प्रशिक्षु आईएफएस अधिकारियों को मिला डीज़ीपीएस सर्वे एवं वन्यजीव प्रबंधन का व्यवहारिक प्रशिक्षण

बारनवापारा में प्रशिक्षु भारतीय वन सेवा अधिकारियों को दिया गया प्रशिक्षण

बारनवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य में प्रशिक्षु भारतीय वन सेवा अधिकारियों के लिए एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन गत दिवस किया गया। प्रशिक्षु अधिकारियों को आधुनिक तकनीकों, आईटी आधारित वन प्रबंधन तथा वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से जानकारी प्रदान की गई। इस प्रशिक्षण से भावी वन सेवा के अधिकारियों ने क्षेत्रीय स्तर पर उपयोग में आने वाली तकनीक एवं प्रबंधन प्रक्रियाओं से व्यावहारिक रूप से परिचित हुए।
     वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप ने अखिल भारतीय वन सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों से कहा कि आप सभी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर अपनी कौशल को विकसित करें और छत्तीसगढ की वन संपदा की सुरक्षा और संरक्षण के लिए सतत कार्य करे l उन्होंने सभी प्रशिक्षु अधिकारी को अपनी शुभकामनाएं दीं l
प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एवं क्षेत्रीय निदेशक सुश्री स्तोविषा समझदार ने डीज़ीपीएस की कार्यप्रणाली, उसकी उपयोगिता तथा वन सर्वेक्षण, सीमांकन एवं प्रबंधन में इसके महत्व के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि डीज़ीपीएस आधारित सर्वेक्षण से वन क्षेत्रों में सटीक डेटा संग्रह संभव होता है जो दीर्घकालिक संरक्षण योजनाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। इसी क्रम में उप-निदेशक, उदंती–सीतानदी टाइगर रिजर्व वरुण जैन ने “गज संकेत” मोबाइल एप्लिकेशन के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह एप हाथी मॉनिटरिंग, मूवमेंट ट्रैकिंग, मानव–हाथी संघर्ष प्रबंधन तथा त्वरित सूचना साझा करने में एक प्रभावी डिजिटल टूल के रूप में कार्य करता है। प्रशिक्षु अधिकारियों को एप के फील्ड उपयोग, डेटा एंट्री एवं प्रबंधन से संबंधित व्यावहारिक पहलुओं से भी अवगत कराया गया।
        इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन पर वनमण्डलाधिकारी बलौदाबाजार धम्मशील गणवीर ने कहा कि इस प्रकार के तकनीकी एवं फील्ड आधारित प्रशिक्षण भावी वन सेवा के अधिकारियों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक, डिजिटल टूल्स एवं वैज्ञानिक प्रबंधन पद्धतियों के माध्यम से वन एवं वन्यजीव संरक्षण को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है तथा ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम अधिकारियों को जमीनी स्तर पर बेहतर निर्णय लेने में सहायक सिद्ध होंगे।
         अधीक्षक बारनवापारा अभ्यारण्य कृषानू चन्द्राकार ने प्रशिक्षु अधिकारियों को बारनवापारा अभ्यारण्य की भौगोलिक, पारिस्थितिक एवं संरक्षण संबंधी विशेषताओं की जानकारी दी । इसके साथ ही अधिकारियों को अभ्यारण्य में संचालित वनभैंसा संरक्षण केंद्र, ब्लैकबक रिलोकेशन एवं संरक्षण केंद्र, ग्रासलैंड विकास क्षेत्रों सहित अन्य महत्वपूर्ण स्थलों का भ्रमण कराया जिससे उन्हें संरक्षण कार्यों को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिला।

बस्तर की धरती के सेवाव्रती डॉ. रामचंद्र और सुनीता ताई गोडबोले

छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल अपनी सघन वनराशि, विशिष्ट जनजातीय संस्कृति और प्रकृति से आत्मीय संबंध के लिए जाना जाता है। किंतु बीते कई दशकों से यह क्षेत्र नक्सल हिंसा, सशस्त्र संघर्ष, भय और अविश्वास के वातावरण से भी जूझता रहा है। ऐसे कठिन हालात में यदि कोई व्यक्ति अपना संपूर्ण जीवन निःस्वार्थ भाव से जनजाति समाज की सेवा में अर्पित कर दे, तो वह केवल चिकित्सक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संवाहक बन जाता है। ऐसे ही प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी सहधर्मचारिणी सुनीता ताई – जिन्होंने बस्तर को ही अपना कर्मक्षेत्र और घर बना लिया।

