बस्तर 2.0 की शुरुआत : मुख्यमंत्री साय ने पीएम मोदी को दिया आमंत्रण, विकास का ब्लूप्रिंट सौंपा

बस्तर के लिए 360° प्लान-टूरिज्म, स्टार्टअप, इंफ्रा और इनोवेशन पर फोकस

पीएम का बस्तर दौरा बनेगा टर्निंग पॉइंट, बड़े प्रोजेक्ट्स की सौगात

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर बस्तर के भविष्य की एक नई तस्वीर पेश की। इस मुलाकात में मुख्यमंत्री ने न केवल नक्सलवाद के अंत के बाद प्रदेश में आई शांति के लिए प्रधानमंत्री का आभार जताया, बल्कि बस्तर के समग्र विकास का एक विस्तृत और दूरदर्शी ब्लूप्रिंट भी सौंपा। साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री को मानसून के बाद बस्तर आने का आमंत्रण दिया, जहां उनकी मौजूदगी में कई बड़ी परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण प्रस्तावित है।

उन्होंने बताया कि बस्तर समेत पूरे राज्य में नक्सलवाद समाप्त हो चुका है और अब शांति स्थापित है। शिक्षा व स्वास्थ्य सुधार के तहत नए एजुकेशन सिटी, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बनाए जा रहे हैं, जबकि इंद्रावती नदी पर बैराज, रेल लाइन और एयरपोर्ट विस्तार से कनेक्टिविटी मजबूत हो रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस ब्लूप्रिंट के जरिए बस्तर में अब विकास, रोजगार और बेहतर सुविधाओं का नया दौर शुरू होगा।

मुख्यमंत्री ने अपने विकास दस्तावेज़ में उल्लेख किया कि एक दशक पहले प्रधानमंत्री द्वारा बस्तर के लिए देखा गया शांति और विकास का सपना अब जमीन पर साकार हो रहा है। नक्सलवाद खत्म होने के बाद अब लोगों में डर नहीं, बल्कि उम्मीद और विकास की नई चमक है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन से बस्तर को नई दिशा और गति मिलेगी, जिससे क्षेत्र में विश्वास और उत्साह बढ़ेगा।

मुख्यमंत्री द्वारा प्रस्तुत विकास ब्लूप्रिंट ‘सैचुरेशन, कनेक्ट, फैसिलिटेट, एम्पावर और एंगेज’ रणनीति पर आधारित है। इसके तहत बस्तर में बुनियादी सुविधाओं को तेजी से विस्तार देने का लक्ष्य रखा गया है। सड़कों के व्यापक जाल के माध्यम से दूर-दराज के गांवों को जोड़ा जाएगा। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अधूरे कार्यों को 2027 तक पूरा करने के साथ-साथ नई 228 सड़कों और 267 पुलों का निर्माण प्रस्तावित है। इसके अलावा 61 नई परियोजनाओं के लिए विशेष केंद्रीय सहायता की मांग भी की गई है।

ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भी बड़े बदलाव की योजना है। हर घर तक बिजली पहुंचाने के कार्य तेज होंगे। शिक्षा के क्षेत्र में 45 पोटा केबिन स्कूलों को स्थायी भवनों में बदला जाएगा। युवाओं के लिए 15 स्टेडियम और 2 मल्टीपर्पज हॉल बनाए जाएंगे, जबकि स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार और डॉक्टरों के लिए ट्रांजिट हॉस्टल बनाए जा रहे हैं।

कृषि और सिंचाई के क्षेत्र में इंद्रावती नदी पर दो बड़े प्रोजेक्ट देउरगांव और मटनार में स्वीकृत किए गए हैं, जिनसे 31,840 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। यह परियोजनाएं बस्तर की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगी।

आजीविका और आय बढ़ाने के लिए सरकार ने तीन वर्षीय योजना तैयार की है, जिसका लक्ष्य 2029 तक 85% परिवारों की मासिक आय 15,000 रुपये से बढ़ाकर 30,000 रुपये करना है। ‘नियद नेल्ला नार 2.0’ योजना के तहत अब अधिक जिलों को जोड़ा जा रहा है, जिससे विकास का लाभ व्यापक स्तर पर पहुंचेगा। 10 जिलों में शुरू की गई यह योजना अब 7 जिलों और 3 नए जिलों (गरियाबंद, मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई) तक विस्तारित हो रही है।

 ‘अंजोर विजन 2047’ और ‘विकसित भारत@2047’ के तहत स्टार्टअप नीति भी लागू की गई है, जिसमें 2030 तक 5,000 स्टार्टअप तैयार करने का लक्ष्य है।

पर्यटन के क्षेत्र में बस्तर की पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में भी तेजी से काम हो रहा है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी नेशनल पार्क, एडवेंचर टूरिज्म, कैनोपी वॉक और ग्लास ब्रिज जैसी परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे आयोजन क्षेत्र को नई पहचान दे रहे हैं। वहीं, एक लाख से अधिक युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिनमें से 40 हजार को रोजगार भी मिल चुका है।

नक्सलवाद से मुक्त बस्तर के विकास के लिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज प्रधानमंत्री के सामने जो कार्ययोजना प्रस्तुत की, उसमें ‘बस्तर मुन्ने’ (अग्रणी बस्तर) कार्यक्रम एक अहम पहल है। इस कार्यक्रम के तहत हर ग्राम पंचायत में शिविर लगाए जाएंगे, जहाँ अधिकारियों की मौजूदगी में लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे दिया जाएगा, जरूरी दस्तावेज वहीं बनाए जाएंगे और उनकी समस्याओं का मौके पर ही समाधान किया जाएगा। इसका उद्देश्य है कि हर व्यक्ति तक सरकार की योजनाएँ आसानी से पहुँचें और बस्तर तेजी से विकास की राह पर आगे बढ़े।

प्रधानमंत्री के प्रस्तावित दौरे के दौरान जिन प्रमुख परियोजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण की योजना है, उनमें रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन, जगदलपुर एयरपोर्ट का विस्तार, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, दंतेवाड़ा में मेडिकल कॉलेज, जगरगुंडा और ओरछा में एजुकेशन सिटी जैसी महत्वपूर्ण पहल शामिल हैं। ये परियोजनाएं बस्तर को शिक्षा, स्वास्थ्य और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगी।

