राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के 150 वर्ष होने पर माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक
30-31 अक्टूबर-1 नवम्बर 2025, जबलपुर
 
माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य

राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के 150 वर्ष
मातृभूमि की आराधना और संपूर्ण राष्ट्र जीवन में चेतना का संचार करने वाले अद्भुत मन्त्र “वंदेमातरम्” की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के शुभ अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रगीत के रचयिता श्रद्धेय बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता है। 1875 में रचित इस गीत को 1896 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राष्ट्रकवि श्रद्धेय रविंद्रनाथ ठाकुर ने सस्वर प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था। तब से यह गीत देशभक्ति का मंत्र ही नहीं अपितु राष्ट्रीय उद्घोष, राष्ट्रीय चेतना तथा राष्ट्र की आत्मा की ध्वनि बन गया।
तत्पश्चात बँग-भंग आंदोलन सहित भारत के स्वाधीनता संग्राम के सभी सैनानियों का घोष मंत्र “वंदेमातरम्” ही बन गया था। इस महामंत्र की व्यापकता को इस बात से समझा जा सकता है कि देश के अनेक विद्वानों और महापुरुषों जैसे महर्षि श्रीअरविंद, मैडम भीकाजी कामा, महाकवि सुब्रमण्यम भारती, लाला हरदयाल, लाला लाजपत राय आदि ने अपने पत्र पत्रिकाओं के नाम में वंदेमातरम् जोड़ लिया था। महात्मा गांधी भी अनेक वर्षों तक अपने पत्रों का समापन “वंदेमातरम्” के साथ करते रहे।
“वंदेमातरम्” राष्ट्र की आत्मा का गान है जो हर किसी को प्रेरणा देता है। वंदेमातरम् अपने दिव्य प्रभाव के कारण 150 वर्षों के बाद भी संपूर्ण समाज को राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना से ओत-प्रोत करने की सामर्थ्य रखता है। आज जब क्षेत्र, भाषा, जाति आदि संकुचितता के आधार पर विभाजन करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब “वंदेमातरम्” वह सूत्र है, जो समाज को एकता के सूत्र में बांधकर रख सकता है। भारत के सभी क्षेत्रों, समाजों एवं भाषाओं में इसकी सहज स्वीकृति है। यह आज भी समाज की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक पहचान और एकात्म भाव का सशक्त आधार है। राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण और राष्ट्र निर्माण की इस पावन बेला में इस महामंत्र के भावों को हृदयंगम करने की आवश्यकता है।
“वंदेमातरम्” गीत की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सभी स्वयंसेवकों सहित सम्पूर्ण समाज से आवाहन् करता है कि वंदेमातरम् की प्रेरणा को प्रत्येक हृदय में जागृत करते हुए “स्व” के आधार पर राष्ट्र निर्माण कार्य हेतु सक्रिय हों और इस अवसर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों को उत्साहपूर्वक भागीदारी करें।
 

https://www.rss.org/hindi/Encyc/2025/11/1/statemnet-by-sarkaryavah-jion-150-years-of-vandemataram.html

राष्ट्रीय चेतना के जागरण की शक्ति – २

प्रशांत पोळ

ऐसे अनेक प्रसंगों पर संघ के स्वयंसेवकों का योगदान अतुल्य और अद्भुत था। संघ के पूरे 100 वर्षों के कार्यकाल में, देश में जहां भी आपत्ति आई, आपदाएं आईं, तो उस परिस्थिति में, सहायता करने संघ स्वयंसेवक ही सर्वप्रथम पहुंचते हैं।

यह सारे क्राइसिस मैनेजमेंट या डिजास्टर मैनेजमेंट के उदाहरण हैं, जिसमें संघ की सक्रिय भूमिका रहती है। किंतु कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं, जिनमें संघ की उपस्थिति के कारण देश विघातक तत्वों पर अंकुश लगा।

उत्तर-पूर्व के राज्यों की स्थिति से संबंधित बातों का उल्लेख पहले भी आया है। रविवार 27 अक्तूबर 1946 को, संघ के 3 वरिष्ठ प्रचारकों ने, (दादाराव परमार्थ, कृष्णा परांजपे और वसंतराव ओक), गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ और शिलांग में एक साथ शाखा लगाई थी। इन राज्यों में संघ कार्य की आधारशिला रखी गई थी। बाद में संघ पर प्रतिबंध लगने से संघ कार्य में थोड़ा ठहराव अवश्य आया, किंतु पचास के दशक में, अत्यंत प्रतिकूल परिस्थिति में संघ कार्य पुनः प्रारंभ हुआ। इन राज्यों में धर्मांतरण की गति तेज थी, यह हमने देखा है। किंतु संघ कार्य की ताकत बढ़ने से क्या होता है, यह इन पूर्वोत्तर राज्यों में स्पष्ट दिखता है।

तीन राज्यों के ही उदाहरण लेते हैं –

इससे पहले हमने देखा है कि अंग्रेजों ने सारे प्रयास करने के बाद भी, स्वतंत्रता मिलने तक, सौ – डेढ़ सौ वर्षों में नागालैंड के 46% लोग ही ईसाई बने थे। किंतु उसके बाद स्वतंत्र भारत में धर्मांतरण को गति मिली, और अगले 60 वर्षों में ही धर्मांतरित ईसाइयों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई। अर्थात 1951 की जनगणना के अनुसार, नागालैंड में ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत था 46%, तो 2011 आते-आते वह 88 प्रतिशत हो गया।