महाराष्ट्र के सतारा जिले में जन्मे डॉ. गोडबोले ने आयुर्वेदिक चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। लगभग 18–19 वर्ष की आयु में अल्बर्ट श्वाइत्ज़र के जीवन पर आधारित एक पुस्तक पढ़ी, जिसने उनके सोचने की दिशा ही बदल दी। युवावस्था में ही उनके मन में समाज सेवा का बीज अंकुरित हो गया था। डॉ. गोडबोले ने तय कर लिया कि चिकित्सा उनके लिए आजीविका नहीं, बल्कि साधना होगी।

पढ़ाई पूरी करने के बाद वे वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े और नासिक जिले के कनाशी स्थान पर निवास करने वाले भील जनजाति समाज के बीच स्वास्थ्य सेवा का कार्य प्रारंभ किया। कुछ वर्षों बाद, मात्र 28 वर्ष की आयु में, उन्हें छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बारसूर गांव भेजा गया, जहां एक स्वास्थ्य केंद्र लंबे समय से बंद पड़ा था। यही स्थान उनकी स्थायी कर्मभूमि बन गया।

कल्याण आश्रम ने उन्हें अकेले न जाने की सलाह दी और पहले विवाह करने का सुझाव दिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात पुणे की सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता पुराणिक से हुई, जो महिला सशक्तिकरण और साक्षरता अभियानों में सक्रिय थीं। सुनीता ताई भी वनवासी कल्याण आश्रम के रायगढ़ जिले में स्थित जांभिवली केंद्र पर कार्य कर रही थी। दोनों के विचार और सेवा-भावना में समानता थी। विवाह के मात्र दो सप्ताह बाद ही दोनों सुदूर क्षेत्र बस्तर पहुंच गए और जनजाति समाज के साथ जीवन को आत्मसात कर लिया।

आज डॉ. गोडबोले और उनकी पत्नी बारसूर गांव में एक साधारण दो-कमरे के मकान में रहते हैं – ईंट की दीवारें, टीन की छत और चारों ओर फैला घना जंगल। उनके घर से कुछ दूरी पर खड़ी एम्बुलेंस उनकी सेवा-प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

डॉ. गोडबोले कहते हैं, – “यहां के लोगों के पास दवाइयों के पैसे भी मुश्किल से होते हैं, परिवहन की व्यवस्था तो लगभग नहीं के बराबर है। इसलिए यह जिम्मेदारी हमें स्वयं उठानी पड़ी।”

शुरुआती वर्षों में जनजाति समाज में आधुनिक चिकित्सा के प्रति गहरा संदेह था। बीमार होने पर पहले मांत्रिकों और ओझा-गुनियों से उपचार कराया जाता था। जब वे असफल होते, तब डॉक्टर को बुलाया जाता। वह भी सीधे क्लिनिक आने की परंपरा नहीं थी – जंगल में आग जलाकर धुआं किया जाता, ताकि डॉक्टर उस संकेत को देखकर मरीज तक पहुंचे। बाहरी दुनिया का भय इतना गहरा था कि एक बार डॉ. गोडबोले एक मरीज को इलाज के लिए जगदलपुर ले गए, तो वह फिर कभी गांव नहीं लौटा। बाद में पता चला कि शहर उनके लिए किसी अनजान देश जैसा था – भाषा, कागजी प्रक्रिया और पैसों की कमी उन्हें डरा देती थी।

इन्हीं अनुभवों से डॉ. गोडबोले निष्कर्ष पर पहुंचे कि स्वास्थ्य सेवा गांव में ही, सरल और न्यूनतम खर्च पर उपलब्ध कराना ही एकमात्र व्यवहारिक समाधान है। उन्होंने स्थानीय हलबी भाषा सीखी, लोगों के साथ समय बिताया और धैर्यपूर्वक विश्वास अर्जित किया। धीरे-धीरे उनके क्लिनिक में नियमित मरीज आने लगे। इसी दौरान सुनीता गोडबोले ने जनजाति महिलाओं का एक समूह गठित किया, जो महुआ, इमली, कच्चे आम जैसे वनोपज को उचित मूल्य पर बेचने में सहायक बना।

 राष्ट्रपति भवन में छत्तीसगढ़ की झांकी कलाकारों का सम्मान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सराही जनजातीय कला, कलाकार हुए भावविभोर