दशकों के वामपंथी उग्रवाद की समाप्ति

दशकों से फैले वामपंथी लाल आतंकी हिंसा के घनघोर अंधकार की समाप्ति की औपचारिक घोषणा हो चुकी है। अधिकांश नक्सलवादियों ने हथियार डाल दिए हैं। शांति के कपोत अब खुले आसमान में निर्भय उड़ान भर रहे हैं। राष्ट्र की देह में पल रहे इस बुरे नासूर की शल्य चिकित्सा कर दी गई है। यह मात्र एक राजनीतिक विजय नहीं, बल्कि लाखों जनजातीय परिवारों की मुक्ति, हजारों जवानों के सर्वोच्च बलिदान का फल और एक राष्ट्र की सामूहिक आस्था की जीत है।

पीछे देखते हैं तो नक्सलवाद की कहानी शुरू होती है वर्ष 1967 से, जब पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव में एक छोटा सा किसान विद्रोह भड़का। उस समय के कम्युनिस्ट नेताओं चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में गरीब किसानों और आदिवासियों ने जमींदारों के खिलाफ हथियार उठा लिए। नक्सलबाड़ी आंदोलन ने वामपंथी विचारधारा को हिंसक रूप दिया। सीपीआई एमएल जैसी पार्टियां बनीं। 1970 के दशक में यह बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश तक पहुंच गया। 1980 के दशक में पीपुल्स वॉर ग्रुप और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर जैसे संगठन सक्रिय हुए। 2004 में इनका विलय होकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया माओइस्ट बना। छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और आंध्र जैसे राज्यों के जंगलों में यह संगठन राज करने लगा।

जनजातीय के रहवास वनों में अपना डेरा डाला और छिपने की जगह बनाई और शोषण के विरोध के नाम पर वनवासी युवाओं को बंदूकें थमाई। नक्सली कहते थे कि वे वनवासियों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। पर वास्तव में नक्सलियों ने वनों की धरती को वनवासियों के रक्त से ही लाल किया, उन्हें ही अपना शिकार बनाया। उन्होंने स्कूल जलाए, सड़कें तोड़ीं, विकास कार्य रोके और अपनी ही जनता पर अत्याचार किए। यह लाल अंधकार धीरे-धीरे राष्ट्र की देह में कैंसर की तरह फैलता गया।

अब बात करते हैं हत्याओं की, नक्सलियों द्वारा की गई हत्याओं की संख्या दिल दहला देने वाली है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2004 से नवंबर 2025 तक लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म ने 8956 लोगों को मार डाला। इनमें अधिकांश वनों में रहने वाले थे, जिन्हें नक्सली पुलिस मुखबिर बताकर क्रूरता से मारते थे। 2010 में दंतेवाड़ा हमले में अकेले 76 सीआरपीएफ जवान बलिदान हो गए। बस्तर में सैकड़ों ग्रामीणों को जिंदा जलाया गया। एर्राबोर के नृशंस सामूहिक हत्याकांड को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

नक्सल जनित हर हत्या के पीछे एक परिवार का आंसू था, एक मां का रोना था, एक बच्चे का भविष्य छिन जाना था। यह मात्र आंकड़े नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में जहां कभी वनवासी गीत गुनगुनाते थे, नृत्य करते थे, अपने त्योहार मनाते थे, वहां नक्सली आतंक के कारण चुप्पी थी। गांवों से लोगों ने अपने बच्चों को शहर भेज दिया ताकि वे नक्सलियों के हाथों न पड़ जाएं। मैंने अनुभव किया है कि शहरों में रहने वाले बच्चे अब बड़े होकर अपने समुदाय की बोली और संस्कृति तथा देवी देवता भूल चुके हैं, जिन्हें पीढियों से उनके पुरखे मानते आए हैं।

पूर्व सरकारों ने समस्या को हल करने की कोई अधिक कोशिश नहीं की। कभी सिर्फ बातचीत, कभी सिर्फ ऑपरेशन। नतीजा यह हुआ कि नक्सलवाद 100 से अधिक जिलों में फैल गया। 2014 के बाद सरकार ने नीति में बदलाव किया। सुरक्षा बलों को आधुनिक हथियार दिए गए। खुफिया तंत्र को मजबूत किया गया। सबसे महत्वपूर्ण, विकास को हथियार बनाया गया। सड़कें बनीं, बिजली पहुंची, मोबाइल टावर लगे, स्कूल खुले और स्थानीय निवासियों के लिए रोजगार के साधन उपलब्ध कराए और नक्सली कैडरों को सरेंडर पैकेज देकर पुनर्वास पर जोर दिया गया।

छत्तीसगढ़ सरकार ने लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई। बस्तर पंडुम जैसी योजनाएं शुरू हुईं। स्थानीय पुलिस और केंद्रीय बलों का समन्वय बढ़ा। 2023 के बाद से छत्तीसगढ़ में अभियान तेज हुए। बस्तर रेंज में सैकड़ों कैडरों ने हथियार डाले। महिलाएं भी मुख्यधारा में आईं। सरकार ने कहा कि जनजातीय को बंदूक नहीं, विकास चाहिए। पुनर्वास पैकेज बढ़ाया, कौशल विकास केंद्र खोले और ट्राइबल युवाओं को आईटीआई में प्रशिक्षण दिया। यह स्थानीय स्तर की लड़ाई थी जो राष्ट्र स्तर की जीत बन गई।

गृह मंत्रालय के अनुसार 2014 से अब तक 10000 से अधिक नक्सली मुख्यधारा में आए।

यह संयोग नहीं, बल्कि इतिहास का न्याय है। लाल अंधकार चीरकर शांति की किरणें निकल रही हैं। कोई डर नहीं, कोई गोली नहीं, सिर्फ विकास की हवा। भीतर के क्षेत्रों में सड़कें बनेंगी, सड़कों के माध्यम से मूलभूत सुविधाएं गांवों तक पहुंचेंगी, सड़कों पर निर्भय होकर वाहन चलेंगे। मोबाइल के टावर लगने से ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी सुविधाओं का लाभ उठाएंगे।

वामपंथी उग्रवाद को लोगों ने नकार दिया और समर्पण करने वाले नक्सली भी अब समझ गये हैं कि हथियारों के बल पर सत्ता हासिल नहीं की जा सकती, जिसने भी यह प्रयास किया, उसे एक दिन पराजित होना ही पड़ा है। यहां किसी भी प्रकार की हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है।

मार्कफेड की राज्य स्तरीय समीक्षा बैठक में धान निराकरण एवं उठाव में तेजी के निर्देश