किंतु इसमें एक रहस्य छिपा है। पूर्वोत्तर राज्यों में संघ का काम बढ़ने लगा, साठ- सत्तर के दशक से। संघ से प्रेरित ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ और ‘विवेकानंद केंद्र’ का कार्य भी यहां प्रारंभ हो गया। धीरे-धीरे संघ की ताकत यहां बढ़ती गई। इसका स्पष्ट प्रतिबिंब इसी जनसंख्या के घटते धर्मांतरण में दिखता है।

1951 में जहां 46% ईसाई नागालैंड में थे, वहां मात्र 20 वर्षों में, अर्थात 1971 की जनगणना के अनुसार, ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत हो गया 83%। संघ कार्य के बढ़ने से 1981 के जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 10 वर्षों में मात्र 2% बढ़ा, अर्थात, 85% हुआ। और उसके बाद के 30 वर्षों में मात्र 3% बढ़ सका!

ऐसा ही उदाहरण मेघालय का भी है –

यहां 1951 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत 25% था। अगले 20 वर्षों में, अर्थात 1971 में, यह प्रतिशत पहुंचा 47%। अर्थात लगभग दोगुना। किंतु यहां भी संघ का विस्तार होने लगा। शाखाओं की संख्या बढ़ने लगी। विवेकानंद केंद्र और कल्याण आश्रम के सेवा प्रकल्प प्रारंभ होते गए। उनके तथा विद्या भारती की शालाओं की संख्या बढ़ने लगी। इन सब के कारण, ईसाई जनसंख्या 75% तक पहुंचने में अगले 40 वर्ष लगे..!

मणिपुर की स्थिति भी ऐसी ही है। 1951 में ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत 12% है, जो अगले 30 वर्षों में (1981 में) 35% तक पहुंचता है। अर्थात, पहले 30 वर्षों में तीन गुना। किंतु संघ की ताकत बढ़ने के कारण, अगले 30 वर्षों में, (अर्थात 1981 से 2011) मात्र 6% ही बढ़ता है।

ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां संघ की शाखाओं का विस्तार होता है, राष्ट्रीय भावना और विचार प्रबल होने लगते हैं, वहां धर्मांतरण, देश विघातक आदि बातें थम सी जाती हैं।

संघ ने आपातकाल के विरोध में जो संघर्ष किया। उन दिनों, जब अन्य राजनीतिक दल निराश हो गए थे, तब संघ के कार्यकर्ताओं ने जनमानस का मनोबल ऊंचा रखा था। इसीलिए संविधान की हत्या करने वाले दंडित हुए, और अत्यंत सरलता से, भारत में रक्तहीन क्रांति से लोकतंत्र की बहाली संभव हो सकी।

अस्सी के दशक में असम में ‘बहिरागत हटाओ’ आंदोलन जोर पकड़ रहा था। ‘ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन’ (AASU आसू) और ‘असम गण संग्राम परिषद’ ने, संयुक्त रूप से यह आंदोलन छेड़ा था। असम में हो रही बांग्लादेश के मुसलमानों की घुसपैठ रोकना, इस आंदोलन का मूल उद्देश्य था। किंतु बाद में यह आंदोलन, असमी विरुद्ध बंगाली होने लगा। असम की क्रुद्ध जनता, सभी बहिरागतों को, अर्थात, प्रमुखता से बंगालियों को भगाने के लिए आंदोलन करने लगी थी। उनकी दृष्टि में बहिरागत यानी, जो आसामी नहीं हैं, वे सभी।

ऐसे प्रसंग में संघ ने विद्यार्थी परिषद के माध्यम से इस आंदोलन में हस्तक्षेप किया। बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थी हिन्दू कहां जाएंगे? वह कहां आश्रय लेंगे? बांग्लादेश में, ‘हिन्दू’ इस नाते से ही वह प्रताड़ित हो रहे थे। उनको आश्रय देना हमारा कर्तव्य था। आंसू और असम गण परिषद को यह बात प्रयत्न पूर्वक समझाई गई। बाद में उन्होंने भी यह स्वीकार किया, और बहिरागत हटाओ आंदोलन बांग्लादेश से अवैध रूप से आने वाले मुस्लिम घूसखोरों के विरुद्ध चला। संघ के प्रयासों से, इस आंदोलन के कारण, असमी और बांग्ला भाषिक लोगों के बीच में जो संघर्ष निर्माण हो रहा था, वह थम गया..!

अस्सी के दशक में, उत्तर का राज्य पंजाब भी अशांत हो गया था। आतंकवाद बढ़ रहा था। ऐसे में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’, बाद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी की हत्या और उस कारण सिक्ख समुदाय पर हुए प्राण घातक हमले.. इन सब के कारण पंजाब की स्थिति अत्यंत खराब थी। केशधारी और सहजधारी, अर्थात प्रचलित भाषा में, सिक्ख और हिन्दुओं के बीच, वैमनस्य अपने चरम पर था। इस मानसिकता को दूर करने और पूरे समाज में एकता का भाव जागृत करने के लिए, संघ के कार्यकर्ता अपने प्राणों पर खेल कर सारे प्रयास कर रहे थे। अर्थात, खालिस्तानी आतंकवादियों की समझ में यह बात आ रही थी कि देश को तोड़कर, स्वतंत्र खालिस्तान बनाने में मुख्य रोड़ा, प्रमुख अड़चन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है।

