मुख्यमंत्री निवास में होली के रंगों की बौछार: मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने अधिकारियों-कर्मचारियों संग खेली होली

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने आज राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ पूरे उत्साह और उमंग के साथ होली का पर्व मनाया। पारंपरिक फाग गीतों और हर्षोल्लास के वातावरण में रंग और उल्लास से सराबोर इस अवसर पर सभी ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएँ दीं। अधिकारियों और कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री श्री साय को गुलाल लगाकर उन्हें बधाई दी, वहीं मुख्यमंत्री श्री साय ने भी आत्मीयता के साथ सभी को गुलाल लगाकर रंगोत्सव की शुभकामनाएँ दीं और स्नेह, विश्वास तथा आपसी भाईचारे का संदेश दिया।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सद्भाव और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यह पर्व समाज में एकता, भाईचारे और सकारात्मकता की भावना को सुदृढ़ करता है तथा जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के पर्व हमें आपसी मतभेद भुलाकर मिल-जुलकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आज मुख्यमंत्री निवास में आयोजित होली मिलन समारोह में सभी से आत्मीय भेंट कर उन्हें अत्यंत प्रसन्नता हुई। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों, साथियों और प्रदेशवासियों के साथ स्नेह, विश्वास और अपनत्व के रंग साझा करना इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने कहा कि प्रदेशवासियों का स्नेह और आशीर्वाद ही जनसेवा के उनके संकल्प को और अधिक सशक्त बनाता है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हुए सभी को होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि रंगों का यह पावन पर्व सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और नई ऊर्जा का संचार करे तथा हमारा छत्तीसगढ़ निरंतर विकास और खुशहाली के नए आयाम स्थापित करता रहे। 

इस अवसर पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री सुबोध कुमार सिंह, पुलिस महानिदेशक श्री अरुण देव गौतम, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक श्री अमित कुमार, रायपुर के पुलिस कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला सहित मुख्यमंत्री सचिवालय एवं निवास कार्यालय के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे।

होली खुशियों और जुड़ाव का अवसर, किसानों की समृद्धि से बढ़ा उत्साह – मुख्यमंत्री श्री साय

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज धरसींवा विधानसभा क्षेत्र में विधायक श्री अनुज शर्मा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल हुए और क्षेत्रवासियों के साथ होली की खुशियाँ साझा कीं। मुख्यमंत्री ने आयोजन में आमंत्रित किए जाने पर विधायक श्री अनुज शर्मा का आभार व्यक्त करते हुए सभी उपस्थितजनों को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे को मजबूत करने का पर्व है। यह हमें मन-मुटाव भुलाकर एक-दूसरे के साथ मिलकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि होलिका बुराई का प्रतीक है, जिसका दहन कर हमें जीवन में अच्छाई, सकारात्मकता और खुशहाली को अपनाना है तथा सबके सहयोग से छत्तीसगढ़ को विकास के पथ पर आगे बढ़ाना है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इस वर्ष 4 मार्च को होली का पर्व है और इसका उत्साह अभी से दिखाई देने लगा है। उन्होंने बताया कि हाल ही में कृषक उन्नति योजना के अंतर्गत किसानों के खातों में राशि अंतरित की गई है, जिससे किसानों में विशेष उत्साह है और इस बार प्रदेश में होली का पर्व और अधिक उल्लासपूर्ण माहौल में मनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि होली सामाजिक और पारिवारिक जुड़ाव का अवसर भी है, जो समाज में आत्मीयता और विश्वास को मजबूत करता है।

विधायक श्री अनुज शर्मा ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय द्वारा किसानों के खातों में सहायता राशि अंतरित किए जाने से किसानों में खुशी का माहौल है और वे इस वर्ष होली का त्योहार अधिक आनंद और उत्साह के साथ मना रहे हैं। उन्होंने कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक फाग गीत प्रस्तुत कर वातावरण को उत्सवमय बना दिया, जिससे पूरा परिसर होली के रंग में सराबोर हो गया।

सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल ने भी क्षेत्रवासियों को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की।

इस अवसर पर विधायक श्री मोतीलाल साहू, श्री पुरंदर मिश्रा, फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष सुश्री मोना सेन सहित अन्य जनप्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में गणमान्यजन उपस्थित थे।

समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण संघ कार्य का मूल आधार – डॉ. मोहन भागवत जी

चरित्र से मजबूत होता है राष्ट्र, संघ मूल्य आधारित संगठन – ले. जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल जी

कुरुक्षेत्र – 28 फरवरी 2026।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण संघ कार्य का मूल आधार हैं। स्पष्ट किया कि नैतिक मूल्यों, आचरण, संस्कार और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के साथ पुरुषार्थ का समन्वय आवश्यक है, तभी स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। सरसंघचालक जी शनिवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त प्रमुख जन गोष्ठी में हरियाणा प्रदेश के प्रमुख शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान मंच पर सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस. जायसवाल जी, उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल जी और प्रांत संघचालक प्रताप सिंह जी उपस्थित रहे ।

सरसंघचालक जी ने परिवार की भूमिका पर विशेष बल देते हुए कहा कि घरों में मंगल संवाद की परंपरा विकसित होनी चाहिए, जहां मन से मन का संवाद हो और बच्चों को उचित-अनुचित का बोध कराया जाए। केवल उपदेश नहीं, बल्कि संवाद और संस्कारयुक्त वातावरण ही व्यक्ति को भटकाव से बचाता है। संपत्ति के समय साथ खड़े होने वाले बहुत होते हैं, लेकिन विपत्ति में साथ देने वाला कौन है, यह परिवार और समाज के संस्कार तय करते हैं। यदि कोई भी इंसान असफल हो जाए या बुरी संगति में पड़ जाए, तो उसे मार्गदर्शन देने वाला, समझाने वाला और संभालने वाला अपना परिवार और समाज ही होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कुटुंब और समाज में संस्कारों का वातावरण निर्माण करना समय की आवश्यकता है, क्योंकि यही वातावरण जिम्मेदार, संवेदनशील और चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण करता है।

सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ को समझना है तो संघ में आकर ही समझना पड़ेगा। केवल बाहर से देखकर, कल्पना से और फैलाये जा रहे नैरेटिव से नहीं समझ सकते, क्योंकि संघ का जैसा काम है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं है। आज पांचों महाद्वीपों से महत्वपूर्ण लोग संघ को देखने, जानने और समझने के लिए आते हैं। वे भी अपने देश के युवाओं के लिए इस तरह का विचार संगठन खड़ा करने के लिए सहयोग मांगते हैं, क्योंकि उनके पास ऐसा ढांचा नहीं है।

उन्होंने कहा कि जिस तरह से सूर्य जैसा कोई दूसरा सूर्य नहीं, आकाश जैसा दूसरा आकाश नहीं है,  उसी तरह से संघ जैसा दूसरा संगठन नहीं है। अगर कोई दूर से देखकर संघ को जानना चाहता है, तो पता नहीं लगेगा। उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवक देश में एक लाख 30 हजार सेवा कार्य चलाते हैं, इसके बाद भी संघ सर्विस आर्गेनाइजेशन नहीं है। कला से लेकर क्रीड़ा तक और विविध क्षेत्रों से लेकर राजनीति तक संघ विचार के कार्यकर्ता हैं, पर संघ एक राजनीतिक संगठन नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ के बारे में एक बात समझने की है कि वह स्पर्धा के भाव से शुरु नहीं हुआ। संघ किसी एक परिस्थिति की प्रतिक्रिया में या विरोध में नहीं चला, बल्कि राष्ट्र के लिए प्रतिबद्धता के साथ समाज को जोड़ने के लिए कार्य करता है। संघ को किसी पर कोई प्रभाव नहीं जमाना, ना ही उसे सत्ता की आवश्यकता है। समाज और देश के लिए संघ के कार्य चलता है, उन सब को पूर्ण करने वाला काम ही संघ है।

सरसंघचालक जी ने कहा कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश आक्रांताओं के खिलाफ हार हुई थी। भारत का एक लंबा कालखंड रहा, जब आक्रांता हम पर राज करते रहे और हम अपनी ही जमीन पर उनसे क्यों हार रहे हैं…इस पर विचार हुआ था। तब किसी ने सोचा था कि एक बार हार गये तो क्या हुआ…। इसी विचार से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए तब 1860 में क्रांतिकारी वासुदेव बलंवत फड़के ने एक भाव जागृत किया। उनका मानना था कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में एक मोर्चा हारा है, देश नहीं, फिर से स्वतंत्रता के लिए लड़ेंगे। इसके बाद स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रभक्तों की लंबी श्रृंखला डॉ. हेडगेवार जी से भगत सिंह, राजगुरु, नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक आगे आई और यह प्रयास लगातार जारी रहे। वासुदेव बलवंत फड़के को आज भी महाराष्ट्र में आद्य क्रांतिकारी कहा जाता है।

डॉ. मोहन भागवत जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्हें जन्मजात देशभक्त बताया। उन्होंने कहा कि बाल्यकाल से ही बालक केशव के मन में राष्ट्रभाव प्रखर था। मात्र 11 वर्ष की आयु में बालक केशव ने गुलामी के प्रतीक के रूप में बांटी गई मिठाई को कचरे में डाल दिया था, जो उनके स्वाभिमानी स्वभाव का संकेत था। उनके माता-पिता भी सेवा भाव से प्रेरित थे और प्लेग पीड़ितों की सेवा में लगे रहते थे, जिसका गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। छात्र जीवन में ही उन्होंने वंदे मातरम् आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उनकी प्रतिभा और राष्ट्रनिष्ठा को देखकर नागपुर के राष्ट्रीय विचार के नेताओं ने उन्हें चिकित्सा शिक्षा के लिए भेजा, जहां उन्होंने प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की और क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े। वे अनुशीलन समिति से भी जुड़े और स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।

सरसंघचालक जी ने बताया कि डॉ. हेडगेवार जी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौर में कई राष्ट्रभक्तों से संवाद किया और क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग किया। बालक केशव से लेकर संघ संस्थापक बनने तक का उनका सफर राष्ट्र चिंतन, प्रयोग और संगठन निर्माण से जुड़ा रहा। लंबे ऐतिहासिक पराधीनता काल के बाद डॉ. हेडगेवार जी ने यह विचार किया कि केवल राजनीतिक परिवर्तन पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज का संगठन और चरित्र निर्माण आवश्यक है। इसी सोच के तहत उन्होंने 10-11 वर्षों तक विभिन्न प्रयोग किए और एक विशिष्ट कार्यपद्धति विकसित की, जिसके आधार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई।

उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना के बाद प्रारंभिक वर्षों में किए गए प्रयोगों से जो कार्यपद्धति विकसित हुई, उसी से संगठन का स्वरूप मजबूत हुआ। उनका मानना था कि समाज को संगठित किए बिना राष्ट्र निर्माण संभव नहीं और देश का कार्य किसी एक संस्था या व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। डॉ. हेडगेवार जी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि महापुरुषों के प्रयास तात्कालिक प्रेरणा देते हैं, लेकिन स्थायी परिवर्तन समाज के आचरण और पुरुषार्थ से आता है। व्यवस्था परिवर्तन के लिए समाज परिवर्तन आवश्यक है और इसके लिए वातावरण निर्माण करने वाले चरित्रवान व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।

उन्होंने कहा कि संघ का मूल कार्य व्यक्तित्व निर्माण और समाज का संगठन है। संघ स्वयं को उद्धारक नहीं मानता, बल्कि समाज को सक्षम बनाने का कार्य करता है। उनके अनुसार, प्रत्येक गांव और बस्ती में ऐसे लोगों का निर्माण जरूरी है जो राष्ट्रीय चरित्र के उदाहरण बनें और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करें। संघ संपूर्ण समाज को जोड़ने की बात करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दू किसी संकीर्ण पहचान का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और गुणात्मक जीवन दृष्टि का प्रतीक है, जिसका मूल आधार संस्कार, आचरण और राष्ट्रहित है।

संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) बी.एस. जायसवाल ने वंदे मातरम् के उद्घोष से शुरुआत की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा को असाधारण बताया। उन्होंने कहा कि विश्व में शायद ही कोई ऐसा संगठन हो जो इतने वर्षों से निरंतर विस्तार और प्रभाव के साथ कार्य कर रहा हो। इस कार्यक्रम में उपस्थित होकर उन्हें नैतिक मूल्यों से प्रेरित वातावरण का अनुभव हुआ। जायसवाल ने संघ को एक मूल्य-आधारित संगठन बताते हुए कहा कि सेना की तरह संघ भी अनुशासन, संस्कार और राष्ट्रीयता के भाव से परिपूर्ण है। उन्होंने हिन्दू संस्कृति को भारत की पहचान बताते हुए कहा कि यदि संस्कृति समाप्त हो जाए तो केवल भूमि रह जाएगी, चरित्र नहीं। उन्होंने कहा कि संघ के माध्यम से राष्ट्र के प्रति निष्ठा और चरित्र निर्माण का कार्य निरंतर बढ़ रहा है।

संघ में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता और यही उसका मूल मंत्र है। उन्होंने महात्मा गांधी के वर्धा प्रवास का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी संघ की शाखा में समानता का भाव देखने को मिला था। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल सेना और उद्योग से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र से तय होती है, और चरित्र निर्माण संघ का मूल आधार है। राष्ट्रीय जिम्मेदारी के संदर्भ में उन्होंने विभाजन काल, भूदान आंदोलन, 1962 के युद्ध और कारगिल युद्ध के दौरान संघ स्वयंसेवकों की सेवा गतिविधियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राहत शिविर, ट्रैफिक नियंत्रण और रक्तदान जैसे कार्यों के माध्यम से संघ ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी सराहा था।

उन्होंने वीर सावरकर के कथन का उल्लेख करते हुए भारतीय सभ्यता को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता बताया। साथ ही कहा कि भारतीय सेना में धर्म नहीं, बल्कि वर्दी और तिरंगा सर्वोपरि होते हैं और सर्वधर्म समभाव की भावना ही उसकी पहचान है। जायसवाल ने विभाजनकारी सोच को त्यागने का आह्वान करते हुए कहा कि अस्पताल में रक्त की पहचान ही सबसे बड़ी होती है, इसलिए समाज में भी एकता का भाव होना चाहिए। संघ में अनुशासन और संस्कार को ही वास्तविक धर्म माना जाता है।

उन्होंने भारत को विश्वगुरु बनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया और कहा कि संघ के मूल मूल्यों पर चलकर ही राष्ट्र की विजय सुनिश्चित हो सकती है। उन्होंने “जय हिंद” के साथ अपने वक्तव्य का समापन किया।

वृत्तचित्रप्रदर्शनी और संघ की यात्रा

इस अवसर पर परिसर में संघ की 100 वर्ष की यात्रा पर आधारित एक प्रदर्शनी, अस्थाई साहित्य केंद्र, स्वदेशी उत्पाद केंद्र, पंचगव्य उत्पाद केंद्र स्थापित किया गया। संघ की प्रदर्शनी में संघ की क्रमिक विकास यात्रा के साथ इनमें संघ वृक्ष के बीज डॉ. हेडगेवार जी से वटवृक्ष बनने तक की सचित्र यात्रा दिखी। इसी के साथ स्वदेशी जागरण मंच, राष्ट्र सेविका समिति, नर सेवा नारायण सेवा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, विद्या भारती, संस्कार भारती, हिन्दू जागरण मंच, विश्व हिन्दू परिषद, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम तथा भारतीय किसान संघ की झलक देखने को मिली।

सभागार में कार्यक्रम के शुभारंभ से पहले संघ की सौ वर्ष की यात्रा, वृत्त चित्र के माध्यम से प्रस्तुत की गई। इसमें संघ के जनक की जीवनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी प्रमुख घटनाओं को दर्शाया गया। इसमें संघ के गठन से लेकर वर्तमान तक की यात्रा शामिल रही। डॉ. हेडगेवार जी का मूलमंत्र -संगठन कागजों में नहीं, लोगों के दिल में, इस वृत्त चित्र में सामने था।

The Kerala Story 2 – भले ही न्‍यायालय में चुनौती दी जाए, पर आंकड़े झूठ नहीं बोलते..!

2011 की जनगणना बताती है कि केरल में मुस्लिम आबादी 26.56 प्रतिशत थी, जबकि 1951 में यह 17.4 प्रतिशत थी। 2001 से 2011 के बीच मुस्लिम आबादी वृद्धि दर 12.8 प्रतिशत रही, जबकि राज्य की कुल जनसंख्या वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत थी। उसी अवधि में हिन्दुओं की वृद्धि दर 2.23 प्रतिशत और ईसाइयों की 1.38 प्रतिशत रही। स्पष्ट है कि वृद्धि दर में अंतर है।

जब किसी फिल्म से इतना भय पैदा हो जाए कि उसकी रिलीज से पहले न्‍यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़े तो समझ लीजिए कि मामला सच सामने आने के बाद असहजता से संबंधित है। द केरल स्टोरी 2, ठीक उसी मोड़ पर खड़ी है। 27 फरवरी, 2026 को रिलीज होने से पहले ही केरल उच्च न्यायालय ने अस्थायी रोक लगा दी। हालांकि, उच्च न्यायालय की बड़ी पीठ ने फिल्म की रिलीज को हरी झंडी दिखा दी है। फिल्म को लेकर याचिकाएं दायर हुईं आरोप लगे कि फिल्म राज्य की छवि खराब करेगी, सांप्रदायिक तनाव फैलाएगी, समाज को बांटेगी। किंतु, मूल प्रश्न कोई पूछने को तैयार नहीं कि क्या केरल विधानसभा में रखी गई रिपोर्ट भी प्रोपगैंडा हो सकती है?

फिल्म 2023 में आई द केरल स्टोरी का सीक्वल है। पहली फिल्म की तरह इसका विषय भी छल से धर्मांतरण है, लेकिन इस बार कथा केरल से आगे बढ़कर मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक जाती है। ट्रेलर में कहा गया है कि यह वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है। यह कहते ही हंगामा शुरू हो गया। कुछ फिल्मकारों और अपने आपको सेक्‍युलर कहने वालों ने इसे प्रोपगैंडा बताया। न्यायालय में फिल्‍म को चुनौती देने पहुंचे याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फिल्म केरल को सांप्रदायिक रंग में रंगती है और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाती है। तब निर्देशक ने सार्वजनिक रूप से चुनौती दी कि यदि कुछ भी गलत सिद्ध हो जाए तो वे फिल्म निर्माण छोड़ देंगे। कहना होगा कि यह आत्मविश्वास यूं ही नहीं आता है, इसके पीछे तथ्य होते हैं।

25 फरवरी, 2026 को केरल उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई और न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस की एकल पीठ ने निर्माताओं से कहा कि अंतिम निर्णय तक फिल्म के अधिकार जारी न किए जाएं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा दिए गए यू\ए प्रमाणपत्र पर भी सवाल उठाए गए। न्यायालय ने पूछा कि यदि विषय इतना संवेदनशील है तो ए प्रमाणपत्र क्यों नहीं दिया गया। लेकिन यह प्रश्‍न बड़ा है कि क्या किसी राज्य का नाम शीर्षक में आ जाना ही उसकी गरिमा पर हमला है? अगर ऐसा है तो फिर गो गोवा गॉन, वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई या दिल्ली बेली जैसी फिल्मों ने भी अपने-अपने शहरों की छवि बिगाड़ी होगी?

वस्‍तुत: इस संदर्भ में कहना होगा कि यह विवाद नया नहीं है। 2023 में आई “द केरल स्टोरी” भी कानूनी चुनौतियों से गुजरी थी। उससे पहले 2022 में “द कश्मीर फाइल्स” को लेकर भी देश भर में याचिकाएं दायर हुईं। हर बार तर्क यही था कि फिल्म से सामाजिक सद्भाव बिगड़ेगा। हर बार अदालतों ने संतुलन साधते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी महत्व दिया।

अब आइए मूल प्रश्न पर आते हैं, छल से धर्मांतरण का मुद्दा। किसी का धर्म बदलने का अर्थ यह नहीं है कि बल, प्रलोभन या धोखे से धर्म परिवर्तन किया जाए। संविधान इसकी अनुमति नहीं देता। इसी कारण उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों ने विशेष कानून बनाए हैं। यह कानून यूं ही नहीं बने, इसके पीछे शिकायतें और हजारों की संख्‍या में अब तक दर्ज मामले रहे।

राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो जबरन धर्मांतरण का अलग से समेकित आंकड़ा जारी नहीं करता। इसलिए बहस अक्सर भावनात्मक हो जाती है। लेकिन जहां राज्य कानून हैं, वहां दर्ज आंकड़े मौजूद हैं और केरल का मामला तो विधानसभा में रखी गई रिपोर्टों से भी जुड़ा है।

2011 की जनगणना बताती है कि केरल में मुस्लिम आबादी 26.56 प्रतिशत थी, जबकि 1951 में यह 17.4 प्रतिशत थी। 2001 से 2011 के बीच मुस्लिम आबादी वृद्धि दर 12.8 प्रतिशत रही, जबकि राज्य की कुल जनसंख्या वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत थी। उसी अवधि में हिन्दुओं की वृद्धि दर 2.23 प्रतिशत और ईसाइयों की 1.38 प्रतिशत रही। स्पष्ट है कि वृद्धि दर में अंतर है। इसके पीछे केवल धर्मांतरण कारण नहीं, मुसलमानों की उच्च प्रजनन दर, सामाजिक संरचना और अन्य कारक भी हैं। लेकिन धर्मांतरण को पूरी तरह नकार देना भी तथ्यों से आंख मूंदना होगा।

2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने केरल विधानसभा में बताया कि 2006 से 2012 के बीच 7713 लोगों ने इस्लाम धर्म अपनाया, जिनमें 2667 लड़कियां थीं। रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर मामले अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े थे। यह कोई फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि सरकार द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक सूचना थी। 2015 में केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल के मुखपत्र जाग्रता ने दावा किया कि 2005 से 2012 के बीच लगभग चार हजार लड़कियों का धर्मांतरण हुआ, जिनमें ज्यादातर ने इस्लाम स्वीकार किया।

स्‍वाभाविक है कि यदि किसी अवधि में हजारों लोग धर्म बदलते हैं तो समाजशास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता होती है और उसमें भी, जब विशेष वर्ग के प्रति अचानक से आकर्षण दिखे, तब संदेह पैदा होना स्‍वाभाविक है। ऐसे में केरल की इस सच्‍चाई को आज कोई भी नकार नहीं सकता है। इसलिए फि‍ल्‍म में जो दिखाया गया है, वह वास्‍तव में उन तमाम युवतियों का भोगा हुआ यथार्थ है, जिससे वे दिनरात गुजरी हैं। ये सच है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है, लेकिन वह निरर्थक भी नहीं है। यदि हर संवेदनशील विषय पर रोक लगेगी तो सिनेमा केवल मनोरंजन का खोखला माध्यम बनकर रह जाएगा। अदालतें कानून देखेंगी, सार्वजनिक व्यवस्था शालीनता और नैतिकता। लेकिन समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि क्या वह कठिन प्रश्नों का सामना करने को तैयार है।

सच यह है कि धर्मांतरण का प्रश्न बहुआयामी है; फिर भी यदि आधिकारिक आंकड़े मौजूद हैं, यदि विधानसभा में रिपोर्ट रखी गई है, यदि मीडिया ने धर्मांतरण के रुझानों पर विश्लेषण किया है तो इस विषय पर फिल्म बनाना अवैध कैसे हो सकता है? “द केरल स्टोरी 2” को न्‍यायालय में चुनौती दीजिए, जरूर दीजिए, तथ्यों की जांच कीजिए प्रमाणपत्र पर बहस कीजिए। किंतु यह मत कहिए कि विषय अस्तित्वहीन है। क्योंकि आंकड़े मौजूद हैं जनगणना के, विधानसभा के और मीडिया रिपोर्टों के।

अब यह बहस रुकेगी नहीं। और शायद यही लोकतंत्र की असली ताकत है सवाल पूछने की, असहमति जताने की और तथ्यों को परखने की स्‍वतंत्रता सभी को समान रूप से भारतीय संविधान देता है। कहना होगा कि सच आंकड़ों में दर्ज रहता है, दस्तावेजों में सुरक्षित रहता है और समय-समय पर सामने आ जाता है। इसलिए आज प्रश्न यह नहीं कि फिल्म पर रोक लगी या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या हम उन तथ्यों से सामना करने को तैयार हैं, जिन्हें हम देखना नहीं चाहते। क्योंकि इतिहास गवाह है फिल्में रोकी जा सकती हैं, लेकिन आंकड़ों को आज कोई नहीं नकार सकता, जो देश भर में चिल्‍ला- चिल्‍ला कर कह रहे हैं कि लव जिहाद के निशाने पर हिन्‍दू एवं अन्‍य गैर मुस्‍लिम लड़किया हैं! इस्‍लामिक कन्‍वर्जन का खेल पूरी तरह से योजनाबद्ध तरीके से संचालित किया जा रहा है, जिस पर कि हर हाल में रोक लगना ही चाहिए।

सिख गुरुओं की सीख और बलिदान हम सभी को देती है प्रेरणा – मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय

मुख्यमंत्री श्री साय ने होला मोहल्ला के लिए संगत बसों को हरी झंडी दिखाकर किया रवाना

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज शाम राजधानी रायपुर स्थित रेलवे स्टेशन गुरुद्वारा पहुंचे, जहां उन्होंने मत्था टेककर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए अरदास की। इस अवसर पर उन्होंने सिख संगत द्वारा आयोजित होला मोहल्ला यात्रा के लिए निःशुल्क बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

सिख संगत द्वारा आयोजित इस यात्रा में लगभग 1200 श्रद्धालु 17 बसों, 2 ट्रकों एवं अन्य वाहनों के साथ श्री हजूर साहिब नांदेड़ (महाराष्ट्र) तथा गुरुद्वारा नानक झीरा साहिब, बीदर (कर्नाटक) के लिए रवाना हुए। यह यात्रा सिख समाज की आस्था, परंपरा और सामूहिक श्रद्धा का प्रतीक है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने संगत को मंगलमय यात्रा की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि सिख गुरुओं का त्याग, बलिदान और मानवता की सेवा का संदेश पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़े पवित्र स्थलों पर आयोजित होला मोहल्ला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि साहस, सेवा और राष्ट्रभक्ति की अद्भुत परंपरा का प्रतीक है। सिख गुरुओं द्वारा स्थापित शौर्य और समर्पण की विरासत सदैव देशवासियों को प्रेरित करती रहेगी।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि सिख संगत द्वारा लगातार 25वें वर्ष इस भव्य आयोजन का संचालन किया जा रहा है। उन्होंने इस उत्कृष्ट आयोजन के लिए सिख समाज को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।

इस अवसर पर रायपुर सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल, अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष श्री अमरजीत सिंह छाबड़ा, गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र सिंह छाबड़ा सहित सिख समाज के प्रतिनिधिगण बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

मंत्रिमंडल ने ‘केरल’ राज्य के नाम को बदलकर “केरलम” करने को मंजूरी दी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज ‘केरल’ राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद, राष्ट्रपति द्वारा केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 को केरल राज्य विधानसभा को संविधान के अनुच्छेद 3 के प्रावधान के तहत विचार-विमर्श हेतु भेजा जाएगा। केरल राज्य विधानसभा की राय प्राप्त होने के बाद, भारत सरकार आगे की कार्रवाई करेगी और संसद में केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने हेतु केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 को लागू करने के लिए राष्ट्रपति की अनुशंसा प्राप्त की जाएगी।

केरल विधानसभा ने 24.06.2024 को एक प्रस्ताव पारित कर राज्य का नाम बदलकर “केरलम” करने का निर्णय लिया, जो इस प्रकार है:

मलयालम भाषा में हमारे राज्य का नाम केरलम‘ है। नवंबर, 1956 को भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ था। केरल पिरवी दिवस भी नवंबर को ही मनाया जाता है। राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही मलयालम भाषी लोगों के लिए संयुक्त केरल के गठन की प्रबल मांग रही है। लेकिन संविधान की पहली अनुसूची में हमारे राज्य का नाम केरल‘ ही दर्ज है। यह विधानसभा सर्वसम्मति से केंद्र सरकार से संविधान के अनुच्छेद के अनुसार तत्काल कदम उठाकर राज्य का नाम बदलकर केरलम‘ करने की अपील करती है।”

इसके बाद, केरल सरकार ने भारत सरकार से संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार ‘केरल’ राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के लिए संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन करने हेतु आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया है।

संविधान के अनुच्छेद 3 में मौजूदा राज्यों के नाम परिवर्तन का प्रावधान है। अनुच्छेद 3 के अनुसार, संसद विधि द्वारा किसी भी राज्य का नाम बदल सकती है। अनुच्छेद 3 में आगे प्रावधान है कि इस उद्देश्य से कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना प्रस्तुत नहीं किया जाएगा, और यदि विधेयक में निहित प्रस्ताव किसी राज्य के क्षेत्रफल, सीमाओं या नाम को प्रभावित करता है, तो राष्ट्रपति द्वारा विधेयक को उस राज्य के विधानमंडल को निर्दिष्ट अवधि के भीतर या राष्ट्रपति द्वारा अनुमत अतिरिक्त अवधि के भीतर उस पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए संदर्भित किया जाना चाहिए और इस प्रकार निर्दिष्ट या अनुमत अवधि समाप्त हो जानी चाहिए।

भारत सरकार के गृह मंत्रालय में केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के विषय पर विचार किया गया और केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह की स्वीकृति से, केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के लिए मंत्रिमंडल के समक्ष मसौदा ज्ञापन को विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधि मामलों और विधायी विभाग को उनकी टिप्पणियों के लिए भेजा गया। विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधि और विधायी विभाग ने केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव से सहमति व्यक्त की है।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय से आज विधानसभा परिसर स्थित उनके कक्ष में वित्त मंत्री श्री ओपी चौधरी ने वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट प्रस्तुत करने से पूर्व मुलाकात की

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय से आज विधानसभा परिसर स्थित उनके कक्ष में वित्त मंत्री श्री ओपी चौधरी ने वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट प्रस्तुत करने से पूर्व मुलाकात की।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री साय ने वित्त मंत्री को आगामी बजट के लिए शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह बजट प्रदेशवासियों की आकांक्षाओं को पूरा करने वाला तथा छत्तीसगढ़ के समग्र विकास को नई दिशा देने वाला सिद्ध होगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सरकार की जनकल्याणकारी प्राथमिकताओं, सुशासन और समावेशी विकास के संकल्प को यह बजट और अधिक सशक्त आधार प्रदान करेगा।

इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा, उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव सहित मंत्रिपरिषद के सभी मंत्रीगण तथा वित्त सचिव श्री मुकेश बंसल उपस्थित थे।

 राज्य सरकार जल संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने के लिए प्रतिबद्ध – मुख्यमंत्री श्री साय

जल संरक्षण को दिनचर्या का हिस्सा बनाने, जल संरचनाओं की रक्षा और जल के प्रति जिम्मेदार सोच अपनाने का मुख्यमंत्री ने किया आह्वान

मुख्यमंत्री श्री साय और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटिल की संयुक्त अध्यक्षता में “जल संचय-जन भागीदारी 2.0” अभियान के क्रियान्वयन की हुई गहन समीक्षा

केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री ने छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण के क्षेत्र में हो रहे कार्यों और नवाचारों की सराहना की

31 मई तक 10 लाख जल संरचनाओं का लक्ष्य, जल सुरक्षा को मिलेगा नया आधार

डबरी निर्माण से बढ़ेगा भू-जल स्तर, किसानों को मिलेगा अतिरिक्त लाभ

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटिल की संयुक्त अध्यक्षता में आज नवा रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में आयोजित बैठक में प्रदेश में “जल संचय-जन भागीदारी 2.0” अभियान के क्रियान्वयन की गहन समीक्षा की गई। केंद्रीय मंत्री श्री पाटिल इस बैठक में वर्चुअली शामिल हुए और बैठक को संबोधित किया। इस दौरान बिलासपुर, दुर्ग और सूरजपुर जिले के कलेक्टरों ने अपने-अपने जिलों में अभियान के अंतर्गत संचालित कार्यों और गतिविधियों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि जल संकट 21वीं सदी की केवल गंभीर पर्यावरणीय ही नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और विकासात्मक चुनौती भी बन चुका है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण को स्थायी और प्रभावी बनाने के लिए जनभागीदारी अनिवार्य है।उन्होंने देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के उस संदेश का उल्लेख किया, जिसमें पानी के उपयोग को प्रसाद के समान मानते हुए जल के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन से प्रेरित होकर राज्य सरकार जल संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने के लिए प्रतिबद्ध है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि अभियान के पहले चरण में छत्तीसगढ़ ने देशभर में द्वितीय स्थान प्राप्त किया तथा विभिन्न जिलों को भी अलग-अलग श्रेणियों में पुरस्कार मिले। पहले चरण में सामुदायिक भागीदारी के मॉडल पर कार्य करते हुए बड़े पैमाने पर बोरवेल रिचार्ज, रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, रिचार्ज शाफ्ट, सोक पिट और ओपनवेल रिचार्ज जैसी संरचनाओं का निर्माण किया गया। श्री साय ने कहा कि प्रदेश में वर्तमान में 5 क्रिटिकल और 21 सेमी-क्रिटिकल भू-जल ब्लॉक चिन्हित हैं। वर्ष 2024 की तुलना में 2025 में इनमें से 5 ब्लॉकों में भू-जल निकासी में कमी और भू-जल स्तर में सुधार दर्ज किया गया है, जो जल संरक्षण प्रयासों के सकारात्मक परिणामों का संकेत है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि अभियान के दूसरे चरण “जल संचय-जन भागीदारी 2.0” के अंतर्गत तकनीक आधारित और अधिक परिणाममूलक रणनीति अपनाई जा रही है। राज्य सरकार ने 31 मई 2026 तक 10 लाख जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया है। मुख्यमंत्री ने इसे जल सुरक्षा की दिशा में प्रदेश का ऐतिहासिक कदम बताया। उन्होंने कहा कि राज्य के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर एक विशेष पहल के तहत 10 एकड़ से अधिक भूमि वाले चार लाख से अधिक किसानों को अपने खेतों में डबरी निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस कार्य में जिला प्रशासन के साथ-साथ औद्योगिक समूहों का सहयोग भी लिया जा रहा है। इन डबरियों से भू-जल स्तर में वृद्धि के साथ किसानों को सिंचाई एवं मछली पालन जैसी अतिरिक्त सुविधाएँ मिलेंगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि दूसरे चरण में सभी जल संरचनाओं की जियोटैगिंग, ग्राम पंचायतों के वॉटर बजट तथा जल सुरक्षा योजनाओं के निर्माण पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। साथ ही गांवों के युवाओं को “जल मित्र” के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा, ताकि अभियान को गति मिल सके। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि क्रिटिकल और सेमी-क्रिटिकल ब्लॉकों पर विशेष फोकस रखते हुए सेमी-क्रिटिकल ब्लॉकों में 40 प्रतिशत तथा क्रिटिकल ब्लॉकों में 65 प्रतिशत जल संरक्षण कार्यों का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उन्होंने प्रदेशवासियों से जल संरक्षण को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने, जल संरचनाओं की रक्षा करने और जल के प्रति जिम्मेदार सोच अपनाने का आह्वान भी किया।

केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटिल ने छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण के क्षेत्र में हो रहे कार्यों और नवाचारों की सराहना की। उन्होंने कहा कि गत वर्ष जल संरक्षण के प्रयासों में छत्तीसगढ़ देशभर में दूसरे स्थान पर रहा, जो राज्य के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2024 को सूरत से ‘जल संचय जन भागीदारी अभियान’ की शुरुआत की थी और ‘कर्मभूमि से मातृभूमि के लिए जल संचयन में सहयोग’ का आह्वान किया था। इस अभियान का उद्देश्य जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप देना है।

केंद्रीय मंत्री श्री पाटिल ने प्रदेश के समस्त कलेक्टरों से मनरेगा के तहत जल संचय कार्यों के लिए प्राप्त राशि का पूर्ण और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने को कहा। उन्होंने राजनांदगांव प्रवास के दौरान एक महिला सरपंच द्वारा स्वयं के प्रयासों से जल संचयन के लिए किए गए उल्लेखनीय कार्यों की प्रशंसा की। इसके साथ ही उन्होंने जल संचय में व्यापक जनभागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया।

बैठक में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री सुबोध कुमार सिंह, जल संसाधन विभाग के सचिव श्री राजेश सुकुमार टोप्पो तथा जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव श्री कांताराव और छत्तीसगढ़ के समस्त कलेक्टर वर्चुअली उपस्थित थे।

भारत के ज़िम्मेदार एआई विज़न को मज़बूत ग्लोबल समर्थन के साथ इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 भारत मंडपम में सम्पन्न

अवसंरचना का वादा $250 अरब के पार;  $20 अरब की डीप-टेक प्रतिबद्धता भारत के एआई इकोसिस्टम में दुनिया के भरोसे को दिखाती हैं

118 देशों के 20 से ज़्यादा सरकार के प्रमुखों और प्रतिनिधियों ने ऐतिहासिक एआई आयोजन में हिस्सा लिया

5 लाख से ज़्यादा प्रतिभागियों और 550 प्री-समिट आयोजनों ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट को दुनिया की सबसे बड़े एआई सम्मेलनों में से एक बनाया

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 आज भारत मंडपम, नई दिल्ली में सम्पन्न हो गया। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को संबोधित किया और पांच दिन के ग्लोबल आयोजन के पैमाने, नतीजों और खास घोषणाओं को संक्षेप में बताया।  संवाददाता सम्मेलन में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव श्री एस. कृष्णन, भारत के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता श्री रणधीर जायसवाल और भारत सरकार के प्रधान प्रवक्ता और पत्र सूचना कार्यालय के प्रधान महानिदेशक श्री धीरेंद्र ओझा भी शामिल हुए।

सम्मेलन में अभूतपूर्व भागीदारी देखी गई जिससे ग्लोबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बातचीत को आकार देने में भारत के बढ़ते नेतृत्व की फिर से पुष्टि हुई। उद्घाटन में 118 देशों के सरकारी प्रतिनिधियों के साथ-साथ 20 से ज़्यादा सरकार के प्रमुख और 59 मंत्री स्तर के प्रतिनिधि शामिल हुए। समिट में 100+ ग्लोबल एआई लीडर, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सीएक्सओ, और दुनिया भर के 500 से ज़्यादा बड़े एआई विशेषज्ञ भी शामिल हुए।

भारत के एआई ट्रैजेक्टरी में दुनिया भर की ज़बरदस्त दिलचस्पी को दिखाते हुए, समिट में 5 लाख से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया।  इस आयोजन के लिए वैश्विक स्तर पर रुचि बन रही थी, शिखर सम्मेलन से पहले 30 देशों में 550 सम्मेलन और कार्यक्रम आयोजित किए गए। मुख्य शिखर सम्मेलन के दिनों में 500 से अधिक साइड इवेंट आयोजित की गई। इससे यह अब तक के सबसे व्यापक बहु-हितधारक एआई कार्यक्रमों में से एक बन गया।

इस अवसर पर संबोधन में मजबूत वैश्विक भागीदारी, भारत के जिम्मेदार एआई दृष्टिकोण के व्यापक समर्थन और देश की तकनीकी क्षमताओं में बढ़ते विश्वास की जानकारी देते हुए, श्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “संख्या महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वास्तव में महत्वपूर्ण यह है कि दुनिया को नए एआई युग में भारत की भूमिका पर भरोसा है। भागीदारी की गुणवत्ता, संवाद की गहराई और जिम्मेदार और संप्रभु एआई के प्रति हमारे दृष्टिकोण का वैश्विक समर्थन यह दर्शाता है कि भारत सिर्फ इस परिवर्तन में भाग नहीं ले रहा है, हम इसे आकार देने में मदद कर रहे हैं।”

मंत्री ने एआई समिट को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भारत के  वैश्विक नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण पल बताया। उन्होंने दुनिया के बड़े एआई प्लेयर्स की भागीदारी, मंत्रियों की मज़बूत भागीदारी और युवाओं की अभूतपूर्व भागीदारी पर ज़ोर दिया।  इसमें 2.5 लाख से ज़्यादा विद्यार्थियों ने ज़िम्मेदार और नैतिक एआई पर चर्चा में हिस्सा लिया, जिसका परिणाम  गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के रूप में सामने आया।

श्री वैष्णव ने कहा कि अवसंरचना से जुड़े निवेश के वादे $250 अरब को पार कर गए हैं, साथ ही लगभग $20 अरब की डीप-टेक वेंचर प्रतिबद्धता भी हैं। यह भारत के एआई इंफ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम में बढ़ते वैश्विक भरोसे को दिखाता है। उन्होंने भारत की सॉवरेन एआई मॉडल स्ट्रैटेजी के मज़बूत अंतरराष्ट्रीय समर्थन पर भी ज़ोर दिया और कम नवाचार से बनाए गए देसी मॉडल्स की गुणवत्ता की तारीफ़ की।

उन्होंने इन घटनाक्रमों को देश को 2047 तक “विकसित भारत” बनाने के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के बड़े विज़न के रूप में वर्णित किया। श्री वैष्णव ने समिट को भारत में दीर्घावधि प्रौद्योगिकीय और सेमीकंडक्टर क्षमता बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। 

OpenAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की

OpenAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) श्री सैम ऑल्टमैन ने आज प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की।

बैठक के बाद, प्रधानमंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत एआई में बहुत तरक्की कर रहा है और प्रतिभा एवं  नवाचार के लिए ग्लोबल हब बनने की ओर अग्रसर है।

प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत के प्रतिभावान युवाओं में निवेश करने और इस बदलाव लाने वाले क्षेत्र में जोश भरने का निमंत्रण दिया।

X पर सैम ऑल्टमैन की पोस्ट के जवाब में श्री मोदी ने कहा:

“यह सच में बहुत अच्छी बैठक थी। भारत एआई की दुनिया में बहुत तरक्की कर रहा है। हम दुनिया को अपने प्रतिभावान युवाओं में निवेश करने और इस क्षेत्र में जोश भरने के लिए निमंत्रण देते हैं।

धन-धान्य से पुष्पित-पल्लवित धरा को सुंदर, समृद्ध, सुरक्षित और विकसित बनाने के लिए संकल्पित होकर काम कर रही हमारी सरकार : मुख्यमंत्री श्री साय

सिक्किम के पत्रकारों को भाया छत्तीसगढ़, कहा – छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विविधता और लोगों का आत्मीय व्यवहार अत्यंत प्रभावित करने वाला

“छत्तीसगढ़ ने भारतीय होने का गर्व कराया” – पत्रकार सुश्री अर्चना प्रधान

सिक्किम से अध्ययन भ्रमण पर आए पत्रकारों ने मुख्यमंत्री से की मुलाकात

छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर प्रदेश है और धन-धान्य से पुष्पित-पल्लवित इस धरा को हमारी सरकार सुंदर, समृद्ध, सुरक्षित और विकसित बनाने के लिए संकल्पित होकर काम कर रही है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने आज अपने निवास कार्यालय में सिक्किम राज्य से अध्ययन भ्रमण पर पहुंचे पत्रकारों के दल से मुलाकात कर आत्मीय संवाद किया और उनसे छत्तीसगढ़ को लेकर ढेर सारी बातें साझा की। उन्होंने सभी अतिथियों को राजकीय गमछा भेंट कर छत्तीसगढ़ में स्वागत और अभिवादन किया। मुख्यमंत्री की सहृदयता और आतिथ्य पाकर  सभी पत्रकार अभिभूत हुए और उन्हें सिक्किम आने का निमंत्रण भी दिया। 

             मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ 44 प्रतिशत वन क्षेत्र से आच्छादित है तथा यहां 31 प्रतिशत आदिवासी समुदाय निवासरत है। वनोपज संग्रहण और मूल्य संवर्धन के माध्यम से जनजातीय समुदाय आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। जशपुर जिले में स्व-सहायता समूह की महिलाएं ‘जशप्योर’ ब्रांड के अंतर्गत उत्पाद तैयार कर आय अर्जित कर रही हैं। उन्होंने बताया कि तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए सरकार द्वारा 5,500 रुपये प्रति मानक बोरा की दर से भुगतान किया जा रहा है तथा चरण पादुका योजना के तहत निःशुल्क चप्पल प्रदान की जा रही है।

                मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह की चिंता को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2005 में इस योजना की शुरुआत की गई थी। हाल ही छह हजार से अधिक जोड़े इस योजना के अंतर्गत विवाह बंधन में बंधे, जिसे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी स्थान प्राप्त हुआ है। उन्होंने बताया कि योजना के तहत नवदंपतियों को 35 हजार रुपये की आर्थिक सहायता एवं 15 हजार रुपये का सामग्री सहयोग प्रदान किया जाता है।

                   नक्सलवाद के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार के सफल नेतृत्व और दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते प्रदेश में नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में है। राज्य सरकार की आकर्षक पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को 50 हजार रुपये की सहायता तथा तीन वर्षों तक प्रति माह 10 हजार रुपये दिए जा रहे हैं। अब तक 2,500 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। कौशल प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें रोजगार से जोड़ने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। श्री साय ने बताया कि जगदलपुर में आत्मसमर्पित नक्सलियों द्वारा ‘बस्तर पंडुम’ कैफे का सफल संचालन इसका सशक्त उदाहरण है।

          मुख्यमंत्री ने आगे बताया कि ‘नियद नेल्ला नार’ योजना के अंतर्गत 17 शासकीय योजनाओं को दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाया गया है, जिससे सड़क, बिजली, पानी, राशन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं की पहुंच सुदृढ़ हुई है। उन्होंने कहा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र अब विकास की मुख्यधारा से तेजी से जुड़ रहे हैं। पर्यटन की संभावनाओं पर मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। चित्रकोट जलप्रपात, कुटुम्बसर गुफाएं, अबूझमाड़ के वन और धुड़मारास जैसे स्थल प्रदेश की पहचान हैं। ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु होम स्टे को उद्योग का दर्जा दिया गया है, जिसके तहत ग्रामीणों को पांच कमरों तक निर्माण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य एवं औद्योगिक विकास के संदर्भ में जानकारी देते हुए बताया कि नवा रायपुर में 100 एकड़ क्षेत्र में मेडिसिटी का निर्माण किया जा रहा है, जहां निम्न आय वर्ग के लिए सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध होंगी। उन्होंने प्रदेश की आकर्षक नवीन औद्योगिक नीति का ज़िक्र करते हुए कहा कि इसके तहत राज्य को लगभग 8 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। साथ ही चित्रोत्पला फिल्म सिटी की स्थापना से प्रदेश में फिल्म उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। 

“छत्तीसगढ़ ने भारतीय होने का गर्व कराया” – सुश्री अर्चना प्रधान

सिक्किम की पत्रकार सुश्री अर्चना प्रधान ने कहा कि छत्तीसगढ़ में ‘मेक इन इंडिया’ का प्रभावी स्वरूप देखने को मिला। भिलाई स्टील प्लांट में रेल पटरियों सहित विभिन्न इस्पात उत्पादों का निर्माण प्रदेश के औद्योगिक सामर्थ्य को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इकाइयों को हमें करीब से देखने का मौका मिला और हम जान पाए है कि इस प्रदेश का देश के विकास में कितना महत्वपूर्ण योगदान है। 

सिक्किम के पत्रकारों को भाया छत्तीसगढ़

              मुख्यमंत्री से भ्रमण उपरांत मिलने पहुंचे पत्रकारों ने  कहा कि छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विविधता और लोगों का आत्मीय व्यवहार अत्यंत प्रभावित करने वाला है। उन्होंने भ्रमण के दौरान प्राप्त अनुभवों को साझा करते हुए स्थानीय खान-पान और सांस्कृतिक विरासत की सराहना की। सिक्किम से आए पत्रकारों ने अपने पांच दिवसीय भ्रमण के दौरान भिलाई स्टील प्लांट, गेवरा ओपन माइंस, नवा रायपुर तथा जनजातीय संग्रहालय का अवलोकन किया। पत्रकारों ने बताया कि छत्तीसगढ़ भ्रमण की सुंदर स्मृतियों को अपने साथ लेकर जा रहे हैं, जो उन्हें आजीवन याद रहेगा। उन्होंने मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना, किसानों के हित में की गई घोषणाओं, स्वच्छ वातावरण तथा पुनर्वास नीति की सराहना की।

मुख्यमंत्री को भेंट किया सिक्किम का स्मृति चिन्ह ‘थांका’

पत्रकारों के दल ने मुख्यमंत्री को सिक्किम की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक ‘थांका’ पेंटिंग भेंट की। मुख्यमंत्री ने इस उपहार के लिए आभार व्यक्त करते हुए इसे स्नेह और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रतीक बताया।

        पत्रकारों ने बताया कि सिक्किम का थांका पेंटिंग एक पवित्र स्मृति चिन्ह है, जो सूती या रेशमी कपड़े पर बौद्ध देवताओं, मंडलों और बुद्ध के जीवन दृश्यों को दर्शाता है। यह हस्तनिर्मित कला सिक्किम की धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, जिसे अक्सर घर की सजावट और सकारात्मक ऊर्जा के लिए लाया जाता है। इन्हें रोल करके आसानी से ले जाया जा सकता है, जो यात्रियों के लिए एक बेहतरीन सोवेनियर है। यह पारंपरिक कलाकृति सिक्किम के निवासियों के लिए धार्मिक विश्वास और आस्था का प्रतीक है। 

           इस अवसर पर मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार श्री पंकज झा, मुख्यमंत्री के सलाहकार श्री आर. कृष्णा दास, मुख्यमंत्री के प्रेस अधिकारी श्री आलोक सिंह, पीआईबी गंगटोक के सहायक निदेशक श्री मानस प्रतिम शर्मा, पीआईबी रायपुर के सहायक निदेशक श्री सुदीप्तो कर, श्री पुरुषोत्तम झा और श्री सरद बसनेत,पत्रकार श्री बेनु प्रकाश तिवारी, श्री विकास क्षेत्री, श्री होमनाथ दाबरी, श्री ईश्वर, सुश्री अर्चना प्रधान, सुश्री अनुशीला शर्मा, श्री प्रकाश अधिकारी, श्री ललित दहल, श्री विनोद तमंग, श्री मोहन कुमार कार्की, श्री नार बहादुर क्षेत्री उपस्थित थे।

श्री गुरुजी का आर्थिक चिंतन : पश्चिमी राष्ट्रों का लक्ष्य केवल भौतिक सुख

मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है? अथवा मनुष्य अपने सामने जीवन का लक्ष्य कौन सा रखे? इस बारे में लगभग सभी लोगों का मत है कि सुख ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। परंतु, प्रश्न यह है कि सुख से आशय क्या है और मनुष्य को यह सुख कैसे मिल सकता है?

इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी के अनुसार पश्चिमी चिन्तन और हिन्दू दर्शन पर आधारित भारतीय चिन्तन में मूलभूत अन्तर है। इस अन्तर को स्पष्ट करते हुए श्री गुरुजी ने अनेक प्रकार से समझाया है कि सुख के बारे में पश्चिमी विचार अधूरा, एकांगी, अस्थायी एवं क्षणभंगुर है, वस्तुतः तो वह सुख का क्षणिक आभास देते हुए अन्ततः दुखकारी ही है। इसके विपरीत सुख की हिन्दू परिकल्पना समग्र, संतुलित एवं अधिक स्थायी है।

पश्चिमी राष्ट्रों का लक्ष्य – केवल भौतिक सुख

पश्चिमी राष्ट्रों ने सुख की परिकल्पना केवल भौतिक एवं ऐहिक सुख के रूप में ही की है। इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी ने कहा है – ‘‘दुनिया भर की राज्य व्यवस्था एवं राष्ट्र व्यवस्था में मनुष्य मात्र के जीवन का लक्ष्य ऐहिक सुख समृद्धि माना हुआ है। अर्थात् खाना-पीना, वस्त्र प्रावरण, निवास के स्थान, सुखोपभोग, वासना की वृद्धि, वासना संतुष्ट करने के साधनों की वृद्धि, उन साधनों की उपलब्धि, भिन्न-भिन्न मनोविनोद के साधन, यही जगत के सब देशों में सर्वसाधारण लक्ष्य रखा गया है, ऐसा दिखता है। जिसका बड़ा प्रगतिमान वर्णन किया जाता है, वहाँ सामान्य आदमी के यहाँ भी टेलीविजन, रेडियो, मोटर, मोटर साइकिल आदि ऐहिक सुख के लक्षण ही प्रगति के मापदण्ड माने जाते हैं। पर ये वास्तव में मानव की प्रगति के मापदण्ड हैं क्या?’’

भौतिक सुख की यह अवधारणा अधूरी है और यह अंततोगत्वा असंतोष, अशान्ति एवं संघर्ष का ही कारण बनती है, इस बात पर श्री गुरुजी कहते हैं कि मनुष्य मात्र को सुख की प्राप्ति करवा देने का ध्येय सामने रखकर चलने का दावा करने वाली बहुत सी जीवन रचनाएं आज संसार में विद्यमान हैं। भौतिक कामनाओं की पूर्ति में ही सुख है, इसी बात को लेकर अनेक आधुनिक विचार प्रणालियाँ उत्पन्न हुई हैं। परन्तु कुछ काल के लिए होने वाली वासनापूर्ति आगे चलकर मनुष्य को अशान्त करती हुई दिखाई देती है।

श्री गुरुजी के अनुसार इसके कई कारण है – (1) एक तो विषय वासनाओं की पूर्ति सर्वथा असम्भव है। उनको तुष्ट करने की जितनी ही चेष्टा की जाती है, उतनी ही वे बढ़ती हैं। ‘‘अनुभव यह बताता है कि मनुष्य दैहिक आनन्द प्राप्त करने का जितना अधिक प्रयास करता है, उसकी भूख उतनी ही तीव्र होती जाती है। उसे कभी संतुष्टि का अनुभव नहीं होता। इच्छाओं के तुष्टिकरण की चेष्टा जितनी अधिक होगी, उतना ही असंतोष बढे़गा। भौतिक सुख साधनों का संग्रह करने की इच्छा जितनी ही प्रबल होगी, निराशा भी उतनी अधिक होगी। हमारे शास्त्रों ने घोषणा की है – ‘न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति’ (महा0 आदिपर्व)। विषय भोगों से कामनाओं का शमन नहीं होता। शरीर के जीर्णशीर्ण हो जाने पर भी इच्छाएं पूर्ववत् युवा बनी रहती हैं। भर्तृहरि ने भी कहा है – ‘तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः’ (वैराग्य शतक) – यही वास्तविक दुर्दशा है, जिसमें आधुनिक मानव स्वयं को फँसा हुआ पाता है। इस प्रकार वासनापूर्ति असम्भव होने के कारण मानव जीवन दुःखी होता हुआ दिखाई देता है।

(2) भौतिक पदार्थों से अपनी वासनापूर्ति में लगे मनुष्य को प्रारम्भ में भले ही कुछ संतुष्टि मिले पर, ‘‘आगे चलकर वह समझ जाता है कि इन आपाततः सुख देने वाली वस्तुओं में वास्तविक सुख देने की कोई शक्ति नहीं है। सुख तो अपने ही अन्दर समय-समय पर उठने वाली वासना-तंरगों की शांति से होता है। यानि सुख बाह्य वस्तु में नहीं, वासना पूर्ति में भी नहीं; किन्तु वासना के शांत होने में है।’’

(3) श्री गुरुजी का मानना था कि ‘‘व्यक्ति व समाज के लिए वासनाओं का उत्तरोत्तर बढ़ते जाना और उस पर सदा असंतोष का बना ही रहना, यही जगत में बार-बार होने वाले भयंकर युद्धों का प्रमुख कारण है। जगत में अशांति तथा असुख बनाएं रखने में, यही प्रबल कारण है।’’

श्री गुरुजी ने इसी बात को विस्तार से समझाया है, कहा है कि – ‘‘पश्चिम के सुख की अवधारणा पूर्णतया प्रकृतिजन्य इच्छाओं की संतुष्टि पर ही केन्द्रित है, अतः उनके ‘जीवन स्तर को उठाने’ का अर्थ भी केवल भौतिक आनन्द की वस्तुओं को अधिकाधिक जुटाना है। इससे व्यक्ति अन्य विचारों एवं एषणाओं को छोड़कर केवल इसी में पूर्णतया संलग्न हो जाता है। भौतिक सुख-साधनों की प्राप्ति की इच्छा धन-संग्रह को जन्म देती है। अधिकाधिक धन प्राप्ति हेतु शक्ति आवश्यक हो जाती है; किन्तु भौतिक सुख की अतृप्त क्षुधा व्यक्ति को अपनी राष्ट्रीय सीमाओं तक ही नहीं रुकने देती। सबल राष्ट्र राज्य शक्ति के आधार पर दूसरों के दमन व शोषण का भी प्रयास करते हैं। इसमें से संघर्ष व विनाश का जन्म होता है। एक बार यह प्रक्रिया प्रारम्भ हुई कि समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। सभी नैतिक बंधन विच्छिन्न हो जाते हैं। सामान्य मानवीय संवेदनाएं सूख जाती हैं। मनुष्य और पशु में अन्तर स्थापित करने वाले मूल्य एवं गुण समाप्त हो जाते हैं।’’

1992 का बारा नरसंहार – नक्सली आतंक की वह काली खौफनाक रात

नक्सली-माओवादियों का हिंसक चेहरा सबके समक्ष है। इसी हिंसात्मक प्रवृत्ति का एक उदाहरण मात्र है, सन् 1992 का बारा नरसंहार।

12 फरवरी, 1992 की रात गया जिले के बारा गांव (बिहार) में हिंसक कहर ने सारे देश को झकझोर दिया था। माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी के आतंकियों ने अचानक हमला कर 34 निर्दोष ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर दी थी। नक्सली हिंसा के इस क्रूर चेहरे को भुला पाना आसान नहीं है।

टेकरी प्रखंड का बारा गांव गया शहर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है। गांव में करीब 50 घर थे, लगभग 40 परिवार भूमिहार समाज के थे। इनके अलावा छह ब्राह्मण, एक बढ़ई, एक तेली और दो अनुसूचित जाति के परिवार थे। अधिकांश परिवारों के पास तीन से चार बीघा तक जमीन थी। गांव का कुल रकबा लगभग 300 बीघा था। आसपास के खुलुनी, देहुरा और नेन बिगहा जैसे गांवों में अनुसूचित जाति समुदाय की आबादी रहती थी।

12 फरवरी की रात करीब साढ़े नौ बजे गांव में अचानक बम धमाकों की आवाज गूंजी। 500 हमलावरों की भीड़ ने गांव को चारों ओर से घेर लिया था। हमलावरों ने घरों में आग लगाई और “एमसीसी जिंदाबाद” के नारे लगाए। उन्होंने सवर्ण लिबरेशन फ्रंट के कमांडर रामाधार सिंह उर्फ डायमंड और उनके सहयोगी हरद्वार सिंह के बारे में पूछताछ शुरू की।

कुछ हमलावर जबरन घरों में घुसे। उन्होंने तलाशी का बहाना बनाया, लेकिन जल्द ही उनका असली चेहरा सामने आ गया। उन्होंने गांव के पुरुषों को घरों से बाहर निकाला, उनके हाथ बांध दिए और महिलाओं व बच्चों को अलग कर दिया। करीब 100 पुरुषों को पास की नहर के किनारे ले जाया गया। वहां उनके पैरों को भी बांध दिया गया।

इसके बाद हमलावरों ने पूछा कि कौन भूमिहार नहीं है। एक व्यक्ति ने खुद को अलग बताया और छूट गया। एक अन्य व्यक्ति ने खुद को एमसीसी समर्थक बताया, लेकिन हमलावरों ने उसे भी नहीं बख्शा।

हमलावरों ने महिलाओं और बच्चों को वहां से हटने को कहा। और उसके बाद नहर किनारे चीखें गूंज उठीं। हमलावरों ने बंधकों के गले तेज हथियारों से काट दिए। जो लोग भागने की कोशिश करते, उन्हें गोली मार दी। पोस्टमार्टम में 34 लोगों की मौत की पुष्टि हुई। चार लोगों को गोली लगी थी, जबकि बाकी को धारदार हथियार से मारा गया था। यहां तक कि जिन लोगों को गोली लगी थी, उनके भी गले काटे गए थे। इस क्रूरता ने पूरे इलाके को सन्न कर दिया।

उस दौर में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में सक्रिय था। ये संगठन खुद को गरीबों का हितैषी बताता था, लेकिन अपने विरोधियों को खत्म करने के लिए हिंसा को हथियार बनाया। लंबे समय तक हिंसा के रास्ते पर चलता रहा। बारा नरसंहार भी उसी रणनीति का हिस्सा था।

वर्ष 2004 में एमसीसी ने पीपुल्स वार ग्रुप के साथ मिलकर भाकपा माओवादी का गठन किया। केंद्र सरकार ने भाकपा माओवादी और उससे जुड़े संगठनों को आतंकी घोषित किया था।

बारा नरसंहार ने स्पष्ट कर दिया कि नक्सली विचारधारा डर और खून-खराबे पर टिकी है। विचारधारा के नाम पर निर्दोष लोगों को निशाना बनाया। उन्होंने न्याय का नारा लगाया, लेकिन मानवता को रौंद दिया। उन्होंने सामाजिक संघर्ष का दावा किया, लेकिन सिर्फ और सिर्फ आतंक फैलाया।

बारा की वह काली रात आज भी याद दिलाती है कि जब विचारधारा पर हिंसा हावी हो जाती है, तब सबसे पहले इंसानियत मरती है।

प्रशिक्षु आईएफएस अधिकारियों को मिला डीज़ीपीएस सर्वे एवं वन्यजीव प्रबंधन का व्यवहारिक प्रशिक्षण

बारनवापारा में प्रशिक्षु भारतीय वन सेवा अधिकारियों को दिया गया प्रशिक्षण

बारनवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य में प्रशिक्षु भारतीय वन सेवा अधिकारियों के लिए एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन गत दिवस किया गया। प्रशिक्षु अधिकारियों को आधुनिक तकनीकों, आईटी आधारित वन प्रबंधन तथा वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से जानकारी प्रदान की गई। इस प्रशिक्षण से भावी वन सेवा के अधिकारियों ने क्षेत्रीय स्तर पर उपयोग में आने वाली तकनीक एवं प्रबंधन प्रक्रियाओं से व्यावहारिक रूप से परिचित हुए।
     वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप ने अखिल भारतीय वन सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों से कहा कि आप सभी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर अपनी कौशल को विकसित करें और छत्तीसगढ की वन संपदा की सुरक्षा और संरक्षण के लिए सतत कार्य करे l उन्होंने सभी प्रशिक्षु अधिकारी को अपनी शुभकामनाएं दीं l
प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एवं क्षेत्रीय निदेशक सुश्री स्तोविषा समझदार ने डीज़ीपीएस की कार्यप्रणाली, उसकी उपयोगिता तथा वन सर्वेक्षण, सीमांकन एवं प्रबंधन में इसके महत्व के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि डीज़ीपीएस आधारित सर्वेक्षण से वन क्षेत्रों में सटीक डेटा संग्रह संभव होता है जो दीर्घकालिक संरक्षण योजनाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। इसी क्रम में उप-निदेशक, उदंती–सीतानदी टाइगर रिजर्व वरुण जैन ने “गज संकेत” मोबाइल एप्लिकेशन के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह एप हाथी मॉनिटरिंग, मूवमेंट ट्रैकिंग, मानव–हाथी संघर्ष प्रबंधन तथा त्वरित सूचना साझा करने में एक प्रभावी डिजिटल टूल के रूप में कार्य करता है। प्रशिक्षु अधिकारियों को एप के फील्ड उपयोग, डेटा एंट्री एवं प्रबंधन से संबंधित व्यावहारिक पहलुओं से भी अवगत कराया गया।
        इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन पर वनमण्डलाधिकारी बलौदाबाजार धम्मशील गणवीर ने कहा कि इस प्रकार के तकनीकी एवं फील्ड आधारित प्रशिक्षण भावी वन सेवा के अधिकारियों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक, डिजिटल टूल्स एवं वैज्ञानिक प्रबंधन पद्धतियों के माध्यम से वन एवं वन्यजीव संरक्षण को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है तथा ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम अधिकारियों को जमीनी स्तर पर बेहतर निर्णय लेने में सहायक सिद्ध होंगे।
         अधीक्षक बारनवापारा अभ्यारण्य कृषानू चन्द्राकार ने प्रशिक्षु अधिकारियों को बारनवापारा अभ्यारण्य की भौगोलिक, पारिस्थितिक एवं संरक्षण संबंधी विशेषताओं की जानकारी दी । इसके साथ ही अधिकारियों को अभ्यारण्य में संचालित वनभैंसा संरक्षण केंद्र, ब्लैकबक रिलोकेशन एवं संरक्षण केंद्र, ग्रासलैंड विकास क्षेत्रों सहित अन्य महत्वपूर्ण स्थलों का भ्रमण कराया जिससे उन्हें संरक्षण कार्यों को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिला।

बस्तर की धरती के सेवाव्रती डॉ. रामचंद्र और सुनीता ताई गोडबोले

छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल अपनी सघन वनराशि, विशिष्ट जनजातीय संस्कृति और प्रकृति से आत्मीय संबंध के लिए जाना जाता है। किंतु बीते कई दशकों से यह क्षेत्र नक्सल हिंसा, सशस्त्र संघर्ष, भय और अविश्वास के वातावरण से भी जूझता रहा है। ऐसे कठिन हालात में यदि कोई व्यक्ति अपना संपूर्ण जीवन निःस्वार्थ भाव से जनजाति समाज की सेवा में अर्पित कर दे, तो वह केवल चिकित्सक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संवाहक बन जाता है। ऐसे ही प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी सहधर्मचारिणी सुनीता ताई – जिन्होंने बस्तर को ही अपना कर्मक्षेत्र और घर बना लिया।

महाराष्ट्र के सतारा जिले में जन्मे डॉ. गोडबोले ने आयुर्वेदिक चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। लगभग 18–19 वर्ष की आयु में अल्बर्ट श्वाइत्ज़र के जीवन पर आधारित एक पुस्तक पढ़ी, जिसने उनके सोचने की दिशा ही बदल दी। युवावस्था में ही उनके मन में समाज सेवा का बीज अंकुरित हो गया था। डॉ. गोडबोले ने तय कर लिया कि चिकित्सा उनके लिए आजीविका नहीं, बल्कि साधना होगी।

पढ़ाई पूरी करने के बाद वे वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े और नासिक जिले के कनाशी स्थान पर निवास करने वाले भील जनजाति समाज के बीच स्वास्थ्य सेवा का कार्य प्रारंभ किया। कुछ वर्षों बाद, मात्र 28 वर्ष की आयु में, उन्हें छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बारसूर गांव भेजा गया, जहां एक स्वास्थ्य केंद्र लंबे समय से बंद पड़ा था। यही स्थान उनकी स्थायी कर्मभूमि बन गया।

कल्याण आश्रम ने उन्हें अकेले न जाने की सलाह दी और पहले विवाह करने का सुझाव दिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात पुणे की सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता पुराणिक से हुई, जो महिला सशक्तिकरण और साक्षरता अभियानों में सक्रिय थीं। सुनीता ताई भी वनवासी कल्याण आश्रम के रायगढ़ जिले में स्थित जांभिवली केंद्र पर कार्य कर रही थी। दोनों के विचार और सेवा-भावना में समानता थी। विवाह के मात्र दो सप्ताह बाद ही दोनों सुदूर क्षेत्र बस्तर पहुंच गए और जनजाति समाज के साथ जीवन को आत्मसात कर लिया।