गणतंत्र दिवस के अवसर पर कर्तव्य पथ पर छत्तीसगढ़ की झांकी में शामिल कलाकारों को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात का गौरव प्राप्त हुआ। राष्ट्रपति से स्नेहपूर्ण मुलाकात के दौरान कलाकार भावविभोर और अभिभूत नजर आए।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने छत्तीसगढ़ की झांकी की प्रशंसा करते हुए कहा कि झांकी के माध्यम से देश की समृद्ध जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रभावशाली प्रदर्शन हुआ है। उन्होंने कलाकारों के समर्पण, मेहनत और जीवंत प्रस्तुति की सराहना करते हुए छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया भी कहा।

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले से आए जनजातीय कलाकारों ने गणतंत्र दिवस परेड के दौरान छत्तीसगढ़ की झांकी के साथ पारंपरिक मंदार नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति दी थी, जिसने कर्तव्य पथ पर मौजूद दर्शकों के साथ-साथ देश-दुनिया का ध्यान आकर्षित किया।

कलाकारों ने राष्ट्रपति से मुलाकात को अपने जीवन का अविस्मरणीय क्षण बताते हुए कहा कि यह सम्मान उन्हें अपनी कला, संस्कृति और परंपराओं को और अधिक निष्ठा के साथ आगे बढ़ाने की नई प्रेरणा देगा।

राष्ट्रपति से मुलाकात करने वालों में टीम लीडर तेज बहादुर भुवाल के नेतृत्व में नारायणपुर जिले के ग्राम नयनार से आए 13 सदस्यीय दल में जेनू राम सलाम, लच्छू राम, जैतू राम सलाम, राजीम सलाम, दिनेश करंगा, जयनाथ सलाम, मानसिंग करंगा, चन्द्रशेखर पोटाई, धनश्याम सलाम, जगनाथ सलाम, सुरेश सलाम तथा घोड़लापारा, ग्राम नयनार निवासी दिलीप गोटा शामिल रहे।

उल्लेखनीय है कि बस्तर अंचल की इस पारंपरिक कला टोली ने अपनी लोक-संस्कृति और नृत्य शैली से राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ की विशिष्ट पहचान को सशक्त रूप से प्रस्तुत किया।

संघ शताब्दी – राष्ट्रीय संकट के समय दिया एकजुटता का संदेश

1962 के भारत-चीन युद्ध को हम आज भी भूल नहीं पाते हैं। चीन ने भारत के विश्वास का कत्ल किया था। ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के नारे को धुंए में उड़ाकर चीन की कम्युनिस्ट सत्ता ने भारत पर अप्रत्याशित युद्ध थोप दिया था। हमारी सेना ने यथासंभव प्रतिकार किया। चीन को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया। भारतीय सेना के शौर्य को देखकर चीन को अपने कदम रोकने पड़े। हालांकि, इस युद्ध में हमने बहुत कुछ खो दिया था। राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी चीन के साथ खड़ी थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण संदेश दिया। संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिक अनुशासन, प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सहयोग, घायल जवानों के प्राणों की रक्षा के लिए रक्त की आपूर्ति, युद्ध क्षेत्र में सैन्य रसद पहुँचाने में सहयोग एवं हवाई पट्टियों की सुरक्षा सहित कई महत्वपूर्ण कार्यों में आगे बढ़कर सहयोग किया। संकट के समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति को देखकर संघ के विरोधी रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का हृदय भी परिवर्तित हो गया। यही कारण रहा कि सरकार ने 26 जनवरी, 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए अन्य नागरिक संगठनों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समविचारी संगठन भारतीय मजदूर संघ को भी राजपथ पर आमंत्रित किया। स्वयंसेवकों ने राष्ट्रीय एकजुटता के लिए अपने कर्तव्यों के निर्वहन का संदेश दिया।

