच आंकड़ों में दर्ज रहता है, दस्तावेजों में सुरक्षित रहता है और समय-समय पर सामने आ जाता है। इसलिए आज प्रश्न यह नहीं कि फिल्म पर रोक लगी या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या हम उन तथ्यों से सामना करने को तैयार हैं, जिन्हें हम देखना नहीं चाहते। क्योंकि इतिहास गवाह है फिल्में रोकी जा सकती हैं, लेकिन आंकड़ों को आज कोई नहीं नकार सकता, जो देश भर में चिल्ला- चिल्ला कर कह रहे हैं कि लव जिहाद के निशाने पर हिन्दू एवं अन्य गैर मुस्लिम लड़किया हैं! इस्लामिक कन्वर्जन का खेल पूरी तरह से योजनाबद्ध तरीके से संचालित किया जा रहा है, जिस पर कि हर हाल में रोक लगना ही चाहिए।
मुख्यमंत्री श्री साय ने होला मोहल्ला के लिए संगत बसों को हरी झंडी दिखाकर किया रवाना
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज शाम राजधानी रायपुर स्थित रेलवे स्टेशन गुरुद्वारा पहुंचे, जहां उन्होंने मत्था टेककर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए अरदास की। इस अवसर पर उन्होंने सिख संगत द्वारा आयोजित होला मोहल्ला यात्रा के लिए निःशुल्क बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
सिख संगत द्वारा आयोजित इस यात्रा में लगभग 1200 श्रद्धालु 17 बसों, 2 ट्रकों एवं अन्य वाहनों के साथ श्री हजूर साहिब नांदेड़ (महाराष्ट्र) तथा गुरुद्वारा नानक झीरा साहिब, बीदर (कर्नाटक) के लिए रवाना हुए। यह यात्रा सिख समाज की आस्था, परंपरा और सामूहिक श्रद्धा का प्रतीक है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने संगत को मंगलमय यात्रा की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि सिख गुरुओं का त्याग, बलिदान और मानवता की सेवा का संदेश पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़े पवित्र स्थलों पर आयोजित होला मोहल्ला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि साहस, सेवा और राष्ट्रभक्ति की अद्भुत परंपरा का प्रतीक है। सिख गुरुओं द्वारा स्थापित शौर्य और समर्पण की विरासत सदैव देशवासियों को प्रेरित करती रहेगी।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि सिख संगत द्वारा लगातार 25वें वर्ष इस भव्य आयोजन का संचालन किया जा रहा है। उन्होंने इस उत्कृष्ट आयोजन के लिए सिख समाज को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।
इस अवसर पर रायपुर सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल, अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष श्री अमरजीत सिंह छाबड़ा, गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र सिंह छाबड़ा सहित सिख समाज के प्रतिनिधिगण बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय से आज विधानसभा परिसर स्थित उनके कक्ष में वित्त मंत्री श्री ओपी चौधरी ने वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट प्रस्तुत करने से पूर्व मुलाकात की।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री साय ने वित्त मंत्री को आगामी बजट के लिए शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह बजट प्रदेशवासियों की आकांक्षाओं को पूरा करने वाला तथा छत्तीसगढ़ के समग्र विकास को नई दिशा देने वाला सिद्ध होगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सरकार की जनकल्याणकारी प्राथमिकताओं, सुशासन और समावेशी विकास के संकल्प को यह बजट और अधिक सशक्त आधार प्रदान करेगा।
इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा, उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव सहित मंत्रिपरिषद के सभी मंत्रीगण तथा वित्त सचिव श्री मुकेश बंसल उपस्थित थे।
जल संरक्षण को दिनचर्या का हिस्सा बनाने, जल संरचनाओं की रक्षा और जल के प्रति जिम्मेदार सोच अपनाने का मुख्यमंत्री ने किया आह्वान