आज डॉ. गोडबोले और उनकी पत्नी बारसूर गांव में एक साधारण दो-कमरे के मकान में रहते हैं – ईंट की दीवारें, टीन की छत और चारों ओर फैला घना जंगल। उनके घर से कुछ दूरी पर खड़ी एम्बुलेंस उनकी सेवा-प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

डॉ. गोडबोले कहते हैं, – “यहां के लोगों के पास दवाइयों के पैसे भी मुश्किल से होते हैं, परिवहन की व्यवस्था तो लगभग नहीं के बराबर है। इसलिए यह जिम्मेदारी हमें स्वयं उठानी पड़ी।”

शुरुआती वर्षों में जनजाति समाज में आधुनिक चिकित्सा के प्रति गहरा संदेह था। बीमार होने पर पहले मांत्रिकों और ओझा-गुनियों से उपचार कराया जाता था। जब वे असफल होते, तब डॉक्टर को बुलाया जाता। वह भी सीधे क्लिनिक आने की परंपरा नहीं थी – जंगल में आग जलाकर धुआं किया जाता, ताकि डॉक्टर उस संकेत को देखकर मरीज तक पहुंचे। बाहरी दुनिया का भय इतना गहरा था कि एक बार डॉ. गोडबोले एक मरीज को इलाज के लिए जगदलपुर ले गए, तो वह फिर कभी गांव नहीं लौटा। बाद में पता चला कि शहर उनके लिए किसी अनजान देश जैसा था – भाषा, कागजी प्रक्रिया और पैसों की कमी उन्हें डरा देती थी।

इन्हीं अनुभवों से डॉ. गोडबोले निष्कर्ष पर पहुंचे कि स्वास्थ्य सेवा गांव में ही, सरल और न्यूनतम खर्च पर उपलब्ध कराना ही एकमात्र व्यवहारिक समाधान है। उन्होंने स्थानीय हलबी भाषा सीखी, लोगों के साथ समय बिताया और धैर्यपूर्वक विश्वास अर्जित किया। धीरे-धीरे उनके क्लिनिक में नियमित मरीज आने लगे। इसी दौरान सुनीता गोडबोले ने जनजाति महिलाओं का एक समूह गठित किया, जो महुआ, इमली, कच्चे आम जैसे वनोपज को उचित मूल्य पर बेचने में सहायक बना।

 राष्ट्रपति भवन में छत्तीसगढ़ की झांकी कलाकारों का सम्मान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सराही जनजातीय कला, कलाकार हुए भावविभोर

गणतंत्र दिवस के अवसर पर कर्तव्य पथ पर छत्तीसगढ़ की झांकी में शामिल कलाकारों को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात का गौरव प्राप्त हुआ। राष्ट्रपति से स्नेहपूर्ण मुलाकात के दौरान कलाकार भावविभोर और अभिभूत नजर आए।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने छत्तीसगढ़ की झांकी की प्रशंसा करते हुए कहा कि झांकी के माध्यम से देश की समृद्ध जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रभावशाली प्रदर्शन हुआ है। उन्होंने कलाकारों के समर्पण, मेहनत और जीवंत प्रस्तुति की सराहना करते हुए छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया भी कहा।

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले से आए जनजातीय कलाकारों ने गणतंत्र दिवस परेड के दौरान छत्तीसगढ़ की झांकी के साथ पारंपरिक मंदार नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति दी थी, जिसने कर्तव्य पथ पर मौजूद दर्शकों के साथ-साथ देश-दुनिया का ध्यान आकर्षित किया।

कलाकारों ने राष्ट्रपति से मुलाकात को अपने जीवन का अविस्मरणीय क्षण बताते हुए कहा कि यह सम्मान उन्हें अपनी कला, संस्कृति और परंपराओं को और अधिक निष्ठा के साथ आगे बढ़ाने की नई प्रेरणा देगा।

राष्ट्रपति से मुलाकात करने वालों में टीम लीडर तेज बहादुर भुवाल के नेतृत्व में नारायणपुर जिले के ग्राम नयनार से आए 13 सदस्यीय दल में जेनू राम सलाम, लच्छू राम, जैतू राम सलाम, राजीम सलाम, दिनेश करंगा, जयनाथ सलाम, मानसिंग करंगा, चन्द्रशेखर पोटाई, धनश्याम सलाम, जगनाथ सलाम, सुरेश सलाम तथा घोड़लापारा, ग्राम नयनार निवासी दिलीप गोटा शामिल रहे।

उल्लेखनीय है कि बस्तर अंचल की इस पारंपरिक कला टोली ने अपनी लोक-संस्कृति और नृत्य शैली से राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ की विशिष्ट पहचान को सशक्त रूप से प्रस्तुत किया।

संघ शताब्दी – राष्ट्रीय संकट के समय दिया एकजुटता का संदेश

1962 के भारत-चीन युद्ध को हम आज भी भूल नहीं पाते हैं। चीन ने भारत के विश्वास का कत्ल किया था। ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के नारे को धुंए में उड़ाकर चीन की कम्युनिस्ट सत्ता ने भारत पर अप्रत्याशित युद्ध थोप दिया था। हमारी सेना ने यथासंभव प्रतिकार किया। चीन को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया। भारतीय सेना के शौर्य को देखकर चीन को अपने कदम रोकने पड़े। हालांकि, इस युद्ध में हमने बहुत कुछ खो दिया था। राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी चीन के साथ खड़ी थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण संदेश दिया। संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिक अनुशासन, प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सहयोग, घायल जवानों के प्राणों की रक्षा के लिए रक्त की आपूर्ति, युद्ध क्षेत्र में सैन्य रसद पहुँचाने में सहयोग एवं हवाई पट्टियों की सुरक्षा सहित कई महत्वपूर्ण कार्यों में आगे बढ़कर सहयोग किया। संकट के समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति को देखकर संघ के विरोधी रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का हृदय भी परिवर्तित हो गया। यही कारण रहा कि सरकार ने 26 जनवरी, 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए अन्य नागरिक संगठनों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समविचारी संगठन भारतीय मजदूर संघ को भी राजपथ पर आमंत्रित किया। स्वयंसेवकों ने राष्ट्रीय एकजुटता के लिए अपने कर्तव्यों के निर्वहन का संदेश दिया।

राजपथ (अब कर्तव्य पथ) 26 जनवरी, 1963 की राष्ट्रीय परेड कई कारणों से महत्वपूर्ण है। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद देश का मनोबल डगमगाया हुआ था। ऐसे समय में राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन आवश्यक था। प्रश्न यह था कि जब भारतीय सेना सहित अन्य सुरक्षा बल भी सीमारेखा पर हैं, तब राष्ट्रीय परेड किस प्रकार सम्पन्न की जाए। सुरक्षा कारणों से सेना को वापस भी नहीं बुलाया जा सकता था और राष्ट्रीय परेड की परंपरा को भी नहीं तोड़ सकते थे। तब विचार आया कि उन नागरिक संगठनों को परेड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाए, जिन्होंने इस संकट की घड़ी में देश को संभालने में अपना योगदान दिया है। लोकसभा में 31 मार्च 1998 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह तथ्य सबके सामने रखा कि ऐसी परिस्थिति में किसी ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को सुझाव दिया कि इस बार परेड में ‘जनता का मार्च’ होना चाहिए। दिल्ली नगर निगम के महापौर द्वारा स्थापित ‘सर्वदलीय नागरिक परिषद’ ने विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, जिसे संघ के स्थानीय अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया। सरकार के आमंत्रण पर, केवल दो दिन की तैयारी में संघ के लगभग 3000 स्वयंसेवक राजपथ पर कदम से कदम मिलाकर संचलन कर रहे थे, जिसमें लगभग 100 स्वयंसेवकों का घोष दल भी शामिल था। अगले दिन समाचार पत्रों में स्वयंसेवकों की तस्वीरें भी प्रकाशित हुईं और संवाददाताओं ने यह भी संकेत दिया कि जनता के बीच सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र स्वयंसेवकों का अनुशासित दल ही था। दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ ने परेड की जो तस्वीरें प्रकाशित की, उसमें स्वयंसेवकों के संचलन की तस्वीर भी शामिल थी। हिन्दुस्तान में प्रकाशित समाचार में लिखा गया कि “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों का प्रदर्शन बहुत आकर्षक रहा”। इसी प्रकार, द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक समाचार में उल्लेख किया गया है कि संघ के अनुषांगिक संगठन ‘भारतीय मजदूर संघ’ ने भी परेड में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।

कुछ वर्षों तक कम्युनिस्ट एवं कांग्रेस समर्थित लेखकों/पत्रकारों ने 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के शामिल होने को सिरे से खारिज किया। लेकिन, जब उस समय के समाचारपत्रों में प्रकाशित चित्र, समाचार और सिलेक्टिव वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू में प्रकाशित सामग्री सामने आई, तब नए प्रकार के कुतर्क गढ़े जा रहे हैं। इस सबके बीच निर्विवाद सच यही है कि संकट के समय में संघ ने अपने कर्तव्यों का पालन किया और राष्ट्रीय परेड में हिस्सा लेकर राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। संघ विरोधी खेमे में यह खलबली उस समय भी थी, जब यह जानकारी सामने आई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय परेड में शामिल हो रहा है। दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ ने 25 जनवरी, 1963 को “रा. स्व. संघ भी परेड में भाग लेगा” शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया। कई लोगों ने संघ के स्वयंसेवकों को रोकने के लिए भरसक प्रयास किए, लेकिन उनको सफलता नहीं मिली।

जनवरी को कांग्रेस की एक बैठक में इस विषय में काफी चर्चा हुई। इसका विवरण सिलेक्टिव वर्क ऑफ जवाहरलाल नेहरू में प्रकाशित है। बैठक में पंडित नेहरू ने बताया था कि “कुछ कांग्रेसियों ने उनसे शिकायत की थी कि संघ वाले गाजियाबाद और मेरठ से वर्दीधारी लोग (स्वयंसेवक) जमा कर रहे हैं”। कांग्रेस के नेताओं ने पंडित के सामने यह दु:ख भी जाहिर किया कि हमारे पास इतनी वर्दी नहीं है। कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ता भी परेड में दिखायी नहीं दिए। तब प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उन लोगों को स्पष्ट कहा कि “मैं तो नहीं रोक सकता आरएसएस को आने से, (किसी को भी आने से रोकना) बहुत गलत बात है”। इसका अर्थ है कि सब प्रकार से जानकारी होने और कांग्रेसियों का विरोध होने के बाद भी नेहरू जी ने संघ को राष्ट्रीय परेड में शामिल होने दिया।

स्मरण रहे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1962 के युद्ध के समय ही नहीं, बल्कि उसके बाद हुए युद्धों में भी भारत सरकार के साथ खड़े रहकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी संघ ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था, रणनीतिक ठिकानों की पहरेदारी, सैनिकों के लिए भोजन एवं रसद की आपूर्ति, नागरिक सुरक्षा एवं अनुशासन का पालन कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने स्वयंसेवकों के कार्य की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की और आकाशवाणी पर उनके योगदान का जिक्र किया। याद हो कि युद्ध प्रारंभ होते ही राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ के साथ ऐतिहासिक चर्चा भी की थी। 1971 के युद्ध  के दौरान सैनिकों के लिए 24 घंटे भोजन एवं दवा की आपूर्ति, अपनी जान बचाकर भारत आए हिन्दू एवं मुस्लिम शरणार्थियों के लिए राहत शिविर, युद्ध में घायलों के लिए रक्तदान महायज्ञ और हवाई पट्टियों की मरम्मत जैसे कार्य स्वयंसेवकों ने किए। उनकी देशभक्ति एवं निःस्वार्थ सेवाभाव को देखकर सेना प्रमुख जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) सैम मानेकशॉ ने कहा था कि “इन युवाओं की निःस्वार्थ सेवा, फुर्ती और अनुशासन देखकर मुझे गर्व होता है। अगर सेना के बाद देश में कोई सबसे अनुशासित संगठन है, तो वह यही है”।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर भारत सरकार ने जिस स्मृति डाक टिकट को जारी किया है, उसमें भी 1963 की गणतंत्र दिवस में शामिल स्वयंसेवकों के समूह का चित्र शामिल किया गया है। इसके साथ ही एक दूसरे चित्र में सेवा एवं राहत कार्य करते स्वयंसेवक दिखायी दे रहे हैं। संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर सरकार ने एक बार फिर ‘राष्ट्र सेवा के 100 वर्ष’ की संघ यात्रा का स्मरण देशवासियों को कराया।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने India EU Trade Deal की सराहना की

India EU Trade Deal दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौतों के जरिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ के मिशन को मजबूत करता है

भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता भारत के वैश्विक व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक सफलता हासिल करता हुआ निर्णायक क्षण

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के ‘इंडिया फर्स्ट’ के सिद्धांत के नेतृत्व में भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता संबंधित सेक्टरों की सुरक्षा करता है

यह समझौता 99% भारतीय निर्यात के लिए अभूतपूर्व पहुंच हासिल कर समृद्धि के एक नए युग की शुरुआत है

यह समझौता टेक्सटाइल, कपड़े, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न, आभूषण, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान, चिकित्सा उपकरण, प्लास्टिक, रबर और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए नए अवसर उपलब्ध कराता है

‘पीपल फ्रेंडली’ व्यापार समझौतों के लिए एक नया बेंचमार्क स्थापित करते हुए यह कृषि निर्यात के लिए तरजीही बाज़ार पहुंच सुनिश्चित करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तेज़ी और महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि के लिए मंच तैयार करता है
भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के माध्यम से मोदी जी विभिन्न क्षेत्रों में अवसरों को खोलने, नई नौकरियाँ पैदा करने, नवाचार को बढ़ावा देने और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाकर हमारे युवाओं की वैश्विक आकांक्षाओं को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे

‘विकसित भारत 2047’ के विज़न के साथ तालमेल बिठाते हुए यह समझौता 17 उप-क्षेत्रों के स्वतंत्र पेशेवरों की सेवाएं प्रदान करके पूरे यूरोप में भारत की प्रतिभा को शक्ति प्रदान करता है

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता (India EU Trade Deal) भारत के वैश्विक व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक सफलता हासिल करता हुआ निर्णायक क्षण है। गृह मंत्री ने कहा कि वैश्विक प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की दूरदर्शी कूटनीतिक सोच को प्रदर्शित करती हुई यह डील दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौतों के माध्यम से एक भरोसेमंद, परस्पर लाभकारी और संतुलित साझेदारी सुनिश्चित करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ के भारत के मिशन को मजबूत करती है।

केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने X पर किए गए सिलसिलेवार पोस्ट में कहा, “India EU Trade Deal भारत के वैश्विक व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक सफलता हासिल करता हुआ निर्णायक क्षण है। एक वैश्विक प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की दूरदर्शी कूटनीतिक सोच को प्रदर्शित करती हुई यह डील दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौतों के माध्यम से एक भरोसेमंद, परस्पर लाभकारी और संतुलित साझेदारी सुनिश्चित करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ के भारत के मिशन को मजबूत करती है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए मोदी जी का हृदय से धन्यवाद और भारत के लोगों को बधाई।”

गृह मंत्री ने कहा, “प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के ‘इंडिया फर्स्ट’ के सिद्धांत के नेतृत्व में India EU Trade Deal संबंधित सेक्टरों की सुरक्षा करता है, साथ ही 99% भारतीय निर्यात के लिए अभूतपूर्व पहुंच हासिल करके समृद्धि के एक नए युग की शुरुआत करता है, जिससे टेक्सटाइल, कपड़े, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न, आभूषण, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान, चिकित्सा उपकरण और उपकरण, प्लास्टिक और रबर, और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए अवसरों की एक पूरी नई दुनिया खुलेगी। लोगों के अनुकूल व्यापार समझौतों के लिए एक नया बेंचमार्क स्थापित करते हुए यह कृषि निर्यात के लिए तरजीही बाजार पहुंच सुनिश्चित करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उछाल और महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि के लिए मंच तैयार करता है।”

श्री अमित शाह ने कहा, “India EU Trade Deal के माध्यम से मोदी जी हमारे युवाओं की वैश्विक आकांक्षाओं को नए ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए विभिन्न सेक्टरों में अवसरों को खोल रहे हैं, नई नौकरियां पैदा कर रहे हैं, इनोवेशन को बढ़ावा दे रहे हैं, और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ा रहे हैं। ‘विकसित भारत 2047’ के विजन के साथ तालमेल बिठाते हुए यह समझौता 17 उप-सेक्टरों के स्वतंत्र पेशेवरों को EU क्लाइंट्स को सेवाएं प्रदान करने में निश्चितता प्रदान करके, ज्ञान-आधारित व्यापार में रास्ते बनाकर, और भारत में प्रशिक्षित आयुष चिकित्सकों को EU सदस्य देशों में सेवाएं प्रदान करने का अवसर प्रदान करके पूरे यूरोप में भारत की प्रतिभा को शक्ति प्रदान करता है।”

ओडिशा – 30 जनजाति परिवारों के 151 लोगों ने की सनातन में वापसी

भुवनेश्वर। जनजाति बहुल जिले मयुरभंज के ठाकुरमुंडा प्रखंड में ईसाइयत में मतांतरित हुए 30 जनजाति परिवारों के 151 पुरुष व महिलाओं ने स्व-धर्म सनातन में वापसी की। घर वापसी करने वाले लोगों में संथाल, हो व गोंड जनजाति के लोग शामिल हैं। ये लोग मिशनरियों के बहकावे में आकर ईसाई बन गए थे, अब पारंपरिक रीति नीति के साथ स्वधर्म में वापसी की। कार्यक्रम में उपस्थित जनजाति समाज के अन्य लोगों ने घर वापसी करने वालों का स्वागत किया। रविवार 4 जनवरी को आयोजित घर वापसी कार्यक्रम में सैकड़ों पुरुष और महिलाएं शामिल हुए।

घर वापसी करने वाले परिवारों के सदस्यों ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व पादरियों के बहकावे में आकर अपनी मूल संस्कृति और परंपराओं से दूर हो गए थे। उस समय पादरियों द्वारा स्वास्थ्य को लेकर किए गए भ्रामक दावों के कारण उन्होंने कनवर्जन का निर्णय लिया था। परिवार के कुछ सदस्य जब गंभीर रूप से अस्वस्थ थे, तब पादरियों ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि ईसाई धर्म अपनाने से उनकी बीमारियां ठीक हो जाएंगी। इसी झांसे में आकर उन्होंने मतांतरण कर लिया।

हालांकि, मतांतरण के बाद उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक अलगाव का सामना करना पड़ा। वे अपने समाज से कट गए और अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों, त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों में भाग नहीं ले पा रहे थे। धीरे-धीरे उन्हें यह महसूस होने लगा कि वे अपनी ही जड़ों और अपने ही लोगों से दूर होते जा रहे हैं, जिससे मानसिक असंतोष और पीड़ा बढ़ती चली गई।

घर वापसी करने वाले प्रमुख व्यक्ति बंशीधर कालुंडिया ने बताया कि इस दौरान वनवासी कल्याण आश्रम और जनजाति सुरक्षा मंच के कार्यकर्ताओं ने उनसे लगातार संवाद बनाए रखा। कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान कनवर्जन में नहीं, बल्कि उचित उपचार और जागरूकता में है। कनवर्जन के नाम पर लोगों को उनके पूर्वजों की संस्कृति से काटना एक साजिश है। इसके बाद उन्हें वास्तविकता का बोध हुआ और उन्होंने घर वापसी का निर्णय लिया। अपने मूल धर्म और संस्कृति में लौटकर संतोष महसूस कर रहे हैं।

स्थानीय कार्यकर्ता शिव प्रसाद हेम्ब्रम ने बताया कि राज्य में गैर कानूनी तरीके से कनवर्जन पर रोक लगाने के लिए कानून बना हुआ है। लेकिन इस कानून का सही रूप से अनुपालन नहीं हो रहा है। यही कारण है कि मिशनरियां जनजातीय लोगों को विभिन्न प्रकार का झांसा देकर कनवर्ट कर रहे हैं। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि राज्य में कनवर्जन को रोकने के लिए जो कानून है, उसे सख्ती से लागू करे ताकि जनजातीय समुदाय के लोगों को अपने पूर्वजों की संस्कृति से उखाड़ने का जो प्रयास हो रहा, वह सफल न हो।

घर वापसी करने के बाद इन लोगों का जनजाति सुरक्षा मंच की ओर से स्वागत किया गया। यह कार्यक्रम मयूरभंज जिले के ठाकुरमुंडा ब्लॉक अंतर्गत बागदफा, जामनांडा और डंगाडिहा गांवों में आयोजित किया गया। हो जनजाति के धर्मगुरु मानाय पूर्ति ने इस अवसर पर आशीर्वचन प्रदान किया।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री विश्वेश्वर टुडु ने घर वापसी करने वाले परिवारों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि भारत के महापुरुषों जैसे स्वामी विवेकानंद से लेकर महात्मा गांधी तक कनवर्जन के खिलाफ थे। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ शक्तियां विभिन्न उपायों से भोले-भाले वनवासियों का कनवर्जन कराने के प्रयास में लगे हुए हैं तथा उनके पूर्वजों की संस्कृति से काट रहे हैं। इससे वनवासी समाज को सचेत रहने की आवश्यकता है।

लखपति दीदी राशोबाई ने मेहनत और समूह सहयोग से कायम की आत्मनिर्भरता की मिसाल

जहाँ चाह वहां राह इस उक्ति को चरितार्थ कर दिखाया है,कोंडागांव जिले के विकासखंड फरसगांव अंतर्गत ग्राम पंचायत बानगांव की रहने वाली श्रीमती राशोबाई मरकाम ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ के अंतर्गत स्व सहायता समूह से जुड़कर न केवल अपने जीवन को नई दिशा दी, बल्कि आत्मनिर्भरता की मिसाल भी कायम की है। राशोबाई आज विभिन्न आजीविका गतिविधियां शुरूकर 01 लाख रूपए से अधिक की आमदनी प्राप्त कर रही हैं।

जय माता दी स्व सहायता समूह की सदस्य राशोबाई स्व सहायता समूह से जुड़ने से पहले कृषि मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करती थीं और घर के कार्यों तक ही सीमित थी। आय के सीमित साधन होने के कारण परिवार की वार्षिक आय केवल 48 हजार रुपये थी, जिससे दैनिक जरूरतों को पूरा करना काफी मुश्किल होता था और परिवार का पालन पोषण बेहतर ढंग से नहीं हो पाता था।

स्व सहायता समूह से जुड़ने के पश्चात उन्हें समूह के माध्यम से आरएफ अनुदान राशि 15 हजार रुपये और सीआईएफ ऋण राशि 60 हजार रुपये प्राप्त हुई। इस सहयोग से उन्होंने कृषि कार्य के साथ-साथ किराना दुकान संचालन एवं मछली पालन जैसी विभिन्न आजीविका गतिविधियां शुरू कीं। जिला प्रशासन की एनआरएलएम टीम के मार्गदर्शन से उनका आत्मविश्वास बढ़ा और उक्त आजीविका गतिविधियों के सफल संचालन से आज श्रीमती राशोबाई मरकाम की वार्षिक आय बढ़कर लगभग 1 लाख 67 हजार रुपये हो गई है। वर्तमान में वे पूर्व की तुलना में दोगुना आय अर्जित कर रही हैं। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है तथा जीवन स्तर में सुखद बदलाव आया है। आज श्रीमती राशोबाई मरकाम ने अपनी मेहनत, लगन और समूह के सहयोग से न केवल आत्मनिर्भर हुई हैं, बल्कि अपने परिवार के लिए एक मजबूत आर्थिक सहारा भी बनी है। उन्होंने शासन की योजनाओं से मिली सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया। 

उल्लेखनीय है कि एनआरएलएम ‘बिहान’ योजना के अंतर्गत स्व सहायता समूहों एवं टीम के सतत प्रयासों से ग्रामीण महिलाओं को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में निरंतर कार्य किया जा रहा है, ताकि अधिक से अधिक महिलाएं “लखपति दीदी” बनकर आत्मसम्मान के साथ जीवन यापन कर सकें।

जनजातीय क्षेत्रों के समग्र विकास के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है सरकार : मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय

प्राचीन संस्कृति और परंपराओं के संवर्धन में जनजातीय समाज की ऐतिहासिक भूमिका

जनजातीय गौरव पथ’ के निर्माण और महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित करने की घोषणा

गौरा पूजा एवं बैगा पुजेरी सम्मेलन में मुख्यमंत्री श्री साय की सहभागिता

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज कोरबा जिले के महर्षि वाल्मीकि आश्रम, आईटीआई रामपुर में आयोजित गौरा पूजा महोत्सव एवं बैगा पुजेरी सम्मेलन में शामिल हुए। उन्होंने गौरा-गौरी पूजन तथा बैगा पुजारी सम्मेलन की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आदिवासी समाज का अपना गौरवशाली इतिहास, विशिष्ट संस्कृति और समृद्ध परंपराएं हैं। बैगा और पुजेरी समाज आज भी इन परंपराओं के संरक्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने इस अवसर पर आईटीआई चौक से बालको रोड का नाम ‘जनजातीय गौरव पथ’ रखने तथा इस मार्ग के प्रारंभिक बिंदु पर जनजातीय महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित करने की घोषणा की।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण इसलिए किया था ताकि यहां की सर्वाधिक जनसंख्या वाले आदिवासी समाज को विकास की मुख्यधारा में आगे बढ़ाया जा सके। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जनजातीय समाज का मान-सम्मान बढ़ाने के लिए 15 नवंबर शहीद बिरसा मुंडा जयंती को जनजातीय गौरव दिवस घोषित करते हुए धरती आबा उत्कर्ष योजना प्रारंभ की। इसके साथ ही पीएम जनमन योजना के माध्यम से विशेष पिछड़ी जनजातियों को विकास के दायरे में लाने का कार्य किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि यह गर्व का विषय है कि आज देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आदिवासी समाज की बेटी राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु आसीन हैं और छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री भी एक साधारण किसान परिवार से आने वाला आदिवासी समाज का बेटा है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि धरती आबा ग्राम उत्कर्ष योजना के लिए 80 हजार करोड़ रुपये तथा पीएम जनमन योजना के लिए 24 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिससे छत्तीसगढ़ के 6,691 गांव लाभान्वित हो रहे हैं।उन्होंने कहा कि पहाड़ी कोरवा, बिरहोर सहित अन्य पीवीटीजी समुदायों के उत्थान के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। आदिवासी अंचलों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है। इसके लिए राज्य में प्राधिकरण का गठन कर आदिवासी एवं पिछड़े क्षेत्रों में विकास कार्यों को और अधिक गति दी जा रही है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने अपने जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने स्वयं भी वनवासी कल्याण आश्रम में कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज आदिकाल से भगवान गौरागौरी के रूप में शिव-पार्वती के उपासक रहे हैं।

उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज के महापुरुषों के योगदान को स्मरणीय बनाने, उनकी स्मृतियों को सहेजने और नई पीढ़ी को उनके बारे में जानकारी देने के उद्देश्य से नवा रायपुर में विशाल डिजिटल जनजातीय संग्रहालय स्थापित किया गया है, जिसमें महापुरुषों की जीवन-गाथाओं का सचित्र वर्णन किया गया है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि जनजातीय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण को प्रोत्साहित करने हेतु बैगा, गुनिया और सिरहा को प्रतिवर्ष 5,000 रुपये की सम्मान निधि प्रदान की जा रही है। साथ ही सरना स्थलों का संरक्षण किया जाएगा, जो न केवल सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा करेगा बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए उद्योग मंत्री श्री लखनलाल देवांगन ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी विकसित भारत का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं, उसी प्रकार मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में विकसित छत्तीसगढ़ की दिशा में तेजी से कार्य हो रहा है।उन्होंने कहा कि जिले में अनेक प्राचीन देवी-देवताओं के स्थल हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री श्री साय के मार्गदर्शन में विकसित कर पर्यटन के रूप में नई पहचान दी जा रही है।

कार्यक्रम में कटघोरा विधायक श्री प्रेमचंद पटेल, वनवासी कल्याण आश्रम के पदाधिकारी श्री पनतराम भगत एवं श्री बीरबल सिंह ने भी संबोधन दिया। इस अवसर पर महापौर श्रीमती संजू देवी राजपूत, पूर्व मंत्री श्री ननकी राम कंवर, वनवासी कल्याण आश्रम के पदाधिकारी, जनप्रतिनिधिगण एवं बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

सांसद खेल महोत्सव– ‘फिट युवा, विकसित भारत’ का भव्य समापन : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने खिलाड़ियों का बढ़ाया उत्साह

खिलाड़ियों के सपनों को पंख देने के लिए सरकार प्रतिबद्ध: मुख्यमंत्री श्री साय

सांसद खेल महोत्सव– ‘फिट युवा, विकसित भारत’ का समापन समारोह आज पं. दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम, रायपुर में उत्साहपूर्ण और गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय खेल एवं युवा कार्य मंत्री श्री मनसुख मांडविया तथा देशभर के सांसद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े और समापन समारोह को वर्चुअल रूप से संबोधित किया। ऑडिटोरियम में उपस्थित जनसमूह ने प्रधानमंत्री के प्रेरक उद्बोधन को ध्यानपूर्वक सुना।

खिलाड़ियों के सपनों को पंख देने के लिए सरकार प्रतिबद्ध: मुख्यमंत्री श्री साय

मुख्यमंत्री श्री साय ने अपने संबोधन की शुरुआत सुशासन दिवस की शुभकामनाओं के साथ करते हुए भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी को नमन किया। उन्होंने कहा कि सांसद खेल महोत्सव– ‘फिट युवा, विकसित भारत’ जैसे आयोजन युवा पीढ़ी में खेल संस्कृति को मजबूत बनाते हैं और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के लिए सशक्त मंच प्रदान करते हैं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि यह महोत्सव लगभग चार महीनों तक रायपुर संसदीय क्षेत्र के 36 विभिन्न स्थानों पर आयोजित किया गया। इसमें स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं के साथ-साथ ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के नागरिकों ने भी उत्साहपूर्वक सहभागिता की। उन्होंने इस व्यापक और सुव्यवस्थित आयोजन के लिए सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल को विशेष बधाई दी।

खिलाड़ियों के सपनों को पंख देने के लिए सरकार प्रतिबद्ध: मुख्यमंत्री श्री साय

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि खेलों में केवल पहला, दूसरा या तीसरा स्थान ही सबकुछ नहीं होता, बल्कि अनुशासन, टीम-स्पिरिट, समर्पण और सतत अभ्यास के गुण ही किसी को महान खिलाड़ी बनाते हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस महोत्सव से अनेक खिलाड़ी उभरकर सामने आएंगे, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ और देश का नाम रोशन करेंगे। मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि खिलाड़ियों के सपनों को पंख देने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का सुनहरा अवसर मिल रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार खेलों को बढ़ावा देने के लिए निरंतर ठोस कदम उठा रही है। छत्तीसगढ़ में खेल अलंकरण समारोह पुनः प्रारंभ किया गया है। ओलंपिक में प्रदेश के खिलाड़ी के चयन पर 21 लाख रुपये तथा स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक विजेताओं को क्रमशः 3 करोड़, 2 करोड़ और 1 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी। 

उन्होंने कहा कि वर्ष 2026 में ‘खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स’ की मेजबानी छत्तीसगढ़ को मिली है, जो प्रदेश के लिए गौरव का विषय है। रायपुर का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम देश का तीसरा सबसे बड़ा स्टेडियम है और जनवरी माह में यहां पुनः बड़े मैचों का आयोजन किया जाएगा। खेलो इंडिया के कार्यालय विभिन्न स्थानों पर स्थापित कर नई खेल प्रतिभाओं को तराशने का कार्य किया जा रहा है।

सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि सांसद खेल महोत्सव– ‘फिट युवा, विकसित भारत’ का शुभारंभ 29 अगस्त को हुआ था और यह आयोजन रायपुर लोकसभा क्षेत्र के 36 स्थानों पर सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। उन्होंने कहा कि केवल पढ़ाई-लिखाई ही नहीं, बल्कि खेल-कूद भी जीवन में समान रूप से महत्वपूर्ण है और इसी के माध्यम से बच्चे देश-प्रदेश का नाम रोशन कर सकते हैं। इस महोत्सव में  542 गांवों से सहभागिता रही और 85 हजार से अधिक खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया, जो पूरे देश में रिकॉर्ड भागीदारी है।

उन्होंने कहा कि इस महोत्सव में पारंपरिक एवं आधुनिक खेलों का सुंदर समन्वय देखने को मिला। गेड़ी प्रतियोगिता में 70 वर्ष की महिलाओं की सहभागिता, कबड्डी, फुगड़ी, वॉलीबॉल जैसे खेलों में उत्साहपूर्ण प्रदर्शन और ट्रांसजेंडर खिलाड़ियों द्वारा रस्साकशी में भागीदारी—सभी ने सामाजिक समरसता और समावेशन का सशक्त संदेश दिया। स्कूल छोड़ चुके युवाओं को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला तथा अनुभवी खिलाड़ियों का सम्मान किया गया।

सांसद श्री अग्रवाल ने कहा कि इस भव्य आयोजन को सफल बनाने में लगभग 1,500 खेल अधिकारियों, विद्यालयीन शिक्षकों और सेवानिवृत्त खेल अधिकारियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। विश्वविद्यालय परिसरों में भी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। उन्होंने सभी खिलाड़ियों तथा आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि आने वाले समय में सांसद खेल महोत्सव को और अधिक सुव्यवस्थित, व्यापक और प्रभावी रूप दिया जाएगा।

समापन समारोह में विजेता खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया गया। समूह खेलों में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली टीम को 11,000 रुपये, द्वितीय स्थान को 5,000 रुपये तथा एकल खेलों में प्रथम स्थान पर 3,100 रुपये और द्वितीय स्थान पर 1,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि के साथ पदक, प्रशस्ति-पत्र एवं टी-शर्ट प्रदान किए गए।

कार्यक्रम में विधायक श्री राजेश मूणत, श्री सुनील सोनी, श्री पुरंदर मिश्रा, श्री मोतीलाल साहू, विधायक श्री किरण सिंह देव, ज़िला पंचायत अध्यक्ष श्री नवीन अग्रवाल, नान अध्यक्ष श्री संजय श्रीवास्तव, जिला पंचायत सीईओ श्री कुमार बिस्वरंजन सहित जनप्रतिनिधि, खेल विभाग के अधिकारी एवं बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे एवं नागरिक उपस्थित थे।

राष्ट्रपति ने संथाली भाषा में भारत का संविधान जारी किया

 

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (25 दिसंबर, 2025) राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में संथाली भाषा में भारत का संविधान जारी किया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि यह सभी संथाली लोगों के लिए गर्व और खुशी की बात है कि भारत का संविधान अब संथाली भाषा में, ओल चिकी लिपि में उपलब्ध है। इससे वे संविधान को अपनी भाषा में पढ़ और समझ सकेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि इस वर्ष हम ओल चिकी लिपि की शताब्दी मना रहे हैं। उन्होंने विधि एवं न्याय मंत्री और उनकी टीम की प्रशंसा की, जिन्होंने शताब्दी वर्ष में भारत के संविधान को ओल चिकी लिपि में प्रकाशित करवाया।

इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति श्री सीपी राधाकृष्णन और केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल शामिल थे।

संथाली भाषा, जिसे 2003 के 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, भारत की सबसे प्राचीन जीवित भाषाओं में से एक है। यह झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार में बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों द्वारा बोली जाती है।

 

छत्तीसगढ़ सरकार बाबा गुरु घासीदास के बताए मार्ग पर चलकर सभी समाज के हित में कर रही है कार्य – मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय

शिक्षा ही विकास का मूलमंत्र

सतनाम भवन सेक्टर-6 भिलाई में आयोजित बाबा गुरु घासीदास जयंती एवं गुरु पर्व कार्यक्रम में शामिल हुए मुख्यमंत्री श्री साय

सतनाम भवन में डोम निर्माण के लिए 50 लाख रुपये तथा बाबा गुरु घासीदास जयंती आयोजन हेतु प्रतिवर्ष 10 लाख रुपये की घोषणा

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज दुर्ग जिले के भिलाई सेक्टर-6 स्थित सतनाम भवन में आयोजित परमपूज्य बाबा गुरु घासीदास जी की 269वीं जयंती एवं गुरु पर्व कार्यक्रम में शामिल हुए। इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री साय ने सतनाम भवन में बाबा गुरु घासीदास जी की गुरु-गद्दी के दर्शन कर विधिवत पूजा-अर्चना की तथा प्रदेशवासियों के सुख-समृद्धि एवं कल्याण की कामना की।

इस गरिमामय आयोजन में प्रदेश के तकनीकी शिक्षा एवं रोजगार, कौशल विकास तथा अनुसूचित जाति विकास मंत्री श्री गुरु खुशवंत साहेब, स्कूल शिक्षा, ग्रामोद्योग, विधि एवं विधायी मंत्री श्री गजेन्द्र यादव, अनुसूचित जाति विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष एवं विधायक श्री डोमन लाल कोर्सेवाड़ा तथा विधायक श्री रिकेश सेन विशेष रूप से उपस्थित थे।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि 18वीं सदी में जब समाज में छुआछूत, भेदभाव और असमानता चरम पर थी, उस समय बाबा गुरु घासीदास जी ने “मनखे-मनखे एक समान” का महान संदेश देकर मानवता को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार बाबा गुरु घासीदास जी के इन्हीं आदर्शों और शिक्षाओं को आत्मसात करते हुए सभी समाज वर्गों के कल्याण के लिए निरंतर कार्य कर रही है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के संकल्प के अनुरूप छत्तीसगढ़ सरकार भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की रोशनी पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार की योजनाओं का लाभ समाज के हर वर्ग तक सुनिश्चित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि महतारी वंदन योजना, मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना, श्रीरामलला दर्शन योजना तथा 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी जैसी योजनाओं का सीधा लाभ किसानों और आम नागरिकों को मिल रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि समाज के समग्र विकास के उद्देश्य से अनुसूचित जाति विकास प्राधिकरण का गठन किया गया है, जिसमें अहिवारा विधायक श्री डोमन लाल कोर्सेवाड़ा को प्राधिकरण का उपाध्यक्ष बनाया गया है। समाज के विकास के लिए प्राधिकरण के माध्यम से 75 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया है। साथ ही समाज के बेटा-बेटियों को उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने हेतु सरकार द्वारा 15 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि शिक्षा ही विकास का मूलमंत्र है। इसी उद्देश्य को साकार करने के लिए जिला मुख्यालयों में नालंदा परिसर का निर्माण किया जा रहा है, जिससे प्रदेश के बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर उच्च पदों तक पहुँच सकें। उन्होंने समाज में फैल रही नशाखोरी पर चिंता व्यक्त करते हुए इसके विरुद्ध कठोर कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि बेरोजगारी दूर करने के लिए राज्य सरकार द्वारा नई उद्योग नीति लागू की गई है, जिसके माध्यम से युवाओं को रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इस उद्योग नीति के अंतर्गत अब तक लगभग 8 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। उन्होंने समाज से शिक्षा को बढ़ावा देने, समानता, सद्भाव और विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान किया।

मुख्यमंत्री श्री साय ने गुरु घासीदास सेवा समिति की मांगों का उल्लेख करते हुए सतनाम भवन सेक्टर-06 भिलाई में डोम निर्माण के लिए 50 लाख रुपये तथा प्रति वर्ष बाबा गुरु घासीदास जयंती कार्यक्रम के आयोजन हेतु 10 लाख रुपये की स्वीकृति देने की घोषणा की।

प्रदेश के तकनीकी शिक्षा एवं रोजगार मंत्री श्री गुरु खुशवंत साहेब ने अपने उद्बोधन में कहा कि यदि बाबा गुरु घासीदास जी के “मनखे-मनखे एक समान” के संदेश को पूर्ण भाव से जीवन में उतार लिया जाए, तो समाज की सभी बुराइयों का स्वतः अंत हो जाएगा। उन्होंने सतनाम मार्ग पर चलने वालों से खान-पान और आचरण को शुद्ध रखने का आह्वान किया।

स्कूल शिक्षा मंत्री श्री गजेन्द्र यादव ने अपने संक्षिप्त संबोधन में बाबा गुरु घासीदास जी के बताए मार्ग और संदेशों को जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम को अनुसूचित जाति विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष एवं विधायक श्री डोमन लाल कोर्सेवाड़ा ने भी संबोधित किया।

इस अवसर पर पूर्व विधायक श्री सांवला राम डाहरे, गुरु घासीदास सेवा समिति के अध्यक्ष श्री भरत लाल कुर्रे, उपाध्यक्ष श्रीमती उर्मिला भास्कर एवं समिति के अन्य पदाधिकारी, जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती सरस्वती बंजारे सहित अनेक जनप्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु और नागरिक उपस्थित थे।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने विजय दिवस पर, युद्ध में अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर शहीदों को नमन किया

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने विजय दिवस पर, युद्ध में अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर शहीदों को नमन किया।

X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा “वर्ष 1971 में आज ही के दिन सुरक्षा बलों ने अदम्य साहस और सटीक रणनीति के बल पर पाकिस्तानी सेना को परास्त कर उसे आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया था। इस विजय ने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ ढाल बन, विश्वभर में मानवता की रक्षा का आदर्श उदाहरण पेश किया और भारतीय सेनाओं की अद्वितीय सैन्य क्षमता और पराक्रम का लोहा मनवाया। विजय दिवस पर, युद्ध में अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर शहीदों को नमन करता हूँ।”

लाल किले में गूंजा ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’

छत्तीसगढ़ के गेड़ी नृत्य का अद्भुत प्रदर्शन को यूनेस्को ने सराहा

180 देशों के प्रतिनिधियों ने किया छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का अभिवादन

छत्तीसगढ राज्य के बिलासपुर जिले की सांस्कृतिक संस्था ‘लोक श्रृंगार भारती’ के गेड़ी लोक नृत्य दल द्वारा सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) व संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के आमंत्रण पर नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला प्रांगण में गेड़ी नृत्य की प्रस्तुति दी गई।  7 से 13 दिसम्बर तक आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समारोह में 180 देशों के प्रतिनिधियों की सहभागिता रहीं। समारोह में बिलासपुर के गेड़ी नर्तक दल ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति को काफी सराहा गया। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने इस गेडी नर्तक दल को बधाई और शुभकामनाएं दीं है l 

केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत प्रभावित हुए। उन्होंने “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” का नारा दिया

         समारोह का ऐतिहासिक क्षण तब आया जब भारत के महापर्व दीपावली को यूनेस्को द्वारा विश्व सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान की गई। इस उपलब्धि में छत्तीसगढ़ के गेड़ी लोक नृत्य दल की प्रस्तुति को विशेष सराहना मिली गेड़ी नृत्य की भावपूर्ण और साहसिक प्रस्तुति से केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत प्रभावित हुए। उन्होंने “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” कहकर कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। 

गेड़ी नृत्य दल ने अपने रोमांचक प्रदर्शन से अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों को रोमांचित कर दिया

         मुख्य गायक एवं नृत्य निर्देशक अनिल गढ़ेवाल के कुशल नेतृत्व में गेड़ी नृत्य दल ने अपने सशक्त, ऊर्जावान एवं रोमांचक प्रदर्शन से अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों को रोमांचित कर दिया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर, केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता, विभिन्न राज्यों के कलाकारों सहित 180 देशों के डेलिगेट्स उपस्थित रहे।

यूनेस्को के महानिदेशक डॉ. खालिद एन. एनानी सहित 180 देशों के प्रतिनिधियों ने गेड़ी नृत्य दल के साथ स्मृति चित्र लिए

       मुख्य गायक अनिल गढ़ेवाल द्वारा प्रस्तुत “काट ले हरियर बांसे” गीत ने विदेशी प्रतिनिधियों के मन में छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न की। वहीं मुख्य मांदल वादक मोहन डोंगरे द्वारा एक ही स्थान पर घूमते हुए मांदल वादन किया। हारमोनियम वादक सौखी लाल कोसले एवं बांसुरी वादक महेश नवरंग की स्वर लहरियों पर विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधि झूम उठे। गेड़ी नर्तकों प्रभात बंजारे, सूरज खांडे, शुभम भार्गव, लक्ष्मी नारायण माण्डले, फूलचंद ओगरे एवं मनोज माण्डले ने साहसिक करतबों से दर्शकों को रोमांचित किया। विशेष रूप से तब, जब एक गेड़ी पर संतुलन बनाते हुए कलाकारों ने मानवीय संरचनाएं बनाईं, पूरा प्रांगण तालियों से गूंज उठा।

गेड़ी नृत्य दल ने छत्तीसगढ़ राज्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक पहचान दिलाई

         छत्तीसगढ़ की पारंपरिक वेशभूषा, कौड़ियों व चीनी मिट्टी की मालाएं, पटसन वस्त्र, सिकबंध एवं मयूर पंख धारण कर प्रस्तुत भाव नृत्य ने प्रस्तुति को और भी आकर्षक बना दिया। यूनेस्को के महानिदेशक डॉ. खालिद एन. एनानी सहित विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने गेड़ी नृत्य दल के साथ स्मृति चित्र लिया व छत्तीसगढ़ राज्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक पहचान दिलाने के लिए शुभकामनाएं दी।

असम में चौथे सहकारिता मेला 2025 का उद्घाटन

केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री श्री कृष्ण पाल गुर्जर ने महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव और महापुरुष माधवदेव की सांस्कृतिक विरासत को सहकारिता पुनर्जागरण की आधारशिला बताया

असम सरकार के सहकारिता विभाग द्वारा, भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय के मार्गदर्शन में आयोजित चौथे सहकारिता मेला 2025 का आज चांदमारी स्थित एईआई ग्राउंड में उद्घाटन किया गया। यह तीन दिवसीय मेला 13 से 15 दिसंबर 2025 तक आयोजित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य असम में सहकारिता आंदोलन की शक्ति, विविधता और संभावनाओं को प्रदर्शित करना है।

इस मेले का औपचारिक उद्घाटन भारत सरकार के केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री श्री कृष्ण पाल गुर्जर ने असम सरकार के सहकारिता मंत्री श्री जोगेन मोहन की गरिमामयी उपस्थिति में किया।

गुवाहाटी में आयोजित सहकारिता मेले को संबोधित करते हुए केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री ने कहा कि असम में सहकारिता आंदोलन राज्य की गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं का स्वाभाविक विस्तार है। उन्होंने क्षेत्र के महान संत विभूतियों महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव और महापुरुष माधवदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि एकता, समानता और समाज सेवा पर आधारित उनकी शिक्षाएं ही सहकारिता की भावना की मूल आधारशिला हैं।

केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के निर्णायक नेतृत्व और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह के मार्गदर्शन में सहकार से समृद्धि की राष्ट्रीय परिकल्पना, सशक्त वास्तविकता में परिवर्तित हो रही है। उन्होंने वर्ष 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना को एक ऐतिहासिक कदम बताया, जिसने भारत में वर्ष 2047 तक एक सर्वांगीण, विश्वस्तरीय सहकारिता प्रणाली के निर्माण के लिए आवश्यक संस्थागत प्रोत्साहन और स्पष्ट रोडमैप प्रदान किया है।

श्री गुर्जर ने विशेष रूप से असम में सहकारिता क्षेत्र में हो रहे तेज़ सुधारों की सराहना करते हुए मुख्यमंत्री डॉहिमंत बिस्वा सरमा के गतिशील नेतृत्व और राज्य के सहकारिता मंत्री श्री जोगेन मोहन के समर्पित प्रयासों को इसका श्रेय दिया। उन्होंने कहा कि राज्य स्तर पर सक्रिय और प्रभावी क्रियान्वयन के चलते असम प्रमुख राष्ट्रीय पहलों में अग्रणी बनकर उभरा है।

उन्होंने बताया कि प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) के 100 प्रतिशत कंप्यूटरीकरण की दिशा में असम ने उल्लेखनीय प्रगति की है, जहां 800 से अधिक पैक्स ने नए मॉडल उपविधियों को अपनाया है। इस प्रगति से युवाओं और महिलाओं को सशक्त किया जा रहा है, विभिन्न क्षेत्रों में उद्यमिता को बढ़ावा मिल रहा है और 32 लाख से अधिक सदस्यों को वित्तीय समावेशन का लाभ मिल रहा है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि असम अब राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के उस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के अनुरूप पूरी तरह अग्रसर है, जिसके अंतर्गत वर्ष 2026 तक प्रत्येक गांव में एक सहकारी संस्था की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने राज्य के लिए एक समृद्ध, आत्मनिर्भर और सहकारिता-आधारित भविष्य के निर्माण हेतु सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया।

चौथे सहकारिता मेले में अपने संबोधन में असम सरकार के सहकारिता मंत्री श्री जोगेन मोहन ने इस मेले को जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण का एक जीवंत मंच बताया। उन्होंने प्रतिभागियों की विशेष रूप से सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर अपशिष्ट को उपयोगी संसाधनों में बदलते हुए आत्मनिर्भरता और अद्भुत नवाचार क्षमता का परिचय दिया है।

उन्होंने बताया कि ये सहकारी संस्थाएं आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन से लेकर महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और युवाओं की सफलता तक, विभिन्न क्षेत्रों में लोगों को व्यापक लाभ पहुंचा रही हैं।

इस सहकारिता मेले में 160 सहकारी संस्थाओं की भागीदारी है, जो हथकरघा, मत्स्य पालन, डेयरी, कृषि तथा युवा एवं महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों जैसे प्रमुख क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। यह मेला स्थानीय उत्पादों, नवाचारों और सहकारिता की सफलता की कहानियों को प्रदर्शित करने के लिए एक सशक्त मंच प्रदान कर रहा है।

मेला आगामी दो दिनों तक जारी रहेगा, जिसमें प्रदर्शनियां, संवाद और ज्ञान-साझा सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनका उद्देश्य राज्य में सहकारिता आधारित विकास को और अधिक प्रोत्साहित करना है।

वीर सावरकर-स्वतंत्रता संग्राम में जीवन देने वाले राष्ट्रभक्तों की आकाशगंगा का दीप्तिमान तारा हैं – डॉ. मोहन भागवत जी

सावरकर

स्वातंत्र्यवीर सावरकर के गीत ‘सागरा प्राण तळमळला’ के 115 वर्ष पूर्ण

श्री विजयपुरम्, 12 दिसंबर 2025। स्वातंत्र्यवीर सावरकर के गीत ‘सागरा प्राण तळमळला’ के 115 वर्ष पूर्ण होने पर अंडमान और निकोबार के श्री विजयपुरम् में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इससे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने वीर सावरकर की आदमकद प्रतिमा का अनावरण और ‘वीर सावरकर प्रेरणा पार्क’ का उद्घाटन किया।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और सावरकर जी के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। उनके जीवन और दर्शन पर एक कॉफी टेबल बुक भी जारी की गई।

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि प्रतिमा और कविता पाठ, हालांकि सार्थक है, लेकिन वे केवल प्रतीक स्वरूप हैं। हर नागरिक को सावरकर जी के विज़न को साकार करने के लिए सक्रिय रूप से काम करना चाहिए।

उन्होंने सावरकर जी को “भारत के देशभक्तों में एक चमकता सितारा” बताया, जिनका बलिदान और कष्ट भारत के प्रति उनके गहरे प्रेम को दर्शाते हैं। उन्होंने नागरिकों से सावरकर जी जैसी ही राष्ट्रीय समर्पण की भावना विकसित करने का आग्रह किया। “तेरे टुकड़े” का नारा कहाँ से आता है?”, यह पूछते हुए, उन्होंने विभाजनकारी प्रवृत्तियों को अस्वीकार करने और एकता को बल देने का आह्वान किया। “सावरकर जी के लिए, राष्ट्र ही देवता था”, और सभी से अपने सभी कार्यों के केंद्र में भारत को रखने के लिए कहा। उन्होंने युवाओं को  प्रोत्साहित किया राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को कभी न भूलने के लिए । साथ ही वीर सावरकर जी के गुणों को स्वयं के जीवन में उतारने को कहा और उनके जीवन में अदम्य साहस एवं संयम का जो दर्शन होता है उससे आज के युवाओं को प्रेरणा लेने को भी कहा l 

सरसंघचालक जी ने कहा कि वीर सावरकर आजादी की लड़ाई में जीवन समर्पित करने वाले देशभक्तों की आकाशगंगा में सबसे दीप्तिमान तारा हैं। उनका जीवन पूर्ण, अनुकरणीय और राष्ट्रभक्ति का जीवंत उदाहरण है। हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए उनकी कल्पना के भारत के निर्माण के लिए काम करना होगा। सावरकर जैसे सूर्य न बन पाएं तो भी दीपक अवश्य बनें। यही उनको सच्ची श्रद्धांजली होगी।

उन्होंने कहा कि सावरकर जी के व्यक्तित्व की व्याख्या करने के लिए अनेक विशेषणों की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि उनका जीवन उत्कट समर्पण, प्रेम, त्याग और अदम्य साहस का अनूठा संगम था। उनके इन्हीं गुणों के कारण वे तनमय अवस्था में पहुंच गए थे, जहां अपना दुख भूलकर व्यक्ति देश और समाज के दुख से जुड़ जाता है। इसे ही भक्ति कहा जाता है। 

सावरकर जी का स्मरण केवल इतिहास का पुन: आवाहन नहीं, बल्कि सच्ची देशभक्ति को जगाने का माध्यम है। यदि हमें सावरकर जी के सपनों का भारत बनाना है, तो उनके समर्पण और अनुशासन को अपने जीवन में उतारना होगा। आज की आवश्यकता गुलामी के कालखंड की तरह किसी (अंग्रेजों) के खिलाफ काम करने की नहीं, बल्कि अपने राष्ट्र के लिए कार्य करने की है। उनका जीवन उत्कट समर्पण, प्रेम, त्याग और अदम्य साहस का अनूठा संगम था। 

समारोह में लेफ्टिनेंट गवर्नर एडमिरल देवेंद्र कुमार जोशी, महाराष्ट्र के संस्कृति मंत्री एडवोकेट आशीष शेलार, पंडित हृदयनाथ मंगेशकर, अभिनेता रणदीप हुड्डा और शरद पोंक्से और इतिहासकार डॉ. विक्रम संपत सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए।

कार्यक्रम में पंडित हृदयनाथ मंगेशकर के संगीत निर्देशन में सावरकर जी की रचनाओं जय देव जय देव, हे हिन्दू नृसिंह प्रभु शिवाजी राजा, जयोस्तुते और सदाबहार सागर प्राण तळमळला की भावपूर्ण प्रस्तुतियाँ दी गईं।

कार्यक्रम में सावरकर जी की रचनाओं जय देव जय देव, हे हिन्दू नृसिंह प्रभु शिवाजी राजा, जयोस्तुते और सदाबहार सागर प्राण तळमळला की भावपूर्ण प्रस्तुतियाँ दी गईं।

जय माँ भारती तुझे शत शत नमन l 

सावरकर कौन थे ?

सावरकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे l 

सावरकर ने ‘सागरा प्राण तळमळला’ गीत लिखा था l 

115 साल

भारत की जनगणना 2027 – केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने दी मंजूरी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज 11,718.24 करोड़ रुपये की लागत से भारत की जनगणना 2027 कराने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है ।

योजना का विवरण:

  • भारतीय जनगणना विश्‍व की सबसे बड़ी प्रशासनिक और सांख्यिकीय कार्ययोजना है। भारत की जनगणना दो चरणों में आयोजित की जाएगी: ( i ) घरों की सूची बनाना (हाउसलिस्टिंग) और आवास (हाउसिंग) जनगणना – अप्रैल से सितंबर, 2026 और (ii) जनसंख्‍या की गणना (पीई) – फरवरी 2027 (केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के बर्फ से प्रभावित गैर-समकालिक क्षेत्रों और हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड राज्यों के लिए, पीई सितंबर, 2026 में की जाएगी)।
  • लगभग 30 लाख प्रक्षेत्र कर्मचारी राष्ट्रीय महत्व के इस विशाल कार्य को पूरा करेंगे।
  • डेटा संग्रह के लिए मोबाइल ऐप और मॉनिटरिंग के लिए सेंट्रल पोर्टल का उपयोग करने से बेहतर गुणवत्ता का डेटा सुनिश्चित होगी।
  • डाटा प्रसार बेहतर और अधिक यूज़र फ्रेंडली तरीके से होगा ताकि नीति निर्माण के लिए आवश्‍यक मानकों पर सभी प्रश्‍न एक बटन क्लिक करते ही प्राप्‍त हो जाए।
  • जनगणना एक सेवा के रूप में (सीएएएस) मंत्रालयों को डेटा स्‍पष्‍ट, मशीन से पढ़े जा सकने वाले और कार्रवाई करने योग्‍य प्रारूप में प्रदान करेंगे।

लाभ: 

भारत की जनगणना 2027 में देश की समस्‍त जनसंख्‍या को शामिल किया जाएगा।

कार्यान्‍वयन कार्यनीति और लक्ष्य:

  • जनगणना प्रक्रिया में हर घर में जाना और हाउसलिस्टिंग तथा हाउसिंग जनगणना और जनसंख्या गणना के लिए अलग-अलग प्रश्नावली तैयार करना शामिल है।
  • गणनाकार (एन्यूमेरेटर) जो आम तौर पर सरकारी शिक्षक होते हैं और जिन्हें राज्य सरकार नियुक्‍त करती है, अपनी नियमित ड्यूटी के अतिरिक्‍त जनगणना का फील्ड वर्क भी करेंगे।
  • उप-जिला, जिला और राज्‍य स्‍तरों पर दूसरे जनगणना अधिकारियों को भी राज्‍य /जिला प्रशासन द्वारा नियुक्‍त किया जाएगा।
  • जनगणना 2027 के लिए उठाए गए नए कदम इस प्रकार हैं:

( i ) देश में डिजिटल माध्‍यम से पहली जनगणना। डेटा का संग्रह मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग करके किया जाएगा जो एन्‍डरॉएड और आईओएस दोनों वर्जनों के लिए उपलब्ध होंगे।

(ii)    पूरी जनगणना प्रक्रिया को वास्‍तविक समय आधार पर प्रबंधित और निगरानी करने के लिए एक समर्पित पोर्टल, जिसका नाम सेंसस मैनेजमेंट एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (सीएमएमएस) है, डेवलप किया गया है।

(iv)    हाउसलिस्टिंग ब्लॉक (एचएलबी) क्रिएटर वेब मैप एप्लीकेशन: जनगणना 2027 के लिए एक और इनोवेशन एचएलबी क्रिएटर वेब मैप एप्लीकेशन है, जिसका उपयोग प्रभारी अधिकारी करेंगे।

(v) जनता को स्‍वयं गिनती करने का विकल्‍प दिया जाएगा।

(vi)    इस विशाल डिजिटल अभियान के लिए सटीक सुरक्षा फ़ीचर प्रदान किया गया है।

(vii)    जनगणना 2027 के लिए पूरे देश में जागरूकता, सबको साथ लेकर चलने वाली भागीदारी, सभी का सहयोग और प्रक्षेत्र अभियानों में सहायता के लिए एक केंद्रि‍त और व्‍यापक प्रचारित अभियान संचालित किया जाएगा। इसमें सटीक, प्रमाणिक और समय पर जानकारी साझा करने पर बल दिया जाएगा और समावेशी तथा प्रभावी लोकसंपर्क प्रयास सुनिश्चित किया जाएगा।

(viii) राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति ने 30 अप्रैल 2025 को अपनी बैठक में आगामी जनगणना यानी जनगणना 2027 में जाति गणना को शामिल करने का निर्णय किया। हमारे देश में भारी सामाजिक और जनसांख्यिकीय विविधता तथा संबंधित चुनौतियों के साथ, जनगणना 2027 के दूसरे चरण यानी जनसंख्या गणना (पीई) में जाति डेटा को इलेक्ट्रॉनिक रूप से भी शामिल किया जाएगा।

(ix)    लगभग 30 लाख फील्ड कर्मचारियों को, जिनमें एन्यूमरेटर, सुपरवाइज़र, मास्टर ट्रेनर, प्रभारी अधिकारी और प्रधान/जिला जनगणना अधिकारी शामिल हैं, डेटा कलेक्शन, मॉनिटरिंग और जनगणना अभियान के पर्यवेक्षण के लिए तैनात किया जाएगा। सभी जनगणना कर्मचारियों को जनगणना के काम के लिए उपयुक्‍त मानदेय प्रदान किया जाएगा क्योंकि वे अपने नियमित कार्य के अतिरिक्‍त यह काम भी करेंगे।

रोजगार सृजन क्षमता सहित प्रमुख प्रभाव:

  • वर्तमान में प्रयास यह है कि आगामी जनगणना डेटा पूरे देश में कम से कम समय में उपलब्ध कराया जाए। जनगणना परिणामों को अधिक कस्टमाइज़्ड विज़ुअलाइज़ेशन टूल्स के साथ प्रसारित करने की भी कोशिश की जाएगी। डेटा सबसे निचली प्रशासनिक इकाई यानी गांव/वार्ड स्‍तर तक सभी के साथ साझा किया जाएगा।
  • जनगणना 2027 को सफलतापूर्वक संचालित करने के लिए अलग-अलग दायित्‍वों को पूरा करने हेतु, स्‍थानीय स्‍तर पर लगभग 550 दिनों के लिए लगभग 18,600 तकनीकी श्रमबल का उपयोग किया जाएगा। दूसरे शब्दों में, लगभग 1.02 करोड़ मानव दिवसों का रोजगार सृजित होगा। इसके अतिरिक्‍त प्रभारी/जिला/राज्य स्‍तर पर तकनीकी श्रमबल देने के प्रावधान का परिणाम क्षमता निर्माण के रूप में भी आएगा क्योंकि कार्य की प्रकृति डिजिटल डेटा हैंडलिंग, मॉनिटरिंग और कोऑर्डिनेशन से जुड़ी होगी। इससे इन लोगों के भविष्य में रोज़गार की संभावनाओं में भी मदद मिलेगी।

पृष्ठभूमि:

जनगणना 2027 देश में 16वीं जनगणना और स्‍वतंत्रता के बाद की 8वीं जनगणना  होगी। जनगणना गांव, शहर और वार्ड स्‍तर पर प्राथमिक डेटा उपलब्‍ध कराने का सबसे बड़ा स्रोत है, जो घर की स्थिति; सुविधाएं और परिसंपत्तियां, जनसांख्यिकीय, धर्म, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, भाषा, साक्षरता और शिक्षा, आर्थिक कार्यकलाप, प्रवासन और उर्वरता जैसे अलग-अलग मानकों पर सूक्ष्‍म स्‍तर डेटा प्रदान करता है। जनगणना अधिनियम, 1948 और जनगणना नियमावली, 1990 जनगणना के संचालन के लिए कानूनी संरचना प्रदान करते हैं।

राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के नये उद्देश्य

सहकारिता मंत्रालय ने राज्यों/संघ राज्यक्षेत्रों के सहकारी समिति अधिनियमों में मौजूद किसी कानूनी या नियामक कमी की पहचान नहीं की है जिसके कारण राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2025 के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है।

जब कभी राज्‍य/संघ राज्‍यक्षेत्र राज्‍य-स्‍तरीय सहकारी डेटाबेस के राष्‍ट्रीय सहकारी डेटाबेस (NCD) के साथ एकीकरण के लिए तैयार होते हैं, तब उन्‍हें आवश्‍यक तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है।

सहकारिता मंत्रालय ने राज्‍यों के लिए सहकारी समितियों का डाटा एनसीडी पोर्टल से प्राप्‍त करने हेतु एक मानक API विकसित किया और दिनांक 27.05.2025 को मानक API विनिर्देशन दस्‍तावेज एवं डेटाबेस schema को साझा किया है । तदुपरांत, आरसीएस अनुप्रयोगों से एनसीडी पोर्टल पर लाइव, इवेंट-ड्रिवन डाटा पुशिंग के लिए पुश APIs को विकसित किया गया और सभी संबंधित दस्‍तावेजों और मानक प्रचालन प्रक्रियाओं को राज्‍यों के साथ दिनांक 22.09.2025 को साझा किया गया । RCS कंप्‍यूटरीकरण पूर्ण होने और API एकीकरण की परामर्शिका के साथ एक व्‍यापक चेकलिस्‍ट भी दिनांक 14.11.2025 को जारी की गई । राजस्‍थान, एनसीडी पोर्टल के साथ API एकीकरण का कार्य पूरा कर चुका है । एकीकरण योजना के अनुसार, सफल दो-तरफा एकीकरण और सहकारी डाटा के सिंक्रोनाइजेंशन के लिए राज्‍यों/संघ राज्‍यक्षेत्रों को रिवर्स/पुल API का विकास और संपूर्ण RCS कंप्‍यूटरीकरण सुनिश्चित करना आवश्‍यक है ।

सहकारी क्षेत्र में महिलाओं, युवाओं, अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों और कमजोर वर्ग  की अधिक प्रतिभागिता सुनिश्चित करने के लिए निम्‍नलिखित कदम उठाए गए हैं –

  1. मौजूदा कानून के अनुसमर्थन और सतानवेवां संविधान संशोधन के उपबंधों की अंतर्विष्‍टी द्वारा बहुराज्‍य सहकारी समितियों में शासन सशक्‍त करने, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने तथा निर्वाचन प्रक्रिया में सुधार, आदि के लिए बहुराज्‍य सहकारी सोसाइटी (संशोधन) अधिनियम और नियम, 2023 को क्रमश: दिनांक 03.08.2023 और 04.08.2023 को अधिसूचित किया गया ।   

बहुराज्‍य सहकारी समितियों में महिलाओं और अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों की प्रतिभागिता बढ़ाने के लिए बहुराज्‍य सहकारी समितियों के बोर्ड में महिलाओं के लिए दो सीट और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए एक सीट पर आरक्षण का उपबंध किया गया है ।

  1. महिलाओं और अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों को पर्याप्‍त प्रतिनिधित्‍व देकर प्राथमिक कृषि क्रेडिट समितियों (पैक्‍स) की सदस्‍यता को भी अधिक समावेशी और व्‍यापक बनाया गया है । अब तक, 32 राज्‍यों/संघ राज्‍यक्षेत्रों ने आदर्श उपविधियां अपना ली हैं या उनकी मौजूदा उपविधियां, आदर्श उपविधियों के अनुरूप हैं ।
  2. राष्‍ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC), सहकारी क्षेत्र में महिलाओं, युवाओं, अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों और अन्‍य कमजोर वर्गों की प्रतिभागिता बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठा रहा है जिनका ब्‍योरा निम्‍नानुसार है:

NCDC द्वारा नंदिनी सहकार, स्‍वयं शक्ति सहकार, आयुष्‍मान सहकार और युवा सहकार जैसी समर्पित योजनाएं चलाई जा रही हैं जो महिला-नेतृत्‍व वाली, युवा नेतृत्‍व वाली, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और नवोन्‍मेषी सहकारी समितियों को रियायती वित्तीयन, ब्‍याज अनुदान और स्‍टार्ट-अप सहयोग प्रदान करती हैं । इनका ब्‍योरा निम्‍नानुसार है-

वर्ष 2024-25 के दौरान, महिला सहकारी समितियों को ₹1,355.61 करोड़ की सहायता प्रदान की गई जिससे 41 लाख से अधिक महिला सदस्‍य लाभान्वित हुईं । दिनांक 31.03.2025 के अनुसार, एनसीडीसी ने महिलाओं द्वारा विशिष्‍ट रूप से प्रवर्तित सहकारी सम‍ितियों के विकास के लिए संचयी रूप से ₹7,781.97 करोड़ की वित्तीय सहायता का संवितरण किया है ।