अतः 25 जून 1989 को, इन आतंकवादियों ने पंजाब के मोगा में संघ की प्रभात शाखा पर हमला किया। अत्यंत नृशंसतापूर्वक, 23 संघ स्वयंसेवक और 3 नागरिकों को मौत के घाट उतारा।

इन आतंकवादियों की कल्पना थी कि इस हमले के कारण, मात्र पंजाब ही नहीं, तो समूचे देश में सिक्खों के प्रति क्रोध भड़केगा। इस गुस्से और क्रोध के कारण हिन्दू-सिक्ख दंगे प्रारंभ हो जाएंगे, जो खालिस्तान की दिशा में लोगों को ढकेलेंगे।

किंतु दूसरे दिन 26 जून को मोगा में जो हुआ, उसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। जहां स्वयंसेवकों का हत्याकांड हुआ, उसी स्थान पर संघ की शाखा लगी। उसे छोटे से गांव में, सवा सौ स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित थे। इनमें केशधारी (सिक्ख) स्वयंसेवक बड़ी संख्या में थे। स्वयंसेवक गीत गा रहे थे –

कौन कहंदा हिन्दू – सिक्ख वक्ख ने।

ए भारत मां दी सज्जी –  खब्बी अक्ख ने ।।

(कौन कहता है कि हिन्दू – सिक्ख अलग हैं? वे तो भारत मां की, दाई और बाई आंख हैं।)

इस एक घटना ने पंजाब का सारा चित्र बदल दिया। खालिस्तानी आतंकवादियों को कड़ा संदेश गया, कि संघ के स्वयंसेवक डरने या घबराने वाले नहीं हैं। वह निर्भयता से अपना काम करते रहेंगे। हिन्दू – सिक्खों के बीच जो दरार डालने की कोशिश की गई, वह बाजी उलट गई। इस घटना से हिन्दू – सिक्खों के बीच की बॉन्डिंग और मजबूत हुई।

आंकड़े बताते हैं कि इस घटना के बाद, आतंकवादियों ने बौखला कर हमलों की प्रखरता बढ़ाई। किंतु अगले एक-दो वर्षों में, पंजाब में हिंसा की घटनाओं में तेजी से कमी आई, और 1992 के बाद पंजाब से खालिस्तानी आतंकवाद लगभग समाप्त हुआ।

1989 यही वर्ष था, जब देश में आरक्षण विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था। राजीव गोस्वामी के साथ कुछ और युवकों ने भी आरक्षण के विरोध में आत्मदाह किया था। कुल 200 युवकों ने आत्मदाह का प्रयास किया, जिनमें से 62 छात्रों की मृत्यु हो गई थी। उन दिनों ऐसा लग रहा था कि समूचा उत्तर भारत दो धड़ों में विभाजित हो रहा है। सामाजिक वातावरण अत्यंत दूषित हो गया था।

वर्ष 1989 यह संघ के संस्थापक, डॉक्टर हेडगेवार जी का भी जन्मशताब्दी वर्ष था। इस निमित्त, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने व्यापक पैमाने पर जनसंपर्क का अभियान चलाया था। इसी समय, अयोध्या के राम जन्मभूमि आंदोलन को संघ प्रेरित विश्व हिन्दू परिषद ने गति दी। सर्वत्र श्रीराम का जयघोष होने लगा। समरसता का उद्घोष होने लगा। और इन सब में, जाति-जातियों के बीच का वह भयंकर तनाव, क्षीण होता गया।

राजीव गांधी की सरकार और उसके बाद आई वीपी सिंह की सरकार में आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। बाद की सरकारों को सोना भी गिरवी रखना पड़ा। वैश्विक पृष्ठभूमि पर भारत के आर्थिक हालात अत्यंत खराब थे। विश्व में GDP की क्रम में हम 17वें स्थान पर थे। उस समय संघ की प्रेरणा से स्वदेशी जागरण मंच का कार्य प्रारंभ हुआ, स्वदेशी के माध्यम से लोगों में ‘स्व’ के भाव का जागरण प्रारंभ हुआ…

अर्थात, संघ की ताकत कम रहे, या वह प्रभावशाली भूमिका में रहे, संघ ने हमेशा ही ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ की भावना से, देश के सामने उत्पन्न विभिन्न संकटों से देश को बाहर निकालने का पूरा प्रयास किया है।

मार्च 2020 में आया कोरोना (कोविड) सबसे भयानक संकट था। पूरा देश थम गया था, सहम गया था। किंतु संकट की इस घड़ी में भी संघ स्वयंसेवकों ने समाज को सक्रिय करके, कोरोना का मुकाबला किया। इस प्रक्रिया में संघ के कुछ प्रचारक और कुछ कार्यकर्ता भी हुतात्मा हुए। किंतु संघ ने समाज को आगे करके पूरे देश में आत्मविश्वास और आशावाद का संचार किया।

यद्यपि संघ की दृष्टि से यह सब लिखा जाना उचित नहीं है, कारण संघ श्रेय नहीं चाहता। किंतु फिर भी, इतिहास में यह रेखांकित (underline) करना आवश्यक है कि आपदा के समय, देश को संकट से उबारा और बिखरने से रोका संघ ने। संघ इस देश की रीढ़ की हड्डी है।

विशेषत: जब हम हमारे पड़ोसी देश, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश को देखते हैं, वहां की अराजकता देखते हैं, वहां का बिखराव देखते हैं, तब हमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का महत्व विशेष रूप से प्रतीत होता है..! ‘इंडिया’ से, आज के इस बदले हुए ‘भारत’ को खड़ा करने में, संघ का विशेष योगदान है।

