हिन्दू जीवन में मंदिर सिर्फ पूजास्थल नहीं, जीवन का आधार हैं…

मंदिर मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन का माध्यम है। इसमें वैज्ञानिकता भी है, अध्‍यात्‍म भी, धर्म भी, विचार भी है, और श्रद्धा भी है तो भक्‍ति भी है। वस्‍तुत: वैज्ञानिक दृष्टि कहती है कि मंदिरों की संरचना इस प्रकार की जाती है कि वहाँ ऊर्जा सकारात्मक रहे।

सुबह का वह क्षण याद कीजिए, जब किसी मंदिर की घंटी की ध्वनि सीधे हृदय तक पहुँचती है। उस ध्वनि में पीढ़ियों की आस्था, श्रद्धा और भक्ति का संचित स्पंदन होता है। एक हिन्दू जीवन की शुरुआत प्राय: मंदिर से होती है, जन्‍म लेने के पूर्व गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन यानी इस संपूर्ण तीन भाग के ‘गर्भ संस्कार’ के दौरान गर्भ में पल रहे शिशु के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ माता की प्रसन्नता के लिए देवताओं से प्रार्थना की जाती है और तभी एक जन्‍म लेने वाली जीवात्‍मा के जीवन में उसके अस्‍तित्‍व के साथ ही मंदिर प्रवेश कर जाता है।

उसके बाद मंदिर की यात्रा जैसे घर के छोटे से पूजा-स्थल से लेकर विशाल तीर्थों तक संपूर्ण जीवन भर जुड़ी हुई दिखाई देती है, इतना ही नहीं देह छोड़ देने के बाद भी मंदिर का अस्‍तित्‍व रहता है, स्‍मृतियों में पुरखों के रूप में, पितर बनकर जीवात्‍मा अपने अस्‍तित्‍व को सदियों तक बनाए रखती है।

यही मंदिर जीवन के संघर्षों में सहारा बनते हैं, तो उत्सवों में उल्लास का केंद्र भी। ऐसे ही आध्यात्मिक अनुभवों का चरम रूप है केरल के घने वनों में स्थित शबरीमला मंदिर, जो आज श्रद्धा केंद्र होने के साथ ही देश के बौद्धिक और संवैधानिक विमर्श का भी केंद्र बना हुआ है। सर्वोच्च न्‍यायालय में चल रही बहस ने इसे आस्था और अधिकार के संगम पर खड़ा कर दिया है।

एक प्रश्‍न बार-बार सहज रूप से मन में उमड़ता है, आखिर हिन्दू जीवन में मंदिर क्‍या सिर्फ पूजा का स्थान भर है? हर बार उत्तर सामने आता है, इससे भी कहीं अधिक गहरा है ये। मंदिर, जीवन का आधार है। यह वह स्थान है जहाँ व्यक्ति अपने भीतर के शोर को शांत कर, चेतना के स्‍तर पर आत्मा की आवाज सुनता है, इसीलिए सनातन परंपरा में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार मंदिर से जुड़ा है।

मंदिर मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन का माध्यम है। इसमें वैज्ञानिकता भी है, अध्‍यात्‍म भी, धर्म भी, विचार भी है, और श्रद्धा भी है तो भक्‍ति भी है। वस्‍तुत: वैज्ञानिक दृष्टि कहती है कि मंदिरों की संरचना इस प्रकार की जाती है कि वहाँ ऊर्जा सकारात्मक रहे। घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चार और धूप-दीप का वातावरण मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है। यही कारण है कि मंदिर से लौटते समय व्यक्ति स्वयं को हल्का और संतुलित अनुभव करता है।

मंदिर के साथ जुड़ी श्रद्धा वह अदृश्य शक्ति है जो मनुष्य को असंभव को संभव करने की प्रेरणा देती है। भक्ति उस श्रद्धा का सजीव रूप है, जो कर्म और भावना में प्रकट होती है। जब एक भक्त मंदिर में माथा टेकता है, तब वह अपने अहंकार को त्यागकर एक उच्चतर शक्ति को स्वीकार कर रहा होता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति के भीतर विनम्रता और संतुलन पैदा करती है। यही कारण है कि कठिन परिस्थितियों में भी श्रद्धालु व्यक्ति टूटता नहीं है, वह और अधिक मजबूत होकर उभरता है।

शबरीमला तपस्याअनुशासन और आस्था का संगम है

शबरीमला मंदिर की परंपरा अन्य मंदिरों से भिन्न है। यहाँ भगवान अय्यप्पा को एक तपस्वी ब्रह्मचारी के रूप में पूजा जाता है, इसीलिए यहाँ आने वाले भक्तों के लिए 41 दिनों का कठोर व्रत, संयम और ब्रह्मचर्य अनिवार्य माना गया है। यह यात्रा संपूर्ण हिन्‍दू भक्‍ति परंपरा में धार्मिक अनुष्ठान होने के साथ ही सबसे अधिक जरूरी आत्मानुशासन की परीक्षा है। जंगलों से होकर कठिन मार्ग तय करना, सादा जीवन जीना और सामूहिक भक्ति में शामिल होना, वस्‍तुत: यह सभी तत्व मिलकर एक ऐसा अनुभव रचते हैं, जिसमें व्यक्ति को संपूर्णता के साथ भीतर से बदल देने का सामर्थ्‍य होता है।

ऐसे में जब सर्वोच्च न्‍यायालय ने 2018 में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को शबरीमला में प्रवेश की अनुमति दी, तब यह लगा कि निर्णय एक तरफा हो गया है, समानता के सिद्धांत पर इसे आरूढ़ तो किया गया, किंतु इसके मर्म को शायद गहराई से नहीं समझा गया! परंतु इसके बाद प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि क्या हर धार्मिक परंपरा को एक ही संवैधानिक मानक से परखा जा सकता है?