राजपथ (अब कर्तव्य पथ) 26 जनवरी, 1963 की राष्ट्रीय परेड कई कारणों से महत्वपूर्ण है। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद देश का मनोबल डगमगाया हुआ था। ऐसे समय में राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन आवश्यक था। प्रश्न यह था कि जब भारतीय सेना सहित अन्य सुरक्षा बल भी सीमारेखा पर हैं, तब राष्ट्रीय परेड किस प्रकार सम्पन्न की जाए। सुरक्षा कारणों से सेना को वापस भी नहीं बुलाया जा सकता था और राष्ट्रीय परेड की परंपरा को भी नहीं तोड़ सकते थे। तब विचार आया कि उन नागरिक संगठनों को परेड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाए, जिन्होंने इस संकट की घड़ी में देश को संभालने में अपना योगदान दिया है। लोकसभा में 31 मार्च 1998 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह तथ्य सबके सामने रखा कि ऐसी परिस्थिति में किसी ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को सुझाव दिया कि इस बार परेड में ‘जनता का मार्च’ होना चाहिए। दिल्ली नगर निगम के महापौर द्वारा स्थापित ‘सर्वदलीय नागरिक परिषद’ ने विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, जिसे संघ के स्थानीय अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया। सरकार के आमंत्रण पर, केवल दो दिन की तैयारी में संघ के लगभग 3000 स्वयंसेवक राजपथ पर कदम से कदम मिलाकर संचलन कर रहे थे, जिसमें लगभग 100 स्वयंसेवकों का घोष दल भी शामिल था। अगले दिन समाचार पत्रों में स्वयंसेवकों की तस्वीरें भी प्रकाशित हुईं और संवाददाताओं ने यह भी संकेत दिया कि जनता के बीच सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र स्वयंसेवकों का अनुशासित दल ही था। दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ ने परेड की जो तस्वीरें प्रकाशित की, उसमें स्वयंसेवकों के संचलन की तस्वीर भी शामिल थी। हिन्दुस्तान में प्रकाशित समाचार में लिखा गया कि “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों का प्रदर्शन बहुत आकर्षक रहा”। इसी प्रकार, द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक समाचार में उल्लेख किया गया है कि संघ के अनुषांगिक संगठन ‘भारतीय मजदूर संघ’ ने भी परेड में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।

कुछ वर्षों तक कम्युनिस्ट एवं कांग्रेस समर्थित लेखकों/पत्रकारों ने 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के शामिल होने को सिरे से खारिज किया। लेकिन, जब उस समय के समाचारपत्रों में प्रकाशित चित्र, समाचार और सिलेक्टिव वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू में प्रकाशित सामग्री सामने आई, तब नए प्रकार के कुतर्क गढ़े जा रहे हैं। इस सबके बीच निर्विवाद सच यही है कि संकट के समय में संघ ने अपने कर्तव्यों का पालन किया और राष्ट्रीय परेड में हिस्सा लेकर राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। संघ विरोधी खेमे में यह खलबली उस समय भी थी, जब यह जानकारी सामने आई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय परेड में शामिल हो रहा है। दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ ने 25 जनवरी, 1963 को “रा. स्व. संघ भी परेड में भाग लेगा” शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया। कई लोगों ने संघ के स्वयंसेवकों को रोकने के लिए भरसक प्रयास किए, लेकिन उनको सफलता नहीं मिली।

जनवरी को कांग्रेस की एक बैठक में इस विषय में काफी चर्चा हुई। इसका विवरण सिलेक्टिव वर्क ऑफ जवाहरलाल नेहरू में प्रकाशित है। बैठक में पंडित नेहरू ने बताया था कि “कुछ कांग्रेसियों ने उनसे शिकायत की थी कि संघ वाले गाजियाबाद और मेरठ से वर्दीधारी लोग (स्वयंसेवक) जमा कर रहे हैं”। कांग्रेस के नेताओं ने पंडित के सामने यह दु:ख भी जाहिर किया कि हमारे पास इतनी वर्दी नहीं है। कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ता भी परेड में दिखायी नहीं दिए। तब प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उन लोगों को स्पष्ट कहा कि “मैं तो नहीं रोक सकता आरएसएस को आने से, (किसी को भी आने से रोकना) बहुत गलत बात है”। इसका अर्थ है कि सब प्रकार से जानकारी होने और कांग्रेसियों का विरोध होने के बाद भी नेहरू जी ने संघ को राष्ट्रीय परेड में शामिल होने दिया।

