सहकार, कृषि और उद्योग हमारे विकास के आधार स्तंभ – डॉ. मोहन भागवत जी

संघ शताब्दी के उपलक्ष्य में कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में ‘उद्यमी संवाद – नए क्षितिज की ओर’ कार्यक्रम

विविधताओं को कैसे संभालना है, यह भारत को पूरी दुनिया को सिखाना है

राष्ट्र को परम वैभव संपन्न बनाने के लिए सबको साथ चलना है

जयपुर, 13 नवम्बर । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा कि विविधताओं को कैसे संभालना है, यह हमें दुनिया को सिखाना है क्योंकि दुनिया के पास ऐसा तंत्र नहीं है जो भारत के पास है।

सरसंघचालक जी गुरुवार को संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर ‘100 वर्ष की संघ यात्रा श्रृंखला’ के अंतर्गत कॉन्स्टीट्यूशन क्लब, जयपुर के पृथ्वीराज चौहान सभागार में ‘उद्यमी संवाद – नए क्षितिज की ओर’ कार्यक्रम में राजस्थान के प्रमुख उद्यमियों को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संघ को प्रत्यक्ष अनुभव किए बिना संघ के बारे में राय मत बनाइए। संघ से जुड़ने के लिए शाखा में आइए, जो आपको अनुकूल लगे वह काम आप कर सकते हैं। संघ पूरे समाज को ही संगठित करना चाहता है। पूरा समाज संघ बन जाए यानी प्रमाणिकता से, निःस्वार्थ बुद्धि से सब लोग देश के लिए जिएं।

उन्होंने कहा कि संघ के 100 वर्ष की यात्रा पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम कोई सेलिब्रेशन नहीं है, बल्कि आगे के चरण की दृष्टि से अपने कार्य की वृद्धि का विचार करने के लिए कार्यक्रम किए जा रहे हैं। राष्ट्र को परम वैभव संपन्न और विश्वगुरु बनाना किसी एक व्यक्ति के वश में नहीं है। यह सबका काम है और इसके लिए सबको साथ लेकर चलना है।

उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना किसी एक विषय को लेकर नहीं हुई। संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार क्रांतिकारी थे। वे इंडियन नेशनल कांग्रेस के बहुत सक्रिय कार्यकर्ता थे। उसके आंदोलनों में संघ स्थापना के पहले और एक बार स्थापना के बाद, दो बार जेल गए। जो देश हित और समाज हित में चल रहा था, उसमें वह सक्रिय रहे। असहयोग आंदोलन में उन पर राजद्रोह का अभियोग लगा। उन्होंने बचाव में पक्ष रखना चुना क्योंकि इससे दोबारा भाषण का मौका मिलता। उनके बचाव भाषण को सुनकर जज को कहना पड़ा कि उनका बचाव भाषण पहले भाषण से भी अधिक राजद्रोही है। डॉ. हेडगेवार ने अनुभव किया कि समाज में डेढ़ हजार साल से जो दुर्गुण आ रहे थे, उन्हें दूर करना जरूरी है। उन्हें महसूस हुआ कि संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित किए बिना भारत इस पुरानी बीमारी से मुक्त नहीं होगा। इसलिए उन्होंने एक दशक तक विचार और प्रयोगों के बाद संघ की स्थापना की।

सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ किसी को नष्ट करने के लिए नहीं बना है। भारत वर्ष में हमारी पहचान हिन्दू है। हिन्दू शब्द सबको एक करने वाला है। हमारा राष्ट्र संस्कृति के आधार पर एक है, न कि राज्य के आधार पर। पुराने समय में जब राज्य अनेक थे तब भी हम एक देश थे, पराधीन थे तब भी एक देश थे। उन्होंने कहा कि समाज की स्वस्थ अवस्था का नाम समाज का संगठन है। संघ व्यक्ति निर्माण का काम करता है। संघ स्वयंसेवक तैयार करता है, स्वयंसेवक बाकी सब काम करते हैं।

उन्होंने संघ कार्य के आगामी चरण के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि सारा समाज देश हित में जिए, ये संघ का आगे का काम है। समाज की सज्जन शक्ति जागृत हो, सामाजिक समरसता का वातावरण बने और मंदिर, पानी, शमशान सबके लिए खुले होने चाहिए। परिवार के सभी सदस्य सप्ताह में कम से कम एक बार एकत्र आएं और अपना भोजन एवं भजन, अपनी भाषा और अपनी परंपरा के अनुसार करें। पानी बचाने, पेड़ लगाने और प्लास्टिक हटाने जैसे पर्यावरण संरक्षण के कार्यों के लिए भी हमें आगे आना चाहिए। स्व का बोध और स्वदेशी का भाव सबके मन में जागृत हो, देश स्वनिर्भर बने। नागरिक कर्तव्य और नागरिक अनुशासन के प्रति हम सजग बनें और नियम, कानून, संविधान का पालन करें।