अब एक बार फिर मंदिर की परंपरा को लेकर न्‍यायालय में बहस चल रही है, तुषार मेहता बता रहे हैं कि भारत में कई मंदिरों में विशिष्ट परंपराएँ हैं, जो उनकी आस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। इस संदर्भ में ब्रह्मा मंदिर पुष्कर, कामाख्या देवी मंदिर और कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर जैसे उदाहरण सामने हैं, जहाँ अलग-अलग नियम प्रचलित हैं।

विविधता ही हिन्दुत्व की सबसे बड़ी शक्ति

हिन्दू धर्म किसी एकरूपता का आग्रह नहीं करता। यहाँ हर मंदिर, हर परंपरा और हर पूजा पद्धति का अपना विशिष्ट महत्व (वैशिष्‍ट्य) है। यही कारण है कि कहीं केवल महिलाएँ पूजा करती हैं, तो कहीं पुरुषों को विशेष वेशभूषा धारण करनी होती है। वस्‍तुत: विविधता यह दर्शाती है कि हिन्दू धर्म एक जीवंत परंपरा है, जो समय और परिस्थितियों के साथ विकसित होती रही है। यह किसी एक नियम में बंधा हुआ धर्म नहीं, य‍ह तो अनुभव और आस्था का विस्तृत महासागर है।

हिन्दू धर्म की महानता ही इसी में है कि यह विविधता को स्वीकार करता है, संवाद को महत्व देता है और हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार जीने की स्वतंत्रता देता है। मंदिर से जुड़ी श्रद्धा और भक्ति जीवन को दिशा देने वाले तत्व हैं।

एक भक्त के लिए मंदिर एक अनुभव है। जब वह कठिन यात्रा करके शबरीमला पहुँचता है, तब उसकी आँखों में सिर्फ अपने आराध्‍य के दर्शन की इच्छा होने के साथ ही संतुष्टि का भाव भी होता है। निश्‍चित ही यह अनुभव शब्दों से परे है; यह वह क्षण है जब मनुष्य स्वयं को ईश्वर के निकट महसूस करता है, उसकी चेतना बोल उठती है,  प्रज्ञानं ब्रह्म – “चेतना ही ब्रह्म है।” अहं ब्रह्मास्मि – “मैं ब्रह्म हूँ।” तत्‍वमसि – “तुम वही हो” (वह तुम हो) और अयमात्मा ब्रह्म – “यह आत्मा ही ब्रह्म है।” ‘शिवोह्म शिवोह्म’- “मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।” वस्‍तुत: यही आस्था की वास्तविक शक्ति है…जो भारत में है, जो भारत में सर्वत्र व्‍याप्‍त है…।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

नासिक टीसीएस धर्मांतरण मामले में मुख्य आरोपी निदा खान गिरफ्तार

नासिक/छत्रपति संभाजी नगर।

नासिक स्थित टीसीएस (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) धर्मांतरण मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी निदा खान को गिरफ्तार कर लिया है। लंबे समय से फरार चल रही निदा को छत्रपति संभाजी नगर के नारेगांव से पकड़ा गया है। निदा पर उत्पीड़न और जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप लगे हैं। वह टीसीएस नासिक में प्रोसेस एसोसिएट के पद पर काम करती थी। आरोप सामने आने के बाद कंपनी ने उसे निलंबित कर दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार, खान कैसर कॉलोनी स्थित एक फ्लैट में पिछले कई दिनों से रह रही थी। वहां पर उसके साथ उसके चार और रिश्तेदार भी थे।

पुलिस निदा खान की तलाश में थी। गिरफ्तारी से पहले उन्होंने अपनी दो महीने की गर्भावस्था का हवाला देते हुए नासिक कोर्ट में अग्रिम जमानत और गिरफ्तारी से सुरक्षा की याचिका दाखिल की थी। लेकिन कोर्ट ने कोई राहत नहीं दी। 4 मई को नासिक कोर्ट ने निदा खान की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि पीड़िता को सुनियोजित तरीके से ब्रेनवॉश करके मलेशिया भेजने की योजना नजर आती है। कोर्ट के अनुसार, अपराध गंभीर है और मामले की गहराई तक पहुंचने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है।

देवलाली पुलिस थाने में दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, निदा खान, दानिश शेख और तौसीफ पर भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज हैं। इनमें झूठा विवाह का वादा करके यौन संबंध बनाना, यौन उत्पीड़न और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना शामिल है। तीनों पर SC/ST एक्ट की धाराओं के तहत भी आरोप लगे हैं।

पुलिस के अनुसार, दानिश शेख ने पीड़िता से शादी का झूठा वादा करके यौन उत्पीड़न किया। तौसीफ ने बार-बार छेड़छाड़ की और संबंध उजागर करने की धमकी देकर दबाव डाला। निदा खान पर आरोप है कि उन्होंने दोनों साथियों के साथ मिलकर पीड़िता को डराया-धमकाया और उसकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाकर धर्म बदलने के लिए मजबूर करने की कोशिश की। जांच में पता चला कि निदा ने पीड़िता को बुर्का, पैगंबर मोहम्मद पर किताबें दी थीं और मोबाइल में इस्लामी ऐप्स इंस्टॉल करवाए।

सभी आरोपी पीड़िता के ही TCS नासिक यूनिट के सहकर्मी थे। पीड़िता को आरोपियों के धार्मिक रीति-रिवाज और दिनचर्या का पालन करने के लिए मजबूर किया गया था।

निदा खान ने दिसंबर 2021 में टीसीएस नासिक में काम शुरू किया था। आरोपों की जानकारी मिलने के बाद कंपनी ने 9 अप्रैल को निलंबित कर दिया था।

मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना लाखों उपभोक्ताओं को राहत देने वाली जनहितैषी पहल