लालच-धोखे से धर्म परिवर्तन सामाजिक एकता के लिए खतरा, जनजातीय समाज की परंपरा की रक्षा करना संवैधानिक

रायपुर, छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में जनजातीय गांवों में पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने वाले बोर्डों के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय ने जनजातीय समाज को जबरन या लालच देकर किए जाने वाले धर्मांतरण से बचाने के लिए लगाए बोर्डों को असंवैधानिक मानने से इंकार कर दिया।

कांकेर जिले के आठ जनजातीय गांवों में लगे बोर्डों पर सवाल उठाने वाली याचिका को न्यायालय ने खारिज कर दिया और कहा कि इन बोर्डों का मकसद धर्म विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक एकता की रक्षा करना है।

कांकेर जिले के दिग्बल टांडी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मांग की थी कि गांवों में लगे इन बोर्डों को हटाया जाए। उनका आरोप था कि ये बोर्ड पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों को गांव में प्रवेश करने से रोकते हैं और धार्मिक भेदभाव करते हैं। ये बोर्ड कुदल, पारवी, जुनवानी, घोटा, हबेचुर, घोटिया, मुसुरपुट्टा और सुलागी जैसे जनजातीय गांवों में लगाए गए थे। याचिकाकर्ता ने पंचायत विभाग पर आरोप लगाया कि उसने इन गांवों को पत्र जारी कर ‘हमारी परंपरा, हमारी विरासत’ के नाम पर ऐसे बोर्ड लगाने को कहा।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभुदत्त गुरु की पीठ ने कहा कि बोर्डों में ईसाई धर्म के खिलाफ कुछ भी नहीं लिखा गया है। वे केवल उन पादरियों के प्रवेश को रोकते हैं, जिन पर लालच और धोखे से धर्मांतरण कराने के आरोप हैं। “ये बोर्ड जनजातीय लोगों ने अपनी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत बचाने के उद्देश्य से लगाए हैं। यह अवैध धर्मांतरण के खिलाफ एहतियाती कदम है, न कि किसी धर्म के खिलाफ भेदभाव।”

न्यायालय ने कहा कि अवैध धर्मांतरण से सामाजिक सद्भाव पर बुरा असर पड़ता है। मिशनरियों द्वारा गरीब, अशिक्षित और पिछड़े समुदायों को बेहतर जीवन, शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर लालच देकर धर्म बदलवाने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हुए न्यायालय ने कहा कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक विभाजन को जन्म देता है।

“ईसाई मिशनरियों पर जनजातीय समाज को बहला-फुसलाकर धर्मांतरण कराने के आरोप लगते हैं। यह प्रक्रिया न केवल जनजातीय परंपराओं को तोड़ती है, बल्कि समुदायों के अंदर गहरे मतभेद पैदा करती है।”

न्यायालय ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। इसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता के दायरे में ही माना जाएगा। इसीलिए कई राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं, ताकि धोखे, दबाव या लालच से होने वाले धर्मांतरण को रोका जा सके।

“भारत का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना सह-अस्तित्व और विविधता के सम्मान पर आधारित है।” लेकिन लालच देकर धर्मांतरण करवाना न केवल धर्म का अपमान है, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव भी पैदा करता है। कई बार ऐसे धर्मांतरण विवादों के बाद हिंसा की घटनाएं भी सामने आती हैं।

मुख्य मंदिर निर्माण संबंधी सभी कार्य पूर्ण

अयोध्या। मुख्य मंदिर निर्माण सबंधी सभी कार्य पूर्ण हो गए हैं अर्थात – मुख्य मंदिर, परकोटा के ६ मंदिर – भगवान शिव, भगवान गणेश, भगवान हनुमान, सूर्यदेव, देवी भगवती, देवी अन्नपूर्णा तथा शेषावतार मंदिर भी पूर्ण हो चुके हैं। इन पर ध्वजदण्ड एवं कलश भी स्थापित हो चुके हैं। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की ओर से यह जानकारी एक सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से दी गई।

तीर्थ क्षेत्र की ओर से बताया गया कि इसके अतिरिक्त सप्त मण्डप अर्थात् महर्षि वाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, निषादराज, शबरी एवं ऋषि पत्नी अहल्या मंदिरों का भी निर्माण पूर्ण हो चुका है। सन्त तुलसीदास मंदिर भी पूर्ण हो चुका है तथा जटायु और गिलहरी की प्रतिमाएं स्थापित की जा चुकी हैं।

जिन कार्यों का सीधा सम्बन्ध दर्शनार्थियों की सुविधा से है अथवा व्यवस्था से है, वे सभी कार्य पूर्णत्व प्राप्त कर चुके हैं। मानचित्र अनुसार सड़कें एवं फ्लोरिंग पर पत्थर लगाने कार्य L&T द्वारा तथा भूमि सौन्दर्य, हरियाली और लैंड स्केपिंग कार्य सहित १० एकड़ में पंचवटी निर्माण का कार्य GMR द्वारा तीव्र गति से किए जा रहे हैं।

तीर्थ क्षेत्र ने बताया कि वही कार्य अभी चल रहे हैं, जिनका सम्बन्ध जनता से नहीं है जैसे ३.५ किलोमीटर लम्बी चारदीवारी, ट्रस्ट कार्यालय, अतिथि गृह, सभागार इत्यादि।

हिन्दू समाज के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं – मिलिंद परांडे