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति सहकारी समितियों की योजनाएं उन्‍हें विपणन, कार्यशील पूंजी और अवसंरचना निर्माण में सहायता प्रदान करती हैं । वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान अनुसूचित जाति सहकारी समितियों को ₹0.18 करोड़ की धनराशि और अनुसूचित जनजाति सहकारी समितियों को ₹29.63 करोड़ की धनराशि का संवितरण किया गया । दिनांक 31.03.2025 के अनुसार, अनुसूचित जाति सहकारी समितियों को ₹323.52 करोड़ और अनुसूचित जनजाति सहकारी समितियों को ₹5308.02 करोड़ का संचयी संवितरण किया गया।

इसके अलावा, एनसीडीसी मात्स्यिकी, पशुधन, हथकरघा, रेशम उत्‍पादन और श्रमिक क्षेत्रों में दुर्बल वर्ग की सहकारी समितियों को सहायता प्रदान करता है जिससे लाखों सदस्‍य लाभान्वित होते हैं, जिनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला सदस्‍य भी शामिल हैं । एनसीडीसी ने महिला सशक्‍तीकरण, सहकारी समितियों के डिजिटलीकरण और ग्रामीण स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल पर विशेष बल देते हुए सहकारी क्षेत्र की उभरती जरूरतों के साथ संरेखित क्षेत्र विशिष्‍ट योजनाओं और केंद्रीकृत उत्‍पादों की शुरूआत की है ।

मंत्रिपरिषद के निर्णय : दिनांक – 10 दिसम्बर 2025

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में आज यहां सिविल लाईन स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में आयोजित कैबिनेट की बैठक में अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए – 

1. मंत्रिपरिषद ने आत्मसमर्पित नक्सलियों के विरुद्ध पंजीबद्ध आपराधिक प्रकरणों के निराकरण/वापसी संबंधी प्रक्रिया को अनुमोदित किया है। 

         मंत्रिपरिषद ने आत्मसमर्पित नक्सलियों के विरुद्ध दर्ज प्रकरणों की समीक्षा एवं परीक्षण के लिए, जिन्हें न्यायालय से वापस लिया जाना है, मंत्रिपरिषद उप समिति के गठन को स्वीकृति दी है। यह समिति परीक्षण उपरांत प्रकरणों को मंत्रिपरिषद के समक्ष प्रस्तुत करेगी। यह निर्णय छत्तीसगढ़ शासन द्वारा जारी छत्तीसगढ़ नक्सलवादी आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत पुनर्वास नीति-2025 के प्रावधानों के अनुरूप है, जिसके अंतर्गत आत्मसमर्पित नक्सलियों के अच्छे आचरण तथा नक्सलवाद उन्मूलन में दिए गए योगदान को ध्यान में रखकर उनके विरुद्ध दर्ज प्रकरणों के निराकरण पर विचार का प्रावधान है।

        आत्मसमर्पित नक्सलियों के प्रकरण वापसी की प्रक्रिया के लिए जिला स्तरीय समिति के गठन का प्रावधान किया गया है। यह समिति आत्मसमर्पित नक्सली के अपराधिक प्रकरणों की वापसी के लिए रिपोर्ट पुलिस मुख्यालय को प्रस्तुत करेगी। पुलिस मुख्यालय अभिमत सहित प्रस्ताव भेजेगा। शासन द्वारा विधि विभाग का अभिमत प्राप्त कर मामलों को मंत्रिपरिषद उप समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। उपसमिति द्वारा अनुशंसित प्रकरणों को अंतिम अनुमोदन हेतु मंत्रिपरिषद के समक्ष रखा जाएगा। केंद्रीय अधिनियम अथवा केंद्र सरकार से संबंधित प्रकरणों के लिए भारत सरकार से आवश्यक अनुज्ञा प्राप्त की जाएगी। अन्य प्रकरणों को न्यायालय में लोक अभियोजन अधिकारी के माध्यम से वापसी की प्रक्रिया हेतु जिला दण्डाधिकारी को प्रेषित किया जाएगा।

2. मंत्रिपरिषद द्वारा राज्य के विभिन्न कानूनों को समयानुकूल और नागरिकों के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से 14 अधिनियमों में संशोधन हेतु छत्तीसगढ़ जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) (द्वितीय) विधेयक, 2025 के प्रारूप का अनुमोदन किया गया। 

       उल्लेखनीय है कि कई अधिनियमों में उल्लंघन पर जुर्माना या कारावास के प्रावधान होने से न्यायिक प्रक्रिया लंबी हो जाती है, जिससे आम नागरिक और व्यवसाय दोनों अनावश्यक रूप से प्रभावित होते हैं। ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस और ईज ऑफ लिविंग को बढ़ावा देने के लिए इन प्रावधानों का सरलीकरण आवश्यक है। इससे पहले, राज्य सरकार द्वारा 8 अधिनियमों के 163 प्रावधानों में संशोधन करते हुए छत्तीसगढ़ जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) अधिनियम, 2025 अधिसूचित किया गया है। अब 11 विभागों के 14 अधिनियमों के 116 प्रावधानों को भी सरल और अधिक प्रभावी बनाने के लिए यह विधेयक लाया जाएगा। 

        इस विधेयक में छोटे उल्लंघनों के लिए प्रशासकीय शास्ति का प्रावधान रखा गया है, जिससे मामलों का त्वरित निपटारा होगा, न्यायालयों का बोझ कम होगा और नागरिकों को तेजी से राहत मिल सकेगी। साथ ही, कई अधिनियमों में दंड राशि लंबे समय से अपरिवर्तित होने के कारण प्रभावी कार्यवाही बाधित होती थी, इस विधेयक से वह कमी भी दूर होगी। इन संशोधनों से सुशासन को बढ़ावा मिलेगा।

         उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जहां जन विश्वास विधेयक का द्वितीय संस्करण लाया जा रहा है। 

3. मंत्रिपरिषद की बैठक में प्रथम अनुपूरक अनुमान वर्ष 2025-2026 का विधानसभा में उपस्थापन बावत् छत्तीसगढ़ विनियोग विधेयक, 2025 का अनुमोदन किया गया।

विहिप केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल की बैठक में देशभर से जुटे लगभग 300 संत

नई दिल्ली, दिसंबर 9, 2025। विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की द्वि-दिवसीय बैठक मंगलवार सायंकाल 3 बजे इंद्रप्रस्थ नगरी (दिल्ली) के पंजाबी बाग में प्रारंभ हुई। ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज की अध्यक्षता में प्रारंभ हुए उद्घाटन सत्र में विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार जी ने हिन्दू समाज के समक्ष चुनौतियों के बारे में बताते हुए पूज्य संतों से विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन का आग्रह किया –

  • हिन्दू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्ति।
  • देश भर में धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं पर विराम हेतु प्रभावी उपाय।
  • धर्म स्वातंत्र्य कानून को संपूर्ण देश में एक समान रूप से लागू करना।
  • देश में बढ़ती जिहादी मानसिकता, कट्टरता और हिंसक घटनाएं।
  • सीमांत क्षेत्रों में बढ़ती सामाजिक समस्याओं और नशामुक्ति अभियान।
  • आगामी जनगणना में सभी हिन्दू अपना धर्म ‘हिन्दू’ ही लिखें।

बैठक में अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री पूज्य स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती जी ने कहा कि कुछ समूह आज जिहाद और आतंकी मानसिकता को उचित ठहराने का दुस्साहस कर रहे हैं। दिल्ली में हुए आतंकी हमले के आरोपी का समर्थन करने की प्रवृत्ति अत्यंत चिंताजनक है। उन्होंने मांग की कि देश की संसद कठोर और प्रभावी कानून लाए। उन्होंने देवालयों की सरकारी अधिग्रहण से मुक्ति तथा जनसंख्या नियंत्रण कानून की आवश्यकता पर भी बल दिया।

बंगाल से पधारे पूज्य संतों ने राज्य की गंभीर स्थिति पर चिंता व्यक्त की और कहा कि कट्टरपंथियों द्वारा सार्वजनिक रूप से दिए जा रहे जिहादी बयान, हिन्दुओं को धमकी व अत्याचार न सिर्फ बंगाल बल्कि सम्पूर्ण देश के लिए चेतावनी है।

सुधांशु जी महाराज ने राममंदिर निर्माण की 500 वर्षों की तपस्या और संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की असली ऊर्जा हमारे संतों और सांस्कृतिक परंपराओं में निहित है। आज समय की आवश्यकता है कि गुरुकुल, पुजारी परंपरा, आश्रम और संस्कार केंद्रों को सशक्त बनाया जाए तथा सनातन समाज अपनी सांस्कृतिक शक्ति के लिए संगठित हो।

बैठक में पूज्य जगद्गुरु स्वामी राम कमलचार्य जी, अटल पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती जी महाराज, आचार्य महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी विशोकानंद जी महाराज, पूज्य स्वामी विवेकानंद जी महाराज, गीता मनीषी ज्ञानानंद जी महाराज, विहिप उपाध्यक्ष ओमप्रकाश सिंघल, संरक्षक दिनेश चंद्र, सह संगठन मंत्री विनायक राव व केन्द्रीय मंत्री अशोक तिवारी सहित देशभर से पधारे अनेक पूजनीय संत और विहिप पदाधिकारी उपस्थित रहे।

वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे – लोकसभा में प्रधानमंत्री के भाषण का मूल पाठ

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

मैं आपका और सदन के सभी माननीय सदस्यों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं कि हमने इस महत्वपूर्ण अवसर पर एक सामूहिक चर्चा का रास्ता चुना है, जिस मंत्र ने, जिस जय घोष ने देश की आजादी के आंदोलन को ऊर्जा दी थी, प्रेरणा दी थी, त्याग और तपस्या का मार्ग दिखाया था, उस वंदे मातरम का पुण्य स्मरण करना, इस सदन में हम सब का यह बहुत बड़ा सौभाग्य है। और हमारे लिए गर्व की बात है कि वंदे मातरम के 150 वर्ष निमित्त, इस ऐतिहासिक अवसर के हम साक्षी बना रहे हैं। एक ऐसा कालखंड, जो हमारे सामने इतिहास के अनगिनत घटनाओं को अपने सामने लेकर के आता है। यह चर्चा सदन की प्रतिबद्धता को तो प्रकट करेगी ही, लेकिन आने वाली पीढियां के लिए भी, दर पीढ़ी के लिए भी यह शिक्षा का कारण बन सकती है, अगर हम सब मिलकर के इसका सदुपयोग करें तो।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यह एक ऐसा कालखंड है, जब इतिहास के कई प्रेरक अध्याय फिर से हमारे सामने उजागर हुए हैं। अभी-अभी हमने हमारे संविधान के 75 वर्ष गौरवपूर्व मनाए हैं। आज देश सरदार वल्लभ भाई पटेल की और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती भी मना रहा है और अभी-अभी हमने गुरु तेग बहादुर जी का 350वां बलिदान दिवस भी बनाया है और आज हम वंदे मातरम की 150 वर्ष निमित्त सदन की एक सामूहिक ऊर्जा को, उसकी अनुभूति करने का प्रयास कर रहे हैं। वंदे मातरम 150 वर्ष की यह यात्रा अनेक पड़ावों से गुजरी है।

लेकिन आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम को जब 50 वर्ष हुए, तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था और वंदे मातरम के 100 साल हुए, तब देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। जब वंदे मातरम 100 साल के अत्यंत उत्तम पर्व था, तब भारत के संविधान का गला घोट दिया गया था। जब वंदे मातरम 100 साल का हुआ, तब देशभक्ति के लिए जीने-मरने वाले लोगों को जेल के सलाखों के पीछे बंद कर दिया गया था। जिस वंदे मातरम के गीत ने देश को आजादी की ऊर्जा दी थी, उसके जब 100 साल हुए, तो दुर्भाग्य से एक काला कालखंड हमारे इतिहास में उजागर हो गया। हम लोकतंत्र के (अस्पष्ट) गिरोह में थे।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

150 वर्ष उस महान अध्याय को, उस गौरव को पुनः स्थापित करने का अवसर है और मैं मानता हूं, सदन ने भी और देश ने भी इस अवसर को जाने नहीं देना चाहिए। यही वंदे मातरम है, जिसने 1947 में देश को आजादी दिलाई। स्वतंत्रता संग्राम का भावनात्मक नेतृत्व इस वंदे मातरम के जयघोष में था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आपके समक्ष आज जब मैं वंदे मातरम 150 निमित्त चर्चा के लिए आरंभ करने खड़ा हुआ हूं। यहां कोई पक्ष प्रतिपक्ष नहीं है, क्योंकि हम सब यहां जो बैठे हैं, एक्चुअली हमारे लिए ऋण स्वीकार करने का अवसर है कि जिस वंदे मातरम के कारण लक्ष्यावादी लोग आजादी का आंदोलन चला रहे थे और उसी का परिणाम है कि आज हम सब यहां बैठे हैं और इसलिए हम सभी सांसदों के लिए, हम सभी जनप्रतिनिधियों के लिए वंदे मातरम के ऋण स्वीकार करने का यह पावन पर्व है। और इससे हम प्रेरणा लेकर के वंदे मातरम की जिस भावना ने देश की आजादी का जंग लड़ा, उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम पूरा देश एक स्वर से वंदे मातरम बोलकर आगे बढ़ा, फिर से एक बार अवसर है कि आओ, हम सब मिलकर चलें, देश को साथ लेकर चलें, आजादी का दीवानों ने जो सपने देखे थे, उन सपनों को पूरा करने के लिए वंदे मातरम 150 हम सब की प्रेरणा बने, हम सब की ऊर्जा बने और देश आत्मनिर्भर बने, 2047 में विकसित भारत बनाकर के हम रहें, इस संकल्प को दोहराने के लिए यह वंदे मातरम हमारे लिए एक बहुत बड़ा अवसर है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

दादा तबीयत तो ठीक है ना! नहीं कभी-कभी इस उम्र में हो जाता है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम की इस यात्रा की शुरुआत बंकिम चंद्र जी ने 1875 में की थी और गीत ऐसे समय लिखा गया था, जब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज सल्तनत बौखलाई हुई थी। भारत पर भांति-भांति के दबाव डाल रहे थी, भांति-भांति के ज़ुल्म कर रही थी और भारत के लोगों को मजबूर किया जा रहा था अंग्रेजों के द्वारा और उस समय उनका जो राष्ट्रीय गीत था, God Save The Queen, इसको भारत में घर-घर पहुंचाने का एक षड्यंत्र चल रहा था। ऐसे समय बंकिम दा ने चुनौती दी और ईट का जवाब पत्थर से दिया और उसमें से वंदे मातरम का जन्म हुआ। इसके कुछ वर्ष बाद, 1882 में जब उन्होंने आनंद मठ लिखा, तो उस गीत का उसमें समावेश किया गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम ने उस विचार को पुनर्जीवित किया था, जो हजारों वर्ष से भारत की रग-रग में रचा-बसा था। उसी भाव को, उसी संस्कारों को, उसी संस्कृति को, उसी परंपरा को उन्होंने बहुत ही उत्तम शब्दों में, उत्तम भाव के साथ, वंदे मातरम के रूप में हम सबको बहुत बड़ी सौगात दी थी। वंदे मातरम, यह सिर्फ केवल राजनीतिक आजादी की लड़ाई का मंत्र नहीं था, सिर्फ हम अंग्रेज जाएं और हम खड़े हो जाएं, अपनी राह पर चलें, इतनी मात्र तक वंदे मातरम प्रेरित नहीं करता था, वो उससे कहीं आगे था। आजादी की लड़ाई इस मातृभूमि को मुक्त कराने का भी जंग था। अपनी मां भारती को उन बेड़ियों से मुक्ति दिलाने का एक पवित्र जंग था और वंदे मातरम की पृष्ठभूमि हम देखें, उसके संस्कार सरिता देखें, तो हमारे यहां वेद काल से एक बात बार-बार हमारे सामने आई है। जब वंदे मातरम कहते हैं, तो वही वेद काल की बात हमें याद आती है। वेद काल से कहा गया है “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” अर्थात यह भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूं।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यही वह विचार है, जिसको प्रभु श्री राम ने भी लंका के वैभव को छोड़ते हुए कहा था “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”। वंदे मातरम, यही महान सांस्कृतिक परंपरा का एक आधुनिक अवतार है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

बंकिम दा ने जब वंदे मातरम की रचना की, तो स्वाभाविक ही वह स्वतंत्रता आंदोलन का स्वर बन गया। पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण वंदे, मातरम हर भारतीय का संकल्प बन गया। इसलिए वंदे मातरम की स्‍तुति में लिखा गया था, “मातृभूमि स्वतंत्रता की वेदिका पर मोदमय, मातृभूमि स्वतंत्रता की वेदिका पर मोदमय, स्वार्थ का बलिदान है, ये शब्द हैं वंदे मातरम, है सजीवन मंत्र भी, यह विश्व विजयी मंत्र भी, शक्ति का आह्वान है, यह शब्द वंदे मातरम। उष्ण शोणित से लिखो, वक्‍तस्‍थलि को चीरकर वीर का अभिमान है, यह शब्द वंदे मातरम।”

आदरणीय अध्यक्ष जी,

कुछ दिन पूर्व, जब वंदे मातरम 150 का आरंभ हो रहा था, तो मैंने उस आयोजन में कहा था, वंदे मातरम हजारों वर्ष की सांस्‍कृतिक ऊर्जा भी थी। उसमें आजादी का जज्बा भी था और आजाद भारत का विजन भी था। अंग्रेजों के उस दौर में एक फैशन हो गई थी, भारत को कमजोर, निकम्मा, आलसी, कर्महीन इस प्रकार भारत को जितना नीचा दिखा सकें, ऐसी एक फैशन बन गई थी और उसमें हमारे यहां भी जिन्होंने तैयार किए थे, वह लोग भी वही भाषा बोलते थे। तब बंकिम दा ने उस हीन भावना को भी झंकझोरने के लिए और सामर्थ्य का परिचय कराने के लिए, वंदे मातरम के भारत के सामर्थ्यशाली रूप को प्रकट करते हुए, आपने लिखा था, त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी। नमामि त्वां नमामि कमलाम्, अमलाम् अतुलां सुजलां सुफलां मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ अर्थात भारत माता ज्ञान और समृद्धि की देवी भी हैं और दुश्मनों के सामने अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली चंडी भी हैं।

अध्यक्ष जी,

यह शब्द, यह भाव, यह प्रेरणा, गुलामी की हताशा में हम भारतीयों को हौसला देने वाले थे। इन वाक्यों ने तब करोड़ों देशवासियों को यह एहसास कराया की लड़ाई किसी जमीन के टुकड़े के लिए नहीं है, यह लड़ाई सिर्फ सत्ता के सिंहासन को कब्जा करने के लिए नहीं है, यह गुलामी की बेड़ियों को मुक्त कर हजारों साल की महान जो परंपराएं थी, महान संस्कृति, जो गौरवपूर्ण इतिहास था, उसको फिर से पुनर्जन्म कराने का संकल्प इसमें है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम, इसका जो जन-जन से जुड़ाव था, यह हमारे स्वतंत्रता संग्राम के एक लंबी गाथा अभिव्यक्त होती है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जब भी जैसे किसी नदी की चर्चा होती है, चाहे सिंधु हो, सरस्वती हो, कावेरी हो, गोदावरी हो, गंगा हो, यमुना हो, उस नदी के साथ एक सांस्कृतिक धारा प्रवाह, एक विकास यात्रा का धारा प्रवाह, एक जन-जीवन की यात्रा का प्रवाह, उसके साथ जुड़ जाता है। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि आजादी जंग के हर पड़ाव, वो पूरी यात्रा वंदे मातरम की भावनाओं से गुजरता था। उसके तट पर पल्लवित होता था, ऐसा भाव काव्य शायद दुनिया में कभी उपलब्ध नहीं होगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

अंग्रेज समझ चुके थे कि 1857 के बाद लंबे समय तक भारत में टिकना उनके लिए मुश्किल लग रहा था और जिस प्रकार से वह अपने सपने लेकर के आए थे, तब उनको लगा कि जब तक, जब तक भारत को बाटेंगे नहीं, जब तक भारत को टुकडों में नहीं बाटेंगे, भारत में ही लोगों को एक-दूसरे से लड़ाएंगे नहीं, तब तक यहां राज करना मुश्किल है और अंग्रेजों ने बाटों और राज करो, इस रास्ते को चुना और उन्होंने बंगाल को इसकी प्रयोगशाला बनाया क्यूंकि अंग्रेज़ भी जानते थे, वह एक वक्त था जब बंगाल का बौद्धिक सामर्थ्‍य देश को दिशा देता था, देश को ताकत देता था, देश को प्रेरणा देता था और इसलिए अंग्रेज भी चाहते थे कि बंगाल का यह जो सामर्थ्‍य है, वह पूरे देश की शक्ति का एक प्रकार से केंद्र बिंदु है। और इसलिए अंग्रेजों ने सबसे पहले बंगाल के टुकड़े करने की दिशा में काम किया। और अंग्रेजों का मानना था कि एक बार बंगाल टूट गया, तो यह देश भी टूट जाएगा और वो यावच चन्द्र-दिवाकरौ राज करते रहेंगे, यह उनकी सोच थी। 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, लेकिन जब अंग्रेजों ने 1905 में यह पाप किया, तो वंदे मातरम चट्टान की तरह खड़ा रहा। बंगाल की एकता के लिए वंदे मातरम गली-गली का नाद बन गया था और वही नारा प्रेरणा देता था। अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन के साथ ही भारत को कमजोर करने के बीज और अधिक बोने की दिशा पकड़ ली थी, लेकिन वंदे मातरम एक स्वर, एक सूत्र के रूप में अंग्रेजों के लिए चुनौती बनता गया और देश के लिए चट्टान बनता गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

बंगाल का विभाजन तो हुआ, लेकिन एक बहुत बड़ा स्वदेशी आंदोलन खड़ा हुआ और तब वंदे मातरम हर तरफ गूंज रहा था। अंग्रेज समझ गए थे कि बंगाल की धरती से निकला, बंकिम दा का यह भाव सूत्र, बंकित बाबू बोलें अच्छा थैंक यू थैंक यू थैंक यू आपकी भावनाओं का मैं आदर करता हूं। बंकिम बाबू ने, बंकिम बाबू ने थैंक यू दादा थैंक यू, आपको तो दादा कह सकता हूं ना, वरना उसमें भी आपको ऐतराज हो जाएगा। बंकिम बाबू ने यह जो भाव विश्व तैयार किया था, उनके भाव गीत के द्वारा, उन्होंने अंग्रेजों को हिला दिया और अंग्रेजों ने देखिए कितनी कमजोरी होगी और इस गीत की ताकत कितनी होगी, अंग्रेजों ने उसको कानूनी रूप से प्रतिबंध लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा था। गाने पर सजा, छापने पर सजा, इतना ही नहीं, वंदे मातरम शब्द बोलने पर भी सजा, इतने कठोर कानून लागू कर दिए गए थे। हमारे देश की आजादी के आंदोलन में सैकड़ों महिलाओं ने नेतृत्व किया, लक्ष्यावधि महिलाओं ने योगदान दिया। एक घटना का मैं जिक्र करना चाहता हूं, बारीसाल, बारीसाल में वंदे मातरम गाने पर सर्वाधिक जुल्म हुए थे। वो बारीसाल आज भारत का हिस्सा नहीं रहा है और उस समय बारीसाल के हमारे माताएं, बहने, बच्चे मैदान उतरे थे, वंदे मातरम के स्वाभिमान के लिए, इस प्रतिबंध के विरोध में लड़ाई के मैदान में उतरी थी और तब बारीसाल कि यह वीरांगना श्रीमती सरोजिनी घोष, जिन्होंने उस जमाने में वहां की भावनाओं को देखिए और उन्होंने कहा था की वंदे मातरम यह जो प्रतिबंध लगा है, जब तक यह प्रतिबंध नहीं हटता है, मैं अपनी चूड़ियां जो पहनती हूं, वो निकाल दूंगी। भारत में वह एक जमाना था, चूड़ी निकालना यानी महिला के जीवन की एक बहुत बड़ी घटना हुआ करती थी, लेकिन उनके लिए वंदे मातरम वह भावना थी, उन्होंने अपनी सोने की चूड़ियां, जब तक वंदे मातरम प्रतिबंध नहीं हटेगा, मैं दोबारा नहीं धारण करूंगी, ऐसा बड़ा व्रत ले लिया था। हमारे देश के बालक भी पीछे नहीं रहे थे, उनको कोड़े की सजा होती थी, छोटी-छोटी उम्र में उनको जेल में बंद कर दिया जाता था और उन दिनों खास करके बंगाल की गलियों में लगातार वंदे मातरम के लिए प्रभात फेरियां निकलती थी। अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था और उस समय एक गीत गूंजता था बंगाल में जाए जाबे जीवोनो चोले, जाए जाबे जीवोनो चोले, जोगोतो माझे तोमार काँधे वन्दे मातरम बोले (In Bengali) अर्थात हे मां संसार में तुम्हारा काम करते और वंदे मातरम कहते जीवन भी चला जाए, तो वह जीवन भी धन्य है, यह बंगाल की गलियों में बच्चे कह रहे थे। यह गीत उन बच्चों की हिम्मत का स्वर था और उन बच्चों की हिम्मत ने देश को हिम्मत दी थी। बंगाल की गलियों से निकली आवाज देश की आवाज बन गई थी। 1905 में हरितपुर के एक गांव में बहुत छोटी-छोटी उम्र के बच्चे, जब वंदे मातरम के नारे लगा रहे थे, अंग्रेजों ने बेरहमी से उन पर कोड़े मारे थे। हर एक प्रकार से जीवन और मृत्यु के बीच लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। इतना अत्याचार हुआ था। 1906 में नागपुर में नील सिटी हाई स्कूल के उन बच्चों पर भी अंग्रेजों ने ऐसे ही जुल्म किए थे। गुनाह यही था कि वह एक स्वर से वंदे मातरम बोल करके खड़े हो गए थे। उन्होंने वंदे मातरम के लिए, मंत्र का महात्म्य अपनी ताकत से सिद्ध करने का प्रयास किया था। हमारे जांबाज सपूत बिना किसी डर के फांसी के तख्त पर चढ़ते थे और आखिरी सांस तक वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम, यही उनका भाव घोष रहता था। खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, रोशन सिंह, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रामकृष्ण विश्वास अनगिनत जिन्होंने वंदे मातरम कहते-कहते फांसी के फंदे को अपने गले पर लगाया था। लेकिन देखिए यह अलग-अलग जेलों में होता था, अलग-अलग इलाकों में होता था। प्रक्रिया करने वाले चेहरे अलग थे, लोग अलग थे। जिन पर जुल्म हो रहा था, उनकी भाषा भी अलग थी, लेकिन एक भारत, श्रेष्ठ भारत, इन सबका मंत्र एक ही था, वंदे मातरम। चटगांव की स्वराज क्रांति जिन युवाओं ने अंग्रेजों को चुनौती दी, वह भी इतिहास के चमकते हुए नाम हैं। हरगोपाल कौल, पुलिन विकाश घोष, त्रिपुर सेन इन सबने देश के लिए अपना बलिदान दिया। मास्टर सूर्य सेन को 1934 में जब फांसी दी गई, तब उन्होंने अपने साथियों को एक पत्र लिखा और पत्र में एक ही शब्द की गूंज थी और वह शब्द था वंदे मातरम।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

हम देशवासियों को गर्व होना चाहिए, दुनिया के इतिहास में कहीं पर भी ऐसा कोई काव्य नहीं हो सकता, ऐसा कोई भाव गीत नहीं हो सकता, जो सदियों तक एक लक्ष्य के लिए कोटि-कोटि जनों को प्रेरित करता हो और जीवन आहूत करने के लिए निकल पड़ते हों, दुनिया में ऐसा कोई भाव गीत नहीं हो सकता, जो वंदे मातरम है। पूरे विश्व को पता होना चाहिए कि गुलामी के कालखंड में भी ऐसे लोग हमारे यहां पैदा होते थे, जो इस प्रकार के भाव गीत की रचना कर सकते थे। यह विश्व के लिए अजूबा है, हमें गर्व से कहना चाहिए, तो दुनिया भी मनाना शुरू करेगी। यह हमारी स्वतंत्रता का मंत्र था, यह बलिदान का मंत्र था, यह ऊर्जा का मंत्र था, यह सात्विकता का मंत्र था, यह समर्पण का मंत्र था, यह त्याग और तपस्या का मंत्र था, संकटों को सहने का सामर्थ्य देने का यह मंत्र था और वह मंत्र वंदे मातरम था। और इसलिए गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने लिखा था, उन्होंने लिखा था, एक कार्ये सोंपियाछि सहस्र जीवन—वन्दे मातरम् (In Bengali) अर्थात एक सूत्र में बंधे हुए सहस्त्र मन, एक ही कार्य में अर्पित सहस्त्र जीवन, वंदे मातरम। यह रविंद्रनाथ टैगोर जी ने लिखा था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

उसी कालखंड में वंदे मातरम की रिकॉर्डिंग दुनिया के अलग-अलग भागों में पहुंची और लंदन में जो क्रांतिकारियों की एक प्रकार से तीर्थ भूमि बन गया था, वह लंदन का इंडिया हाउस वीर सावरकर जी ने वहां वंदे मातरम गीत गाया और वहां यह गीत बार-बार गूंजता था। देश के लिए जीने-मरने वालों के लिए वह एक बहुत बड़ा प्रेरणा का अवसर रहता था। उसी समय विपिन चंद्र पाल और महर्षि अरविंद घोष, उन्होंने अखबार निकालें, उस अखबार का नाम भी उन्होंने वंदे मातरम रखा। यानी डगर-डगर पर अंग्रेजों के नींद हराम करने के लिए वंदे मातरम काफी हो जाता था और इसलिए उन्होंने इस नाम को रखा। अंग्रेजों ने अखबारों पर रोक लगा दी, तो मैडम भीकाजी कामा ने पेरिस में एक अखबार निकाला और उसका नाम उन्होंने वंदे मातरम रखा!

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम ने भारत को स्वावलंबन का रास्ता भी दिखाया। उस समय माचिस के डिबिया, मैच बॉक्स, वहां से लेकर के बड़े-बड़े शिप उस पर भी वंदे मातरम लिखने की परंपरा बन गई और बाहरी कंपनियों को चुनौती देने का एक माध्यम बन गया, स्वदेशी का एक मंत्र बन गया। आजादी का मंत्र स्वदेशी के मंत्र की तरह विस्तार होता गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मैं एक और घटना का जिक्र भी करना चाहता हूं। 1907 में जब वी ओ चिदंबरम पिल्लई, उन्होंने स्वदेशी कंपनी का जहाज बनाया, तो उस पर भी लिखा था वंदेमातरम। राष्ट्रकवि सुब्रमण्यम भारती ने वंदे मातरम को तमिल में अनुवाद किया, स्तुति गीत लिखे। उनके कई तमिल देशभक्ति गीतों में वंदे मातरम की श्रद्धा साफ-साफ नजर आती है। शायद सभी लोगों को लगता है, तमिलनाडु के लोगों को पता हो, लेकिन सभी लोगों को यह बात का पता ना हो कि भारत का ध्वज गीत वी सुब्रमण्यम भारती ने ही लिखा था। उस ध्वज गीत का वर्णन जिस पर वंदे मातरम लिखा हुआ था, तमिल में इस ध्वज गीत का शीर्षक था। Thayin manikodi pareer, thazhndu panintu Pukazhnthida Vareer! (In Tamil) अर्थात देश प्रेमियों दर्शन कर लो, सविनय अभिनंदन कर लो, मेरी मां की दिव्य ध्वजा का वंदन कर लो।

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

मैं आज इस सदन में वंदे मातरम पर महात्मा गांधी की भावनाएं क्या थी, वह भी रखना चाहता हूं। दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित एक साप्ताहिक पत्रिका निकलती थी, इंडियन ओपिनियन और और इस इंडियन ओपिनियन में महात्मा गांधी ने 2 दिसंबर 1905 जो लिखा था, उसको मैं कोट कर रहा हूं। उन्होंने लिखा था, महात्मा गांधी ने लिखा था, “गीत वंदे मातरम जिसे बंकिम चंद्र ने रचा है, पूरे बंगाल में अत्यंत लोकप्रिय हो गया है, स्वदेशी आंदोलन के दौरान बंगाल में विशाल सभाएं हुईं, जहां लाखों लोग इकट्ठा हुए और बंकिम का यह गीत गाया।” गांधी जी आगे लिखते हैंं, यह बहुत महत्वपूर्ण है, वह लिखते हैं यह 1905 की बात है। उन्होंने लिखा, “यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया है, जैसे यह हमारा नेशनल एंथम बन गया है। इसकी भावनाएं महान हैं और यह अन्य राष्ट्रों के गीतों से अधिक मधुर है। इसका एकमात्र उद्देश्य हम में देशभक्ति की भावना जगाना है। यह भारत को मां के रूप में देखता है और उसकी स्तुति करता है।”

अध्यक्ष जी,

जो वंदे मातरम 1905 में महात्मा गांधी को नेशनल एंथम के रूप में दिखता था, देश के हर कोने में, हर व्यक्ति के जीवन में, जो भी देश के लिए जीता-जागता, जिस देश के लिए जागता था, उन सबके लिए वंदे मातरम की ताकत बहुत बड़ी थी। वंदे मातरम इतना महान था, जिसकी भावना इतनी महान थी, तो फिर पिछली सदी में इसके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हुआ? वंदे मातरम के साथ विश्वासघात क्यों हुआ? यह अन्याय क्यों हुआ? वह कौन सी ताकत थी, जिसकी इच्छा खुद पूज्‍य बापू की भावनाओं पर भी भारी पड़ गई? जिसने वंदे मातरम जैसी पवित्र भावना को भी विवादों में घसीट दिया। मैं समझता हूं कि आज जब हम वंदे मातरम के 150 वर्ष का पर्व बना रहे हैं, यह चर्चा कर रहे हैं, तो हमें उन परिस्थितियों को भी हमारी नई पीडिया को जरूर बताना हमारा दायित्व है। जिसकी वजह से वंदे मातरम के साथ विश्वासघात किया गया। वंदे मातरम के प्रति मुस्लिम लीग की विरोध की राजनीति तेज होती जा रही थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्टूबर 1937 को वंदे मातरम के विरुद्ध का नारा बुलंद किया। फिर कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा। बजाय कि नेहरू जी मुस्लिम लीग के आधारहीन बयानों को तगड़ा जवाब देते, करारा जवाब देते, मुस्लिम लीग के बयानों की निंदा करते और वंदे मातरम के प्रति खुद की भी और कांग्रेस पार्टी की भी निष्ठा को प्रकट करते, लेकिन उल्टा हुआ। वो ऐसा क्यों कर रहे हैं, वह तो पूछा ही नहीं, न जाना, लेकिन उन्होंने वंदे मातरम की ही पड़ताल शुरू कर दी। जिन्ना के विरोध के 5 दिन बाद ही 20 अक्टूबर को नेहरू जी ने नेताजी सुभाष बाबू को चिट्ठी लिखी। उस चिट्ठी में जिन्ना की भावना से नेहरू जी अपनी सहमति जताते हुए कि वंदे मातरम भी यह जो उन्होंने सुभाष बाबू को लिखा है, वंदे मातरम की आनंद मठ वाली पृष्ठभूमि मुसलमानों को इरिटेट कर सकती है। मैं नेहरू जी का क्वोट पढ़ता हूं, नेहरू जी कहते हैं “मैंने वंदे मातरम गीत का बैकग्राउंड पड़ा है।” नेहरू जी फिर लिखते हैं, “मुझे लगता है कि यह जो बैकग्राउंड है, इससे मुस्लिम भड़केंगे।”

साथियों,

इसके बाद कांग्रेस की तरफ से बयान आया कि 26 अक्टूबर से कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक कोलकाता में होगी, जिसमें वंदे मातरम के उपयोग की समीक्षा की जाएगी। बंकिम बाबू का बंगाल, बंकिम बाबू का कोलकाता और उसको चुना गया और वहां पर समीक्षा करना तय किया। पूरा देश हतप्रभ था, पूरा देश हैरान था, पूरे देश में देशभक्तों ने इस प्रस्ताव के विरोध में देश के कोने-कोने में प्रभात फेरियां निकालीं, वंदे मातरम गीत गाया लेकिन देश का दुर्भाग्य कि 26 अक्टूबर को कांग्रेस ने वंदे मातरम पर समझौता कर लिया। वंदे मातरम के टुकड़े करने के फैसले में वंदे मातरम के टुकड़े कर दिए। उस फैसले के पीछे नकाब ये पहना गया, चोला ये पहना गया, यह तो सामाजिक सद्भाव का काम है। लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेक दिए और मुस्लिम लीग के दबाव में किया और कांग्रेस का यह तुष्टीकरण की राजनीति को साधने का एक तरीका था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

तुष्टीकरण की राजनीति के दबाव में कांग्रेस वंदे मातरम के बंटवारे के लिए झुकी, इसलिए कांग्रेस को एक दिन भारत के बंटवारे के लिए झुकना पड़ा। मुझे लगता है, कांग्रेस ने आउटसोर्स कर दिया है। दुर्भाग्य से कांग्रेस के नीतियां वैसी की वैसी ही हैं और इतना ही नहीं INC चलते-चलते MMC हो गया है। आज भी कांग्रेस और उसके साथी और जिन-जिन के नाम के साथ कांग्रेस जुड़ा हुआ है सब, वंदे मातरम पर विवाद खड़ा करने की कोशिश करते हैं।

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

किसी भी राष्ट्र का चरित्र उसके जीवटता उसके अच्छे कालखंड से ज्यादा, जब चुनौतियों का कालखंड होता है, जब संकटों का कालखंड होता है, तब प्रकट होती हैं, उजागर होती हैं और सच्‍चे अर्थ में कसौटी से कसी जाती हैं। जब कसौटी का काल आता है, तब ही यह सिद्ध होता है कि हम कितने दृढ़ हैं, कितने सशक्त हैं, कितने सामर्थ्यवान हैं। 1947 में देश आजाद होने के बाद देश की चुनौतियां बदली, देश के प्राथमिकताएं बदली, लेकिन देश का चरित्र, देश की जीवटता, वही रही, वही प्रेरणा मिलती रही। भारत पर जब-जब संकट आए, देश हर बार वंदे मातरम की भावना के साथ आगे बढ़ा। बीच का कालखंड कैसा गया, जाने दो। लेकिन आज भी 15 अगस्त, 26 जनवरी की जब बात आती है, हर घर तिरंगा की बात आती है, चारों तरफ वो भाव दिखता है। तिरंगे झंडे फहरते हैं। एक जमाना था, जब देश में खाद्य का संकट आया, वही वंदे मातरम का भाव था, मेरे देश के किसानों के अन्‍न के भंडार भर दिए और उसके पीछे भाव वही है वंदे मातरम। जब देश की आजादी को कुचलना की कोशिश हुए, संविधान की पीठ पर छुरा घोप दिया गया, आपातकाल थोप दिया गया, यही वंदे मातरम की ताकत थी कि देश खड़ा हुआ और परास्त करके रहा। देश पर जब भी युद्ध थोपे गए, देश को जब भी संघर्ष की नौबत आई, यही वंद मातरम का भाव था, देश का जवान सीमाओं पर अड़ गया और मां भारती का झंडा लहराता रहा, विजय श्री प्राप्त करता रहा। कोरोना जैसा वैश्विक महासंकट आया, यही देश उसी भाव से खड़ा हुआ, उसको भी परास्त करके आगे बढ़ा।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यह राष्ट्र की शक्ति है, यह राष्ट्र को भावनाओं से जोड़ने वाला सामर्थ्‍यवान एक ऊर्जा प्रवाह है। यह चेतना परवाह है, यह संस्कृति की अविरल धारा का प्रतिबिंब है, उसका प्रकटीकरण है। यह वंदे मातरम हमारे लिए सिर्फ स्मरण करने का काल नहीं, एक नई ऊर्जा, नई प्रेरणा का लेने का काल बन जाए और हम उसके प्रति समर्पित होते चलें और मैंने पहले कहा हम लोगों पर तो कर्ज है वंदे मातरम का, वही वंदे मातरम है, जिसने वह रास्ता बनाया, जिस रास्ते से हम यहां पहुंचे हैं और इसलिए हमारा कर्ज बनता है। भारत हर चुनौतियों को पार करने में सामर्थ्‍य है। वंदे मातरम के भाव की वो ताकत है। वंदे मातरम यह सिर्फ गीत या भाव गीत नहीं, यह हमारे लिए प्रेरणा है, राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के लिए हमें झकझोरने वाला काम है और इसलिए हमें निरंतर इसको करते रहना होगा। हम आत्मनिर्भर भारत का सपना लेकर के चल रहे हैं, उसको पूरा करना है। वंदे मातरम हमारी प्रेरणा है। हम स्वदेशी आंदोलन को ताकत देना चाहते हैं, समय बदला होगा, रूप बदले होंगे, लेकिन पूज्य गांधी ने जो भाव व्यक्त किया था, उस भाव की ताकत आज भी हमें मौजूद है और वंदे मातरम हमें जोड़ता है। देश के महापुरुषों का सपना था स्वतंत्र भारत का, देश की आज की पीढ़ी का सपना है समृद्ध भारत का, आजाद भारत के सपने को सींचा था वंदे भारत की भावना ने, वंदे भारत की भावना ने, समृद्ध भारत के सपने को सींचेगा वंदे मातरम के भवना, उसी भावनाओं को लेकर के हमें आगे चलना है। और हमें आत्मनिर्भर भारत बनाना, 2047 में देश विकसित भारत बन कर रहे। अगर आजादी के 50 साल पहले कोई आजाद भारत का सपना देख सकता था, तो 25 साल पहले हम भी तो समृद्ध भारत का सपना देख सकते हैं, विकसित भारत का सपना देख सकते हैं और इस सपने के लिए अपने आप को खपा भी सकते हैं। इसी मंत्र और इसी संकल्प के साथ वंदे मातरम हमें प्रेरणा देता रहे, वंदे मातरम का हम ऋण स्वीकार करें, वंदे मातरम की भावनाओं को लेकर के चलें, देशवासियों को साथ लेकर के चलें, हम सब मिलकर के चलें, इस सपने को पूरा करें, इस एक भाव के साथ यह चर्चा का आज आरंभ हो रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि दोनों सदनों में देश के अंदर वह भाव भरने वाला कारण बनेगा, देश को प्रेरित करने वाला कारण बनेगा, देश की नई पीढ़ी को ऊर्जा देने का कारण बनेगा, इन्हीं शब्दों के साथ आपने मुझे अवसर दिया, मैं आपका बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

राष्ट्र निर्माण में युवा सक्रिय भूमिका निभाएं – दत्तात्रेय होसबाले जी

ऊधमपुर, 07 दिसम्बर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में रविवार को रिवायत हॉल में ”100 वर्ष की यात्रा और भविष्य की दिशा” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा, राष्ट्र निर्माण में युवा सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने भारत के गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराया और बताया कि किस प्रकार हमारे पूर्वजों ने विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया और हमारी सभ्यता एवं सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा। उन्होंने बीते 100 वर्षों में समाज के लिए संघ स्वयंसेवकों द्वारा किए गए निःस्वार्थ सेवाकार्यों और योगदान पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि पिछले एक शताब्दी से संघ ने दैनिक शाखाओं, सेवा गतिविधियों, शैक्षणिक पहलों एवं सामाजिक सुधार कार्यक्रमों के माध्यम से मूल स्तर पर राष्ट्र निर्माण का कार्य सतत् किया है। संघ का मूल उद्देश्य एक सशक्त, आत्मविश्वासी, सांस्कृतिक रूप से दृढ़ एवं एकजुट भारत का निर्माण रहा है। स्वयंसेवकों ने अनुशासन, चरित्र-निर्माण और निःस्वार्थ सेवा के आदर्श पर चलते हुए राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

भविष्य की दिशा पर बात करते हुए उन्होंने ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा पर विशेष बल दिया, उन्होंने इसे भविष्य के सशक्त भारत का आधार बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि पंच परिवर्तन सामाजिक सद्भाव की भावना को मजबूत करने, परिवार को राष्ट्र विकास की मूल इकाई के रूप में सुदृढ़ करने, पर्यावरण संरक्षण को जीवन-शैली का हिस्सा बनाने, स्वदेशी आधारित आत्मनिर्भरता के माध्यम से आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने और प्रत्येक नागरिक को राष्ट्र एवं समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करने पर केंद्रित है। उन्होंने आग्रह किया कि आरएसएस के शताब्दी वर्ष को राष्ट्र सेवा की गौरवशाली यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखते हुए समाज के प्रत्येक वर्ग को राष्ट्र उन्नति के लिए अपनी भूमिका तय करनी चाहिए।

उन्होंने युवा एकत्रीकरण में बड़ी संख्या में उपस्थित युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने तथा नशीली दवाओं एवं अन्य सामाजिक बुराइयों से दूर रहने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है और यदि युवा सही दिशा का चयन करें तो राष्ट्र विकास के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच सकता है। युवा अपने आस-पास होने वाली गतिविधियों के प्रति सजग और जागरूक रहें तथा समाज हित में आगे आएं।

उन्होंने पंच परिवर्तन के संदेश को स्थानीय बैठकों और चर्चाओं के माध्यम से हर घर तक पहुंचाने पर बल दिया। नशा, जबरन धर्मांतरण एवं अन्य सामाजिक विकृतियां आज बड़ी चुनौतियां हैं और इनसे निपटने में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे सकारात्मक परिवर्तन के अग्रदूत बनें, सामाजिक समरसता को मजबूत करें और भारत को उसके उज्ज्वल तथा गौरवमयी भविष्य की ओर अग्रसर करें।

निर्माण कार्यों से शिक्षा, बुनियादी ढांचा और सामुदायिक विकास को मिलेगी गति

उपमुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा ने आज नगर पंचायत पिपरिया को विकास की नई दिशा देते हुए कुल साढ़े 5 करोड़ रुपए के निर्माण कार्यों की सौगात दी। पीएमश्री स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल, पिपरिया परिसर में आयोजित कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री श्री शर्मा ने विधिपूर्वक पूजा-अर्चना कर विभिन्न निर्माण कार्यों का भूमिपूजन और लोकार्पण किया। 

उन्होंने कहा कि नगरीय क्षेत्रों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित करना हमारी प्राथमिकता है। शिक्षा, बुनियादी ढांचा और सामुदायिक विकास तीनों को गति देने के लिए ये कार्य मील का पत्थर साबित होंगे। इन परियोजनाओं के साथ पिपरिया में शिक्षा, सार्वजनिक सुविधाओं और नगरीय विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। यह सौगात पिपरिया के आने वाले वर्षों को नई रफ्तार देने वाली साबित होगी। इस अवसर पर जिला पंचायत अध्यक्ष श्री ईश्वरी साहू, उपाध्यक्ष श्री कैलाश चंद्रवंशी, नगर पंचायत पिपरिया अध्यक्ष श्री घुरवाराम साहू जिला पंचायत सदस्य डॉक्टर वीरेंद्र साहू, श्री मुकेश अग्रवाल, श्री निर्मल द्विवेदी, पार्षद कमल कांत नाविक, श्री सोम पटेल सहित जनप्रतिनिधि, जनप्रतिनिधि गणमान्य नागरिक और विद्यार्थी उपस्थित रहे। 

पिपरिया में साढ़े 5 करोड़ रुपए के निर्माण कार्यों का भूमिपूजन

उप मुख्यमंत्री श्री शर्मा ने पिपरिया में साढ़े 5 करोड़ रुपए के निर्माण कार्यों का भूमिपूजन किया। उन्होंने 1 करोड़ 60 लाख 92 हजार रूपए की लागत से पीएम श्री स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल, 14 लाख 83 हजार रुपए की लागत से सामुदायिक भवन, 10 लाख रुपए की लागत से जायसवाल सामुदायिक भवन, 3 करोड़ 31 लाख 90 हजार रुपए की लागत से विभिन्न स्थानों में चौरिया, घड़ी व अन्य चौक निर्माण – सौंदर्यीकरण, हाईमास्ट लाईट, आरसीसी नाली, सीसी रोड, बाउंड्री वाल, व्यायामशाला, सामुदायिक भवन एवं पाथवे निर्माण, 19 लाख रुपए की लागत से स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल में रासायनिक, प्री-विज्ञान व भौतिक प्रयोगशाला और 20 लाख रुपए की लागत से नवीन खाद्य गोदाम निर्माण का भूमिपूजन किया। उपमुख्यमंत्री श्री शर्मा ने कहा कि यह सभी परियोजनाएँ पिपरिया को आधुनिक शिक्षा, बेहतर बुनियादी सुविधाओं और सुदृढ़ नगरीय विकास की दिशा में नई गति देंगी।

सरकार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास के लिए कर रही निरंतर कार्य

उपमुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा ने कहा कि सरकार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास के लिए निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि पिपरिया में साढ़े 5 करोड़ रुपए की बड़ी राशि से एक साथ  विकास कार्य किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पिपरिया अस्पताल का उन्नयन हो चुका है, वहीं सीएचसी निर्माण के लिए स्वीकृति जारी कर दी गई है। स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार हेतु एंबुलेंस की सुविधा प्रदान की गई है तथा अस्पताल में सोनोग्राफी मशीन की शुरुआत भी की गई है। उन्होंने बताया कि आईटीआई के लिए पौने 3 करोड़ रुपए और अनुसूचित जाति छात्रावास निर्माण के लिए 1.5 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए हैं, जिससे युवाओं और विद्यार्थियों को सीधा लाभ मिलेगा।

पीएम श्री स्कूल उन्नयन के लिए 1.60 करोड़ रुपए का भूमिपूजन, प्रतिभा को मिलेगा आधुनिक शिक्षण मंच

कार्यक्रम के दौरान उपमुख्यमंत्री श्री शर्मा ने पिपरिया स्थित स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल के परिसर में आयोजित कार्यक्रम में कहा कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि पीएम श्री स्कूलों के उन्नयन के लिए 1 करोड़ 60 लाख रुपए स्वीकृत किए गए हैं, जो प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में उपलब्ध कराए जा रहे हैं। उन्होंने स्कूल में संचालित स्मार्ट क्लास की व्यवस्था और विद्यार्थियों से इसकी उपयोगिता की जानकारी ली। उन्होंने कहा कि कवर्धा विधानसभा के 50 स्कूलों में स्मार्ट क्लास स्थापित किए जा रहे हैं। इस अवसर पर उन्होंने थ्री-डी तकनीक के माध्यम से विज्ञान विषय को पढ़ाने के अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि सरकारी स्कूलों के बच्चे अत्यंत प्रतिभावान होते हैं और आज हर क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नई सरकार बनने के बाद नगर विकास कार्यों को नई गति मिली है और पिपरिया में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से आने वाले वर्षों में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलेगा।

स्वास्थ सुविधा में हो रहा तेजी से विस्तार

उपमुख्यमंत्री श्री शर्मा ने कहा कि कवर्धा को मेडिकल कॉलेज की एक बड़ी सौगात मिली और निर्माण कार्य शीघ्र प्रारंभ होगा। मेडिकल कॉलेज में 50 सीटों हेतु तैयारी की जा रही है और 60 पदों की स्वीकृति भी प्राप्त हो चुकी है। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए पिपरिया एवं तरेगांव में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हेतु 52–52 लाख रुपये की स्वीकृति मिली है। बच्चों के लिए 50-सीटर क्रिटिकल केयर अस्पताल, जिला अस्पताल की क्षमता 100 से बढ़ाकर 220 बिस्तर, तथा सीटी स्कैन सेवा प्रारंभ की गई है। बोडला में सोनोग्राफी सेवा आरंभ की गई है। पिपरिया सहित दो स्थानों पर एंबुलेंस की सुविधा भी प्रारंभ की गई है। नया बस स्टैंड एवं मेडिकल कॉलेज को बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए घोटिया रोड सहित गौरव पथ के दोनों मार्गों का उन्नयन किया जा रहा है।

जनसहभागिता से स्वच्छ और समृद्ध जिला का होगा  निर्माण

उपमुख्यमंत्री ने कहा कि स्वास्थ्य एवं युवा कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए जा रहे हैं। भोरमदेव विद्यापीठ निःशुल्क कोचिंग सेंटर संचालित किए जा रहे हैं। साढ़े 4 करोड़ रुपये की लागत से नालंदा परिसर का भूमिपूजन किया गया है। कवर्धा के प्राचीन बूढ़ा महादेव परिसर में कांवरिया श्रद्धालुओं हेतु सुविधाओं के निर्माण का कार्य किया जाएगा। भोरमदेव पर्यटन क्षेत्र के उन्नयन हेतु 146 करोड़ रुपये की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि कवर्धा विधानसभा में विकास कार्यों की गति निरंतर तेज हो रही है। रायपुर–बिलासपुर–राजनांदगांव मार्ग को फोरलेन में विकसित करते हुए कवर्धा प्रवेश मार्ग को उच्च स्तरीय स्वरूप देने के लिए 54 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। उपमुख्यमंत्री ने कहा कि क्षेत्र के सभी हिस्सों में संतुलित एवं व्यापक विकास के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। स्वच्छता के क्षेत्र में जनसहयोग आवश्यक है। प्रत्येक वार्ड और हर गली को स्वच्छ बनाने के लिए जनजागरण तथा सामुदायिक सहयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने निर्माण एजेंसियों को निर्देशित किया कि सभी कार्य गुणवत्तापूर्ण, पारदर्शी और समयबद्ध रूप से पूर्ण किए जाएं।

रूस के राष्ट्रपति की भारत की राजकीय यात्रा के परिणाम

मझौता ज्ञापन और समझौते

प्रवासन और गतिशीलता:

एक देश के नागरिकों के दूसरे देश के क्षेत्र में अस्थायी श्रम गतिविधि पर भारत सरकार और रूस की सरकार के बीच समझौता।  

भारत सरकार और रूस की सरकार के बीच अनियमित प्रवासन से निपटने में सहयोग पर समझौता।

स्वास्थ्य एवं खाद्य सुरक्षा:

स्वास्थ्य सेवा, चिकित्सा शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग हेतु भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और रूस के स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच समझौता।

खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण और रूस की सरकार की उपभोक्ता अधिकार संरक्षण एवं मानव कल्याण पर निगरानी की संघीय सेवा के बीच समझौता।

समुद्री सहयोग और ध्रुवीय जलक्षेत्र:

ध्रुवीय जलक्षेत्र में संचालित जहाजों के लिए विशेषज्ञों के प्रशिक्षण पर भारत सरकार के पत्‍तन, पोत परिवाहन और जलमार्ग मंत्रालय तथा रूस की सरकार के परिवहन मंत्रालय के बीच समझौता ज्ञापन।

भारत सरकार के पत्‍तन, पोत परिवाहन और जलमार्ग मंत्रालय और रूस के समुद्री बोर्ड के बीच समझौता ज्ञापन।

उर्वरक:

मेसर्स जेएससी यूरालकेम और मेसर्स राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड तथा नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड और इंडियन पोटाश लिमिटेड के बीच समझौता ज्ञापन।

सीमा शुल्क एवं वाणिज्य:

भारत और रूस के बीच माल और वाहनों के संबंध में आगमन-पूर्व सूचना के आदान-प्रदान में सहयोग के लिए भारत सरकार के केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड तथा रूस की संघीय सीमा शुल्क सेवा के बीच प्रोटोकॉल।

भारत सरकार के संचार मंत्रालय के डाक विभाग और जेएससी “रूसी पोस्ट” के बीच द्विपक्षीय समझौता।

शैक्षणिक सहयोग:

पुणे स्थित रक्षा उन्नत प्रौद्योगिकी संस्थान  और रूस के फेडल स्‍टेट ऑटोनोमस उच्च शिक्षा संस्थान “नेशनल टॉम्स्क स्‍टेट यूर्निवसिटी”, टॉम्स्क के बीच वैज्ञानिक और शैक्षणिक सहयोग पर समझौता ज्ञापन।

मुंबई विश्वविद्यालय, लोमोनोसोव मॉस्को स्‍टेट विश्वविद्यालय और रूसी प्रत्यक्ष निवेश कोष की संयुक्त-स्टॉक कंपनी प्रबंधन कंपनी के बीच सहयोग संबंधी समझौता।

मीडिया सहयोग:

प्रसार भारती, भारत और संयुक्त स्टॉक कंपनी गज़प्रोम-मीडिया होल्डिंग, रूस संघ के बीच प्रसारण पर सहयोग और सहभागिता हेतु समझौता ज्ञापन।

भारत के प्रसार भारती और रूस के नेशनल मीडिया ग्रुप के बीच प्रसारण पर सहयोग और सहभागिता के लिए हेतु समझौता ज्ञापन।

भारत के प्रसार भारती और द बिग एशिया मीडिया ग्रुप के बीच प्रसारण पर सहयोग और सहभागिता के लिए समझौता ज्ञापन।

भारत के प्रसार भारती और एएनओ “टीवी-नोवोस्ती” के बीच प्रसारण सहयोग और सहभागिता हेतु समझौता ज्ञापन का परिशिष्ट।

“टीवी ब्रिक्स” संयुक्त स्टॉक कंपनी और “प्रसार भारती” के बीच समझौता ज्ञापन।

घोषणाएँ

भारत-रूस आर्थिक सहयोग के रणनीतिक क्षेत्रों के विकास के लिए 2030 तक का कार्यक्रम।

रूसी पक्ष ने अंतर्राष्ट्रीय बिग कैट एलायंस (आईबीसीए) में शामिल होने के लिए फ्रेमवर्क समझौते को अपनाने का निर्णय लिया है।

नई दिल्‍ली स्थित राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय एवं हस्तकला अकादमी और मास्‍को स्थित ज़ारित्सिनो स्‍टेट ऐतिहासिक, वास्तुशिल्‍प, कला एवं भूदृश्य संग्रहालय-रिजर्व के बीच प्रदर्शनी “इंडिया: फैवरिक ऑफ टाइम” के लिए समझौता।

रूसी नागरिकों को पारस्परिक आधार पर 30 दिनों का निःशुल्क ई-पर्यटक वीज़ा प्रदान किया जाएगा।

रूसी नागरिकों को निःशुल्क समूह पर्यटक वीज़ा प्रदान किया जाएगा।

विश्व मनोरंजन: बदलती दुनिया का ग्लोबल एंटरटेनमेंट उद्योग

मनोरंजन (Entertainment) आज केवल समय बिताने का साधन नहीं रहा, बल्कि यह एक वैश्विक उद्योग बन चुका है, जिसकी पहुँच तकनीक, संस्कृति और अर्थव्यवस्था—तीनों को प्रभावित करती है। फिल्में, संगीत, गेमिंग, स्पोर्ट्स, सोशल मीडिया, लाइव शो और डिजिटल कंटेंट—ये सब मिलकर आज World Entertainment Industry का आकार तय करते हैं।


1. मनोरंजन का वैश्विक स्वरूप

दुनिया भर में एंटरटेनमेंट अब स्थानीय सीमाओं में बंधा नहीं है।

  • कोरिया के K-Pop की धुनें भारत-अमेरिका तक छा जाती हैं,
  • हॉलीवुड की फिल्में दुनिया के हर देश में रिलीज़ होती हैं,
  • भारतीय OTT और संगीत विदेशों में लोकप्रिय हो रहे हैं।

यह पूरा उद्योग ग्लोबल कनेक्टिविटी और सोशल मीडिया की बदौलत लगातार बढ़ रहा है।


2. डिजिटल एंटरटेनमेंट का उभार

पिछले 10 वर्षों में डिजिटल मनोरंजन ने सबसे तेज़ विकास किया है।

🔹 प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म:

  • Netflix, Amazon Prime, Disney+
  • YouTube, TikTok, Instagram
  • Spotify, Apple Music
  • Online Gaming: PUBG, Free Fire, Fortnite
  • eSports: लाइव गेमिंग प्रतियोगिताएँ

इनकी वजह से अब मनोरंजन “on demand” उपलब्ध है—यानी जब चाहें, जैसे चाहें।


3. फिल्म उद्योग का वैश्वीकरण

हॉलीवुड, बॉलीवुड, K-Cinema और एनीमेशन अब सर्वाधिक कमाई करने वाले क्षेत्र हैं।

  • Marvel, Avatar, Fast & Furious जैसी फिल्में वैश्विक ब्लॉकबस्टर बनती हैं।
  • भारतीय सिनेमा अब दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग (KGF, RRR, Pushpa) की वजह से अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त कर रहा है।
  • एनीमेशन फिल्में (Disney, Pixar, Anime) बच्चों और युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हैं।

4. संगीत उद्योग की क्रांति

संगीत का उपभोग अब रिकॉर्ड और CD से मोबाइल ऐप तक पहुँच चुका है।

  • Spotify, YouTube Music और JioSaavn ने दुनिया भर का संगीत सबके लिए उपलब्ध कर दिया है।
  • लोकल संगीत ग्लोबल हो रहा है—जैसे K-pop, African Beats, Punjabi Pop।

5. सोशल मीडिया: नया एंटरटेनमेंट पॉवरहाउस

Instagram Reels, YouTube Shorts और TikTok ने मनोरंजन का चरित्र पूरी तरह बदल दिया है।
अब हर व्यक्ति कंटेंट क्रिएटर बन सकता है।
इन्फ्लुएंसर्स, व्लॉगर्स और डिजिटल रचनाकार मनोरंजन का नया चेहरा बन चुके हैं।


6. गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स का उभार

गेमिंग अब एक इंडस्ट्री नहीं, बल्कि एक स्पोर्ट्स कैटेगरी बन चुकी है।

  • लाखों लोग लाइव गेम खेलते और देखते हैं।
  • ई-स्पोर्ट्स प्रतियोगिताओं में करोड़ों की प्राइज मनी होती है।
  • VR और Metaverse एंटरटेनमेंट का नया भविष्य हैं।

7. लाइव शो और इवेंट्स का महत्व

भले ही डिजिटल दुनिया बढ़ रही हो, लेकिन लाइव मनोरंजन का अपना अलग महत्व है—

  • कॉन्सर्ट
  • थिएटर
  • स्टैंड-अप कॉमेडी
  • स्पोर्ट्स टूर्नामेंट (FIFA, Olympics, IPL)

लाइव इवेंट्स लोगों को अनुभव और भावनाएँ प्रदान करते हैं, जो डिजिटल माध्यमों से संभव नहीं।


8. भविष्य: एंटरटेनमेंट कहाँ जा रहा है?