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार आम जनता को राहत पहुंचाने और सुशासन को मजबूत करने की दिशा में लगातार कार्य कर रही है। इसी क्रम में बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत प्रदान करने के उद्देश्य से “मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना-2026” लागू की गई है। यह योजना घरेलू, बीपीएल एवं कृषि उपभोक्ताओं को बकाया बिजली बिल के भुगतान में राहत देने के साथ-साथ आसान समाधान उपलब्ध करा रही है।
योजना के अंतर्गत उपभोक्ताओं को बकाया बिजली बिल का भुगतान एकमुश्त अथवा आसान किस्तों में करने की सुविधा दी गई है। विशेष बात यह है कि 31 मार्च 2023 तक के बकाया बिजली बिलों पर 100 प्रतिशत सरचार्ज माफी का लाभ भी प्रदान किया जा रहा है, जिससे लाखों परिवारों को आर्थिक राहत मिल रही है।
       राज्य सरकार का लक्ष्य है कि कोई भी उपभोक्ता आर्थिक कारणों से बिजली सुविधा से वंचित न रहे। इसी सोच के साथ योजना को सरल और सुलभ बनाया गया है। योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए उपभोक्ताओं का पंजीयन अनिवार्य रखा गया है।
उपभोक्ताओं की सुविधा के लिए पंजीयन की व्यवस्था विभिन्न माध्यमों से उपलब्ध कराई गई है। उपभोक्ता “मोर बिजली” एप, CSPDCL की आधिकारिक वेबसाइट, नजदीकी बिजली कार्यालय तथा विशेष पंजीयन शिविरों के माध्यम से आसानी से अपना पंजीयन करा सकते हैं। यह योजना 12 मार्च 2026 से लागू है तथा योजना का लाभ लेने की अंतिम तिथि 30 जून 2026 निर्धारित की गई है। अब तक लाखों उपभोक्ता योजना से जुड़ चुके हैं और बड़ी संख्या में प्रकरणों का निराकरण कर उपभोक्ताओं को करोड़ों रुपए की राहत प्रदान की जा चुकी है। आंकड़ों की बात करें तो अब तक प्रदेश के 07 लाख 24 हजार उपभोक्ताओं ने योजना का लाभ लेने के लिए पंजीयन कराया है। 1 लाख 63 हजार प्रकरणों का निराकरण कर कुल 06 करोड़ 22 लाख रूपये से अधिक की राहत प्रदान की जा चुकी है।
       मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा है कि राज्य सरकार जनता की समस्याओं के समाधान के लिए प्रतिबद्ध है और आम नागरिकों को राहत पहुंचाने वाली योजनाओं को प्राथमिकता के साथ लागू किया जा रहा है। मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 इसी जनहितकारी सोच का परिणाम है, जो लाखों उपभोक्ताओं के जीवन में राहत और विश्वास लेकर आई है।

आर्थिक संबल से आत्मविश्वास तक, सशक्त हो रही छत्तीसगढ़ की महिलाएं

 विशेष लेख : महतारी वंदन योजना : आर्थिक संबल से आत्मविश्वास तक, सशक्त हो रही छत्तीसगढ़ की महिलाएं

रायपुर, 21 मार्च 2026

आर्थिक संबल से आत्मविश्वास तक, सशक्त हो रही छत्तीसगढ़ की महिलाएं

किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तब मानी जाती है जब उसकी महिलाएं सशक्त, आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जीने लगें। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी महतारी वंदन योजना इसी दिशा में एक ऐतिहासिक और संवेदनशील पहल बनकर उभरी है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के मार्गदर्शन में यह योजना आज लाखों महिलाओं के जीवन में आत्मविश्वास, आर्थिक संबल और नई उम्मीदों का संचार कर रही है।

आर्थिक संबल से आत्मविश्वास तक, सशक्त हो रही छत्तीसगढ़ की महिलाएं
आर्थिक संबल से आत्मविश्वास तक, सशक्त हो रही छत्तीसगढ़ की महिलाएं

महतारी वंदन योजना केवल हर माह मिलने वाली 1000 रुपये की आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के सपनों को पंख देने, उनके आत्मसम्मान को मजबूत करने और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने का सशक्त माध्यम बन गई है। प्रदेश के गांव-गांव से ऐसी प्रेरक कहानियां सामने आ रही हैं, जो बताती हैं कि छोटे-छोटे आर्थिक सहयोग से भी बड़े सामाजिक बदलाव संभव हैं।

आर्थिक संबल से आत्मविश्वास तक, सशक्त हो रही छत्तीसगढ़ की महिलाएं

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर बस्तर में आयोजित वृहद महतारी वंदन कार्यक्रम के दौरान कई महिलाओं ने मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय से वर्चुअल संवाद कर अपने जीवन में आए बदलाव साझा किए। गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले के ग्राम खोडरी की श्रीमती अनीता साहू ने बताया कि पहले आर्थिक कठिनाइयों के कारण परिवार चलाना मुश्किल था, लेकिन योजना से मिली राशि से उन्होंने सिलाई मशीन खरीदी और “अनीता सिलाई सेंटर” शुरू किया। आज वे सिलाई, खेती और मजदूरी के माध्यम से अपने परिवार को बेहतर जीवन दे रही हैं। उनका यह सफर संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक की प्रेरक कहानी बन गया है।

मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले की श्रीमती मिथलेश चतुर्वेदी ने भी अपने जीवन का भावुक अनुभव साझा किया। पति के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। ऐसे कठिन समय में महतारी वंदन योजना ने उन्हें आर्थिक संबल दिया और उन्होंने ई-रिक्शा खरीदकर आजीविका का नया रास्ता चुना। आज वे आत्मसम्मान के साथ अपने परिवार का पालन-पोषण कर रही हैं और समाज में आत्मनिर्भर महिला की पहचान बना चुकी हैं।

कोरिया जिले की ग्राम डुमरिया निवासी श्रीमती बाबी राजवाड़े बताती हैं कि खेती-किसानी में मिलने वाली मासिक राशि उनके लिए बड़ी मदद साबित हो रही है। बीज, खाद और अन्य कृषि जरूरतों को पूरा करना अब पहले की तुलना में आसान हो गया है। वहीं ग्राम आमापारा की श्रीमती सुंदरी पैकरा इस राशि का उपयोग अपने बच्चों की पढ़ाई में कर रही हैं, जिससे उनके बच्चों के भविष्य को नई दिशा मिल रही है।