सारा समाज एक बनकर अपना-अपना काम अपनी-अपनी पद्धति से करे ताकि हम सभी एक दूसरे के बाधक नहीं, बल्कि पूरक बनें।

उन्होंने कहा कि सहकार, कृषि और उद्योग हमारे विकास के आधार स्तंभ हैं। कृषि, व्यापार, उद्योग परस्पर साथ आकर, परस्पर निर्भर होकर तीनों एक साथ प्रगति करें। छोटे और मध्यम उद्योग अर्थव्यवस्था को विकेंद्रित करते हैं। इन उद्योगों को अपने देश के अंदर सुचारू रूप से चलने का वातावरण देना, ये बड़े उद्योगों का काम है। छोटे उद्योगों को रोजगार, कौशल, उत्पादन की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ाना चाहिए।

इससे पूर्व राजस्थान क्षेत्र संघचालक रमेश चंद्र अग्रवाल ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखी। कार्यक्रम का संचालन डॉ. हेमंत सेठिया ने किया।

स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी अधीनता से मुक्ति नहीं, स्वदेशी तंत्र का निर्माण करना भी है – पराग अभ्यंकर जी

भुवनेश्वर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भुवनेश्वर महानगर द्वारा उत्कल विश्वविद्यालय के दीक्षांत ऑडिटोरियम में आयोजित युवा सम्मेलन के समापन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख पराग अभ्यंकर ने कहा कि स्वतंत्रता का सच्चा अर्थ केवल विदेशी अधीनता से मुक्ति नहीं है, बल्कि अपनी उन्नति और राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए स्वदेशी तंत्र का निर्माण करना भी है।

उन्होंने कहा कि 15 अगस्त, 1947 को स्वाधीनता मिल गई अर्थात् किसी की अधीनता से मुक्त हो गए, आजाद हो गए। अपने निर्णय लेने के लिए अंग्रेज वायसराय पर डिपेंडेंट नहीं थे, इसलिए हम इंडिपेंडेंट कहलाए। अपनी नियति डेस्टिनी का निर्णय करने के लिए सक्षम हो गए। परन्तु स्वतंत्रता का सच्चा अर्थ है अपनी वास्तविक उन्नति, लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अपना तंत्र निर्माण कर लेना। उन्होंने कहा कि आज भी हमारी पहचान “इंडिया दैट इज़ भारत” के रूप में होती है, जबकि केवल “भारत” या “हिंदुस्तान” नाम ही स्वीकार करना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों तक जिस शिक्षा, न्याय और आर्थिक नीति के तंत्र के माध्यम से हमने विश्वगुरु तथा सोने की चिड़िया का दर्जा प्राप्त किया था, उसे भूलकर गुलामी के दौर की ही शिक्षा, न्याय और आर्थिक नीति पर हमारा शासन तंत्र गत 75 वर्षों तक चला। अर्थात्, हमने अपने तंत्र को अपनाने के बजाय विदेशी तंत्र को स्वीकार किया। जब हम प्राचीन भारतीय नीतियों को अपनाएंगे, तभी हम वास्तव में स्वतंत्र कहलाएंगे। जब भारत अपने प्राचीन भारतीय नीतिगत तंत्र को पुनः स्थापित करेगा, तभी हम सच्चे अर्थों में स्वतंत्र कहलाएंगे।

भारत की विश्व के प्रति क्या भूमिका है, यह स्वामी विवेकानंद जी ने 1897 में लाहौर के भाषण में बताया था। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के 1897 के लाहौर भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की नियति विश्व बंधुत्व और शांति के जीवन मूल्यों को पूरे विश्व में फैलाने की है। इन जीवन मूल्यों को समाज के प्रत्येक व्यक्ति के भीतर जागृत करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा “जब त्याग और सेवा की भावना समाज तथा शासन – दोनों के तंत्र में प्रतिष्ठित होगी, तभी हम कह सकेंगे कि सच्चा स्वातंत्र्य प्राप्त हुआ है।”

उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गत 100 वर्षों से इसी कार्य में लगा हुआ है। युवाओं की सहभागिता से इसे आगे बढ़ाना है।