स्मरण रहे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1962 के युद्ध के समय ही नहीं, बल्कि उसके बाद हुए युद्धों में भी भारत सरकार के साथ खड़े रहकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी संघ ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था, रणनीतिक ठिकानों की पहरेदारी, सैनिकों के लिए भोजन एवं रसद की आपूर्ति, नागरिक सुरक्षा एवं अनुशासन का पालन कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने स्वयंसेवकों के कार्य की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की और आकाशवाणी पर उनके योगदान का जिक्र किया। याद हो कि युद्ध प्रारंभ होते ही राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ के साथ ऐतिहासिक चर्चा भी की थी। 1971 के युद्ध  के दौरान सैनिकों के लिए 24 घंटे भोजन एवं दवा की आपूर्ति, अपनी जान बचाकर भारत आए हिन्दू एवं मुस्लिम शरणार्थियों के लिए राहत शिविर, युद्ध में घायलों के लिए रक्तदान महायज्ञ और हवाई पट्टियों की मरम्मत जैसे कार्य स्वयंसेवकों ने किए। उनकी देशभक्ति एवं निःस्वार्थ सेवाभाव को देखकर सेना प्रमुख जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) सैम मानेकशॉ ने कहा था कि “इन युवाओं की निःस्वार्थ सेवा, फुर्ती और अनुशासन देखकर मुझे गर्व होता है। अगर सेना के बाद देश में कोई सबसे अनुशासित संगठन है, तो वह यही है”।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर भारत सरकार ने जिस स्मृति डाक टिकट को जारी किया है, उसमें भी 1963 की गणतंत्र दिवस में शामिल स्वयंसेवकों के समूह का चित्र शामिल किया गया है। इसके साथ ही एक दूसरे चित्र में सेवा एवं राहत कार्य करते स्वयंसेवक दिखायी दे रहे हैं। संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर सरकार ने एक बार फिर ‘राष्ट्र सेवा के 100 वर्ष’ की संघ यात्रा का स्मरण देशवासियों को कराया।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने India EU Trade Deal की सराहना की

India EU Trade Deal दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौतों के जरिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ के मिशन को मजबूत करता है

भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता भारत के वैश्विक व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक सफलता हासिल करता हुआ निर्णायक क्षण

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के ‘इंडिया फर्स्ट’ के सिद्धांत के नेतृत्व में भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता संबंधित सेक्टरों की सुरक्षा करता है

यह समझौता 99% भारतीय निर्यात के लिए अभूतपूर्व पहुंच हासिल कर समृद्धि के एक नए युग की शुरुआत है

यह समझौता टेक्सटाइल, कपड़े, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न, आभूषण, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान, चिकित्सा उपकरण, प्लास्टिक, रबर और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए नए अवसर उपलब्ध कराता है

‘पीपल फ्रेंडली’ व्यापार समझौतों के लिए एक नया बेंचमार्क स्थापित करते हुए यह कृषि निर्यात के लिए तरजीही बाज़ार पहुंच सुनिश्चित करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तेज़ी और महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि के लिए मंच तैयार करता है
भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के माध्यम से मोदी जी विभिन्न क्षेत्रों में अवसरों को खोलने, नई नौकरियाँ पैदा करने, नवाचार को बढ़ावा देने और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाकर हमारे युवाओं की वैश्विक आकांक्षाओं को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे

‘विकसित भारत 2047’ के विज़न के साथ तालमेल बिठाते हुए यह समझौता 17 उप-क्षेत्रों के स्वतंत्र पेशेवरों की सेवाएं प्रदान करके पूरे यूरोप में भारत की प्रतिभा को शक्ति प्रदान करता है

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता (India EU Trade Deal) भारत के वैश्विक व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक सफलता हासिल करता हुआ निर्णायक क्षण है। गृह मंत्री ने कहा कि वैश्विक प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की दूरदर्शी कूटनीतिक सोच को प्रदर्शित करती हुई यह डील दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौतों के माध्यम से एक भरोसेमंद, परस्पर लाभकारी और संतुलित साझेदारी सुनिश्चित करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ के भारत के मिशन को मजबूत करती है।

केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने X पर किए गए सिलसिलेवार पोस्ट में कहा, “India EU Trade Deal भारत के वैश्विक व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक सफलता हासिल करता हुआ निर्णायक क्षण है। एक वैश्विक प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की दूरदर्शी कूटनीतिक सोच को प्रदर्शित करती हुई यह डील दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौतों के माध्यम से एक भरोसेमंद, परस्पर लाभकारी और संतुलित साझेदारी सुनिश्चित करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ के भारत के मिशन को मजबूत करती है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए मोदी जी का हृदय से धन्यवाद और भारत के लोगों को बधाई।”

गृह मंत्री ने कहा, “प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के ‘इंडिया फर्स्ट’ के सिद्धांत के नेतृत्व में India EU Trade Deal संबंधित सेक्टरों की सुरक्षा करता है, साथ ही 99% भारतीय निर्यात के लिए अभूतपूर्व पहुंच हासिल करके समृद्धि के एक नए युग की शुरुआत करता है, जिससे टेक्सटाइल, कपड़े, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न, आभूषण, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान, चिकित्सा उपकरण और उपकरण, प्लास्टिक और रबर, और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए अवसरों की एक पूरी नई दुनिया खुलेगी। लोगों के अनुकूल व्यापार समझौतों के लिए एक नया बेंचमार्क स्थापित करते हुए यह कृषि निर्यात के लिए तरजीही बाजार पहुंच सुनिश्चित करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उछाल और महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि के लिए मंच तैयार करता है।”