भरतपुर विकासखंड के ग्राम चांटी की श्रीमती सविता सिंह की कहानी इस योजना की सार्थकता को और मजबूत करती है। उन्होंने महतारी वंदन योजना की राशि को बचाकर सिलाई मशीन खरीदी और सिलाई कार्य शुरू किया। आज वे गांव में कपड़ों की सिलाई कर नियमित आय अर्जित कर रही हैं और अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च स्वयं उठा रही हैं। उनकी सफलता ने गांव की अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी है।
महतारी वंदन योजना का व्यापक प्रभाव प्रदेश के हर जिले में दिखाई दे रहा है। लगभग 69 लाख विवाहित महिलाओं को प्रतिमाह 1000 रुपये की सहायता सीधे उनके बैंक खातों में दी जा रही है और अब तक 25 किस्तों के माध्यम से 16 हजार 237 करोड़ रुपये से अधिक की राशि डीबीटी के जरिए प्रदान की जा चुकी है। यह नियमित आर्थिक सहयोग महिलाओं के जीवन में स्थिरता और आत्मविश्वास ला रहा है।

इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह महिलाओं को केवल सहायता नहीं देती, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देती है। महिलाएं इस राशि से छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू कर रही हैं, बच्चों की पढ़ाई में निवेश कर रही हैं, खेती-किसानी को मजबूत बना रही हैं और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इससे परिवार, समाज और राज्य—तीनों स्तरों पर सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है।

महिलाओं का कहना है कि पहले छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब महतारी वंदन योजना ने उन्हें आत्मसम्मान के साथ जीने की ताकत दी है। उन्होंने मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह योजना उनके जीवन में नई उम्मीद और नया आत्मविश्वास लेकर आई है।

आज महतारी वंदन योजना छत्तीसगढ़ में महिला सशक्तिकरण का मजबूत स्तंभ बन चुकी है। यह योजना न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बना रही है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मान, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी दे रही है।

निश्चित रूप से महतारी वंदन योजना छत्तीसगढ़ की महिलाओं के लिए आत्मसम्मान, सशक्तिकरण और उज्ज्वल भविष्य की नई सुबह साबित हो रही है, जो आने वाले समय में प्रदेश के समग्र विकास की मजबूत आधारशिला बनेगी।

    डॉ. दानेश्वरी संभाकर, उप संचालक जनसंपर्क, उप संचालक जनसंपर्क

यश व सफलता के साथ विनम्रता, कृतज्ञता का भाव ज़रूरी है – डॉ. मोहन भागवत जी

नागपुर, 26 अप्रैल 2026। नाग भूषण अवॉर्ड फाउंडेशन द्वारा आयोजित नाग भूषण समारोह-२०२५ समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि यश पाना ही सब कुछ नहीं है। यश पाने के साथ-साथ व्यक्ति का सार्थक बनना भी ज़रूरी है, और यशस्विता का उपयोग सबकी भलाई के लिए करना चाहिए।

समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, महाराष्ट्र के वित्त और योजना राज्य मंत्री आशीष जयसवाल, पूर्व सांसद तथा फाऊंडेशन के अध्यक्ष अजय संचेती भी उपस्थित थे। समारोह में सोलर इंडस्ट्री इंडिया के चेयरमैन पद्मश्री सत्यनारायण नुवाल को प्रतिष्ठित नाग भूषण पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया, जबकि ‘आयरन मैन ऑस्ट्रेलिया’ कॉम्पिटिशन के विजेता दक्ष खंते को सम्मानित किया गया।

सरसंघचालक जी ने कहा कि दुनिया में शक्ति बहुत ज़रूरी है। इसके बिना कुछ नहीं हो सकता। लेकिन, अगर शक्ति को फलदायिनी बनाना है, तो शक्तिमान लोगों को सिर्फ़ यश पाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए। यश दूसरों को प्रेरित करता है और यह ज़्यादा ज़रूरी है। जब शक्ति के साथ विनम्रता हो, तभी वह सफल होती है। सफलता के साथ विनम्रता, कृतज्ञता का भाव ज़रूरी है। यश पाते हुए इंसान का सार्थक बनना भी उतना ही ज़रूरी है। पिछले 200 वर्षों में हमारे देश में जितने भी महान लोग हुए हैं, उनके जीवन में 90 परसेंट परस्पिरेशन और 10 परसेंट इन्सपिरेशन का सूत्र देखा गया है। मैं और मेरा परिवार के दायरे से बाहर निकलकर अपनेपन के दायरे को बढ़ाएंगे, उतना ही मिला हुआ यश सार्थक होगा।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी ने कहा कि कठिन और चुनौतीपूर्ण हालात में भी कितना बड़ा काम किया जा सकता है और कामयाबी की ऊंचाई तक पहुंचा जा सकता है, यह उदाहरण सत्यनारायण नुवाल ने प्रस्तुत किया है। नुवाल जी ने इस क्षेत्र में ऐसे समय में कदम रखा था, जब देश के डिफेंस इक्विपमेंट प्रोडक्शन के फील्ड में प्राइवेट सेक्टर कितनी तरक्की करेगा, इस बारे में कोई पक्का नहीं था, और अब यह इंडस्ट्री कामयाबी की ऊंचाई पर पहुंच रही है। इस मौके पर हमने दिखाया है कि भारत भी दुनिया में सबसे अच्छी क्वालिटी के हथियार बना सकता है। ऑपरेशन सिंदूर में भी सोलर इंडस्ट्री के योगदान ने बहुत अहम भूमिका निभाई है। दक्ष खंते ने जो कामयाबी हासिल की है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक रोल मॉडल हैं, वह नई पीढ़ी को भी इसी तरह प्रेरित करेंगे।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जी ने कहा कि भारत की डिफेंस ताकत को बढ़ाना बहुत ज़रूरी है ताकि दुनिया में शांति बनी रहे, अच्छी ताकतों का असर बना रहे और बुरी ताकतों पर लगातार नियंत्रण रहे। इसी को ध्यान में रखते हुए देश में डिफेंस टेक्नोलॉजी का डेवलपमेंट किया जा रहा है।

तेंदुवा धाम, रायपुर में श्रीराम कथा का भव्य शुभारंभ: मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने लिया संतों का आशीर्वाद