भविष्य का मनोरंजन तीन दिशाओं में आगे बढ़ रहा है:

🔮 1. AI आधारित मनोरंजन

फिल्में, संगीत, गेम—AI से और तेज़, और व्यक्तिगत होंगी।

🔮 2. Metaverse

एक ऐसी वर्चुअल दुनिया जहाँ लोग डिजिटल अवतार में फिल्में, गेम और इवेंट्स का अनुभव करेंगे।

🔮 3. इंटरएक्टिव कंटेंट

दर्शक कहानी में बदलाव कर सकेंगे, जैसे Netflix का “Black Mirror: Bandersnatch”।


🎬 निष्कर्ष

विश्व मनोरंजन आज एक तेज़ी से बदलते और तकनीक आधारित उद्योग में बदल चुका है। जहाँ पहले मनोरंजन केवल टीवी, रेडियो या थिएटर तक सीमित था, वहीं आज यह हर स्क्रीन—मोबाइल, लैपटॉप, VR हेडसेट—पर उपलब्ध है।
डिजिटल दुनिया की वजह से मनोरंजन अब स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक हो चुका है।

राष्ट्रपति ने वर्ष 2025 के लिए राष्ट्रीय दिव्यांगजन सशक्तिकरण हेतु पुरस्कार प्रदान किए

दिव्यांगजनों का समावेश हमारी राष्ट्रीय विकास यात्रा का अभिन्न अंग है: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (3 दिसंबर, 2025) अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में वर्ष 2025 के लिए राष्ट्रीय दिव्यांगजन सशक्तिकरण पुरस्कार प्रदान किए।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि दिव्यांगजन समानता के हकदार हैं। समाज और देश की विकास यात्रा में उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित करना सभी हितधारकों का कर्तव्य है, न कि कोई दान-पुण्य। दिव्यांगजनों की समान भागीदारी से ही किसी समाज को वास्तविक अर्थों में विकसित माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस -2025 का विषय, ‘सामाजिक प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए दिव्यांगता-समावेशी समाजों को बढ़ावा’ भी इसी प्रगतिशील विचार पर आधारित है।

राष्ट्रपति को यह जानकर खुशी हुई कि हमारा देश कल्याणकारी मानसिकता से आगे बढ़ते हुए, दिव्यांगजनों के लिए अधिकार-आधारित, सम्मान-केंद्रित व्यवस्था अपना रहा है। उन्होंने कहा कि दिव्यांगजनों का समावेश हमारी राष्ट्रीय विकास यात्रा का एक अभिन्न अंग है। 2015 से “दिव्यांगजन” शब्द के प्रयोग का निर्णय दिव्यांगजनों के प्रति विशेष सम्मान प्रदर्शित करने के लिए लिया गया था।

राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार दिव्यांगजनों के समावेशन और सशक्तिकरण के लिए इको-सिस्‍टम को मजबूत कर रही है। उनके लिए सांकेतिक भाषा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण, मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास और खेल प्रशिक्षण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में कई राष्ट्रीय स्तर के संस्थान स्थापित किए गए हैं। लाखों दिव्यांगजनों को विशिष्ट विकलांगता पहचान पत्र जारी किए गए हैं, जिससे उन्हें विशेष सुविधाओं का लाभ मिल रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि दिव्यांगजनों के हितों के लिए सरकार के साथ-साथ समाज को भी जागरूक और सक्रिय रहना चाहिए। इससे सरकार के प्रगतिशील प्रयासों को बल मिलेगा। उन्होंने कहा कि दिव्यांगजनों की गरिमा, स्वावलंबन और आत्म-सम्मान सुनिश्चित करना सभी नागरिकों का दायित्व है। प्रत्येक नागरिक को सामाजिक और राष्ट्रीय प्रगति के अपने प्रयासों में दिव्यांगजनों को भागीदार बनाने का संकल्प लेना चाहिए।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एससी/एसटी सर्टिफिकेट के गलत उपयोग की जांच के आदेश दिए

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के सभी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को उन मामलों की जांच करने का निर्देश दिया है, जहां हिन्दू धर्म से दूसरे धर्म में धर्म बदलने वाले लोग गलत तरीके से अनुसूचित जाति या इसी तरह के कैटेगरी के सर्टिफिकेट का उपयोग कर रहे हैं।

जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने निर्देश दिया कि वे चार महीने के अंदर राज्य सरकार को कमियों के बारे में बताएं “ताकि संविधान के साथ ऐसा धोखा न हो”। न्यायालय ने केंद्रीय कैबिनेट सेक्रेटरी और उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के “मामले को देखने” का आदेश दिया।

न्यायालय ने आदेश में कहा – “प्रिंसिपल सेक्रेटरी/एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, माइनॉरिटीज वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ यूपी को भी मामले को देखने और सही कार्रवाई करने या अधिकारियों को निर्देश देने के लिए उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया जाता है ताकि कानून को सही मायने में लागू किया जा सके। एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट को भी कानून के अनुसार काम करने का निर्देश दिया जाता है”।

न्यायाधीश ने कहा कि हिन्दू, सिक्ख या बौद्ध के अलावा किसी और कम्युनिटी से जुड़ा कोई भी व्यक्ति कॉन्स्टिट्यूशन (शेड्यूल्ड कास्ट) ऑर्डर, 1950 के तहत शेड्यूल्ड कास्ट का मेंबर नहीं माना जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक फैसले में कहा था कि धर्म बदलने के बाद सिर्फ रिज़र्वेशन पाने के मकसद से जाति के आधार पर फायदे लेना “संविधान के साथ फ्रॉड” है।

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के एक फैसले पर भी ध्यान दिया, जिसमें कहा गया था कि ईसाई धर्म में जाति के आधार पर भेदभाव नहीं होता है और इसलिए, धर्म बदलने पर शेड्यूल्ड कास्ट क्लासिफिकेशन का आधार खत्म हो जाता है।

इसके बाद न्यायालय ने पिटीशनर जितेंद्र साहनी के धर्म की जांच करने का निर्देश दिया। “इस बात को देखते हुए, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, महाराजगंज को निर्देश दिया जाता है कि वे आवेदक के धर्म से जुड़े मामले की तीन महीने के अंदर जांच करें और अगर वह जालसाजी का दोषी पाया जाता है, तो कानून के अनुसार उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करें ताकि भविष्य में इस न्यायालय में ऐसे एफिडेविट फाइल न किए जा सकें।”

यह केस इस आरोप पर दर्ज किया गया था कि उसने दूसरों को ईसाई धर्म में बदलने की कोशिश की और हिन्दू देवी-देवताओं के खिलाफ गाली-गलौज वाले शब्दों का इस्तेमाल किया।

हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि उसने अपनी जमीन पर जनता को जीसस क्राइस्ट के वचन सुनाने के लिए एक एप्लीकेशन देकर सब डिविजनल मजिस्ट्रेट, महाराजगंज से पहले से परमिशन ली थी। बाद में परमिशन वापस ले ली गई।

कंठस्थ शुक्ल यजुर्वेद का दण्डक्रम पारायण

वाराणसी। एक ऐतिहासिक समारोह में 19 वर्षीय वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे को शुक्ल यजुर्वेद (माध्यंदिनी शाखा) के अत्यंत कठिन दण्डक्रम पारायण को सफलतापूर्वक पूर्ण करने पर सम्मानित किया गया। इस प्रकार की साधना पिछले तीन सौ वर्षों में केवल कुछ ही बार सम्पन्न हुई है। जगद्गुरु शंकराचार्य श्री श्री भारती तीर्थ महास्वामीजी और जगद्गुरु शंकराचार्य श्री श्री विदुशेखर भारती महास्वामीजी के आशीर्वाद से भव्य शोभायात्रा और नागरिक अभिनंदन का आयोजन किया गया। शोभायात्रा के दौरान काशी की सड़कों पर वैदिक मंत्रोच्चार, शंखध्वनि, दक्षिण भारतीय वाद्ययंत्रों की ताल और बड़ी संख्या में जुटे श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने पूरे वातावरण को दिव्य बना दिया। मार्गभर पुष्पवृष्टि और पारंपरिक संगीत ने कार्यक्रम को विशेष रूप से आकर्षक बना दिया।

दक्षिणाम्नाय श्री शारदापीठ, शृंगेरी की ओर से देवव्रत को ₹5 लाख का बहुमूल्य स्वर्ण कंगन और ₹1,11,116 की सम्मान राशि दी गई।। यह सम्मान पीठ की ओर से डॉ. तंगीराल शिवकुमार शर्मा ने उभय जगद्गुरुओं के आशीर्वाद के साथ प्रदान किया।

दण्डक्रम पारायण वैदिक अध्ययन की सबसे कठिन विधियों में से एक मानी जाती है, जिसमें स्वरों, संधि-विच्छेद और विरोध-संधि की अत्यंत सूक्ष्म गणनाएँ शामिल होती हैं। इसे परंपरागत रूप से वेद मुकुट के रूप में भी जाना जाता है।

वाराणसी में आयोजित काशी तमिल संगमम के उद्घाटन के अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिनी शाखा के कंठस्थ दण्डक्रम पारायण को 50 दिन में पूर्ण करने वाले 19 वर्षीय बटु देवव्रत रेखे को अंगवस्त्रम, प्रतीक चिह्न नारिकेल देकर सम्मानित किया।

काशी में पहली बार देवव्रत रेखे ने 12 अक्तूबर 2025 से 29 नवम्बर 2025 के मध्य 50 दिन की अवधि में शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिनी शाखा का कंठस्थ दण्डक्रम पारायण कि​या। शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिनी शाखा संहिता में कुल 40 अध्याय एवं 2000 मंत्र है। लेकिन दण्डक्रम पारायण में मंत्रों की संख्या 25 लाख हो जाती है। यह दण्डक्रम पारायण काशी के सांगवेद विद्यालय रामघाट में पद्मश्री पं. गणेश्वर शास्त्री द्रविड़ के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ।

देवव्रत रेखे की वैदिक शिक्षा उनके पिता घनपाठी महेश रेखे के निर्देशन में हुई है। इस तरह का शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिनी की शाखा का कंठस्थ दण्डक्रम पारायण 200 वर्ष पूर्व महाराष्ट्र में हुआ था। काशी में यह कंठस्थ दण्डक्रम पारायण पहली बार होने से विशेष है। महेश रेखे महाराष्ट्र के पुणे के समीप अहिल्यानगर के निवासी हैं।

वेद के दण्डक्रम पारायण पाठ श्रवण से अधिकाधिक फल की प्राप्ति का विधान है। देवव्रत रेखे की इस महनीय उपलब्धि के लिए प्रधानमंत्री ने भी ट्वीट कर प्रशंसा की।

उन्होंने एक्स पर लिखा –

19 वर्ष के देवव्रत महेश रेखे जी ने जो उपलब्धि हासिल की है, वो जानकर मन प्रफुल्लित हो गया है। उनकी ये सफलता हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बनने वाली है। भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर एक व्यक्ति को ये जानकर अच्छा लगेगा कि श्री देवव्रत ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के 2000 मंत्रों वाले ‘दण्डकर्म पारायणम्’ को 50 दिनों तक बिना किसी अवरोध के पूर्ण किया है। इसमें अनेक वैदिक ऋचाएं और पवित्रतम शब्द उल्लेखित हैं, जिन्हें उन्होंने पूर्ण शुद्धता के साथ उच्चारित किया। ये उपलब्धि हमारी गुरु परंपरा का सबसे उत्तम रूप है।

काशी से सांसद के रूप में, मुझे इस बात का गर्व है कि उनकी यह अद्भुत साधना इसी पवित्र धरती पर संपन्न हुई। उनके परिवार, संतों, मुनियों, विद्वानों और देशभर की उन सभी संस्थाओं को मेरा प्रणाम, जिन्होंने इस तपस्या में उन्हें सहयोग दिया।

गीता जयंती / मोक्षदा एकादशी

द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने आज ही के दिन अर्जुन को गीता उपदेश देकर समस्त संसार को यह संदेश दिया कि बुराई चाहे कहीं से भी उपजे उसे खत्म करना ही हमारा धर्म और कर्तव्य है, फिर चाहे उस बुराई को करने वाले अपने ही क्यों ना हों।

आज गीता महोत्सव या गीता जयंती के रूप में मनाया जाने वाला यह दिन हम सबको स्मरण करवाता है कि धर्म की स्थापना के लिए कभी-कभी हमें अपनों से भी लड़ना पड़ सकता है।

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन कृष्ण ने अर्जुन को धर्म-कर्म और मोक्ष का दिव्य ज्ञान दिया था। इसीलिए इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

कृष्ण एक ऐसा नाम है जो अखिल ब्रह्मांड में सभी देवी देवताओं को प्रिय है। कृष्ण अर्थात आकर्षण, जिसके नाम में ही आकर्षण हो, भला सारी सृष्टि उससे आकर्षित कैसे नहीं होगी?

वर्तमान परिवेश में भी भगवान कृष्ण की चर्चा सर्वदा सबसे ज्यादा होती है क्योंकि कृष्ण 16 कलाओं में निपुण हैं और कृष्ण ऐसी शक्ति हैं, जिन्हें गुरु भी माना जा सकता है और सखा भी। कृष्ण को जिसने जिस रूप में चाहा, वे उसे उसी रूप में दिखाई दिए। परंतु अटल सत्य तो यही है कि कृष्ण कण-कण में व्याप्त हैं और उनकी लीलाओं का वर्णन जिसने नहीं सुना, उसका जीवन अधूरा ही है। कृष्ण को बुद्धि के तर्क से नहीं, बल्कि प्रेम के भाव से ही समझा व प्राप्त किया जा सकता है।

श्री कृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं, इसलिए उन्हें अनेक नामों से पुकारा जाता है।

कृष्ण ने धरती पर रहकर आम मनुष्य की तरह ही जीवन जिया। कृष्ण का बाल रूप जो तरह-तरह की लीलाओं से वर्णित रहा, उन्होंने लीलाधर बनकर लीलाएं रचीं, गोपाल बनकर ग्वाल बाल के संग माखन चुराया तो मनोहर बनकर गोपियों संग रास भी रचाया। कभी गुरु बनकर उपदेश दिया तो कभी सखा बनकर प्रेम का संदेश दिया, वंशीधर बनकर मुरली की धुन से सबका मन मोहा तो चक्रधारी के रूप में न्याय के लिए सुदर्शन चक्र का प्रयोग भी किया। लोगों के हित के लिए रणछोड़ बने तो द्वारकाधीश बनकर राज्य भी संभाला।

देखा जाए तो अलग अलग समय पर उन्होंने अपने स्वरूप को भी समय अनुसार बदला। परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। इसलिए समय के साथ-साथ परिवर्तन को भी हमें स्वीकार करना चाहिए।

राधा कृष्ण ने मिलकर विशुद्ध प्रेम की परिभाषा पूरे संसार को समझाई। उनके द्वारा दिए गए उपदेश भगवद्गीता में संकलित हैं, भगवद्गीता मनुष्य को अपने कर्तव्य और कर्म फल का बोध कराती है। गीता के पठन और श्रवण से प्रत्येक प्राणी जन्म जन्मांतर के बंधन से मुक्त हो जाता है।

समस्त संसार को जीवन जीने की नई दिशा प्रदान करने वाला ग्रंथ भगवद्गीता प्रत्येक प्राणी के जीवन में हर प्रकार से सहायक है। दूसरों को दुख देना ही सबसे बड़ा पाप और सुख देना ही सबसे बड़ा सुख है, भूत भविष्य की चिंता छोड़कर हमें वर्तमान में जीना चाहिए और अच्छे कर्म करने चाहिए।

यह दिन केवल पूजा अर्चना के लिए ही नहीं, अपितु श्री कृष्ण द्वारा दिए संदेश, शिक्षा को यदि हम अपने जीवन में धारण करने का संकल्प लें और उस पर विचार करके चलें तो हमारा जीवन भी धन्य हो जाएगा। यही अपने आराध्य के प्रति सच्ची श्रद्धा और भक्ति होगी।

BSF Punjab Frontier 2025 की प्रमुख उपलब्धियाँ: ड्रोन से लेकर नशा तस्करी पर बड़ा प्रहार

जालंधर

1 दिसंबर 2025 | चंडीगढ़
बीएसएफ के 61वें स्थापना दिवस से पहले BSF Punjab Frontier 2025 की ऑपरेशनल रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट में ड्रोन गतिविधि, नशा तस्करी, हथियार बरामदगी और आंतरिक सुरक्षा में किए गए महत्वपूर्ण कार्यों को सामने रखा गया।


ड्रोन चुनौती पर BSF की बड़ी कार्रवाई

इस वर्ष पाकिस्तान की ओर से बढ़ी ड्रोन गतिविधियाँ बीएसएफ के लिए सबसे बड़ी चुनौती थीं। लेकिन BSF Punjab Frontier 2025 ने समय रहते कड़ी कार्रवाई की और 272 ड्रोन को मार गिराया या जब्त किया परिणामस्वरूप सीमा पार से होने वाली ड्रग और हथियार सप्लाई को रोका गया जिससे ड्रोन मूवमेंट पर विशेष निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक अपनाई


नशा तस्करी पर निर्णायक प्रहार

बीएसएफ ने नशा तस्करी नेटवर्क को तोड़ने के लिए कई सफल अभियान चलाए। वर्ष 2025 में पकड़ी गई नशीली वस्तुओं की मात्रा:

  • हेरोइन – 367.788 किग्रा
  • आईस ड्रग – 19.033 किग्रा
  • अफीम – 14.437 किग्रा

इन बरामदगियों से पाकिस्तान आधारित नेटवर्क को भारी नुकसान हुआ है।


हथियार तस्करी का भंडाफोड़

BSF Punjab Frontier 2025 ने सीमा पर हथियार भेजने की कोशिशों को विफल करते हुए:

  • 200 अवैध हथियार
  • 3625 लाइव राउंड
  • 265 मैगजीन

बरामद कीं। यह सीमा पार सक्रिय आतंकी व तस्करी गिरोहों के लिए बड़ा झटका है।


तस्करों और संदिग्धों पर बड़ी कार्रवाई

बीएसएफ ने विभिन्न ऑपरेशनों में अलग-अलग देशों के नागरिकों को गिरफ्तार किया:

  • 251 भारतीय तस्कर/संदिग्ध
  • 18 पाकिस्तानी नागरिक
  • 4 नेपाली नागरिक
  • 3 बांग्लादेशी नागरिक

इसके अतिरिक्त, सीमा पार घुसपैठ की कोशिश कर रहे 3 पाकिस्तानी नागरिकों को मार गिराया गया


आंतरिक सुरक्षा में BSF की महत्वपूर्ण भूमिका

सीमा सुरक्षा के साथ-साथ BSF Punjab Frontier 2025 ने देश की आंतरिक सुरक्षा में भी योगदान दिया:

अमरनाथ यात्रा सुरक्षा तैनाती

  • 22 कंपनियाँ कश्मीर घाटी में तैनात की गईं

कानून-व्यवस्था में तैनाती

  • हरियाणा, चंडीगढ़ और पंजाब के विभिन्न जिलों में तैनाती
  • प्रयागराज महाकुंभ 2025 की सुरक्षा में भी BSF की भूमिका

शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराने में योगदान

BSF पंजाब फ्रंटियर की टुकड़ियाँ निम्न राज्यों में चुनाव ड्यूटी में तैनात रहीं:

  • बिहार
  • दिल्ली
  • गुजरात
  • पंजाब
  • जम्मू-कश्मीर
  • राजस्थान
  • ओडिशा
  • पश्चिम बंगाल

BSF सीमा संरचना और तैनाती आँकड़े

  • भारत–पाकिस्तान सीमा: 2289.66 किमी
  • एलओसी तैनाती: 772 किमी (237.2 किमी पर स्वतंत्र तैनाती)
  • भारत–बांग्लादेश सीमा: 4096.70 किमी
  • कुल सीमा सुरक्षा: 6386.36 किमी
  • पंजाब फ्रंटियर की सीमा: 533 किमी
  • कुल बटालियन: 19

2025 BSF पंजाब के लिए उपलब्धियों का वर्ष

ड्रोन रोधी कार्रवाई, नशा व हथियार तस्करी पर रोक, और आंतरिक सुरक्षा में योगदान—इन सभी उपलब्धियों से स्पष्ट है कि BSF Punjab Frontier 2025 भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा में सबसे मजबूत स्तंभों में से एक है।

नई कंप्यूटर तकनीक 2025: AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और डिजिटल दुनिया के बड़े बदलाव

तकनीक की दुनिया लगातार बदल रही है, लेकिन 2025 में कंप्यूटर तकनीक ने एक नई रफ़्तार पकड़ ली है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, एज कंप्यूटिंग और अल्ट्रा-फास्ट चिप्स—ये सभी मिलकर हमारे काम करने, सीखने और जीने के तरीके को बदल रहे हैं।
आइए जानते हैं इस साल की सबसे नई और महत्वपूर्ण कंप्यूटर तकनीकों के बारे में:


1. एआई-चालित कंप्यूटर (AI-Powered Computing)

2025 में कंप्यूटर अब सिर्फ मशीन नहीं बल्कि “सोचने वाले साथी” बन रहे हैं।

  • ये डेटा को खुद समझते हैं।
  • निर्णय लेने में मदद करते हैं।
  • आवाज़ और टेक्स्ट दोनों को आसानी से पहचानते हैं।
    AI-सक्षम कंप्यूटर अब शिक्षा, हेल्थकेयर, सुरक्षा और बिज़नेस—हर जगह उपयोग किए जा रहे हैं।

2. क्वांटम कंप्यूटिंग का उभार (Quantum Computing Rise)

क्वांटम कंप्यूटर अब प्रयोगशालाओं से निकलकर उद्योगों में प्रवेश कर रहे हैं।
ये पारंपरिक कंप्यूटरों की तुलना में लाखों गुना तेज़ प्रोसेसिंग कर सकते हैं।
इनका उपयोग—

  • नई दवाओं की खोज
  • मौसम पूर्वानुमान
  • साइबर सुरक्षा
  • जटिल गणना
    में तेजी से बढ़ रहा है।

3. एज कंप्यूटिंग (Edge Computing)

अब डेटा दूर सर्वर पर नहीं, बल्कि डिवाइस के पास ही प्रोसेस होता है।
इसके फायदे:

  • तेज़ स्पीड
  • कम लेटेंसी
  • उच्च सुरक्षा
    स्मार्ट शहर, ट्रैफिक सिस्टम और IoT डिवाइस में यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो रही है।

4. न्यूरोमॉर्फिक चिप्स (Neuromorphic Chips)

मानव मस्तिष्क जैसी क्षमता वाले कंप्यूटर चिप्स 2025 में चर्चा में हैं।
ये चिप्स—

  • ऊर्जा बचाते हैं
  • तेज़ी से सीखते हैं
  • AI को और शक्तिशाली बनाते हैं
    रोबोटिक्स और सेल्फ-ड्राइविंग वाहन में इनका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।

5. हाइब्रिड क्लाउड और मल्टी-क्लाउड तकनीक

कंपनियाँ अब एक ही क्लाउड पर निर्भर नहीं रहतीं।
हाइब्रिड और मल्टी-क्लाउड मॉडल—

  • डेटा सुरक्षा बढ़ाते हैं
  • लागत कम करते हैं
  • सेवाओं को स्केल करना आसान बनाते हैं।

6. साइबर सुरक्षा में एआई की भूमिका

साइबर हमलों के बढ़ते खतरे को देखते हुए 2025 में एआई आधारित सुरक्षा सिस्टम बहुत लोकप्रिय हो गए हैं।
ये सिस्टम—

  • तुरंत खतरे को पहचानते हैं
  • स्वतः कार्रवाई करते हैं
  • डेटा को सुरक्षित रखते हैं

7. एक्सआर तकनीक (XR – AR/VR/MR)

वर्चुअल रियलिटी और ऑगमेंटेड रियलिटी का विस्तार हो रहा है।
शिक्षा, गेमिंग, ट्रेनिंग और पर्यटन में XR नई दुनिया बना रहा है।


निष्कर्ष

2025 कंप्यूटर तकनीक के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष साबित हो रहा है।
AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, एज कंप्यूटिंग और नई पीढ़ी के चिप्स—ये तकनीकें आने वाले वर्षों में मानव जीवन को और अधिक स्मार्ट, सुरक्षित और तेज़ बनाने वाली हैं।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के रायपुर में तीन दिवसीय 60वीं DGP/IGP कॉफ्रेंस का उद्घाटन किया

हमने विगत 7 वर्षों में 586 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन बनाकर सुरक्षा के घेरे को मजबूत बनाया है, इसी का परिणाम है कि 2014 में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या जो 126 थी, वो घटकर 11 रह गई है

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में DGsP/IGsP कॉफ्रेंस समस्याओं के समाधान, चुनौतियों और रणनीतियों से नीति निर्धारण तक, देश की आंतरिक सुरक्षा के समाधान का फोरम बन कर उभरी है

अगली DGsP/IGsP कॉन्फ्रेंस से पहले देश नक्सलवाद की समस्या से पूर्णतः मुक्त हो जाएगा

पिछले 40 साल से देश के लिए नासूर बनें 3 हॉटस्पॉट नक्सलवाद, नार्थ-ईस्ट और जम्मू-कश्मीर की समस्या के निराकरण का मोदी सरकार ने स्थायी समाधान दिया है, जल्द ही ये देश के बाकी हिस्सों जैसे बन जाएंगे

हमने NIA, UAPA कानूनों को सुदृढ़ बनाने, तीन नए आपराधिक कानून, नारकोटिक्स और भगोड़ों के लिए मजबूत कानून बनाए हैं

तीनों नए आपराधिक कानूनों के पूर्णतः लागू होने के बाद भारत की पुलिसिंग विश्व में सबसे आधुनिक होगी

हमने PFI पर बैन लगाकर देशभर में उनके ठिकानों पर छापे मार कर गिरफ्तारियां की, जो केंद्र – राज्य के समन्वय का उत्तम उदाहरण बनी

Intelligence की Accuracy, Objective की clarity और Action की synergy इन तीन बिंदुओं पर काम करके हम कट्टरता, उग्रवाद और नारकोटिक्स पर कड़ा प्रहार कर रहे हैं

हमें नारकोटिक्स और organised क्राइम पर 360 डिग्री प्रहार कर ऐसा तंत्र बनाना है कि इस देश में नार्को व्यापारियों और अपराधियों को एक इंच भी जमीन न मिल पाए

अब समय आ गया है कि राज्यों की पुलिस NCB के साथ मिलकर नारकोटिक्स के राज्य, राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर के गिरोहों पर कड़ा प्रहार कर उनके आकाओं को जेल में डाले

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के रायपुर में तीन दिवसीय 60वीं DGsP/IGsP कॉफ्रेंस का उद्घाटन किया।

अपने सम्बोधन में केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में DGP/IGP कॉफ्रेंस समस्याओं के समाधान, चुनौतियों और रणनीतियों से नीति निर्धारण तक, देश की आंतरिक सुरक्षा के समाधान का फोरम बन कर उभरी है।

गृह मंत्री ने नक्सलवाद के समूल नाश के खिलाफ उठाए गए मोदी सरकार के एक्शनेबल प्वाइंट का जिक्र करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने विगत 7 वर्षों में 586 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन बनाकर सुरक्षा घेरे को मजबूत बनाया है और इसी का परिणाम है कि 2014 में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 126 थी जो आज घटकर सिर्फ 11 रह गई है। केन्द्रीय गृह मंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि अगली DGsP/IGsP कॉन्फ्रेंस से पहले देश नक्सलवाद की समस्या से पूर्णतः मुक्त हो जाएगा।

श्री अमित शाह ने कहा कि पिछले 40 साल से देश नक्सलवाद की समस्या का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि देश के लिए नासूर बने 3 हॉटस्पॉट – नक्सलवाद, नार्थ-ईस्ट और जम्मू-कश्मीर – की समस्या के निराकरण के लिए मोदी सरकार ने स्थायी समाधान दिया है और जल्द ही ये देश के बाकी हिस्सों जैसे बन जाएंगे। गृह मंत्री ने मोदी सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए कहा कि नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) कानूनों को सुदृढ़ बनाया गया, तीन नए आपराधिक कानूनों के साथ ही नारकोटिक्स और भगोड़ों के लिए मजबूत कानून बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि तीनों नए आपराधिक कानूनों के पूरी तरह लागू होने के बाद भारत की पुलिसिंग विश्व में सबसे आधुनिक बन जाएगी।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने आतंकवाद और उग्रवाद पर मोदी सरकार की कार्रवाई का जिक्र कहते हुए कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा पॉपुलर फ्रन्ट ऑफ इंडिया (PFI) पर बैन लगाने के बाद देशभर में उसके ठिकानों पर छापे मार कर गिरफ्तारियां की गईं, जो केंद्र – राज्य के समन्वय का उत्तम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि सुरक्षाबलों और पुलिस द्वारा Intelligence की Accuracy, Objective की clarity और Action की synergy के तीन बिंदुओं पर काम कर कट्टरता, उग्रवाद और नारकोटिक्स पर कड़ा प्रहार किया जा रहा है।

गृह मंत्री ने दोहराया कि हमें नारकोटिक्स और organised क्राइम पर 360 डिग्री प्रहार कर ऐसा तंत्र बनाना है जिससे इस देश में नार्को व्यापारियों और अपराधियों को एक इंच जमीन भी न मिल पाए। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि राज्यों की पुलिस नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के साथ मिलकर नारकोटिक्स के राज्य, राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर के गिरोहों पर कड़ा प्रहार कर उनके आकाओं को जेल में डाले।

मणिकर्णिका संगोष्ठी: महिला सशक्तिकरण और रानी लक्ष्मीबाई से प्रेरणा

सांगानेर, 28 नवम्बर।

सांगानेर में आयोजित मणिकर्णिका संगोष्ठी में महिला सशक्तिकरण, रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य, राष्ट्र निर्माण में नारी की भूमिका और भारतीय संस्कृति पर सार्थक विमर्श।

एस.एस. जैन सुबोध महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, सांगानेर एवं संस्कृता महिला विचार मंच के संयुक्त तत्वावधान में “मणिकर्णिका—संगोष्ठी” का आयोजन हुआ। संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य महिला सशक्तिकरण, राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका, तथा भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा को युवा पीढ़ी तक पहुँचाना था।


कार्यक्रम का शुभारंभ: दीप प्रज्ज्वलन और मंगलाचरण

संगोष्ठी की शुरुआत माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन से हुई।
वैदिक मंत्रोच्चार के साथ

  • राष्ट्र सेविका समिति, सांगानेर महानगर की शारीरिक प्रमुख सौम्या पांडेय ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया।
  • प्राचार्या डॉ. यदु शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया।
  • लक्ष्मी बघेल ने प्रेरक एकल गीत प्रस्तुत किया।

संगोष्ठी की प्रस्तावना: भारतीय नारी की मूलभूत शक्ति

संयोजिका डॉ. शिप्रा पारीक ने संगोष्ठी की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए नारी की

  • स्वबोध जागरण
  • समाज में उसकी मूलभूत भूमिका
  • आत्मशक्ति
    पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए।

मुख्य वक्ता का उद्बोधन: रानी लक्ष्मीबाई से प्रेरणा

राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका वी. शांता कुमारी जी ने “मणिकर्णिका” विषय पर अपने विचार रखे।
उन्होंने कहा कि—

  • नारी में इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति, और कर्तव्य शक्ति जन्म से निहित हैं।
  • रानी लक्ष्मीबाई का अनुशासन, मातृत्व और शौर्य आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।
  • शिक्षा, चिकित्सा, सेवा और अध्ययन—इन सभी क्षेत्रों में कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण अत्यंत आवश्यक है।

छात्राओं की प्रस्तुति: रानी लक्ष्मीबाई का शौर्य

महाविद्यालय की छात्राओं ने रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य पर आधारित लघु नाटिका प्रस्तुत की।
यह प्रस्तुति दर्शकों के लिए रानी के साहस और बलिदान का सजीव अनुभव बन गई।


महिला सशक्तिकरण पर विशेष चर्चा

मेधा नरुका जी ने महिलाओं की

  • आत्मशक्ति
  • समाज निर्माण में निर्णायक भूमिका
  • राष्ट्र के प्रति कर्तव्य

अध्यक्षीय संबोधन: विकसित भारत 2047 का संकल्प

पूर्व महापौर डॉ. सौम्या गुर्जर ने कहा कि—

  • शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान राष्ट्र की मजबूत नींव तैयार करते हैं।
  • छात्राओं को चरित्र निर्माण और विकसित भारत 2047 के संकल्प के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

कार्यक्रम संचालन और समापन

कार्यक्रम का समापन “वंदे मातरम्” के साथ हुआ।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. अंजना शर्मा और डॉ. दीक्षिता अजवानी ने किया।

सांगानेर विभाग की कार्यवाहिका गीतांजलि पारीक ने आभार व्यक्त किया।

ऑनलाइन कंटेंट को रेगुलेट करने के लिए ऑटोनॉमस बॉडी की आवश्यकता – सर्वोच्च न्यायालय

ई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने ऑनलाइन कंटेंट को रेगुलेट करने की आवश्यकता दोहराई, और कहा कि यह तय करने के लिए एक ऑटोनॉमस बॉडी की ज़रूरत है कि क्या अलाउड किया जा सकता है और क्या नहीं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि “खुद को बताने वाली” बॉडी इस सिचुएशन को संभालने के लिए काफी नहीं होगी और रेगुलेटरी उपाय के तौर पर किसी ऐसी रेगुलेटरी बॉडी की ज़रूरत है, जो बाहरी प्रभाव से मुक्त हो।

न्यायालय ने पूछा, “कुछ समय के लिए यह तय करने के लिए सिर्फ़ एक ऑटोनॉमस बॉडी की ज़रूरत है कि कुछ अलाउड किया जा सकता है या नहीं…अगर अलाउड है तो ठीक है। अगर सब कुछ अलाउड हो गया तो क्या होगा?”

सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़ किया कि फंडामेंटल राइट्स को बैलेंस करना होगा और वह “किसी ऐसी चीज़ को मंज़ूरी नहीं देगा जो किसी का मुंह बंद कर सके”। मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि “अगर आप सब कोई उपाय लेकर आते हैं तो हम रेगुलेटरी उपाय का सुझाव देने वाले आखिरी व्यक्ति होंगे। आप सब कहते हैं कि यह और वह एसोसिएशन है…तो फिर ऐसे मामले क्यों हो रहे हैं?”

न्यायालय कॉमेडियन और पॉडकास्टर से जुड़ी पिटीशन पर सुनवाई कर रहा था, जो अपने ऑनलाइन बर्ताव की वजह से मुश्किल में पड़ गए। न्यायालय ने किसी को नीचा दिखाने वाले कंटेंट, खासकर दिव्यांग लोगों को नीचा दिखाने वाले कंटेंट से निपटने के लिए कड़े कानून बनाने की भी बात कही।

मुख्यन्यायधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक चेतावनी दिखाने की ज़रूरत है, जिसमें कहा गया कि ऐसा कंटेंट आम दर्शकों के लिए सही नहीं हो सकता है।

जस्टिस बागची ने कहा, “अश्लीलता किताब, पेंटिंग वगैरह में हो सकती है। अगर कोई नीलामी होती है… तो उस पर भी रोक हो सकती है। जैसे ही आप फोन ऑन करते हैं और कुछ ऐसा आता है जो आप नहीं चाहते या आप पर ज़बरदस्ती थोपा जाता है, तो क्या होगा?”

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वैसे तो आमतौर पर वॉर्निंग होती है, लेकिन एक एक्स्ट्रा उपाय के तौर पर उम्र का वेरिफिकेशन किया जा सकता है।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “देखिए, दिक्कत यह है कि वॉर्निंग दी जाती है और शो शुरू हो जाता है। लेकिन जब तक आप न देखने का फैसला करते हैं, तब तक यह शुरू हो जाता है। वॉर्निंग कुछ सेकंड के लिए हो सकती है…फिर शायद आपका आधार कार्ड वगैरह मांगा जाए। ताकि आपकी उम्र वेरिफाई हो सके और फिर प्रोग्राम शुरू हो। बेशक, ये सिर्फ उदाहरण के लिए सुझाव हैं…अलग-अलग एक्सपर्ट्स का कॉम्बिनेशन…ज्यूडिशियरी और मीडिया से भी कोई हो सकती है…कुछ पायलट बेसिस पर आने दें और अगर यह बोलने और बोलने की आज़ादी में रुकावट डालता है, तो उस पर तब गौर किया जा सकता है। हमें एक ज़िम्मेदार समाज बनाने की ज़रूरत है और एक बार ऐसा हो जाने पर, ज़्यादातर समस्याएं हल हो जाएंगी।”

मुख्य न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा, “आप SC/ST एक्ट की तरह ही एक बहुत कड़े कानून के बारे में क्यों नहीं सोचते…जहां उन्हें नीचा दिखाने पर सज़ा हो। उसी तरह।”

सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि यूज़र-जनरेटेड कंटेंट के संबंध में उपायों की ज़रूरत है, क्योंकि कोई व्यक्ति बोलने की आज़ादी की आड़ में “सब कुछ और कुछ भी” नहीं कर सकता।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा “यह अजीब है कि मैं अपना चैनल बनाता हूं और बिना किसी जवाबदेही के काम करता रहता हूं। हां, बोलने की आज़ादी की रक्षा होनी चाहिए…मान लीजिए कि एडल्ट कंटेंट वाला कोई प्रोग्राम है…पैरेंटल कंट्रोल से पहले से चेतावनी दी जा सकती है।”

जस्टिस बागची ने “एंटी-नेशनल” कंटेंट पर भी चिंता जताई और सवाल किया कि क्या इससे निपटने के लिए सेल्फ-रेगुलेशन काफी होगा।

“जब कंटेंट एंटी-नेशनल हो या समाज के ढांचे को नुकसान पहुंचाने वाला हो… तो क्या सेल्फ-रेगुलेशन काफी होगा? कानूनी आधार क्या है? रेगुलेशन ऐसी चीज़ से आया है, जिसे चुनौती दी जा रही है। वे रेगुलेशन इंटरमीडियरी को भी कवर करते हैं। मुश्किल रिस्पॉन्स टाइम की है और जब तक सरकार जवाब देती है, तब तक चीज़ें अरबों व्यूज़ के साथ वायरल हो चुकी होती हैं।”

जस्टिस बागची ने कहा,

“हम फ्री स्पीच को रेगुलेटेड अधिकार के हिसाब से देखते हैं। बेशक, कोई सरकारी अथॉरिटी यह तय नहीं कर सकती कि कोई पब्लिकेशन एंटी-नेशनल है या नहीं। लेकिन अगर यह अपने आप में ऐसा है जो देश की एकता, अखंडता और सॉवरेनिटी पर असर डालता है…”

लालकिला ब्लास्ट मामले में आतंकी उमर नबी का सहयोगी सोयब फरीदाबाद से गिरफ्तार

नई दिल्ली/फरीदाबाद।

लालकिला के समीप बम धमाके की जांच में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए सुसाइड हमलावर आतंकी डॉ. उमर नबी के नजदीकी सहयोगी सोयब को फरीदाबाद के गांव धौज से गिरफ्तार किया है। इस मामले में यह 7वीं गिरफ्तारी है।

सोयब हरियाणा के अल-फलह विश्वविद्यालय में वार्ड बॉय के रूप में कार्यरत था। उस पर आरोप है कि उसने उमर नबी को विस्फोटक सामग्री लाने और ले जाने में सहायता की और नूंह में अपनी साली अफसाना के घर में उसके लिए कमरा किराए पर दिलवाया। धमाके से पहले उमर नबी 10 दिन तक वहीं ठहरा था।

आतंकी मॉड्यूल से जुड़े डॉ. मुजम्मिल शकील की निशानदेही के बाद अब एनआईए डॉ. आदिल अहमद और डॉ. शाहीन सईद को अल-फलह विश्वविद्यालय में लेकर जाएगी। जांच में सामने आया है कि आदिल और उमर नबी कई वर्षों से परिचित थे। आदिल कई बार उमर से मिलने के लिए विश्वविद्यालय आया और उसके छात्रावास स्थित फ्लैट में ठहरा। इसी दौरान उसकी पहचान मुजम्मिल शकील और शाहीन सईद से कराई गई।

रिपोर्ट्स के अनुसार, फतेहपुरा तगा और धौज गांव में विस्फोटक सामग्री इकट्ठा करने की योजना आदिल ने ही सुझाई थी। उमर नबी और आदिल दोनों अनंतनाग के सरकारी अस्पताल में कार्यरत थे। बाद में आदिल सहारनपुर और उमर अल-फलह विश्वविद्यालय में तैनात हुए, लेकिन दोनों का संपर्क बना रहा।

जांच में पता चला है कि डॉ. शाहीन सईद आतंकी मॉड्यूल की महत्वपूर्ण सदस्य थी। वह विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम समिति में तीसरे स्थान पर थी और नए लोगों को नेटवर्क में जोड़ने तथा मानसिक रूप से प्रभावित करने का काम करती थी।

सत्य की सदा जय का आश्वासन है कोविदारध्वज…

सत्य की सदा जय का आश्वासन है कोविदारध्वज…

आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण, महंत श्रीसिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास

सत्यनिष्ठा से युक्त प्रतिभाएं पूर्ण होती हैं। सदुद्देश्य से किए उचित प्रयत्न विफल नहीं होते। पुण्यों का फल मनुष्य को प्राप्तव्य की प्राप्ति करा ही देता है। श्री राम जन्मभूमि मन्दिर पर ध्वजारोहण सनातन की इसी विश्वास-परंपरा का मानो पुण्य पर्व है। शताब्दियों का अनुताप तथा पीढ़ियों का सन्ताप दूर हुआ है। भारतीय जन के मन में बसा मन्दिर अब अयोध्या धाम की पावन भूमि पर प्रत्यक्ष है। इसके निर्माण और उससे जुड़े प्रश्नों तथा आक्षेपों का समाधान हो गया है। पूर्णता को प्राप्त हुए भव्य मन्दिर पर कोविदार ध्वज शोभा भुवनमोहिनी होगी। भारतीय परंपरा में ध्वज अस्मिता और प्रतिज्ञा के व्यन्जक होते हैं।

इनके माध्यम से ध्वजी अर्थात ध्वज धारण करने वाले का स्वरूप व्यक्त होता है। देवताओं के संबंध में प्रायः उनके वाहनों को ही उनके ध्वज-चिह्न के रूप में देखा जाता है। जैसे भगवान शिव का वाहन वृषभ है और वे वृषध्वज कहलाते हैं, इसी प्रकार कुमार कार्तिकेय का वाहन मयूर है और वे मयूरध्वज कहलाते हैं। ध्वज-चिह्नों में, जिसका ध्वज होता ,है उसके स्वभाव-स्वरूप के संकेत निहित होते हैं।

प्रायः विश्व भर में सभी राष्ट्रों के अपने ध्वज हैं और उनकी अपनी व्याख्याएं भी हैं। ध्वज के प्रकार, उनमें विद्यमान चिह्न एवं रंग आदि के भी महत्वपूर्ण सन्दर्भ होते हैं।

यह ध्वज रघुवंश का है, यह ध्वज रामराज्य का है और यह ध्वज भगवान् श्रीराम का है। सम्पूर्ण पहचान है। प्रभु श्रीराम बाल्यकाल से इस रथ में शोभित होते रहे हैं, इसलिए सहज ही उनके रथ को कोविदार ध्वज कहा जाता है…

शैशवे रघुनाथस्तु सवपितृस्यन्दनस्थितः।

अतः सोप्यस्य रामस्य कोविदारध्वजः स्मृतः॥

जैसे कोविदार पृथ्वी का भेदन करके उत्पन्न होने के गुण से अपना नाम प्राप्त करता हैं, वैसे ही सूर्य अपनी जीवनदायिनी किरणों के बल से धरती के गर्भ से सुप्त बीजों को अंकुरित कर देता है। यह सादृश्य कोविदार को सूर्यवंश की ध्वजा में अर्थवान् बनाता है। पवित्र वृक्षों की श्रेणी में कोविदार को कल्पवृक्ष के समान कहा गया है –

“मन्दारः कोविदारश्च पारिजातश्च नामभिः।

स वृक्षो ज्ञायते दिव्यो यस्यैतत् कुसुर्मात्तमम्।”

श्री राम जन्मभूमि मन्दिर पर कोविदार ध्वज में सूर्य एवं प्रणव भी दृश्य हैं। इस दृष्टि से विचार करने पर भगवान् श्रीराम का लोकोत्तर चरित्र हमारे सामने आता है। श्रीराम की चरित्रगत व्याप्ति एवं महानता को कोई एक चिह्न व्यक्त कर सकता है, ऐसा कहना कठिन है। उनके विराट् व्यक्तित्व एवं उनकी प्रभुता को व्यक्त करने वाले उनके ध्वज भी चार प्रकार के कहे गए हैं। आनन्द रामायण में इसकी सुंदर चर्चा करते हुए भगवान् श्रीरामभद्र के चार ध्वजों का वर्णन प्राप्त होता है। श्री रघुनंदन के रथ चार प्रकार के हैं, तदनुरूप उनके ध्वज भी चार हैं…..

चतुर्षु स्यन्दनेष्वेवं चत्वारः कीर्त्तिताः ध्वजाः।

श्री राम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर पूर्ण गौरव के साथ धर्म ध्वजारोहण

l l जय श्री राम l l

अयोध्या धाम, 25 नवम्बर।

रामराज्य का प्रतीक धर्मध्वज आज पूर्ण श्रद्धा के साथ श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के उत्तुंग शिखर पर चढ़ाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ध्वज को 191 फिट ऊंचाई पर चढ़ाने की प्रक्रिया पूरी की। हजारों की संख्या में उपस्थित हर जाति वर्ग के लोग भाव विभोर होकर पांच सौ वर्षों के निरंतर संघर्ष के बाद आए इस सार्थकता दिवस के साक्षी बने। इससे पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने रामदरबार में आरती कर रामलला का दर्शन पूजन किया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री, सरसंघचालक जी सहित सभी आगंतुकों का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि भव्य मंदिर पर ध्वजारोहण एक यज्ञ की पूर्णाहुति ही नहीं, अपितु नए युग का शुभारंभ है। रामराज्य के मूल्य कालजयी हैं। अनगिनत पीढ़ियों की प्रतीक्षा भव्य मंदिर के रूप में है। यह ध्वज धर्म और मर्यादा के साथ ही राष्ट्रधर्म और विकसित भारत की संकल्पना का प्रतीक है। “नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना..” की रामराज्य की परिकल्पना में सभी को अन्न, स्वास्थ्य सुविधा, आवास आदि उपलब्ध कराना है। यही रामराज्य की उद्घोषणा का संकल्प है। 500 वर्षों के संघर्ष के बाद इस ध्वजारोहण से अयोध्या अब उत्सवों की वैश्विक राजधानी बन गई है।

सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि आज का दिन हम सबके लिए सार्थकता का दिवस है। इसके लिए कितने लोगों ने सपना देखा, कितनों ने प्रयास किया, कितनों ने अपने प्राण अर्पण किए। अशोक जी, महंत रामचंद्र दास जी महाराज, डालमिया जी सहित कितने ही संत पुरुषों, गृहस्थ, विद्यार्थियों ने अपने प्रणार्पण किए, आज उनकी आत्माएं तृप्त हो रही होंगी। आज उस मंदिर निर्माण की शास्त्रीय प्रक्रिया पूर्ण हो गई। यह उसी ध्वज का आरोहण व रामराज्य का ध्वज है जो कभी अयोध्या में फहराता था और संपूर्ण विश्व में अपने आलोक से सुख शांति प्रदान करता था। उसी ध्वज को आज फिर से हमने नीचे से ऊपर चढ़ता हुआ, अपने शिखर पर विराजमान होते अपनी आंखों से देखा है। मंदिर बनने में भी समय लगा, 500 साल छोड़ें तो भी 30 साल तो लगे ही हैं। मंदिर के रूप में हमने कुछ तत्वों को उच्चतम शिखर पर पहुंचाया, जिससे सारा विश्व ठीक चले। व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन से लेकर तो संपूर्ण सृष्टि का जीवन ठीक चले, यही धर्म है। उस धर्म का प्रतीक भगवा रंग ही इस ध्वज का रंग है। इस धर्म ध्वज पर रघुकुल का प्रतीक कोविदार वृक्ष है। यह वृक्ष उस रघुकुल की सत्ता का प्रतीक है, जिससे यह व्यक्त होता है कि स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरों के लिए छाया प्रदान करें। ध्वजारोहण यह भी संदेश देता है कि इस जीवन का झंडा शिखर तक पहुंचना है, चाहे जितनी प्रतिकूलता, कठिनाई क्यों न हो। भले ही सारी दुनिया स्वार्थ में बैठी हो, लेकिन हमारा संकल्प सूर्य भगवान के तेज जैसा है। हिन्दू समाज ने लगातार 500 साल और बाद के दीर्घ आंदोलन में अपने इस तत्व को सिद्ध किया और रामलला आ गए, मंदिर बन गया। यह ध्यान रहे कि संपूर्ण दुनिया में सुख बांटने वाला भारतवर्ष खड़ा करने का काम शुरू हो गया है। इस प्रतीक को देखकर हिम्मत रखकर सतत प्रयास करते हुए, सब प्रकार की प्रतिकूलताओं में भी हम सबको मिलकर करना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि आज यह हमारे संकल्प की पुनरावृत्ति का दिवस है, जो संकल्प हमारे पूर्वजों ने दिया है। यह देश जहां हम जन्मे हैं, सबसे प्राचीन है, इसलिए बड़े भाई हैं, ऐसा जीवन जिएं कि पृथ्वी के सर्वमानव चरित्र की शिक्षा, जीवन की विद्या भारतवासियों से सीखें। सबको विकास का सुफल देने वाला भारतवर्ष खड़ा करना है। यह विश्व की अपेक्षा है, यही हमारा कर्तव्य है। मंदिर में श्री रामलला विराजमान हैं, उनका नाम लें और इस कार्य की गति बढ़ाएं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश और दुनिया इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बन रहे हैं। आज अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के उत्कर्ष बिंदु की साक्षी बन रही है। संपूर्ण भारत, संपूर्ण विश्व राममय है। राम भक्तों को संतोष, असीम कृतज्ञता, अपार अलौकिक आनंद है। सदियों का संकल्प आज सिद्धि को प्राप्त हो रहा है। आज उस यज्ञ की पूर्णाहुति है, जिसकी अग्नि 500 वर्ष तक प्रज्ज्वलित रही। यह एक पल भी आस्था से डिगी नहीं, एक पल भी विश्वास से टूटी नहीं। आज भगवान श्रीराम के गर्भगृह की अनंत ऊर्जा श्रीराम परिवार का दिव्य प्रताप, इस धर्म ध्वजा के रूप में दिव्यतम्, भव्यतम् मंदिर प्रतिस्थापित हुआ। यह पुनर्जागरण का ध्वज है, इसका भगवा रंग इस पर रचित सूर्यवंश की ख्याति, वर्णित ‘ॐ’ शब्द और अंकित कोविदार वृक्ष रामराज्य की कीर्ति को प्रतिरूपित करता है। यह ध्वज संकल्प है, सफलता है, संघर्ष से सृजन की गाथा है, सदियों से चले आ रहे सपनों का साकार स्वरूप है। यह ध्वज संतों की साधना और समाज की सहभागिता की सार्थक परिणीति है। यह धर्म ध्वज आह्वान करेगा सत्यमेव जयते का। यह धर्म ध्वज प्रेरणा बनेगा प्राण जाई पर वचन न जाई। धर्म ध्वजा कामना करेगा परेशानी से मुक्ति, समाज में शांति और सुख हो, यह ध्वज दूर से ही रामलला की जन्मभूमि के दर्शन कराएगा। युगों-युगों तक प्रभु श्री राम के आदेशों और प्रेरणा को मानव मात्र तक पहुंचाएगा। संपूर्ण विश्व के करोड़ों राम भक्तों को इस अद्वितीय अवसर की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। आज उन सभी भक्तों को भी प्रणाम करता हूं, हर उस दानवीर का आभार व्यक्त करता हूं, जिसने राम मंदिर निर्माण के लिए अपना सहयोग दिया। राम मंदिर के निर्माण से जुड़े हर श्रमवीर, हर कारीगर, हर योजनाकार, हर वास्तुकार सभी का अभिनंदन करता हूं।

अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्श आचरण में बदलते हैं। यही वह नगरी है, जहां श्रीराम ने अपना जीवन पथ शुरू किया था। इसी अयोध्या में संसार को बताया कि एक व्यक्ति कैसे समाज की शक्ति से, उसके संस्कारों से, पुरुषोत्तम बनता है। जब श्रीराम अयोध्या से वनवास को गए तो वे युवराज राम थे, लेकिन जब लौटे तो मर्यादा पुरुषोत्तम बन करके आए। उनके मर्यादा पुरुषोत्तम बनने में महर्षि वशिष्ठ का ज्ञान, महर्षि विश्वामित्र की दीक्षा, महर्षि अगस्त्य का मार्गदर्शन, निषाद राज की मित्रता, मां शबरी की ममता, भक्त हनुमान का समर्पण, इन सब की शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

विकसित भारत बनाने के लिए भी समाज की इसी सामूहिक शक्ति की आवश्यकता है। राम मंदिर का दिव्य प्रांगण भारत के सामूहिक समर्थ्य का भी चेतना स्थल बन रहा है। यहां सप्त मंदिर बने हैं, माता शबरी का मंदिर बना है जो जनजातीय समाज के प्रेम भाव और आतिथ्य परंपरा की प्रतिमूर्ति है। यहां निषादराज का मंदिर बना है, यह उस मित्रता का साक्षी है जो साधन नहीं, साध्य को, उसकी भावना को पूजती है। यहां एक ही स्थान पर माता अहिल्या है, महर्षि वाल्मीकि है, महर्षि वशिष्ठ है, महर्षि विश्वामित्र है, महर्षि अगस्त्य है और संत तुलसीदास हैं। रामलला के साथ-साथ इन सभी ऋषियों के दर्शन भी होते हैं। यहां जटायु जी और गिलहरी भी हैं, जो बड़े संकल्पों की सिद्धि के लिए हर छोटे से छोटे प्रयास के महत्व को दिखाती है। हमारे राम भेद से नहीं, भाव से जुड़ते हैं। उनके लिए व्यक्ति का कुल नहीं, उसकी भक्ति महत्वपूर्ण है। उन्हें वंश नहीं, मूल्य प्रिय है। शक्ति नहीं, सहयोग महान लगता है।

कार्यक्रम में राज्यपाल आनंदी बेन पटेल, ट्रस्ट अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास, कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंददेव गिरि सहित अन्य न्यासीगण व आमंत्रित संत समाज व अनेक प्रतिष्ठित जन उपस्थित रहे।

“भारत को जानें, भारत को मानें, भारत के बनें और फिर भारत को बनाएं” – डॉ. मनमोहन वैद्य

आठ वर्षों के अनुभव का संग्रह है ‘हम और यह विश्व’ – जगदीप धनखड़

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक डॉ. मनमोहन वैद्य की पुस्तक ‘हम और यह विश्व’ का विमोचन समारोह रवींद्र भवन में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में भारत की मूल अवधारणा, आत्मगौरव, सांस्कृतिक चेतना और अध्ययनशील परंपरा पर व्यापक चर्चा हुई। श्री आनंदम धाम आश्रम, वृंदावन के पीठाधीश्वर ऋतेश्वर जी महाराज, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, जागरण के समूह संपादक विष्णु त्रिपाठी, सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली और लेखक डॉ. मनमोहन वैद्य ने अपने विचार प्रकट किए।

डॉ. मनमोहन वैद्य ने भारतीयता, अध्ययन और विमर्श की आवश्यकता पर उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि भारत को बनाने से पहले आवश्यक है कि हम पहले भारत को मानें, उसके बाद भारत को जानें, फिर भारत के बनें और उसके बाद भारत को बनाएं। संघ के तृतीय वर्ष प्रशिक्षण वर्ग में जब श्री प्रणब मुखर्जी को संबोधन के लिए आमंत्रित किया गया था, तब कुछ लोगों ने बिना कारण विरोध किया। इस एक घटना ने मनमोहन जी को लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 में केवल 1 से 6 जून के बीच 378 लोगों ने उनसे मिलने का अनुरोध किया था, जो यह दर्शाता है कि संघ को लेकर समाज में संवाद की गहरी उत्सुकता है।

उन्होंने बताया कि संघ का बेवजह किया गया विरोध कई बार संघ की स्वीकार्यता को और बढ़ा देता है। जॉइन आरएसएस वेबसाइट का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि सिर्फ उस वर्ष अक्तूबर माह में ही 48,890 लोगों ने स्वयंसेवक के रूप में जुड़ने का अनुरोध किया। यह भारत के सामाजिक परिवर्तन और संगठन के प्रति बढ़ते आकर्षण को दर्शाता है।

भारत की अवधारणा पर उन्होंने कहा कि हमें उन कथनों को समझना होगा जो हमारी सोच को प्रभावित करते हैं। उन्होंने लोकप्रिय गीत “सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा” की पंक्ति “हम बुलबुले हैं इसके” पर बताया कि ऐसे भाव हमें अपनी मूल चेतना से दूर करते हैं। उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि भारत में सांस्कृतिक विविधता है। अपितु यह कहना अधिक सही है कि भारत की संस्कृति एक ही है जो विविध रूपों में प्रकट होती है। भारत में विविधता मूल संस्कृति की शाखाएं हैं, उसका विकल्प नहीं।

उन्होंने कहा कि वेलफेयर स्टेट की अवधारणा भारत की अपनी अवधारणा नहीं है, बल्कि पश्चिम से आयातित विचार है। भारत की परंपरा समाज-आधारित दायित्व पर आधारित रही है। यह पुस्तक चार महत्वपूर्ण खंडों में विभाजित है और प्रत्येक खंड भारत के विमर्शों पर नई दृष्टि प्रदान करता है।

अध्ययन ही भारत की परंपरा का मूल – विष्णु त्रिपाठी

जागरण समूह के समूह संपादक विष्णु त्रिपाठी ने कहा कि यह पुस्तक सिर्फ घर या पुस्तकालय में संग्रह के लिए नहीं लिखी गई है, बल्कि इसके अध्ययन, मनन और भाष्य की आवश्यकता है। भारत की परंपरा किसी एक पुस्तक या एक मत पर आधारित नहीं है। यहाँ ज्ञान की अनेक धाराएँ हैं। हमारी आध्यात्मिकता भी अध्ययन और चिंतन से ही जन्म लेती है। उन्होंने भारत की पहचान पर उठने वाले प्रश्नों पर स्पष्ट कहा कि भारत हिन्दू राष्ट्र है या नहीं जैसी बहसें अध्ययन के अभाव से उत्पन्न होती हैं। जब भारत और भारतीयता पर गौरव का भाव स्थापित हो जाता है, तो ऐसे प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने गुरुनानक देव जी का उदाहरण देते हुए बताया कि वे रामनाम के परम उपासक थे और बाबर की आलोचना सीधे अपने भजनों में करते हैं। इसी रामनाम के प्रसार के साथ वे बगदाद तक पहुँचे थे। यह उदाहरण भारतीय अध्यात्म की गहराई और व्यापकता दोनों को दिखाता है।

यह पुस्तक सोए हुए को जगा देगी” – पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि भोपाल आकर इस पुस्तक पर बोलने का अवसर उनके लिए सौभाग्य की बात है। हम और यह विश्व सिर्फ एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारत के गौरवशाली अतीत का दर्पण और भविष्य निर्माण की दिशा दिखाने वाला ग्रंथ है। कहा कि यह पुस्तक आठ वर्षों के अनुभवों का संग्रह है, जिसमें प्रणब मुखर्जी पर दो महत्त्वपूर्ण लेख भी शामिल हैं।

अंग्रेजी में वक्तव्य पर कहा कि मैं अंग्रेजी में इसलिए बोल रहा हूँ ताकि जो लोग देश की सकारात्मक छवि को समझना नहीं चाहते, वे भी स्पष्ट और सीधे शब्दों में भारत के वास्तविक स्वरूप से परिचित हों। आज का भारत तेजी से बदल रहा है, हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है और विश्व मंच पर एक मजबूत, आत्मविश्वासी और निर्णायक देश के रूप में उभर रहा है।

राजीव तुली ने सुरुचि प्रकाशन की परंपरा और भविष्य की दिशा का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि सुरुचि प्रकाशन समाज जीवन के विविध महत्वपूर्ण विषयों पर लगातार पुस्तकों, शोध कृतियों और विचारपरक सामग्री का प्रकाशन कर रहा है। आने वाले महीनों में वॉकिज़्म, पंच परिवर्तन और अन्य बौद्धिक मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण प्रकाशन सामने आने वाले हैं। “हम और यह विश्व” पुस्तक के पाठन के दौरान ऐसा महसूस होता है जैसे पाठक और पुस्तक के बीच सीधा संवाद स्थापित हो रहा हो। भले ही इस पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण पहले प्रकाशित हुआ था, लेकिन वर्तमान संस्करण में कई महत्त्वपूर्ण और विस्तृत जानकारियाँ जोड़ी गई हैं। यह पुस्तक आज के समाज के बड़े विमर्शों को पढ़ने, समझने और उनके भाष्य लिखने के लिए अत्यंत उपयोगी है।

हिड़मा के शव पर अर्बन नक्सलियों का श्रृगाल विलाप

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

छत्तीसगढ़ के बस्तर सहित कई राज्यों के निरपराध लोगों के ख़ून से रत्नगर्भा धरती को रक्तरंजित करने वाले माओवादी आतंकी ‘हिड़मा’ को सुरक्षा बलों ने मार गिराया। 18 नवम्बर 2025 को लाल आतंक का पर्याय हिड़मा मारा गया। इसके चलते जहां देशभर में ख़ुशी का वातावरण है। बस्तर सहित समूचा वनांचल में उसके आतंक का खौफ़ व्याप्त था। वहां के लोग सुकून की सांस लेने लगे। क्योंकि हिड़मा का मारा जाना माओवादी आतंक के सबसे मज़बूत किले का ढह जाना है। बस्तर में स्थायी शांति की बहाली का संकेत है। इसी बीच छग सरकार ने सदाशयता और मानवीयता दिखलाई। 20 नवम्बर को हिड़मा और उसकी माओवादी पत्नी के शव को अंतिम संस्कार के लिए उसके गांव पूवर्ती भेजा। शव आने की ख़बर के साथ ही माओवादियों का अर्बन मॉड्यूल तुरंत एक्टिवेट हुआ। पूरे लाव-लश्कर के साथ कई टीमें पूवर्ती पहुंचने लगीं। कुछ संस्थानों में बैठे लोग की-बोर्ड में माओवादी बारुद के साथ अलर्ट मोड में बैठ गए। देरी थी बस कुछ एक्सक्लूसिव तस्वीरों, भावुकता भरे वीडियोज, कुछ लोगों के स्क्रिप्टेड वर्जन (वर्सन)। ये इनपुट जैसे ही मिले सियारों का रुदन तुरंत चालू हो गया। अर्बन नक्सल गिरोह के सिपाही हिड़मा के अंतिम संस्कार के नाम पर सहानुभूति बटोरने, उसे ग्लोरीफाई करना शुरू कर दिया।

कामरेड के नाम पर उसके ऊपर काले कपड़ों वाली वर्दी रखी गई। अर्बन नक्सली ‘नक्सलवाद कभी ख़त्म न होने की’ बात कहते नज़र आए। भावनाओं को भुनाने के लिए नैरेटिव सेट किया गया कि – फलां-फलां फूट-फूटकर रोया। ये मिथ्यारोप लगाए गए कि “हिड़मा तो सरेंडर करने आया था। जवानों ने उसका नाहक में एनकाउंटर कर दिया।” – ये सब कितना सोचा समझा नैरेटिव है न? हिड़मा को ऐसा पेश किया जा रहा है कि जैसे वो कोई मासूम दुधमुंहा बच्चा रहा हो।

हिड़मा, वही माओवादी आतंकी है जिस पर 6 राज्यों ने तक़रीबन 1.80 करोड़ का ईनाम रखा था। जिसने ख़ुद 127 हत्याएं की थी। 600 माओवादी-नक्सलियों का जो हेड था। वो हिड़मा जिसने बस्तर के सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतारा। जनजातीय समाज के जीवन की खुशियां छीन लीं।

ये वही हिड़मा है, जिसने छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में सैकड़ों जवानों की हत्या की। सैकड़ों जवानों की हत्या की साज़िशें रचीं। मई 2013 का झीरम घाटी कांड, जिसमें कांग्रेस के कद्दावर नेता महेंद्र कर्मा सहित कई नेताओं की हत्या कर दी गई। उस दौरान सुरक्षाकर्मियों सहित कुल 33 लोगों की हत्या हुई थी। इसका मास्टरमाइंड हिड़मा ही था। हालांकि महेन्द्र कर्मा की हत्या और झीरम घाटी कांड के पीछे कुछ कांग्रेस के नेताओं द्वारा साज़िश रची जाने की बातें भी सुर्खियां बनीं थीं।

हिड़मा, अहम किरदार था। इन बातों में कितनी सच्चाई थी, इसका कोई अंतिम सत्य अभी तक आया नहीं  है। इससे पहले हिड़मा के नेतृत्व में – 2010 में दंतेवाड़ा में एक यात्री बस को बम के धमाकों से उड़ा दिया था। दंतेवाड़ा बस कांड में 20 जवानों सहित कुल 50 लोग मारे गए थे।

बस्तर क्षेत्र में हिड़मा जैसे माओवादी आतंकियों का कितना भय व्याप्त है। ये मैंने क़रीब से अनुभव किया है। 2024 में गर्मी के महीने में दंतेवाड़ा जाना हुआ। वहां के कुछ सुदूर ग्रामीण इलाकों में गया। एक राजनेता के घर ठहरना तय था। इसलिए उनके यहां गया। जब रास्ते से गुजर रहा था तो उन्होंने कई ऐसी जगहें दिखाई, जहां नक्सलियों ने ख़ूनी खेल रचा था। बीच रास्ते में जवानों की एंबुश लगाकर हत्या की थी। मेले से वापस लौट रहे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्थानीय लोगों की माओवादी आतंकियों ने क्रूरता के साथ हत्याएं की थी। IED लगाकर वाहन सहित उड़ा दिया था।

आख़िर में जब मैं उनके घर पहुंचा तो थोड़ा अचंभित हो गया। क्योंकि उनके घर में सुरक्षा के लिए कई ज़वान तैनात थे। उनके भाई अगर घर से बाहर निकलेंगे तो उनकी सुरक्षा में ज़वान साथ-साथ चलेंगे। शाम को एक निश्चित समय के बाद वो घर से बाहर कतई नहीं निकल पाएंगे। – जब मैंने उनसे इस संदर्भ में पूछा तो उन्होंने बताया कि – हम हर समय माओवादियों के निशाने पर हैं। उन्होंने कई घटनाओं का जिक्र भी किया। जब वो और उनके परिवार के लोग माओवादियों को चकमा देकर सुरक्षित बचे थे।….यह बताने की वजह ये है कि – नक्सलवाद-माओवादी आतंकवाद कितना खौफनाक है। इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। जिसने आम जनजीवन को तबाह कर दिया हो। निरपराधों के ख़ून से पूरे बस्तर को लथपथ कर दिया हो। उस नक्सलवाद-माओवाद के प्रति क्या कोई सहानुभूति हो सकती है?