मुख्यमंत्री श्री साय और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटिल की संयुक्त अध्यक्षता में “जल संचय-जन भागीदारी 2.0” अभियान के क्रियान्वयन की हुई गहन समीक्षा
केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री ने छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण के क्षेत्र में हो रहे कार्यों और नवाचारों की सराहना की
31 मई तक 10 लाख जल संरचनाओं का लक्ष्य, जल सुरक्षा को मिलेगा नया आधार
डबरी निर्माण से बढ़ेगा भू-जल स्तर, किसानों को मिलेगा अतिरिक्त लाभ
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटिल की संयुक्त अध्यक्षता में आज नवा रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में आयोजित बैठक में प्रदेश में “जल संचय-जन भागीदारी 2.0” अभियान के क्रियान्वयन की गहन समीक्षा की गई। केंद्रीय मंत्री श्री पाटिल इस बैठक में वर्चुअली शामिल हुए और बैठक को संबोधित किया। इस दौरान बिलासपुर, दुर्ग और सूरजपुर जिले के कलेक्टरों ने अपने-अपने जिलों में अभियान के अंतर्गत संचालित कार्यों और गतिविधियों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि जल संकट 21वीं सदी की केवल गंभीर पर्यावरणीय ही नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और विकासात्मक चुनौती भी बन चुका है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण को स्थायी और प्रभावी बनाने के लिए जनभागीदारी अनिवार्य है।उन्होंने देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के उस संदेश का उल्लेख किया, जिसमें पानी के उपयोग को प्रसाद के समान मानते हुए जल के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन से प्रेरित होकर राज्य सरकार जल संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने के लिए प्रतिबद्ध है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि अभियान के पहले चरण में छत्तीसगढ़ ने देशभर में द्वितीय स्थान प्राप्त किया तथा विभिन्न जिलों को भी अलग-अलग श्रेणियों में पुरस्कार मिले। पहले चरण में सामुदायिक भागीदारी के मॉडल पर कार्य करते हुए बड़े पैमाने पर बोरवेल रिचार्ज, रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, रिचार्ज शाफ्ट, सोक पिट और ओपनवेल रिचार्ज जैसी संरचनाओं का निर्माण किया गया। श्री साय ने कहा कि प्रदेश में वर्तमान में 5 क्रिटिकल और 21 सेमी-क्रिटिकल भू-जल ब्लॉक चिन्हित हैं। वर्ष 2024 की तुलना में 2025 में इनमें से 5 ब्लॉकों में भू-जल निकासी में कमी और भू-जल स्तर में सुधार दर्ज किया गया है, जो जल संरक्षण प्रयासों के सकारात्मक परिणामों का संकेत है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि अभियान के दूसरे चरण “जल संचय-जन भागीदारी 2.0” के अंतर्गत तकनीक आधारित और अधिक परिणाममूलक रणनीति अपनाई जा रही है। राज्य सरकार ने 31 मई 2026 तक 10 लाख जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया है। मुख्यमंत्री ने इसे जल सुरक्षा की दिशा में प्रदेश का ऐतिहासिक कदम बताया। उन्होंने कहा कि राज्य के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर एक विशेष पहल के तहत 10 एकड़ से अधिक भूमि वाले चार लाख से अधिक किसानों को अपने खेतों में डबरी निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस कार्य में जिला प्रशासन के साथ-साथ औद्योगिक समूहों का सहयोग भी लिया जा रहा है। इन डबरियों से भू-जल स्तर में वृद्धि के साथ किसानों को सिंचाई एवं मछली पालन जैसी अतिरिक्त सुविधाएँ मिलेंगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि दूसरे चरण में सभी जल संरचनाओं की जियोटैगिंग, ग्राम पंचायतों के वॉटर बजट तथा जल सुरक्षा योजनाओं के निर्माण पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। साथ ही गांवों के युवाओं को “जल मित्र” के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा, ताकि अभियान को गति मिल सके। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि क्रिटिकल और सेमी-क्रिटिकल ब्लॉकों पर विशेष फोकस रखते हुए सेमी-क्रिटिकल ब्लॉकों में 40 प्रतिशत तथा क्रिटिकल ब्लॉकों में 65 प्रतिशत जल संरक्षण कार्यों का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उन्होंने प्रदेशवासियों से जल संरक्षण को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने, जल संरचनाओं की रक्षा करने और जल के प्रति जिम्मेदार सोच अपनाने का आह्वान भी किया।
केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटिल ने छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण के क्षेत्र में हो रहे कार्यों और नवाचारों की सराहना की। उन्होंने कहा कि गत वर्ष जल संरक्षण के प्रयासों में छत्तीसगढ़ देशभर में दूसरे स्थान पर रहा, जो राज्य के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2024 को सूरत से ‘जल संचय जन भागीदारी अभियान’ की शुरुआत की थी और ‘कर्मभूमि से मातृभूमि के लिए जल संचयन में सहयोग’ का आह्वान किया था। इस अभियान का उद्देश्य जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप देना है।
केंद्रीय मंत्री श्री पाटिल ने प्रदेश के समस्त कलेक्टरों से मनरेगा के तहत जल संचय कार्यों के लिए प्राप्त राशि का पूर्ण और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने को कहा। उन्होंने राजनांदगांव प्रवास के दौरान एक महिला सरपंच द्वारा स्वयं के प्रयासों से जल संचयन के लिए किए गए उल्लेखनीय कार्यों की प्रशंसा की। इसके साथ ही उन्होंने जल संचय में व्यापक जनभागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया।
बैठक में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री सुबोध कुमार सिंह, जल संसाधन विभाग के सचिव श्री राजेश सुकुमार टोप्पो तथा जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव श्री कांताराव और छत्तीसगढ़ के समस्त कलेक्टर वर्चुअली उपस्थित थे।
सिक्किम के पत्रकारों को भाया छत्तीसगढ़, कहा – छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विविधता और लोगों का आत्मीय व्यवहार अत्यंत प्रभावित करने वाला
“छत्तीसगढ़ ने भारतीय होने का गर्व कराया” – पत्रकार सुश्री अर्चना प्रधान
सिक्किम से अध्ययन भ्रमण पर आए पत्रकारों ने मुख्यमंत्री से की मुलाकात
छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर प्रदेश है और धन-धान्य से पुष्पित-पल्लवित इस धरा को हमारी सरकार सुंदर, समृद्ध, सुरक्षित और विकसित बनाने के लिए संकल्पित होकर काम कर रही है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने आज अपने निवास कार्यालय में सिक्किम राज्य से अध्ययन भ्रमण पर पहुंचे पत्रकारों के दल से मुलाकात कर आत्मीय संवाद किया और उनसे छत्तीसगढ़ को लेकर ढेर सारी बातें साझा की। उन्होंने सभी अतिथियों को राजकीय गमछा भेंट कर छत्तीसगढ़ में स्वागत और अभिवादन किया। मुख्यमंत्री की सहृदयता और आतिथ्य पाकर सभी पत्रकार अभिभूत हुए और उन्हें सिक्किम आने का निमंत्रण भी दिया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ 44 प्रतिशत वन क्षेत्र से आच्छादित है तथा यहां 31 प्रतिशत आदिवासी समुदाय निवासरत है। वनोपज संग्रहण और मूल्य संवर्धन के माध्यम से जनजातीय समुदाय आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। जशपुर जिले में स्व-सहायता समूह की महिलाएं ‘जशप्योर’ ब्रांड के अंतर्गत उत्पाद तैयार कर आय अर्जित कर रही हैं। उन्होंने बताया कि तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए सरकार द्वारा 5,500 रुपये प्रति मानक बोरा की दर से भुगतान किया जा रहा है तथा चरण पादुका योजना के तहत निःशुल्क चप्पल प्रदान की जा रही है।
मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह की चिंता को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2005 में इस योजना की शुरुआत की गई थी। हाल ही छह हजार से अधिक जोड़े इस योजना के अंतर्गत विवाह बंधन में बंधे, जिसे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी स्थान प्राप्त हुआ है। उन्होंने बताया कि योजना के तहत नवदंपतियों को 35 हजार रुपये की आर्थिक सहायता एवं 15 हजार रुपये का सामग्री सहयोग प्रदान किया जाता है।
नक्सलवाद के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार के सफल नेतृत्व और दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते प्रदेश में नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में है। राज्य सरकार की आकर्षक पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को 50 हजार रुपये की सहायता तथा तीन वर्षों तक प्रति माह 10 हजार रुपये दिए जा रहे हैं। अब तक 2,500 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। कौशल प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें रोजगार से जोड़ने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। श्री साय ने बताया कि जगदलपुर में आत्मसमर्पित नक्सलियों द्वारा ‘बस्तर पंडुम’ कैफे का सफल संचालन इसका सशक्त उदाहरण है।
मुख्यमंत्री ने आगे बताया कि ‘नियद नेल्ला नार’ योजना के अंतर्गत 17 शासकीय योजनाओं को दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाया गया है, जिससे सड़क, बिजली, पानी, राशन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं की पहुंच सुदृढ़ हुई है। उन्होंने कहा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र अब विकास की मुख्यधारा से तेजी से जुड़ रहे हैं। पर्यटन की संभावनाओं पर मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। चित्रकोट जलप्रपात, कुटुम्बसर गुफाएं, अबूझमाड़ के वन और धुड़मारास जैसे स्थल प्रदेश की पहचान हैं। ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु होम स्टे को उद्योग का दर्जा दिया गया है, जिसके तहत ग्रामीणों को पांच कमरों तक निर्माण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य एवं औद्योगिक विकास के संदर्भ में जानकारी देते हुए बताया कि नवा रायपुर में 100 एकड़ क्षेत्र में मेडिसिटी का निर्माण किया जा रहा है, जहां निम्न आय वर्ग के लिए सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध होंगी। उन्होंने प्रदेश की आकर्षक नवीन औद्योगिक नीति का ज़िक्र करते हुए कहा कि इसके तहत राज्य को लगभग 8 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। साथ ही चित्रोत्पला फिल्म सिटी की स्थापना से प्रदेश में फिल्म उद्योग को बढ़ावा मिलेगा।
“छत्तीसगढ़ ने भारतीय होने का गर्व कराया” – सुश्री अर्चना प्रधान
सिक्किम की पत्रकार सुश्री अर्चना प्रधान ने कहा कि छत्तीसगढ़ में ‘मेक इन इंडिया’ का प्रभावी स्वरूप देखने को मिला। भिलाई स्टील प्लांट में रेल पटरियों सहित विभिन्न इस्पात उत्पादों का निर्माण प्रदेश के औद्योगिक सामर्थ्य को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इकाइयों को हमें करीब से देखने का मौका मिला और हम जान पाए है कि इस प्रदेश का देश के विकास में कितना महत्वपूर्ण योगदान है।
सिक्किम के पत्रकारों को भाया छत्तीसगढ़