उत्कल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यज्ञेश्वर दण्डपाट समापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इससे पहले सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. श्रीकांत मिश्र ने कहा कि संघ अपने 100 वर्षों के कार्यकाल में अपने लक्ष्य की दिशा में निरंतर प्रगति कर रहा है। मुख्य वक्ता ओडिशा (पूर्व) प्रांत के बौद्धिक प्रमुख तन्मय महापात्र ने कहा कि भारत की महान संस्कृति, शिक्षा, इतिहास और स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण विदेशों में भी प्रतिष्ठित थी। देश के निर्माण में युवाओं की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण रही है और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान युवाओं का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सदैव वैज्ञानिक रही है। जब संपूर्ण विश्व अंधकार में था, तब भारत का ज्ञान-विज्ञान विश्व को नया मार्ग दिखा रहा था।

“पंच परिवर्तन” विषय पर प्रश्न मंच का आयोजन किया गया, तथा स्वच्छता और पर्यावरण पर आधारित नाटकों का मंचन भी हुआ। युवा सम्मेलन में 1,700 से अधिक युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण था मनोज़ साहू का सैंड आर्ट प्रदर्शन। इसके अलावा, युवाओं ने देशभक्ति गीतों और नृत्य कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

लखनऊ की महिला डॉक्टर की कार से AK-47 और कारतूस बरामद, पुलिस ने किया गिरफ्तार

लखनऊ की एक महिला डॉक्टर शाहीन शाहिद को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सोमवार को गिरफ्तार किया। शाहीन के कब्जे से एके-47 बरामद हुई है। डाक्टर शाहीन को जम्मू-कश्मीर पुलिस अपने साथ ले गई है।

जानकारी के अनुसार, डॉ. शाहीन शाहिद लखनऊ में लालबाग मोहल्ले की रहने वाली है। पुलिस को जानकारी मिली कि शाहीन, फरीदाबाद आतंकी साजिश में गिरफ्तार डॉक्टर मुजम्मिल की सहयोगी है। मुजम्मिल जिस कार का इस्तेमाल करता था। वह कार डॉ. शाहीन के नाम पर है। शाहीन की कार से ही एके-47 राइफल और कुछ जिंदा कारतूस और अन्य संदिग्ध सामग्री बरामद की गई है।

पुलिस की विवेचना में पाया गया कि डॉ. शाहीन शाहिद कई संदिग्ध आतंकियों के संपर्क में थी। शाहीन, पाकिस्तान के आतंकियों के भी संपर्क में थी। पुलिस का कहना है कि भारत के कई हिस्सों में आतंकी गतिविधियों को संचालित करने का षड्यंत्र रचा जा रहा था। अभी तक इस मॉड्यूल से सम्बन्धित सात अभियुक्तों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गिरफ्तार आठ आरोपियों में तीन डॉक्टर शामिल हैं और इस कार्रवाई में 2,900 किलोग्राम विस्फोटक बरामद किया गया है। जांच में पता चला है कि यह ‘व्हाइट कॉलर’ आतंकी मॉड्यूल जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवत-उल-हिंद जैसे संगठनों से जुड़ा हुआ है।

जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और हरियाणा पुलिस के साथ केंद्रीय एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई में यह बड़ी सफलता मिली है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मॉड्यूल का खुलासा तब हुआ, जब पुलिस ने दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में सरकारी मेडिकल कॉलेज (GMC) में काम कर चुके डॉ. आदिल अहमद को गिरफ्तार किया। डॉ. आदिल की गिरफ्तारी सहारनपुर से हुई थी। डॉ. आदिल की निशानदेही पर ही डॉ. मुजम्मिल शकील को पकड़ा गया। GMC अस्पताल में डॉ. आदिल के लॉकर से पुलिस ने AK-47 राइफल और अन्य हथियार बरामद किए गए थे। जांच में सामने आया कि डॉ. आदिल आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा हुआ था और कश्मीर में जैश नेटवर्क को फिर से खड़ा करने की साजिश रच रहा था।

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने अपने निवास पर विश्व कप विजेता महिला टीम की सदस्य आकांक्षा सत्यवंशी जी का स्वागत किया व उन्हें शक्ति स्वरूप गदा भेट की.. आकांक्षा सत्यवंशी जी ने फाइनल मैच के दौरान गदा से संबंधित एक रोचक किस्सा उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा से शेयर किया

वंदे मातरम् – राष्ट्र चेतना का अमर मंत्र

राष्ट्र गीत “वंदे मातरम्” ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और यह 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था। “वंदे मातरम्” संस्कृत पद है, जिसका अर्थ “मैं तेरी वंदना करता हूँ, हे मातृभूमि” अथवा “हे माँ, मैं तुझे नमन करता हूँ”, है।