श्री अमित शाह ने कहा, “India EU Trade Deal के माध्यम से मोदी जी हमारे युवाओं की वैश्विक आकांक्षाओं को नए ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए विभिन्न सेक्टरों में अवसरों को खोल रहे हैं, नई नौकरियां पैदा कर रहे हैं, इनोवेशन को बढ़ावा दे रहे हैं, और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ा रहे हैं। ‘विकसित भारत 2047’ के विजन के साथ तालमेल बिठाते हुए यह समझौता 17 उप-सेक्टरों के स्वतंत्र पेशेवरों को EU क्लाइंट्स को सेवाएं प्रदान करने में निश्चितता प्रदान करके, ज्ञान-आधारित व्यापार में रास्ते बनाकर, और भारत में प्रशिक्षित आयुष चिकित्सकों को EU सदस्य देशों में सेवाएं प्रदान करने का अवसर प्रदान करके पूरे यूरोप में भारत की प्रतिभा को शक्ति प्रदान करता है।”

ओडिशा – 30 जनजाति परिवारों के 151 लोगों ने की सनातन में वापसी

भुवनेश्वर। जनजाति बहुल जिले मयुरभंज के ठाकुरमुंडा प्रखंड में ईसाइयत में मतांतरित हुए 30 जनजाति परिवारों के 151 पुरुष व महिलाओं ने स्व-धर्म सनातन में वापसी की। घर वापसी करने वाले लोगों में संथाल, हो व गोंड जनजाति के लोग शामिल हैं। ये लोग मिशनरियों के बहकावे में आकर ईसाई बन गए थे, अब पारंपरिक रीति नीति के साथ स्वधर्म में वापसी की। कार्यक्रम में उपस्थित जनजाति समाज के अन्य लोगों ने घर वापसी करने वालों का स्वागत किया। रविवार 4 जनवरी को आयोजित घर वापसी कार्यक्रम में सैकड़ों पुरुष और महिलाएं शामिल हुए।

घर वापसी करने वाले परिवारों के सदस्यों ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व पादरियों के बहकावे में आकर अपनी मूल संस्कृति और परंपराओं से दूर हो गए थे। उस समय पादरियों द्वारा स्वास्थ्य को लेकर किए गए भ्रामक दावों के कारण उन्होंने कनवर्जन का निर्णय लिया था। परिवार के कुछ सदस्य जब गंभीर रूप से अस्वस्थ थे, तब पादरियों ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि ईसाई धर्म अपनाने से उनकी बीमारियां ठीक हो जाएंगी। इसी झांसे में आकर उन्होंने मतांतरण कर लिया।

हालांकि, मतांतरण के बाद उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक अलगाव का सामना करना पड़ा। वे अपने समाज से कट गए और अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों, त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों में भाग नहीं ले पा रहे थे। धीरे-धीरे उन्हें यह महसूस होने लगा कि वे अपनी ही जड़ों और अपने ही लोगों से दूर होते जा रहे हैं, जिससे मानसिक असंतोष और पीड़ा बढ़ती चली गई।

घर वापसी करने वाले प्रमुख व्यक्ति बंशीधर कालुंडिया ने बताया कि इस दौरान वनवासी कल्याण आश्रम और जनजाति सुरक्षा मंच के कार्यकर्ताओं ने उनसे लगातार संवाद बनाए रखा। कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान कनवर्जन में नहीं, बल्कि उचित उपचार और जागरूकता में है। कनवर्जन के नाम पर लोगों को उनके पूर्वजों की संस्कृति से काटना एक साजिश है। इसके बाद उन्हें वास्तविकता का बोध हुआ और उन्होंने घर वापसी का निर्णय लिया। अपने मूल धर्म और संस्कृति में लौटकर संतोष महसूस कर रहे हैं।