छत्तीसगढ़ “धान का कटोरा” होने के साथ-साथ सेवा, समर्पण और आस्था की भूमि – मुख्यमंत्री श्री साय

मुख्यमंत्री श्री साय ने अपने संबोधन में कहा कि छत्तीसगढ़ की पावन भूमि सदैव भगवान श्रीराम के चरणों से धन्य रही है। उन्होंने वनवास काल में भगवान श्रीराम के आगमन और माता शबरी की अद्भुत भक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि इस धरती ने आस्था, समर्पण और विश्वास की अनूठी परंपरा को सहेज कर रखा है। उन्होंने कहा कि तेंदुवाधाम आज धार्मिक और सांस्कृतिक जागरण का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है, जहां हजारों श्रद्धालु एक साथ श्रीराम कथा का श्रवण कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने इस अवसर को अत्यंत सौभाग्यशाली बताते हुए कहा कि एक ही मंच से अनेक संतों का सान्निध्य और आशीर्वाद प्राप्त होना विशेष अनुभव है। उन्होंने आश्रम परिसर में हरिवंश औषधालय एवं पंचकर्म केंद्र, श्री राम-जानकी मंडपम, हरिवंश वैदिक पाठशाला, मां दुर्गा गौ मंदिर और हनुमत प्रवेश द्वार सहित विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों के लोकार्पण पर आश्रम प्रबंधन और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ “धान का कटोरा” होने के साथ-साथ सेवा, समर्पण और आस्था की भूमि भी है। उन्होंने अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर निर्माण के दौरान छत्तीसगढ़ से 11 ट्रक चावल और चिकित्सकों की टीम के वहां पहुंचने का उल्लेख करते हुए इसे प्रदेशवासियों की गहरी श्रद्धा का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि लगभग 500 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भगवान श्रीराम भव्य मंदिर में विराजमान हुए हैं, जो देश की सांस्कृतिक एकता और गौरव का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि श्रीरामलला दर्शन योजना के माध्यम से हजारों श्रद्धालु अयोध्या धाम के दर्शन कर लाभान्वित हो रहे हैं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन और जवानों के अदम्य साहस से आज प्रदेश से नक्सलवाद समाप्त हो चुका है तथा राज्य में शांति, विकास और सामाजिक समरसता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। उन्होंने कहा कि “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” यहां की संस्कृति और जीवन मूल्यों की सच्ची पहचान है।

इस अवसर पर परमपूज्य वासुदेवनंद सरस्वती महाराज, किन्नर अखाड़ा प्रमुख मां टीना सहित अनेक संत-महात्माओं की गरिमामयी उपस्थिति में विभिन्न धार्मिक-सांस्कृतिक परियोजनाओं का लोकार्पण किया गया।

राघव सेवा समिति के प्रमुख डॉ. अशोक हरिवंश ने बताया कि यह स्थल माता शबरी की जन्मभूमि शिवरीनारायण में स्थित है, जहां ‘कलिंग शैली’ में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। आश्रम में औषधालय, वैदिक विद्यालय, गौ मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर, गीता वाटिका, शबरी रसोई और निर्धन कन्या विवाह जैसी अनेक सामाजिक-धार्मिक पहल संचालित हो रही हैं। कार्यक्रम के तहत विभिन्न वर्गों – दिव्यांगजन, रक्तदाता, कुष्ठ रोगी और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों – को समर्पित विशेष दिवस भी आयोजित किए जा रहे हैं।

कार्यक्रम में सांसद श्रीमती कमलेश जांगड़े, सहित अन्य जनप्रतिनिधि, अधिकारी एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

बिछड़े बंधुओं को स्वधर्म में लाएंगे, सभी को गले लगाएंगे – विहिप अध्यक्ष

कालड़ी (केरलम)।

एकता, प्रेम व मानवीय जीवन मूल्यों के साथ अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदि शंकराचार्य जी की जयंती पर विश्व हिन्दू परिषद ने एक संकल्प लिया कि गत 1000 वर्षों में किन्हीं कारणों से हिन्दू धर्म से बिछड़े बंधुओं को हम स्वधर्म में लाएंगे। विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने आदि शंकराचार्य जी की, कालड़ी में स्थित पावन जन्मभूमि (कोच्चि – एर्नाकुलम के निकट) पर एकत्र श्रद्धालुओं से कहा कि पूज्य आदि शंकराचार्य जी ने संपूर्ण मानवता और उनके कल्याण के लिए काम किया। वहीं दूसरी ओर विश्व में कुछ लोग आज सिर्फ किसी एक पुस्तक या विचार से बंधकर और बांधकर अपने कट्टरपंथी विचार थोपना चाहते हैं जो मानवता के लिए चुनौती बनता जा रहा है।

“दुनिया के कुछ हिस्सों में, कुछ लोग कट्टरपंथी विचारों को थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जो मानवता के लिए एक गंभीर खतरा है। हम दुनिया को ऐसी विनाशकारी विचारधाराओं से बचाने और उन लोगों को वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो अपने मूल विश्वास से अलग हो गए हैं।”

“हम शंकराचार्य की उस परंपरा का पालन करते हैं, जिनमें इतनी महानता थी कि उन्होंने अत्यंत वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति को भी अपना गुरु स्वीकार कर लिया। हम हिन्दू समाज में आज भी व्याप्त जातिगत भेदभाव की बुराई को पूरी तरह से मिटाने के लिए कृतसंकल्प हैं।”

उन्होंने वहां निकाली गई एक पवित्र धार्मिक यात्रा में भी सहभागिता की। कार्यक्रम में विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल के सदस्य पूज्य स्वामी सतस्वरूपानंद जी महाराज, पूज्य स्वामी तीर्थानंद जी महाराज, कोचिंग शिपयार्ड के सेवानिवृत्त अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक डॉ. मधु एस नायर जी, अलुवा जिला संघचालक जस्टिस सुंदरम गोविंद जी तथा पद्मश्री कुंजोल मास जी भी उपस्थित थे।