ऐसे में हिड़मा के शव और उसकी मौत को लेकर जो लोग आंसू बहा रहे हैं। उनके मंसूबे क्या किसी से छिपे हैं? उस दुर्दांत माओवादी आतंकी की मौत पर मातमपुर्सी, संवेदनाओं का खेल रचना सब कुछ अर्बन नक्सलियों की स्क्रिप्ट का हिस्सा ही मालूम पड़ रहा है। ये सब इसलिए किया गया ताकि हिड़मा के नाम पर लोगों को बरगलाया जा सके। देश और विदेश में छिपे भारत-विरोधी-जनजातीय समाज के विरोधी – आकाओं को ख़ुश किया जा सके। क्योंकि अर्बन नक्सलियों के लिए यही तो फायदे का धंधा है।

वैसे इन अर्बन नक्सलियों को उन जवानों के लिए कभी आंसू बहाते नहीं देखा होगा, जिन्हें हिड़मा और उसके साथियों ने मार दिया। जो ‘की-बोर्ड’ के क्रांतिकारी और तथाकथित ‘मुखौटाधारी’ – हिड़मा को हीरो बनाने में जुटे रहे। मानवीय संवेदनाओं भरी स्टोरीज लिखते रहे। भावुकता भरे स्क्रिप्टेड वीडियो क्लिप जनरेट करते रहे। जबरदस्ती माइक ठूंसकर – संवेदनाओं की बयार बहाने में पूरी ताक़त झोंक दी। हिड़मा के अंतिम संस्कार के समय ऐसा चित्रित करते रहे जैसे हिड़मा कोई महान नायक रहा हो। जबकि उसका पूरा जीवन क्रूर आतंक का पर्याय है। छग के राजनांदगांव में इन्हीं माओवादियों से लोहा लेने वाले हॉक फोर्स के बलिदानी – आशीष शर्मा पर इनकी नज़र ही नहीं गई। नरसिंहपुर के बोहानी गांव में उनका भी 20 नवम्बर को ही अंतिम संस्कार हुआ।

वस्तुत:, ये वही ‘अर्बन नक्सली’ हैं, जिन्होंने हिड़मा जैसे न जाने कितने लोगों को ‘माओवादी आतंकी’ बनाया। विदेशी आकाओं के इशारों पर भारत की धरती को रक्तरंजित करने के लिए बस्तर के जनजातीय समाज के युवाओं, महिलाओं का ब्रेनवॉश किया। उनके हाथों में किताब की बजाय हथियार थमा दिया। ताकि छत्तीसगढ़ के बस्तर सहित लाल गलियारा कहे जाने वाले हिस्सों में विकास न पहुंच पाए। बस्तर अंचल के लोग सुख-शांति और समृद्धि के साथ न रह सकें।

अब हिड़मा की लाश पर माओवादी गिद्ध अपनी खोई हुई ज़मीन तलाश रहे हैं। हिड़मा जैसे क्रूर दुर्दांत अपराधी के नाम पर घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि अब न तो जंगल में छिपे नक्सली-माओवादी बचने वाले हैं। न ही मुखौटा लगाकर राष्ट्र घात करने वाले अर्बन नक्सली बचेंगे। बस इसीलिए वो हिड़मा के बहाने अपनी माओवादी आतंक की ज़मीन को बचाने की अंतिम कोशिश में जुटे हैं।

पूजन के द्वितीय दिवस पर श्रीराम सहस्रनामार्चन

अयोध्या, 22 नवम्बर। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में होने वाले ध्वाजारोहण कार्यक्रम के लिए द्वितीय दिवस भी विधि विधान से पूजन संपन्न हुआ। एक हजार तुलसी पत्र से भगवान श्री राम का सहस्र नामार्चन हुआ।

आचार्यों द्वारा पहले दिन की भांति ही गणपति पूजन, पंचांग पूजन, षोडष मातृका पूजन के बाद मंडप प्रवेश पूजन कराया गया। इसके बाद योगिनी पूजन, क्षेत्रपाल पूजन, वास्तु पूजन, नवग्रह पूजन, और प्रधान मंडल के रूप में रामभद्र मंडल व अन्य मंडलों का आवाहन पूजन हुआ।

यजमान डॉ. अनिल मिश्र व अन्य यजमानों ने अर्द्धांगिनी सहित पूजन किया। इस अवसर पर मुख्य आचार्य चंद्रभान शर्मा, उपाचार्य रविंद्र पैठणे, यज्ञ के ब्रह्मा व आचार्य पंकज शर्मा ने पूजन संपन्न कराया। पूजन व्यवस्था प्रमुख आचार्य इंद्रदेव मिश्र व आचार्य पंकज कौशिक की देखरेख में समस्त अनुष्ठान संपन्न हुआ।

खैरागढ़ महोत्सव के समापन समारोह

ज्यपाल ने इस अवसर पर कहा कि खैरागढ़ की सांस्कृतिक धरोहर न केवल छत्तीसगढ़ की पहचान है, बल्कि यह भारत की विविध कला-पद्धतियों का जीवंत केंद्र भी है। उन्होंने बताया कि यहां की संस्कृति रामायण काल से भी प्राचीन है। उन्होंने कहा कि संस्कृति के संरक्षण में ग्रामीणों की भूमिका अहम होती है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी में कला के प्रति प्रेम और संरक्षण की प्रेरणा जगाते हैं तथा कलाकारों को अपने हुनर के प्रदर्शन का महत्वपूर्ण मंच प्रदान करते हैं। 
         
समारोह में विशिष्ट अतिथि रायपुर सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि खैरागढ़ भारत की कला-राजधानी के रूप में उभर रहा है और यह महोत्सव आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त करेगा। 

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. लवली शर्मा ने कहा कि खैरागढ़ महोत्सव विद्यार्थियों की साधना, सृजनशीलता और कला-अनुसंधान का सशक्त मंच है तथा विश्वविद्यालय भविष्य में राष्ट्रीय कला केंद्र के रूप में स्थापित होगा। 

समारोह में नृत्य संकाय के विद्यार्थियों ने कथक, भरतनाट्यम व ओडिसी नृत्य की सधी हुई प्रस्तुतिया दी। कोलकाता से आए मशहूर सरोदवादक उस्ताद सिराज अली खान और लंदन के तबला वादक पंडित संजू सहाय की जुगलबंदी ने संगीतमय वातावरण रचा। पंडित संजू सहाय के द्वारा तबला वादन की प्रस्तुति दी गई। पुणे की प्रख्यात कथक नृत्यांगना विदुषी शमा भाटे एवं उनके समूह ने रामायण के विभिन्न प्रसंगों पर कथक नृत्य की प्रस्तुतियां दी । 

राजनांदगांव की लोकगायिका श्रीमती कविता वासनिक एवं उनके दल ने लोकसंगीत अनुराग धारा की प्रस्तुति दी।

श्री राम जन्मभूमि मंदिर ध्वजारोहण समारोह प्रथम दिवस पूजन

अयोध्या, 21 नवम्बर। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में होने वाले ऐतिहासिक ध्वजारोहण कार्यक्रम के लिए विधिविधान से पूजन अर्चन शुरू हुआ। इस अवसर पर पूर्ण वैदिक रीति से विभिन्न पूज्य देवताओं का आवाहन किया गया।

गुरुवार को हुई श्रद्धाभक्ति से परिपूर्ण सफल कलश यात्रा के बाद शुक्रवार सुबह से क्रमशः वैदिक मर्मज्ञ आचार्यों द्वारा गणपति पूजन, पंचांग पूजन, षोडष मातृका पूजन के बाद मंडप प्रवेश पूजन कराया गया। इसके बाद योगिनी पूजन, क्षेत्रपाल पूजन, वास्तु पूजन, नवग्रह पूजन, और प्रधान मंडल के रूप में रामभक्त मंडल व अन्य समस्त पूज्य मंडलों का आवाहन पूजन हुआ।

तदोपरान्त अरणि मंथन से अग्निकुण्ड में मंत्रोच्चार के साथ अग्नि स्थापना की गई। यजमान डॉ. अनिल मिश्र ने अर्द्धांगिनी सहित पूजन किया। इस अवसर पर मुख्य आचार्य चंद्रभान शर्मा, उप-आचार्य रविंद्र पैठणे, यज्ञ के ब्रह्मा व आचार्य पंकज शर्मा ने पूजन संपन्न कराया। पूजन व्यवस्था प्रमुख आचार्य इंद्रदेव मिश्र व आचार्य पंकज कौशिक की देखरेख में संपन्न हुई।

अतिथियों के लिए सात स्थानों पर संचालति होंगे भोजनालय

श्री राम जन्मभूमि मन्दिर ध्वजारोहण समारोह में आने वाले अतिथियों के लिए श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की ओर से अलग-अलग सात स्थानों पर आठ भोजनालय स्थापित किए गए हैं। आमंत्रित अतिथियों को भोजनालयों में जलपान के लिए पहुंचाया जाएगा। संपूर्ण परीक्षण के बाद ही यहां से आगे गोल्फ कोर्ट से कार्यक्रम में भेजा जाएगा। इसके लिए पानी की व्यवस्था की जा रही है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र द्वारा संचालित सीता रसोई के संचालक व विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मंत्री राजेंद्र सिहं “पंकज” के अनुसार सीता रसोई के अतिरिक्त देश के विभिन्न क्षेत्र में अन्न क्षेत्र चलाने वाले भक्त संगठन भी भोजनालयों में सहयोग कर रहे हैं।

चयनित स्थानों में कारसेवकपुरम में सीता रसोई के साथ पंजाब अमृतसर के दुर्ग्याना मंदिर की ओर से भोजन सेवा होगी। इसकी क्षमता 2 से 2.5 हजार आगंतुकों की है। इसके अतिरिक्त रामसेवकपुरम में सीता रसोई द्वारा 800 से एक हजार क्षमता वाले, कार्यशाला में जम्मू कश्मीर कटरा स्थित हनुमान मंदिर की ओर से भोजनालय संचालित होगा। यहां आने वाले सभी भक्तों को प्रसाद मिलेगा, संख्या का निर्धारण नहीं है। कनक महल में एक हजार की क्षमता का भोजनालय संचालित होगा। तीर्थक्षेत्रपुरम् में दो भोजनालयों का संचालन होगा। यहां की क्षमता भी लगभग ढाई हजार है। तीर्थक्षेत्र भवन में 800 से एक हजार क्षमता का भोजनालय संचालित होगा। इसके अतिरिक्त अंगद टीला में हरियाणा कैथल के भक्तों व सीता रसोई द्वारा यहां पहुंचने वाले समस्त श्रद्धालुओं को प्रसाद का वितरण होगा।

केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने किया छत्तीसकला ब्राण्ड एवं डिजिटल फाइनेंस बुकलेट का किया विमोचन

ग्रामीण महिला उत्पादों को मिला राज्य का पहला एकीकृत ब्राण्ड ‘छत्तीसकला’

      राज्य की ग्रामीण गरीब महिलाओं द्वारा निर्मित गुणवत्तापूर्ण उत्पादों को एक ही पहचान और एकीकृत बाजार मंच प्रदान करने के उद्देश्य से राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) ने ‘छत्तीसकला’ ब्राण्ड की शुरुआत की है। इस ब्रांड के अंतर्गत वर्तमान में मिलेट्स आधारित खाद्य उत्पाद, चाय, अचार, स्नैक्स, हैंडलूम एवं हस्तशिल्प निर्मित ढोकरा आर्ट, बांस शिल्प, मिट्टी एवं लकड़ी उत्पाद, अगरबत्ती एवं पूजा सामग्री जैसे विविध उत्पादों पर मानकीकरण, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के साथ व्यापक बाजार उपलब्ध कराने की योजना है। केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने कहा कि छत्तीसकला ब्रांड ग्रामीण महिलाओं की मेहनत, हुनर और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनेगा। यह ब्राण्ड उनके उत्पादों को राज्य से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक ले जाएगा।

48 बीसी सखियों की सफलता की गाथा का डिजिटल फाइनान्स बुकलेट का हुआ विमोचन

         कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने डिजिटल फायनान्स बुकलेट का भी विमोचन किया गया,  जिसमें राज्यभर की 48 बैंकिंग कोरेस्पोंडेंट सखियों (बीसी सखियों) की प्रेरणादायक सफलताओं को दर्ज किया गया है। 

3775 बीसी सखियाँ सक्रिय रूप  बैंकिंग सेवाएँ दे रही

       वर्तमान छत्तीसगढ़ में कुल 3775 बीसी सखियाँ सक्रिय रूप से घर-घर बैंकिंग सेवाएँ दे रही हैं और पिछले चार वर्षों में 3033.48 करोड़ से अधिक का वित्तीय लेन-देन कर चुकी हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जो महिलाएँ कभी घरों से बाहर निकलने में संकोच करती थीं, आज वही महिलाएँ गाँव-गाँव वित्तीय सेवाएँ पहुँचाकर सामाजिक व आर्थिक परिवर्तन की राह बना रही हैं।

हजारों स्व-सहायता समूह को मिला वित्तीय सशक्तिकरण

     इस भव्य कार्यक्रम से ग्रामीण महिला समूहों को बड़ी वित्तीय सहायता प्रदान की गई है। जिसके अंतर्गत 1080 स्व-सहायता समूहों को 1.62 करोड़ रुपए की रिवॉल्विंग निधि एवं 8340 स्व-सहायता समूहों को 50.04 करोड़ रूपए की सामुदायिक निवेश निधि, बैंक लिंकेज के रूप में 229.74 करोड़ रूपये प्रदान किये गए। इसके साथ ही 1533 महिला उद्यमियों को 6.23 करोड़ रुपए का उद्यमिता ऋण भी प्रदान किया गया है। इन वित्तीय प्रावधानों से ग्रामीण महिलाओं की आय में वृद्धि एवं नए उद्यमों की स्थापना और आर्थिक स्वावलंबन को मजबूती मिलेगी।

ग्रामीण समृद्धि, महिला नेतृत्व और आत्मनिर्भरता की नई दिशा

        धमतरी में हुआ यह आयोजन न केवल आर्थिक सहायता का वितरण था, बल्कि ‘आत्मनिर्भर ग्रामीण छत्तीसगढ़’ के संकल्प को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है। ‘छत्तीसकला’ ब्राण्ड, बीसी सखी मॉडल और व्यापक वित्तीय समर्थन तीनों मिलकर ग्रामीण आजीविका की दशा और दिशा बदलने वाले साबित होंगे।

भारत के उत्थान के लिए “भारत प्रथम” के सिद्धांत पर चलना अनिवार्य

गुवाहाटी, 19 नवम्बर 2025।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने असम और सम्पूर्ण पूर्वोत्तर के युवाओं से अपील की कि वे संघ के बारे में किसी प्रकार की पूर्वाग्रही धारणाओं या प्रायोजित प्रचार के आधार पर राय न बनाएं। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को संघ को नज़दीक से देखना और समझना चाहिए।

बुधवार को शहर के बरबाड़ी स्थित सुदर्शनालय में आयोजित युवा नेतृत्व सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों से आए सौ से अधिक युवा प्रतिनिधियों के समक्ष उन्होंने संघ के सिद्धांतों, आदर्शों और कार्यपद्धति पर विस्तार से रखा और संगठन के बारे में चल रही बहसों पर भी प्रकाश डाला।

दो दिवसीय असम प्रवास के तहत कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज संघ एक व्यापक चर्चा का विषय बन चुका है। “लेकिन चर्चाएँ तथ्यों पर आधारित हों।”

अंतरराष्ट्रीय मंचों और कई डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध आरएसएस संबंधी जानकारी का 50 प्रतिशत हिस्सा या तो गलत होता है या अधूरा। “विभिन्न मीडिया संस्थानों द्वारा संघ के खिलाफ सुनियोजित दुष्प्रचार भी चलाया जाता है।”

कार्यक्रम की शुरुआत गायक शरत राग द्वारा प्रस्तुत एक देशभक्ति गीत से हुई। आयोजन को पूरे पूर्वोत्तर के युवाओं के लिए संघ को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

सरसंघचालक जी ने संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की दृष्टि का उल्लेख करते हुए बताया कि संघ का मूल उद्देश्य भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाना है। राष्ट्र तभी उठता है, जब समाज उठता है। और प्रगतिशील भारत के लिए एक संगठित, गुणवान और गुणवत्तापूर्ण समाज का निर्माण आवश्यक है। उन्होंने विकसित देशों के इतिहास का अध्ययन करने की आवश्यकता बताई और कहा कि उन देशों ने पहली सौ वर्षों की यात्रा में समाज को एकजुट और मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दिया। “भारतीय समाज को भी इसी प्रकार विकसित होना होगा।”संघ के शताब्दी वर्ष पर घोषित पांच सामाजिक परिवर्तन सिद्धांत (पंच परिवर्तन) इसी भावना को व्यक्त करते हैं। सरसंघचालक जी ने कहा कि भाषा, क्षेत्र और विचारों की विविधताओं का सम्मान करना भारत की प्राचीन परंपरा है। “दुनिया के कई देशों में यह मानसिकता नहीं मिलती।”

भारत की परंपरा कहती है – “मेरा मार्ग सही है, लेकिन तुम्हारी परिस्थिति में तुम्हारा मार्ग भी सही हो सकता है।” उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जो लोग भारत से अलग हुए, उनकी विविधताएँ समाप्त होती गईं, जैसे पाकिस्तान में पंजाबी और सिंधी समाज अब उर्दू अपनाने पर विवश है। उन्होंने कहा कि विविधता का सम्मान करने वाला समाज हिन्दू समाज ही है और ऐसा समाज निर्मित करना ही संघ का प्रमुख उद्देश्य है। “जब तक भारतीय समाज संगठित और गुणयुक्त नहीं होगा, देश की नियति नहीं बदलेगी।”

उन्होंने गुरु नानक और श्रीमंत शंकरदेव का स्मरण करते हुए कहा कि इन महान संतों ने विविधता का सम्मान किया और समाज को एकता का संदेश दिया।

मोहन भागवत जी ने कहा कि आरएसएस एक आदर्श मनुष्य-निर्माण पद्धति है। संगठन का उद्देश्य जमीनी स्तर पर ग़ैर राजनीतिक सामाजिक नेतृत्व तैयार करना है। व्यक्ति के निर्माण से समाज बदलता है और समाज बदलता है तो व्यवस्था स्वयं बदल जाती है। उन्होंने युवाओं को आमंत्रित किया कि वे संघ की शाखाओं में प्रत्यक्ष अनुभव लें कि वहां किस प्रकार व्यक्तित्व का निर्माण, चरित्र का विकास और गुणों का संवर्धन किया जाता है।

उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार का अंत कानून से नहीं होगा, बल्कि चरित्र निर्माण से होगा। इसी प्रकार, गौ-संरक्षण केवल कानूनी प्रावधानों से संभव नहीं है; इसके लिए समाज में जागरूकता भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि भारत के उत्थान के लिए “भारत प्रथम” के सिद्धांत पर चलना अनिवार्य है। भारत को किसी भी विदेशी देश के प्रति न तो पक्षपाती होना चाहिए और न ही विरोधी। अमेरिका और चीन अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर चलते हैं, और उनकी आपसी प्रतिस्पर्धा भी इन्हीं हितों का परिणाम है, चाहे वे वैश्विक भाईचारे की कितनी ही बातें क्यों न करें। हमारी नीति बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए – भारत की विदेश नीति पूर्णतः ‘प्रो-भारत’ होनी चाहिए, न कि अमेरिका या चीन के पक्ष या विपक्ष में। जब हम अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हैं, तो वैश्विक कल्याण अपने-आप सुनिश्चित होता है। एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होगा और भविष्य में विश्व में उत्पन्न विभिन्न संघर्षों को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए एक अधिक सौहार्दपूर्ण वैश्विक व्यवस्था स्थापित कर सकेगा।

युवाओं से आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि वे अपनी रुचि, समय, क्षमता और अवसर के अनुसार संघ की गतिविधियों से जुड़ें। संघ समाज का अविभाज्य हिस्सा है और पूर्वोत्तर भारत में इसका आधार लगातार मजबूत होता जा रहा है।

जनजातीय गौरव दिवस समारोह का ऐतिहासिक क्षण : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु को भेंट की धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की बस्तर आर्ट प्रतिमा

रायपुर : जनजातीय गौरव दिवस समारोह का ऐतिहासिक क्षण : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु को भेंट की धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की बस्तर आर्ट प्रतिमा

रायपुर, 20 नवंबर 2025
जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर अंबिकापुर में आयोजित कार्यक्रम में एक प्रेरक एवं गरिमामय क्षण देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु को बस्तर आर्ट में निर्मित धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा स्मृति-चिह्न के रूप में भेंट की। यह प्रतिमा जनजातीय विरासत, शौर्य और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक मानी जाती है।
मुख्यमंत्री श्री साय द्वारा भेंट की गई यह मूर्ति भगवान बिरसा मुंडा के बलिदान और जनजातीय समाज की गौरवपूर्ण परंपराओं को सम्मानपूर्वक स्मरण कराने वाला एक सशक्त प्रतीक है। कार्यक्रम स्थल पर मौजूद दर्शकों ने इस भावनात्मक क्षण का गर्मजोशी से स्वागत किया।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि राज्य सरकार आदिवासी समाज की समृद्ध परंपराओं, कला, इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार जनजातीय समाज की विरासत, संस्कृति और अमूल्य योगदान को संजोने, संरक्षित करने और सशक्त रूप से आगे बढ़ाने के लिए पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। 
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि हमारा संकल्प है कि आदिवासी समाज के स्वाभिमान को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया जाए, ताकि उनकी गौरवशाली पहचान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा बने।
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संस्कृत विषय के प्रमाणपत्रीय पाठ्यक्रम का उद्‌घाटन एवं दीक्षारंभ समारोह का हुआ आयोजन

पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा IKS में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के द्वारा संस्कृत भाषा में एक सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स शुरू किया गया है l इसी समबन्ध में प्रमाण पत्रीय पाठ्यक्रम का उद्घाटन एवं दीक्षारंभ कार्यक्रम का आयोजन हुआ l

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० साच्चिदानन्द शुक्ला , तथा कार्य परिषद के वरिष्ठ सदस्य एवं विप्र महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ० मेघेश तिवारी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।समारोह में मुख्य वक्ता श्री दुधाधारी महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ० प्रवीण कुमार झारी थे।

कुलपति प्रो० साच्चिदानन्द शुक्लान कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक विरासत की मूलधारा है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल भारत की लगभग सभी महान ग्रंथ— वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत, रामायण, पुराण, आयुर्वेद, योग, ज्योतिष, वास्तु, दर्शनशास्त्र—सब संस्कृत में हैं। इन ग्रंथों की सही समझ केवल संस्कृत के माध्यम से ही संभव है। संस्कृत विज्ञान और गणित की प्राचीन तथा उन्नत भाषा है l संस्कृत में वैज्ञानिक भाषा की सबसे बड़ी विशेषता है: स्पष्टता (Precision) , बिना भ्रम के अभिव्यक्ति, कंप्यूटर-फ्रेंडली संरचना l NASA और कई विश्व के भाषाविदों ने इसे सबसे लॉजिकल और स्ट्रक्चर्ड लैंग्वेज माना है। संस्कृत भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत 80% से अधिक भारतीय भाषाओं की आधारभूत भाषा है।
यदि संस्कृत मजबूत होगी, तो हिन्दी, मराठी, बंगाली, उड़िया, कन्नड़, सभी भाषाएं समृद्ध होंगी। यह योग व आयुर्वेद की प्रामाणिक भाषा है l आज पूरी दुनिया योग और आयुर्वेद अपना रही है, पर उनकी असली व्याख्या और सूत्र संस्कृत में ही हैं।
उदाहरण: पतंजलि योगसूत्र, चरक-संहिता, सुश्रुत-संहिता आदि l संस्कृत भाषाई कौशल को बढ़ाती है संस्कृत सीखने से: तर्कशक्ति विकसित होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है, उच्चारण सुधरता है, व्याकरण और भाषा-ज्ञान में गहराई आती हैl संस्कृत राष्ट्र की एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है l भारत विविध भाषाओं वाला देश है। संस्कृत एक ऐसी भाषा है जो सभी क्षेत्रों को कुल-धर्म भाषा (Pan-Indian Language) की तरह जोड़ सकती हैl आज दुनिया भर में संस्कृत के

  • विश्वविद्यालय,
  • शोध केंद्र,
  • डिजिटल प्रोजेक्ट
  • भाषावैज्ञानिक अध्ययन
    तेजी से बढ़ रहे हैं। जिससे विश्व में संस्कृत भाषा की प्रतिष्ठा बढ़ रही है l
    यह इसकी वैश्विक महत्ता को प्रमाणित करता है l संस्कृत भारत की पहचान, बौद्धिक शक्ति, सांस्कृतिक मूल, वैज्ञानिक दृष्टि और आत्मगौरव की भाषा है। इसे अपनाना भारत की आत्मा को अपनाना है l

प्रो. ब्रम्हे ने बताया कि कार्यक्रम में 100 से अधिक विद्यार्थि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन केंन्द्र की शिक्षिका निशा मिश्रा ने किया। डॉ. मेघेश तिवारी ने छात्रों के लिए संस्निकृत के नियमित अध्ययन के साथ संस्कृत में प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम को उपयोगी बताया। विवि० के कुलअनुषासक प्रो. आशीष कुमार श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापित कर कार्यक्रम का समापन किया।

भारत का भविष्य केवल अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि संस्कृति, चरित्र और समन्वित ज्ञान से निर्धारित होगा – सुनील आंबेकर जी

काशी, 16 नवम्बर। काशी में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले साहित्यिक समागम “काशी शब्दोत्सव” के तृतीय संस्करण का शुभारम्भ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन सभागार में हुआ। समागम के उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी, मुख्य अतिथि श्रीहनुमन्निवास अयोध्या के श्रीमहंत आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत चतुर्वेदी थे।

सुनील आंबेकर जी ने कहा कि काशी में आधुनिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा का जो अद्वितीय संगम दिखाई देता है, वह हमारे राष्ट्र की वास्तविक शक्ति और दृष्टि का प्रतीक है। भारत की सांस्कृतिक धारा में नवीनता और परंपरा कभी परस्पर विरोधी नहीं रही; बल्कि नई परिस्थितियों के अनुरूप पुराने ज्ञान का पुनर्मूल्यांकन ही हमारी परंपरा का स्वभाव रहा है। समय चाहे कितना भी बदल जाए, भारत ने हमेशा यही दृष्टि रखी है कि पुराना और नया अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही प्रवाह के दो आयाम हैं। इसी विमर्श हेतु काशी में आयोजित काशी शब्दोत्सव आधुनिक विश्व के कल्याण का मंत्र देगा।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के समय भी यही भावना केंद्रीय थी- भारत के पारंपरिक ज्ञान को दुनिया के किसी भी कोने से आने वाले आधुनिक विज्ञान और तकनीक से जोड़कर एक समन्वित शिक्षा प्रणाली का निर्माण। इसी समन्वय ने पूरे देश में राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की और महाराष्ट्र सहित देश के कई भागों में राष्ट्रीय विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना हुई।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार स्वयं इसी राष्ट्रीय शिक्षा परंपरा का हिस्सा रहे। अंग्रेज़ी शासन के नील सिटी विद्यालय से वंदे मातरम् कहने पर निकाले जाने के बाद उनकी शिक्षा यवतमाल के राष्ट्रीय विद्यालय में हुई। आगे चलकर उन्होंने कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज में भी अध्ययन किया। जहाँ भारतीय परंपरा और विश्व के नवीनतम ज्ञान का संगम था। यह दर्शाता है कि, भारत ने दुनिया के नए ज्ञान को अपनाते हुए भी अपनी स्वयं की ज्ञानधारा को कभी छोड़ा नहीं, बल्कि उसे और समृद्ध किया।

इसी समन्वित दृष्टि के कारण भारत में ज्ञान की अनेक शाखाएँ विदेशी आक्रमणों और कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहीं। यदि यह प्रयास न होते, तो पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों का वह षड्यंत्र सफल होता जो भारतीय ज्ञान और संस्कृति को पूरी तरह समाप्त करना चाहते थे। परंतु हमारी परंपरा की शक्ति के कारण सरस्वती की धारा पुनः प्रवाहित हुई और आज भी हम उसके लाभार्थी हैं। काशी विश्वविद्यालय इसी अखंड परंपरा का सशक्त वाहक है।

आज दुनिया अत्याधुनिक तकनीकों – विशेषतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में प्रवेश कर चुकी है। पिछले तीन सौ वर्षों में तकनीक, मशीनों और बाज़ारों ने मानव जीवन को सुविधा तो दी, परंतु अनेक स्थानों पर मनुष्य और प्रकृति के बीच की संवेदनशीलता को क्षीण भी किया। दुनिया के कई देशों में ‘पारिवारिक ढाँचे, सामाजिक रिश्ते और पर्यावरण’ गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। मानव जीवन का मूल प्रश्न केवल तकनीकी उन्नति नहीं है, बल्कि यह है कि, तकनीक को नियंत्रित कौन करेगा? क्या मनुष्य तकनीक का चयन करेगा, या तकनीक और बाज़ार मनुष्य के जीवन का निर्धारण करेंगे? यही आगामी शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

भारत के सामने यह चुनौती है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाते हुए भी वह अपने ‘सांस्कृतिक मूल्यों – सात्विकता, करुणा, वसुधैव कुटुंबकम् और संतुलित जीवन’ को बनाए रखे। हमारी परंपरा में शक्ति और सात्विकता का मेल ही जीवन को कल्याणकारी बनाता है। शक्ति बिना सात्विकता के विनाश का कारण बनती है; परंतु शक्ति का उपयोग यदि नैतिकता, संयम और विश्व-कल्याण के लिए किया जाए, तो वह सृजन का आधार बनता है।

भारत ने कोविड-19 महामारी के समय इसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिया। विश्व के अनेक शक्तिशाली और सम्पन्न राष्ट्र वैक्सीन को बाज़ार और लाभ के दृष्टिकोण से देखते रहे, वहीं भारत ने उसे सेवा और मानवता के दृष्टिकोण से दुनिया के लिए उपलब्ध कराया। यह हमारे सांस्कृतिक संस्कारों का ही परिणाम था।

सुनील जी ने कहा कि आज भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार में निरंतर प्रगति हो रही है। लेकिन आर्थिक प्रगति के साथ-साथ एक नया विकास मॉडल तैयार करना आवश्यक है। जो केवल GDP आधारित न होकर संस्कृति, पर्यावरण, परिवार, नैतिकता और मानवता पर आधारित हो। पश्चिम के कई देशों ने यह भूल की है कि आर्थिक उन्नति ही जीवन का अंतिम उद्देश्य है और आज वे उसके दुष्परिणाम भोग रहे हैं। भारत को यह भूल दोहरानी नहीं चाहिए।

हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों तक समृद्धि और उत्कृष्ट संस्कृति – दोनों को साथ रखकर दिखाया था। आज हमें पुनः वही अवसर प्राप्त हो रहा है। इस अवसर को तभी सार्थक बनाया जा सकता है, जब हम तकनीकी प्रगति को भारतीय जीवन मूल्यों से जोड़ें। इस प्रक्रिया में चरित्र निर्माण सर्वोपरि है। चरित्रहीनता किसी भी समाज, संगठन या राष्ट्र की एकता को नष्ट कर देती है। अच्छे चरित्र का निर्माण भी किसी अन्य कौशल की तरह अभ्यास से ही होता है जो बचपन से शुरू होकर आजीवन चलता है।

भारत हजारों वर्षों तक विविधताओं के बावजूद इसलिए एकजुट रहा, क्योंकि उसके लोगों में उच्च चरित्र और नैतिकता थी। यदि आज समाज में तनाव, विभाजन और प्रवंचना दिखाई देती है, तो उसका मूल कारण चरित्र और संस्कारों की कमी है। इसलिए ‘व्यक्ति का चरित्र और राष्ट्र की आराधना’ दोनों साथ-साथ चलते हैं।

IIT मुंबई में चल रहा एआई और भारतीय ज्ञान–परंपरा का संयुक्त प्रकल्प इस बात का प्रमाण है कि भारत आधुनिक तकनीक को भी सांस्कृतिक दृष्टि से एकात्म करने की क्षमता रखता है। धर्म और संस्कृति को आधुनिक संदर्भ में समझना भी आज अत्यंत आवश्यक है। भारतीय संस्कृति बाइनरी या विभाजनकारी दृष्टि पर आधारित नहीं है। हम मुकाबले में नहीं, बल्कि परस्पर-पूरक दृष्टि में विश्वास रखते हैं। शहर-गाँव, पुरुष-स्त्री, परंपरा-आधुनिकता, विज्ञान-अध्यात्म, भाषा, ये सब विरोध नहीं, बल्कि एक ही अखंड संस्कृति के विविध रूप हैं।

उन्होंने कहा कि संवाद ही हमारी संस्कृति का मूल है। बिना संवाद परिवार, समाज और राष्ट्र नहीं टिक सकते। आज दुनिया में अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ केवल राजनीतिक संतुलन ढूँढती हैं। परंतु शांति का वास्तविक आधार संवाद, समझ और सहानुभूति ही है। भाषाई विवाद, क्षेत्रीय राजनीति, जातीय विभाजन – ये सब भारत की एकता के विरुद्ध षड्यंत्र हैं। काशी–तमिल संगम जैसी पहल यह दर्शाती है कि संवाद और संस्कृति के माध्यम से भारत की एकात्मता और अखंडता और अधिक सुदृढ़ हो सकती है।

अतः आधुनिक विकास और भारतीय संस्कृति को अलग-अलग देखना एक गंभीर भूल होगी। दोनों को जोड़कर ही भारत दुनिया को एक नया मानवीय, संतुलित और कल्याणकारी विकास मॉडल दे सकता है। इसी दिशा में काशी का यह उत्सव- भारतीय विचार, संस्कृति, संवाद और आधुनिक दृष्टि-सभी को एक मंच पर लाकर हमें मार्गदर्शन देता है और बताता है कि, भारत का भविष्य केवल अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि संस्कृति, चरित्र और समन्वित ज्ञान से निर्धारित होगा।

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि एवं अयोध्या हनुमन्ननिवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदनी शरण जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति “शब्दों में साँस लेती है”। कोई भी समाज अपने शब्दों को सहेजकर अपनी पहचान सुरक्षित रखता है। कबीर और रामानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि इनके माध्यम से काशी से समरसता का संदेश गया। आज की पीढ़ी अक्सर शब्दों को उतना महत्व नहीं देती, जितना देना चाहिए। हर शब्द की अपनी गर्माहट और शीतलता होती है, और शब्दोत्सव इन सूक्ष्मताओं को पुनः अनुभव कराने में सहायक है।

बीएचयू के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि यह उत्सव भारतीय संस्कृति के पुनरोद्धार और उसकी उन्नति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। उन्होंने प्रख्यात उड़िया रचनाकार उपेंद्र भज्ज के कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज के समाज को सांस्कृतिक दृष्टा चाहिए। इसी तरह के विमर्श से समाज को अगला कबीर और अगला शंकराचार्य मिलेगा जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन, और ज्ञानवर्धन करेगा। उन्होंने कहा कि शब्दोत्सव समाज को शब्दों, विचारों और भारत की शाश्वत सांस्कृतिक धरोहर को गहराई से जोड़ता है।

कार्यक्रम के संयोजक डॉ. हरेंद्र कुमार राय ने मंचस्थ सभी अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मंगलाचरण, द्वीप प्रज्ज्वलन एवं बीएचयू के छात्रों द्वारा कुलगीत की प्रस्तुति से हुआ। कार्यक्रम का संचालन डॉ. शुचिता त्रिपाठी ने किया।

लोकहित प्रकाशन लखनऊ द्वारा प्रकाशित पुस्तकों –  “कृतिरूप संघ दर्शन” के साथ ही “हिन्दू, हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति”, प्रो. उदय प्रताप सिंह की पुस्तक ”भक्त कालीन साहित्य और चित्तिमूलक विमर्श”, प्रो. रचना शर्मा की पुस्तक ”आजादी के रणबांकुरे और काशी”, डॉ. लहरीराम मीणा की पुस्तक “The Hope I left with” का लोकार्पण हुआ।

रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने ‘पंडुम कैफे’ का किया शुभारंभ

पंडुम कैफे का शुभारंभ बस्तर में नक्सल उन्मूलन की दिशा में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का प्रेरक प्रतीक – मुख्यमंत्री श्री साय

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने बस्तर में सामाजिक-आर्थिक बदलाव के नए अध्याय की शुरुआत करते हुए आज जगदलपुर में ‘पंडुम कैफ़े’ का शुभारंभ किया। यह कैफ़े नक्सली हिंसा के पीड़ितों और समर्पण कर चुके सदस्यों के पुनर्वास हेतु छत्तीसगढ़ सरकार की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसने हिंसा का मार्ग छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वालों को सम्मानजनक और स्थायी आजीविका प्रदान करने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है। यह अनूठी पहल संघर्ष से सहयोग तक के प्रेरणादायक सफर को दर्शाती है।‘पंडुम कैफ़े’ जगदलपुर के पुलिस लाइन परिसर में स्थित है।

 मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने 'पंडुम कैफे' का किया शुभारंभ

मुख्यमंत्री श्री साय ने ‘पंडुम कैफे’   में कार्यरत नारायणपुर की फगनी, सुकमा की पुष्पा ठाकुर, बीरेंद्र ठाकुर, बस्तर की आशमती और प्रेमिला बघेल के साथ सौहार्दपूर्ण बातचीत की। उन्होंने नई शुरुआत के लिए उनका हौसला बढ़ाया और ‘पंडुम कैफ़े’ के बेहतर संचालन के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं भी दीं।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि पंडुम कैफ़े का शुभारंभ बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का एक प्रेरक प्रतीक है। मुख्यमंत्री ने श्री साय ने कहा कि पंडुम कैफे आशा, प्रगति और शांति का उज्ज्वल प्रतीक है। कैफे में कार्यरत युवा, जो नक्सली हिंसा के पीड़ित तथा हिंसा का मार्ग छोड़ चुके सदस्य हैं, अब शांति के पथ पर अग्रसर हो चुके हैं। जिला प्रशासन और पुलिस के सहयोग से उन्हें आतिथ्य सेवाओं, कैफ़े प्रबंधन, ग्राहक सेवा, स्वच्छता मानकों, खाद्य सुरक्षा और उद्यमिता कौशल का गहन प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।

हिंसा का मार्ग छोड़कर शांति के पथ पर लौटे और कैफ़े में कार्यरत एक महिला ने इस अवसर पर भावुक होकर इस पुनर्वास पहल से हुए बदलाव की बात दोहराई। एक पूर्व माओवादी कैडर ने कहा कि,“हमने अपने अतीत में अंधेरा देखा था। आज हमें समाज की सेवा करने का यह अवसर मिला है, यह हमारे लिए एक नया जन्म है। बारूद की जगह कॉफी परोसना और अपनी मेहनत की कमाई से जीना—यह एहसास हमें शांति और सम्मान दे रहा है।”

एक अन्य सहयोगी ने अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि,“पहले हम अपने परिवार को सम्मानजनक जीवन देने का सपना भी नहीं देख सकते थे। अब हम अपनी मेहनत से कमाए पैसों से घर के सदस्यों का भविष्य संवार सकते हैं। यह सब प्रशासन और इस कैफ़े की वजह से संभव हुआ है।”

एक अन्य सदस्य ने समुदाय के सहयोग पर जोर देते हुए कहा कि,“हमें लगा था कि मुख्यधारा में लौटना आसान नहीं होगा, लेकिन पुलिस और जिला प्रशासन ने हमें प्रशिक्षण दिया और हमारा विश्वास जीता। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अब पीड़ितों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे हमें अपने अतीत के अपराधों को सुधारने और शांति स्थापित करने का अवसर मिला है।”

उन्होंने यह भी बताया कि ‘पंडुम’ बस्तर की सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाता है, और इसकी टैगलाइन “जहाँ हर कप एक कहानी कहता है” इस बात का प्रतीक है कि यहाँ परोसी गई कॉफी सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष पर विजय और एक नई शुरुआत की कहानी भी अपने साथ लेकर आती है।

इस अवसर पर वन मंत्री श्री केदार कश्यप, शिक्षा मंत्री श्री गजेन्द्र यादव, सांसद श्री महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक श्री किरण सिंह देव, चित्रकोट विधायक श्री विनायक गोयल, बेवरेज कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष श्री श्रीनिवास राव मद्दी, अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष श्री रूपसिंह मंडावी, जगदलपुर महापौर श्री संजय पांडे, जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती वेदवती कश्यप, संभागायुक्त श्री डोमन सिंह, पुलिस महानिरीक्षक श्री सुन्दरराज पी., कलेक्टर श्री हरिस एस., पुलिस अधीक्षक श्री शलभ सिन्हा सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण एवं वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारीगण भी उपस्थित थे।

रायपुर : 48वां रावत नाचा महोत्सव : लाल बहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय

रावत नाचा सांस्कृतिक एकता का प्रतीक — मुख्यमंत्री श्री साय

बिलासपुर के लाल बहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में 48वें रावत नाचा महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। नाचा महोत्सव में शामिल होने मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय लाल बहादुर शास्त्री शाला प्रांगण पहुंचे। आगमन पर महोत्सव के संरक्षक श्री कालीचरण यादव एवं समिति के पदाधिकारियों द्वारा पुष्पहार पहनाकर मुख्यमंत्री का आत्मीय स्वागत किया गया। इसके पश्चात मुख्यमंत्री एवं अतिथियों ने भगवान श्रीकृष्ण के छायाचित्र पर माल्यार्पण कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया।

कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री श्री तोखन साहू, उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव, स्कूल शिक्षा मंत्री श्री गजेंद्र यादव, तखतपुर विधायक श्री धर्मजीत सिंह, बिल्हा विधायक श्री धरमलाल कौशिक, बेलतरा विधायक श्री सुशांत शुक्ला, चंद्रपुर विधायक श्री रामकुमार यादव, कोटा विधायक श्री अटल श्रीवास्तव, मस्तूरी विधायक श्री दिलीप लहरिया तथा महापौर सुश्री पूजा विधानी सहित अनेक जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक एवं बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय पारंपरिक रावत नाचा वेशभूषा में मंच पर पहुंचे और कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। उन्होंने कहा कि “यदुवंशी समाज वह समाज है, जहां प्रभु श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। छत्तीसगढ़ की नृत्य–गायन परंपरा हमारी सांस्कृतिक समृद्धि और एकता का सजीव प्रतीक है।” मुख्यमंत्री ने ‘तेल फूल में लइका बाढ़े…’ दोहा गाकर यदुवंशी समाज एवं नर्तन दलों को आशीर्वचन भी दिया।

केंद्रीय राज्य मंत्री श्री तोखन साहू ने रावत नाचा को यदुवंशी समाज के शौर्य, संस्कृति और कला का अप्रतिम प्रदर्शन बताया तथा मंच से दोहे गाकर सभी को शुभकामनाएँ दीं। उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव ने कहा कि “48 वर्षों से इस गौरवशाली परंपरा को बनाए रखना समाज की एकजुटता, अनुशासन और सांस्कृतिक गर्व का प्रमाण है।” उन्होंने समस्त समाज एवं नर्तक दलों को शुभकामनाएँ दीं।

बिलासपुर विधायक श्री अमर अग्रवाल ने अपने संबोधन में कहा कि “रावत नाचा बिलासपुर की 48 वर्षों की गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर है, जिसका संरक्षण समिति द्वारा निरंतर किया जा रहा है। समाज के मंगल और सद्भाव के लिए यदि कोई समाज सतत प्रयासरत है, तो वह यादव समाज है।” उन्होंने सभी को महोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं।

स्कूल शिक्षा मंत्री श्री गजेंद्र यादव ने कहा कि “बिलासा की पावन धरा पर रावत नाचा महोत्सव का आयोजन होना सौभाग्य की बात है। यदुवंशी समाज के लोग घर–घर जाकर सर्व समाज की मंगलकामना करते हैं।” उन्होंने कार्यक्रम में शामिल होने हेतु मुख्यमंत्री का आभार जताया।

महोत्सव के संरक्षक डॉ. कालीचरण यादव ने स्वागत उद्बोधन देते हुए रावत नाचा की गौरवशाली परंपरा पर प्रकाश डाला और कहा कि पिछले 47 वर्षों से रावत नाचा महोत्सव यदुवंशी समाज की संस्कृति, सम्मान और सांस्कृतिक पहचान का मजबूत प्रतीक बना हुआ है।

पारंपरिक वेशभूषा में नर्तक दलों के बीच पहुंचे मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय पारंपरिक वेशभूषा में राउत नाचा दलों के बीच पहुंचे और ढोल–नगाड़ों की गूंजती धुन पर उनके साथ झूमकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाया। उन्होंने नर्तक दलों की मनमोहक प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि रावत नाचा जैसी सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी और हमारी परंपराओं को सदैव जीवित रखेगी।

सनातन विचार ही एकात्म मानव दर्शन है – डॉ. मोहन भागवत जी

जयपुर, 15 नवम्बर। आज एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान की ओर से आयोजित दीनदयाल स्मृति व्याख्यान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि सनातन विचार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने देश, काल, परिस्थिति के अनुसार एकात्म मानव दर्शन का नया नाम देकर लोगों के समक्ष रखा। यह विचार नया नहीं है, 60 वर्ष बाद भी वर्तमान समय में यह एकात्म मानव दर्शन पूरे विश्व के लिए प्रासंगिक है।

एकात्म मानव दर्शन को एक शब्द में समझना है तो वह शब्द है धर्म। इस धर्म का अर्थ रिलिजन, मत, पंथ, संप्रदाय नहीं है। इस धर्म का तात्पर्य गंतव्य से है, सब की धारणा करने वाला धर्म है। वर्तमान समय में दुनिया को इसी एकात्म मानव दर्शन के धर्म से चलना होगा। सरसंघचालक जी ने कहा कि भारतीय जब भी बाहर गए किसी को लूटा नहीं, किसी को पीटा नहीं, सबको सुखी किया।

भारत में भी पिछले कई दशकों में रहन-सहन, खानपान, वेशभूषा सब बदला होगा, किंतु सनातन विचार नहीं बदला। वह सनातन विचार ही एकात्म मानव दर्शन है और उसका आधार यह है कि सुख बाहर नहीं, हमारे भीतर ही होता है। हम अंदर का सुख देखते हैं, तब समझ में आता है कि पूरा विश्व एकात्म है। इस एकात्म मानव दर्शन में अतिवाद नहीं है।

उन्होंने कहा कि सत्ता की भी मर्यादा है। सबका हित साधते हुए अपना विकास करना यह वर्तमान समय की आवश्यकता है। पूरे विश्व में अनेक बार आर्थिक उठापटक होती हैं, लेकिन भारत पर इसका असर सबसे कम होता है क्योंकि भारत के अर्थतंत्र का आधार यहां की परिवार व्यवस्था है।

डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि वर्तमान में विज्ञान की प्रगति चरम पर जा रही है। विज्ञान के आधार पर सबका जीवन भौतिक सुविधाओं से संपन्न हो, ऐसे प्रयास हो रहे हैं। लेकिन क्या मनुष्य के मन में शांति और संतोष भी बढ़ रहा है। विज्ञान की प्रगति के कारण बहुत सी नई दवाइयां बनी हैं, किंतु क्या स्वास्थ्य पहले की तुलना में अधिक ठीक हुआ है। कुछ बीमारियों का तो कारण ही कुछ दवाइयां हैं।

उन्होंने कहा कि हमारे यहां प्रारंभ से ही अनेक विषयों में विविधता रही है, लेकिन हमारे यहां की विविधता कभी झगड़े का कारण नहीं बनी। अपितु हमारे यहां की विविधता उत्सव का विषय बनी। हमारे यहां पहले से अनेक देवी देवता थे, कुछ और भी आ गए तो हमें कोई समस्या नहीं हुई। उन्होंने कहा कि दुनिया यह तो जानती है कि शरीर, बुद्धि और मन का सुख होता है। लेकिन उसे एक साथ कैसे प्राप्त किया जाए, यह दुनिया नहीं जानती। यह केवल भारत जानता है क्योंकि भारत में शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा सभी के सुख का विचार है।

कार्यक्रम की प्रस्तावना एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा ने रखी। उन्होंने कहा कि संपूर्ण सृष्टि एकात्म है। सृष्टि का एक कण भी हिलता है तो संपूर्ण सृष्टि पर असर दिखता है। इस समय वंदे मातरम् की रचना का 150वां वर्ष चल रहा है और वर्तमान परिस्थितियों में पूरा वंदे मातरम् गाना अत्यंत आवश्यक है।

स्वास्थ्य कल्याण ग्रुप के निदेशक डॉ. एस.एस. अग्रवाल ने आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया एवं डॉ. नर्बदा इंदौरिया ने कार्यक्रम का संचालन किया।

ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म की सामग्री का नियमन हो

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि समाज की गरिमा और नैतिकता को नष्ट करने की छूट दी जाए

17वां राष्ट्रीय अधिवेशन, 7, 8, 9 नवंबर 2025 – रीवा

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के रीवा अधिवेशन -2025 में पारित प्रस्ताव

परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई, और परोपकराय सताम् विभूतयः की मान्यता पर आधारित हमारी संस्कृति आज अति भौतिकता से प्रभावित होकर बाजारवाद का संत्रास झेल रही है। आज हम जिस घोर व्यावसायिक समय में जी रहे हैं, उसने जीवन के मूलभूत संसाधनों को व्यापार में परिवर्तित कर दिया है। तकनीकों पर बाजारवादी शक्तियों का नियंत्रण है। इसी की परिणति है कि डिजिटल मीडिया का एक अति विशाल उद्योगतंत्र खड़ा हो गया है तथा पारंपरिक प्रसारण माध्यमों की जगह ऑनलाइन स्ट्रीमिंग ने ले ली है। ओवर-द-टॉप (ओटीटी) के सभी प्लेटफॉर्म और गेमिंग एप्स पर अधिकांश मनोरंजन की सामग्री का स्वरूप बदलकर नकारात्मक एवं जीवन मूल्यों रहित होता जा रहा है।

मनोरंजन के नाम पर इनके द्वारा जो हिंसक, अश्लील एवं मर्यादाहीन सामग्रियां परोसी जा रही हैं, वे अत्यंत लज्जास्पद एवं निंदनीय हैं। ये युवावर्ग और बालमन व मस्तिष्क में उग्रता, अश्लीलता, विकृत यौनाचार और नशाखोरी जैसे दुराचारों को महिमा मंडित कर उन्हें अधोपतन की ओर अग्रसित कर रही हैं। इन माध्यमों में प्रदर्शित अधिकांश दृश्य, वोकिज़्म और नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाली होती हैं। आज इस तरह के प्लेटफॉर्म और गेमिंग एप्स युवाओं को आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रहे हैं। साथ ही अधिकांश प्लेटफॉर्म भारत के सांस्कृतिक मूल्यों एवं परम्पराओं पर आघात कर उनको विकृत रूप में चित्रित करती हैं। इनका अनियंत्रित प्रसारण समाज एवं राष्ट्र जीवन के लिए अत्यधिक घातक है।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जो भारतीय साहित्य, संस्कृति और चिंतन के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए समर्पित है, इस गंभीर स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। परिषद का यह मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि समाज की गरिमा और नैतिकता को नष्ट करने की छूट दी जाए। स्वतंत्रता और अनुशासन, सृजन और मर्यादा, ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

अतः यह अधिवेशन भारत सरकार तथा सभी राज्य सरकारों से मांग करता है कि –

  1. ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म एवं गेमिंग एप्स पर प्रसारित होने वाली प्रत्येक सामग्री के परीक्षण, नियमन, और वर्गीकरण हेतु शासन द्वरा एक सशक्त, स्वायत्त विधायी नियामक संस्था का गठन किया जाए।
  2. डिजिटल माध्यमों में प्रस्तुत किसी भी दृश्य, संवाद या विचार जो भारत की संविधानिक गरिमा, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक मूल्यों या सामाजिक मर्यादा और सनातन परंपरा को आहत करते हों, उन पर कड़ी निगरानी रखी जाए।
  3. किशोरों और युवाओं के लिए उपयुक्त सामग्री के आयु आधारित नियंत्रण तंत्र को अनिवार्य बनाया जाए।
  4. जो मंच या माध्यम अश्लीलता, हिंसा, नशाखोरी या विकृत जीवन मूल्यों का प्रचार करते हैं, उनके विरुद्ध कठोर कानूनी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
  5. भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संवर्धन हेतु भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक मनोरंजन माध्यमों को प्रोत्साहित किया जाए।

अंत में, अखिल भारतीय साहित्य परिषद का मानना है कि साहित्य, संस्कृति और समाज की शुचिता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब जनमानस में सजगता, संवेदनशीलता और नैतिकता बनी रहे। अतः अखिल भारतीय साहित्य परिषद भारत सरकार तथा सभी राज्य सरकारों से यह मांग करती है कि उपर्युक्त सभी विषयों का संज्ञान लेकर इस दिशा में उचित कदम उठाए।

सहकार, कृषि और उद्योग हमारे विकास के आधार स्तंभ – डॉ. मोहन भागवत जी

संघ शताब्दी के उपलक्ष्य में कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में ‘उद्यमी संवाद – नए क्षितिज की ओर’ कार्यक्रम

विविधताओं को कैसे संभालना है, यह भारत को पूरी दुनिया को सिखाना है

राष्ट्र को परम वैभव संपन्न बनाने के लिए सबको साथ चलना है

जयपुर, 13 नवम्बर । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा कि विविधताओं को कैसे संभालना है, यह हमें दुनिया को सिखाना है क्योंकि दुनिया के पास ऐसा तंत्र नहीं है जो भारत के पास है।

सरसंघचालक जी गुरुवार को संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर ‘100 वर्ष की संघ यात्रा श्रृंखला’ के अंतर्गत कॉन्स्टीट्यूशन क्लब, जयपुर के पृथ्वीराज चौहान सभागार में ‘उद्यमी संवाद – नए क्षितिज की ओर’ कार्यक्रम में राजस्थान के प्रमुख उद्यमियों को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संघ को प्रत्यक्ष अनुभव किए बिना संघ के बारे में राय मत बनाइए। संघ से जुड़ने के लिए शाखा में आइए, जो आपको अनुकूल लगे वह काम आप कर सकते हैं। संघ पूरे समाज को ही संगठित करना चाहता है। पूरा समाज संघ बन जाए यानी प्रमाणिकता से, निःस्वार्थ बुद्धि से सब लोग देश के लिए जिएं।

उन्होंने कहा कि संघ के 100 वर्ष की यात्रा पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम कोई सेलिब्रेशन नहीं है, बल्कि आगे के चरण की दृष्टि से अपने कार्य की वृद्धि का विचार करने के लिए कार्यक्रम किए जा रहे हैं। राष्ट्र को परम वैभव संपन्न और विश्वगुरु बनाना किसी एक व्यक्ति के वश में नहीं है। यह सबका काम है और इसके लिए सबको साथ लेकर चलना है।

उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना किसी एक विषय को लेकर नहीं हुई। संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार क्रांतिकारी थे। वे इंडियन नेशनल कांग्रेस के बहुत सक्रिय कार्यकर्ता थे। उसके आंदोलनों में संघ स्थापना के पहले और एक बार स्थापना के बाद, दो बार जेल गए। जो देश हित और समाज हित में चल रहा था, उसमें वह सक्रिय रहे। असहयोग आंदोलन में उन पर राजद्रोह का अभियोग लगा। उन्होंने बचाव में पक्ष रखना चुना क्योंकि इससे दोबारा भाषण का मौका मिलता। उनके बचाव भाषण को सुनकर जज को कहना पड़ा कि उनका बचाव भाषण पहले भाषण से भी अधिक राजद्रोही है। डॉ. हेडगेवार ने अनुभव किया कि समाज में डेढ़ हजार साल से जो दुर्गुण आ रहे थे, उन्हें दूर करना जरूरी है। उन्हें महसूस हुआ कि संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित किए बिना भारत इस पुरानी बीमारी से मुक्त नहीं होगा। इसलिए उन्होंने एक दशक तक विचार और प्रयोगों के बाद संघ की स्थापना की।

सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ किसी को नष्ट करने के लिए नहीं बना है। भारत वर्ष में हमारी पहचान हिन्दू है। हिन्दू शब्द सबको एक करने वाला है। हमारा राष्ट्र संस्कृति के आधार पर एक है, न कि राज्य के आधार पर। पुराने समय में जब राज्य अनेक थे तब भी हम एक देश थे, पराधीन थे तब भी एक देश थे। उन्होंने कहा कि समाज की स्वस्थ अवस्था का नाम समाज का संगठन है। संघ व्यक्ति निर्माण का काम करता है। संघ स्वयंसेवक तैयार करता है, स्वयंसेवक बाकी सब काम करते हैं।

उन्होंने संघ कार्य के आगामी चरण के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि सारा समाज देश हित में जिए, ये संघ का आगे का काम है। समाज की सज्जन शक्ति जागृत हो, सामाजिक समरसता का वातावरण बने और मंदिर, पानी, शमशान सबके लिए खुले होने चाहिए। परिवार के सभी सदस्य सप्ताह में कम से कम एक बार एकत्र आएं और अपना भोजन एवं भजन, अपनी भाषा और अपनी परंपरा के अनुसार करें। पानी बचाने, पेड़ लगाने और प्लास्टिक हटाने जैसे पर्यावरण संरक्षण के कार्यों के लिए भी हमें आगे आना चाहिए। स्व का बोध और स्वदेशी का भाव सबके मन में जागृत हो, देश स्वनिर्भर बने। नागरिक कर्तव्य और नागरिक अनुशासन के प्रति हम सजग बनें और नियम, कानून, संविधान का पालन करें।

सारा समाज एक बनकर अपना-अपना काम अपनी-अपनी पद्धति से करे ताकि हम सभी एक दूसरे के बाधक नहीं, बल्कि पूरक बनें।

उन्होंने कहा कि सहकार, कृषि और उद्योग हमारे विकास के आधार स्तंभ हैं। कृषि, व्यापार, उद्योग परस्पर साथ आकर, परस्पर निर्भर होकर तीनों एक साथ प्रगति करें। छोटे और मध्यम उद्योग अर्थव्यवस्था को विकेंद्रित करते हैं। इन उद्योगों को अपने देश के अंदर सुचारू रूप से चलने का वातावरण देना, ये बड़े उद्योगों का काम है। छोटे उद्योगों को रोजगार, कौशल, उत्पादन की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ाना चाहिए।

इससे पूर्व राजस्थान क्षेत्र संघचालक रमेश चंद्र अग्रवाल ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखी। कार्यक्रम का संचालन डॉ. हेमंत सेठिया ने किया।

स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी अधीनता से मुक्ति नहीं, स्वदेशी तंत्र का निर्माण करना भी है – पराग अभ्यंकर जी

भुवनेश्वर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भुवनेश्वर महानगर द्वारा उत्कल विश्वविद्यालय के दीक्षांत ऑडिटोरियम में आयोजित युवा सम्मेलन के समापन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख पराग अभ्यंकर ने कहा कि स्वतंत्रता का सच्चा अर्थ केवल विदेशी अधीनता से मुक्ति नहीं है, बल्कि अपनी उन्नति और राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए स्वदेशी तंत्र का निर्माण करना भी है।

उन्होंने कहा कि 15 अगस्त, 1947 को स्वाधीनता मिल गई अर्थात् किसी की अधीनता से मुक्त हो गए, आजाद हो गए। अपने निर्णय लेने के लिए अंग्रेज वायसराय पर डिपेंडेंट नहीं थे, इसलिए हम इंडिपेंडेंट कहलाए। अपनी नियति डेस्टिनी का निर्णय करने के लिए सक्षम हो गए। परन्तु स्वतंत्रता का सच्चा अर्थ है अपनी वास्तविक उन्नति, लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अपना तंत्र निर्माण कर लेना। उन्होंने कहा कि आज भी हमारी पहचान “इंडिया दैट इज़ भारत” के रूप में होती है, जबकि केवल “भारत” या “हिंदुस्तान” नाम ही स्वीकार करना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों तक जिस शिक्षा, न्याय और आर्थिक नीति के तंत्र के माध्यम से हमने विश्वगुरु तथा सोने की चिड़िया का दर्जा प्राप्त किया था, उसे भूलकर गुलामी के दौर की ही शिक्षा, न्याय और आर्थिक नीति पर हमारा शासन तंत्र गत 75 वर्षों तक चला। अर्थात्, हमने अपने तंत्र को अपनाने के बजाय विदेशी तंत्र को स्वीकार किया। जब हम प्राचीन भारतीय नीतियों को अपनाएंगे, तभी हम वास्तव में स्वतंत्र कहलाएंगे। जब भारत अपने प्राचीन भारतीय नीतिगत तंत्र को पुनः स्थापित करेगा, तभी हम सच्चे अर्थों में स्वतंत्र कहलाएंगे।

भारत की विश्व के प्रति क्या भूमिका है, यह स्वामी विवेकानंद जी ने 1897 में लाहौर के भाषण में बताया था। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के 1897 के लाहौर भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की नियति विश्व बंधुत्व और शांति के जीवन मूल्यों को पूरे विश्व में फैलाने की है। इन जीवन मूल्यों को समाज के प्रत्येक व्यक्ति के भीतर जागृत करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा “जब त्याग और सेवा की भावना समाज तथा शासन – दोनों के तंत्र में प्रतिष्ठित होगी, तभी हम कह सकेंगे कि सच्चा स्वातंत्र्य प्राप्त हुआ है।”

उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गत 100 वर्षों से इसी कार्य में लगा हुआ है। युवाओं की सहभागिता से इसे आगे बढ़ाना है।

उत्कल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यज्ञेश्वर दण्डपाट समापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इससे पहले सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. श्रीकांत मिश्र ने कहा कि संघ अपने 100 वर्षों के कार्यकाल में अपने लक्ष्य की दिशा में निरंतर प्रगति कर रहा है। मुख्य वक्ता ओडिशा (पूर्व) प्रांत के बौद्धिक प्रमुख तन्मय महापात्र ने कहा कि भारत की महान संस्कृति, शिक्षा, इतिहास और स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण विदेशों में भी प्रतिष्ठित थी। देश के निर्माण में युवाओं की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण रही है और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान युवाओं का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सदैव वैज्ञानिक रही है। जब संपूर्ण विश्व अंधकार में था, तब भारत का ज्ञान-विज्ञान विश्व को नया मार्ग दिखा रहा था।

“पंच परिवर्तन” विषय पर प्रश्न मंच का आयोजन किया गया, तथा स्वच्छता और पर्यावरण पर आधारित नाटकों का मंचन भी हुआ। युवा सम्मेलन में 1,700 से अधिक युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण था मनोज़ साहू का सैंड आर्ट प्रदर्शन। इसके अलावा, युवाओं ने देशभक्ति गीतों और नृत्य कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

लखनऊ की महिला डॉक्टर की कार से AK-47 और कारतूस बरामद, पुलिस ने किया गिरफ्तार

लखनऊ की एक महिला डॉक्टर शाहीन शाहिद को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सोमवार को गिरफ्तार किया। शाहीन के कब्जे से एके-47 बरामद हुई है। डाक्टर शाहीन को जम्मू-कश्मीर पुलिस अपने साथ ले गई है।

जानकारी के अनुसार, डॉ. शाहीन शाहिद लखनऊ में लालबाग मोहल्ले की रहने वाली है। पुलिस को जानकारी मिली कि शाहीन, फरीदाबाद आतंकी साजिश में गिरफ्तार डॉक्टर मुजम्मिल की सहयोगी है। मुजम्मिल जिस कार का इस्तेमाल करता था। वह कार डॉ. शाहीन के नाम पर है। शाहीन की कार से ही एके-47 राइफल और कुछ जिंदा कारतूस और अन्य संदिग्ध सामग्री बरामद की गई है।

पुलिस की विवेचना में पाया गया कि डॉ. शाहीन शाहिद कई संदिग्ध आतंकियों के संपर्क में थी। शाहीन, पाकिस्तान के आतंकियों के भी संपर्क में थी। पुलिस का कहना है कि भारत के कई हिस्सों में आतंकी गतिविधियों को संचालित करने का षड्यंत्र रचा जा रहा था। अभी तक इस मॉड्यूल से सम्बन्धित सात अभियुक्तों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गिरफ्तार आठ आरोपियों में तीन डॉक्टर शामिल हैं और इस कार्रवाई में 2,900 किलोग्राम विस्फोटक बरामद किया गया है। जांच में पता चला है कि यह ‘व्हाइट कॉलर’ आतंकी मॉड्यूल जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवत-उल-हिंद जैसे संगठनों से जुड़ा हुआ है।

जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और हरियाणा पुलिस के साथ केंद्रीय एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई में यह बड़ी सफलता मिली है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मॉड्यूल का खुलासा तब हुआ, जब पुलिस ने दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में सरकारी मेडिकल कॉलेज (GMC) में काम कर चुके डॉ. आदिल अहमद को गिरफ्तार किया। डॉ. आदिल की गिरफ्तारी सहारनपुर से हुई थी। डॉ. आदिल की निशानदेही पर ही डॉ. मुजम्मिल शकील को पकड़ा गया। GMC अस्पताल में डॉ. आदिल के लॉकर से पुलिस ने AK-47 राइफल और अन्य हथियार बरामद किए गए थे। जांच में सामने आया कि डॉ. आदिल आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा हुआ था और कश्मीर में जैश नेटवर्क को फिर से खड़ा करने की साजिश रच रहा था।

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने अपने निवास पर विश्व कप विजेता महिला टीम की सदस्य आकांक्षा सत्यवंशी जी का स्वागत किया व उन्हें शक्ति स्वरूप गदा भेट की.. आकांक्षा सत्यवंशी जी ने फाइनल मैच के दौरान गदा से संबंधित एक रोचक किस्सा उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा से शेयर किया

वंदे मातरम् – राष्ट्र चेतना का अमर मंत्र

राष्ट्र गीत “वंदे मातरम्” ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और यह 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था। “वंदे मातरम्” संस्कृत पद है, जिसका अर्थ “मैं तेरी वंदना करता हूँ, हे मातृभूमि” अथवा “हे माँ, मैं तुझे नमन करता हूँ”, है।

अभी हाल ही में जबलपुर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने मातृभूमि की आराधना और राष्ट्र जीवन में चेतना का संचार करने वाले इस दिव्य मंत्र वंदे मातरम् की रचना के 150वें वर्ष पर इसके रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए कृतज्ञ श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस पावन अवसर पर संघ ने सभी स्वयंसेवकों एवं देशवासियों से आह्वान किया है कि वे अपने हृदय में वंदे मातरम् की प्रेरणा जागृत करें और “स्व” की भावना पर आधारित राष्ट्र पुनर्निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लें। सरकार्यवाह जी ने कहा कि इस प्रेरणादायी यात्रा में सभी जन उत्साहपूर्वक सहभागी बनें, जिससे यह भावी पीढ़ियों के लिए राष्ट्रीय एकता, समर्पण और गौरव का प्रकाश स्तंभ बनी रहे।

1875 में रचित वंदे मातरम् भारत जागरण की घोषणा बन गया। 1896 में कोलकाता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने स्वरबद्ध कर गाया, जिससे पूरा सभागार देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत हो उठा। उस क्षण से वंदे मातरम् मात्र एक गीत नहीं रहा – यह भारत माता की आराधना का मंत्र, राष्ट्रीय उद्घोष, राष्ट्रीय चेतना की वाणी और राष्ट्रात्मा की अनुगूंज बन गया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदे मातरम् ने स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों और सामान्य जन को उत्साह और बलिदान की भावना से एक सूत्र में बांध दिया। बंग-भंग आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक, यह उद्घोष हर देशभक्त की प्रेरणा बना रहा।

इसका व्यापक प्रभाव इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि महर्षि अरविंद, मैडम भीकाजी कामा, महाकवि सुब्रह्मण्य भारती, लाला हरदयाल और लाला लाजपत राय जैसे महान व्यक्तित्वों ने अपने पत्र-पत्रिकाओं में वंदे मातरम् को अपनाया। महात्मा गांधी भी वर्षों तक अपने पत्रों का समापन वंदे मातरम् से करते थे।

राष्ट्रात्मा का गीत

वंदे मातरम् केवल शब्दों का संग्रह नहीं – यह राष्ट्रात्मा का गीत है, जो हर भारतीय हृदय को प्रेरित करता है। इसकी दिव्य अनुगूंज आज भी समाज में मातृभूमि के प्रति समर्पण, एकता और गौरव की भावना भरती है, यहाँ तक कि 150 वर्षों के बाद भी।

जब क्षेत्र, भाषा और जाति के आधार पर विभाजन बढ़ते दिखाई देते हैं, तब वंदे मातरम् वह एक सूत्र है जो संपूर्ण समाज को “भारतत्व” की एक ही भावना में जोड़ता है। यह भारत के सभी प्रांतों, समुदायों और भाषाओं में समान रूप से स्वीकार्य है – इसीलिए यह राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक एकात्मता का सशक्त प्रतीक बन गया है।

राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रनिर्माण के पुनर्जागरण काल में वंदे मातरम् की भावना को आत्मसात कर जीवन में उतारना आवश्यक है। इसका उच्चारण केवल वाणी का कार्य नहीं, बल्कि यह देशभक्ति का आध्यात्मिक साधन और सांस्कृतिक मूल्यों का स्रोत है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर जी) के लिए वंदे मातरम् केवल नारा नहीं, बल्कि देशभक्ति, संगठन और स्वतंत्रता का मूल मंत्र था।

नागपुर में छात्र जीवन के आरंभिक काल से ही डॉक्टर जी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से गहराई से प्रभावित थे। उस समय ब्रिटिश शासन में वंदे मातरम् कहना अपराध माना जाता था। किंतु डॉक्टर जी के नेतृत्व में विद्यार्थियों ने एक ब्रिटिश निरीक्षक का स्वागत “वंदे मातरम्” के उद्घोष से किया। इस कार्य के लिए उन्हें विद्यालय से निलंबित कर दिया गया और सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पर रोक लगा दी गई – यही वह क्षण था जब उनके भीतर राष्ट्रीयता की ज्वाला प्रज्वलित हुई, जिसने आगे चलकर एक महान संगठन की स्थापना की राह दिखाई।

1925 में जब डॉक्टर जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, तब वंदे मातरम् की भावना संघ की प्रत्येक गतिविधि, प्रार्थना और अनुशासन का अभिन्न अंग बन गई। उनका दृढ़ विश्वास था – “हमारा राष्ट्र केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, वह हमारी माता है। वंदे मातरम् उसके प्रति हमारी श्रद्धा की वाणी है।”

अपने प्रारंभ से लेकर आज तक वंदे मातरम् को प्रत्येक स्वयंसेवक के जीवन में राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान का स्थान प्राप्त है। आज भी कई कार्यक्रमों और सभाओं का समापन स्वयंसेवकों द्वारा इसके श्रद्धापूर्ण गायन से होता है। खेल और प्रशिक्षण के समय भी गण-शिक्षक (प्रशिक्षक) स्वयंसेवकों के साथ मिलकर वंदे मातरम् का सामूहिक उच्चारण कराते हैं – यह अनुशासन, एकता और मातृभूमि के प्रति प्रेम का प्रतीक है। इसके माध्यम से संघ निरंतर देशभक्ति, सेवा और अनुशासन की भावना का विकास करता आ रहा है।

डॉ. हेडगेवार के लिए वंदे मातरम् केवल क्रांति का प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आध्यात्मिक आधारशिला थी। वे इसे राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्र की जीवंत आत्मा के जागरण के रूप में देखते थे।

डॉक्टर जी स्वयंसेवकों से कहा करते थे कि यह पवित्र उद्घोष प्रत्येक भारतीय हृदय में भक्ति, अनुशासन और त्याग की भावना जागृत करे। उनका विश्वास था कि जब तक भारतीयों के हृदय से वंदे मातरम् की गूंज उठती रहेगी, तब तक भारत की आत्मा जीवित रहेगी।

आज जब हम वंदे मातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने का उत्सव मना रहे हैं, तब डॉ. हेडगेवार का यह वाक्य स्मरणीय है – “हमारा कर्तव्य केवल वंदे मातरम् गाना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में जीना है।”

हमारी यही प्रार्थना और प्रेरणा है कि –

हर मुख से एक स्वर में वंदे मातरम् की गूंज उठे।

इस अनादि प्रेरणा से हर नागरिक समर्पित देशभक्त बने, और एक सशक्त, एकात्म व आत्मनिर्भर भारत की रचना में योगदान दे।

हर हृदय और भारत के हर कोने से एक ही स्वर उठे —

वंदे मातरम्! भारत माता की जय!