मुख्यमंत्री से भ्रमण उपरांत मिलने पहुंचे पत्रकारों ने कहा कि छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विविधता और लोगों का आत्मीय व्यवहार अत्यंत प्रभावित करने वाला है। उन्होंने भ्रमण के दौरान प्राप्त अनुभवों को साझा करते हुए स्थानीय खान-पान और सांस्कृतिक विरासत की सराहना की। सिक्किम से आए पत्रकारों ने अपने पांच दिवसीय भ्रमण के दौरान भिलाई स्टील प्लांट, गेवरा ओपन माइंस, नवा रायपुर तथा जनजातीय संग्रहालय का अवलोकन किया। पत्रकारों ने बताया कि छत्तीसगढ़ भ्रमण की सुंदर स्मृतियों को अपने साथ लेकर जा रहे हैं, जो उन्हें आजीवन याद रहेगा। उन्होंने मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना, किसानों के हित में की गई घोषणाओं, स्वच्छ वातावरण तथा पुनर्वास नीति की सराहना की।
मुख्यमंत्री को भेंट किया सिक्किम का स्मृति चिन्ह ‘थांका’
पत्रकारों के दल ने मुख्यमंत्री को सिक्किम की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक ‘थांका’ पेंटिंग भेंट की। मुख्यमंत्री ने इस उपहार के लिए आभार व्यक्त करते हुए इसे स्नेह और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रतीक बताया।
पत्रकारों ने बताया कि सिक्किम का थांका पेंटिंग एक पवित्र स्मृति चिन्ह है, जो सूती या रेशमी कपड़े पर बौद्ध देवताओं, मंडलों और बुद्ध के जीवन दृश्यों को दर्शाता है। यह हस्तनिर्मित कला सिक्किम की धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, जिसे अक्सर घर की सजावट और सकारात्मक ऊर्जा के लिए लाया जाता है। इन्हें रोल करके आसानी से ले जाया जा सकता है, जो यात्रियों के लिए एक बेहतरीन सोवेनियर है। यह पारंपरिक कलाकृति सिक्किम के निवासियों के लिए धार्मिक विश्वास और आस्था का प्रतीक है।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार श्री पंकज झा, मुख्यमंत्री के सलाहकार श्री आर. कृष्णा दास, मुख्यमंत्री के प्रेस अधिकारी श्री आलोक सिंह, पीआईबी गंगटोक के सहायक निदेशक श्री मानस प्रतिम शर्मा, पीआईबी रायपुर के सहायक निदेशक श्री सुदीप्तो कर, श्री पुरुषोत्तम झा और श्री सरद बसनेत,पत्रकार श्री बेनु प्रकाश तिवारी, श्री विकास क्षेत्री, श्री होमनाथ दाबरी, श्री ईश्वर, सुश्री अर्चना प्रधान, सुश्री अनुशीला शर्मा, श्री प्रकाश अधिकारी, श्री ललित दहल, श्री विनोद तमंग, श्री मोहन कुमार कार्की, श्री नार बहादुर क्षेत्री उपस्थित थे।
मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है? अथवा मनुष्य अपने सामने जीवन का लक्ष्य कौन सा रखे? इस बारे में लगभग सभी लोगों का मत है कि सुख ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। परंतु, प्रश्न यह है कि सुख से आशय क्या है और मनुष्य को यह सुख कैसे मिल सकता है?
इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी के अनुसार पश्चिमी चिन्तन और हिन्दू दर्शन पर आधारित भारतीय चिन्तन में मूलभूत अन्तर है। इस अन्तर को स्पष्ट करते हुए श्री गुरुजी ने अनेक प्रकार से समझाया है कि सुख के बारे में पश्चिमी विचार अधूरा, एकांगी, अस्थायी एवं क्षणभंगुर है, वस्तुतः तो वह सुख का क्षणिक आभास देते हुए अन्ततः दुखकारी ही है। इसके विपरीत सुख की हिन्दू परिकल्पना समग्र, संतुलित एवं अधिक स्थायी है।
पश्चिमी राष्ट्रों का लक्ष्य – केवल भौतिक सुख
पश्चिमी राष्ट्रों ने सुख की परिकल्पना केवल भौतिक एवं ऐहिक सुख के रूप में ही की है। इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी ने कहा है – ‘‘दुनिया भर की राज्य व्यवस्था एवं राष्ट्र व्यवस्था में मनुष्य मात्र के जीवन का लक्ष्य ऐहिक सुख समृद्धि माना हुआ है। अर्थात् खाना-पीना, वस्त्र प्रावरण, निवास के स्थान, सुखोपभोग, वासना की वृद्धि, वासना संतुष्ट करने के साधनों की वृद्धि, उन साधनों की उपलब्धि, भिन्न-भिन्न मनोविनोद के साधन, यही जगत के सब देशों में सर्वसाधारण लक्ष्य रखा गया है, ऐसा दिखता है। जिसका बड़ा प्रगतिमान वर्णन किया जाता है, वहाँ सामान्य आदमी के यहाँ भी टेलीविजन, रेडियो, मोटर, मोटर साइकिल आदि ऐहिक सुख के लक्षण ही प्रगति के मापदण्ड माने जाते हैं। पर ये वास्तव में मानव की प्रगति के मापदण्ड हैं क्या?’’