अभी हाल ही में जबलपुर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने मातृभूमि की आराधना और राष्ट्र जीवन में चेतना का संचार करने वाले इस दिव्य मंत्र वंदे मातरम् की रचना के 150वें वर्ष पर इसके रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए कृतज्ञ श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस पावन अवसर पर संघ ने सभी स्वयंसेवकों एवं देशवासियों से आह्वान किया है कि वे अपने हृदय में वंदे मातरम् की प्रेरणा जागृत करें और “स्व” की भावना पर आधारित राष्ट्र पुनर्निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लें। सरकार्यवाह जी ने कहा कि इस प्रेरणादायी यात्रा में सभी जन उत्साहपूर्वक सहभागी बनें, जिससे यह भावी पीढ़ियों के लिए राष्ट्रीय एकता, समर्पण और गौरव का प्रकाश स्तंभ बनी रहे।

1875 में रचित वंदे मातरम् भारत जागरण की घोषणा बन गया। 1896 में कोलकाता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने स्वरबद्ध कर गाया, जिससे पूरा सभागार देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत हो उठा। उस क्षण से वंदे मातरम् मात्र एक गीत नहीं रहा – यह भारत माता की आराधना का मंत्र, राष्ट्रीय उद्घोष, राष्ट्रीय चेतना की वाणी और राष्ट्रात्मा की अनुगूंज बन गया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदे मातरम् ने स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों और सामान्य जन को उत्साह और बलिदान की भावना से एक सूत्र में बांध दिया। बंग-भंग आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक, यह उद्घोष हर देशभक्त की प्रेरणा बना रहा।

इसका व्यापक प्रभाव इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि महर्षि अरविंद, मैडम भीकाजी कामा, महाकवि सुब्रह्मण्य भारती, लाला हरदयाल और लाला लाजपत राय जैसे महान व्यक्तित्वों ने अपने पत्र-पत्रिकाओं में वंदे मातरम् को अपनाया। महात्मा गांधी भी वर्षों तक अपने पत्रों का समापन वंदे मातरम् से करते थे।

राष्ट्रात्मा का गीत

वंदे मातरम् केवल शब्दों का संग्रह नहीं – यह राष्ट्रात्मा का गीत है, जो हर भारतीय हृदय को प्रेरित करता है। इसकी दिव्य अनुगूंज आज भी समाज में मातृभूमि के प्रति समर्पण, एकता और गौरव की भावना भरती है, यहाँ तक कि 150 वर्षों के बाद भी।

जब क्षेत्र, भाषा और जाति के आधार पर विभाजन बढ़ते दिखाई देते हैं, तब वंदे मातरम् वह एक सूत्र है जो संपूर्ण समाज को “भारतत्व” की एक ही भावना में जोड़ता है। यह भारत के सभी प्रांतों, समुदायों और भाषाओं में समान रूप से स्वीकार्य है – इसीलिए यह राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक एकात्मता का सशक्त प्रतीक बन गया है।

राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रनिर्माण के पुनर्जागरण काल में वंदे मातरम् की भावना को आत्मसात कर जीवन में उतारना आवश्यक है। इसका उच्चारण केवल वाणी का कार्य नहीं, बल्कि यह देशभक्ति का आध्यात्मिक साधन और सांस्कृतिक मूल्यों का स्रोत है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर जी) के लिए वंदे मातरम् केवल नारा नहीं, बल्कि देशभक्ति, संगठन और स्वतंत्रता का मूल मंत्र था।

नागपुर में छात्र जीवन के आरंभिक काल से ही डॉक्टर जी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से गहराई से प्रभावित थे। उस समय ब्रिटिश शासन में वंदे मातरम् कहना अपराध माना जाता था। किंतु डॉक्टर जी के नेतृत्व में विद्यार्थियों ने एक ब्रिटिश निरीक्षक का स्वागत “वंदे मातरम्” के उद्घोष से किया। इस कार्य के लिए उन्हें विद्यालय से निलंबित कर दिया गया और सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पर रोक लगा दी गई – यही वह क्षण था जब उनके भीतर राष्ट्रीयता की ज्वाला प्रज्वलित हुई, जिसने आगे चलकर एक महान संगठन की स्थापना की राह दिखाई।

1925 में जब डॉक्टर जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, तब वंदे मातरम् की भावना संघ की प्रत्येक गतिविधि, प्रार्थना और अनुशासन का अभिन्न अंग बन गई। उनका दृढ़ विश्वास था – “हमारा राष्ट्र केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, वह हमारी माता है। वंदे मातरम् उसके प्रति हमारी श्रद्धा की वाणी है।”