डेयरी योजना से सशक्त हो रहीं ग्रामीण महिलाएं

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) की डेयरी समग्र योजना जशपुर जिले में ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का सशक्त माध्यम बनकर उभर रही है। योजना के अंतर्गत जिले के 24 गांवों की 447 महिला डेयरी उत्पादक लाभान्वित हो रही हैं, जो पशुपालन को लाभकारी व्यवसाय के रूप में अपना रही हैं।

योजना के तहत पशु नस्ल सुधार और दुग्ध उत्पादन वृद्धि के उद्देश्य से 27 आदिवासी महिला हितग्राहियों को उन्नत साहिवाल नस्ल की दुधारू गायें वितरित की गई हैं। साहिवाल नस्ल अपनी उच्च दुग्ध क्षमता और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए जानी जाती है। वर्तमान में 114 आदिवासी महिलाएं पंजीकृत होकर संगठित रूप से कार्य कर रही हैं, जबकि 197 सक्रिय सदस्य प्रतिदिन दूध संकलन में योगदान दे रही हैं। इससे जिले में प्रतिदिन औसतन 1,075 लीटर दूध का संकलन हो रहा है। 

पारदर्शी भुगतान व्यवस्था के तहत 5 जून से 31 मार्च 2026 तक 374 महिला हितग्राहियों के बैंक खातों में 80 लाख 54 हजार 467 रुपये की राशि सीधे डीबीटी के माध्यम से हस्तांतरित की गई है। यह योजना न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती प्रदान कर रही है। प्रशासन और एनडीडीबी का लक्ष्य अधिक से अधिक गांवों की महिलाओं को इस पहल से जोड़ते हुए जशपुर को दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी बनाना है।

डिजिटल डेमोक्रेसी डायलॉग में मुख्यमंत्री का आह्वान: क्रिएटर्स दिखाएं बदलते छत्तीसगढ़ की नई पहचान

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने आज राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास में आयोजित डिजिटल डेमोक्रेसी डायलॉग में देशभर से आए कंटेंट क्रिएटर्स का स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़  आस्था, संस्कृति और प्रकृति का संगम है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि यह भूमि भगवान श्रीराम के ननिहाल और माता कौशल्या के मायके के रूप में जानी जाती है। वनवास के 14 वर्षों में से अधिकांश समय भगवान श्रीराम ने यहीं व्यतीत किया, जिसके प्रमाण आज भी प्रदेश के विभिन्न स्थलों पर मिलते हैं। उन्होंने माता शबरी की भक्ति, दंडकारण्य और अबूझमाड़ जैसे ऐतिहासिक-आध्यात्मिक स्थलों का उल्लेख करते हुए छत्तीसगढ़ की गौरवशाली विरासत को रेखांकित किया।

उन्होंने संत गुरु घासीदास जी के “मनखे-मनखे एक समान” के संदेश को याद करते हुए कहा कि सत्य और अहिंसा की यह परंपरा आज भी प्रदेश की आत्मा में समाहित है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि कभी नक्सलवाद से प्रभावित रहा छत्तीसगढ़ आज तेजी से बदल रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति, केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह के संकल्प और सुरक्षा बलों के अदम्य साहस के परिणामस्वरूप प्रदेश अब नक्सलवाद से मुक्त होने की दिशा में निर्णायक सफलता हासिल कर चुका है। उन्होंने बताया कि पहले जहां प्रदेश का बड़ा हिस्सा नक्सल प्रभावित था, वहीं अब विकास की मुख्यधारा गांव-गांव तक पहुंच रही है।

मुख्यमंत्री ने बस्तर संभाग को प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण बताते हुए कहा कि यहां के जलप्रपात, घने वन, संस्कृति और जनजातीय जीवन देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि यूनेस्को द्वारा बस्तर के धुड़मारास गांव को विश्व के 20 सर्वश्रेष्ठ पर्यटन स्थलों में शामिल किया जाना प्रदेश के लिए गर्व की बात है।

उन्होंने कंटेंट क्रिएटर्स से आग्रह किया कि वे अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए बस्तर और छत्तीसगढ़ की सकारात्मक छवि देश-दुनिया तक पहुंचाएं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने उदाहरण देते हुए बताया कि बस्तर के दिव्यांग बालक मड्डा राम का वीडियो वायरल होने पर क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर द्वारा उन्हें क्रिकेट किट भेजी गई—यह सोशल मीडिया की ताकत का प्रमाण है।

प्रदेश में विकास कार्यों की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री  श्री साय ने बताया कि नई औद्योगिक नीति के तहत पिछले दो वर्षों में 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। साथ ही, “छत्तीसगढ़ विजन 2047” के माध्यम से राज्य को विकसित बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए संचालित योजनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि “नियद नेल्ला नार योजना” के माध्यम से सड़क, बिजली, पानी, राशन, वनाधिकार पट्टा और दूरसंचार जैसी मूलभूत सुविधाएं सुदूर गांवों तक पहुंचाई गई हैं। बस्तर ओलंपिक और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है।

डिजिटल युग पर प्रकाश डालते हुए मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया विजन का प्रभाव आज गांव-गांव में दिखाई दे रहा है, जहां आम नागरिक भी डिजिटल भुगतान कर रहा है। उन्होंने क्रिएटर्स से इस परिवर्तन को और आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी के उपाध्यक्ष श्री विनय सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि नक्सलवाद की छाया से बाहर निकलकर उभरता नया छत्तीसगढ़ आज देश के सामने एक सकारात्मक और प्रेरक उदाहरण के रूप में स्थापित हो रहा है। उन्होंने कहा कि जिस क्षेत्र को कभी केवल संघर्ष और चुनौतियों के संदर्भ में देखा जाता था, वही आज विकास, शांति और संभावनाओं की नई कहानी लिख रहा है। उन्होंने कंटेंट क्रिएटर्स से अपील करते हुए कहा कि वे पूर्वाग्रहों से परे जाकर छत्तीसगढ़ को समझें और यहां हो रहे वास्तविक परिवर्तन, जनजीवन में आए सकारात्मक बदलाव, सांस्कृतिक समृद्धि और विकास की नई गति को अपने मंचों के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि आज डिजिटल माध्यम केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि धारणा निर्माण की सबसे प्रभावशाली शक्ति बन चुका है, ऐसे में क्रिएटर्स की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे सच्चाई और सकारात्मकता पर आधारित कंटेंट प्रस्तुत कर समाज में नई सोच और विश्वास का संचार करें।