भौतिक सुख की यह अवधारणा अधूरी है और यह अंततोगत्वा असंतोष, अशान्ति एवं संघर्ष का ही कारण बनती है, इस बात पर श्री गुरुजी कहते हैं कि मनुष्य मात्र को सुख की प्राप्ति करवा देने का ध्येय सामने रखकर चलने का दावा करने वाली बहुत सी जीवन रचनाएं आज संसार में विद्यमान हैं। भौतिक कामनाओं की पूर्ति में ही सुख है, इसी बात को लेकर अनेक आधुनिक विचार प्रणालियाँ उत्पन्न हुई हैं। परन्तु कुछ काल के लिए होने वाली वासनापूर्ति आगे चलकर मनुष्य को अशान्त करती हुई दिखाई देती है।
श्री गुरुजी के अनुसार इसके कई कारण है – (1) एक तो विषय वासनाओं की पूर्ति सर्वथा असम्भव है। उनको तुष्ट करने की जितनी ही चेष्टा की जाती है, उतनी ही वे बढ़ती हैं। ‘‘अनुभव यह बताता है कि मनुष्य दैहिक आनन्द प्राप्त करने का जितना अधिक प्रयास करता है, उसकी भूख उतनी ही तीव्र होती जाती है। उसे कभी संतुष्टि का अनुभव नहीं होता। इच्छाओं के तुष्टिकरण की चेष्टा जितनी अधिक होगी, उतना ही असंतोष बढे़गा। भौतिक सुख साधनों का संग्रह करने की इच्छा जितनी ही प्रबल होगी, निराशा भी उतनी अधिक होगी। हमारे शास्त्रों ने घोषणा की है – ‘न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति’ (महा0 आदिपर्व)। विषय भोगों से कामनाओं का शमन नहीं होता। शरीर के जीर्णशीर्ण हो जाने पर भी इच्छाएं पूर्ववत् युवा बनी रहती हैं। भर्तृहरि ने भी कहा है – ‘तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः’ (वैराग्य शतक) – यही वास्तविक दुर्दशा है, जिसमें आधुनिक मानव स्वयं को फँसा हुआ पाता है। इस प्रकार वासनापूर्ति असम्भव होने के कारण मानव जीवन दुःखी होता हुआ दिखाई देता है।
(2) भौतिक पदार्थों से अपनी वासनापूर्ति में लगे मनुष्य को प्रारम्भ में भले ही कुछ संतुष्टि मिले पर, ‘‘आगे चलकर वह समझ जाता है कि इन आपाततः सुख देने वाली वस्तुओं में वास्तविक सुख देने की कोई शक्ति नहीं है। सुख तो अपने ही अन्दर समय-समय पर उठने वाली वासना-तंरगों की शांति से होता है। यानि सुख बाह्य वस्तु में नहीं, वासना पूर्ति में भी नहीं; किन्तु वासना के शांत होने में है।’’
(3) श्री गुरुजी का मानना था कि ‘‘व्यक्ति व समाज के लिए वासनाओं का उत्तरोत्तर बढ़ते जाना और उस पर सदा असंतोष का बना ही रहना, यही जगत में बार-बार होने वाले भयंकर युद्धों का प्रमुख कारण है। जगत में अशांति तथा असुख बनाएं रखने में, यही प्रबल कारण है।’’
श्री गुरुजी ने इसी बात को विस्तार से समझाया है, कहा है कि – ‘‘पश्चिम के सुख की अवधारणा पूर्णतया प्रकृतिजन्य इच्छाओं की संतुष्टि पर ही केन्द्रित है, अतः उनके ‘जीवन स्तर को उठाने’ का अर्थ भी केवल भौतिक आनन्द की वस्तुओं को अधिकाधिक जुटाना है। इससे व्यक्ति अन्य विचारों एवं एषणाओं को छोड़कर केवल इसी में पूर्णतया संलग्न हो जाता है। भौतिक सुख-साधनों की प्राप्ति की इच्छा धन-संग्रह को जन्म देती है। अधिकाधिक धन प्राप्ति हेतु शक्ति आवश्यक हो जाती है; किन्तु भौतिक सुख की अतृप्त क्षुधा व्यक्ति को अपनी राष्ट्रीय सीमाओं तक ही नहीं रुकने देती। सबल राष्ट्र राज्य शक्ति के आधार पर दूसरों के दमन व शोषण का भी प्रयास करते हैं। इसमें से संघर्ष व विनाश का जन्म होता है। एक बार यह प्रक्रिया प्रारम्भ हुई कि समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। सभी नैतिक बंधन विच्छिन्न हो जाते हैं। सामान्य मानवीय संवेदनाएं सूख जाती हैं। मनुष्य और पशु में अन्तर स्थापित करने वाले मूल्य एवं गुण समाप्त हो जाते हैं।’’