अपने प्रारंभ से लेकर आज तक वंदे मातरम् को प्रत्येक स्वयंसेवक के जीवन में राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान का स्थान प्राप्त है। आज भी कई कार्यक्रमों और सभाओं का समापन स्वयंसेवकों द्वारा इसके श्रद्धापूर्ण गायन से होता है। खेल और प्रशिक्षण के समय भी गण-शिक्षक (प्रशिक्षक) स्वयंसेवकों के साथ मिलकर वंदे मातरम् का सामूहिक उच्चारण कराते हैं – यह अनुशासन, एकता और मातृभूमि के प्रति प्रेम का प्रतीक है। इसके माध्यम से संघ निरंतर देशभक्ति, सेवा और अनुशासन की भावना का विकास करता आ रहा है।

डॉ. हेडगेवार के लिए वंदे मातरम् केवल क्रांति का प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आध्यात्मिक आधारशिला थी। वे इसे राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्र की जीवंत आत्मा के जागरण के रूप में देखते थे।

डॉक्टर जी स्वयंसेवकों से कहा करते थे कि यह पवित्र उद्घोष प्रत्येक भारतीय हृदय में भक्ति, अनुशासन और त्याग की भावना जागृत करे। उनका विश्वास था कि जब तक भारतीयों के हृदय से वंदे मातरम् की गूंज उठती रहेगी, तब तक भारत की आत्मा जीवित रहेगी।

आज जब हम वंदे मातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने का उत्सव मना रहे हैं, तब डॉ. हेडगेवार का यह वाक्य स्मरणीय है – “हमारा कर्तव्य केवल वंदे मातरम् गाना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में जीना है।”

हमारी यही प्रार्थना और प्रेरणा है कि –

हर मुख से एक स्वर में वंदे मातरम् की गूंज उठे।

इस अनादि प्रेरणा से हर नागरिक समर्पित देशभक्त बने, और एक सशक्त, एकात्म व आत्मनिर्भर भारत की रचना में योगदान दे।

हर हृदय और भारत के हर कोने से एक ही स्वर उठे —

वंदे मातरम्! भारत माता की जय!

बिनन्दा खुन्द्राकपम

सह प्रान्त प्रचारक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मणिपुर प्रान्त

राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के 150 वर्ष होने पर माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक
30-31 अक्टूबर-1 नवम्बर 2025, जबलपुर
 
माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य

राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के 150 वर्ष
मातृभूमि की आराधना और संपूर्ण राष्ट्र जीवन में चेतना का संचार करने वाले अद्भुत मन्त्र “वंदेमातरम्” की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के शुभ अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रगीत के रचयिता श्रद्धेय बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता है। 1875 में रचित इस गीत को 1896 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राष्ट्रकवि श्रद्धेय रविंद्रनाथ ठाकुर ने सस्वर प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था। तब से यह गीत देशभक्ति का मंत्र ही नहीं अपितु राष्ट्रीय उद्घोष, राष्ट्रीय चेतना तथा राष्ट्र की आत्मा की ध्वनि बन गया।
तत्पश्चात बँग-भंग आंदोलन सहित भारत के स्वाधीनता संग्राम के सभी सैनानियों का घोष मंत्र “वंदेमातरम्” ही बन गया था। इस महामंत्र की व्यापकता को इस बात से समझा जा सकता है कि देश के अनेक विद्वानों और महापुरुषों जैसे महर्षि श्रीअरविंद, मैडम भीकाजी कामा, महाकवि सुब्रमण्यम भारती, लाला हरदयाल, लाला लाजपत राय आदि ने अपने पत्र पत्रिकाओं के नाम में वंदेमातरम् जोड़ लिया था। महात्मा गांधी भी अनेक वर्षों तक अपने पत्रों का समापन “वंदेमातरम्” के साथ करते रहे।
“वंदेमातरम्” राष्ट्र की आत्मा का गान है जो हर किसी को प्रेरणा देता है। वंदेमातरम् अपने दिव्य प्रभाव के कारण 150 वर्षों के बाद भी संपूर्ण समाज को राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना से ओत-प्रोत करने की सामर्थ्य रखता है। आज जब क्षेत्र, भाषा, जाति आदि संकुचितता के आधार पर विभाजन करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब “वंदेमातरम्” वह सूत्र है, जो समाज को एकता के सूत्र में बांधकर रख सकता है। भारत के सभी क्षेत्रों, समाजों एवं भाषाओं में इसकी सहज स्वीकृति है। यह आज भी समाज की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक पहचान और एकात्म भाव का सशक्त आधार है। राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण और राष्ट्र निर्माण की इस पावन बेला में इस महामंत्र के भावों को हृदयंगम करने की आवश्यकता है।
“वंदेमातरम्” गीत की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सभी स्वयंसेवकों सहित सम्पूर्ण समाज से आवाहन् करता है कि वंदेमातरम् की प्रेरणा को प्रत्येक हृदय में जागृत करते हुए “स्व” के आधार पर राष्ट्र निर्माण कार्य हेतु सक्रिय हों और इस अवसर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों को उत्साहपूर्वक भागीदारी करें।
 

https://www.rss.org/hindi/Encyc/2025/11/1/statemnet-by-sarkaryavah-jion-150-years-of-vandemataram.html