काशी। विश्व हिन्दू परिषद काशी कार्यालय के लोकार्पण कार्यक्रम संपन्न हुआ। विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय महामंत्री संगठन मिलिंद परांडे जी ने कहा कि यह भवन केवल निवास के लिए नहीं, बल्कि देश दुनिया से काशी आने वाले लोगों के लिए एवं संगठन गतिविधियों का केंद्र होगा। यह व्यक्तिगत वस्तु नहीं, बल्कि सार्वजनिक भवन है, जिसकी व्यवस्थाओं के लिए हमें अपने नागरिक कर्तव्य का बोध होना चाहिए। यह अनेक पुण्य आत्माओं द्वारा किए गए कार्य का प्रतिफल है। आज सैकड़ों वर्षों के बाद हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के लिए समाज में अनुकूल वातावरण बना हुआ है, फिर भी हिन्दू समाज के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं। उनकी राजनीतिक शक्तियां कमज़ोर हुई हैं, आज वह प्रत्यक्ष शारीरिक हिंसा साम्यवादी, जिहादी समाज में हिंसा का माहौल निर्माण कर रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में हम हिन्दू हैं, हमें इसको सिद्ध करना पड़ेगा। हम जाति, मत, पंथ, संप्रदाय से ऊपर उठकर हम हिन्दू हैं, इस कर्तव्य का पालन करना होगा। हिन्दू-हिन्दू से कैसे लड़ेगा, ऐसा वातावरण समाज में बनाने का प्रयास किया जा रहा है। हमें ऐसी शक्तियों को पहचान कर उनके मंसूबे नाकाम करने पड़ेंगे। घटती प्रजनन दर जनसंख्या असंतुलन का मुख्य कारण है, जो समाज में एक बड़ी खाई का रूप लेती जा रही है। इन विषयों पर समाज को चिंतन करना है। जो पोषण देने में सक्षम है, उन लोगों के यहां भी प्रजनन का अनुपात बहुत कम है।

उन्होंने कहा कि आज 10 से 15 वर्ष के बच्चों को सीमावर्ती राज्यों पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, बर्मा, थाईलैंड से ड्रग की आपूर्ति की जा रही है। वर्ष में लगभग 40000 करोड़ रुपये का ड्रग पकड़ा गया है, जो हमारे संस्कार समाप्त करने की बहुत बड़ी साजिश चल रही है। गौ-हत्या और धर्मांतरण, मंदिर अधिग्रहण एक बड़ी चुनौती है, ऐसे विषयों पर समाज का जागरण हो, समाज संस्कार युक्त हो, इसके लिए समाज का प्रबोधन करने की जिम्मेदारी हम सब की है। समाज में पर्यावरण, नागरिक कर्तव्य, सामाजिक समरसता जैसे विषयों को ले जाना हम लोगों की जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम में महंत रविदास मठ के भारत भूषण जी ने संगठन के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि विश्व हिन्दू परिषद हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के लिए हिन्दू समाज के व्यापक जागरण के कार्य में लगा रहता है। ऐसे ही संगठनों से हमारे संस्कृति का परचम पूरी दुनिया में लहरा रहा है। पूजन व मंगलाचरण संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य द्वारा संपन्न हुआ। कार्यालय निर्माण में सहयोग करने वाले प्रवीण रुंगटा, अमित अग्रवाल, नवीन रुंगटा का सम्मान किया गया।

बस्तर क्षेत्र में बारूद की गंध नहीं बहेगी; प्रगति के साथ कदम ताल करेगा

आप राजनीति के लिए सरकार की आलोचना कर सकते हैं, गलत पर आलोचना करनी ही चाहिए। लेकिन क्रूर माओवादी आतंकवाद (नक्सलवाद) के खात्मे के लिए सरकार ने नई लकीर खींच दी है।  17 अक्तूबर 2025 को छत्तीसगढ़ में 210 माओवादियों का समर्पण एक बड़ी और ऐतिहासिक सफलता है। हथियार का रास्ता छोड़कर हाथों में संविधान यानी लोकतंत्र की राह पकड़ने वालों के लिए सरकार ने – रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत भी किया। गुलाब देकर अभिनंदन करते हुए बताया कि बारूद नहीं, अब पुष्प की भांति ही सुगंध बिखेरिए।

सोचिए कि जिन नक्सलियों के हाथों में हथियार रहते थे और जो हिंसा से छत्तीसगढ़ की धरती को लाल करते थे। अब वो माओवादी हथियार छोड़कर संविधान थाम रहे हैं। हिंसा की बजाय शांति और सकारात्मक भूमिका की ओर बढ़ रहे हैं। इस मोड़ तक लाने के पीछे निश्चय ही सरकार की मुखरता और प्रतिबद्धता रही है। जो अब इस रूप में सबके सामने आ पाई है। लगातार आलोचनाओं और आरोपों के बावजूद भी सरकार और जवान अपने उद्देश्य से विचलित नहीं हुए। माओवादियों ने अगर हिंसा का रास्ता चुना तो उन्हें संहार का सामना करना पड़ा और अब शांति की ओर बढ़े तो सरकार ने स्वागत किया।