बिनन्दा खुन्द्राकपम

सह प्रान्त प्रचारक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मणिपुर प्रान्त

राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के 150 वर्ष होने पर माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक
30-31 अक्टूबर-1 नवम्बर 2025, जबलपुर
 
माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य

राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के 150 वर्ष
मातृभूमि की आराधना और संपूर्ण राष्ट्र जीवन में चेतना का संचार करने वाले अद्भुत मन्त्र “वंदेमातरम्” की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के शुभ अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रगीत के रचयिता श्रद्धेय बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता है। 1875 में रचित इस गीत को 1896 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राष्ट्रकवि श्रद्धेय रविंद्रनाथ ठाकुर ने सस्वर प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था। तब से यह गीत देशभक्ति का मंत्र ही नहीं अपितु राष्ट्रीय उद्घोष, राष्ट्रीय चेतना तथा राष्ट्र की आत्मा की ध्वनि बन गया।
तत्पश्चात बँग-भंग आंदोलन सहित भारत के स्वाधीनता संग्राम के सभी सैनानियों का घोष मंत्र “वंदेमातरम्” ही बन गया था। इस महामंत्र की व्यापकता को इस बात से समझा जा सकता है कि देश के अनेक विद्वानों और महापुरुषों जैसे महर्षि श्रीअरविंद, मैडम भीकाजी कामा, महाकवि सुब्रमण्यम भारती, लाला हरदयाल, लाला लाजपत राय आदि ने अपने पत्र पत्रिकाओं के नाम में वंदेमातरम् जोड़ लिया था। महात्मा गांधी भी अनेक वर्षों तक अपने पत्रों का समापन “वंदेमातरम्” के साथ करते रहे।
“वंदेमातरम्” राष्ट्र की आत्मा का गान है जो हर किसी को प्रेरणा देता है। वंदेमातरम् अपने दिव्य प्रभाव के कारण 150 वर्षों के बाद भी संपूर्ण समाज को राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना से ओत-प्रोत करने की सामर्थ्य रखता है। आज जब क्षेत्र, भाषा, जाति आदि संकुचितता के आधार पर विभाजन करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब “वंदेमातरम्” वह सूत्र है, जो समाज को एकता के सूत्र में बांधकर रख सकता है। भारत के सभी क्षेत्रों, समाजों एवं भाषाओं में इसकी सहज स्वीकृति है। यह आज भी समाज की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक पहचान और एकात्म भाव का सशक्त आधार है। राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण और राष्ट्र निर्माण की इस पावन बेला में इस महामंत्र के भावों को हृदयंगम करने की आवश्यकता है।
“वंदेमातरम्” गीत की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सभी स्वयंसेवकों सहित सम्पूर्ण समाज से आवाहन् करता है कि वंदेमातरम् की प्रेरणा को प्रत्येक हृदय में जागृत करते हुए “स्व” के आधार पर राष्ट्र निर्माण कार्य हेतु सक्रिय हों और इस अवसर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों को उत्साहपूर्वक भागीदारी करें।
 

https://www.rss.org/hindi/Encyc/2025/11/1/statemnet-by-sarkaryavah-jion-150-years-of-vandemataram.html

राष्ट्रीय चेतना के जागरण की शक्ति – २

प्रशांत पोळ

ऐसे अनेक प्रसंगों पर संघ के स्वयंसेवकों का योगदान अतुल्य और अद्भुत था। संघ के पूरे 100 वर्षों के कार्यकाल में, देश में जहां भी आपत्ति आई, आपदाएं आईं, तो उस परिस्थिति में, सहायता करने संघ स्वयंसेवक ही सर्वप्रथम पहुंचते हैं।

यह सारे क्राइसिस मैनेजमेंट या डिजास्टर मैनेजमेंट के उदाहरण हैं, जिसमें संघ की सक्रिय भूमिका रहती है। किंतु कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं, जिनमें संघ की उपस्थिति के कारण देश विघातक तत्वों पर अंकुश लगा।

उत्तर-पूर्व के राज्यों की स्थिति से संबंधित बातों का उल्लेख पहले भी आया है। रविवार 27 अक्तूबर 1946 को, संघ के 3 वरिष्ठ प्रचारकों ने, (दादाराव परमार्थ, कृष्णा परांजपे और वसंतराव ओक), गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ और शिलांग में एक साथ शाखा लगाई थी। इन राज्यों में संघ कार्य की आधारशिला रखी गई थी। बाद में संघ पर प्रतिबंध लगने से संघ कार्य में थोड़ा ठहराव अवश्य आया, किंतु पचास के दशक में, अत्यंत प्रतिकूल परिस्थिति में संघ कार्य पुनः प्रारंभ हुआ। इन राज्यों में धर्मांतरण की गति तेज थी, यह हमने देखा है। किंतु संघ कार्य की ताकत बढ़ने से क्या होता है, यह इन पूर्वोत्तर राज्यों में स्पष्ट दिखता है।

तीन राज्यों के ही उदाहरण लेते हैं –

इससे पहले हमने देखा है कि अंग्रेजों ने सारे प्रयास करने के बाद भी, स्वतंत्रता मिलने तक, सौ – डेढ़ सौ वर्षों में नागालैंड के 46% लोग ही ईसाई बने थे। किंतु उसके बाद स्वतंत्र भारत में धर्मांतरण को गति मिली, और अगले 60 वर्षों में ही धर्मांतरित ईसाइयों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई। अर्थात 1951 की जनगणना के अनुसार, नागालैंड में ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत था 46%, तो 2011 आते-आते वह 88 प्रतिशत हो गया।

किंतु इसमें एक रहस्य छिपा है। पूर्वोत्तर राज्यों में संघ का काम बढ़ने लगा, साठ- सत्तर के दशक से। संघ से प्रेरित ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ और ‘विवेकानंद केंद्र’ का कार्य भी यहां प्रारंभ हो गया। धीरे-धीरे संघ की ताकत यहां बढ़ती गई। इसका स्पष्ट प्रतिबिंब इसी जनसंख्या के घटते धर्मांतरण में दिखता है।

1951 में जहां 46% ईसाई नागालैंड में थे, वहां मात्र 20 वर्षों में, अर्थात 1971 की जनगणना के अनुसार, ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत हो गया 83%। संघ कार्य के बढ़ने से 1981 के जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 10 वर्षों में मात्र 2% बढ़ा, अर्थात, 85% हुआ। और उसके बाद के 30 वर्षों में मात्र 3% बढ़ सका!

ऐसा ही उदाहरण मेघालय का भी है –

यहां 1951 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत 25% था। अगले 20 वर्षों में, अर्थात 1971 में, यह प्रतिशत पहुंचा 47%। अर्थात लगभग दोगुना। किंतु यहां भी संघ का विस्तार होने लगा। शाखाओं की संख्या बढ़ने लगी। विवेकानंद केंद्र और कल्याण आश्रम के सेवा प्रकल्प प्रारंभ होते गए। उनके तथा विद्या भारती की शालाओं की संख्या बढ़ने लगी। इन सब के कारण, ईसाई जनसंख्या 75% तक पहुंचने में अगले 40 वर्ष लगे..!

मणिपुर की स्थिति भी ऐसी ही है। 1951 में ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत 12% है, जो अगले 30 वर्षों में (1981 में) 35% तक पहुंचता है। अर्थात, पहले 30 वर्षों में तीन गुना। किंतु संघ की ताकत बढ़ने के कारण, अगले 30 वर्षों में, (अर्थात 1981 से 2011) मात्र 6% ही बढ़ता है।

ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां संघ की शाखाओं का विस्तार होता है, राष्ट्रीय भावना और विचार प्रबल होने लगते हैं, वहां धर्मांतरण, देश विघातक आदि बातें थम सी जाती हैं।

संघ ने आपातकाल के विरोध में जो संघर्ष किया। उन दिनों, जब अन्य राजनीतिक दल निराश हो गए थे, तब संघ के कार्यकर्ताओं ने जनमानस का मनोबल ऊंचा रखा था। इसीलिए संविधान की हत्या करने वाले दंडित हुए, और अत्यंत सरलता से, भारत में रक्तहीन क्रांति से लोकतंत्र की बहाली संभव हो सकी।

अस्सी के दशक में असम में ‘बहिरागत हटाओ’ आंदोलन जोर पकड़ रहा था। ‘ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन’ (AASU आसू) और ‘असम गण संग्राम परिषद’ ने, संयुक्त रूप से यह आंदोलन छेड़ा था। असम में हो रही बांग्लादेश के मुसलमानों की घुसपैठ रोकना, इस आंदोलन का मूल उद्देश्य था। किंतु बाद में यह आंदोलन, असमी विरुद्ध बंगाली होने लगा। असम की क्रुद्ध जनता, सभी बहिरागतों को, अर्थात, प्रमुखता से बंगालियों को भगाने के लिए आंदोलन करने लगी थी। उनकी दृष्टि में बहिरागत यानी, जो आसामी नहीं हैं, वे सभी।

ऐसे प्रसंग में संघ ने विद्यार्थी परिषद के माध्यम से इस आंदोलन में हस्तक्षेप किया। बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थी हिन्दू कहां जाएंगे? वह कहां आश्रय लेंगे? बांग्लादेश में, ‘हिन्दू’ इस नाते से ही वह प्रताड़ित हो रहे थे। उनको आश्रय देना हमारा कर्तव्य था। आंसू और असम गण परिषद को यह बात प्रयत्न पूर्वक समझाई गई। बाद में उन्होंने भी यह स्वीकार किया, और बहिरागत हटाओ आंदोलन बांग्लादेश से अवैध रूप से आने वाले मुस्लिम घूसखोरों के विरुद्ध चला। संघ के प्रयासों से, इस आंदोलन के कारण, असमी और बांग्ला भाषिक लोगों के बीच में जो संघर्ष निर्माण हो रहा था, वह थम गया..!

अस्सी के दशक में, उत्तर का राज्य पंजाब भी अशांत हो गया था। आतंकवाद बढ़ रहा था। ऐसे में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’, बाद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी की हत्या और उस कारण सिक्ख समुदाय पर हुए प्राण घातक हमले.. इन सब के कारण पंजाब की स्थिति अत्यंत खराब थी। केशधारी और सहजधारी, अर्थात प्रचलित भाषा में, सिक्ख और हिन्दुओं के बीच, वैमनस्य अपने चरम पर था। इस मानसिकता को दूर करने और पूरे समाज में एकता का भाव जागृत करने के लिए, संघ के कार्यकर्ता अपने प्राणों पर खेल कर सारे प्रयास कर रहे थे। अर्थात, खालिस्तानी आतंकवादियों की समझ में यह बात आ रही थी कि देश को तोड़कर, स्वतंत्र खालिस्तान बनाने में मुख्य रोड़ा, प्रमुख अड़चन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है।

अतः 25 जून 1989 को, इन आतंकवादियों ने पंजाब के मोगा में संघ की प्रभात शाखा पर हमला किया। अत्यंत नृशंसतापूर्वक, 23 संघ स्वयंसेवक और 3 नागरिकों को मौत के घाट उतारा।

इन आतंकवादियों की कल्पना थी कि इस हमले के कारण, मात्र पंजाब ही नहीं, तो समूचे देश में सिक्खों के प्रति क्रोध भड़केगा। इस गुस्से और क्रोध के कारण हिन्दू-सिक्ख दंगे प्रारंभ हो जाएंगे, जो खालिस्तान की दिशा में लोगों को ढकेलेंगे।

किंतु दूसरे दिन 26 जून को मोगा में जो हुआ, उसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। जहां स्वयंसेवकों का हत्याकांड हुआ, उसी स्थान पर संघ की शाखा लगी। उसे छोटे से गांव में, सवा सौ स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित थे। इनमें केशधारी (सिक्ख) स्वयंसेवक बड़ी संख्या में थे। स्वयंसेवक गीत गा रहे थे –

कौन कहंदा हिन्दू – सिक्ख वक्ख ने।

ए भारत मां दी सज्जी –  खब्बी अक्ख ने ।।

(कौन कहता है कि हिन्दू – सिक्ख अलग हैं? वे तो भारत मां की, दाई और बाई आंख हैं।)

इस एक घटना ने पंजाब का सारा चित्र बदल दिया। खालिस्तानी आतंकवादियों को कड़ा संदेश गया, कि संघ के स्वयंसेवक डरने या घबराने वाले नहीं हैं। वह निर्भयता से अपना काम करते रहेंगे। हिन्दू – सिक्खों के बीच जो दरार डालने की कोशिश की गई, वह बाजी उलट गई। इस घटना से हिन्दू – सिक्खों के बीच की बॉन्डिंग और मजबूत हुई।

आंकड़े बताते हैं कि इस घटना के बाद, आतंकवादियों ने बौखला कर हमलों की प्रखरता बढ़ाई। किंतु अगले एक-दो वर्षों में, पंजाब में हिंसा की घटनाओं में तेजी से कमी आई, और 1992 के बाद पंजाब से खालिस्तानी आतंकवाद लगभग समाप्त हुआ।

1989 यही वर्ष था, जब देश में आरक्षण विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था। राजीव गोस्वामी के साथ कुछ और युवकों ने भी आरक्षण के विरोध में आत्मदाह किया था। कुल 200 युवकों ने आत्मदाह का प्रयास किया, जिनमें से 62 छात्रों की मृत्यु हो गई थी। उन दिनों ऐसा लग रहा था कि समूचा उत्तर भारत दो धड़ों में विभाजित हो रहा है। सामाजिक वातावरण अत्यंत दूषित हो गया था।

वर्ष 1989 यह संघ के संस्थापक, डॉक्टर हेडगेवार जी का भी जन्मशताब्दी वर्ष था। इस निमित्त, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने व्यापक पैमाने पर जनसंपर्क का अभियान चलाया था। इसी समय, अयोध्या के राम जन्मभूमि आंदोलन को संघ प्रेरित विश्व हिन्दू परिषद ने गति दी। सर्वत्र श्रीराम का जयघोष होने लगा। समरसता का उद्घोष होने लगा। और इन सब में, जाति-जातियों के बीच का वह भयंकर तनाव, क्षीण होता गया।

राजीव गांधी की सरकार और उसके बाद आई वीपी सिंह की सरकार में आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। बाद की सरकारों को सोना भी गिरवी रखना पड़ा। वैश्विक पृष्ठभूमि पर भारत के आर्थिक हालात अत्यंत खराब थे। विश्व में GDP की क्रम में हम 17वें स्थान पर थे। उस समय संघ की प्रेरणा से स्वदेशी जागरण मंच का कार्य प्रारंभ हुआ, स्वदेशी के माध्यम से लोगों में ‘स्व’ के भाव का जागरण प्रारंभ हुआ…

अर्थात, संघ की ताकत कम रहे, या वह प्रभावशाली भूमिका में रहे, संघ ने हमेशा ही ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ की भावना से, देश के सामने उत्पन्न विभिन्न संकटों से देश को बाहर निकालने का पूरा प्रयास किया है।

मार्च 2020 में आया कोरोना (कोविड) सबसे भयानक संकट था। पूरा देश थम गया था, सहम गया था। किंतु संकट की इस घड़ी में भी संघ स्वयंसेवकों ने समाज को सक्रिय करके, कोरोना का मुकाबला किया। इस प्रक्रिया में संघ के कुछ प्रचारक और कुछ कार्यकर्ता भी हुतात्मा हुए। किंतु संघ ने समाज को आगे करके पूरे देश में आत्मविश्वास और आशावाद का संचार किया।

यद्यपि संघ की दृष्टि से यह सब लिखा जाना उचित नहीं है, कारण संघ श्रेय नहीं चाहता। किंतु फिर भी, इतिहास में यह रेखांकित (underline) करना आवश्यक है कि आपदा के समय, देश को संकट से उबारा और बिखरने से रोका संघ ने। संघ इस देश की रीढ़ की हड्डी है।

विशेषत: जब हम हमारे पड़ोसी देश, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश को देखते हैं, वहां की अराजकता देखते हैं, वहां का बिखराव देखते हैं, तब हमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का महत्व विशेष रूप से प्रतीत होता है..! ‘इंडिया’ से, आज के इस बदले हुए ‘भारत’ को खड़ा करने में, संघ का विशेष योगदान है।

लालच-धोखे से धर्म परिवर्तन सामाजिक एकता के लिए खतरा, जनजातीय समाज की परंपरा की रक्षा करना संवैधानिक

रायपुर, छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में जनजातीय गांवों में पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने वाले बोर्डों के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय ने जनजातीय समाज को जबरन या लालच देकर किए जाने वाले धर्मांतरण से बचाने के लिए लगाए बोर्डों को असंवैधानिक मानने से इंकार कर दिया।

कांकेर जिले के आठ जनजातीय गांवों में लगे बोर्डों पर सवाल उठाने वाली याचिका को न्यायालय ने खारिज कर दिया और कहा कि इन बोर्डों का मकसद धर्म विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक एकता की रक्षा करना है।

कांकेर जिले के दिग्बल टांडी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मांग की थी कि गांवों में लगे इन बोर्डों को हटाया जाए। उनका आरोप था कि ये बोर्ड पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों को गांव में प्रवेश करने से रोकते हैं और धार्मिक भेदभाव करते हैं। ये बोर्ड कुदल, पारवी, जुनवानी, घोटा, हबेचुर, घोटिया, मुसुरपुट्टा और सुलागी जैसे जनजातीय गांवों में लगाए गए थे। याचिकाकर्ता ने पंचायत विभाग पर आरोप लगाया कि उसने इन गांवों को पत्र जारी कर ‘हमारी परंपरा, हमारी विरासत’ के नाम पर ऐसे बोर्ड लगाने को कहा।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभुदत्त गुरु की पीठ ने कहा कि बोर्डों में ईसाई धर्म के खिलाफ कुछ भी नहीं लिखा गया है। वे केवल उन पादरियों के प्रवेश को रोकते हैं, जिन पर लालच और धोखे से धर्मांतरण कराने के आरोप हैं। “ये बोर्ड जनजातीय लोगों ने अपनी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत बचाने के उद्देश्य से लगाए हैं। यह अवैध धर्मांतरण के खिलाफ एहतियाती कदम है, न कि किसी धर्म के खिलाफ भेदभाव।”

न्यायालय ने कहा कि अवैध धर्मांतरण से सामाजिक सद्भाव पर बुरा असर पड़ता है। मिशनरियों द्वारा गरीब, अशिक्षित और पिछड़े समुदायों को बेहतर जीवन, शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर लालच देकर धर्म बदलवाने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हुए न्यायालय ने कहा कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक विभाजन को जन्म देता है।

“ईसाई मिशनरियों पर जनजातीय समाज को बहला-फुसलाकर धर्मांतरण कराने के आरोप लगते हैं। यह प्रक्रिया न केवल जनजातीय परंपराओं को तोड़ती है, बल्कि समुदायों के अंदर गहरे मतभेद पैदा करती है।”

न्यायालय ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। इसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता के दायरे में ही माना जाएगा। इसीलिए कई राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं, ताकि धोखे, दबाव या लालच से होने वाले धर्मांतरण को रोका जा सके।

“भारत का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना सह-अस्तित्व और विविधता के सम्मान पर आधारित है।” लेकिन लालच देकर धर्मांतरण करवाना न केवल धर्म का अपमान है, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव भी पैदा करता है। कई बार ऐसे धर्मांतरण विवादों के बाद हिंसा की घटनाएं भी सामने आती हैं।

मुख्य मंदिर निर्माण संबंधी सभी कार्य पूर्ण

अयोध्या। मुख्य मंदिर निर्माण सबंधी सभी कार्य पूर्ण हो गए हैं अर्थात – मुख्य मंदिर, परकोटा के ६ मंदिर – भगवान शिव, भगवान गणेश, भगवान हनुमान, सूर्यदेव, देवी भगवती, देवी अन्नपूर्णा तथा शेषावतार मंदिर भी पूर्ण हो चुके हैं। इन पर ध्वजदण्ड एवं कलश भी स्थापित हो चुके हैं। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की ओर से यह जानकारी एक सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से दी गई।

तीर्थ क्षेत्र की ओर से बताया गया कि इसके अतिरिक्त सप्त मण्डप अर्थात् महर्षि वाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, निषादराज, शबरी एवं ऋषि पत्नी अहल्या मंदिरों का भी निर्माण पूर्ण हो चुका है। सन्त तुलसीदास मंदिर भी पूर्ण हो चुका है तथा जटायु और गिलहरी की प्रतिमाएं स्थापित की जा चुकी हैं।

जिन कार्यों का सीधा सम्बन्ध दर्शनार्थियों की सुविधा से है अथवा व्यवस्था से है, वे सभी कार्य पूर्णत्व प्राप्त कर चुके हैं। मानचित्र अनुसार सड़कें एवं फ्लोरिंग पर पत्थर लगाने कार्य L&T द्वारा तथा भूमि सौन्दर्य, हरियाली और लैंड स्केपिंग कार्य सहित १० एकड़ में पंचवटी निर्माण का कार्य GMR द्वारा तीव्र गति से किए जा रहे हैं।

तीर्थ क्षेत्र ने बताया कि वही कार्य अभी चल रहे हैं, जिनका सम्बन्ध जनता से नहीं है जैसे ३.५ किलोमीटर लम्बी चारदीवारी, ट्रस्ट कार्यालय, अतिथि गृह, सभागार इत्यादि।

हिन्दू समाज के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं – मिलिंद परांडे

काशी। विश्व हिन्दू परिषद काशी कार्यालय के लोकार्पण कार्यक्रम संपन्न हुआ। विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय महामंत्री संगठन मिलिंद परांडे जी ने कहा कि यह भवन केवल निवास के लिए नहीं, बल्कि देश दुनिया से काशी आने वाले लोगों के लिए एवं संगठन गतिविधियों का केंद्र होगा। यह व्यक्तिगत वस्तु नहीं, बल्कि सार्वजनिक भवन है, जिसकी व्यवस्थाओं के लिए हमें अपने नागरिक कर्तव्य का बोध होना चाहिए। यह अनेक पुण्य आत्माओं द्वारा किए गए कार्य का प्रतिफल है। आज सैकड़ों वर्षों के बाद हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के लिए समाज में अनुकूल वातावरण बना हुआ है, फिर भी हिन्दू समाज के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं। उनकी राजनीतिक शक्तियां कमज़ोर हुई हैं, आज वह प्रत्यक्ष शारीरिक हिंसा साम्यवादी, जिहादी समाज में हिंसा का माहौल निर्माण कर रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में हम हिन्दू हैं, हमें इसको सिद्ध करना पड़ेगा। हम जाति, मत, पंथ, संप्रदाय से ऊपर उठकर हम हिन्दू हैं, इस कर्तव्य का पालन करना होगा। हिन्दू-हिन्दू से कैसे लड़ेगा, ऐसा वातावरण समाज में बनाने का प्रयास किया जा रहा है। हमें ऐसी शक्तियों को पहचान कर उनके मंसूबे नाकाम करने पड़ेंगे। घटती प्रजनन दर जनसंख्या असंतुलन का मुख्य कारण है, जो समाज में एक बड़ी खाई का रूप लेती जा रही है। इन विषयों पर समाज को चिंतन करना है। जो पोषण देने में सक्षम है, उन लोगों के यहां भी प्रजनन का अनुपात बहुत कम है।

उन्होंने कहा कि आज 10 से 15 वर्ष के बच्चों को सीमावर्ती राज्यों पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, बर्मा, थाईलैंड से ड्रग की आपूर्ति की जा रही है। वर्ष में लगभग 40000 करोड़ रुपये का ड्रग पकड़ा गया है, जो हमारे संस्कार समाप्त करने की बहुत बड़ी साजिश चल रही है। गौ-हत्या और धर्मांतरण, मंदिर अधिग्रहण एक बड़ी चुनौती है, ऐसे विषयों पर समाज का जागरण हो, समाज संस्कार युक्त हो, इसके लिए समाज का प्रबोधन करने की जिम्मेदारी हम सब की है। समाज में पर्यावरण, नागरिक कर्तव्य, सामाजिक समरसता जैसे विषयों को ले जाना हम लोगों की जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम में महंत रविदास मठ के भारत भूषण जी ने संगठन के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि विश्व हिन्दू परिषद हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के लिए हिन्दू समाज के व्यापक जागरण के कार्य में लगा रहता है। ऐसे ही संगठनों से हमारे संस्कृति का परचम पूरी दुनिया में लहरा रहा है। पूजन व मंगलाचरण संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य द्वारा संपन्न हुआ। कार्यालय निर्माण में सहयोग करने वाले प्रवीण रुंगटा, अमित अग्रवाल, नवीन रुंगटा का सम्मान किया गया।

बस्तर क्षेत्र में बारूद की गंध नहीं बहेगी; प्रगति के साथ कदम ताल करेगा

आप राजनीति के लिए सरकार की आलोचना कर सकते हैं, गलत पर आलोचना करनी ही चाहिए। लेकिन क्रूर माओवादी आतंकवाद (नक्सलवाद) के खात्मे के लिए सरकार ने नई लकीर खींच दी है।  17 अक्तूबर 2025 को छत्तीसगढ़ में 210 माओवादियों का समर्पण एक बड़ी और ऐतिहासिक सफलता है। हथियार का रास्ता छोड़कर हाथों में संविधान यानी लोकतंत्र की राह पकड़ने वालों के लिए सरकार ने – रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत भी किया। गुलाब देकर अभिनंदन करते हुए बताया कि बारूद नहीं, अब पुष्प की भांति ही सुगंध बिखेरिए।

सोचिए कि जिन नक्सलियों के हाथों में हथियार रहते थे और जो हिंसा से छत्तीसगढ़ की धरती को लाल करते थे। अब वो माओवादी हथियार छोड़कर संविधान थाम रहे हैं। हिंसा की बजाय शांति और सकारात्मक भूमिका की ओर बढ़ रहे हैं। इस मोड़ तक लाने के पीछे निश्चय ही सरकार की मुखरता और प्रतिबद्धता रही है। जो अब इस रूप में सबके सामने आ पाई है। लगातार आलोचनाओं और आरोपों के बावजूद भी सरकार और जवान अपने उद्देश्य से विचलित नहीं हुए। माओवादियों ने अगर हिंसा का रास्ता चुना तो उन्हें संहार का सामना करना पड़ा और अब शांति की ओर बढ़े तो सरकार ने स्वागत किया।

निश्चय ही इसके लिए मुख्यमंत्री और गृहमंत्री बधाई के पात्र हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ में शांति के संकल्प को केवल नारों और वादों में ही सीमित नहीं रखा। बल्कि उसे साकार कर दिखाया है। इससे पहले भी माओवादी छिटपुट समर्पण करते रहे हैं। लोन वर्राटू अभियान की इसमें बड़ी भूमिका रही है। लेकिन एक साथ 210 की संख्या में माओवादियों का समर्पण सरकार की लोक हितकारी भूमिका प्रकट करता है। इसके साथ ही ‘नक्सलवादी आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025’, नियद नेल्लानार योजना और ‘पूना मारगेम-पुनर्वास से पुनर्जीवन’ जैसी योजनाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सरकार ने बता दिया है कि उसका उद्देश्य बस्तर में स्थायी शांति है। इससे किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता है। जहां माओवादियों के खिलाफ जवानों ने लगातार आक्रामक कार्रवाई की। वहीं बातचीत के माध्यम से आत्मसमर्पण के रास्ते भी खोले। हथियार छोड़कर मुख्यधारा में शामिल करने के लिए पहल की। इसमें सफलता भी मिली। स्पष्ट है कि ये ‘पुनर्वास से पुनर्जीवन’ लक्ष्य है, जिसे मार्च 2026 तक केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार पूरा करने में पूरी ताक़त झोंक चुकी है। लेकिन चुनौतियां अब भी बाकी हैं। अब बस्तर सहित समूचा छत्तीसगढ़ शांति के रास्ते पर बढ़ चला है। बस्तर क्षेत्र में अब बारूद की गंध नहीं बहेगी, बल्कि लोकतन्त्र की छांव में प्रगति के साथ कदम ताल करेगा।

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

राष्ट्र निर्माण में मीडिया की मजबूत भूमिका होनी चाहिए – दत्तात्रेय होसबाले जी

हरिद्वार, उत्तराखंड।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में शुक्रवार को राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी, देसंविवि के कुलपति शरद पारधी जी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी, पूर्व सांसद तरुण विजय सहित अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। सम्मेलन में कुल पाँच सत्र हुए, जिनमें वक्ताओं ने मीडिया से भारत को विकसित बनाने में योगदान देने का आह्वान किया।

मुख्य अतिथि दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि मीडिया को सशक्त भूमिका निभानी चाहिए। अपने देश व धर्म की सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करते रहना चाहिए। राष्ट्र निर्माण में मीडिया की विशेष भूमिका है। स्वाधीनता के समय में भी हमारे नायकों ने मीडिया के कई माध्यमों का उपयोग किया और जन जागरण में मीडिया की उपयोगिता सिद्ध की। पत्रकारों का आवाहन करते हुए उन्होंने कहा कि सभी को अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी के साथ निभानी चाहिए। समाज के सशक्तीकरण व नारी जागरण जैसे विषयों पर अपनी योग्यता का पूरा उपयोग करते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण में मीडिया की मजबूत भूमिका होनी चाहिए।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि पत्रकारों को संवेदनशील होना चाहिए और वे ऐसे खबरों का ही विस्तार करें, जो समाज व राष्ट्र का विकास में सहायक हों। आज जिस तरह से असुरता, अनीति, और भ्रष्टाचार ने अपना पैर पसारा है, उसे अब जड़ से मिटाने का समय आ गया है। प्राच्यम स्टूडियोज के सीईओ प्रवीण चतुर्वेदी, सुदर्शन चैनल के मुख्य संपादक सुरेश चव्हाणके, पूर्व सूचना आयुक्त उदय माहूरकर, पूर्व राज्यसभा सदस्य तरुण विजय ने भी मीडिया की भूमिका पर विचार साझा किए।

पांच सत्रों में दिल्ली, बिहार, झारखण्ड, उप्र, उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, मप्र सहित अनेक राज्यों से आए ’मीडिया जगत के प्रतिष्ठित व्यक्तियों, लेखकों, फिल्मकार, पत्रकारों ने मीडिया की भूमिका पर विचार-विमर्श किया। इस बात पर बल दिया कि आज के समय में मीडिया केवल सूचना का स्रोत नहीं, बल्कि राष्ट्र को दिशा देने वाला एक सशक्त माध्यम बन चुका है। इस दौरान अखिल विश्व गायत्री परिवार के सैकड़ों स्वयंसेवक सदस्य भी उपस्थित रहे और आयोजन को वैचारिक व सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध किया। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने भी आधुनिक समय में स्पिरिचुअल पत्रकारिता की आवश्यकता पर विशेष चर्चा की।

इस दौरान अखण्ड ज्योति की आध्यात्मिक यात्रा पर डॉक्यूमेंट्री, संस्कृति संचार, रिनासा के नये अंक व पुस्तकों का विमोचन किया गया। कुलपति, प्रतिकुलपति ने अतिथियों को देसंविवि का प्रतीक चिह्न, गंगाजली, रुद्राक्षमाला आदि भेंटकर सम्मानित किया।

मानसरोवर की मुक्ति भारत एवं तिब्बत का सामूहिक स्वप्न – डोलमा गैरी

धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम ‘शताब्दी संघोष’ ने निर्वासित तिब्बत प्रशासन की सुरक्षा मंत्री डोलमा गैरी ने कहा कि मानसरोवर की मुक्ति भारत एवं तिब्बत का सामूहिक स्वप्न है। इस स्वप्न की प्राप्ति के लिए आरएसएस का देश प्रेम एवं इतिहास हमें प्रेरित करता है।

सुरक्षा मंत्री डोलमा गैरी ने कहा कि प्रत्येक तिब्बती भारत को आर्यभूमि कहता है, और आरएसएस आर्यभूमि के इतिहास एवं परंपरा का संवाहक है, इसलिए देश प्रेम का आरएसएस का दृष्टिकोण  तिब्बतियों के लिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है। निर्वासित तिब्बतियों के अधिकारों एवं स्वतंत्रता के लिए संघ प्रारंभ से ही प्रयत्नशील है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र बौद्धिक शिक्षण प्रमुख हरीश जी ने कहा कि संघ ने 100 वर्ष के इतिहास में उपेक्षा एवं विरोध की लम्बी श्रृंखला का सामना किया है और अब उसे समाज का सहयोग प्राप्त होने लगा है। बढ़ते समाजिक सहभाग ने वैश्विक स्तर पर कई शक्तियों को हैरत में डाल दिया है। समाज के बढ़ते सहभाग से पैदा हुई ऊर्जा का सही उपाय उपयोग करने के लिए संघ ने पंच परिवर्तन का लक्ष्य लिया है। स्व बोध, कुटुम्ब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य और पर्यावरण संरक्षण को लेकर संघ ने भारतीय समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया है। उन्होंने इस प्रयास से समाज के सभी नागरिकों को जुड़ने का आह्वान भी किया।

संघ के शताब्दी वर्ष और विजयादशमी के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में दाढ़ी मेला ग्राउंड से लेकर चरान चौक तक लगभग 625 स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश में पथ संचलन किया। इसमें छोटे आयु के बाल स्वयंसेवकों का पथ संचलन आकर्षण का केन्द्र रहा। स्थानीय लोगों ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया।

पथ संचलन से पहले अतिथियों ने शस्त्र पूजन किया।

महर्षि वाल्मीकि ने रामायण के माध्यम से श्री राम को घर-घर तक पहुंचाया – डॉ. मोहन भागवत जी

कामठी (नागपुर), 07 अक्तूबर।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि जी की महानता को तो हम सब लोग जानते हैं। हमारे जीवन में राम लाने वाले वही हैं। राम तो थे, और हो गए, परंतु घर-घर में राम महर्षि वाल्मीकि के कारण पहुंचे। उन्होंने रामायण लिखी और सब तक पहुंचाई। क्योंकि उनके मन की संवेदना सबको अपना मानने वाली थी। दुनिया का दुःख दूर हो, इसलिये उन्होंने यह किया। उस पर चिंतन करने की आवश्यकता है।

सरसंघचालक जी वाल्मीकि समाज सेवा मंडल, कामठी, नागपुर द्वारा आयोजित महर्षि वाल्मीकि जन्मोत्सव समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर मंच पर सांसद सुमित्रा वाल्मीकि, अंशु रघुवंशी, विदर्भ प्रान्त सह संघचालक श्रीधर जी गाडगे और विधायक आशीष जायसवाल मंच पर उपस्थित रहे।

सरसंघचालक जी ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि जी का जन्म जयंती उत्सव मनाने के लिए हम यहां एकत्रित हैं। उत्सव शब्द से उत्साह शब्द आता है। उत्सव मनाते हैं, तो उत्साह बढ़ता है। लेकिन कौन-सा उत्साह बढ़ना चाहिए? तो जिनका उत्सव मनाते हैं, उनके जीवन के जो गुण हैं, उन गुणों का आचरण, अनुकरण करने का उत्साह बढ़ना चाहिए।

रामायण का मूल उद्देश्य

महर्षि वाल्मीकि जी ने दुनिया दुःख दूर करने के लिये रामायण लिखी और सब तक पहुंचाई। अगर दुनिया का दुःख दूर होना है, तो वो कोई जादू से दूर नहीं होता। क्योंकि दुःख क्यों पैदा होता है? दुःख हम लोग ही पैदा करते हैं। अपने स्वयं के जीवन में भी दुःख पैदा करने वाले हम ही हैं। दोष दूसरों को देते हैं। लेकिन कहीं न कहीं हमारा ही कर्म हमको खाता है। हमारे मन में स्वार्थ, भेद है, हम किसी नियम में बैठते नहीं, हम अपने आप को सबसे अलग और बड़ा मानते हैं, बाकी लोगों को नीच मानते हैं, ये बातें मन के अहंकार के कारण उत्पन्न होती हैं, उसके कारण जीवन में दुःख होता है। जो अहंकारी नहीं है, जो अपने फायदे-नुकसान की परवाह नहीं करता, यश-अपयश, जय-पराजय, मान-अपमान, इससे अलग होकर हर किसी परिस्थिति में जो मनुष्यता का बर्ताव करता है, सबके साथ अपने आप को जोड़कर एक मानकर बर्ताव करता है, वो स्वयं तो सुखी होता ही है, लेकिन दुनिया में सर्वदूर सुख का अवतरण करने का कारण बनता है। ऐसे उदाहरण को सारे समाज के सामने रखने के लिए उन्होंने रामायण रची।

रामायण यह कल्पना की बात नहीं है। यह ग्रंथ हमको बताता है कि उस समय जो प्रत्यक्ष राजा राम थे, वह जब बालक राम थे, जब वनवासी राम थे, जब युद्ध में लड़ने वाले राम थे, जब राजा राम थे, और उसके बाद एक कुटुंब वत्सल राम भी थे। राम के अनेक रूप हैं। तो एक पूरे जीवन का वर्णन किया। हमें रामायण में एक आदर्श व्यक्ति, राजा राम का उदाहरण मिलता है। रामायण में एक आदर्श परिवार का भी उदाहरण मिलता है । भाई हो तो भरत जैसा, माता हो तो कौशल्या जैसी। रामायण में जितने पात्र हैं, राम के कुटुंब में भी और रावण के कुटुंब में भी, दोनों की करनी अलग-अलग है, परस्पर विरुद्ध भी है, लेकिन एक-दूसरे के साथ कुटुंब में आचरण करने के मूल्य समान हैं। हमको व्यक्ति के नाते कैसा रहना चाहिए जीवन में, राम बताते हैं। हमारे कुटुंब में हम सबको परस्पर व्यवहार कैसा रखना चाहिए, रामायण बताता है। आदर्श सेवक कैसा हो, आदर्श मंत्री कैसा हो राजा को सलाह देने वाला, श्री राम है, उनके भक्त हनुमान हैं। भक्ति के तो इतने उदाहरण हैं, विभीषण भी हैं, सुग्रीव भी हैं। जीवन के हर प्रकार के व्यक्ति के लिए आचरण का मार्गदर्शन वाल्मीकि जी की रामायण में है। उन्होंने केवल कथा नहीं बताई, उन्होंने हमारे लिए एक शाश्वत उपदेश दिया है।

मोहन भागवत जी ने कहा कि विश्व में भारत अपनी आध्यात्मिकता, सद्भावना, सद्-व्यवहार के कारण प्रसिद्ध है। और वह आध्यात्मिकता, सद्-व्यवहार, यह किसके कारण आया? वो सद्भावना सारे विश्व के प्रति हमारे मन में क्यों आई? उसके मूल में राम-कथा है, और राम-कथा का मूल है महर्षि वाल्मीकि जी की करुणा, महर्षि वाल्मीकि जी का आदर्शवाद।

महर्षि वाल्मीकि जी ने केवल कथा नहीं लिखी, उनका स्वयं का जीवन ऐसा था। उनके कथा के नायक राम थे, वह वास्तविक थे, कल्पना नहीं थी। उन्होंने देखकर उनका जीवन लिखा। ऐसा उत्तम चरित्र उन्होंने स्वयं चरितार्थ किया, जो चरितार्थ कर रहा था उसकी कहानी बताई। इसलिए बताई कि यह संस्कारों की परंपरा, गुणवत्ता की परंपरा, विश्व के प्रति सद्भाव की परंपरा सतत चलती रहे। परिस्थिति आती है उल्टी-सीधी। लेकिन दिमाग ठिकाने पर रहे, मन में शांति रहे, मन में प्रेम रहे, सद्भावना रहे और कष्ट उठाकर भी, सहन करके भी, लोग अच्छाई के मार्ग पर चलें, बुराई के मार्ग पर न चलें।

सरसंघचालक जी ने कहा कि आज की गणना के अनुसार कहते हैं कि रामायण 8000 वर्ष पूर्व हो गई। तो 8000 वर्ष पूर्व जो उन्होंने सपना देखा था, वह 8000 वर्ष बाद आज भी हम लोग ऐसे प्रयत्नों से, धैर्यपूर्वक, सतत, मेहनत करते हुए, अपनी इन्हीं आँखों से, इसी देह में, इस देश में साकार कर सकते हैं और साकार करना चाहिए। मानवता के प्रति हमारा यह कर्तव्य है। क्योंकि हम भारतीय हैं, यह हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा है, उसको आगे सरसाना हमारा कर्तव्य है। उस संस्कृति के कारण ही हम वास्तविक मनुष्य का जीवन पाते हैं। और एक व्यक्ति के नाते, हमारे अपने समाज के प्रति, हमारे अपने परिवार के प्रति अपना यह कर्तव्य है। ये त्रिविध कर्तव्य अपने पूरे हो जाएं, इसलिए इस प्रकार के उत्सव सहायभूत होते हैं। आज के प्रसंग का यह महत्व समझकर हम सब लोग इसका चिंतन करें और आचरण करें।

प्रभु श्रीराम के दर्शन को 40 दिन की पदयात्रा, 73 वर्षीय राम भक्त का उत्साह

अयोध्या, 9 अक्तूबर। प्रभु श्री रामलला के प्रति समर्पण व संकल्प पूर्ति के लिए 73 वर्षीय युवा-वृद्ध 1338 किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए अयोध्या धाम पहुंचे।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चम्पतराय से भेंट की अभिलाषा में कारसेवकपुरम आए। गुजरात के मेहसाणा जनपद के ग्राम मोदीपुर निवासी जयंती लाल हरजीवन दास पटेल बताते हैं कि अक्तूबर 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा जब मेहसाणा पहुंची तो वे भी पूरे उत्साह से इसमें शामिल हुए और मंदिर बन जाने पर मेहसाणा से अयोध्या तक की पदयात्रा का संकल्प लिया था।

अब रामलला, राम दरबार सहित परिसर व परकोटे के आठ अन्य मंदिरों की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ध्वजारोहण की घोषणा होने पर संकल्प पूर्ति के लिए पदयात्रा करते आए  हैं। जयंतीलाल ने बताया कि रोज 33-35 किलोमीटर चलते व रात को विश्राम करते थे। 30 अगस्त को शुरू की गईं यात्रा 40वें दिन अयोध्या में समाप्त हुई। रास्ते में अधिकांशतः मंदिरों, सार्वजनिक पार्क व अतिथि गृहों में भोजन विश्राम करते हुए यात्रा की निरन्तरता रखी। नित्य अग्रिम पड़ाव के लिए कुछ रिश्तेदार मोबाइल पर आगे के पड़ाव का अनुमान बता देते थे।

प्रभु राम समस्त मानव जाति के लिए आदर्श हैं – दत्तात्रेय होसबाले जी

अयोध्या, 02 अक्तूबर 2025।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी १०० वर्षों की यात्रा पूरी करते हुए 101वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है। इसी दिन समाज के संगठन व सामर्थ्यवान राष्ट्र के रूप में भारत को परम वैभव पर ले जाने हेतु डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने 27 सितम्बर 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य प्रारंभ किया था। अयोध्या के राम कथा पार्क में श्री विजयादशमी उत्सव का आयोजन किया गया। ध्वजारोहण के साथ मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने शस्त्र पूजन कर भगवान राम के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर पूजन किया।

कार्यक्रम अध्यक्ष भगवान श्री ऋषभ देव जन्मभूमि दिगम्बर जैन तीर्थ अयोध्या के पीठाधीश पूज्यसंत रवींद्र कीर्ति स्वामी जी ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण संघ के वर्षों के संघर्ष का परिणाम है। संघ वैदिक, सनातन संस्कृति के मूल मंत्र अहिंसा परमो धर्मः का पालन करने वाला संगठन है।

सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि विजयादशमी धर्म स्थापना का मंगल उत्सव है। अधर्म पर धर्म की, अन्याय पर न्याय की, असत्य पर सत्य की जीत की कामना करते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने अद्भुत प्रेरणादाई यात्रा के सौ वर्ष पूर्ण करते हुए अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। संघ के स्वयंसेवक देश व विदेशों में भी रहकर मानवता की सेवा में निरंतर कार्य कर रहे हैं। हिन्दुत्व समन्वय का विचार है। रामराज्य और हिन्दू राष्ट्र अलग अलग नहीं है। प्रभु राम केवल भारत भूमि के नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए आदर्श हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज को एक ध्येय मार्ग पर संगठित करने का संकल्प लेकर कार्य कर रहा है।

राष्ट्रभक्ति, सेवा, अनुशासन के मार्ग पर चलते हुए, देश सेवा के लिए सामने आएं, कमजोर दुर्बल के जीवन को सार्थक बनाने के लिए संघ के स्वयंसेवक कार्यरत हैं। संघ के साथ मिलकर जिन्होंने इस कार्य में सहयोग किया, हम सब आज उन सबका स्मरण करते हुए आभार व्यक्त करते हैं। भारत के प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा, सम्मान, प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए। इसलिए संघ शताब्दी वर्ष से पंच परिवर्तन के विषय को ले कर आगे बढ़ेंगे। देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें। इस विचार को लेकर नौजवानों को खड़ा होना चाहिए। देश में एक अध्यात्म, चरित्र, धर्म की क्रांति होनी चाहिए। व्यक्ति निर्माण से चरित्र एवं राष्ट्र निर्माण करना ही संघ का उद्देश्य है।

कार्यक्रम के पश्चात पथ संचलन निकला।

डॉक्टर हेडगेवार जी और हिन्दुत्व…

प्रशांत पोळ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष पर विशेष

डॉक्टर जी ने जब संघ प्रारंभ किया, तब ‘हिन्दुत्व’ शब्द प्रचलन में नहीं था। स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ने 1927 से इस शब्द का प्रयोग करना प्रारंभ किया। इसके पहले स्वामी विवेकानंद जी ने हिन्दुत्व के लिए ‘हिन्दुइज़्म’ शब्द का प्रयोग किया था। ‘इज़्म’ यानि वाद अर्थात ‘हिन्दू वाद’। यह शब्द बाद में भी अनेकों बार प्रयोग किया गया। डॉक्टर जी ने ‘हिन्दुत्व’ के समानार्थी शब्द के रूप में ‘हिन्दू हुड’ (Hindu hood) शब्द का प्रयोग किया है (brother hood जैसा)।

मद्रास के डॉक्टर नायडू ने तमिळनाडु में हिन्दू महासभा कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया था। ‘इस कॉन्फ्रेंस में डॉक्टर जी ने उपस्थित रहना चाहिए’, ऐसा आग्रह करने वाला पत्र डॉक्टर नायडू ने डॉक्टर जी को लिखा। किंतु स्वास्थ्य ठीक न होने से डॉक्टर जी बिहार के राजगीर में गए थे। अर्थात् उनका मद्रास जाना संभव नहीं था। इस संदर्भ में अपनी मृत्यु से तीन महीने पहले, अर्थात 1940  के 17 मार्च को, डॉक्टर जी ने मद्रास के डॉक्टर नायडू को पत्र लिखा। ‘हिन्दू समाज में हिन्दू जनजागरण के कार्य की आवश्यकता’, इस पत्र में डॉक्टर जी ने अधोरेखित किया है। डॉक्टर जी लिखते हैं – “To arouse the dormant spirit of Hinduhood among our brethren of the South”. (‘दक्षिण के बंधुओं मे हिन्दुत्व की सुप्त भावनाओं को जगाने का यह कार्य है’)

19 अक्तूबर, 1929 को डॉक्टर जी ने नीलकंठ राव सदाफळ जी को एक पत्र भेजा है। इसमें डॉक्टर जी लिखते हैं, “स्वयंसेवकों के मन में राष्ट्रीयत्व का पूर्णतः संचार करके, हिन्दुत्व और राष्ट्रीयत्व में कोई भेद नहीं है, यह दोनों बातें एक ही हैं, यह तर्कपूर्ण ढंग से समझाना, यह संघ शाखाओं का काम है।”

डॉक्टर जी ने एक जगह लिखा है –

सामर्थ्य है हिन्दुत्व का, प्रत्येक हिन्दू राष्ट्रीय का।

किंतु उसे संगठन का.., अधिष्ठान चाहिये..।

वे आगे लिखते हैं, “हिंदुस्तान में आसेतु हिमाचल बसने वाले अखिल हिन्दुओं का एकरूप और मजबूत संगठन खड़ा करना यही हमारा वर्तमान धर्म है। हम लोगों में राष्ट्रीयत्व की भावना निर्माण करके,

हिन्दू यह सब एक राष्ट्र के अंग हैं तथा हिन्दू समाज के विभिन्न मत – पंथों के आचार – विचार एक ही प्रकार के है, यह वैज्ञानिक दृष्टी से समझाकर, प्रत्यक्ष कार्य करना है।”

डॉक्टर जी का हिन्दुत्व समझने के लिये अत्यंत सरल, सीधा और सुगम था। स्व. दादाराव परमार्थ, उनके ‘परम पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार’ लेख में लिखते हैं, “यह देश हिन्दुओं का है, यह तो हम सब का विश्वास था। हिन्दू बाहर से आये हैं, यह कल्पना हमें मान्य नहीं थी। मूलतः हिन्दू इसी देश के हैं तथा अपने त्याग, समर्पण और कर्तृत्व से यह राष्ट्र उन्होंने खड़ा किया है। इस देश का राष्ट्रीयत्व यह हिन्दुत्व है, इस पर डॉक्टर जी की अटूट श्रद्धा थी। इसलिये, इस देश पर पूर्ण समर्पित भाव से प्रेम करने वाला हिन्दू है। इस देश की प्रगति के लिये अपने आपको झोंककर काम करने वाला हिन्दू है। इस देश की सर्वांगीण उन्नति के लिए प्रयत्न की पराकाष्ठा करने वाला हिन्दू है। और ऐसे सारे हिन्दुओं का संगठन बांधना यह डॉक्टर जी का ध्येय था। इतने सीधे, सरल और स्वच्छ नजरों से देखने के कारण डॉक्टर जी को हिन्दू समाज के भेद-विभेद, जाति-पाती कभी दिखी ही नहीं। हिन्दुओं का संगठन करते समय यह विचार गलती से भी उनके मन में नहीं आया।”

और इसलिये जाति-पाती के चश्मे से जो लोग हिन्दू समाज को देखते थे, उनको बड़ा आश्चर्य लगता था। महात्मा गांधी जी को भी इसका आश्चर्य लगा था। वर्ष 1934 के दिसंबर में वर्धा में संघ का शीतकालीन शिविर लगा था। उन दिनों महात्मा गांधी जी का मुकाम वर्धा शहर में था। महात्मा जी के बंगले के पास ही यह शिविर स्थल था, इसलिए महात्मा जी को संघ के डेढ़ हजार स्वयंसेवकों के अनुशासित शिविर को देखने की इच्छा हुई। उनकी सुविधानुसार समय तय हुआ। 25 दिसंबर 1934 मंगलवार को प्रातः छह बजे महात्मा जी शिविर में आएंगे, यह निश्चित हुआ।

महात्मा जी तय समय पर शिविर में आए। वे वहां लगभग डेढ़ – दो घंटे रुके। उन्होंने शिविर की सारी जानकारी ली। सभी स्वयंसेवक एक साथ रहते हैं, एक ही पंक्ति में भोजन करते हैं, यह सुनकर और देखकर उन्हें आश्चर्य लगा। जो दिख रहा है, उसमें कितना तथ्य है, यह जानने के लिए कुछ स्वयंसेवकों से प्रश्न भी पूछे। तब, “ये महार, ये ब्राह्मण, ये मराठा, ये दर्जी ऐसा भेदभाव हम नहीं मानते। हमारे बगल में किस जाति का स्वयंसेवक बैठा है, इसकी कोई जानकारी हमें नहीं रहती और ना ही वैसी जानकारी लेने की हम में से किसी की भी इच्छा रहती है। हम सब हिन्दू हैं और इसीलिए बंधु हैं। अतः आपसी व्यवहार में ऊंच-नीच सोच रखने की कल्पना भी हम नहीं करते।” इस प्रकार के उत्तर महात्मा जी को स्वयंसेवकों से मिले।

यह है डॉक्टर हेडगेवार जी का हिन्दुत्व। बिलकुल सीधा और सरल। “हम सब हिन्दू हैं, इसलिये बंधु हैं”, इस एक वाक्य ने हिन्दुओं का संगठन खड़ा किया, जो आज विश्व का सबसे बड़ा संगठन है।

डॉक्टर जी के संपूर्ण कार्यकाल में वह तात्विक या बौद्धिक विवादों में बहुत ज्यादा नहीं उलझे। उनका जोर, प्रत्यक्ष कार्य पर था। संघ प्रारंभ होने से पहले उन्होंने ऐसे सभी विचार प्रवाहों का विस्तृत अध्ययन किया था। हिन्दू समाज की कमियां, मुस्लिम आक्रांताओं के कारण हिन्दू समाज में आई कुरीतियां, कुछ प्राचीन, अप्रासंगिक परंपराएं… इन सबसे वे अच्छी तरह परिचित थे। किंतु इन सब बातों के विरोध में बोलते रहने की अपेक्षा प्रत्यक्ष कार्य कर, कृति रूप उत्तर देने में उनका विश्वास था।

विभिन्न वैचारिक प्रवाहों में, संस्थाओं में, राजनीतिक दल में कार्य करने के कारण उनके विचारों में पारदर्शिता और स्पष्टता थी। ‘क्या करना है’ यह उनको अवगत था। इसलिये, संघ स्थापना के बाद उनके 15 वर्षों के कालखंड में, और बाद में भी, संघ पर अनेक संकट आने के बावजूद संघ बढ़ता ही रहा। संघ के प्रारंभिक काल से इस बात की स्पष्टता थी, कि संघ का संगठन, हिन्दुओं के संरक्षण के लिए बना हुआ कोई रक्षक दल नहीं है। इसका अर्थ कि हिन्दू समाज ने अपने संरक्षण के लिये संघ को, आज की भाषा में, आऊटसोर्स किया हुआ नहीं है। संघ के स्वयंसेवक संकटों का सामना करेंगे, संघर्ष करेंगे और बाकी हिन्दू समाज इस संघर्ष का मजा देखता रहेगा, यह उन्हें अभिप्रेत नहीं था।

संघ का उद्देश्य हिन्दू समाज का संगठन कर संपूर्ण समाज को सक्षम बनाना यह था/है। इसलिये ‘समाज ही सब कुछ करेगा’ यह भूमिका पहले से आज तक कायम है। यही संघ के यश का सूत्र भी रहा है। संघ ने सही अर्थों में हिन्दू समाज का सक्षमीकरण (empowerment) करना, यह डॉक्टर हेडगेवार जी को अभिप्रेत था। इसलिये 1925 के बाद इस देश पर आए सभी संकटों का सामना संघ ने पूरे समाज को साथ लेकर किया है। चार – पांच वर्ष पहले के करोना में भी संघ स्वयंसेवकों ने आगे बढ़कर अनेक काम किये। संघ ने कोरोना के संघर्ष में संपूर्ण समाज को साथ लेकर सक्रिय किया।

और यही डॉक्टर हेडगेवार जी की दूरदृष्टी सामने आती है। हिन्दू संगठन की रचना बनाते समय उन्होंने अत्यंत स्पष्ट और साफ शब्दों में कहा था, “हमें पूरे हिन्दू समाज का संगठन करना है, समाज में संगठन नहीं करना है”। यह अत्यंत महत्व का सूत्र है। डॉक्टर जी के पहले भी हिन्दू समाज में हिन्दू हितों के लिए काम करने वाली अनेक संस्थाएं और संगठन तैयार हुए थे। किंतु इन सबकी मर्यादाएं थीं। समाज के एक प्रवाह जैसे यह संगठन / संस्थाएं थीं। किंतु प्रारंभ से ही डॉक्टर जी ने संघ को हिन्दू समाज का एक पंथ या प्रवाह न बनाते हुए, ‘संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन’ इसी स्वरूप में खड़ा किया। इसलिये पहले जो संघ के विरोधक थे, वही बाद में संघ के सक्रिय स्वयंसेवक बने।

हिन्दुओं का संगठन यह असंभव कल्पना है, ऐसा पहले बोला जाता था। किंतु डॉक्टर हेडगेवार जी ने इस बात को गलत सिद्ध करके बताया। संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करने के लिये उन्होंने जो संघ की कार्यपद्धति बनायी, उसकी विश्व में कोई तुलना ही नहीं है। इसके कारण एकरूप, एकसमान सोच के, अपनी भारत माता को वैभव के परम शिखर पर पहुंचाने के ध्येय से प्रेरित, ऐसे करोड़ों हिन्दुओं का, विश्व का सबसे बड़ा अभियान खड़ा हुआ। यह संगठन, डॉक्टर जी की मृत्यु के पश्चात भी 85 वर्ष सतत वर्धिष्णु हो रहा है।

दूरदृष्टी के, भविष्य को देखने की क्षमता रखने वाले डॉक्टर हेडगेवार जी का यह निर्विवाद यश है..!

शताब्दी वर्ष श्री विजयादशमी उत्सव 2025 – रा. स्व. संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन

। । ॐ । ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

प. पू. सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत द्वारा

श्री विजयादशमी उत्सव, नागपुर, के अवसर पर दिए उद्बोधन का सारांश

(आश्विन शु. 10 युगाब्द 5127 – गुरूवार दिनांक 2 अक्तूबर 2025)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य के शतवर्ष पूर्ण करने वाली इस विजयादशमी के निमित्त हम यहाँ एकत्रित है । संयोग है कि यह वर्ष श्री गुरु तेग बहादुर जी महाराज के पावन देहोत्सर्ग का तीनसौ पचास वाँ वर्ष है । हिन्द की चादर बनकर उनके उस बलिदान ने विदेशी विधर्मी अत्याचार से हिन्दू समाज की रक्षा की । अंग्रेजी दिनांक के अनुसार आज स्व. महात्मा गांधी जी का जन्मदिवस है । अपनी स्वतंत्रता के शिल्पकारों में वे अग्रणी हैं ही, भारत के ‘स्व’ के आधार पर स्वातंत्र्योत्तर भारत की संकल्पना करने वाले दार्शनिकों में भी उनका स्थान विशिष्ट है । सादगी, विनम्रता, प्रामाणिकता तथा दृढ़ता के धनी व देशहित में अपने प्राण तक न्यौछावर करने वाले हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्मदिवस भी आज ही है ।

भक्ति, समर्पण व देशसेवा के ये उत्तुंग आदर्श हम सभी के लिए अनुकरणीय हैं । मनुष्य वास्तविक दृष्टि से मनुष्य कैसे बने और जीवन को जिये यह शिक्षा हमें इन महापुरुषों से मिलती है ।

आज की देश व दुनिया की परिस्थिति भी हम भारतवासियों से इसी प्रकार से व्यक्तिगत व राष्ट्रीय चारित्र्य से सुसंपन्न जीवन की माँग कर रही है । गत वर्ष भर के कालावधि में हम सब ने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जो राह तय की है उसके पुनरावलोकन से यह बात ध्यान में आती है।

वर्तमान परिदृश्य – आशा और चुनौतियाँ

यह बीती कालावधि एक तरफ विश्वास तथा आशा को अधिक बलवान बनाने वाली है तथा दूसरी ओर हमारे सम्मुख उपस्थित पुरानी व नयी चुनौतियों को अधिक स्पष्ट रूप में उजागर करते हुए हमारे लिए विहित कर्तव्य पथ को भी निर्देशित करने वाली है ।

गत वर्ष प्रयागराज में संपन्न महाकुंभ ने श्रद्धालुओं की सर्व भारतीय संख्या के साथ ही उत्तम व्यवस्थापन के भी सारे कीर्तिमान तोड़कर एक जागतिक विक्रम प्रस्थापित किया। संपूर्ण भारत में श्रद्धा व एकता की प्रचण्ड लहर जगायी।

दिनांक 22 अप्रैल को पहलगाम में सीमापार से आये आतंकवादियों के हमले में 26 भारतीय यात्री नागरिकों की उनका हिन्दू धर्म पूछ कर हत्या कर दी गई । संपूर्ण भारतवर्ष में नागरिकों में दु:ख और क्रोध की ज्वाला भड़की । भारत सरकार ने योजना बनाकर मई मास में इसका पुरजोर उत्तर दिया । इस सब कालावधि में देश के नेतृत्व की दृढ़ता तथा हमारी सेना के पराक्रम तथा युद्ध कौशल के  साथ-साथ ही समाज की दृढ़ता व एकता का सुखद दृश्य हमने देखा । परन्तु अपनी तरफ से सबसे मित्रता की नीति व भाव रखते हुए भी हमें अपने सुरक्षा के विषय में अधिकाधिक सजग रहना व समर्थ बनते रहना पड़ेगा यह बात भी हमें समझ में आ गई ।

विश्व में बाकी सब देशों के इस प्रसंग के संबंध में जो नीतिगत क्रियाकलाप बने उससे विश्व में हमारे मित्र कौन-कौन औंर कहाँ तक हैं इसकी परीक्षा भी हो गई ।

देश के अन्दर उग्रवादी नक्सली आन्दोलन पर शासन तथा प्रशासन की दृढ़ कारवाई के कारण तथा लोगों के सामने उनके विचार का खोखलापन व क्रूरता अनुभव से उजागर होने के कारण, बड़ी मात्रा में नियंत्रण आया है । उन क्षेत्रों में  नक्षलियों के पनपने के मूल में वहाँ चल रहा शोषण व अन्याय, विकास का अभाव तथा शासन-प्रशासन में इन सब बातों के प्रति संवेदना का अभाव ये कारण थे । अब यह बाधा दूर हुई है तो उन क्षेत्रों में न्याय, विकास, सद्भावना, संवेदना तथा सामरस्य स्थापन करने के लिए कोई व्यापक योजना शासन-प्रशासन के द्वारा बने इसकी आवश्यकता रहेगी ।

आर्थिक क्षेत्र में भी प्रचलित परिमाणों के आधार पर हमारी अर्थ स्थिति प्रगति कर रही है, ऐसा कहा जा सकता है । अपने देश को विश्व में सिरमौर देश बनाने का सर्व सामान्य जनों में बना उत्साह हमारे उद्योग जगत में और विशेष कर नई पीढ़ी में दिखता है । परंतु इस प्रचलित अर्थ प्रणाली के प्रयोग से अमीरी व गरीबी का अंतर बढ़ना, आर्थिक सामर्थ्य का केंद्रीकृत होना, शोषकों के लिए अधिक सुरक्षित शोषण का नया तंत्र दृढ़मूल होना, पर्यावरण की हानि, मनुष्यों के आपसी व्यवहार में संबंधों की जगह व्यापारिक दृष्टि व अमानवीयता बढ़ना, ऐसे दोष भी विश्व में सर्वत्र उजागर हुए हैं । इन दोषों की बाधा हमें न हों तथा अभी अमेरिका ने अपने स्वयं के हित को आधार बनाकर जो आयात शुल्क नीति चलायी उसके चलते, हमको भी कुछ बातों का पुनर्विचार करना पड़ने वाला है । विश्व परस्पर निर्भरता पर जीता है । परंतु स्वयं आत्मनिर्भर होकर, विश्व जीवन की एकता को ध्यान में रखकर हम इस परस्पर निर्भरता को अपनी मजबूरी न बनने देते हुए अपने स्वेच्छा से जिएं, ऐसा हमको बनना पड़ेगा । स्वदेशी तथा स्वावलंबन को कोई पर्याय नहीं है ।

जड़वादी पृथगात्म दृष्टि पर आधारित विकास की संकल्पना को लेकर जो विकास की जड़वादी व उपभोगवादी नीति विश्व भर में प्रचलित है उसके दुष्परिणाम सब ओर उत्तरोत्तर बढ़ती मात्रा में उजागर हो रहे हैं । भारत में भी वर्तमान में उसी नीति के चलते वर्षा का अनियमित व अप्रत्याशित वर्षामान, भूस्खलन, हिमनदियों का सूखना आदि परिणाम गत तीन-चार वर्षो में अधिक तीव्र हो रहे हैं । दक्षिण पश्चिम एशिया का सारा जलस्रोत हिमालय से आता है । उस हिमालय में इन दुर्घटनाओं का होना भारतवर्ष और दक्षिण एशिया के अन्य देशों के लिए खतरे की घंटी माननी चाहिए ।

गत वर्षों में हमारे पड़ोसी देशों में बहुत उथल-पुथल मची है । श्रीलंका में, बांग्लादेश में और हाल ही में नेपाल में जिस प्रकार जन-आक्रोश का हिंसक उद्रेक होकर सत्ता का परिवर्तन हुआ वह हमारे लिए चिंताजनक है । अपने देश में तथा दुनिया में भी भारतवर्ष में इस प्रकार के उपद्रवों को चाहनेवाली शक्तियाँ सक्रीय हैं ।  शासन प्रशासन का समाज से टूटा हुआ सम्बन्ध, चुस्त व लोकाभिमुख प्रशासकीय क्रिया-कलापों का अभाव यह असंतोष के स्वाभाविक व तात्कालिक कारण होते हैं । परन्तु हिंसक उद्रेक में वांच्छित परिवर्तन लाने की शक्ति नहीं होती । प्रजातांत्रिक मार्गों से ही समाज ऐसे आमूलाग्र परिवर्तन ला सकता है । अन्यथा ऐसे हिंसक प्रसंगों में विश्व की वर्चस्ववादी ताकतें अपना खेल खेलने के अवसर ढूँढे, यह संभावना बनती है । यह हमारे पड़ोसी देश सांस्कृतिक दृष्टि से तथा जनता के नित्य संबंधों की दृष्टि से भी भारत से जुड़े हैं । एक तरह से हमारा ही परिवार है । वहाँ पर शांति रहे, स्थिरता रहे, उन्नति हो, सुख और सुविधा की व्यवस्था हो, यह हमारे लिए हमारे हितरक्षण से भी अधिक हमारी स्वाभाविक आत्मीयताजन्य आवश्यकता है ।

विश्व में सर्वत्र ज्ञान-विज्ञान की प्रगति, सुख-सुविधा तकनीकी का मनुष्य जीवन में कई प्रकार की व्यवस्थाओं को आरामदायक बनाने वाला स्वरूप, संचार माध्यमों व आंतरराष्ट्रीय व्यापार के कारण दुनिया के राष्ट्रों में बढ़ी हुई निकटता जैसे परिस्थिति का सुखदायक रूप दिखता है । परन्तु विज्ञान एवं तकनीकी की प्रगति की गति व मनुष्यों की इन से तालमेल बनाने की गति इस में बड़ा अंतर है । इसलिए सामान्य मनुष्यों के जीवन में बहुत सारी समस्याएँ उत्पन्न होती दिखाई दे रही हैं । वैसे ही सर्वत्र चल रहे युद्धों सहित अन्य छोटे बड़े कलह, पर्यावरण के क्षरण के कारण प्रकृति के उग्र प्रकोप, सभी समाजों में तथा परिवारों में आई हुई टूटन, नागरिक जीवन में बढ़ता हुआ अनाचार व अत्याचार ऐसी समस्याएँ भी साथ में चलती हुई दिखाई देती हैं । इन सबके उपाय के प्रयास हुए हैं परंतु वे इन समस्याओं की बढ़त को रोकने में अथवा उनका पूर्ण निदान देने में असफल रहे हैं । मानव मात्र में इसके चलते आई हुई अस्वस्थता, कलह और हिंसा को और बढ़ाते हुए, सभी प्रकार के मांगल्य, संस्कृति, श्रद्धा, परंपरा आदि का संपूर्ण विनाश ही, आगे अपने आप इन समस्याओं को ठीक करेगा, ऐसा विकृत और विपरीत विचार लेकर चलने वाली शक्तियों का संकट भी, सभी देशों में अनुभव में आ रहा है । भारतवर्ष में भी कम-अधिक प्रमाण में इन सब परिस्थितियों को हम अनुभव कर रहे हैं । अब विश्व इन समस्याओं के समाधान के लिए भारत की दृष्टि से निकले चिंतन में से उपाय की अपेक्षा कर रहा है ।

हम सब की आशा और आश्वस्ति बढाने वाली बात यह है कि अपने देश में सर्वत्र तथा विशेषकर नई पीढ़ी में देशभक्ति की भावना अपने संस्कृति के प्रति आस्था व विश्वास का प्रमाण निरंतर बढ़ रहा है । संघ के स्वयंसेवकों सहित समाज में चल रही विविध धार्मिक, सामाजिक संस्थाएं तथा व्यक्ति समाज के अभावग्रस्त वर्गों की नि:स्वार्थ सेवा करने के लिए अधिकाधिक आगे आ रहे है, और इन सब बातों के कारण समाज का स्वयं सक्षम होना और स्वयं की पहल से अपने सामने की समस्याओं का समाधान करना व अभावों की पूर्ति करना बढ़ा है । संघ के स्वयंसेवकों का यह अनुभव है कि संघ और समाज के कार्यों में प्रत्यक्ष सहभागी होने की इच्छा समाज में बढ़ रही है । समाज के बुद्धिजीवियों में भी विश्व में प्रचलित विकास तथा लोकप्रबंधन के प्रतिमान के अतिरिक्त अपने देश के जीवन दृष्टि, प्रकृति तथा आवश्यकता के आधार पर अपना स्वतन्त्र और अलग प्रकार का कोई प्रतिमान कैसा हो सकता है इसकी खोज का चिंतन बढ़ा है ।

भारतीय चिन्तन दृष्टि 

भारत का तथा विश्व का विचार भारतीय दृष्टि के आधार पर करने वाले हमारे सभी आधुनिक मनीषी, स्वामी विवेकानंद से लेकर तो महात्मा गांधीजी, दीनदयालजी उपाध्याय, राम मनोहर लोहिया जी, ऐसे हमारे समाज का नेतृत्व करने वाले सभी महापुरुषों ने, उपरोक्त सभी समस्याओं का परामर्श करते हुए, एक समान दिशा का दिग्दर्शन किया है। आधुनिक विश्व के पास जो जीवन दृष्टि है वह पूर्णतः गलत नहीं, अधूरी है । इसलिए उसके चलते मानव का भौतिक विकास तो कुछ देशों और वर्गों के लिए आगे बढ़ा हुआ दिखता है । सबका नहीं । सबको छोडिये, अकेले भारत को अमेरिका जैसा तथाकथित समृद्ध और प्रगत भौतिक जीवन जीना है तो और पांच पृथ्वियों की आवश्यकता होगी ऐसा कुछ अभ्यासक कहते हैं । आज की इस प्रणाली से भौतिक विकास के साथ-साथ मानव का मानसिक व नैतिक विकास नहीं हुआ । इसलिए प्रगति के साथ-साथ ही मानव व सृष्टि के सामने नयी-नयी समस्याएँ प्राण संकट बन खड़ी हो रही हैं । इसका कारण – वही दृष्टि का अधूरापन !