राष्ट्रीय चेतना के जागरण की शक्ति – २

प्रशांत पोळ

ऐसे अनेक प्रसंगों पर संघ के स्वयंसेवकों का योगदान अतुल्य और अद्भुत था। संघ के पूरे 100 वर्षों के कार्यकाल में, देश में जहां भी आपत्ति आई, आपदाएं आईं, तो उस परिस्थिति में, सहायता करने संघ स्वयंसेवक ही सर्वप्रथम पहुंचते हैं।

यह सारे क्राइसिस मैनेजमेंट या डिजास्टर मैनेजमेंट के उदाहरण हैं, जिसमें संघ की सक्रिय भूमिका रहती है। किंतु कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं, जिनमें संघ की उपस्थिति के कारण देश विघातक तत्वों पर अंकुश लगा।

उत्तर-पूर्व के राज्यों की स्थिति से संबंधित बातों का उल्लेख पहले भी आया है। रविवार 27 अक्तूबर 1946 को, संघ के 3 वरिष्ठ प्रचारकों ने, (दादाराव परमार्थ, कृष्णा परांजपे और वसंतराव ओक), गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ और शिलांग में एक साथ शाखा लगाई थी। इन राज्यों में संघ कार्य की आधारशिला रखी गई थी। बाद में संघ पर प्रतिबंध लगने से संघ कार्य में थोड़ा ठहराव अवश्य आया, किंतु पचास के दशक में, अत्यंत प्रतिकूल परिस्थिति में संघ कार्य पुनः प्रारंभ हुआ। इन राज्यों में धर्मांतरण की गति तेज थी, यह हमने देखा है। किंतु संघ कार्य की ताकत बढ़ने से क्या होता है, यह इन पूर्वोत्तर राज्यों में स्पष्ट दिखता है।

तीन राज्यों के ही उदाहरण लेते हैं –

इससे पहले हमने देखा है कि अंग्रेजों ने सारे प्रयास करने के बाद भी, स्वतंत्रता मिलने तक, सौ – डेढ़ सौ वर्षों में नागालैंड के 46% लोग ही ईसाई बने थे। किंतु उसके बाद स्वतंत्र भारत में धर्मांतरण को गति मिली, और अगले 60 वर्षों में ही धर्मांतरित ईसाइयों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई। अर्थात 1951 की जनगणना के अनुसार, नागालैंड में ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत था 46%, तो 2011 आते-आते वह 88 प्रतिशत हो गया।

किंतु इसमें एक रहस्य छिपा है। पूर्वोत्तर राज्यों में संघ का काम बढ़ने लगा, साठ- सत्तर के दशक से। संघ से प्रेरित ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ और ‘विवेकानंद केंद्र’ का कार्य भी यहां प्रारंभ हो गया। धीरे-धीरे संघ की ताकत यहां बढ़ती गई। इसका स्पष्ट प्रतिबिंब इसी जनसंख्या के घटते धर्मांतरण में दिखता है।

1951 में जहां 46% ईसाई नागालैंड में थे, वहां मात्र 20 वर्षों में, अर्थात 1971 की जनगणना के अनुसार, ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत हो गया 83%। संघ कार्य के बढ़ने से 1981 के जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 10 वर्षों में मात्र 2% बढ़ा, अर्थात, 85% हुआ। और उसके बाद के 30 वर्षों में मात्र 3% बढ़ सका!

ऐसा ही उदाहरण मेघालय का भी है –

यहां 1951 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत 25% था। अगले 20 वर्षों में, अर्थात 1971 में, यह प्रतिशत पहुंचा 47%। अर्थात लगभग दोगुना। किंतु यहां भी संघ का विस्तार होने लगा। शाखाओं की संख्या बढ़ने लगी। विवेकानंद केंद्र और कल्याण आश्रम के सेवा प्रकल्प प्रारंभ होते गए। उनके तथा विद्या भारती की शालाओं की संख्या बढ़ने लगी। इन सब के कारण, ईसाई जनसंख्या 75% तक पहुंचने में अगले 40 वर्ष लगे..!