स्थानीय कार्यकर्ता शिव प्रसाद हेम्ब्रम ने बताया कि राज्य में गैर कानूनी तरीके से कनवर्जन पर रोक लगाने के लिए कानून बना हुआ है। लेकिन इस कानून का सही रूप से अनुपालन नहीं हो रहा है। यही कारण है कि मिशनरियां जनजातीय लोगों को विभिन्न प्रकार का झांसा देकर कनवर्ट कर रहे हैं। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि राज्य में कनवर्जन को रोकने के लिए जो कानून है, उसे सख्ती से लागू करे ताकि जनजातीय समुदाय के लोगों को अपने पूर्वजों की संस्कृति से उखाड़ने का जो प्रयास हो रहा, वह सफल न हो।

घर वापसी करने के बाद इन लोगों का जनजाति सुरक्षा मंच की ओर से स्वागत किया गया। यह कार्यक्रम मयूरभंज जिले के ठाकुरमुंडा ब्लॉक अंतर्गत बागदफा, जामनांडा और डंगाडिहा गांवों में आयोजित किया गया। हो जनजाति के धर्मगुरु मानाय पूर्ति ने इस अवसर पर आशीर्वचन प्रदान किया।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री विश्वेश्वर टुडु ने घर वापसी करने वाले परिवारों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि भारत के महापुरुषों जैसे स्वामी विवेकानंद से लेकर महात्मा गांधी तक कनवर्जन के खिलाफ थे। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ शक्तियां विभिन्न उपायों से भोले-भाले वनवासियों का कनवर्जन कराने के प्रयास में लगे हुए हैं तथा उनके पूर्वजों की संस्कृति से काट रहे हैं। इससे वनवासी समाज को सचेत रहने की आवश्यकता है।

लखपति दीदी राशोबाई ने मेहनत और समूह सहयोग से कायम की आत्मनिर्भरता की मिसाल

जहाँ चाह वहां राह इस उक्ति को चरितार्थ कर दिखाया है,कोंडागांव जिले के विकासखंड फरसगांव अंतर्गत ग्राम पंचायत बानगांव की रहने वाली श्रीमती राशोबाई मरकाम ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ के अंतर्गत स्व सहायता समूह से जुड़कर न केवल अपने जीवन को नई दिशा दी, बल्कि आत्मनिर्भरता की मिसाल भी कायम की है। राशोबाई आज विभिन्न आजीविका गतिविधियां शुरूकर 01 लाख रूपए से अधिक की आमदनी प्राप्त कर रही हैं।

जय माता दी स्व सहायता समूह की सदस्य राशोबाई स्व सहायता समूह से जुड़ने से पहले कृषि मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करती थीं और घर के कार्यों तक ही सीमित थी। आय के सीमित साधन होने के कारण परिवार की वार्षिक आय केवल 48 हजार रुपये थी, जिससे दैनिक जरूरतों को पूरा करना काफी मुश्किल होता था और परिवार का पालन पोषण बेहतर ढंग से नहीं हो पाता था।

स्व सहायता समूह से जुड़ने के पश्चात उन्हें समूह के माध्यम से आरएफ अनुदान राशि 15 हजार रुपये और सीआईएफ ऋण राशि 60 हजार रुपये प्राप्त हुई। इस सहयोग से उन्होंने कृषि कार्य के साथ-साथ किराना दुकान संचालन एवं मछली पालन जैसी विभिन्न आजीविका गतिविधियां शुरू कीं। जिला प्रशासन की एनआरएलएम टीम के मार्गदर्शन से उनका आत्मविश्वास बढ़ा और उक्त आजीविका गतिविधियों के सफल संचालन से आज श्रीमती राशोबाई मरकाम की वार्षिक आय बढ़कर लगभग 1 लाख 67 हजार रुपये हो गई है। वर्तमान में वे पूर्व की तुलना में दोगुना आय अर्जित कर रही हैं। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है तथा जीवन स्तर में सुखद बदलाव आया है। आज श्रीमती राशोबाई मरकाम ने अपनी मेहनत, लगन और समूह के सहयोग से न केवल आत्मनिर्भर हुई हैं, बल्कि अपने परिवार के लिए एक मजबूत आर्थिक सहारा भी बनी है। उन्होंने शासन की योजनाओं से मिली सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया। 

उल्लेखनीय है कि एनआरएलएम ‘बिहान’ योजना के अंतर्गत स्व सहायता समूहों एवं टीम के सतत प्रयासों से ग्रामीण महिलाओं को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में निरंतर कार्य किया जा रहा है, ताकि अधिक से अधिक महिलाएं “लखपति दीदी” बनकर आत्मसम्मान के साथ जीवन यापन कर सकें।

जनजातीय क्षेत्रों के समग्र विकास के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है सरकार : मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय

प्राचीन संस्कृति और परंपराओं के संवर्धन में जनजातीय समाज की ऐतिहासिक भूमिका

जनजातीय गौरव पथ’ के निर्माण और महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित करने की घोषणा

गौरा पूजा एवं बैगा पुजेरी सम्मेलन में मुख्यमंत्री श्री साय की सहभागिता

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज कोरबा जिले के महर्षि वाल्मीकि आश्रम, आईटीआई रामपुर में आयोजित गौरा पूजा महोत्सव एवं बैगा पुजेरी सम्मेलन में शामिल हुए। उन्होंने गौरा-गौरी पूजन तथा बैगा पुजारी सम्मेलन की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आदिवासी समाज का अपना गौरवशाली इतिहास, विशिष्ट संस्कृति और समृद्ध परंपराएं हैं। बैगा और पुजेरी समाज आज भी इन परंपराओं के संरक्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने इस अवसर पर आईटीआई चौक से बालको रोड का नाम ‘जनजातीय गौरव पथ’ रखने तथा इस मार्ग के प्रारंभिक बिंदु पर जनजातीय महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित करने की घोषणा की।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण इसलिए किया था ताकि यहां की सर्वाधिक जनसंख्या वाले आदिवासी समाज को विकास की मुख्यधारा में आगे बढ़ाया जा सके। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जनजातीय समाज का मान-सम्मान बढ़ाने के लिए 15 नवंबर शहीद बिरसा मुंडा जयंती को जनजातीय गौरव दिवस घोषित करते हुए धरती आबा उत्कर्ष योजना प्रारंभ की। इसके साथ ही पीएम जनमन योजना के माध्यम से विशेष पिछड़ी जनजातियों को विकास के दायरे में लाने का कार्य किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि यह गर्व का विषय है कि आज देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आदिवासी समाज की बेटी राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु आसीन हैं और छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री भी एक साधारण किसान परिवार से आने वाला आदिवासी समाज का बेटा है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि धरती आबा ग्राम उत्कर्ष योजना के लिए 80 हजार करोड़ रुपये तथा पीएम जनमन योजना के लिए 24 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिससे छत्तीसगढ़ के 6,691 गांव लाभान्वित हो रहे हैं।उन्होंने कहा कि पहाड़ी कोरवा, बिरहोर सहित अन्य पीवीटीजी समुदायों के उत्थान के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। आदिवासी अंचलों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है। इसके लिए राज्य में प्राधिकरण का गठन कर आदिवासी एवं पिछड़े क्षेत्रों में विकास कार्यों को और अधिक गति दी जा रही है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने अपने जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने स्वयं भी वनवासी कल्याण आश्रम में कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज आदिकाल से भगवान गौरागौरी के रूप में शिव-पार्वती के उपासक रहे हैं।

उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज के महापुरुषों के योगदान को स्मरणीय बनाने, उनकी स्मृतियों को सहेजने और नई पीढ़ी को उनके बारे में जानकारी देने के उद्देश्य से नवा रायपुर में विशाल डिजिटल जनजातीय संग्रहालय स्थापित किया गया है, जिसमें महापुरुषों की जीवन-गाथाओं का सचित्र वर्णन किया गया है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि जनजातीय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण को प्रोत्साहित करने हेतु बैगा, गुनिया और सिरहा को प्रतिवर्ष 5,000 रुपये की सम्मान निधि प्रदान की जा रही है। साथ ही सरना स्थलों का संरक्षण किया जाएगा, जो न केवल सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा करेगा बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए उद्योग मंत्री श्री लखनलाल देवांगन ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी विकसित भारत का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं, उसी प्रकार मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में विकसित छत्तीसगढ़ की दिशा में तेजी से कार्य हो रहा है।उन्होंने कहा कि जिले में अनेक प्राचीन देवी-देवताओं के स्थल हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री श्री साय के मार्गदर्शन में विकसित कर पर्यटन के रूप में नई पहचान दी जा रही है।

कार्यक्रम में कटघोरा विधायक श्री प्रेमचंद पटेल, वनवासी कल्याण आश्रम के पदाधिकारी श्री पनतराम भगत एवं श्री बीरबल सिंह ने भी संबोधन दिया। इस अवसर पर महापौर श्रीमती संजू देवी राजपूत, पूर्व मंत्री श्री ननकी राम कंवर, वनवासी कल्याण आश्रम के पदाधिकारी, जनप्रतिनिधिगण एवं बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।