हमारी सनातन, आध्यात्मिक, समग्र व एकात्म दृष्टि में मनुष्य के भौतिक विकास के साथ-साथ मन, बुद्धि तथा आध्यात्मिकता का विकास, व्यक्ति के साथ-साथ मानव समूह व सृष्टि का विकास, मनुष्य की आवश्यकताओं – इच्छाओं के अनुरूप आर्थिक स्थिति के साथ-साथ ही, उसके समूह और सृष्टि को लेकर कर्तव्य बुद्धि का तथा सब में अपनेपन के साक्षात्कार को अनुभव करने के स्वभाव का विकास करने की शक्ति है । क्योंकि हमारे पास सबको जोड़ने वाले तत्त्व का साक्षात्कार है । उसके आधार पर सहस्त्रों वर्षों तक इस विश्व में हमने एक सुंदर, समृद्ध और शांतिपूर्ण, परस्पर संबंधों को पहचानने वाला, मनुष्य और सृष्टि का सहयोगी जीवन प्रस्थापित किया था । उस हमारी समग्र तथा एकात्म दृष्टि के आधार पर, आज के विश्व की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए, आज विश्व जिन समस्याओं का सामना कर रहा है, उनका शाश्वत निदान देने वाली एक नई रचना की विश्व को आवश्यकता है । अपने उदाहरण से उस रचना का अनुकरणीय प्रतिमान विश्व को देना यह कार्य नियति हम भारतवासियों से चाहती है ।

संघ का चिन्तन 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने कार्य के शतवर्ष पूर्ण कर चुका है । संघ में विचार व संस्कारों को प्राप्त कर समाज जीवन के विभिन्न आयामों में, विविध संगठनों में, संस्थाओं में, तथा स्थानीय स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक स्वयंसेवक सक्रिय हैं ।‌ समाज जीवन में सक्रिय अनेक सज्जनों के साथ भी स्वयंसेवकों का सहयोग व संवाद चलते रहता है । उन सबके संकलित अनुभव के आधार पर संघ के कुछ निरीक्षण व निष्कर्ष बने हैं ।

१) भारत वर्ष के उत्थान की प्रक्रिया गति पकड़ रही है । परन्तु अभी भी हम उसी नीति व व्यवस्था के दायरों में ही सोच रहे हैं जिस का अधूरापन उस नीति के जो परिणाम आज मिल रहे हैं उन से उजागर हो चुका है । यह बात सही है कि उन तरीकों पर विश्व के साथ हम भी इतना आगे पहले ही बढ़ गये हैं कि एकदम परिवर्तन करना संभव नहीं होगा । एक लम्बे वृत्त में धीरे-धीरे ही मुड़ना पड़ेगा । परन्तु हमारे सहित विश्व के सामने खड़ी समस्याओं तथा भविष्य के‌ खतरों से बचने का दूसरा उपाय नहीं है । हमें अपनी समग्र व एकात्म दृष्टि के आधार पर अपना विकास पथ बनाकर, विश्व के सामने एक यशस्वी उदाहरण रखना पड़ेगा । अर्थ व काम के पीछे अंधी होकर भाग रही दुनिया को पूजा व रीति रिवाजों के परे, सबको जोड़ने वाले, सबको साथ में लेकर चलने वाले, सबकी एक साथ उन्नति करने वाले धर्म का मार्ग दिखाना ही होगा ।

२) संपूर्ण देश का ऐसा आदर्श चित्र विश्व के सामने खड़ा करने का काम केवल देश की व्यवस्थाओं का ही नहीं है । क्योंकि व्यवस्थाओं का अपने में परिवर्तन का सामर्थ्य व इच्छा, दोनों मर्यादित होती है । इन सब की प्रेरणा व इन सब का नियंत्रण समाज की प्रबल इच्छा से ही होता है । इसलिए व्यवस्था परिवर्तन के लिए समाज का प्रबोधन तथा उसके आचरण का परिवर्तन यह व्यवस्था परिवर्तन की पूर्वशर्तें हैं । समाज के आचरण में परिवर्तन भाषणों से या ग्रंथों से नहीं आता । समाज का व्यापक प्रबोधन करना पड़ता है तथा प्रबोधन करने वालों को स्वयं परिवर्तन का उदाहरण बनना पड़ता है । स्थान-स्थान पर ऐसे उदाहरण स्वरूप व्यक्ति, जो समाज के लिए उसके अपने हैं, उनके जीवन में पारदर्शिता है, नि:स्वार्थता है और जो संपूर्ण समाज को अपना मानकर समाज के साथ अपना नित्य व्यवहार करते हैं, समाज को उपलब्ध होने चाहिए । समाज में सबके साथ रहकर अपने उदाहरण से समाज को प्रेरणा देने वाला ऐसा स्थानीय सामाजिक नेतृत्व चाहिए । इसलिए व्यक्ति निर्माण से समाज परिवर्तन और समाज परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन यह देश में और विश्व में परिवर्तन लाने का सही पथ है यह स्वयंसेवकों का अनुभव है ।

३) ऐसे व्यक्तियों के निर्माण की व्यवस्था भिन्न-भिन्न समाजों में सक्रिय रहती है । हमारे समाज में आक्रमण की लंबी अवधि में यह व्यवस्थाएँ ध्वस्त हो गईं ।  इसलिए इसकी युगानुकूल व्यवस्था घर में, शिक्षा पद्धति में व समाज के क्रियाकलापों में फिर से स्थापित करनी पड़ेगी । यह कार्य करने वाले व्यक्ति तैयार करने पड़ेंगे । मन बुद्धि से इस विचार को मानने के बाद भी उनको आचरण में लाने के लिए मन, वचन, कर्म, की आदत बदलनी पड़ती है, उसके लिए व्यवस्था चाहिए । संघ की शाखा वह व्यवस्था है । सौ वर्षों से सब प्रकार की परिस्थितियों में आग्रहपूर्वक इस व्यवस्था को संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा सतत चलाया गया है और आगे भी ऐसे ही चलाना है । इसलिए स्वयंसेवकों को नित्य शाखा के कार्यक्रमों को मन लगाकर करते हुए अपनी आदतों में परिवर्तन करने की साधना करनी पड़ती है । व्यक्तिगत सद्गुणों की तथा सामूहिकता की साधना करना तथा समाज के क्रियाकलापों में सहभागी, सहयोगी होते हुए समाज में सद्गुणों का व सामूहिकता का वातावरण निर्माण करने के लिए ही संघ की शाखा है ।

४) किसी भी देश के उत्थान में सबसे महत्वपूर्ण कारक उस देश के समाज की एकता है । हमारा देश विविधताओं का देश है । अनेक भाषाएँ अनेक पंथ, भौगोलिक विविधता के कारण रहन-सहन, खान-पान के अनेक प्रकार, जाति-उपजाति आदि विविधताएँ पहले से ही हैं । पिछले हजार वर्षों में भारतवर्ष की सीमा के बाहर के देशों से भी यहाँ पर कुछ विदेशी संप्रदाय आ गए । अब विदेशी तो चले गए लेकिन उन संप्रदायों को स्वीकार कर आज भी अनेक कारणों से उन्हीं पर चलने वाले हमारे ही बंधु भारत में विद्यमान हैं । भारत की परंपरा में इन सब का स्वागत और स्वीकार्य है । इनको हम अलगता की दृष्टि से नहीं देखते । हमारी विविधताओं को हम अपनी अपनी विशिष्टताएँ मानते हैं और अपनी-अपनी विशिष्टता पर गौरव करने का स्वभाव भी समझते हैं । परंतु यह विशिष्टताएँ भेद का कारण नहीं बननी चाहिए । अपनी सब विशिष्टताओं के बावजूद हम सब एक बडे समाज के अंग‌ हैं । समाज, देश, संस्कृति तथा राष्ट्र के नाते हम एक हैं । यह हमारी बड़ी पहचान हमारे लिए सर्वोपरि है यह हमको सदैव ध्यान में रखना चाहिए । उसके चलते समाज में सबका आपस का व्यवहार सद्भावनापूर्ण व संयमपूर्ण रहना चाहिए । सब की अपनी-अपनी श्रद्धाएँ, महापुरुष तथा पूजा के स्थान होते हैं । मन, वचन, कर्म से आपस में इनकी अवमानना न हो इसका ध्यान रखना चाहिए । इसलिए प्रबोधन करने की आवश्यकता है । नियम पालन, व्यवस्था पालन करना व सद्भावपूर्वक व्यवहार करना यह इसीलिए अपना स्वभाव बनना चाहिये । छोटी-बड़ी बातों पर या केवल मन में संदेह है इसलिए, कानून हाथ में लेकर रास्तोंपर निकल आना, गुंडागर्दी, हिंसा करना यह प्रवृत्ति ठीक नहीं । मन में प्रतिक्रिया रखकर अथवा किसी समुदाय विशेष को उकसाने के लिए अपना शक्ति प्रदर्शन करना ऐसी घटनाओं को योजनापूर्वक कराया जाता है । उनके चंगुल में फ़सने का परिणाम, तात्कालिक और दीर्घकालिक, दोनों दृष्टी से ठीक नहीं है । इन प्रवृत्तियों की रोकथाम आवश्यक है । शासन-प्रशासन अपना काम बिना पक्षपात के तथा बिना किसी दबाव में आये, नियम के अनुसार करें । परन्तु समाज की सज्जन शक्ति व तरुण पीढ़ी को भी सजग व संगठित होना पडेगा, आवश्यकतानुसार हस्तक्षेप भी करना पडेगा ।

५) हमारी इस एकता के आधार को डॉक्टर अंबेडकर साहब ने Inherent cultural unity (अन्तर्निहित सांस्कृतिक एकता) कहा है । भारतीय संस्कृति प्राचीन समय से चलती आई हुई भारत की विशेषता है । वह सर्व समावेशक है । सभी विविधताओं का सम्मान और स्वीकार करने की सीख देती है क्योंकि वह भारत के आध्यात्मिक सत्य तथा करुणा, शुचिता व तप के सदाचार पर यानी धर्म पर आधारित है । इस देश के पुत्र रूप हिंदू समाज ने इसे परंपरा से अपने आचरण में जतन किया है, इसलिए उसे हिंदू संस्कृति भी कहते हैं । प्राचीन भारत में ऋषियों ने अपने तपोबल से इस को नि:सृत किया । भारत के समृद्ध तथा सुरक्षित परिवेश के कारण उनसे यह कार्य हो पाया । हमारे पूर्वजों के परिश्रम, त्याग व बलिदानों के कारण  यह संस्कृति फली-फूली व  अक्षुण्ण रहकर आज हम तक पहुँची है । उस हमारी संस्कृति का आचरण, उसका आदर्श बनें हमारे पूर्वजों का मन में गौरव व कृति में विवेकपूर्ण अनुसरण तथा यह सब जिसके कारण संभव हुआ उस हमारे पवित्र मातृभूमि की भक्ति यह मिलकर हमारी राष्ट्रीयता हैं । विविधताओं के संपूर्ण स्वीकार व सम्मान के साथ हम सब को एक माल में  मिलानेवाली यह हिन्दू राष्ट्रीयता ही हमें सदैव एक रखती आयी है । हमारी ‘Nation State’ जैसी कल्पना नहीं है । राज्य आते हैं और जाते हैं, राष्ट्र निरन्तर विद्यमान है । हम सब की एकता का यह आधार हमें कभी भी भूलना नहीं चाहिए ।

६) संपूर्ण हिंदू समाज का बल संपन्न, शील संपन्न संगठित स्वरूप इस देश के एकता, एकात्मता, विकास व सुरक्षा की गारंटी है। हिंदू समाज इस देश के लिए उत्तरदायी समाज है, हिंदू समाज सर्व-समावेशी है । ऊपर के अनेकविध नाम और रूपों को देखकर, अपने को अलग मानकर, मनुष्यों में बटवारा व अलगाव खडा करने वाली ‘हम और वे’ इस मानसिकता से मुक्त है और मुक्त रहेगा । ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की उदार विचारधारा का पुरस्कर्ता व संरक्षक हिंदू समाज है । इसलिए भारतवर्ष को वैभव संपन्न व संपूर्ण विश्व में अपना अपेक्षित व उचित योगदान देने वाला देश बनाना, यह हिंदू समाज का कर्तव्य बनता है । उसकी संगठित कार्य शक्ति के द्वारा, विश्व को नयी राह दे सकने वाले धर्म का संरक्षण करते हुए, भारत को वैभव संपन्न बनाना, यह संकल्प लेकर संघ सम्पूर्ण हिंदू समाज के संगठन का कार्य कर रहा है । संगठित समाज अपने सब कर्तव्य स्वयं के बलबूते पूरे कर लेता है । उसके लिए अलग से अन्य किसी को कुछ करने की आवश्यकता नहीं रहती ।

७) उपरोक्त समाज का चित्र प्रत्यक्ष साकार होना है तो व्यक्तिओं में, समूहों में व्यक्तिगत तथा ‌राष्ट्रीय चारित्र्य, दोनों के सुदृढ़ होने की आवश्यकता रहेगी । अपने राष्ट्र स्वरूप की स्पष्ट‌ कल्पना व गौरव संघ की शाखा में प्राप्त होता है । नित्य शाखा में चलने वाले कार्यक्रमों से स्वयंसेवकों में व्यक्तित्व, कर्तृत्व, नेतृत्व, भक्ति व समझदारी का विकास होता है ।

इसलिए शताब्दि वर्ष में व्यक्ति निर्माण का कार्य देश में भौगोलिक दृष्टि से सर्वव्यापी हो तथा सामाजिक आचरण‌ में सहज परिवर्तन लाने वाला पंच परिवर्तन कार्यक्रम स्वयंसेवकों के उदाहरण से समाजव्यापी बने यह संघ का प्रयास रहेगा । सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व बोध तथा स्वदेशी व नियम, कानून, नागरिक अनुशासन व संविधान का पालन इन पांच विषयों में व्यक्ति व परिवार, कृतिरूप से स्वयं के आचरण में परिवर्तन लाने में सक्रिय हो तथा समाज में उनके उदाहरणों का अनुकरण हो ऐसा यह कार्यक्रम है । इसमें अंतर्भूत कृतियाँ आचरण के लिए सरल और सहज है । गत दो-तीन वर्षों में समय-समय पर संघ के कार्यक्रमों में इसका विस्तृत विवेचन हुआ है । संघ के स्वयंसेवकों के अतिरिक्त समाज में अनेक अन्य संगठन व व्यक्ति भी इन्ही प्रकार के कार्यक्रम चला रहे है । उन सब के साथ संघ के स्वयंसेवकों का सहयोग व समन्वय साधा जा रहा है।

विश्व के इतिहास में समय-समय पर भारत का महत्वपूर्ण अवदान, विश्व का खोया हुआ संतुलन वापस लाने वाला, विश्व के जीवन में संयम और मर्यादा का भान उत्पन्न करने वाला विश्व धर्म देना, यही रहा है । हमारे प्राचीन पूर्वजों ने भारत भूमि में निवास करने वाले विविधतापूर्ण समाज को संगठित कर एक राष्ट्र के रूप में इसी कर्तव्य के बारंबार आपूर्ति करने के साधन के नाते खड़ा किया था । हमारे स्वातंत्र्य संग्राम के तथा राष्ट्रीय नवोत्थान के पुरोधाओं के सामने स्वतन्त्र भारत की समृद्धि व क्षमताओं के विकास के मंगल परिणाम का यही चित्र था।

हमारे बंगाल प्रांत के पूर्ववर्ती संघचालक स्व. केशवचन्द्र चक्रवर्ती महाशय ने बहुत सुन्दर काव्य पंक्तियों में इसका वर्णन किया है –

बाली सिंघल जबद्वीपे

प्रांतर माझे उठे ।

कोतो मठ कोतो मन्दिर

कोतो प्रस्तरे फूल फोटे ।।

तादेर मुखेर मधुमय बानी

सुने थेमें जाय सब हानाहानी ।

अभ्युदयेर सभ्यता जागे

विश्वेर घरे-घरे ।।

(सिंहल और जावा-द्वीप तक भारतीय संस्कृति का प्रभाव फैला हुआ था । जगह-जगह मठ-मंदिर थे, जहाँ जीवन की सुगंध फूलों-सी बिखरती थी । भारत की मधुर और ज्ञानमयी वाणी सुनकर अन्य देशों में भी वैर-भाव और अशांति समाप्त हो जाती थी)

आइए, भारत का यही आत्मस्वरूप आज की देश-काल-परिस्थिति से सुसंगत शैली में फिरसे विश्व में खडा करना है ।  पूर्वज प्रदत्त इस कर्तव्य को, विश्व की आज की आवश्यकता को, पूर्ण करने के लिए हम सब मिलकर, साथ चलकर, अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर होने के लिए आज की विजयादशमी के मुहूर्त पर सीमोल्लंघन को संपन्न करें ।

|| भारत माता की जय ||

मंत्रिपरिषद के निर्णय : दिनांक – 09 सितम्बर 2025

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में आज यहां मंत्रालय महानदी भवन में आयोजित कैबिनेट की बैठक में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए –

1)    मंत्रिपरिषद ने सुकमा जिले में नक्सल विरोधी अभियान के दौरान 09 जून 2025 को बम विस्फोट की घटना में शहीद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक आकाश राव गिरेपूंजे की शहादत और अदम्य वीरता को सम्मानित करते हुए उनकी पत्नी श्रीमती स्नेहा गिरेपूंजे को विशेष प्रकरण मानते हुए राज्य पुलिस सेवा में उप पुलिस अधीक्षक के पद पर अनुकंपा नियुक्ति देने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है।

2)    मंत्रिपरिषद की बैठक में पारंपरिक ऊर्जा स्त्रोत की निर्भरता को कम करने तथा गैर पारंपरिक स्त्रोत आधारित ऊर्जा उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य की सौर ऊर्जा नीति में आवश्यक संशोधन के प्रस्ताव का अनुमोदन किया गया। 

    नीति की अवधि – नई व्यवस्था के अनुसार यह संशोधित नीति अब 2030 तक लागू रहेगी, या फिर जब तक राज्य सरकार नई सौर ऊर्जा नीति जारी नहीं करती।
    उद्योगों को मिलने वाले लाभ – सौर ऊर्जा परियोजनाओं को अब राज्य की औद्योगिक नीति के तहत प्राथमिकता उद्योग का दर्जा मिलेगा। 
    इसके तहत निवेशकों को कई तरह की रियायतें और प्रोत्साहन मिलेंगे, जैसे ब्याज अनुदान, पूंजी लागत पर अनुदान (सूक्ष्म उद्योगों को), जीएसटी प्रतिपूर्ति (लघु, मध्यम और बड़े उद्योगों को), बिजली शुल्क में छूट, स्टाम्प शुल्क में छूट, परियोजना रिपोर्ट तैयार करने पर अनुदान, भूमि उपयोग बदलने की फीस में छूट, भूमि बैंक से जमीन लेने पर शुल्क में रियायत मिलेगी, अनुसूचित जाति/जनजाति, दिव्यांग, वरिष्ठ नागरिक और तृतीय लिंग समुदाय के उद्यमियों को जमीन के प्रीमियम में छूट, दिव्यांगों को रोजगार देने पर अनुदान, मेगा और अल्ट्रा मेगा प्रोजेक्ट्स के लिए विशेष पैकेज का प्रावधान किया गया है। 

3)    मंत्रिपरिषद की बैठक में महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए सुश्री रीता शांडिल्य, जो वर्तमान में लोक सेवा आयोग की सदस्य एवं कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं, को लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्त करने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया गया है।

4)    मंत्रिपरिषद की बैठक में छत्तीसगढ़ वरिष्ठ मीडिया कर्मी सम्मान निधि के तहत सेवानिवृत्त हो चुके मीडिया कर्मियों को दी जाने वाली सम्मान राशि 10 हजार रूपए प्रतिमाह से बढ़ाकर 20 हजार रूपए प्रतिमाह करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। इसकी घोषणा वर्ष 2025-26 के बजट में की गई थी। 

रायपुर : युद्ध तथा सैनिक कार्यवाही में शहीद सैनिकों के आश्रितों को मिलेगी 50 लाख की अनुग्रह राशि

परमवीर चक्र प्राप्त वीर जवानों को मिलेगी 1 करोड़ की अनुग्रह राशि

युद्ध तथा सैनिक कार्यवाही में शहीद  सैनिकों की पत्नी अथवा उनके आश्रितों को दी जाने वाली अनुग्रह राशि में वृद्धि करते हुए इसे 20 लाख से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया गया है। इसके साथ ही युद्ध तथा सैनिक कार्यवाही में विभिन्न वीरता अलंकरण प्राप्त जवानों को दी जाने वाली राशि में भी वृद्धि की गई है। अब परमवीर चक्र प्राप्त वीर जवानों को 40 लाख रुपये की जगह 1 करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि प्रदान की जाएगी। यह महत्वपूर्ण निर्णय आज मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में सम्पन्न राज्य सैनिक बोर्ड की बैठक में लिया गया।

आज मंत्रालय महानदी भवन में मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में सैनिक कल्याण विभाग की 6वीं राज्य सैनिक समिति की बैठक सम्पन्न हुई। इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि हमारे सैनिक देश की सुरक्षा के लिए अपना जीवन न्यौछावर करते हैं। हम उनके शौर्य और बलिदान को नमन करते हैं। सरकार भूतपूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के कल्याण के लिए सदैव प्रतिबद्ध है। बैठक में शहीदों की वीर नारियों, भूतपूर्व सैनिकों, विधवाओं एवं उनके आश्रितों के लिए राज्य द्वारा संचालित कई कल्याणकारी योजनाओं पर चर्चा की गई।

मुख्यमंत्री श्री साय ने समिति की छठवीं बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि 140 करोड़ देशवासियों की सुरक्षा में हमारे वीर जवान दिन-रात तत्पर रहते हैं। भारत माँ की सेवा में अपना जीवन अर्पित करने वाले इन वीर सपूतों का कल्याण करना सबका दायित्व और कर्तव्य है। आज की बैठक में भूतपूर्व सैनिकों, विधवाओं और उनके परिजनों के हित में सार्थक चर्चा हुई है। बैठक में लिए गए निर्णयों का लाभ भूतपूर्व सैनिकों और उनके परिवारों तक सीधे पहुंचेगा। भूतपूर्व सैनिकों की बेहतरी के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी सदस्यों द्वारा दिए गए हैं, जिन पर सकारात्मक रूप से विचार कर उचित निर्णय लिया जाएगा।

बैठक के दौरान भूतपूर्व सैनिकों, विधवाओं एवं उनके आश्रितों के हित में कई महत्वपूर्ण एजेंडा बिंदुओं पर निर्णय लिये गए। इनमें युद्ध तथा सैनिक कार्यवाही में शहीद (बैटल कैजुअल्टी) सैनिकों की पत्नी अथवा आश्रितों को अनुग्रह राशि 20 लाख से बढ़ाकर 50 लाख करना, विभिन्न शौर्य अलंकरण प्राप्त सैनिकों को दी जाने वाली राशि में वृद्धि करना शामिल है। अब परमवीर चक्र प्राप्तकर्ता सैनिक को 40 लाख की जगह 1 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। इसी प्रकार सैनिकों के माता-पिता को दी जाने वाली जंगी इनाम राशि 5 हजार रुपये प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 20 हजार रुपये कर दी गई है। युद्ध तथा सैनिक कार्यवाही में दिव्यांग हुए सैनिकों की अनुदान राशि 10 लाख से बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दी गई है। साथ ही सेवारत सैनिकों, भूतपूर्व सैनिकों एवं विधवाओं को प्रथम भूमि/गृह क्रय करने पर 25 लाख रुपये तक के स्टाम्प शुल्क में छूट देने का निर्णय लिया गया।
 
इस अवसर पर मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ शासन श्री अमिताभ जैन ने मुख्यमंत्री को बालवृक्ष भेंट किया। तत्पश्चात् सैनिक कल्याण संचालनालय छत्तीसगढ़ के संचालक एवं राज्य सैनिक समिति के सचिव ब्रिगेडियर विवेक शर्मा, विशिष्ट सेवा मेडल (से.नि) ने राज्य सैनिक बोर्ड, छत्तीसगढ़ की गतिविधियों की संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत की। उन्होंने 13 जनवरी 2012 को आयोजित पाँचवीं राज्य सैनिक बोर्ड की बैठक की कार्यवाही विवरण पर प्रगति रिपोर्ट दी और 6वीं बैठक में सम्मिलित एजेंडा बिंदुओं पर चर्चा प्रारम्भ की।

बैठक में उपमुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा, सांसद रायपुर श्री बृजमोहन अग्रवाल, मध्य भारत क्षेत्र के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल पदम सिंह शेखावत (पीवीएसएम, एवीएसएम, एसएम), अपर मुख्य सचिव गृह विभाग श्री मनोज पिंगुआ, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री सुबोध कुमार सिंह, मुख्यमंत्री के सचिव श्री राहुल भगत, केंद्रीय सैनिक बोर्ड नई दिल्ली के सचिव ब्रिगेडियर डी.एस. बसेरा (विशिष्ट सेवा मेडल), कमांडर छत्तीसगढ़ एवं ओडिशा सब एरिया ब्रिगेडियर तेजिंदर सिंह बावा (सेना मेडल), सचिव वित्त विभाग श्री अंकित आनंद, सचिव सामान्य प्रशासन विभाग श्री अविनाश चंपावत, मेजर जनरल संजय शर्मा (से.नि), विंग कमांडर ए. श्रीनिवास राव (से.नि), श्री विक्रांत सिंह एवं श्री राजेश कुमार पाण्डेय राज्य सैनिक समिति छत्तीसगढ़ के सदस्यगण उपस्थित थे।

रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की आत्मीयता ने छुआ श्रमिक परिवार का दिल, बेटी प्रतिज्ञा ने थामा सपनों का रास्ता

अटल उत्कृष्ट शिक्षा योजना से प्रतिज्ञा का फौज में जाने का सपना होगा पूरा

एक माँ की आँखों में उमड़ी खुशी, चेहरे पर झलकता गर्व और शब्दों में छलकता भावातिरेक इस बात का प्रमाण है कि सरकार की दिशा सही है और योजनाएँ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुँच रही हैं। रायपुर की नंदिनी यादव, जो रोज़ी-मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करती हैं, आज अपनी बेटी प्रतिज्ञा को छत्तीसगढ़ पब्लिक स्कूल, टाटीबंध में प्रवेश दिलाकर गदगद हैं। यह संभव हुआ है मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की पहल पर शुरू की गई अटल उत्कृष्ट शिक्षा योजना से।

नंदिनी यादव बताती हैं कि वह हमेशा चाहती थीं कि उनके बच्चे भी इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ें, लेकिन सीमित आर्थिक स्थिति के कारण यह सपना पूरा नहीं हो पा रहा था। घर के अन्य बच्चों को देख वह कई बार सोचती थीं कि उनकी बिटिया भी अच्छे स्कूल में पढ़े। जब प्रतिज्ञा का चयन अटल उत्कृष्ट शिक्षा योजना में हुआ तो उनकी आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उन्होंने कहा मेरे लिए यह क्षण अविस्मरणीय है। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा तोहफा है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय से मुलाकात के दौरान नंदिनी यादव ने अपने मन की भावनाएँ साझा कीं। उन्होंने कहा कि अब बेटी का भविष्य संवर जाएगा। मुख्यमंत्री श्री साय ने भी नंदिनी यादव को बधाई और शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि यह योजना श्रमिक परिवारों के बच्चों को बेहतर शिक्षा और जीवन की नई दिशा देने का माध्यम बनेगी।

नंदिनी ने बताया कि बेटी प्रतिज्ञा का सपना बड़ा है। वह हमेशा से कहती आई है कि उसे फौज में जाना है और देश की सेवा करनी है।  बिटिया का यह सपना अब हकीकत बनने की राह पर है। इंग्लिश मीडियम में पढ़ाई और बेहतर संसाधनों की उपलब्धता से वह अपने लक्ष्य तक पहुँच सकेगी।  मुख्यमंत्री श्री साय ने बच्ची की इस सोच की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे सपनों से ही देश की नींव मजबूत होती है।

नंदिनी यादव ने अपनी खुशी साझा करते हुए बताया कि केवल बच्ची की शिक्षा की व्यवस्था ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री आवास योजना से उन्हें पक्का मकान मिला है, उज्ज्वल योजना से रसोई गैस कनेक्शन मिला और उनकी सासू माँ को शासन से सिलाई मशीन भी प्राप्त हुई है। इन योजनाओं ने उनके परिवार की जिंदगी बदल दी है। उन्होंने कहा सरकार की योजनाएँ मेरे परिवार के लिए संबल बन गई हैं, यही तो सच्चा अंत्योदय है।

उन्होंने आगे कहा कि मुख्यमंत्री जी के कारण आज मेरी बच्ची को बेहतर शिक्षा मिल रही है। मैं मुख्यमंत्री जी के पास अपनी भावनाएँ व्यक्त करने आई हूँ। यह खुशी शब्दों में बयान करना मुश्किल है। माँ की भावुकता देखकर उपस्थित लोग भी प्रभावित हुए। मुख्यमंत्री ने उन्हें आश्वस्त किया कि बेटी की पढ़ाई पूरी जिम्मेदारी से होगी और परिवार को लगातार सहयोग मिलता रहेगा।

उल्लखेनीय है कि अटल उत्कृष्ट शिक्षा योजना के तहत छठी से बारहवीं तक पढ़ाई का पूरा दायित्व सरकार उठाती है। नंदिनी यादव अब निश्चिंत हैं कि उनकी बच्ची का भविष्य सुरक्षित है। महतारी वंदन योजना से मिलने वाले सहयोग ने उनके परिवार को आर्थिक संबल दिया है। यह कहानी केवल एक माँ-बेटी की नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के उन हजारों परिवारों की है जिनके सपने सरकार की योजनाओं से साकार हो रहे हैं।

बुनकर प्रकोष्ट के राष्ट्रीय अधिवेशन का समापन, 13 प्रस्ताव पारित।

सहकार भारती के तत्वाधान में बुनकर प्रकोष्ठ का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का समापन,
समापन सत्र में राज्यपाल रामेन डेका और कृषि मंत्री रामविचार नेताम हुए शामिल,
अधिवेशन में 14 प्रस्ताव पारित हुए,
अधिवेशन में 17 राज्यों के 650 बुनकर प्रतिनिधि शामिल हुए।

रायपुर 24 अगस्त 202. सहकार भारती के तत्वाधान में राजधानी में चल रहे बुनकर प्रकोष्ठ का राष्ट्रिय अधिवेशन भव्यता के साथ सम्प्पन हुआ। अधिवेशन में देशभर से आये बुनकर प्रतिनिधियों ने अपनी समस्याओ और सरकारी योजनाओ को लेकर चर्चा किया। अधिवेशन का उद्देश्य हथकरघा और हस्तशिल्प में बढ़ते मशीनो के उपयोग, घटते बुनकरो की संख्या, सरकारी अनुदान में कमी सहित अनेक विषयो पर चर्चाये हुई। अधिवेशन में केरल, महाराष्ट्र, बिहार मध्यप्रदेश, आसाम, पक्षिम बंगाल, सहित कुल 17 राज्यों के प्रतिधि शामिल हुए। अधिवेशन के दूसरे दिन बुनकरों ने 13 मांगो का प्रस्ताव पारित किया जिसे भारत सरकार को भेजा जायेगा। प्रस्ताव को बुनकर प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक अनंत मिश्रा ने रखा जिसे देशभर से आये बुनकर प्रतिनिधियों ने दोनों हाथ उठाकर समर्थन दिया।

नक्सलगढ़ की छवि अब सुधरेगी-
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए वरिष्ठ मंत्री रामविचार नेताम ने छत्तीसगढ़ शांति का टापू है, यह बाबा गुरुघासीदास, बिरसामुंडा की धरती है। साल 2000 में छत्तीसगढ़ का उदय हुआ तो प्रदेश की बीजेपी सरकार ने इसे विकसित राज्य बनाने की कोशिश की, जिसका परिणाम है समकालीन राज्यों में छत्तीसगढ़ तेजी से विकसित हो रहा है। छत्तीसगढ़ को दूर से देखने वाले नक्सलगढ़ समझते है, पर यह शांति का टापू है। जल्द ही नक्सल समस्या का संधान भी हो जायेगा।
छत्तीसगढ़ में बुनकरों की स्थिति बेहद अच्छी नहीं है, आजा भी हमारे द्वारा उपयोग किये जाने वाला राजकीय गमछा मशीनों से बना होता है, जबकि उसे हथकरघा से बना होना चाहिए। हमें अच्छी क्वालिटी के उत्पाद तैयार करने जरूरत है।

राज्यपाल बोले- मै स्वयं बुनकरों के गाँव से आता हूँ।
समापन सत्र में राज्यपाल डॉ रमेन डेका ने आयोजन के लिए सहकर भारती और बुनकर प्रकोष्ट को बधाई देते हुए कहा कि ऐसा आयोजन निश्चित रूप से बुनकरों के जीवन में आमूल चूल परिवर्तन लाने वाला है। मेरे गाँव में बुनकरों की संख्या अधिक है, जिसके चलते उसे बुनकरों का गाँव कहा जाता है। भारत एक बड़े बाजार में रूप में उभरा है ऐसे में यहाँ बुनकर समितियों और पावरलूम में व्यापक संभावनाएं है। छत्तीसग़ढ का कोसा देशभर में प्रसिद्ध है उसे और बढ़ाने की जरुरत है, उन्होंने अमूल और लिज्जत पापड़ का उदारः देते हुए उनके जैसे काम करने की नसीहत दी। आसाम से आये बुनकर प्रतिनिधियों का राजभवन में अतिथि सत्कार किया गया।

बुनकरों के हित में 13 प्रस्ताव पारित हुए
दो दिवसीय अधिवेशन में देशभर से आये बुनकरों से चर्चा और मंथन उपरांत उनकी समस्याओ के निराकरण हेतु 13 प्रस्ताव पारित हुए जिसे भारत सरकार को भेजा जायेगा। सहकर भारती के राष्ट्रीय महामंत्री दीपक पाचपोर ने प्रस्तावों के संबंध में बताया कि बुनकरों के कल्याण हेतु राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र बुनकर कल्याण बोर्ड का गठन किया जाये जहां सरकारी योजनाओ की निगरानी और शिकायतों का समाधान हो। हथकरघा क्लस्टर और कॉमन फसलेटी सेंटर का गठन, हथकरघा वस्त्रो के निर्माण में लगने वाले जीएसटी को माफ़ करते हुए जीएसटी मुक्त किया जाये। राष्ट्रीय हथकरघा निति बनाने की मांग, बुनकरों के लिए पर्यटन सहित 13 प्रस्ताव पारित किया गया।

राष्ट्रीय बुनकर प्रकोष्ठ का पुनर्गठन-
सहकर भारती के राष्टीय अध्यक्ष उदय जोशी ने राष्ट्रीय बुनकर प्रकोष्ठ का पुनर्गठन किया, जिसमे अनंत मिश्रा को संयोजक बनाते हुए आसाम गुजरात महाराष्ट्र, उड़ीसा छत्तीसगढ़ के बुनकरों को सदस्य बनाने की घोषणा की।
कार्यक्रम में सहकर भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय जोशी, राष्ट्रीय महामंत्री दीपक चौरसिया, संगठन मंत्री श्री पाचपोर, राष्ट्रीय संयोजक अनंत मिश्रा, आरबीआई के निदेशक सतीश मराठे, छत्तीसगढ़ सहकर भारती महामंत्री कनीराम जी, कार्यक्रम संयोजक सुरेंद्र पाटनी सहित कार्यक्रम से जुड़े सभी कार्यकर्ता मौजूद रहे।

अन्तर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में शामिल हुए मंत्री श्री केदार कश्यप

प्रेम को प्रकृति के साथ जोड़ता है एक पेड़ माँ के नाम अभियान: मंत्री श्री कश्यप

गौपालक किसानों व मत्स्य सहकारी किसानों को रुपे केसीसी कार्ड एवं डेयरी सोसायटियों को माइक्रो एटीएम वितरित किया

सहकारिता एवं जल संसाधन मंत्री श्री केदार कश्यप शनिवार को अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस पर आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी में शामिल हुए। संगोष्ठी नवा रायपुर, अटल नगर में स्थित छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी बैंक (अपेक्स बैंक) परिसर में आयोजित की गई। उन्होंने इस अवसर पर एक पेड़  माँ के नाम अभियान के तहत परिसर में पौधरोपण किया। मंत्री श्री कश्यप ने इस मौके पर गौपालक तथा मत्स्य पालक किसानों को रुपे केसीसी कार्ड और दुग्ध सहकारी समितियो को माइक्रो एटीएम वितरित किया। 

    मंत्री श्री कश्यप ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि ‘एक पेड़ माँ के नाम‘ अभियान पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है और माँ के प्रति हमारी श्रद्धा। उन्होंने कहा कि यह अभियान प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अनूठा तरीका भी है। माँ और प्रकृति दोनों ही जीवनदायिनी हैं, पोषण करती हैं, और बिना किसी स्वार्थ के अपनापन देती हैं ।

    मंत्री श्री कश्यप ने कहा कि माँ के नाम पर एक पेड़ लगाना माँ के प्रेम को प्रकृति के साथ जोड़ता है। यह एक जीवंत श्रद्धांजलि है, जो न केवल माँ के प्रति हमारी भावनाओं को व्यक्त करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक उपहार है। उन्होंने कहा कि यह अभियान, ‘सहकारिता‘ के साथ, भारत में सामाजिक और पर्यावरणीय उत्थान के लिए महत्वपूर्ण पहल है। ये सामूहिक भागीदारी और सामूहिक जिम्मेदारी पर आधारित हैं, और इनकी मूल भावना सहयोग, संरक्षण और समाज में योगदान देने की है। ‘एक पेड़ माँ के नाम‘ पहल की शुरुआत प्रधानमंत्री द्वारा 5 जून 2024 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर की गई थी। इसका उद्देश्य माताओं की स्मृति में पेड़ लगाने को प्रोत्साहित करना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। यह अभियान प्रकृति और मातृत्व के बीच समानता को रेखांकित करता है , क्योंकि दोनों ही जीवन का पोषण करते हैं ।

    अपेक्स बैंक के प्राधिकृत अधिकारी श्री केदार नाथ गुप्ता ने कहा कि इस अभियान का संदेश है – ‘माँ के लिए एक पेड़, धरती के लिए एक कदम‘ इस संदेश के साथ सभी सहकारी समितियों को इस नेक कार्य में हिस्सा लेने और अपनी माँ के प्रेम को प्रकृति के साथ जोड़ने का आह्वान किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि केंद्र व राज्य सरकार की मंशा है कि पैक्स सोसायटियो को मजबूत किया जाए।

    अपर मुख्य सचिव, सहकारिता, छत्तीसगढ़ शासन श्री सुब्रत साहू ने राज्य स्तरीय सहकारी संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान में ‘सहकार से संमृद्धि‘ अंतर्गत अनेक कार्यक्रम व नवाचार सहकारिता के माध्यम से किये जा रहे हैं, जिसमे सहकारिता क्षेत्र की इकाई-समितियो को बहुउद्देशीय बनाना व इस आंदोलन को और विस्तारित करना है। सहकारिता की महत्ता को ध्यान में रखते हुए 2021 में केंद्र सरकार द्वारा पृथक से सहकारिता मंत्रालय का गठन किया गया, जो इस आंदोलन के प्रति सरकार के सकारात्मक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है। 

    संगोष्ठी में छत्तीसगढ़ सहकारिता प्रकोष्ठ के अध्यक्ष श्री शशिकांत द्विवेदी, सहकारिता विभाग के सचिव डॉ. सी आर प्रसन्ना, आयुक्त सहकारिता श्री कुलदीप शर्मा, एमडी अपेक्स बैंक श्री के एन कांडे, अपर आयुक्त श्री एच के दोषी सहित जिला सहकारी बैंको, मार्कफेड, लघुवनोपज तथा एनसीडीसी तथा बड़ी संख्या में अपेक्स बैंक, जिला सहकारी बैंकों, जिला सहकारी संघ के अधिकारी गण मौजूद थे।

धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान बनी जनजातीय सशक्तिकरण की मिसाल

2340 नागरिकों को मिला आधार समाधान

आदिवासी अंचलों में डिजिटल क्रांति, आधार संचालक श्री लखन लाल साहू को मिला आधार एक्सीलेंस अवॉर्ड

रायपुर : धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान बनी जनजातीय सशक्तिकरण की मिसाल

2340 नागरिकों को मिला आधार समाधान
आदिवासी अंचलों में डिजिटल क्रांति, आधार संचालक श्री लखन लाल साहू को मिला आधार एक्सीलेंस अवॉर्ड
 रायपुर 01 जुलाई 2025

मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले में धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान जनजातीय समुदाय के जीवन में आशा की नई किरण बनकर उभरी है। इस योजना के अंतर्गत लगाए जा रहे शिविरों के माध्यम से दूरस्थ अंचलों तक आधार से संबंधित सेवाएं पहुँचाई जा रही हैं, जिससे हजारों नागरिकों को घर के पास ही राहत मिल रही है।
         अब तक जिले में आयोजित शिविरों के माध्यम से 2340 से अधिक जनजातीय नागरिकों को आधार कार्ड बनाया, अद्यतन एवं समस्याओं का समाधान सफलतापूर्वक किया जा चुका है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धरती आबा योजना केवल एक सरकारी पहल नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के लिए एक डिजिटल सशक्तिकरण अभियान बन गई है।
         जिले के आधार सेवा संचालक श्री लखन लाल साहू को जिला अंतर्गत राज्य में Best performing Operator in Aadhaar Enrolment &Update services in LWE Districts of Chhattisgarh State यह पुरस्कार  UIDAI REGIONAL OFFICE HYDERABAD द्वारा 20 जून 2025 को रायपुर में आयोजित सम्मान समारोह में प्रदान किया गया।   
           
          धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान अंतर्गत नागरिकों को डिजिटल सेवा आधार, आय, जाति, निवास, बिजली की बिल भुगतान, गैस रिफिलिंग, ट्रेन टिकट, बैंकिग, किसानों का फसल बीमा, किसान पंजीयन, वोटर आईडी कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पेन कार्ड, आदि सेवाएं जनजातीय समुदाय के नागरिकों को धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान शिविर में ग्राम स्तर पर ही मुहैया हो रहा है।
         धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान आज ग्राम विकास, जन सुविधा और डिजिटल समावेश का प्रतीक बन चुकी है। यह पहल न केवल आधार जैसी महत्वपूर्ण सेवा को सुलभ बना रही है, बल्कि जनजातीय अंचलों को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो रही है।

लोकतंत्र को जीवित रखने एवं सशक्त करने के लिए जन-जागरूकता और सक्रिय भागीदारी अनिवार्य – मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय

 मुख्यमंत्री संविधान हत्या दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में हुए शामिल: आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित प्रदर्शनी का किया अवलोकन

रायपुर, 25 जून 2025

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज राजधानी रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित संविधान हत्या दिवस कार्यक्रम में शामिल हुए।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि यह अत्यंत आवश्यक है कि लोकतंत्र की हत्या के उस काले दिन को हमारी भावी पीढ़ी भी जाने, समझे और उससे सीख ले। आपातकाल के दौर को याद करते हुए भावुक हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वह कालखंड मेरे जीवन से गहराई से जुड़ा है। यह मेरे लिए मात्र एक घटना नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत पीड़ा है।

मुख्यमंत्री ने बताया कि उनके बड़े पिताजी स्वर्गीय श्री नरहरि प्रसाद साय आपातकाल के दौरान 19 माह तक जेल में रहे। उस समय लोकतंत्र सेनानियों के घरों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी—कई बार घर में चूल्हा तक नहीं जलता था। ऐसे अनेक परिवारों को मैंने स्वयं देखा है। उन्होंने कहा कि निरंकुश सत्ता ने उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दिया था, नागरिक अधिकार छीन लिए गए थे। वास्तव में, वह लोकतंत्र का काला दिन था, जिसका दंश हमारे परिवार ने झेला है और जिसे मैंने स्वयं जिया है। 

मुख्यमंत्री श्री साय ने कार्यक्रम के दौरान लोकतंत्र सेनानी परिवारों के सदस्यों से भेंट कर उन्हें सम्मानित किया तथा शॉल, श्रीफल एवं प्रतीक चिन्ह भेंट किए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार लोकतंत्र सेनानी परिवारों को सम्मान देने का कार्य कर रही है। इन परिवारों को प्रतिमाह 10 हजार से 25 हजार रुपए तक की सम्मान राशि दी जा रही है—यह उनके संघर्ष और बलिदान को नमन करने का एक विनम्र प्रयास है।

कार्यक्रम में उपस्थित छात्र-छात्राओं और युवाओं को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि संविधान की रक्षा हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे आपातकाल के इतिहास को जानें, पढ़ें और समझें कि किस प्रकार उस कालखंड में संविधान को कुचला गया था। लोकतंत्र को जीवित रखने और सशक्त करने के लिए जन-जागरूकता और सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।

विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि भारत के संविधान और लोकतंत्र पर आपातकाल एक ऐसा कलंक है, जिसे इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज किया गया है। आपातकाल थोपकर न केवल संविधान को निष्क्रिय कर दिया गया, बल्कि मौलिक अधिकारों को समाप्त कर लोकतंत्र की आत्मा को कुचल दिया गया।
उन्होंने कहा कि उस समय देश को एक खुली जेल में बदल दिया गया था, जिसमें भय और आतंक का वातावरण था। एक लाख से अधिक लोगों को बिना न्यायिक प्रक्रिया के जेलों में बंद कर दिया गया, और उन्हें यातनाएं दी गईं। यह केवल राजनीतिक दमन का दौर नहीं था, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक चेतना को समाप्त करने का सुनियोजित प्रयास था।
डॉ. सिंह ने युवाओं से आह्वान किया कि वे आपातकाल के विषय में शोध करें, पढ़ें और समझें कि लोकतंत्र की रक्षा हेतु कितने लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। भविष्य में लोकतंत्र को सुरक्षित बनाए रखने के लिए हमें सदैव जागरूक और सजग रहना होगा।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र का सबसे शर्मनाक और काला दिन था। इस दिन संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को जिस तरह से कुचला गया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में नहीं मिलता। संविधान में मनमाने ढंग से संशोधन किए गए, जिससे देश की आत्मचेतना और नागरिक अधिकारों का दमन हुआ।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री साय ने आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित जनजागरूकता रैली में भी भाग लिया।

मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष ने आपातकाल पर आयोजित विशेष प्रदर्शनी का किया अवलोकन

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आधारित विशेष प्रदर्शनी का अवलोकन किया।
इस प्रदर्शनी में आपातकाल के दौरान की दमनकारी नीतियों, मानवाधिकारों के उल्लंघन और लोकतंत्र के हनन को चित्रों एवं दस्तावेजों के माध्यम से दर्शाया गया।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय है, जिसे विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए। ऐसी प्रदर्शनी नई पीढ़ी को लोकतंत्र और संविधान के महत्व को समझाने में सहायक सिद्ध होगी।

विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रदर्शनी लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वालों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

इस  अवसर पर उद्योग मंत्री श्री लखन लाल देवांगन, विधायकगण श्री पुरंदर मिश्रा, गुरु खुशवंत साहेब, श्री मोतीलाल साहू, सीएसआईडीसी के अध्यक्ष श्री राजीव अग्रवाल, छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के अध्यक्ष श्री नीलू शर्मा, लोकतंत्र सेनानी संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सच्चिदानंद उपासने, प्रदेश अध्यक्ष श्री दिवाकर तिवारी, छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री शशांक शर्मा तथा संचालक संस्कृति श्री विवेक आचार्य सहित बड़ी संख्या में विद्वान, लोकतंत्र सेनानी और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

‘धर्म, संस्कृति और समाज का संरक्षण कर राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति’ का लक्ष्य

वर्ष 1925 में प्रारंभ हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा इस वर्ष विजयादशमी पर अपनी शताब्दी का मील का पत्थर प्राप्त करेगी। आज संघ सबसे अनूठा, व्यापक और राष्ट्रव्यापी संगठन बन गया है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के बाद संघ का जो संकल्प और आह्वान सामने आया, उसमें इस यात्रा के मूल्यांकन, आत्ममंथन और संघ के मूल विचार के प्रति पुनः समर्पण का आह्वान किया गया है। संघ की कार्यप्रणाली कैसी है और इसके आयाम क्या हैं? वे कौन से मोड़ थे, वे कौन सी घटनाएं थीं, जिनसे गुजरकर संघ आज इस रूप में हमारे सामने खड़ा है। संघ के विरोधी क्या सोचते हैं और संघ अपने विरोधियों के बारे में क्या सोचता है? संघ आज क्या है और संघ कल क्या होगा? इन सभी सवालों और आगे की राह जानने के लिए, ऑर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर, पांचजन्य संपादक हितेश शंकर, मराठी साप्ताहिक विवेक की संपादक अश्विनी मयेकर और मलयालम दैनिक जन्मभूमि के सह संपादक एम. बालाकृष्णन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत से विस्तृत बातचीत की। (यह बातचीत 21-23 मार्च, 2025 को आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की पृष्ठभूमि में और ऑपरेशन सिंदूर से पहले की गई थी)। संपादित अंश —
 
प्र – आप संघ के एक स्वयंसेवक एवं सरसंघचालक के नाते संघ की 100 वर्ष की यात्रा को कैसे देखते हैं?
 
डॉ. हेडगेवार जी ने संघ का कार्य बहुत सोच समझकर शुरू किया । देश के सामने जो कठिनाईयाँ दिखती हैं, उनका क्या उपाय करना चाहिए यह प्रयोगों के आधार पर निश्चित किया गया और वह उपाय अचूक रहा । संघ की कार्य पद्धति से काम हो सकता है और मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को पार कर संघ आगे बढ़ सकता है, यह अनुभव से सिद्ध होने को 1950 तक का समय लग गया । उसके बाद संघ का देशव्यापी विस्तार और उसके स्वयंसेवकों का समाज में अभिसरण शुरू हुआ । आगे चार दशक तक संघ के स्वयंसेवकों ने समाज जीवन के अन्यान्य क्षेत्रों में उत्तम रीति से कार्य करते हुए अपने कर्तृत्व, अपनत्व तथा शील के आधार पर समाज का विश्वास अर्जित किया तथा 1990 के पश्चात इस विचार एवं गुण संपदा के आधार पर देश को चलाया जा सकता है, यह सिद्ध कर दिखाया। अब इसके आगे हमारे लिए करणीय कार्य यह है कि इसी गुणवत्ता का तथा विचार का अवलंबन कर पूरा समाज सब भेद भूलकर प्रामाणिकता व नि:स्वार्थ बुद्धि से देश के लिए स्वयं कार्य करने लगे, और देश को बड़ा बनाए।
 
प्र – 100 वर्ष की इस यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव क्या थे?
 
संघ के पास कुछ नहीं था। विचार की मान्यता नहीं थी, प्रचार का साधन नहीं था, समाज में उपेक्षा और विरोध ही था। कार्यकर्ता भी नहीं थे। संगणक में इस जानकारी को डालते तो, वह भविष्यवाणी करता कि यह जन्मते ही मर जाने वाला है। लेकिन देश विभाजन के समय हिंदुओं की रक्षा की चुनौती व संघ पर प्रतिबन्ध की कठिन विपत्तियों में से संघ सफल होकर निकला और 1950 तक यह सिद्ध हो गया कि संघ का काम चलेगा, बढ़ेगा। इस पद्धति से हिन्दू समाज को संगठित किया जा सकता है। आगे संघ का पहले से भी अधिक विस्तार हो गया। इस संघ शक्ति का महत्त्व 1975 के आपातकाल में संघ की जो भूमिका रही, उसके कारण समाज के ध्यान में आया। आगे एकात्मता रथ यात्रा, कश्मीर के सम्बन्ध में समाज में जनजागरण तथा श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन व विवेकानंद सार्धशति जैसे अभियानों के माध्यमों से तथा सेवा कार्यों के प्रचंड विस्तार से संघ विचार तथा संघ के प्रति विश्वसनीयता का भाव समाज में अच्छी मात्रा में विस्तारित हुआ।
 
प्र – 1948 और 1975 में संघ पर जो संकट आए, संगठन ने उससे क्या सीखा?
 
यह दोनों प्रतिबन्ध लगने के पीछे राजनीति थी। प्रतिबन्ध लगाने वाले भी जानते थे कि संघ से नुकसान कुछ नहीं, अपितु संघ से लाभ ही है। इतने बड़े समाज में स्वाभाविक ही चलने वाली विचारों की प्रतिस्पर्धा में अपना राजनैतिक वर्चस्व बनाए रखने का प्रयास करने वाले सत्तारूढ़ लोगों ने संघ पर प्रतिबन्ध लगाया। पहले प्रतिबन्ध में सभी बातें संघ के विपरीत थीं। संघ को समाप्त हो जाना था। परन्तु सब विपरीतता के बावजूद संघ उस प्रतिबन्ध में से बाहर आया और आगे 15-20 वर्षों में पूर्ववत होकर पूर्व से भी आगे बढ़ गया। संघ के स्वयंसेवक जो केवल शाखाएं चलाते थे, समाज के क्रियाकलापों में बड़ी भूमिका नहीं रखते थे, वे समाज के अन्यान्य क्रियाकलापों में सहभागी होकर वहां अपनी भूमिका सुनिश्चित करने लगे। 1948 के प्रतिबन्ध से संघ को यह लाभ हुआ कि हमने अपने सामर्थ्य को जाना और समाज में और व्यवस्थाओं में परिवर्तन लाने की ओर स्वयंसेवक योजना बनाकर अग्रसर हुए। संघ के विचार में पहले से तय था कि संघ कार्य केवल एक घंटे की शाखा तक मर्यादित नहीं है, बल्कि शेष 23 घंटे के अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सार्वजनिक तथा आजीविका के क्रियाकलापों में संघ के संस्कारों की अभिव्यक्ति भी करनी है। आगे चलकर 1975 के प्रतिबन्ध में समाज ने संघ के इस बढ़े हुए दायरे की शक्ति का अनुभव किया। जब अच्छे-अच्छे लोग निराश होकर बैठ गए थे, तब सामान्य स्वयंसेवक भी यह संकट जाएगा और इसमें से हम सब सही सलामत बाहर आएंगे, ऐसा विश्वासपूर्वक सोचता था। 1975 के आपातकाल के समय अपने प्रतिबन्ध को मुद्दा न बनाते हुए संघ ने प्रजातंत्र की रक्षा के लिए काम किया, संघ के ऊपर टीका टिप्पणी करने वालों का भी साथ दिया। उस समय समाज में, विशेष कर समाज के विचारशील लोगों में एक विश्वासपात्र वैचारिक ध्रुव के नाते संघ का स्थान बना। आपातकाल के पश्चात संघ कई गुना अधिक बलशाली होकर बाहर आया।
 
प्र – भौगोलिक और संख्यात्मक दृष्टि से संघ बढ़ता गया है। इसके बावजूद गुणवत्तापूर्ण कार्य व स्वयंसेवकों का गुणवत्ता प्रशिक्षण करने में संघ सफल रहा है। इसके क्या कारण है?
 
गुणवत्ता और संख्या में आप केवल गुणवत्ता बढ़ाएंगे और संख्या नहीं बढ़ाएंगे अथवा केवल संख्या बढ़ाएंगे और गुणवत्ता नहीं बढ़ाएंगे तो गुणवत्ता का बढ़ना या संख्या का टिकना यह संभव नहीं। इसी बात को समझकर संघ ने पहले से इस पर ध्यान रखा है कि संघ को सम्पूर्ण समाज को संगठित करना है, लेकिन संगठित करना इसका एक अर्थ है। एक व्यक्ति को कैसे तैयार करना है, इन सब व्यक्तियों का गठबंधन या संगठन कैसा होना चाहिए, ‘हम’ भावना कैसी होनी चाहिए, इसके लिए पहले से कुछ मानक तय किये हैं। उन मानकों को तोड़े बिना संख्या बढ़ानी है और मानकों पर समझौता नहीं करना है, इसका अर्थ लोगों को संगठन के बाहर रखना नहीं। एक उदाहरण है, एक बड़े संगठन के प्रारम्भ के दिनों का। उस संगठन में मूल समाजवादी विचारधारा के एक व्यक्ति कार्यकर्ता बने। उनको लगातार सिगरेट पीने की आदत थी। पहली बार वो अभ्यास वर्ग में आए। सिगरेट तो छोड़िये, वहां सुपारी खाने वाला भी कोई नहीं था। वे दिन भर तड़पते रहे। रात को बिस्तर पर लेटे तो नींद नहीं आ रही थी। इतने में संगठन मंत्री आये और कहा कि नींद नहीं आ रही है तो बाहर चलो। थोड़ा टहल आते हैं। बाहर ले जाकर उन्होंने उस नए व्यक्ति को यह भी कहा कि उधर चौक पर सिगरेट मिलेगी। मन भरकर पी लो और वापस आ जाओ। वर्ग के अन्दर सिगरेट नहीं मिलेगी। वे नए कार्यकर्ता टिक गए, बहुत अच्छे कार्यकर्ता बने और सिगरेट भी छूट गयी। उस संगठन को उन्होंने उस प्रदेश में बहुत ऊँचाई तक पहुंचाया। व्यक्ति जैसा है, वैसा स्वीकार करना है। यह लचीलापन हम रखते हैं। परन्तु हमें जैसा चाहिए, वैसा उसको बनाने वाली आत्मीयता की कला भी हम रखते हैं। यह हिम्मत और ताकत हम रखते हैं। इस कारण संख्या बढ़ाने के साथ ही गुणवत्ता कायम रही। हमें संगठन में गुणवत्ता चाहिए, लेकिन हमें पूरे समाज को ही गुणवत्तापूर्ण बनाना है, इसका भान हम रखते हैं।
 
प्र – संघ आज भी डॉक्टर हेडगेवार जी एवं श्री गुरुजी के मूल विचारों के अनुरूप चल रहा है। परिस्थिति की आवश्यकता के अनुरूप इस में कैसे रूपांतरण किया है?
 
डॉक्टर साहब, श्री गुरूजी या बाळासाहब के विचार सनातन परम्परा या संस्कृति से अलग नहीं हैं। प्रगाढ़ चिंतन व कार्यकर्ताओं के प्रत्यक्ष प्रयोगों के अनुभव से संघ की पद्धति पक्की हुई और चल रही है। पहले से ही उसमें पोथी निष्ठा, व्यक्ति निष्ठा व अंधानुकरण की कोई जगह नहीं है। हम तत्वप्रधान हैं। महापुरुषों के गुणों का, उनकी बताई दिशा का अनुसरण करना है, परन्तु हर देश-काल-परिस्थिति में अपना मार्ग स्वयं बनाकर चलना है। इसलिए नित्यानित्य विवेक होना चाहिए। संघ में नित्य क्या है? एक बार बाळासाहब ने कहा था कि ‘हिन्दुस्थान हिन्दू राष्ट्र है’, इस बात को छोड़कर बाकी सब कुछ संघ में बदल सकता है। सम्पूर्ण हिन्दू समाज इस देश के प्रति उत्तरदायी समाज है। इस देश का स्वभाव व संस्कृति हिन्दुओं की संस्कृति है। इसलिए यह हिन्दू राष्ट्र है। इस बात को पक्का रखकर सब करना है। इसलिए स्वयंसेवक की प्रतिज्ञा में “अपना पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति व हिन्दू समाज का संरक्षण करते हुए हिन्दू राष्ट्र के सर्वांगीण उन्नति” की बात कही गयी है। हिन्दू की अपनी व्याख्या भी व्यापक है। उसकी चौखट में अपनी दिशा कायम रखते हुए देश-काल-परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन करते हुए चलने का पर्याप्त अवसर है। प्रतिज्ञा में “मैं संघ का घटक हूँ”, यह भी कहा जाता है। घटक यानी संघ को गढ़ने वाला, संघ का लघुरूप और संघ का अभिन्न अंग, इसलिए अलग-अलग मत होने पर भी चर्चा में उनकी अभिव्यक्ति का पूर्ण स्वातंत्र्य है। एक बार सहमति बनकर निर्णय होने पर सब लोग अपना-अपना मत उस निर्णय में विलीन कर एक दिशा में चलते हैं। जो निर्णय होता है उसको मानना है। इसलिए सबको कार्य करने की स्वतंत्रता भी है और सबकी दिशा भी एक है। नित्य को हम कायम रखते हैं और अनित्य को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बदलकर चलते है।
 
प्र – संघ को जो बाहर से देखते हैं, जिन्होंने अनुभव नहीं किया है, उन्हें संगठन का ढांचा समझ में आता है, लेकिन इतनी लंबी यात्रा में विचार-विमर्श और आत्मचिंतन की प्रक्रिया कैसी रहती है!
 
उसकी एक पद्धति बनायी है, जिसमें उद्देश्य और आशय निश्चित है। लेकिन उनको देने की पद्धति अलग-अलग हो सकती है। ढांचा तो बदल सकता है, लेकिन ढांचे के अन्दर क्या है वह पक्का है। परिस्थिति के साथ-साथ मनस्थिति का भी महत्त्व है। इसलिए हमारे प्रशिक्षणों में देश की स्थिति, चुनौतियाँ आदि बहुत सारा विचार रहता है। जिसके साथ-साथ ही उनके सन्दर्भ में स्वयंसेवक को कैसे होना चाहिए, संगठन किन गुणों के आधार पर बनाता है, स्वयं में उन गुणों का विकास करने के लिए हम क्या करते हैं, आदि बातों का भी विचार होता है। प्रार्थना में हमारे सामूहिक संकल्प का और प्रतिज्ञा में प्रत्येक स्वयंसेवक का व्यक्तिगत संकल्प नित्य प्रतिदिन स्मरण किया जाता है। स्वयंसेवक का अर्थ ही स्वयं से प्रारम्भ करने वाला, यह है। संघ का घटक शब्द का अर्थ है ‘जैसा मैं हूँ, वैसा संघ है और जैसा संघ है, वैसा मैं हूँ’। जैसे समुद्र की हर बूंद समुद्र जैसी है और सब बूंदों से मिलकर ही समुद्र बनता है। यह ‘एक’ और ‘पूर्ण’ का सबंध संघ में प्रारम्भ से ही चल रहा है। स्वयंसेवक का आत्मचिंतन सतत चलता है। सफलता का श्रेय पूरे संघ का होता है। असफलता की स्थिति में ‘मैं कहाँ कम पड़ा’ इसको हर स्वयंसेवक सोचता है। यही प्रशिक्षण स्वयंसेवकों का होता है।
 
प्र – समाज बदला, जीवनशैली बदली, क्या आज की परिस्थिति में संघ की दैनिक शाखा का मॉडल उतना ही प्रभावी है या इसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी है?
 
शाखा के कार्यक्रमों के विकल्प हो सकते हैं, और उसको हम स्वीकार करते हैं। लेकिन शाखा जो तत्व है – इकट्ठा आना, सद्गुणों की सामूहिक उपासना करना और प्रतिदिन मन में इस संकल्प को जाग्रत करना कि हम मातृभूमि के लिए काम कर रहे हैं, परमवैभव के लिए काम कर रहे हैं। यह जो आधार है, मिलना-जुलना, एक-दूसरे का सहयोग, यह मूल है। इसका विकल्प नहीं है। सामान्य आदमी सामान्य है। वह असामान्य तब होता है, जब वह जुड़ा रहता है। और फिर सामान्य व्यक्ति भी असामान्य कार्य कर डालता है, असामान्य त्याग भी करता है। लेकिन, उसके लिए एक वातावरण होना चाहिए और फिर उस वातावरण से जुड़ना। उदाहरण और आत्मीयता, यह परिवर्तन के कारक हैं और कोई नहीं। दुनिया में कहीं भी जाओ, कभी भी परिवर्तन होता है तो कोई एक मॉडल रहता है, जिसमें पहले अपने आपको परिवर्तन करना पड़ता है, उसको देखकर लोगों में परिवर्तन होता है। यह दूर रहकर नहीं चलता, वह आप्त होना पड़ता है, पास होना पड़ता है। महापुरुष बहुत हैं, उन्हें जानते भी है । उनके प्रति हमारी श्रद्धा है, सम्मान है। लेकिन मैं जिसकी संगति में हूं, वह जैसा चलता है, मैं वैसा चलता हूं। करता मैं वही हूं, जिसकी संगति मुझे है। मेरा अपना मित्र, लेकिन मेरे से थोड़ा अच्छा है, उसी का अनुसरण करता हूं। यह परिवर्तन की सिद्ध पद्धति है। इसमें कहीं बदल नहीं हुआ है, तब तक तो शाखा का दूसरा मॉडल नहीं है। कार्यक्रम और बाकी सब बदल सकता है। शाखा का समय बदलता है, वेश बदलता है। शाखा में तरह-तरह के कार्यक्रम करने की अनुमति पहले से है, लेकिन शाखा का विकल्प नहीं है। शाखा कभी अप्रासंगिक नहीं होती। आज हमारे शाखा मॉडल के बारे में प्रगत देशों के लोग आकर अध्ययन कर रहे हैं, उसके बारे में पूछ रहे हैं। हर दस साल पर हम चिंतन करते हैं कि क्या दूसरा कोई विकल्प है? ऐसे चिंतनों में मैं आज तक 6-7 बार उपस्थित रहा हूं, लेकिन जो हमको करना है, उसको करने वाला कोई विकल्प अभी तक नहीं मिला है।
 
प्र – संघ वनवासी क्षेत्रों में कैसे बढ़ रहा है?
 