निश्चय ही इसके लिए मुख्यमंत्री और गृहमंत्री बधाई के पात्र हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ में शांति के संकल्प को केवल नारों और वादों में ही सीमित नहीं रखा। बल्कि उसे साकार कर दिखाया है। इससे पहले भी माओवादी छिटपुट समर्पण करते रहे हैं। लोन वर्राटू अभियान की इसमें बड़ी भूमिका रही है। लेकिन एक साथ 210 की संख्या में माओवादियों का समर्पण सरकार की लोक हितकारी भूमिका प्रकट करता है। इसके साथ ही ‘नक्सलवादी आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025’, नियद नेल्लानार योजना और ‘पूना मारगेम-पुनर्वास से पुनर्जीवन’ जैसी योजनाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सरकार ने बता दिया है कि उसका उद्देश्य बस्तर में स्थायी शांति है। इससे किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता है। जहां माओवादियों के खिलाफ जवानों ने लगातार आक्रामक कार्रवाई की। वहीं बातचीत के माध्यम से आत्मसमर्पण के रास्ते भी खोले। हथियार छोड़कर मुख्यधारा में शामिल करने के लिए पहल की। इसमें सफलता भी मिली। स्पष्ट है कि ये ‘पुनर्वास से पुनर्जीवन’ लक्ष्य है, जिसे मार्च 2026 तक केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार पूरा करने में पूरी ताक़त झोंक चुकी है। लेकिन चुनौतियां अब भी बाकी हैं। अब बस्तर सहित समूचा छत्तीसगढ़ शांति के रास्ते पर बढ़ चला है। बस्तर क्षेत्र में अब बारूद की गंध नहीं बहेगी, बल्कि लोकतन्त्र की छांव में प्रगति के साथ कदम ताल करेगा।

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

राष्ट्र निर्माण में मीडिया की मजबूत भूमिका होनी चाहिए – दत्तात्रेय होसबाले जी

हरिद्वार, उत्तराखंड।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में शुक्रवार को राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी, देसंविवि के कुलपति शरद पारधी जी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी, पूर्व सांसद तरुण विजय सहित अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। सम्मेलन में कुल पाँच सत्र हुए, जिनमें वक्ताओं ने मीडिया से भारत को विकसित बनाने में योगदान देने का आह्वान किया।

मुख्य अतिथि दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि मीडिया को सशक्त भूमिका निभानी चाहिए। अपने देश व धर्म की सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करते रहना चाहिए। राष्ट्र निर्माण में मीडिया की विशेष भूमिका है। स्वाधीनता के समय में भी हमारे नायकों ने मीडिया के कई माध्यमों का उपयोग किया और जन जागरण में मीडिया की उपयोगिता सिद्ध की। पत्रकारों का आवाहन करते हुए उन्होंने कहा कि सभी को अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी के साथ निभानी चाहिए। समाज के सशक्तीकरण व नारी जागरण जैसे विषयों पर अपनी योग्यता का पूरा उपयोग करते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण में मीडिया की मजबूत भूमिका होनी चाहिए।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि पत्रकारों को संवेदनशील होना चाहिए और वे ऐसे खबरों का ही विस्तार करें, जो समाज व राष्ट्र का विकास में सहायक हों। आज जिस तरह से असुरता, अनीति, और भ्रष्टाचार ने अपना पैर पसारा है, उसे अब जड़ से मिटाने का समय आ गया है। प्राच्यम स्टूडियोज के सीईओ प्रवीण चतुर्वेदी, सुदर्शन चैनल के मुख्य संपादक सुरेश चव्हाणके, पूर्व सूचना आयुक्त उदय माहूरकर, पूर्व राज्यसभा सदस्य तरुण विजय ने भी मीडिया की भूमिका पर विचार साझा किए।

पांच सत्रों में दिल्ली, बिहार, झारखण्ड, उप्र, उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, मप्र सहित अनेक राज्यों से आए ’मीडिया जगत के प्रतिष्ठित व्यक्तियों, लेखकों, फिल्मकार, पत्रकारों ने मीडिया की भूमिका पर विचार-विमर्श किया। इस बात पर बल दिया कि आज के समय में मीडिया केवल सूचना का स्रोत नहीं, बल्कि राष्ट्र को दिशा देने वाला एक सशक्त माध्यम बन चुका है। इस दौरान अखिल विश्व गायत्री परिवार के सैकड़ों स्वयंसेवक सदस्य भी उपस्थित रहे और आयोजन को वैचारिक व सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध किया। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने भी आधुनिक समय में स्पिरिचुअल पत्रकारिता की आवश्यकता पर विशेष चर्चा की।

इस दौरान अखण्ड ज्योति की आध्यात्मिक यात्रा पर डॉक्यूमेंट्री, संस्कृति संचार, रिनासा के नये अंक व पुस्तकों का विमोचन किया गया। कुलपति, प्रतिकुलपति ने अतिथियों को देसंविवि का प्रतीक चिह्न, गंगाजली, रुद्राक्षमाला आदि भेंटकर सम्मानित किया।

मानसरोवर की मुक्ति भारत एवं तिब्बत का सामूहिक स्वप्न – डोलमा गैरी

धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम ‘शताब्दी संघोष’ ने निर्वासित तिब्बत प्रशासन की सुरक्षा मंत्री डोलमा गैरी ने कहा कि मानसरोवर की मुक्ति भारत एवं तिब्बत का सामूहिक स्वप्न है। इस स्वप्न की प्राप्ति के लिए आरएसएस का देश प्रेम एवं इतिहास हमें प्रेरित करता है।