इस अवसर पर विधायक श्री किरण सिंह देव, मुख्यमंत्री के सलाहकार श्री आर. कृष्णा दास, डॉ. गुरु पासवान, श्री प्रबल प्रताप सिंह जूदेव एवं जनसंपर्क आयुक्त श्री रजत बंसल सहित अन्य गणमान्यजन उपस्थित थे।

बस्तर को सिर्फ शांत नहीं, समर्थ बनाना होगा

दिलचस्प बात यह है कि बस्तर शब्द में ही उसकी विकास-यात्रा के संकेत छिपे हैं। एक मत यह है कि “बस्तर” शब्द “वस्त्र” से बना है। यदि ऐसा हैतो यह केवल भाषिक संयोग नहींबल्कि इस भूभाग की सांस्कृतिक और आर्थिक दिशा की ओर संकेत है। बस्तर का कोसा केवल एक कपड़ा नहींबल्कि उसकी पहचानउसका शिल्प और उसकी बड़ी आर्थिक संभावना है।

तारन प्रकाश सिन्हा

बस्तर को हमने बहुत लंबे समय तक एक ही नजर से देखा – संघर्ष, नक्सल, बंदूक और असुरक्षा। इतनी लंबी अवधि तक यही तस्वीर हमारे सामने रखी गई कि बस्तर का दूसरा चेहरा, जो कहीं अधिक गहरा, पुराना और जीवंत है, लगभग ओझल हो गया। जबकि सच यह है कि बस्तर केवल संघर्ष का भूगोल नहीं है; वह सभ्यता, स्मृति, श्रम, जंगल, जल, कला और समुदाय का क्षेत्र है। अब जब हालात पूरी तरह बदल गए हैं, भय और असुरक्षा की रात व्यतीत हो गई। तब बड़ा प्रश्न यही कि अब आगे क्या? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है, अब बस्तर का रास्ता कैसा हो?

मेरे विचार से इसका उत्तर सीधा है, बस्तर को विकास चाहिए। लेकिन ऐसा विकास नहीं जो बाहर से लाकर उस पर रख दिया जाए, बल्कि ऐसा जो यहीं की मिट्टी से निकले, यहीं के लोगों की आकांक्षाओं से बने और यहीं के समाज की भागीदारी से आकार ले। बस्तर को कागजों, फाइलों और योजनाओं से नहीं समझा जा सकता। उसे समझना हो तो उसके गांवों, उसके लोक विश्वास, उसकी निर्णय-प्रणाली और उसके सामाजिक ढांचे को समझना होगा।

उदाहरण के लिए बड़े डोंगर को देखिए। वहां जब राजा नहीं रहा, तो लोगों ने नींबू को ही “लिमऊ राजा” का प्रतीक मान लिया। एक चट्टान पर बैठकर, धूप-दीप के साथ, लोग सामूहिक रूप से निर्णय लेते हैं। यह परंपरा आज भी जीवित है। यह कोई साधारण लोककथा नहीं, बल्कि बस्तर की सामुदायिक बुद्धि का प्रमाण है। यह बताती है कि यहां निर्णय ऊपर से थोपे नहीं जाते, बल्कि साथ बैठकर लिए जाते हैं। यही वह बुनियादी बात है, जिसे हमें बस्तर के विकास में भी समझना होगा।

दिलचस्प बात यह है कि बस्तर शब्द में ही उसकी विकास-यात्रा के संकेत छिपे हैं। एक मत यह है कि “बस्तर” शब्द “वस्त्र” से बना है। यदि ऐसा है, तो यह केवल भाषिक संयोग नहीं, बल्कि इस भूभाग की सांस्कृतिक और आर्थिक दिशा की ओर संकेत है। बस्तर का कोसा केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान, उसका शिल्प और उसकी बड़ी आर्थिक संभावना है। आज जब दुनिया प्राकृतिक, हस्तनिर्मित और टिकाऊ वस्त्रों की ओर लौट रही है, तब बस्तर का कोसा केवल परंपरा भर नहीं रह जाता; वह रोजगार, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण उद्योग और वैश्विक बाजार तक पहुंच का अवसर बन सकता है। यदि इसे सही डिज़ाइन, ब्रांडिंग, गुणवत्ता, विपणन और ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए, तो कोसा बस्तर की अर्थव्यवस्था का बड़ा स्तंभ बन सकता है।

बस्तर शब्द की एक और लोक-व्याख्या “बांस तरी” से भी जुड़ती है, अर्थात बाँसों के नीचे या बाँसों के बीच बसा भूभाग। यह व्याख्या भी केवल भाषा की जिज्ञासा नहीं, बल्कि बस्तर की भौगोलिक और आर्थिक सच्चाई की ओर संकेत करती है। बस्तर में बाँस हर जगह है, लेकिन बाँस आधारित उद्योग अभी भी अपनी पूरी संभावना तक नहीं पहुंचा। जबकि आज बाँस केवल टोकरी या परंपरागत उपयोग की चीज नहीं रह गया है। उससे फर्नीचर, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, सजावटी उत्पाद, अगरबत्ती स्टिक, पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग, निर्माण सामग्री और कई प्रकार के सूक्ष्म उद्योग खड़े किए जा सकते हैं। बस्तर में बाँस केवल वन-उत्पाद नहीं, बल्कि एक बड़ी हरित अर्थव्यवस्था की बुनियाद बन सकता है।