मणिपुर की स्थिति भी ऐसी ही है। 1951 में ईसाई जनसंख्या का प्रतिशत 12% है, जो अगले 30 वर्षों में (1981 में) 35% तक पहुंचता है। अर्थात, पहले 30 वर्षों में तीन गुना। किंतु संघ की ताकत बढ़ने के कारण, अगले 30 वर्षों में, (अर्थात 1981 से 2011) मात्र 6% ही बढ़ता है।

ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां संघ की शाखाओं का विस्तार होता है, राष्ट्रीय भावना और विचार प्रबल होने लगते हैं, वहां धर्मांतरण, देश विघातक आदि बातें थम सी जाती हैं।

संघ ने आपातकाल के विरोध में जो संघर्ष किया। उन दिनों, जब अन्य राजनीतिक दल निराश हो गए थे, तब संघ के कार्यकर्ताओं ने जनमानस का मनोबल ऊंचा रखा था। इसीलिए संविधान की हत्या करने वाले दंडित हुए, और अत्यंत सरलता से, भारत में रक्तहीन क्रांति से लोकतंत्र की बहाली संभव हो सकी।

अस्सी के दशक में असम में ‘बहिरागत हटाओ’ आंदोलन जोर पकड़ रहा था। ‘ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन’ (AASU आसू) और ‘असम गण संग्राम परिषद’ ने, संयुक्त रूप से यह आंदोलन छेड़ा था। असम में हो रही बांग्लादेश के मुसलमानों की घुसपैठ रोकना, इस आंदोलन का मूल उद्देश्य था। किंतु बाद में यह आंदोलन, असमी विरुद्ध बंगाली होने लगा। असम की क्रुद्ध जनता, सभी बहिरागतों को, अर्थात, प्रमुखता से बंगालियों को भगाने के लिए आंदोलन करने लगी थी। उनकी दृष्टि में बहिरागत यानी, जो आसामी नहीं हैं, वे सभी।

ऐसे प्रसंग में संघ ने विद्यार्थी परिषद के माध्यम से इस आंदोलन में हस्तक्षेप किया। बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थी हिन्दू कहां जाएंगे? वह कहां आश्रय लेंगे? बांग्लादेश में, ‘हिन्दू’ इस नाते से ही वह प्रताड़ित हो रहे थे। उनको आश्रय देना हमारा कर्तव्य था। आंसू और असम गण परिषद को यह बात प्रयत्न पूर्वक समझाई गई। बाद में उन्होंने भी यह स्वीकार किया, और बहिरागत हटाओ आंदोलन बांग्लादेश से अवैध रूप से आने वाले मुस्लिम घूसखोरों के विरुद्ध चला। संघ के प्रयासों से, इस आंदोलन के कारण, असमी और बांग्ला भाषिक लोगों के बीच में जो संघर्ष निर्माण हो रहा था, वह थम गया..!

अस्सी के दशक में, उत्तर का राज्य पंजाब भी अशांत हो गया था। आतंकवाद बढ़ रहा था। ऐसे में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’, बाद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी की हत्या और उस कारण सिक्ख समुदाय पर हुए प्राण घातक हमले.. इन सब के कारण पंजाब की स्थिति अत्यंत खराब थी। केशधारी और सहजधारी, अर्थात प्रचलित भाषा में, सिक्ख और हिन्दुओं के बीच, वैमनस्य अपने चरम पर था। इस मानसिकता को दूर करने और पूरे समाज में एकता का भाव जागृत करने के लिए, संघ के कार्यकर्ता अपने प्राणों पर खेल कर सारे प्रयास कर रहे थे। अर्थात, खालिस्तानी आतंकवादियों की समझ में यह बात आ रही थी कि देश को तोड़कर, स्वतंत्र खालिस्तान बनाने में मुख्य रोड़ा, प्रमुख अड़चन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है।

अतः 25 जून 1989 को, इन आतंकवादियों ने पंजाब के मोगा में संघ की प्रभात शाखा पर हमला किया। अत्यंत नृशंसतापूर्वक, 23 संघ स्वयंसेवक और 3 नागरिकों को मौत के घाट उतारा।

इन आतंकवादियों की कल्पना थी कि इस हमले के कारण, मात्र पंजाब ही नहीं, तो समूचे देश में सिक्खों के प्रति क्रोध भड़केगा। इस गुस्से और क्रोध के कारण हिन्दू-सिक्ख दंगे प्रारंभ हो जाएंगे, जो खालिस्तान की दिशा में लोगों को ढकेलेंगे।

