
पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा IKS में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के द्वारा संस्कृत भाषा में एक सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स शुरू किया गया है l इसी समबन्ध में प्रमाण पत्रीय पाठ्यक्रम का उद्घाटन एवं दीक्षारंभ कार्यक्रम का आयोजन हुआ l
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० साच्चिदानन्द शुक्ला , तथा कार्य परिषद के वरिष्ठ सदस्य एवं विप्र महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ० मेघेश तिवारी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।समारोह में मुख्य वक्ता श्री दुधाधारी महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ० प्रवीण कुमार झारी थे।
कुलपति प्रो० साच्चिदानन्द शुक्लान कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक विरासत की मूलधारा है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल भारत की लगभग सभी महान ग्रंथ— वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत, रामायण, पुराण, आयुर्वेद, योग, ज्योतिष, वास्तु, दर्शनशास्त्र—सब संस्कृत में हैं। इन ग्रंथों की सही समझ केवल संस्कृत के माध्यम से ही संभव है। संस्कृत विज्ञान और गणित की प्राचीन तथा उन्नत भाषा है l संस्कृत में वैज्ञानिक भाषा की सबसे बड़ी विशेषता है: स्पष्टता (Precision) , बिना भ्रम के अभिव्यक्ति, कंप्यूटर-फ्रेंडली संरचना l NASA और कई विश्व के भाषाविदों ने इसे सबसे लॉजिकल और स्ट्रक्चर्ड लैंग्वेज माना है। संस्कृत भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत 80% से अधिक भारतीय भाषाओं की आधारभूत भाषा है।
यदि संस्कृत मजबूत होगी, तो हिन्दी, मराठी, बंगाली, उड़िया, कन्नड़, सभी भाषाएं समृद्ध होंगी। यह योग व आयुर्वेद की प्रामाणिक भाषा है l आज पूरी दुनिया योग और आयुर्वेद अपना रही है, पर उनकी असली व्याख्या और सूत्र संस्कृत में ही हैं।
उदाहरण: पतंजलि योगसूत्र, चरक-संहिता, सुश्रुत-संहिता आदि l संस्कृत भाषाई कौशल को बढ़ाती है संस्कृत सीखने से: तर्कशक्ति विकसित होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है, उच्चारण सुधरता है, व्याकरण और भाषा-ज्ञान में गहराई आती हैl संस्कृत राष्ट्र की एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है l भारत विविध भाषाओं वाला देश है। संस्कृत एक ऐसी भाषा है जो सभी क्षेत्रों को कुल-धर्म भाषा (Pan-Indian Language) की तरह जोड़ सकती हैl आज दुनिया भर में संस्कृत के
- विश्वविद्यालय,
- शोध केंद्र,
- डिजिटल प्रोजेक्ट
- भाषावैज्ञानिक अध्ययन
तेजी से बढ़ रहे हैं। जिससे विश्व में संस्कृत भाषा की प्रतिष्ठा बढ़ रही है l
यह इसकी वैश्विक महत्ता को प्रमाणित करता है l संस्कृत भारत की पहचान, बौद्धिक शक्ति, सांस्कृतिक मूल, वैज्ञानिक दृष्टि और आत्मगौरव की भाषा है। इसे अपनाना भारत की आत्मा को अपनाना है l
प्रो. ब्रम्हे ने बताया कि कार्यक्रम में 100 से अधिक विद्यार्थि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन केंन्द्र की शिक्षिका निशा मिश्रा ने किया। डॉ. मेघेश तिवारी ने छात्रों के लिए संस्निकृत के नियमित अध्ययन के साथ संस्कृत में प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम को उपयोगी बताया। विवि० के कुलअनुषासक प्रो. आशीष कुमार श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापित कर कार्यक्रम का समापन किया।