बस्तर की असली पूंजी जल, जमीन, जंगल और हाट-बाजार हैं। ये केवल संसाधन नहीं, बल्कि यहां के जीवन-तंत्र के चार स्तंभ हैं। हम अक्सर हाट-बाजार को सिर्फ एक बाजार मान लेते हैं, जबकि बस्तर में हाट का अर्थ कहीं अधिक व्यापक है। हाट यहां आर्थिक संस्था भी है, सामाजिक मंच भी और सांस्कृतिक स्पंदन भी। वहीं खरीद-बिक्री होती है, वहीं खबरें चलती हैं, वहीं रिश्ते बनते हैं, वहीं समाज अपने को देखता है। कई जगहों पर आज भी भरोसा नकद से बड़ा माध्यम है। इसलिए यदि बस्तर की स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है, तो हाट-बाजार को मजबूत करना ही होगा, बेहतर व्यवस्था, भंडारण, स्थानीय उत्पादों के लिए जगह, महिला समूहों के लिए मंच और बाजार से सीधा जुड़ाव देकर।

जल की दृष्टि से भी बस्तर बेहद महत्वपूर्ण संभावना वाला क्षेत्र है। यह इलाका गोदावरी और महानदी के बीच फैला है। दक्षिण बस्तर में कई स्थानों पर भूमि की प्रकृति ऐसी है कि पानी बहुत गहराई तक समाने के बजाय बहकर निकल जाता है। इसका अर्थ है कि यहां जल-संचयन की संभावना अत्यंत बड़ी है। पुरानी कहावत “सात आगर सात कोरी” यूं ही नहीं बनी। यह उस जल-संस्कृति की याद है, जिसमें तालाब, आगर और सामुदायिक जल-संरचनाएं जीवन का हिस्सा थीं। बारसूर और बड़े डोंगर आज भी इस परंपरा की गवाही देते हैं। यदि हम फिर से इस दिशा में गंभीरता से काम करें, तो तालाब, सिंचाई और मछली पालन तीनों मिलकर बस्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दे सकते हैं।

खेती की दृष्टि से भी बस्तर को नए नजरिए से देखने की जरूरत है। यहां समस्या खेती की कमी नहीं, बल्कि खेती की दिशा की है। कोदो, कुटकी, रागी और अन्य मोटे अनाज यहां की ताकत हैं। यही इस मिट्टी और जलवायु के सबसे स्वाभाविक साथी हैं। आज जब पूरा विश्व मिलेट्स की ओर लौट रहा है, तब बस्तर के पास एक तैयार अवसर मौजूद है। लेकिन इसे केवल उत्पादन तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। जब तक प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच नहीं बनेगी, तब तक किसान को उसका पूरा लाभ नहीं मिलेगा।

बस्तर केवल संसाधनों का भूगोल नहीं, कौशल की सभ्यता भी है। यहां कोसा है, बाँस शिल्प है, धातु कला है, लकड़ी और चमड़े का पारंपरिक काम है। यहां हाथ केवल श्रम नहीं करते, वे सृजन भी करते हैं। जरूरत इस बात की है कि इन कौशलों को “हुनर” कहकर छोड़ न दिया जाए, बल्कि इन्हें उद्योग, डिज़ाइन, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ा जाए। यही वह रास्ता है, जहां बस्तर का भविष्य केवल कृषि या वन पर नहीं, बल्कि ग्रामीण रचनात्मक अर्थव्यवस्था पर भी टिक सकता है।

फिर सवाल उठता है कि इतनी संभावनाएं होने के बावजूद हम अभी भी पूरी रफ्तार से आगे क्यों नहीं बढ़ पाए? शायद इसलिए कि हमने कई बार संसाधनों को देखा, लेकिन लोगों की भागीदारी को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। हमने योजनाएं बनाईं, लेकिन हर बार यह सुनिश्चित नहीं किया कि लोग उनके निर्माता भी बनें। हमने ढांचे खड़े किए, लेकिन हमेशा यह नहीं देखा कि उनमें स्थानीय समाज का स्वामित्व कितना है। और बस्तर में यही अंतर सबसे निर्णायक है।

बस्तर में काम करना है, तो बस्तर के तरीके से करना होगा। यहां बैठना होगा, सुनना होगा, समझना होगा। यहां गांव को लाभार्थी नहीं, भागीदार मानना होगा। ग्राम सभा, पारंपरिक संस्थाएं, महिला समूह, युवा, वन समितियां और स्थानीय उत्पादक समूह, इन्हें विकास की प्रक्रिया का केंद्र बनाना होगा। बस्तर में प्रशासन की भूमिका सबसे प्रभावी तब होगी जब वह केवल लागू करने वाला तंत्र न रहकर विश्वास का सेतु बने।

अब बस्तर के लिए यह पर्याप्त नहीं है कि हम सिर्फ यह कहें कि “स्थिति सुधर रही है।” असली सवाल यह है कि क्या बस्तर अब आर्थिक रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से आत्मविश्वासी और सांस्कृतिक रूप से सम्मानित दिशा में बढ़ रहा है? स्थायी शांति केवल सुरक्षा से नहीं आती। वह तब आती है, जब समाज को महसूस हो कि व्यवस्था में उसका हिस्सा है, निर्णय में उसकी आवाज़ है और विकास में उसका सम्मान है। इसलिए बस्तर को अब सिर्फ शांत नहीं, बल्कि समर्थ बनाना होगा।

बस्तर इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। वह अंधेरे से पूरी तरह बाहर नहीं आया है, लेकिन अब वह केवल अंधेरे की कहानी भी नहीं रह गया। यही वह समय है, जब हमें बहुत सावधानी से तय करना होगा कि बस्तर के लिए अगला कदम क्या हो। हमें सिर्फ यह नहीं देखना है कि वहां क्या बनाना है, बल्कि यह भी तय करना है कि कैसे बनाना है, किसके साथ बनाना है और किसकी शर्तों पर बनाना है।

अगर बस्तर की असली ताकत को एक वाक्य में कहा जाए, तो वह यह है कि यहां विकास की जमीन मौजूद है, बस उसे बस्तर की भाषा में पढ़ने की जरूरत है। और बस्तर की भाषा क्या है? जल की भाषा, जंगल की भाषा, हाट की भाषा, कोसा की भाषा, बाँस की भाषा और सबसे बढ़कर समुदाय की भाषा।