नक्सली-माओवादियों का हिंसक चेहरा सबके समक्ष है। इसी हिंसात्मक प्रवृत्ति का एक उदाहरण मात्र है, सन् 1992 का बारा नरसंहार।
12 फरवरी, 1992 की रात गया जिले के बारा गांव (बिहार) में हिंसक कहर ने सारे देश को झकझोर दिया था। माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी के आतंकियों ने अचानक हमला कर 34 निर्दोष ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर दी थी। नक्सली हिंसा के इस क्रूर चेहरे को भुला पाना आसान नहीं है।
टेकरी प्रखंड का बारा गांव गया शहर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है। गांव में करीब 50 घर थे, लगभग 40 परिवार भूमिहार समाज के थे। इनके अलावा छह ब्राह्मण, एक बढ़ई, एक तेली और दो अनुसूचित जाति के परिवार थे। अधिकांश परिवारों के पास तीन से चार बीघा तक जमीन थी। गांव का कुल रकबा लगभग 300 बीघा था। आसपास के खुलुनी, देहुरा और नेन बिगहा जैसे गांवों में अनुसूचित जाति समुदाय की आबादी रहती थी।
12 फरवरी की रात करीब साढ़े नौ बजे गांव में अचानक बम धमाकों की आवाज गूंजी। 500 हमलावरों की भीड़ ने गांव को चारों ओर से घेर लिया था। हमलावरों ने घरों में आग लगाई और “एमसीसी जिंदाबाद” के नारे लगाए। उन्होंने सवर्ण लिबरेशन फ्रंट के कमांडर रामाधार सिंह उर्फ डायमंड और उनके सहयोगी हरद्वार सिंह के बारे में पूछताछ शुरू की।
कुछ हमलावर जबरन घरों में घुसे। उन्होंने तलाशी का बहाना बनाया, लेकिन जल्द ही उनका असली चेहरा सामने आ गया। उन्होंने गांव के पुरुषों को घरों से बाहर निकाला, उनके हाथ बांध दिए और महिलाओं व बच्चों को अलग कर दिया। करीब 100 पुरुषों को पास की नहर के किनारे ले जाया गया। वहां उनके पैरों को भी बांध दिया गया।
इसके बाद हमलावरों ने पूछा कि कौन भूमिहार नहीं है। एक व्यक्ति ने खुद को अलग बताया और छूट गया। एक अन्य व्यक्ति ने खुद को एमसीसी समर्थक बताया, लेकिन हमलावरों ने उसे भी नहीं बख्शा।
हमलावरों ने महिलाओं और बच्चों को वहां से हटने को कहा। और उसके बाद नहर किनारे चीखें गूंज उठीं। हमलावरों ने बंधकों के गले तेज हथियारों से काट दिए। जो लोग भागने की कोशिश करते, उन्हें गोली मार दी। पोस्टमार्टम में 34 लोगों की मौत की पुष्टि हुई। चार लोगों को गोली लगी थी, जबकि बाकी को धारदार हथियार से मारा गया था। यहां तक कि जिन लोगों को गोली लगी थी, उनके भी गले काटे गए थे। इस क्रूरता ने पूरे इलाके को सन्न कर दिया।
उस दौर में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में सक्रिय था। ये संगठन खुद को गरीबों का हितैषी बताता था, लेकिन अपने विरोधियों को खत्म करने के लिए हिंसा को हथियार बनाया। लंबे समय तक हिंसा के रास्ते पर चलता रहा। बारा नरसंहार भी उसी रणनीति का हिस्सा था।
वर्ष 2004 में एमसीसी ने पीपुल्स वार ग्रुप के साथ मिलकर भाकपा माओवादी का गठन किया। केंद्र सरकार ने भाकपा माओवादी और उससे जुड़े संगठनों को आतंकी घोषित किया था।
बारा नरसंहार ने स्पष्ट कर दिया कि नक्सली विचारधारा डर और खून-खराबे पर टिकी है। विचारधारा के नाम पर निर्दोष लोगों को निशाना बनाया। उन्होंने न्याय का नारा लगाया, लेकिन मानवता को रौंद दिया। उन्होंने सामाजिक संघर्ष का दावा किया, लेकिन सिर्फ और सिर्फ आतंक फैलाया।
बारा की वह काली रात आज भी याद दिलाती है कि जब विचारधारा पर हिंसा हावी हो जाती है, तब सबसे पहले इंसानियत मरती है।