सुरक्षा मंत्री डोलमा गैरी ने कहा कि प्रत्येक तिब्बती भारत को आर्यभूमि कहता है, और आरएसएस आर्यभूमि के इतिहास एवं परंपरा का संवाहक है, इसलिए देश प्रेम का आरएसएस का दृष्टिकोण  तिब्बतियों के लिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है। निर्वासित तिब्बतियों के अधिकारों एवं स्वतंत्रता के लिए संघ प्रारंभ से ही प्रयत्नशील है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र बौद्धिक शिक्षण प्रमुख हरीश जी ने कहा कि संघ ने 100 वर्ष के इतिहास में उपेक्षा एवं विरोध की लम्बी श्रृंखला का सामना किया है और अब उसे समाज का सहयोग प्राप्त होने लगा है। बढ़ते समाजिक सहभाग ने वैश्विक स्तर पर कई शक्तियों को हैरत में डाल दिया है। समाज के बढ़ते सहभाग से पैदा हुई ऊर्जा का सही उपाय उपयोग करने के लिए संघ ने पंच परिवर्तन का लक्ष्य लिया है। स्व बोध, कुटुम्ब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य और पर्यावरण संरक्षण को लेकर संघ ने भारतीय समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया है। उन्होंने इस प्रयास से समाज के सभी नागरिकों को जुड़ने का आह्वान भी किया।

संघ के शताब्दी वर्ष और विजयादशमी के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में दाढ़ी मेला ग्राउंड से लेकर चरान चौक तक लगभग 625 स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश में पथ संचलन किया। इसमें छोटे आयु के बाल स्वयंसेवकों का पथ संचलन आकर्षण का केन्द्र रहा। स्थानीय लोगों ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया।

पथ संचलन से पहले अतिथियों ने शस्त्र पूजन किया।

महर्षि वाल्मीकि ने रामायण के माध्यम से श्री राम को घर-घर तक पहुंचाया – डॉ. मोहन भागवत जी

कामठी (नागपुर), 07 अक्तूबर।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि जी की महानता को तो हम सब लोग जानते हैं। हमारे जीवन में राम लाने वाले वही हैं। राम तो थे, और हो गए, परंतु घर-घर में राम महर्षि वाल्मीकि के कारण पहुंचे। उन्होंने रामायण लिखी और सब तक पहुंचाई। क्योंकि उनके मन की संवेदना सबको अपना मानने वाली थी। दुनिया का दुःख दूर हो, इसलिये उन्होंने यह किया। उस पर चिंतन करने की आवश्यकता है।

सरसंघचालक जी वाल्मीकि समाज सेवा मंडल, कामठी, नागपुर द्वारा आयोजित महर्षि वाल्मीकि जन्मोत्सव समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर मंच पर सांसद सुमित्रा वाल्मीकि, अंशु रघुवंशी, विदर्भ प्रान्त सह संघचालक श्रीधर जी गाडगे और विधायक आशीष जायसवाल मंच पर उपस्थित रहे।

सरसंघचालक जी ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि जी का जन्म जयंती उत्सव मनाने के लिए हम यहां एकत्रित हैं। उत्सव शब्द से उत्साह शब्द आता है। उत्सव मनाते हैं, तो उत्साह बढ़ता है। लेकिन कौन-सा उत्साह बढ़ना चाहिए? तो जिनका उत्सव मनाते हैं, उनके जीवन के जो गुण हैं, उन गुणों का आचरण, अनुकरण करने का उत्साह बढ़ना चाहिए।

रामायण का मूल उद्देश्य

महर्षि वाल्मीकि जी ने दुनिया दुःख दूर करने के लिये रामायण लिखी और सब तक पहुंचाई। अगर दुनिया का दुःख दूर होना है, तो वो कोई जादू से दूर नहीं होता। क्योंकि दुःख क्यों पैदा होता है? दुःख हम लोग ही पैदा करते हैं। अपने स्वयं के जीवन में भी दुःख पैदा करने वाले हम ही हैं। दोष दूसरों को देते हैं। लेकिन कहीं न कहीं हमारा ही कर्म हमको खाता है। हमारे मन में स्वार्थ, भेद है, हम किसी नियम में बैठते नहीं, हम अपने आप को सबसे अलग और बड़ा मानते हैं, बाकी लोगों को नीच मानते हैं, ये बातें मन के अहंकार के कारण उत्पन्न होती हैं, उसके कारण जीवन में दुःख होता है। जो अहंकारी नहीं है, जो अपने फायदे-नुकसान की परवाह नहीं करता, यश-अपयश, जय-पराजय, मान-अपमान, इससे अलग होकर हर किसी परिस्थिति में जो मनुष्यता का बर्ताव करता है, सबके साथ अपने आप को जोड़कर एक मानकर बर्ताव करता है, वो स्वयं तो सुखी होता ही है, लेकिन दुनिया में सर्वदूर सुख का अवतरण करने का कारण बनता है। ऐसे उदाहरण को सारे समाज के सामने रखने के लिए उन्होंने रामायण रची।