रायपुर, 02 अप्रैल 2026

छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ मर्यादित (मार्कफेड) के प्राधिकृत अधिकारी द्वारा आज नवा रायपुर स्थित न्यू सर्किट हाउस में जिला विपणन अधिकारियों की राज्य स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में प्रदेश के सभी जिलों के विपणन अधिकारी उपस्थित रहे, जहां धान खरीदी, भंडारण एवं उठाव से जुड़े विभिन्न विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई। बैठक में वर्ष 2024-25 के धान निराकरण की वर्तमान स्थिति की समीक्षा करते हुए प्राधिकृत अधिकारी श्री शशिकांत द्विवेदी ने शेष धान के शीघ्र निराकरण के लिए अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए। 

प्राधिकृत अधिकारी मार्कफेड में संग्रहण केंद्रों से धान उठाव के लिए जारी टी.ओ. तथा वर्ष 2025-26 के लिए जारी डी.ओ. के विरुद्ध वास्तविक उठाव की जिलेवार प्रगति का मूल्यांकन किया गया। उन्होंने 30 मार्च 2026 की स्थिति में उपार्जन केंद्रों में उपलब्ध शेष धान की जानकारी लेते हुए उसके सुरक्षित संधारण एवं त्वरित उठाव सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने इसके अलावा, जिलों में अनुपयोगी बारदानों के प्रबंधन तथा स्वयं के एवं किराए के गोदामों से संबंधित लंबित प्रकरणों के शीघ्र निराकरण पर भी विशेष जोर दिया।

बैठक में पिछली समीक्षा बैठक में दिए गए निर्देशों के अनुपालन की भी गहन समीक्षा की गई। प्राधिकृत अधिकारी ने स्पष्ट किया कि धान खरीदी एवं उठाव की प्रक्रिया में पारदर्शिता, समयबद्धता एवं जवाबदेही अत्यंत आवश्यक है और सभी अधिकारियों को निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करनी होगी। इस अवसर पर मार्कफेड मुख्यालय के अपर प्रबंध संचालक, मुख्य लेखाधिकारी सह वित्तीय नियंत्रक, समस्त महाप्रबंधक एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

लोकसभा और राज्यसभा ने जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया

79 केंद्रीय अधिनियमों के 784 प्रावधान संशोधित, 717 प्रावधानों का अपराधमुक्तिकरण, 67 प्रावधानों में संशोधन लाकर जीवन सुगमता को बढ़ावा

जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026 को लोकसभा और राज्यसभा द्वारा पारित किया गया है, जो देश में व्यापार सुगमता और जीवन सुगमता को और बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह विधेयक सरकार की विश्वास-आधारित शासन ढांचे को बढ़ावा देने और समानुपातिक नियमन सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह व्यक्तियों और व्यवसायों पर अनुपालन बोझ को कम करने के लिए छोटे अपराधों का अपराधमुक्तिकरण तथा मौजूदा कानूनी प्रावधानों को तर्कसंगत करने का प्रयास करता है।

विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, 23 मंत्रालयों द्वारा प्रशासित 79 केंद्रीय अधिनियमों के 784 प्रावधानों में संशोधन किया गया है। इनमें से 717 प्रावधानों का अपराधमुक्तिकरण व्यापार सुगमता को बढ़ावा देने के लिए किया गया है, जबकि 67 प्रावधानों में संशोधन जीवन सुगमता को सुगम बनाने के लिए किया गया है।

कुल मिलाकर, विधेयक छोटे अपराधों को हटाकर 1,000 से अधिक अपराधों को तर्कसंगत करने का प्रयास करता है, जिससे समग्र नियामक वातावरण में सुधार होगा और व्यवसायों तथा नागरिकों के लिए अधिक अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र सक्षम होगा।

यह विधेयक प्रारंभ में 18 अगस्त 2025 को लोकसभा में जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2025 के रूप में पेश किया गया था।

 इसमें 10 मंत्रालयों/विभागों द्वारा प्रशासित 16 केंद्रीय अधिनियमों के 355 प्रावधानों में संशोधन प्रस्तावित था और इसे लोकसभा की एक चयन समिति को भेज दिया गया। 

श्री तेजस्वी सूर्या की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने 49 बैठकें आयोजित कीं और 13 मार्च 2026 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। समिति ने व्यापक हितधारक परामर्श किया और विचाराधीन प्रावधानों के अलावा उसी अधिनियमों के अन्य प्रावधानों की भी जांच की तथा 62 अतिरिक्त केंद्रीय अधिनियमों में अपराधमुक्तिकरण की सिफारिश की।

‘महतारी गौरव वर्ष’ : महिला सशक्तिकरण के नवयुग की ओर अग्रसर छत्तीसगढ़

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ आज महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दौर से गुजर रहा है। मातृशक्ति के सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राज्य सरकार ने इस वर्ष को ‘महतारी गौरव वर्ष’ के रूप में मनाने की घोषणा की है। यह पहल केवल एक औपचारिक घोषणा नहीं है, बल्कि महिलाओं को राज्य की विकास यात्रा के केंद्र में स्थापित करने का सशक्त संकल्प है।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय

विश्वास से निर्माण और अब गौरव की ओर
मुख्यमंत्री श्री साय ने अपने कार्यकाल के पहले वर्ष को ‘विश्वास वर्ष’ के रूप में शासन-प्रशासन और जनता के बीच भरोसे की पुनर्स्थापना को समर्पित किया। इसके बाद दूसरे वर्ष को भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में ‘अटल निर्माण वर्ष’ के रूप में मनाते हुए अधोसंरचना विकास और जनकल्याणकारी योजनाओं को नई गति दी गई। अब तीसरा वर्ष ‘महतारी गौरव वर्ष’ के रूप में माताओं और बहनों को समर्पित किया गया है, जिसमें राज्य की अधिकांश योजनाओं का केंद्रबिंदु महिलाएं होंगी। यह क्रम सरकार की संवेदनशील और समावेशी विकास की सोच को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

महतारी वंदन योजना : आत्मसम्मान और आर्थिक सुरक्षा का आधार
छत्तीसगढ़ सरकार की महतारी वंदन योजना आज महिला सशक्तिकरण का मजबूत स्तंभ बन चुकी है। इस योजना के तहत प्रदेश की लगभग 70 लाख विवाहित महिलाओं को प्रतिमाह 1,000 रुपये की सहायता सीधे उनके बैंक खातों में प्रदान की जा रही है। अब तक 15 हजार 595 करोड़ रुपये से अधिक की राशि डीबीटी के माध्यम से महिलाओं को दी जा चुकी है। हाल ही में 24वीं किस्त के रूप में 68 लाख से अधिक महिलाओं को 641 करोड़ रुपये की राशि प्रदान की गई।यह नियमित आर्थिक सहयोग महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ ही उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बना रहा है। कई महिलाएं इस राशि को केवल घरेलू खर्च तक सीमित न रखकर स्वरोजगार और छोटे व्यवसायों में निवेश कर रही हैं।