वनवासी क्षेत्रों में पहला काम है कि जनजातीय बंधुओं को सशक्त करना। उनकी सेवा करना । बाद में यह भी जुड़ गया कि उनके हितों की रक्षा के लिए प्रयास करना । हम चाहते हैं कि जनजातीय समाज में से ही उनका ऐसा नेतृत्व खड़ा हो जो अपने जनजातीय समाज की चिंता करे और सम्पूर्ण राष्ट्र जीवन का वह एक अंग है, यह समझकर उनको आगे बढ़ाए। इन क्षेत्रों में काम करने वाले स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ रही है । जनजाति क्या है, उनकी जड़ें कहाँ हैं, जनजातीय समाज से निकले महापुरुष, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले जनजातीय समाज के नायक, इन सब बातों के बारे में उनको शिक्षित करते हुए धीरे धीरे राष्ट्रीय स्वर में बोलने वाले, योगदान करने वाले कार्यकर्ता व नेतृत्व वहां खड़ा हो, इसका प्रयास चल रहा है। पूर्वोत्तर के साथ ही अन्य जनजातीय क्षेत्रों में संघ की शाखाएं बढ़ रही हैं।

प्र – भारत के पड़ोसी देशों में हिन्दुओं का उत्पीड़न हो रहा है, उनके विरुद्ध हिंसा हो रही है । विश्व में मानवाधिकार की चिंता करने वाले क्या हिन्दुओं की वैसी चिंता कर रहे हैं? संघ की प्रतिनिधि सभा में भी यह विषय उठा है । आपका इस पर क्या मत है?
 
हिन्दू की चिंता तब होगी, जब हिन्दू इतना सशक्त बनेगा – क्योंकि हिन्दू समाज और भारत देश जुड़े हैं, हिन्दू समाज का बहुत अच्छा स्वरूप भारत को भी बहुत अच्छा देश बनाएगा – जो अपने आप को भारत में हिन्दू नहीं कहते उनको भी साथ लेकर चल सकेगा क्योंकि वे भी हिन्दू ही थे। भारत का हिन्दू समाज सामर्थ्यवान होगा तो विश्व भर के हिन्दुओं को अपने आप सामर्थ्य लाभ होगा । यह काम चल रहा है, परन्तु पूरा नहीं हुआ है । धीरे-धीरे वह स्थिति आ रही है । बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार पर आक्रोश का प्रकटीकरण इस बार जितना हुआ है, वैसा पहले नहीं होता था। यही नहीं, वहां के हिन्दुओं ने यह भी कहा है कि वे भागेंगे नहीं, बल्कि वहीं रहकर अपने अधिकार प्राप्त करेंगे । अब हिन्दू समाज का आतंरिक सामर्थ्य बढ़ रहा है । एक तरह से संगठन बढ़ रहा है, उसका परिणाम अपने आप आएगा । तब तक इसके लिए लड़ना पड़ेगा । दुनिया में जहां-जहां भी हिन्दू हैं, उनके लिए हिन्दू संगठन के नाते अपनी मर्यादा में रहकर जो कुछ कर सकते हैं वो सब कुछ करेंगे, उसी के लिए संघ है । स्वयंसेवक की प्रतिज्ञा ही ‘धर्म, संस्कृति और समाज का संरक्षण कर राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति’ करना है।
 
प्र – वैश्विक व्यवस्था में सैन्य शक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक ताकत का अपना एक महत्व है। संघ इसके बारे में क्या सोचता है?
 
बल संपन्न होना ही पड़ेगा । संघ प्रार्थना की पंक्ति ही है –अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम् – हमें कोई जीत ना सके इतना सामर्थ्य होना ही चाहिए । अपना स्वयं का बल ही वास्तविक बल है । सुरक्षा के मामले में हम किसी पर निर्भर न हों, हम अपनी सुरक्षा स्वयं कर लें, हमें कोई जीत न सके, सारी दुनिया मिलकर भी हमें जीत न सके, इतना सामर्थ्य संपन्न हमको होना ही है। क्योंकि विश्व में कुछ दुष्ट लोग हैं जो स्वभाव से आक्रामक हैं । सज्जन व्यक्ति केवल सज्जनता के कारण सुरक्षित नहीं रहता। सज्जनता के साथ शक्ति चाहिए। केवल अकेली शक्ति दिशाहीन होकर हिंसा का कारण बन सकती है। इसलिए उसके साथ ही सज्जनता चाहिए। इन दोनों की आराधना हमको करनी पड़ेगी। भारतवर्ष अजेय बने। ‘परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम्’ ऐसा सामर्थ्य हो । कोई उपाय नहीं चलेगा, तब दुष्टता को बलपूर्वक नष्ट करना ही पड़ेगा । परन्तु साथ में स्वभाव की सज्जनता है तो रावण को नष्ट कर उस जगह विभीषण को राजा बनाकर वापस आ जाएंगे । यह सारा, सारे विश्व के कारोबार पर हमारी छाया पड़े, इसलिए हम नहीं कर रहे । सभी का जीवन निरामय हो, समर्थ हो, इसलिए कर रहे हैं । हमें शक्ति संपन्न होना ही पड़ेगा क्योंकि दुष्ट लोगों की दुष्टता का अनुभव हम अपनी सभी सीमाओं पर ले रहे हैं।
 
प्र – भारत की भाषिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए संघ समावेशता को कैसे बढ़ावा दे रहा है?
 
संघ में आकर देखिये। सब भाषाओं के, पंथ संप्रदायों के लोग बहुत आनंद के साथ मिलकर संघ में काम करते हैं । संघ के गीत केवल हिंदी में नहीं हैं । बल्कि अनेक भाषाओं में हैं । हर भाषा में संघ गीत गाने वाले गीत गायक, गीतों की रचना करने वाले कवि, संगीत रचनाकार हैं । फिर भी सब लोग संघ शिक्षा वर्गों में जो तीन गीत दिए जाते हैं, वह भारत वर्ष में सर्वत्र गाते हैं । सभी लोग अपनी अपनी विशिष्टताओं को कायम रखकर अपने एक राष्ट्रीयत्व का सम्मान तथा सम्पूर्ण समाज की एकता का भान सुरक्षित रखकर चल रहे हैं। यही संघ है । इतनी विविधताओं से भरे समाज को एक सूत्र में पिरोने वाला सूत्र ही हम देते हैं ।
 
प्र – संघ सामाजिक समरसता की बात करता है और उसके लिए काम भी करता है। मगर कुछ लोग हैं जो समानता की बात करते हैं। आप इन दोनों में भेद कैसे देखते हैं?
 
समानता आर्थिक है, राजनैतिक है और सामाजिक समानता आनी चाहिए । नहीं तो इनका कोई अर्थ नहीं रहेगा । बंधुभाव ही समरसता है । स्वातंत्र्य और समता दोनों का आधार बंधुता है । समता बिना स्वतंत्रता के संकोच लाती है और टिकाऊ होनी है तो बंधुभाव का आधार चाहिए । यह बंधुभाव ही समरसता है । वह समता की पूर्व शर्त है । जात-पात और छुआ-छूत के विरोध में कानून होने के पश्चात भी विषमता नहीं जाती क्योंकि उसका निवास मन में रहता है । उसे मन से निकालना है । सब अपने हैं, इसलिए हम सब समान हैं, ये मानना है । दिखने में समान नहीं हैं तो भी हम एक-दूसरे के हैं, अपनत्व में बंधे हैं, इसी को समरसता कहते हैं । प्रेमभाव, बंधुभाव को ही समरसता कहते हैं ।
 
प्र – संघ में महिलाओं की भागीदारी को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। उसके बारे में आप क्या कहेंगे?
 
संघ के प्रारम्भिक दिनों में, 1933 के आस पास, यह व्यवस्था बनी कि महिलाओं में व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का काम राष्ट्र सेविका समिति के द्वारा ही होगा । वह व्यवस्था चल रही है । जब राष्ट्र सेविका समिति कहेगी कि संघ भी महिलाओं में यह काम करे, तभी हम उसमें जाएंगे । दूसरी बात ये है कि संघ की शाखा का कार्यक्रम पुरुषों के लिए है । उन कार्यक्रमों को देखने के लिए महिलाएं आ सकती हैं और आती भी हैं । परन्तु संघ का कार्य केवल कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं चलता । हमारी माता-बहनों का हाथ लगता है, तभी संघ चलता है । संघ के स्वयंसेवक के घर में जितनी भी महिलाएं हैं, उतनी महिलाएं संघ में हैं । विभिन्न संगठनों में भी महिलाएं संघ के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर काम करती हैं । संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में भी उनका प्रतिनिधित्व और सक्रिय सहभागिता है । इन महिलाओं ने पहली बार भारत के महिला जगत का व्यापक सर्वेक्षण किया, जिसको शासन ने भी स्वीकारा है । उन्हीं के द्वारा पिछले वर्ष सारे देश में बहुत बड़े महिला सम्मलेन हुए, जिनमें लाखों महिलाओं ने भाग लिया । इन सब कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन व सहयोग रहा । हम यह मानते हैं कि महिलाओं का उद्धार पुरुष नहीं कर सकते । महिलाएं स्वयं अपना उद्धार करेंगी, उसमें सबका उद्धार हो जाएगा । इसलिए हम उन्हीं को प्रमुखता देते हैं और जो वे करना चाहती हैं, उसके लिए उनको सशक्त बनाते हैं।
 
प्र – संघ के शताब्दी वर्ष में पंच परिवर्तन का संकल्प आया है। इसे लेकर कोई कार्य योजना बनाई है, इस के आधार पर आगे क्या कर सकते हैं?
 
आचरण के परिवर्तन के लिए आवश्यक बात है मन का भाव। जो काम करने से मन का भाव बदलता है, स्वभाव परिवर्तित हो जाता है, वह काम देना है। और जीवन भी ठीक हो जाता है। इसलिए पंच परिवर्तन की बात है। एक तो समरसता की बात है, अपने समाज में प्रेम उत्पन्न हो। विविध प्रकार का समाज है, विविध अवस्था में है, विविध भौगोलिक क्षेत्रों में है, समस्याएं हैं। एक नियम आपके लिए बना है, मेरे लिए ठीक होगा ही, ऐसा नहीं है। इतना बड़ा देश है। इसमें से अगर रास्ता निकालना है, तो जो भी प्रावधान करने पड़ेंगे, वे प्रावधान मन से होंगे तो सुरक्षित रहेंगे और प्रेम बढ़ेगा। सामाजिक समरसता का व्यवहार करना है। उसमें सामाजिक समरसता का प्रचार अभिप्रेत नहीं है। प्रत्यक्ष समाज के बाहर जितने प्रकार माने जाते हैं, हम तो एक मानते हैं, सब प्रकार के मेरे मित्र होने चाहिए, मेरे कुटुंब के मित्र होने चाहिए। जहां अपना प्रभाव है वहां मंदिर, पानी, श्मशान एक हों, यह प्रारंभ है, इसको बढ़ाते जाना है।
ऐसे ही कुटुंब प्रबोधन है। जो संसार को राहत देने वाली बातें हैं, जिन आवश्यक परंपरागत संस्कारों से आती हैं, हमारी कुल-रीति में हैं और देश की रीति-नीति में भी हैं। उन पर बैठ कर चर्चा करना और उस पर सहमति बनाकर परिवार के आचरण में लाना, यह कुटुंब प्रबोधन है।
पर्यावरण के लिए तो आंदोलन सहित बहुत सारी बातें चलती हैं। लेकिन, आदमी अपने घर में पानी व्यर्थ जाता है, चिंता नहीं करता। पहले करो। पेड़ लगाओ, प्लास्टिक हटाओ, पानी बचाओ। यह करने से समझ विकसित होती है, वह सोचने लगता है।
ऐसे ही स्व के आधार पर करो। अपने स्व के आधार पर व्यवहार करना चाहिए। हमारा सबका जो राष्ट्रीय स्व है, उस के आधार पर चलो। अपने घर के अंदर भाषा, भूषा, भोजन, भजन, भ्रमण यह अपना होना चाहिए। घर की चौखट के बाहर परिस्थिति के अनुसार करना पड़ता है। घर में तो हम हैं, वो रहेगा तो उसके कारण संस्कार भी बचेंगे। स्व-निर्भर देश को होना है तो हम बने तक अपने देश की वस्तुओं में काम चलाएं। इसकी आदत रखें। इसका अर्थ यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बंद करो। उसका एक संतुलन है, मेरा चल सकता है उसको चलाऊँगा। देश की आवश्यकता है, कोई जीवनावश्यक काम है और बाहर देश से लाना पड़ेगा तो लाओ, लेकिन अपनी शर्तों पर, किसी के दबाव में नहीं। यह सब बातें बनेंगी, स्व का आचरण।
कानून, संविधान, सामाजिक भद्रता का पालन। ये पांच बातें लेकर स्वयंसेवक उस पथ पर आगे बढ़ेंगे और शताब्दी वर्ष समाप्त होने के बाद इसको शाखाओं के द्वारा समाज में ले जाएंगे। यह आचरण बनेगा तो वातावरण बनेगा, और वातावरण बनने से परिवर्तन आएगा। और बहुत सी बातें आगे की हैं, वो यहां से जाएंगी धीरे-धीरे शुरू होकर। ऐसा सोचा है। देखते हैं क्या होता है।
 
प्र – आने वाले 25 वर्ष के लिए क्या संकल्प है?
 
संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करना और देश को परमवैभव संपन्न बनाना, उसके आगे एक अनकही बात है कि सम्पूर्ण विश्व को ऐसा बनाना है । डॉ. हेडगेवार के समय से ही यह दृष्टि है । उन्होंने 1920 में प्रस्ताव दिया था कि ‘भारत का सम्पूर्ण स्वातंत्र्य हमारा ध्येय है और स्वतन्त्र भारत दुनिया के देशों को पूंजीवाद के चंगुल से मुक्त करेगा’ ऐसा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को कहना चाहिए ।
 
प्र – संघ के 100 वर्ष होना और देश की आजादी के 100 वर्ष 2047 में पूरे होंगे । भारत विश्व गुरु कैसे बनेगा!
कुछ लोग तरह-तरह से भेद उत्पन्न करने का प्रयास करेंगे । इन सबको कैसे देखते हैं?
 
जो हमारी प्रक्रिया है, उसमें इन सब बातों की चिंता की गयी है । आत्मविस्मृति, स्वार्थ और भेद इन तीन बातों से लड़ते-लड़ते हम बढ़ रहे हैं। आज समाज के विश्वासपात्र बने हैं । यही प्रक्रिया आगे चलेगी । अपनत्व के आधार पर समाज के सभी लोग एक मानसिकता में आ जाएंगे । एक और एक मिलकर दो होने के बजाय ग्यारह होगा । भारतवर्ष को संगठित और बल संपन्न बनाने का काम 2047 तक सर्वत्र व्याप्त हो जाएगा और चलते रहेगा । समरस, सामर्थ्य संपन्न भारत के विश्व जीवन में समृद्ध योगदान को देखकर सब लोग उसके उदाहरण का अनुकरण करने के लिए आगे बढ़ेंगे । 1992 में हमारे एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा था कि “इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देखकर दुनिया के अन्यान्य देशों के लोग उस देश का अपना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खड़ा करेंगे। जिससे पूरे विश्व के जीवन में परिवर्तन आएगा”। यह प्रक्रिया 2047 के बाद प्रारम्भ होगी और इसे पूरा होने में 100 वर्ष नहीं लगेंगे । अगले 20-30 वर्षों में यह पूरी हो जाएगी।
 
प्र – शताब्दी वर्ष में जो हिन्दू-हितैषी वर्ग है, संघ का शुभचिंतक वर्ग है, इस राष्ट्र का हित चिंतक वर्ग है । उसके लिए आपका संदेश क्या होगा?
 
हिन्दू समाज को अब जागृत होना ही पड़ेगा । अपने सारे भेद और स्वार्थ भूलकर हिन्दुत्व के शाश्वत धर्म मूल्यों के आधार पर अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और आजीविका के जीवन को आकार देकर एक सामर्थ्य संपन्न, नीति संपन्न तथा सब प्रकार से वैभव संपन्न भारत खड़ा करना पड़ेगा क्योंकि विश्व को नई राह की प्रतिक्षा है और उसको देना यह भारत का यानी हिन्दू समाज का ईश्वर प्रदत्त कर्तव्य है। कृषि क्रांति हो गयी, उद्योग क्रांति हो गयी, विज्ञान और तकनीक की क्रांति हो गयी, अब धर्म क्रान्ति की आवश्यकता है । मैं रिलीजन की बात नहीं कर रहा हूँ। सत्य, शुचिता, करुणा व तपस के आधार पर मानव जीवन की पुनर्रचना हो, इसकी विश्व को आवश्यकता है और भारत उसका पथ प्रदर्शक हो, यह अपरिहार्य है। संघ कार्य के महत्त्व को हम समझें, ‘मैं और मेरा परिवार’ के दायरे से बाहर आकर और अपने जीवन को उदाहरण बनाकर सक्रिय होकर हम सबको साथ में आगे बढ़ना चाहिए, इसकी आवश्यकता है।
सरसंघचालक

न्यूयॉर्क स्थित यूएन मुख्यालय में, एक शाम – योग के नाम

23 जून 2025स्वास्थ्य

मानसिक तनाव और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के दौर में योग, शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शान्ति का माध्यम बनकर उभर रहा है. ऐसे वातावरण में, 21 जून को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में 11वें अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन, बहुत से लोगों के लिए निश्चित रूप से राहत का अवसर था. शुक्रवार की शाम, यूएन परिसर का उत्तरी बाग़ीचा, एक खुले योग स्टूडियो में तब्दील हो गया, जहाँ विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों, यूएन कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने एक विशाल सभा के रूप में, योग के ज़रिए आन्तरिक सन्तुलन और वैश्विक एकता की अनुभूति की…

संघर्षों, बीमारियों, जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं व मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों के इस दौर में हम, योग पद्धति को अपना कर, न केवल अपने जीवन में शान्ति का अनुभव कर सकते हैं, बल्कि इससे समुदायों व पृथ्वी के साथ भी एक समरसतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने में मदद मिल सकती है. हर वर्ष 21 जून को मनाए जाने वाले ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’ के अवसर पर शुक्रवार को न्यूयॉर्क स्थित यूएन मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान शान्ति व समरसता के इसी सन्देश की गूँज सुनाई दी.

यूएन मुख्यालय परिसर में नॉर्थ लॉन को, एक बार फिर खुली हवा में एक योग स्टूडियो के रूप में तब्दील कर दिया गया, और कुछ दिनों से घिरे बादलों व बारिश के बाद नज़र आई खुली धूप ने योग के लिए उत्सुक लोगों का स्वागत किया.

विभिन्न देशों के प्रतिनिधि, यूएन अधिकारी, कर्मचारी व न्यूयॉर्क के अन्य हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग यहाँ जुटे, जिन्होंने बेहतर शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली इस प्रक्रिया में हिस्सा लिया.

पीटर रोजिना, शान्ति प्रकाश नामक एक परियोजना के संस्थापक हैं, और यूएन मुख्यालय में इस सत्र के लिए आना उनके लिए सुखद अनुभव था. उन्होंने 2019 में आयोजित कार्यक्रम को याद किया जब बारिश के कारण योग सत्र को यूएन महासभा हॉल में किया गया था.

“इतनी बड़ी संख्या में लोगों के साथ योग प्रक्रिया का अवसर मुझे बहुत पसंद है. यहाँ बहुत अधिक ऊर्जा है…और मेरे साथ मेरा बेटा भी आया है. मैं उसे यह अनुभव कराने के लिए रोमांचित हूँ.”

बौद्ध शिक्षक लामा आरिया ड्रोल्मा भी हर साल योग कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए यूएन पहुँचती हैं. कभी कॉरपोरेट जगत में मॉडलिंग के बाद अब वह आन्तरिक शान्ति व आध्यात्म की राह पर हैं.

उन्होंने बताया कि, “मैं जब भारत में बड़ी हो रही थी, तो योग आसन किया करती थी. इसने न केवल मेरे शरीर को बल्कि मेरी आत्मा को छुआ. यह ध्यान में भी सहायक है. मैं योग को सबसे स्वस्थ विकल्पों में मानती हूँ, जिनके ज़रिए हम अपने स्वास्थ्य की देखभाल कर सकते हैं.”

सम्पूर्ण जगत, एक परिवार

योग का सन्देश निजी कल्याण से परे तक जाता है और यह सम्पूर्ण जगत के स्वास्थ्य को साथ में लेकर चलने में अहम भूमिका निभा सकता है.

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई मिशन ने यूएन सचिवालय के सहयोग से इस अन्तरराष्ट्रीय दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किया, जिसकी थीम है: एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग.

भारत के स्थाई प्रतिनिधि, राजदूत पी. हरीश ने अपने सन्देश में कहा कि योग एक महत्वपूर्ण सत्य को परिलक्षित करता है. निजी कल्याण और हमारे ग्रह का स्वास्थ्य, आपस में गहराई तक जुड़े हुए हैं.

“अपनी देखभाल करने में, हम पृथ्वी की देखभाल करते हैं, और यह चिरस्थाई भारतीय मूल्य, वसुधैव कुटुम्बकम को दर्शाता है, कि सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है.”

“योग दिवस का यह 11वाँ संस्करण, हमें यह चिन्तन करने का एक अवसर प्रदान करता है कि योग किस तरह से वैश्विक कल्याण की एक शक्ति के रूप में उभरा है, जिसने आयु समूहों, भौगोलिक क्षेत्रों और जीवन के हर पहलु में लोगों को छुआ है.”

आनन्द मार्ग महिला कल्याण केन्द्र की दीदी आनन्द राधिका आचार्य ने बताया कि योग, केवल अभ्यास से कहीं बढ़कर है. यह अपने को प्रकृति व सम्पूर्ण विश्व से जोड़ने का माध्यम है.

“बाहर से देखने पर हमारा शरीर नज़र आता है, भीतर हमारा मस्तिष्क है. मगर यदि आप और भीतर जाएं, तो कुछ ऐसा है, जो सदैव हमें देख रहा है, परख रहा है. वह हमारी आत्मा है. योग के ज़रिए, हम उस भीतरी स्थल तक पहुँच सकते हैं. जब हम अपने मस्तिष्क की गहराइयों में उतरते हैं, तो हम महसूस कर पाते हैं कि हम सभी एक दूसरे से कितनी मज़बूती से जुड़े हुए हैं.”

आशा का प्रतीक

यह कार्यक्रम क़रीब डेढ़ घंटे तक चला, जिसमें आर्ट ऑफ़ लिविंग के योग विशेषज्ञों ने प्राणायाम तकनीक, विभिन्न योग मुद्राओं व आसनों के साथ लोगों को इसके लाभ बताए. सत्र का एक मुख्य आकर्षण, स्वास्थ्य के प्रति समग्र दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाले डॉक्टर दीपक चोपड़ा रहे, जिन्होंने एक ध्यान सत्र को निर्देशित किया.

न्यूयॉर्क में शिवानन्द योग वेदांत केन्द्र की मार्ता शेडलेट्स्की इस कार्यक्रम में एक समुदाय के एहसास, भरोसे और इस आस्था को पाने के लिए पहुँची कि शान्ति हासिल करना सम्भव है. और इस सत्र का यूएन मुख्यालय में आयोजित होना उनके लिए ख़ास था.

उन्होंने कहा कि फ़िलहाल दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है, जितनी भी उथलपुथल, युद्ध हो रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि में यह स्थान एक बेहतर भविष्य के लिए आशा और शान्ति की सम्भावनाओं का प्रतीक है.

‘नैतिक नाकामी’: युद्ध में फँसे बच्चों के घर बने ‘यात्रा बैग’

25 जून 2025 मानवाधिकार

सीरिया के इदलिब की एक युवती सिला की उम्र उस समय तीन साल थी जब एक दिन सुबह उनकी नीन्द मिसाइलों के हमलों के भयावह शोर में खुली. ये मिसाइल हमले सिला के घर के आसपास हो रहे थे, जिनके कारण सिला और उनके परिवार को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों के लिए भागना पड़ा.

सिला ने बुधवार को सीरिया से वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए सुरक्षा परिषद को बताया, “उस दिन के बाद से, हमारा घर एक ‘यात्रा बैग’ बन गया और वो विस्थापन हमारा रास्ता बन गया… मेरा बचपन भय और चिन्ता से भरा था और मैं अपने प्रियजन से वंचित थी.” 

सिला की उम्र अब 17 वर्ष हो चुकी है. उन्होंने सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान अपने अनुभव बुधवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक में साझा किए. यह बैठक बच्चों और सशस्त्र संघर्ष पर महासचिव की नवीनतम रिपोर्ट के निष्कर्षों पर चर्चा करने के लिए आयोजित की गई.

रिपोर्ट में 2024 में बच्चों के ख़िलाफ़ मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघनों में 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो इसके 20 साल के इतिहास में अब तक दर्ज की गई सबसे बड़ी संख्या है.

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) में बाल संरक्षण की निदेशक शीमा सेन गुप्ता ने सुरक्षा परिषद में कहा, “महासचिव की इस वर्ष की रिपोर्ट एक बार फिर इस बात की पुष्टि करती है और जिसे बहुत से बच्चे पहले से ही जानते हैं – कि दुनिया उन्हें युद्ध की भयावहता से बचाने में विफल हो रही है.”

“दुनिया भर के हर देश में बच्चों के ख़िलाफ़ हर मानवाधिकार उल्लंघन, एक नैतिक विफलता का मामला है.”

नुक़सान का असल दायरा

सुरक्षा परिषद में प्रस्तुत की जाने वाली यह रिपोर्ट, युद्ध से प्रभावित बच्चों के ख़िलाफ़ मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघनों का रिकॉर्ड दर्ज करने के लिए, हर साल प्रकाशित की जाती है.

यह रिपोर्ट पूरी तरह से संयुक्त राष्ट्र द्वारा संकलित और सत्यापित डेटा पर निर्भर होती है. इसका अर्थ है कि वास्तविक संख्या, दर्ज आँकड़ों से कहीं अधिक होने की सम्भावना है.

2024 में, रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्लंघन के रिकॉर्ड 41 हज़ार 370 मामले दर्ज किए गए – जिनमें हत्या और अपंगता, बलात्कार, अपहरण और बच्चों का समर्थन करने वाले स्कूलों जैसे बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया जाना शामिल है.

यह रिपोर्ट, बच्चों व सशस्त्र टकराव के लिए विशेष प्रतिनिधि वर्जीनिया गाम्बा के कार्यालय ने तैयार की है. वर्जीनिया गाम्बा का कहना था, “इन हमलों से पीड़ित प्रत्येक बच्चा अपने साथ एक कहानी, एक छीना हुआ जीवन, एक टूटा हुआ सपना, एक ऐसा भविष्य लेकर चलता है जो बेमतलब हिंसा और लम्बे टकराव से धूमिल हो गया है.”

रिपोर्ट कहती है कि वैसे तो इनमें से कई मानवाधिकार उल्लंघन, संघर्ष व टकराव के दौरान हुए, ख़ासतौर पर जब शहरी युद्ध बढ़ रहा है, मगर गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघन, टकराव समाप्त होने के बाद भी जारी रह सकते हैं.

ये मानवाधिकार उल्लंघन अब भी ज़मीन पर बिखरे पड़े बिना फटे विस्फोटकों के रूप में क़ायम हैं.

सीमा सेन गुप्ता ने कहा, “किसी भी खेत, स्कूल के प्रांगण या गली में छोड़ा गया प्रत्येक अप्रयुक्त आयुध, मौत की एक सज़ा की तरह हैं, जो बच्चों को किसी भी क्षण अपनी चपेट में ले सकती है.”

और ये हालात, आघात और चोटों के रूप में बरक़रार हैं जो जीवन भर बच्चे को कभी भी, पूरी तरह से नहीं छोड़ते हैं.

घाव जो कभी नहीं भरते

जो बच्चे, गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघनों से बच भी जाते हैं, तो भी वो गहरी चोट से नहीं बच पाते हैं, अगर वे हिंसा के शिकार हुए होते हैं, तो उसके घाव, जीवन भर उनके साथ रहते हैं.

और अगर वे घायल नहीं भी हुए, तो भी उनकी ज़िन्दगी में सदमा बना रहता है.

वर्जीनिया गाम्बा ने कहा, “जीवित बचे लोगों के लिए शारीरिक और मनोवैज्ञानिक घाव जीवन भर बने रहते हैं, जो परिवारों, समुदायों और समाज के मूल ढाँचे को प्रभावित करते हैं.”

यही कारण है कि यूनीसेफ़ और उसके साझीदारों ने मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघनों के शिकार बच्चों के लिए, पुनर्मिलन कार्यक्रम और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करने के लिए काम किया है.

सिला ने कहा कि उनके बचपन का सदमा अब भी उनके साथ है, और इसने उन्हें अशान्ति में बच्चों के लिए एक पैरोकार बनने के लिए प्रेरित किया है.

सिला ने कहा, “उस पल के बाद, मेरे जीवन में कुछ भी सामान्य नहीं लगता. मुझे किसी भी ऐसी आवाज़ से डर लगने लगा है जो विमान, अन्धेरे और यहाँ तक कि मौन से भी मिलती-जुलती हो.”

‘उन्हें निराशा से निकालें’

वर्जीनिया गाम्बा ने रिपोर्ट में पेश किए गए चिन्ताजनक रुझानों को उलटने के लिए, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से “अटूट निन्दा और तत्काल कार्रवाई” का आहवान किया.

उन्होंने कहा, “हम उस अन्धकार युग में वापस नहीं जा सकते, जहाँ बच्चे सशस्त्र टकराव के अदृश्य और बेआवाज़ पीड़ित थे… कृपया उन्हें निराशा की छाया में वापस नहीं जाने दें.” 

1967: यूएन मंच पर संगीत का महासंगम, पंडित रवि शंकर और येहूदी मेनुहिन की जुगलबन्दी

11 जून 2025 संस्कृति और शिक्षा

दिसम्बर 1967 में, संगीत की अलग-अलग परम्पराओं के दो महारथियों ने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र महासभा हॉल में मंच को साझा किया. भारतीय सितार वादक पंडित रवि शंकर और ब्रिटिश-अमेरिकी वायलिन वादक येहूदी मेनुहिन ने जब विश्व नेताओं के समक्ष अपनी कला का प्रदर्शन किया, तो यूएन टीवी के कैम​रे ने उस ऐतिहासिक पल को रिकॉर्ड कर लिया. यह मात्र एक संगीत प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि सांस्कृतिक विरासतों के बीच एक आत्मिक सम्वाद भी था, जहाँ सुरों के ज़रिए एकता, सम्मान और शान्ति का सन्देश दिया गया. (वीडियो)

एशिया में जलवायु परिवर्तन और चरम मौसम का सर्वाधिक प्रकोप: WMO रिपोर्ट

डब्लूएमओ की महासचिव सैलेस्टे साउलो ने बताया, “रिपोर्ट के निष्कर्ष बेहद गम्भीर हैं. इस क्षेत्र में कई देशों में 2023 साल का सबसे गर्म वर्ष रहा और सूखे व तापलहर से लेकर बाढ़ एवं तूफ़ान जैसी अनगिनत चरम मौसम घटनाएँ देखने को मिलीं.”

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी घटनाओं की आवृत्ति और गम्भीरता बढ़ी है, जिनसे समाज, अर्थव्यवस्था और सबसे महत्वपूर्ण रूप से मानव जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है.

साल 2023 के दौरान मौसम, जलवायु व जल सम्बन्धी संकटों के कारण एशिया, विश्व का सर्वाधिक आपदा-प्रभावित क्षेत्र रहा. विश्व मौसम संगठन (WMO) की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में सबसे ज़्यादा तबाही, तूफ़ान और बाढ़ ने मचाई.

औसत से तेज़

1960-1990 के बाद से तापमान वृद्धि का रुझान लगभग दोगुना होने कारण, एशिया में वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेज़ी से तापमान वृद्धि हुई है. बाढ़, तूफ़ान और तीव्र तापलहरों से हताहतों की संख्या एवं आर्थिक हानि बढ़ रही है.

2023 में, उत्तर पश्चिमी प्रशान्त महासागर में समुद्र की सतह का तापमान रिकॉर्ड पर सबसे अधिक दर्ज हुआ. यहाँ तक ​​कि आर्कटिक महासागर को भी समुद्री तापलहरों का सामना करना पड़ा. 

रिपोर्ट में बैरेंट्स सागर को “जलवायु परिवर्तन का केन्द्र” बताया गया है.

थर्मल विस्तार और हिमनदों, बर्फ़ की चोटियों व बर्फ़ की चादरों के पिघलने से विश्व स्तर पर समुद्री स्तर बढ़ना जारी रहा. हालाँकि, 1993 से 2023 के बीच एशिया में इस बढ़ोत्तरी की दरें वैश्विक औसत से अधिक रहीं.

आपात स्थिति की घटनाओं पर प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, साल 2023 में एशियाई महाद्वीप में 79 जल सम्बन्धित आपदाएँ देखी गईं, जिनमें से 80 प्रतिशत से अधिक बाढ़ और तूफ़ान से सम्बन्धित थीं. इसके परिणामस्वरूप 2,000 से अधिक लोगों की मौतें हुईं और 90 लाख लोगों पर सीधा असर पड़ा.

तापमान वृद्धि, वर्षा में कमी

क्षेत्र के कई हिस्सों में 2023 में अत्यधिक गर्मी का अनुभव हुआ एशिया में वार्षिक औसत सतही तापमान, 1991-2020 के औसत से 0.91 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज हुआ, जो रिकॉर्ड में दूसरा सबसे अधिक था. 

पश्चिमी साइबेरिया से मध्य एशिया और पूर्वी चीन से जापान तक, विशेष रूप से उच्च तापमान देखा गया. जापान और कज़ाख़स्तान में रिकॉर्ड गर्म वर्ष का अनुभव हुआ.

इस बीच, तुरान तराई क्षेत्र (तुर्क़मेनिस्तान, उज़बेकिस्तान, कज़ाख़स्तान), हिंदुकुश (अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान) और हिमालय के बड़े हिस्सों के साथ-साथ, गंगा के आसपास तथा ब्रह्मपुत्र नदियों (भारत व बांग्लादेश) के निचले हिस्से में वर्षा का स्तर सामान्य से नीचे रहा. 

म्याँमार में अराकान पर्वत और मेकाँग नदी के निचले इलाक़ों में भी सामान्य से कम वर्षा देखी गई है, जबकि दक्षिण-पश्चिम चीन में, 2023 के लगभग हर एक महीने में वर्षा का स्तर सामान्य से नीचे रहने के कारण, सूखे का कहर देखने को मिला.

लेकिन वर्षा का स्तर कम होने के बावजूद, कई चरम मौसम घटनाएँ हुईं, जैसेकि मई में म्याँमार में भारी वर्षा; जून व जुलाई में भारत, पाकिस्तान और नेपाल में बाढ़ व तूफ़ान, तथा सितम्बर में हाँगकाँग में प्रति घंटा रिकॉर्ड वर्षा.

सिकुड़ते हिमनद 

उच्च-पर्वतीय एशिया क्षेत्र, जिसके केन्द्र में तिब्बती पठार है, ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद सबसे अधिक बर्फ़ का घर है. यहाँ लगभग एक लाख वर्ग किलोमीटर लम्बे क्षेत्र में हिमनद स्थित हैं. पिछले कई दशकों में, उनमें से अधिकाँश तेज़ गति से पीछे हटते जा रहे हैं. अध्ययन किए गए 22 में से 20 हिमनदों का पिंड लगातार कम हो रहा है, जिससे रिकॉर्ड तोड़ उच्च तापमान एवं सूखे के हालात पैदा हो रहे हैं.

एवरेस्ट क्षेत्र में हिमनद तेज़ी से पिघल रहे हैं.

UN Nepal/Narendra Shrestha

पर्माफ्रॉस्ट यानि वो मिट्टी जो लगातार दो या उससे ज़्यादा वर्षों तक 0 डिग्री सेल्सियस तापमान से नीचे रहती है, उसमें भी आर्कटिक के बढ़ते वायु तापमान के कारण कमी आ रही है. एशिया में पर्माफ्रॉस्ट का सबसे तीव्र विगलन, ध्रुवीय उराल और पश्चिमी साइबेरिया के पश्चिमी क्षेत्रों में देखा जा रहा है.

धूल भरी भयंकर आँधी, बिजली की गड़गड़ाहट, ठंड की तीव्र लहरें और घना कोहरा भी उन चरम घटनाओं में से हैं, जिन्होंने पूरे एशिया में लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है.

सर्वजन के लिए प्रारम्भिक चेतावनी प्रणाली

रिपोर्ट में कहा गया है कि 1970 से 2021 तक, मौसम, जलवायु और जल सम्बन्धी चरम मौसम घटनाओं के कारण 3 हज़ार 612 आपदाएँ हुईं, जिनमें 9 लाख 84 हज़ार 263 मौतें हुईं और 1.4 खरब डॉलर का आर्थिक नुक़सान हुआ. 

दुनिया भर में प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली कुल मौतों में से 47 प्रतिशत इसी क्षेत्र में हुई हैं, जिनमें उष्णकटिबंधीय चक्रवात सर्वाधिक मौतों का कारण बनें.

इन प्रभावों को कम करने के लिए, WMO और साझीदारों ने, जीवन बचाने और जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य के आर्थिक संकटों की रोकथाम के लिए एक मज़बूत प्रारम्भिक चेतावनी एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण प्रणाली स्थापित करने की सिफ़ारिश की है.

रिपोर्ट तैयार करने में भागीदार, यूएन आर्थिक व सामाजिक आयोग (ESCAP)  की कार्यकारी सचिव, अर्मिदा साल्सिया अलिसजाबाना ने कहा, “प्रारम्भिक चेतावनी और बेहतर तैयारियों ने हज़ारों लोगों की जान बचाई है.”

उन्होंने आश्वासन देते हुए कहा, “एक साथ काम करते हुए, ESCAP और WMO, जलवायु महत्वाकाँक्षा में वृद्धि और ठोस नीति के कार्यान्वयन में तेज़ी लाने हेतु निवेश जारी रखेंगे. इसमें क्षेत्र में सर्वजन को प्रारम्भिक चेतावनी प्रणाली उपलब्ध करवाना शामिल होगा, ताकि लगातार बढ़ते जलवायु परिवर्तन संकट के बीच, कोई भी पीछे न छूट जाए.”

एशिया में ताप वृद्धि

विस्तृत विश्लेषण

🌡️ 1. लगभग दोगुनी गति से गर्म हो रहा है

  • WMO की “State of the Climate in Asia 2024” रिपोर्ट के अनुसार, एशिया का औसत तापमान 2024 में 1.04 °C रहा, जो 1991–2020 के औसत से लगभग इतना ही ऊपर है ft.com+1wmo.int+1indianexpress.com+11healthpolicy-watch.news+11timesofindia.indiatimes.com+11
  • 1991–2024 के तापीय रुझान की दर लगभग दो गुना तेज़ है 1961–1990 की तुलना में ।

🌍 2. भूमि और महासागर—दोनों में असामान्य गर्मी

  • भूमि क्षेत्र व महासागर के बीच अंतर: भूमि अधिक तेजी से गर्म हो रही है, इसलिए एशिया जैसे विशाल महाद्वीप में ताप वृद्धि वैश्विक औसत से तेज़ होती है ।
  • समुद्री सतह का औसतन ताप में वृद्धि 0.24 °C/दशक, जबकि वैश्विक औसत 0.13 °C/दशक है earth.org+15wmo.int+15outlookbusiness.com+15

☀️ 3. रिकॉर्ड तोड़ने वाले ताप और गर्मी लहरें

🌊 4. महासागरीय गर्मी: विशाल एरिया प्रभावित

  • अगस्त–सितंबर 2024 में लगभग 15 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में समुद्री हीटवेव्स देखे गए—जोकि पृथ्वी की महासागरीय सतह का लगभग 10% है dawn.com+1timesofindia.indiatimes.com+1

🏔️ 5. ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्रस्तर बढ़ रहा है

  • हिमालय व तियान शान की 24 में से 23 ग्लेशियरों का द्रव्यमान घटा
  • मध्य-तटीय क्षेत्र में समुद्रस्तर की वृद्धि वैश्विक औसत से तेज रही, जिससे तटवर्ती देशों को खतरा बढ़ा ।

🌪️ 6. चरम मौसम और सामाजिक–आर्थिक प्रभाव

  • चक्रवात (“Yagi” सहित), बाढ़, सूखे, और भारी वर्षा जैसी घटनाओं से जीवन, कृषि, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिक तंत्र पर भारी प्रभाव पड़ा ।
  • भारत में हीटवेव, बाढ़ और भूस्खलन ने सैकड़ों जानें लीं, और स्थिति कमजोर क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी ।

🧭 निष्कर्ष

  • एशिया का ताप वृद्धि की रफ्तार वैश्विक औसत से लगभग दो गुनी तेज़ है — भूमि के ऊपर और समुद्र के नीचे दोनों इसका स्पष्ट संकेत देते हैं।
  • इस तेज़ गर्मी का परिणाम ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्रस्तर का बढ़ना, चरम मौसम, और मानव/प्राकृतिक प्रणाली पर दबाव का रूप लेकर सामने आया है।
  • WMO की यह रिपोर्ट सुझाव देती है कि जलवायु अनुकूलन (climate adaptation) और पूर्व चेतावनी प्रणालियों (early warning systems) में निवेश बढ़ाना अब पहले से भी ज्यादा अनिवार्य है ।

Pricing for Chemicals, Fertilizers, and

Recycled plastics

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छत्तीसगढ़ के विकास के लिए मध्य क्षेत्रीय परिषद बना सार्थक मंच: मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय

उत्तरप्रदेश के वाराणसी में आयोजित मध्य क्षेत्रीय परिषद की 25वीं बैठक में मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि यह परिषद केन्द्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय का सशक्त मंच बन चुकी है, जिसके माध्यम से छत्तीसगढ़ सहित मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विकास को नई दिशा मिली है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में मध्य क्षेत्रीय परिषद ने ठोस योगदान दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य की अर्थव्यवस्था, आंतरिक सुरक्षा, सांस्कृतिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास में परिषद की भूमिका निर्णायक रही है।

नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक बढ़त, बस्तर में विकास का नया युग

मुख्यमंत्री श्री साय ने नक्सल समस्या पर बोलते हुए कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह की दृढ़ इच्छाशक्ति और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय से छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के विरुद्ध बड़ी सफलता मिली है। बसवराजू और सुधाकर जैसे शीर्ष नक्सली नेताओं के न्यूट्रलाइज होने को उन्होंने नक्सलवाद की रीढ़ टूटने जैसा करार दिया। उन्होंने बताया कि बस्तर के विकास के लिए बोधघाट-महानदी इंद्रावती लिंक जैसी कई हजार करोड़ की परियोजनाओं पर भी हम काम कर रहे हैं। रावघाट-जगदलपुर रेललाइन परियोजना को मिली मंजूरी भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

विकास और सुशासन की दिशा में ठोस कार्य

मुख्यमंत्री ने परिषद को अवगत कराया कि पिछली बैठक में दिए गए सुझावों पर तेजी से अमल हुआ है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 28 नई बैंक शाखाएं, डॉयल-112 सेवा का विस्तार, 82 हजार से अधिक बच्चों को कुपोषण से बाहर निकालना जैसी उपलब्धियाँ राज्य के विकास के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों ने स्थानीय खेल और सांस्कृतिक प्रतिभाओं को मंच दिया है। आयुष्मान भारत योजना के तहत 87.2 प्रतिशत नागरिकों को कार्ड वितरित किए जा चुके हैं, और 1075 में से 1033 शासकीय अस्पताल इससे जोड़े जा चुके हैं।

ऊर्जा, निवेश और औद्योगिक विकास में राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर छत्तीसगढ़

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि नई औद्योगिक नीति लागू होने के बाद राज्य को अब तक 5.5 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिनमें 3.5 लाख करोड़ पावर सेक्टर से हैं। छत्तीसगढ़ देश में विद्युत उत्पादन में दूसरे स्थान पर है और 2030 तक प्रथम स्थान का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में 23 घंटे 27 मिनट और शहरी क्षेत्रों में 23 घंटे 51 मिनट की औसत विद्युत आपूर्ति राज्य के ऊर्जा प्रबंधन की दक्षता को दर्शाता है। प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत 6 लाख घरों को सौर ऊर्जा से जोड़ने का कार्य प्रगति पर है।

सुगम सेवाएँ, सशक्त पंचायतें और नई श्वेत क्रांति

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ में डेढ़ लाख से अधिक सोलर कृषि पंप किसानों को सिंचाई सुविधा प्रदान कर रहे हैं। एनडीडीबी के साथ हुए एमओयू से राज्य में दुग्ध उत्पादन में नया विस्तार होगा। अटल डिजिटल सुविधा केंद्र पंचायतों में डिजिटल सुशासन के सेतु बन रहे हैं और लोक सेवा गारंटी अधिनियम 2011 के प्रभावी क्रियान्वयन से सेवाओं की पारदर्शी और समयबद्ध डिलीवरी सुनिश्चित हुई है।

विकास और सुशासन में छत्तीसगढ़ बना मॉडल राज्य

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के नेतृत्व में भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के अभियान में पूरी निष्ठा से सहभागी है। मध्य क्षेत्रीय परिषद के माध्यम से संवाद और समन्वय का यह मंच छत्तीसगढ़ को और भी आगे ले जाने में सहायक सिद्ध हो रहा है।

रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं मंत्रिमंडल का चिंतन शिविर 2.0 शुरू

रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं मंत्रिमंडल का चिंतन शिविर 2.0 शुरू

आईआईएम रायपुर में दो दिवसीय शिविर का आयोजन
रायपुर, 8 जून 2025

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों का दो दिवसीय चिंतन शिविर 2.0 आज आईआईएम रायपुर में प्रारंभ हो गया है। छत्तीसगढ़ शासन के सुशासन एवं अभिसरण विभाग द्वारा भारतीय प्रबंधन संस्थान, रायपुर (आईआईएम) के सहयोग से दो दिवसीय चिंतन शिविर 2.0 का आयोजन किया गया है।
कार्यक्रम के शुभारंभ के पश्चात आज  ‘परिवर्तनकारी नेतृत्व और दूरदर्शी शासन’, संस्कृति, सुशासन और राष्ट्र निर्माण तथा सक्षमता से सततता तक: विकास के लिए सार्वजनिक वित्त पर पुनर्विचार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सत्र का आयोजित किया जा रहा है। दो दिवसीय शिविर के दौरान भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे, प्रो. हिमांशु राय (डायरेक्टर आईआईएम इंदौर), डॉ. रविंद्र ढोलकिया (आईआईएम अहमदाबाद), श्री संजीव सान्याल (प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद सदस्य), पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक उदय माहुरकर, ग्लोबल डिजिटल स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र प्रताप गुप्ता जैसे ख्यातिप्राप्त विशेषज्ञ विभिन्न सत्रों को संबोधित करेंगे।
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Women’s Asia Cup Hockey 2025: India to open campaign vs Thailand on Sept 5 in China

In Hockey, the schedule for the Women’s Asia Cup 2025 has been announced. The tournament will take place in Hangzhou, China, from the 5th to the 14th of September this year. Indian Women’s Hockey Team will kick off their campaign against Thailand on the 5th of September. The Indian Team has been placed in Pool B, alongside defending champions Japan, Thailand, and Singapore, while Pool A consists of hosts China, Korea, Malaysia, and Chinese Taipei.
Team India, which claimed the Bronze medal in the previous edition, will be eyeing the top podium finish this time. A victory not only brings continental glory but also guarantees a direct qualification to the 2026 Women’s FIH Hockey World Cup, as the Asia Cup champions earn an automatic berth in the prestigious quadrennial event.

रायपुर : छोटे कदम, बड़ी उड़ान: महतारी वंदन योजना से हिन्देश्वरी बनीं सफल उद्यमी

रायपुर, 5 जून 2025

छत्तीसगढ़ सरकार की जनकल्याणकारी महतारी वंदन योजना ने प्रदेश की महिलाओं के जीवन में नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार किया है। इस योजना से लाभान्वित होकर मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले की श्रीमती हिन्देश्वरी इंदु राजे ने अपने कठिन हालात को पीछे छोड़ते हुए आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए हैं।
पूर्व में मितानिन के रूप में सेवा दे चुकीं श्रीमती हिन्देश्वरी को कार्य से विराम लेने के बाद आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन महतारी वंदन योजना के तहत मिलने वाली 1,000 रुपये की मासिक सहायता उनके लिए आशा की किरण बनकर आई। इस राशि को अपनी माता श्रीमती उषा देवी के साथ मिलकर बचाते हुए उन्होंने एक छोटा होटल व्यवसाय शुरू किया। आरंभ में टेबल, कुर्सियाँ और आवश्यक बर्तन खरीदकर होटल की नींव रखी गई। समय के साथ उन्होंने अपने व्यवसाय का विस्तार किया और आज उनका परिवार आर्थिक रूप से मजबूत स्थिति में है।
श्रीमती हिन्देश्वरी ने इस परिवर्तन का श्रेय मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के मार्गदर्शन को देते हुए राज्य सरकार के प्रति आभार प्रकट किया है।
योजना से सशक्त हो रही महिलाएं
10 मार्च 2024 में शुरू की गई महतारी वंदन योजना के माध्यम से अब तक 16 महीनों में 10,433.64 करोड़ रूपए की राशि सीधे प्रदेश की महिलाओं को दी जा चुकी है। 21 से 60 वर्ष की आयु वर्ग की विवाहित, विधवा, तलाकशुदा और परित्यक्ता महिलाओं को यह आर्थिक सहायता नियमित रूप से दी जा रही है।यह योजना केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने की एक सशक्त आधारशिला बन चुकी है। हिन्देश्वरी जैसी अनगिनत महिलाएं इस योजना के ज़रिए अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर रही हैं और पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा बन रही हैं।

रायपुर : राज्यपाल श्री डेका ने मड़वाडीह पहुंच कर ग्रामीणों से किया संवाद

राज्यपाल श्री रमेन डेका ने गरियाबंद जिले के ग्राम पंचायत बिजली के साथ आश्रित गांव मड़वाडीह को गोद लेने की अनूठी पहल की है। इसी के तहत आज श्री डेका मड़वाडीह पहंुचे और ग्रामीणों से मिले। उन्होंने गोद ग्राम पंचायत बिजली के आश्रित गांव मड़वाडीह में जन-सभा को संबोधित किया। राज्यपाल श्री डेका ने गांव के समग्र विकास के लिए आश्वासन दिया।
राज्यपाल ने मड़वाडीह में ”एक पेड़ मां“ के नाम अभियान 2.0 के तहत आम का पौधा रोपित किया और लोगों को वृक्षारोपण के लिए प्रेरित किया। वे रेडक्रॉस के यूथ वालिंटियर के साथ मिले, साथ ही नगर पंचायत राजिम में वृक्षारोपण किया, स्वच्छता दीदियों से मुलाकात की और स्वच्छता अभियान में योगदान के लिए उन्होंने आभार जताया।

रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने प्रदेशवासियों को विश्व पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएं दीं

रायपुर, 4 जून 2025

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने प्रदेशवासियों को विश्व पर्यावरण दिवस की बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। मुख्यमंत्री श्री साय ने पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि हम प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं। उन्होंने कहा कि यह दिन मानव और प्रकृति के बीच प्रेम और सामंजस्य बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा  कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाया गया ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान एक व्यापक जन अभियान बन गया है। वृक्षों को कटने से बचाने के साथ-साथ अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने के लिए लोगों को आगे आना चाहिए और दूसरों को भी वृक्षारोपण के लिए जागरूक करना चाहिए, जिससे हम प्रदूषण रहित, स्वस्थ छत्तीसगढ़ और स्वस्थ भारत के निर्माण में योगदान दे सकें।

रायपुर : समाधान शिविर सरकार की जवाबदेही और जनसेवा का प्रतीक – मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

सरकार का काम केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। जब हम गांव-गांव जाकर समाधान शिविर लगाते हैं, तो यह हमारी जवाबदेही का प्रमाण है। यह कार्य वही सरकार कर सकती है, जो ईमानदारी से जनता के लिए काम करती हो। यह बात मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने आज दुर्ग जिले के धमधा विकासखंड की ग्राम पंचायत मुरमंदा में आयोजित समाधान शिविर को संबोधित करते हुए कही।

मुख्यमंत्री ने कहा कि समाधान शिविर केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की जनसामान्य के प्रति उत्तरदायित्व का जीवंत प्रमाण है। हमारी सरकार ने एक वर्ष पूर्ण होने पर जनता के समक्ष रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत किया था, और अब डेढ़ साल बाद पुनः जनता के बीच अपने कामकाज का रिपोर्ट दे रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सुशासन तिहार के तहत् दुर्ग 19 वां जिला है जहां वे सुशासन शिविर में शामिल होने के लिए पहुंचे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि औचक निरीक्षण और सुशासन शिविर में लोगों से फीडबैक पाकर  इस बात की खुशी होती है कि हमारी सरकार ने डेढ़ सालों में जो काम किया है उसका लाभ जनता को मिल रहा है। मुख्यमंत्री श्री साय ने बताया कि मुरमुंदा शिविर में कुल 2630 आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 2539 मामलों का मौके पर समाधान कर दिया गया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि शिविर में प्राप्त सभी आवेदनों का पूर्ण निराकरण किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि हमारी सरकार हर घर तक बिजली और नल से जल पहुंचाने का काम कर रही है। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना में 18 लाख गरीब परिवारों के हक छीनने का काम किया। गरीबों से उनका घर और छत छीनने का काम करके पूर्ववर्ती सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना का बंटाधार कर दिया था। इसी तरह, नल-जल योजना में भी पिछली सरकार की अनियमितताओं का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि गांव में टंकियां तो बना दी गईं, लेकिन पानी का कोई प्रबंध नहीं था। हमारी सरकार ने इन योजनाओं को सुधारा और धरातल पर लागू किया।

किसान, मजदूर और बुजुर्ग हर वर्ग के लिए योजनाएं

मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी सरकार अपने वादे के अनुसार किसानों से प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी 3100 रूपए की दर से कर रही है, पिछले दो वर्षों का बोनस भी किसानों को दिया गया है। मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना के माध्यम से बुजुर्गों को तीर्थ यात्रा का अवसर मिला है। श्री रामलला अयोध्या धाम दर्शन योजना के तहत 22000 से अधिक लोग अयोध्या दर्शन कर चुके हैं। भूमिहीन कृषि मजदूरों को 10,000 रूपए की वार्षिक सहायता दी जा रही है। स्वामित्व कार्ड का वितरण तेजी से किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने भूमि रजिस्ट्री प्रणाली में सुधार का भी उल्लेख किया और बताया कि अब रजिस्ट्री के साथ ही नामांतरण स्वतः हो जाएगा, लोगों को कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने होंगे। यदि कोई व्यक्ति अपने बेटा-बेटी को ज़मीन देना चाहता है, तो 500 रूपए में दानपत्र देकर कार्य पूरा कर सकता है। मुख्यमंत्री ने बताया कि ग्राम पंचायतों में अटल डिजिटल सेवा केंद्रों की स्थापना की जा रही है। अब तक 1460 ग्राम पंचायतों में यह केंद्र शुरू हो चुके हैं, जहां प्रतिदिन 1 से 1.5 लाख रुपए तक के बैंकिंग ट्रांजैक्शन हो रहे हैं। अगले एक वर्ष में सभी ग्राम पंचायतों तक यह सुविधा पहुंचाने का लक्ष्य है।

शिविर में किया गया सामग्री वितरण

मुख्यमंत्री श्री साय ने समाधान शिविर में प्रधानमंत्री आवास योजना के हितग्राहियों को गृह प्रवेश की चाबियां, मनरेगा श्रमिकों को जॉब कार्ड, पात्र हितग्राहियों को सामाजिक पेंशन, किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड, चेक और एटीएम कार्ड वितरित किए। मुख्यमंत्री श्री साय ने अंत में कहा कि सरकार का कार्य सिर्फ शासन चलाना नहीं, बल्कि जनता की सेवा करना है। जब शासन जनता के द्वार तक आता है, तभी असली सुशासन स्थापित होता है। सुशासन शिविर को उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा, विधायक श्री डोमनलाल कोर्सेवाड़ा ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम में विधायक साजा श्री ईश्वर लाल साहू, पूर्व विधायक श्री प्रेमप्रकाश पांडेय, मुख्य सचिव श्री अमिताभ जैन, मुख्यमंत्री के सचिव श्री पी. दयानंद सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं मुरमुंदा सहित 15 पंचायतों के ग्रामीण जन बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

ऑपरेशन सिंदूर पर पाकिस्तान का कुबूलनामा, PM शहबाज ने माना भारत के हमले में नूरखान एयरबेस समेत कई ठिकाने हुए तबाह

नई दिल्‍ली. कश्‍मीर घाटी में धर्म पूछकर हिन्‍दू पर्यटकों का नरसंहार करने की घटना ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था. आतंकियों की ओर से किए गए इस बर्बर हमले से पूरा देश उबल पड़ा. हर तरफ से बदला लेने की आवाज उठने लगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कर दिया था कि इस कायराना हरकत करने वाले और उनको बचाने वालों को मिट्टी में मिला दिया जाएगा. इंडियन आर्म्‍ड फोर्सेज को आतंकवादियों और दुश्‍मनों को जवाब देने की खुली छूट दे दी गई. इसके बाद भारतीय सुरक्षाबलों ने ऑपरेशन सिंदूर लॉन्‍च किया. पाकिस्‍तान में मौजूद आतंकी शिविरों को निशाना बनाते हुए उन्‍हें तबाह कर दिया. आतंकियों का आका पाकिस्‍तान इससे बौखला गया और भारत पर ड्रोन और मिसाइल से हमला करना शुरू कर दिया, जिन्‍हें बेअसर कर दिया गया. इसके बाद इंडिया ने जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्‍तान के 11 एयरबेस को तबाह कर दिया. इनमें नूर खान एयरबेस भी शामिल है, जिसके पास ही पाकिस्‍तान का न्‍यूक्लियर वेपन रखा गया है. इससे पाकिस्‍तान के पसीने छूट गया. भारत ने ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल से स्‍ट्राइक करते हुए आतंकियों के आका को घुटनों पर ला दिया. अब ब्रह्मोस मिसाइल के इस्‍तेमाल पर एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है.

क्‍या आपको पता है कि ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत ने पाकिस्‍तानी सरजमीं पर कितनी ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलें पटकीं? सूत्रों के हवाले से बड़ी खबर सामने आई है. ब्रह्मोस मिसाइल की प्रचंडता को देखकर पाकिस्‍तान का मनोबल भरभरा कर गिर गया और वह सीजफायर के लिए गिड़गिड़ाने लगा. भारत अपनी शर्तों पर सीजफायर के लिए तैयार हुआ. भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत अभी तक पाकिस्‍तान पर 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी हैं. ब्रह्मोस मिसाइल की गिनती दुनिया के घातक मिसाइलों में होती है. पाकिस्‍तान ने इसके अचूक निशाने वाले प्रहार और प्रचंडता का अनुभव किया है. यही वजह है कि पड़ोसी देश दुनिया की शरण में चला गया और उनसे भारत को मनाने की गुहार लगाने लगा. इसके बाद भारत सीजफायर के लिए सहमत हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्‍ट्र के नाम अपने संबोधन में स्‍पष्‍ट तौर पर कह दिया कि भारत में किसी भी तरह के आतंकी हमले अब एक्‍ट ऑफ वॉर (युद्ध की घोषणा) माना जाएगा.

ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल का दुनियाभर में डंका, पाकिस्‍तान पर प्रचंड प्रहार से बढ़ा रुतबा, 17 देश खरीदने को पागल

इसलिए खास है ब्रह्मोस मिसाइल

  1. सुपरसोनिक स्‍पीड: ब्रह्मोस मिसाइल की गति मैक 2.8 से मैक 3 (3430 किमी/घंटा तक) तक होती है, जो इसे दुनिया की सबसे तेज़ क्रूज मिसाइलों में से एक बनाती है.
  2. मल्टी-प्लेटफॉर्म कैपेबिलिटी: ब्रह्मोस मिसाइल को थल (भूमि), जल (नौसेना) और वायु (वायुसेना) तीनों माध्यमों से दागा जा सकता है. इसे युद्धपोतों, पनडुब्बियों, ट्रकों और लड़ाकू विमानों (जैसे कि सुखोई-30MKI) से लॉन्च किया जा सकता है.
  3. हाई एक्‍यूरेसी: ब्रह्मोस की सटीकता बहुत अधिक है. इसकी CEP (Circular Error Probability) केवल 1 मीटर के आसपास है, यानी यह अपने लक्ष्य के लगभग बिल्कुल सटीक केंद्र पर वार करती है.
  4. वॉरहेड कैपेसिटी: ब्रह्मोस मिसाइल लगभग 200 से 300 किलोग्राम तक का पारंपरिक (conventional) या सेमी आर्मर (semi-armor piercing) वॉरहेड ले जा सकती है.
  5. स्टील्थ तकनीक: इसमें लो-रेडार सिग्नेचर टेक्नोलॉजी है, जिससे यह दुश्मन की रडार निगरानी से बच निकलती है.
  6. आधुनिक गाइडेंस सिस्टम: ब्रह्मोस में अत्याधुनिक INS (Inertial Navigation System) और GPS/GLONASS गाइडिंग सिस्‍टम है, जो इसे चलते-फिरते लक्ष्यों पर भी हमला करने में सक्षम बनाती है.
  7. रेंज: पहले इसकी रेंज लगभग 290 किमी थी, लेकिन MTCR (Missile Technology Control Regime) में भारत की सदस्यता के बाद इसकी रेंज 450 किमी से बढ़ाकर अब 800 किमी तक की जा रही है.
  8. फायर एंड फॉरगेट सिस्‍टम: लॉन्च के बाद मिसाइल को नियंत्रित करने की जरूरत नहीं होती है. यह खुद ही लक्ष्य को खोजकर हमला करती है.

पाकिस्‍तान के 11 एयरबेस तबाह

बता दें कि भारत ने पाकिस्‍तान में मौजूद आतंकी शिविरों को निशाना बनाया था, लेकिन पाकिस्‍तान ने इंडियन एयरबेस को टारगेट बनाना शुरू कर दिया. इसके बाद भारत ने भी जवाबी कार्रवाई करनी शुरू कर दी. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान पर 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागीं गईं थीं. सूत्रों का दावा है कि पाकिस्तान के 11 एयरबेस को निशाना बनाया गया था. IAF ने ब्रह्मोस और स्कैल्प मिसाइलें दागीं थीं. भारत ने पाकिस्तान पर 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागी थीं. ऑपरेशन‍ सिंदूर के तहत इसे अंजाम दिया गया था.

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Manish Kumar

बिहार, उत्‍तर प्रदेश और दिल्‍ली से प्रारंभिक के साथ उच्‍च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्‍ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्‍लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें

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New Delhi,Delhi

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May 16, 2025, 12:59 IST

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भारत ने कितने ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल से पाकिस्तान में मचाई तबाही?

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3. ऑपरेशन सिंदूर के बारे दुनिया को ब्रीफ करेंगे भारतीय सांसद; थरूर-ओवैसी रह सकते हैं शामिल

ऑपरेशन सिंदूर पर भारत के सांसद दुनिया को ब्रीफ करेंगे। केंद्र सरकार सभी दलों के चुनिंदा सांसदों को 22 या 23 मई से 10 दिन के विदेश दौरे पर भेज रही है। ये सांसद अमेरिका, UK, दक्षिण अफ्रीका, कतर और UAE जाएंगे। इनमें BJP से अनुराग ठाकुर और अपराजिता सारंगी, कांग्रेस से शशि थरूर, मनीष तिवारी, सलमान खुर्शीद और AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी हो सकते हैं।

सांसदों को विदेश यात्रा के लिए तैयार रहने को कहा: विदेश मंत्रालय (MEA) सांसदों को डिप्लोमेटिक मिशन के लिए रवाना होने से पहले जानकारी देगा। डेलिगेशन में 5-6 सांसदों के 8 ग्रुप्स होंगे। सांसदों के साथ विदेश मंत्रालय (MEA) का एक अधिकारी और एक सरकारी प्रतिनिधि भी जाएंगे। सांसदों को निमंत्रण भेजा जा चुका है। उन्हें अपना पासपोर्ट और ट्रैवल से जुड़ी जरूरी डॉक्यूमेंट्स तैयार रखने की सलाह दी गई है।

नक्सल मुक्त अभियान, कर्रेगुटा ऑपरेशन

250 बंकर, हॉस्पिटल, हथियारों की फैक्ट्री सब तबाह

21 दिन के ऑपरेशन के दौरान कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर 31 माओवादी मारे गए छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में तेलंगाना सीमा पर स्थित कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर करीब इक्कीस दिनों तक चले माओवादी विरोधी अभियान में 16 महिला माओवादियों समेत 31 माओवादी मारे गए हैं।
शीर्ष अधिकारियों का कहना है कि यह अभियान छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर करेगुट्टा पहाड़ी के आसपास ‘बहुत कठिन, पहाड़ी इलाके’ में चलाया गया; माओवादी नेतृत्व पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया है और उनकी सैन्य संरचना बिखर गई है।
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और छत्तीसगढ़ पुलिस के शीर्ष अधिकारियों ने बुधवार (14 मई, 2025) को कहा कि छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर करेगुट्टालू पहाड़ी पर हाल ही में संपन्न 21 दिवसीय नक्सल विरोधी अभियान ने माओवादियों के शीर्ष नेतृत्व को “विस्थापित” करने के अपने मुख्य उद्देश्य को पूरा कर लिया है, जो एक स्थान पर एकत्र हुए थे।

अधिकारियों ने कहा कि यह अभियान 21 अप्रैल से 11 मई तक करेगुट्टा पहाड़ी के आसपास के इलाकों में चलाया गया, जो “लगभग 60 किलोमीटर लंबा और 5-20 किलोमीटर चौड़ा एक बहुत ही कठिन, पहाड़ी इलाका है”। पुलिस के अनुसार, अभियान के तहत 21 मुठभेड़ें हुईं, जिसमें बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया और कम से कम 31 वर्दीधारी माओवादियों की मौत हो गई, जिनमें 16 महिलाएं शामिल थीं।

प्रारंभिक जांच से पता चला है कि मृतक प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) समूह के सदस्य थे, और पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) बटालियन नंबर 1, उनके सबसे मजबूत सैन्य गठन, तेलंगाना राज्य समिति और दंडकारण्य विशेष क्षेत्रीय समिति का हिस्सा थे, पुलिस ने दावा किया।

3. ऑपरेशन सिंदूर के बारे दुनिया को ब्रीफ करेंगे भारतीय सांसद; थरूर-ओवैसी रह सकते हैं शामिल

ऑपरेशन सिंदूर पर भारत के सांसद दुनिया को ब्रीफ करेंगे। केंद्र सरकार सभी दलों के चुनिंदा सांसदों को 22 या 23 मई से 10 दिन के विदेश दौरे पर भेज रही है। ये सांसद अमेरिका, UK, दक्षिण अफ्रीका, कतर और UAE जाएंगे। इनमें BJP से अनुराग ठाकुर और अपराजिता सारंगी, कांग्रेस से शशि थरूर, मनीष तिवारी, सलमान खुर्शीद और AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी हो सकते हैं।

सांसदों को विदेश यात्रा के लिए तैयार रहने को कहा: विदेश मंत्रालय (MEA) सांसदों को डिप्लोमेटिक मिशन के लिए रवाना होने से पहले जानकारी देगा। डेलिगेशन में 5-6 सांसदों के 8 ग्रुप्स होंगे। सांसदों के साथ विदेश मंत्रालय (MEA) का एक अधिकारी और एक सरकारी प्रतिनिधि भी जाएंगे। सांसदों को निमंत्रण भेजा जा चुका है। उन्हें अपना पासपोर्ट और ट्रैवल से जुड़ी जरूरी डॉक्यूमेंट्स तैयार रखने की सलाह दी गई है।