रामायण यह कल्पना की बात नहीं है। यह ग्रंथ हमको बताता है कि उस समय जो प्रत्यक्ष राजा राम थे, वह जब बालक राम थे, जब वनवासी राम थे, जब युद्ध में लड़ने वाले राम थे, जब राजा राम थे, और उसके बाद एक कुटुंब वत्सल राम भी थे। राम के अनेक रूप हैं। तो एक पूरे जीवन का वर्णन किया। हमें रामायण में एक आदर्श व्यक्ति, राजा राम का उदाहरण मिलता है। रामायण में एक आदर्श परिवार का भी उदाहरण मिलता है । भाई हो तो भरत जैसा, माता हो तो कौशल्या जैसी। रामायण में जितने पात्र हैं, राम के कुटुंब में भी और रावण के कुटुंब में भी, दोनों की करनी अलग-अलग है, परस्पर विरुद्ध भी है, लेकिन एक-दूसरे के साथ कुटुंब में आचरण करने के मूल्य समान हैं। हमको व्यक्ति के नाते कैसा रहना चाहिए जीवन में, राम बताते हैं। हमारे कुटुंब में हम सबको परस्पर व्यवहार कैसा रखना चाहिए, रामायण बताता है। आदर्श सेवक कैसा हो, आदर्श मंत्री कैसा हो राजा को सलाह देने वाला, श्री राम है, उनके भक्त हनुमान हैं। भक्ति के तो इतने उदाहरण हैं, विभीषण भी हैं, सुग्रीव भी हैं। जीवन के हर प्रकार के व्यक्ति के लिए आचरण का मार्गदर्शन वाल्मीकि जी की रामायण में है। उन्होंने केवल कथा नहीं बताई, उन्होंने हमारे लिए एक शाश्वत उपदेश दिया है।

मोहन भागवत जी ने कहा कि विश्व में भारत अपनी आध्यात्मिकता, सद्भावना, सद्-व्यवहार के कारण प्रसिद्ध है। और वह आध्यात्मिकता, सद्-व्यवहार, यह किसके कारण आया? वो सद्भावना सारे विश्व के प्रति हमारे मन में क्यों आई? उसके मूल में राम-कथा है, और राम-कथा का मूल है महर्षि वाल्मीकि जी की करुणा, महर्षि वाल्मीकि जी का आदर्शवाद।

महर्षि वाल्मीकि जी ने केवल कथा नहीं लिखी, उनका स्वयं का जीवन ऐसा था। उनके कथा के नायक राम थे, वह वास्तविक थे, कल्पना नहीं थी। उन्होंने देखकर उनका जीवन लिखा। ऐसा उत्तम चरित्र उन्होंने स्वयं चरितार्थ किया, जो चरितार्थ कर रहा था उसकी कहानी बताई। इसलिए बताई कि यह संस्कारों की परंपरा, गुणवत्ता की परंपरा, विश्व के प्रति सद्भाव की परंपरा सतत चलती रहे। परिस्थिति आती है उल्टी-सीधी। लेकिन दिमाग ठिकाने पर रहे, मन में शांति रहे, मन में प्रेम रहे, सद्भावना रहे और कष्ट उठाकर भी, सहन करके भी, लोग अच्छाई के मार्ग पर चलें, बुराई के मार्ग पर न चलें।

सरसंघचालक जी ने कहा कि आज की गणना के अनुसार कहते हैं कि रामायण 8000 वर्ष पूर्व हो गई। तो 8000 वर्ष पूर्व जो उन्होंने सपना देखा था, वह 8000 वर्ष बाद आज भी हम लोग ऐसे प्रयत्नों से, धैर्यपूर्वक, सतत, मेहनत करते हुए, अपनी इन्हीं आँखों से, इसी देह में, इस देश में साकार कर सकते हैं और साकार करना चाहिए। मानवता के प्रति हमारा यह कर्तव्य है। क्योंकि हम भारतीय हैं, यह हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा है, उसको आगे सरसाना हमारा कर्तव्य है। उस संस्कृति के कारण ही हम वास्तविक मनुष्य का जीवन पाते हैं। और एक व्यक्ति के नाते, हमारे अपने समाज के प्रति, हमारे अपने परिवार के प्रति अपना यह कर्तव्य है। ये त्रिविध कर्तव्य अपने पूरे हो जाएं, इसलिए इस प्रकार के उत्सव सहायभूत होते हैं। आज के प्रसंग का यह महत्व समझकर हम सब लोग इसका चिंतन करें और आचरण करें।

प्रभु श्रीराम के दर्शन को 40 दिन की पदयात्रा, 73 वर्षीय राम भक्त का उत्साह

अयोध्या, 9 अक्तूबर। प्रभु श्री रामलला के प्रति समर्पण व संकल्प पूर्ति के लिए 73 वर्षीय युवा-वृद्ध 1338 किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए अयोध्या धाम पहुंचे।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चम्पतराय से भेंट की अभिलाषा में कारसेवकपुरम आए। गुजरात के मेहसाणा जनपद के ग्राम मोदीपुर निवासी जयंती लाल हरजीवन दास पटेल बताते हैं कि अक्तूबर 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा जब मेहसाणा पहुंची तो वे भी पूरे उत्साह से इसमें शामिल हुए और मंदिर बन जाने पर मेहसाणा से अयोध्या तक की पदयात्रा का संकल्प लिया था।

अब रामलला, राम दरबार सहित परिसर व परकोटे के आठ अन्य मंदिरों की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ध्वजारोहण की घोषणा होने पर संकल्प पूर्ति के लिए पदयात्रा करते आए  हैं। जयंतीलाल ने बताया कि रोज 33-35 किलोमीटर चलते व रात को विश्राम करते थे। 30 अगस्त को शुरू की गईं यात्रा 40वें दिन अयोध्या में समाप्त हुई। रास्ते में अधिकांशतः मंदिरों, सार्वजनिक पार्क व अतिथि गृहों में भोजन विश्राम करते हुए यात्रा की निरन्तरता रखी। नित्य अग्रिम पड़ाव के लिए कुछ रिश्तेदार मोबाइल पर आगे के पड़ाव का अनुमान बता देते थे।