संघर्ष से स्वावलंबन तक

संघर्ष से स्वावलंबन तक : रोहनी पटेल की प्रेरक कहानी
बालोद जिले के ग्राम खैरडीह की श्रीमती रोहनी पटेल इसका एक प्रेरणादायक उदाहरण हैं। पति की असमय मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। घर में वृद्ध सास की देखभाल और कॉलेज में पढ़ रहे दो बच्चों की पढ़ाई की चिंता उनके लिए बड़ी चुनौती थी।ऐसे कठिन समय में महतारी वंदन योजना उनके लिए उम्मीद की किरण बनकर आई। योजना से मिलने वाली राशि को उन्होंने सावधानीपूर्वक बचत कर अपने खेत में सब्जी उत्पादन का कार्य शुरू किया। बीज, खाद और कृषि सामग्री की व्यवस्था कर उन्होंने पूरी मेहनत से खेती की।
आज श्रीमती रोहनी पटेल अपने खेत में उगाई गई ताजी सब्जियों को स्थानीय बाजारों में बेचकर नियमित आय अर्जित कर रही हैं। इस आय से वे अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर रही हैं और बच्चों की पढ़ाई भी निर्बाध रूप से जारी है। उनका यह प्रयास गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन चुका है।

महिला सशक्तिकरण के नवयुग की ओर अग्रसर छत्तीसगढ़

बिहान से बदली जिंदगी : ‘लखपति दीदी’ बनीं श्रीमती माहेश्वरी यादव
बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के ग्राम कोरदा की श्रीमती माहेश्वरी यादव भी महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरक मिसाल हैं। पहले उनका जीवन सामान्य गृहिणी की तरह घर-परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित था। लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया।
समूह के सहयोग और परिवार के समर्थन से उन्होंने गांव में एक छोटी किराना दुकान शुरू की। अपनी मेहनत और बेहतर प्रबंधन के बल पर यह दुकान धीरे-धीरे गांव में भरोसेमंद केंद्र बन गई। आज इस दुकान से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 1 से 1.5 लाख रुपये की आय हो रही है और वे ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं। इससे उनके बच्चों की शिक्षा और परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

आधुनिक तकनीक से नई पहचान : ‘ड्रोन दीदी’ सुश्री सीमा वर्मा

आधुनिक तकनीक से नई पहचान : ‘ड्रोन दीदी’ सुश्री सीमा वर्मा
बिलासपुर जिले के मस्तूरी क्षेत्र की सुश्री सीमा वर्मा ने भी यह साबित किया है कि अवसर और प्रशिक्षण मिलने पर महिलाएं आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में भी नई पहचान बना सकती हैं।
स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने पहले मशरूम उत्पादन का कार्य शुरू किया और बाद में ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। शासन की सहायता से उन्हें ड्रोन सेट, जनरेटर और ई-वाहन उपलब्ध कराया गया।
आज सीमा वर्मा किसानों के खेतों में ड्रोन के माध्यम से कीटनाशक छिड़काव कर रही हैं और इस कार्य से उन्हें सम्मानजनक आय प्राप्त हो रही है। गांव में लोग उन्हें स्नेहपूर्वक ‘ड्रोन दीदी’ के नाम से जानते हैं।

बजट में महिला कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता
राज्य सरकार ने महिला एवं बाल विकास विभाग के लिए 8 हजार 245 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है।
आंगनबाड़ी एवं पोषण योजनाओं के लिए 2 हजार 320 करोड़ रुपये, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के लिए 120 करोड़ रुपये, मिशन वात्सल्य के लिए 80 करोड़ रुपये तथा रानी दुर्गावती योजना के लिए 15 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
इसके अतिरिक्त 750 नए आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्माण के लिए 42 करोड़ रुपये और 250 महतारी सदनों के निर्माण के लिए 75 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। यह बजटीय प्रावधान महिलाओं और बच्चों के समग्र विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

सुरक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा की सुदृढ़ व्यवस्था
महिला सुरक्षा के क्षेत्र में भी राज्य ने प्रभावी तंत्र विकसित किया है। वन स्टॉप सेंटर, 181 महिला हेल्पलाइन और डायल 112 के माध्यम से संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। सुखद सहारा योजना के अंतर्गत 2 लाख 18 हजार से अधिक विधवा एवं परित्यक्ता महिलाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है।

स्वावलंबन से नेतृत्व तक
प्रदेश में 42 हजार से अधिक महिला स्व-सहायता समूहों को रियायती ऋण प्रदान कर आर्थिक रूप से सशक्त बनाया गया है। रेडी-टू-ईट कार्य महिला समूहों को सौंपे जाने से उन्हें स्थायी आय का स्रोत मिला है। इसके साथ ही डिजिटल सखी, दीदी ई-रिक्शा, सिलाई मशीन सहायता, मिनीमाता महतारी जतन योजना और लखपति दीदी जैसी पहलें महिलाओं को नए आजीविका अवसर प्रदान कर रही हैं।
महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के अनुसार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें सुरक्षित तथा सम्मानजनक वातावरण प्रदान करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

विकसित छत्तीसगढ़ की सशक्त आधारशिला
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य के अनुरूप ‘छत्तीसगढ़ अंजोर विजन 2047’ के माध्यम से राज्य को समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को अनिवार्य तत्व माना गया है।
‘महतारी गौरव वर्ष’ केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का व्यापक अभियान है। यह वर्ष छत्तीसगढ़ में मातृशक्ति के सम्मान, आत्मविश्वास और नेतृत्व को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संकल्प लेकर आया है। आज प्रदेश की महिलाएं आत्मनिर्भरता, नवाचार और नेतृत्व के साथ विकास की नई कहानी लिख रही हैं। यही सशक्त मातृशक्ति विकसित और समृद्ध छत्तीसगढ़ की सबसे मजबूत आधारशिला बनेगी।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में 35वीं रैंक प्राप्त करने वाली सुश्री वैभवी अग्रवाल को मुख्यमंत्री ने दी बधाई

कड़ी मेहनत और लगन से कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय

रायपुर, 7 मार्च 2026

संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में 35वीं रैंक प्राप्त करने वाली सुश्री वैभवी अग्रवाल ने आज मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय से राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में भेंट की।  मुख्यमंत्री श्री साय ने सुश्री वैभवी को मिठाई खिलाकर उनकी इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ दीं। मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि सुश्री वैभवी अग्रवाल ने अपनी प्रतिभा, कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा में उत्कृष्ट सफलता प्राप्त कर न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि वैभवी की यह सफलता प्रदेश के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की उपलब्धियाँ यह संदेश देती हैं कि लक्ष्य के प्रति समर्पण,अनुशासन और निरंतर प्रयास से कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है।

