25 जून 2025 मानवाधिकार
सीरिया के इदलिब की एक युवती सिला की उम्र उस समय तीन साल थी जब एक दिन सुबह उनकी नीन्द मिसाइलों के हमलों के भयावह शोर में खुली. ये मिसाइल हमले सिला के घर के आसपास हो रहे थे, जिनके कारण सिला और उनके परिवार को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों के लिए भागना पड़ा.
सिला ने बुधवार को सीरिया से वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए सुरक्षा परिषद को बताया, “उस दिन के बाद से, हमारा घर एक ‘यात्रा बैग’ बन गया और वो विस्थापन हमारा रास्ता बन गया… मेरा बचपन भय और चिन्ता से भरा था और मैं अपने प्रियजन से वंचित थी.”
सिला की उम्र अब 17 वर्ष हो चुकी है. उन्होंने सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान अपने अनुभव बुधवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक में साझा किए. यह बैठक बच्चों और सशस्त्र संघर्ष पर महासचिव की नवीनतम रिपोर्ट के निष्कर्षों पर चर्चा करने के लिए आयोजित की गई.
रिपोर्ट में 2024 में बच्चों के ख़िलाफ़ मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघनों में 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो इसके 20 साल के इतिहास में अब तक दर्ज की गई सबसे बड़ी संख्या है.
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) में बाल संरक्षण की निदेशक शीमा सेन गुप्ता ने सुरक्षा परिषद में कहा, “महासचिव की इस वर्ष की रिपोर्ट एक बार फिर इस बात की पुष्टि करती है और जिसे बहुत से बच्चे पहले से ही जानते हैं – कि दुनिया उन्हें युद्ध की भयावहता से बचाने में विफल हो रही है.”
“दुनिया भर के हर देश में बच्चों के ख़िलाफ़ हर मानवाधिकार उल्लंघन, एक नैतिक विफलता का मामला है.”
नुक़सान का असल दायरा
सुरक्षा परिषद में प्रस्तुत की जाने वाली यह रिपोर्ट, युद्ध से प्रभावित बच्चों के ख़िलाफ़ मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघनों का रिकॉर्ड दर्ज करने के लिए, हर साल प्रकाशित की जाती है.
यह रिपोर्ट पूरी तरह से संयुक्त राष्ट्र द्वारा संकलित और सत्यापित डेटा पर निर्भर होती है. इसका अर्थ है कि वास्तविक संख्या, दर्ज आँकड़ों से कहीं अधिक होने की सम्भावना है.
2024 में, रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्लंघन के रिकॉर्ड 41 हज़ार 370 मामले दर्ज किए गए – जिनमें हत्या और अपंगता, बलात्कार, अपहरण और बच्चों का समर्थन करने वाले स्कूलों जैसे बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया जाना शामिल है.
यह रिपोर्ट, बच्चों व सशस्त्र टकराव के लिए विशेष प्रतिनिधि वर्जीनिया गाम्बा के कार्यालय ने तैयार की है. वर्जीनिया गाम्बा का कहना था, “इन हमलों से पीड़ित प्रत्येक बच्चा अपने साथ एक कहानी, एक छीना हुआ जीवन, एक टूटा हुआ सपना, एक ऐसा भविष्य लेकर चलता है जो बेमतलब हिंसा और लम्बे टकराव से धूमिल हो गया है.”
रिपोर्ट कहती है कि वैसे तो इनमें से कई मानवाधिकार उल्लंघन, संघर्ष व टकराव के दौरान हुए, ख़ासतौर पर जब शहरी युद्ध बढ़ रहा है, मगर गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघन, टकराव समाप्त होने के बाद भी जारी रह सकते हैं.
ये मानवाधिकार उल्लंघन अब भी ज़मीन पर बिखरे पड़े बिना फटे विस्फोटकों के रूप में क़ायम हैं.
सीमा सेन गुप्ता ने कहा, “किसी भी खेत, स्कूल के प्रांगण या गली में छोड़ा गया प्रत्येक अप्रयुक्त आयुध, मौत की एक सज़ा की तरह हैं, जो बच्चों को किसी भी क्षण अपनी चपेट में ले सकती है.”
और ये हालात, आघात और चोटों के रूप में बरक़रार हैं जो जीवन भर बच्चे को कभी भी, पूरी तरह से नहीं छोड़ते हैं.
घाव जो कभी नहीं भरते
जो बच्चे, गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघनों से बच भी जाते हैं, तो भी वो गहरी चोट से नहीं बच पाते हैं, अगर वे हिंसा के शिकार हुए होते हैं, तो उसके घाव, जीवन भर उनके साथ रहते हैं.
और अगर वे घायल नहीं भी हुए, तो भी उनकी ज़िन्दगी में सदमा बना रहता है.
वर्जीनिया गाम्बा ने कहा, “जीवित बचे लोगों के लिए शारीरिक और मनोवैज्ञानिक घाव जीवन भर बने रहते हैं, जो परिवारों, समुदायों और समाज के मूल ढाँचे को प्रभावित करते हैं.”
यही कारण है कि यूनीसेफ़ और उसके साझीदारों ने मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघनों के शिकार बच्चों के लिए, पुनर्मिलन कार्यक्रम और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करने के लिए काम किया है.
सिला ने कहा कि उनके बचपन का सदमा अब भी उनके साथ है, और इसने उन्हें अशान्ति में बच्चों के लिए एक पैरोकार बनने के लिए प्रेरित किया है.
सिला ने कहा, “उस पल के बाद, मेरे जीवन में कुछ भी सामान्य नहीं लगता. मुझे किसी भी ऐसी आवाज़ से डर लगने लगा है जो विमान, अन्धेरे और यहाँ तक कि मौन से भी मिलती-जुलती हो.”
‘उन्हें निराशा से निकालें’
वर्जीनिया गाम्बा ने रिपोर्ट में पेश किए गए चिन्ताजनक रुझानों को उलटने के लिए, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से “अटूट निन्दा और तत्काल कार्रवाई” का आहवान किया.
उन्होंने कहा, “हम उस अन्धकार युग में वापस नहीं जा सकते, जहाँ बच्चे सशस्त्र टकराव के अदृश्य और बेआवाज़ पीड़ित थे… कृपया उन्हें निराशा की छाया में वापस नहीं जाने दें.”