मुख्यमंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि सुश्री वैभवी अग्रवाल भविष्य में प्रशासनिक सेवा में अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए देश और समाज की सेवा में महत्वपूर्ण योगदान देंगी। उन्होंने उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए आगामी दायित्वों के लिए शुभकामनाएँ दीं।

इस अवसर पर सुश्री वैभवी अग्रवाल के पिता श्री शीतल अग्रवाल और भाई श्री विनायक अग्रवाल उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री निवास में होली के रंगों की बौछार: मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने अधिकारियों-कर्मचारियों संग खेली होली

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने आज राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ पूरे उत्साह और उमंग के साथ होली का पर्व मनाया। पारंपरिक फाग गीतों और हर्षोल्लास के वातावरण में रंग और उल्लास से सराबोर इस अवसर पर सभी ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएँ दीं। अधिकारियों और कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री श्री साय को गुलाल लगाकर उन्हें बधाई दी, वहीं मुख्यमंत्री श्री साय ने भी आत्मीयता के साथ सभी को गुलाल लगाकर रंगोत्सव की शुभकामनाएँ दीं और स्नेह, विश्वास तथा आपसी भाईचारे का संदेश दिया।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सद्भाव और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यह पर्व समाज में एकता, भाईचारे और सकारात्मकता की भावना को सुदृढ़ करता है तथा जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के पर्व हमें आपसी मतभेद भुलाकर मिल-जुलकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आज मुख्यमंत्री निवास में आयोजित होली मिलन समारोह में सभी से आत्मीय भेंट कर उन्हें अत्यंत प्रसन्नता हुई। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों, साथियों और प्रदेशवासियों के साथ स्नेह, विश्वास और अपनत्व के रंग साझा करना इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने कहा कि प्रदेशवासियों का स्नेह और आशीर्वाद ही जनसेवा के उनके संकल्प को और अधिक सशक्त बनाता है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हुए सभी को होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि रंगों का यह पावन पर्व सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और नई ऊर्जा का संचार करे तथा हमारा छत्तीसगढ़ निरंतर विकास और खुशहाली के नए आयाम स्थापित करता रहे। 

इस अवसर पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री सुबोध कुमार सिंह, पुलिस महानिदेशक श्री अरुण देव गौतम, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक श्री अमित कुमार, रायपुर के पुलिस कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला सहित मुख्यमंत्री सचिवालय एवं निवास कार्यालय के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे।

होली खुशियों और जुड़ाव का अवसर, किसानों की समृद्धि से बढ़ा उत्साह – मुख्यमंत्री श्री साय

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज धरसींवा विधानसभा क्षेत्र में विधायक श्री अनुज शर्मा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल हुए और क्षेत्रवासियों के साथ होली की खुशियाँ साझा कीं। मुख्यमंत्री ने आयोजन में आमंत्रित किए जाने पर विधायक श्री अनुज शर्मा का आभार व्यक्त करते हुए सभी उपस्थितजनों को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे को मजबूत करने का पर्व है। यह हमें मन-मुटाव भुलाकर एक-दूसरे के साथ मिलकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि होलिका बुराई का प्रतीक है, जिसका दहन कर हमें जीवन में अच्छाई, सकारात्मकता और खुशहाली को अपनाना है तथा सबके सहयोग से छत्तीसगढ़ को विकास के पथ पर आगे बढ़ाना है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इस वर्ष 4 मार्च को होली का पर्व है और इसका उत्साह अभी से दिखाई देने लगा है। उन्होंने बताया कि हाल ही में कृषक उन्नति योजना के अंतर्गत किसानों के खातों में राशि अंतरित की गई है, जिससे किसानों में विशेष उत्साह है और इस बार प्रदेश में होली का पर्व और अधिक उल्लासपूर्ण माहौल में मनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि होली सामाजिक और पारिवारिक जुड़ाव का अवसर भी है, जो समाज में आत्मीयता और विश्वास को मजबूत करता है।

विधायक श्री अनुज शर्मा ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय द्वारा किसानों के खातों में सहायता राशि अंतरित किए जाने से किसानों में खुशी का माहौल है और वे इस वर्ष होली का त्योहार अधिक आनंद और उत्साह के साथ मना रहे हैं। उन्होंने कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक फाग गीत प्रस्तुत कर वातावरण को उत्सवमय बना दिया, जिससे पूरा परिसर होली के रंग में सराबोर हो गया।

सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल ने भी क्षेत्रवासियों को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की।

इस अवसर पर विधायक श्री मोतीलाल साहू, श्री पुरंदर मिश्रा, फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष सुश्री मोना सेन सहित अन्य जनप्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में गणमान्यजन उपस्थित थे।

समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण संघ कार्य का मूल आधार – डॉ. मोहन भागवत जी

चरित्र से मजबूत होता है राष्ट्र, संघ मूल्य आधारित संगठन – ले. जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल जी

कुरुक्षेत्र – 28 फरवरी 2026।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण संघ कार्य का मूल आधार हैं। स्पष्ट किया कि नैतिक मूल्यों, आचरण, संस्कार और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के साथ पुरुषार्थ का समन्वय आवश्यक है, तभी स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। सरसंघचालक जी शनिवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त प्रमुख जन गोष्ठी में हरियाणा प्रदेश के प्रमुख शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान मंच पर सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस. जायसवाल जी, उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल जी और प्रांत संघचालक प्रताप सिंह जी उपस्थित रहे ।

सरसंघचालक जी ने परिवार की भूमिका पर विशेष बल देते हुए कहा कि घरों में मंगल संवाद की परंपरा विकसित होनी चाहिए, जहां मन से मन का संवाद हो और बच्चों को उचित-अनुचित का बोध कराया जाए। केवल उपदेश नहीं, बल्कि संवाद और संस्कारयुक्त वातावरण ही व्यक्ति को भटकाव से बचाता है। संपत्ति के समय साथ खड़े होने वाले बहुत होते हैं, लेकिन विपत्ति में साथ देने वाला कौन है, यह परिवार और समाज के संस्कार तय करते हैं। यदि कोई भी इंसान असफल हो जाए या बुरी संगति में पड़ जाए, तो उसे मार्गदर्शन देने वाला, समझाने वाला और संभालने वाला अपना परिवार और समाज ही होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कुटुंब और समाज में संस्कारों का वातावरण निर्माण करना समय की आवश्यकता है, क्योंकि यही वातावरण जिम्मेदार, संवेदनशील और चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण करता है।

सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ को समझना है तो संघ में आकर ही समझना पड़ेगा। केवल बाहर से देखकर, कल्पना से और फैलाये जा रहे नैरेटिव से नहीं समझ सकते, क्योंकि संघ का जैसा काम है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं है। आज पांचों महाद्वीपों से महत्वपूर्ण लोग संघ को देखने, जानने और समझने के लिए आते हैं। वे भी अपने देश के युवाओं के लिए इस तरह का विचार संगठन खड़ा करने के लिए सहयोग मांगते हैं, क्योंकि उनके पास ऐसा ढांचा नहीं है।

उन्होंने कहा कि जिस तरह से सूर्य जैसा कोई दूसरा सूर्य नहीं, आकाश जैसा दूसरा आकाश नहीं है,  उसी तरह से संघ जैसा दूसरा संगठन नहीं है। अगर कोई दूर से देखकर संघ को जानना चाहता है, तो पता नहीं लगेगा। उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवक देश में एक लाख 30 हजार सेवा कार्य चलाते हैं, इसके बाद भी संघ सर्विस आर्गेनाइजेशन नहीं है। कला से लेकर क्रीड़ा तक और विविध क्षेत्रों से लेकर राजनीति तक संघ विचार के कार्यकर्ता हैं, पर संघ एक राजनीतिक संगठन नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ के बारे में एक बात समझने की है कि वह स्पर्धा के भाव से शुरु नहीं हुआ। संघ किसी एक परिस्थिति की प्रतिक्रिया में या विरोध में नहीं चला, बल्कि राष्ट्र के लिए प्रतिबद्धता के साथ समाज को जोड़ने के लिए कार्य करता है। संघ को किसी पर कोई प्रभाव नहीं जमाना, ना ही उसे सत्ता की आवश्यकता है। समाज और देश के लिए संघ के कार्य चलता है, उन सब को पूर्ण करने वाला काम ही संघ है।

सरसंघचालक जी ने कहा कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश आक्रांताओं के खिलाफ हार हुई थी। भारत का एक लंबा कालखंड रहा, जब आक्रांता हम पर राज करते रहे और हम अपनी ही जमीन पर उनसे क्यों हार रहे हैं…इस पर विचार हुआ था। तब किसी ने सोचा था कि एक बार हार गये तो क्या हुआ…। इसी विचार से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए तब 1860 में क्रांतिकारी वासुदेव बलंवत फड़के ने एक भाव जागृत किया। उनका मानना था कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में एक मोर्चा हारा है, देश नहीं, फिर से स्वतंत्रता के लिए लड़ेंगे। इसके बाद स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रभक्तों की लंबी श्रृंखला डॉ. हेडगेवार जी से भगत सिंह, राजगुरु, नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक आगे आई और यह प्रयास लगातार जारी रहे। वासुदेव बलवंत फड़के को आज भी महाराष्ट्र में आद्य क्रांतिकारी कहा जाता है।

डॉ. मोहन भागवत जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्हें जन्मजात देशभक्त बताया। उन्होंने कहा कि बाल्यकाल से ही बालक केशव के मन में राष्ट्रभाव प्रखर था। मात्र 11 वर्ष की आयु में बालक केशव ने गुलामी के प्रतीक के रूप में बांटी गई मिठाई को कचरे में डाल दिया था, जो उनके स्वाभिमानी स्वभाव का संकेत था। उनके माता-पिता भी सेवा भाव से प्रेरित थे और प्लेग पीड़ितों की सेवा में लगे रहते थे, जिसका गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। छात्र जीवन में ही उन्होंने वंदे मातरम् आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उनकी प्रतिभा और राष्ट्रनिष्ठा को देखकर नागपुर के राष्ट्रीय विचार के नेताओं ने उन्हें चिकित्सा शिक्षा के लिए भेजा, जहां उन्होंने प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की और क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े। वे अनुशीलन समिति से भी जुड़े और स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।

सरसंघचालक जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार जी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौर में कई राष्ट्रभक्तों से संवाद किया और क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग किया। बालक केशव से लेकर संघ संस्थापक बनने तक का उनका सफर राष्ट्र चिंतन, प्रयोग और संगठन निर्माण से जुड़ा रहा। लंबे ऐतिहासिक पराधीनता काल के बाद डॉ. हेडगेवार जी ने यह विचार किया कि केवल राजनीतिक परिवर्तन पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज का संगठन और चरित्र निर्माण आवश्यक है। इसी सोच के तहत उन्होंने 10-11 वर्षों तक विभिन्न प्रयोग किए और एक विशिष्ट कार्यपद्धति विकसित की, जिसके आधार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई।

उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना के बाद प्रारंभिक वर्षों में किए गए प्रयोगों से जो कार्यपद्धति विकसित हुई, उसी से संगठन का स्वरूप मजबूत हुआ। उनका मानना था कि समाज को संगठित किए बिना राष्ट्र निर्माण संभव नहीं और देश का कार्य किसी एक संस्था या व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। डॉ. हेडगेवार जी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि महापुरुषों के प्रयास तात्कालिक प्रेरणा देते हैं, लेकिन स्थायी परिवर्तन समाज के आचरण और पुरुषार्थ से आता है। व्यवस्था परिवर्तन के लिए समाज परिवर्तन आवश्यक है और इसके लिए वातावरण निर्माण करने वाले चरित्रवान व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।

उन्होंने कहा कि संघ का मूल कार्य व्यक्तित्व निर्माण और समाज का संगठन है। संघ स्वयं को उद्धारक नहीं मानता, बल्कि समाज को सक्षम बनाने का कार्य करता है। उनके अनुसार, प्रत्येक गांव और बस्ती में ऐसे लोगों का निर्माण जरूरी है जो राष्ट्रीय चरित्र के उदाहरण बनें और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करें। संघ संपूर्ण समाज को जोड़ने की बात करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दू किसी संकीर्ण पहचान का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और गुणात्मक जीवन दृष्टि का प्रतीक है, जिसका मूल आधार संस्कार, आचरण और राष्ट्रहित है।

संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल ने वंदे मातरम् के उद्घोष से शुरुआत की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा को असाधारण बताया। उन्होंने कहा कि विश्व में शायद ही कोई ऐसा संगठन हो जो इतने वर्षों से निरंतर विस्तार और प्रभाव के साथ कार्य कर रहा हो। इस कार्यक्रम में उपस्थित होकर उन्हें नैतिक मूल्यों से प्रेरित वातावरण का अनुभव हुआ। जायसवाल ने संघ को एक मूल्य-आधारित संगठन बताते हुए कहा कि सेना की तरह संघ भी अनुशासन, संस्कार और राष्ट्रीयता के भाव से परिपूर्ण है। उन्होंने हिन्दू संस्कृति को भारत की पहचान बताते हुए कहा कि यदि संस्कृति समाप्त हो जाए तो केवल भूमि रह जाएगी, चरित्र नहीं। उन्होंने कहा कि संघ के माध्यम से राष्ट्र के प्रति निष्ठा और चरित्र निर्माण का कार्य निरंतर बढ़ रहा है।

संघ में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता और यही उसका मूल मंत्र है। उन्होंने महात्मा गांधी के वर्धा प्रवास का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी संघ की शाखा में समानता का भाव देखने को मिला था। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल सेना और उद्योग से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र से तय होती है, और चरित्र निर्माण संघ का मूल आधार है। राष्ट्रीय जिम्मेदारी के संदर्भ में उन्होंने विभाजन काल, भूदान आंदोलन, 1962 के युद्ध और कारगिल युद्ध के दौरान संघ स्वयंसेवकों की सेवा गतिविधियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राहत शिविर, ट्रैफिक नियंत्रण और रक्तदान जैसे कार्यों के माध्यम से संघ ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी सराहा था।

उन्होंने वीर सावरकर के कथन का उल्लेख करते हुए भारतीय सभ्यता को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता बताया। साथ ही कहा कि भारतीय सेना में धर्म नहीं, बल्कि वर्दी और तिरंगा सर्वोपरि होते हैं और सर्वधर्म समभाव की भावना ही उसकी पहचान है। जायसवाल ने विभाजनकारी सोच को त्यागने का आह्वान करते हुए कहा कि अस्पताल में रक्त की पहचान ही सबसे बड़ी होती है, इसलिए समाज में भी एकता का भाव होना चाहिए। संघ में अनुशासन और संस्कार को ही वास्तविक धर्म माना जाता है।

उन्होंने भारत को विश्वगुरु बनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया और कहा कि संघ के मूल मूल्यों पर चलकर ही राष्ट्र की विजय सुनिश्चित हो सकती है। उन्होंने “जय हिंद” के साथ अपने वक्तव्य का समापन किया।

वृत्तचित्रप्रदर्शनी और संघ की यात्रा

इस अवसर पर परिसर में संघ की 100 वर्ष की यात्रा पर आधारित एक प्रदर्शनी, अस्थाई साहित्य केंद्र, स्वदेशी उत्पाद केंद्र, पंचगव्य उत्पाद केंद्र स्थापित किया गया। संघ की प्रदर्शनी में संघ की क्रमिक विकास यात्रा के साथ इनमें संघ वृक्ष के बीज डॉ. हेडगेवार जी से वटवृक्ष बनने तक की सचित्र यात्रा दिखी। इसी के साथ स्वदेशी जागरण मंच, राष्ट्र सेविका समिति, नर सेवा नारायण सेवा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, विद्या भारती, संस्कार भारती, हिन्दू जागरण मंच, विश्व हिन्दू परिषद, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम तथा भारतीय किसान संघ की झलक देखने को मिली।

सभागार में कार्यक्रम के शुभारंभ से पहले संघ की सौ वर्ष की यात्रा, वृत्त चित्र के माध्यम से प्रस्तुत की गई। इसमें संघ के जनक की जीवनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी प्रमुख घटनाओं को दर्शाया गया। इसमें संघ के गठन से लेकर वर्तमान तक की यात्रा शामिल रही। डॉ. हेडगेवार जी का मूलमंत्र -संगठन कागजों में नहीं, लोगों के दिल में, इस वृत्त चित्र में सामने था।

The Kerala Story 2 – भले ही न्‍यायालय में चुनौती दी जाए, पर आंकड़े झूठ नहीं बोलते..!

2011 की जनगणना बताती है कि केरल में मुस्लिम आबादी 26.56 प्रतिशत थी, जबकि 1951 में यह 17.4 प्रतिशत थी। 2001 से 2011 के बीच मुस्लिम आबादी वृद्धि दर 12.8 प्रतिशत रही, जबकि राज्य की कुल जनसंख्या वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत थी। उसी अवधि में हिन्दुओं की वृद्धि दर 2.23 प्रतिशत और ईसाइयों की 1.38 प्रतिशत रही। स्पष्ट है कि वृद्धि दर में अंतर है।

जब किसी फिल्म से इतना भय पैदा हो जाए कि उसकी रिलीज से पहले न्‍यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़े तो समझ लीजिए कि मामला सच सामने आने के बाद असहजता से संबंधित है। द केरल स्टोरी 2, ठीक उसी मोड़ पर खड़ी है। 27 फरवरी, 2026 को रिलीज होने से पहले ही केरल उच्च न्यायालय ने अस्थायी रोक लगा दी। हालांकि, उच्च न्यायालय की बड़ी पीठ ने फिल्म की रिलीज को हरी झंडी दिखा दी है। फिल्म को लेकर याचिकाएं दायर हुईं आरोप लगे कि फिल्म राज्य की छवि खराब करेगी, सांप्रदायिक तनाव फैलाएगी, समाज को बांटेगी। किंतु, मूल प्रश्न कोई पूछने को तैयार नहीं कि क्या केरल विधानसभा में रखी गई रिपोर्ट भी प्रोपगैंडा हो सकती है?

फिल्म 2023 में आई द केरल स्टोरी का सीक्वल है। पहली फिल्म की तरह इसका विषय भी छल से धर्मांतरण है, लेकिन इस बार कथा केरल से आगे बढ़कर मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक जाती है। ट्रेलर में कहा गया है कि यह वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है। यह कहते ही हंगामा शुरू हो गया। कुछ फिल्मकारों और अपने आपको सेक्‍युलर कहने वालों ने इसे प्रोपगैंडा बताया। न्यायालय में फिल्‍म को चुनौती देने पहुंचे याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फिल्म केरल को सांप्रदायिक रंग में रंगती है और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाती है। तब निर्देशक ने सार्वजनिक रूप से चुनौती दी कि यदि कुछ भी गलत सिद्ध हो जाए तो वे फिल्म निर्माण छोड़ देंगे। कहना होगा कि यह आत्मविश्वास यूं ही नहीं आता है, इसके पीछे तथ्य होते हैं।

25 फरवरी, 2026 को केरल उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई और न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस की एकल पीठ ने निर्माताओं से कहा कि अंतिम निर्णय तक फिल्म के अधिकार जारी न किए जाएं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा दिए गए यू\ए प्रमाणपत्र पर भी सवाल उठाए गए। न्यायालय ने पूछा कि यदि विषय इतना संवेदनशील है तो ए प्रमाणपत्र क्यों नहीं दिया गया। लेकिन यह प्रश्‍न बड़ा है कि क्या किसी राज्य का नाम शीर्षक में आ जाना ही उसकी गरिमा पर हमला है? अगर ऐसा है तो फिर गो गोवा गॉन, वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई या दिल्ली बेली जैसी फिल्मों ने भी अपने-अपने शहरों की छवि बिगाड़ी होगी?

वस्‍तुत: इस संदर्भ में कहना होगा कि यह विवाद नया नहीं है। 2023 में आई “द केरल स्टोरी” भी कानूनी चुनौतियों से गुजरी थी। उससे पहले 2022 में “द कश्मीर फाइल्स” को लेकर भी देश भर में याचिकाएं दायर हुईं। हर बार तर्क यही था कि फिल्म से सामाजिक सद्भाव बिगड़ेगा। हर बार अदालतों ने संतुलन साधते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी महत्व दिया।

अब आइए मूल प्रश्न पर आते हैं, छल से धर्मांतरण का मुद्दा। किसी का धर्म बदलने का अर्थ यह नहीं है कि बल, प्रलोभन या धोखे से धर्म परिवर्तन किया जाए। संविधान इसकी अनुमति नहीं देता। इसी कारण उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों ने विशेष कानून बनाए हैं। यह कानून यूं ही नहीं बने, इसके पीछे शिकायतें और हजारों की संख्‍या में अब तक दर्ज मामले रहे।

राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो जबरन धर्मांतरण का अलग से समेकित आंकड़ा जारी नहीं करता। इसलिए बहस अक्सर भावनात्मक हो जाती है। लेकिन जहां राज्य कानून हैं, वहां दर्ज आंकड़े मौजूद हैं और केरल का मामला तो विधानसभा में रखी गई रिपोर्टों से भी जुड़ा है।

2011 की जनगणना बताती है कि केरल में मुस्लिम आबादी 26.56 प्रतिशत थी, जबकि 1951 में यह 17.4 प्रतिशत थी। 2001 से 2011 के बीच मुस्लिम आबादी वृद्धि दर 12.8 प्रतिशत रही, जबकि राज्य की कुल जनसंख्या वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत थी। उसी अवधि में हिन्दुओं की वृद्धि दर 2.23 प्रतिशत और ईसाइयों की 1.38 प्रतिशत रही। स्पष्ट है कि वृद्धि दर में अंतर है। इसके पीछे केवल धर्मांतरण कारण नहीं, मुसलमानों की उच्च प्रजनन दर, सामाजिक संरचना और अन्य कारक भी हैं। लेकिन धर्मांतरण को पूरी तरह नकार देना भी तथ्यों से आंख मूंदना होगा।

2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने केरल विधानसभा में बताया कि 2006 से 2012 के बीच 7713 लोगों ने इस्लाम धर्म अपनाया, जिनमें 2667 लड़कियां थीं। रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर मामले अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े थे। यह कोई फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि सरकार द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक सूचना थी। 2015 में केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल के मुखपत्र जाग्रता ने दावा किया कि 2005 से 2012 के बीच लगभग चार हजार लड़कियों का धर्मांतरण हुआ, जिनमें ज्यादातर ने इस्लाम स्वीकार किया।

स्‍वाभाविक है कि यदि किसी अवधि में हजारों लोग धर्म बदलते हैं तो समाजशास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता होती है और उसमें भी, जब विशेष वर्ग के प्रति अचानक से आकर्षण दिखे, तब संदेह पैदा होना स्‍वाभाविक है। ऐसे में केरल की इस सच्‍चाई को आज कोई भी नकार नहीं सकता है। इसलिए फि‍ल्‍म में जो दिखाया गया है, वह वास्‍तव में उन तमाम युवतियों का भोगा हुआ यथार्थ है, जिससे वे दिनरात गुजरी हैं। ये सच है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है, लेकिन वह निरर्थक भी नहीं है। यदि हर संवेदनशील विषय पर रोक लगेगी तो सिनेमा केवल मनोरंजन का खोखला माध्यम बनकर रह जाएगा। अदालतें कानून देखेंगी, सार्वजनिक व्यवस्था शालीनता और नैतिकता। लेकिन समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि क्या वह कठिन प्रश्नों का सामना करने को तैयार है।

सच यह है कि धर्मांतरण का प्रश्न बहुआयामी है; फिर भी यदि आधिकारिक आंकड़े मौजूद हैं, यदि विधानसभा में रिपोर्ट रखी गई है, यदि मीडिया ने धर्मांतरण के रुझानों पर विश्लेषण किया है तो इस विषय पर फिल्म बनाना अवैध कैसे हो सकता है? “द केरल स्टोरी 2” को न्‍यायालय में चुनौती दीजिए, जरूर दीजिए, तथ्यों की जांच कीजिए प्रमाणपत्र पर बहस कीजिए। किंतु यह मत कहिए कि विषय अस्तित्वहीन है। क्योंकि आंकड़े मौजूद हैं जनगणना के, विधानसभा के और मीडिया रिपोर्टों के।

अब यह बहस रुकेगी नहीं। और शायद यही लोकतंत्र की असली ताकत है सवाल पूछने की, असहमति जताने की और तथ्यों को परखने की स्‍वतंत्रता सभी को समान रूप से भारतीय संविधान देता है। कहना होगा कि सच आंकड़ों में दर्ज रहता है, दस्तावेजों में सुरक्षित रहता है और समय-समय पर सामने आ जाता है। इसलिए आज प्रश्न यह नहीं कि फिल्म पर रोक लगी या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या हम उन तथ्यों से सामना करने को तैयार हैं, जिन्हें हम देखना नहीं चाहते। क्योंकि इतिहास गवाह है फिल्में रोकी जा सकती हैं, लेकिन आंकड़ों को आज कोई नहीं नकार सकता, जो देश भर में चिल्‍ला- चिल्‍ला कर कह रहे हैं कि लव जिहाद के निशाने पर हिन्‍दू एवं अन्‍य गैर मुस्‍लिम लड़किया हैं! इस्‍लामिक कन्‍वर्जन का खेल पूरी तरह से योजनाबद्ध तरीके से संचालित किया जा रहा है, जिस पर कि हर हाल में रोक लगना ही चाहिए।