किंतु दूसरे दिन 26 जून को मोगा में जो हुआ, उसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। जहां स्वयंसेवकों का हत्याकांड हुआ, उसी स्थान पर संघ की शाखा लगी। उसे छोटे से गांव में, सवा सौ स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित थे। इनमें केशधारी (सिक्ख) स्वयंसेवक बड़ी संख्या में थे। स्वयंसेवक गीत गा रहे थे –

कौन कहंदा हिन्दू – सिक्ख वक्ख ने।

ए भारत मां दी सज्जी –  खब्बी अक्ख ने ।।

(कौन कहता है कि हिन्दू – सिक्ख अलग हैं? वे तो भारत मां की, दाई और बाई आंख हैं।)

इस एक घटना ने पंजाब का सारा चित्र बदल दिया। खालिस्तानी आतंकवादियों को कड़ा संदेश गया, कि संघ के स्वयंसेवक डरने या घबराने वाले नहीं हैं। वह निर्भयता से अपना काम करते रहेंगे। हिन्दू – सिक्खों के बीच जो दरार डालने की कोशिश की गई, वह बाजी उलट गई। इस घटना से हिन्दू – सिक्खों के बीच की बॉन्डिंग और मजबूत हुई।

आंकड़े बताते हैं कि इस घटना के बाद, आतंकवादियों ने बौखला कर हमलों की प्रखरता बढ़ाई। किंतु अगले एक-दो वर्षों में, पंजाब में हिंसा की घटनाओं में तेजी से कमी आई, और 1992 के बाद पंजाब से खालिस्तानी आतंकवाद लगभग समाप्त हुआ।

1989 यही वर्ष था, जब देश में आरक्षण विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था। राजीव गोस्वामी के साथ कुछ और युवकों ने भी आरक्षण के विरोध में आत्मदाह किया था। कुल 200 युवकों ने आत्मदाह का प्रयास किया, जिनमें से 62 छात्रों की मृत्यु हो गई थी। उन दिनों ऐसा लग रहा था कि समूचा उत्तर भारत दो धड़ों में विभाजित हो रहा है। सामाजिक वातावरण अत्यंत दूषित हो गया था।

वर्ष 1989 यह संघ के संस्थापक, डॉक्टर हेडगेवार जी का भी जन्मशताब्दी वर्ष था। इस निमित्त, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने व्यापक पैमाने पर जनसंपर्क का अभियान चलाया था। इसी समय, अयोध्या के राम जन्मभूमि आंदोलन को संघ प्रेरित विश्व हिन्दू परिषद ने गति दी। सर्वत्र श्रीराम का जयघोष होने लगा। समरसता का उद्घोष होने लगा। और इन सब में, जाति-जातियों के बीच का वह भयंकर तनाव, क्षीण होता गया।

राजीव गांधी की सरकार और उसके बाद आई वीपी सिंह की सरकार में आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। बाद की सरकारों को सोना भी गिरवी रखना पड़ा। वैश्विक पृष्ठभूमि पर भारत के आर्थिक हालात अत्यंत खराब थे। विश्व में GDP की क्रम में हम 17वें स्थान पर थे। उस समय संघ की प्रेरणा से स्वदेशी जागरण मंच का कार्य प्रारंभ हुआ, स्वदेशी के माध्यम से लोगों में ‘स्व’ के भाव का जागरण प्रारंभ हुआ…

अर्थात, संघ की ताकत कम रहे, या वह प्रभावशाली भूमिका में रहे, संघ ने हमेशा ही ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ की भावना से, देश के सामने उत्पन्न विभिन्न संकटों से देश को बाहर निकालने का पूरा प्रयास किया है।

मार्च 2020 में आया कोरोना (कोविड) सबसे भयानक संकट था। पूरा देश थम गया था, सहम गया था। किंतु संकट की इस घड़ी में भी संघ स्वयंसेवकों ने समाज को सक्रिय करके, कोरोना का मुकाबला किया। इस प्रक्रिया में संघ के कुछ प्रचारक और कुछ कार्यकर्ता भी हुतात्मा हुए। किंतु संघ ने समाज को आगे करके पूरे देश में आत्मविश्वास और आशावाद का संचार किया।

यद्यपि संघ की दृष्टि से यह सब लिखा जाना उचित नहीं है, कारण संघ श्रेय नहीं चाहता। किंतु फिर भी, इतिहास में यह रेखांकित (underline) करना आवश्यक है कि आपदा के समय, देश को संकट से उबारा और बिखरने से रोका संघ ने। संघ इस देश की रीढ़ की हड्डी है।

विशेषत: जब हम हमारे पड़ोसी देश, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश को देखते हैं, वहां की अराजकता देखते हैं, वहां का बिखराव देखते हैं, तब हमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का महत्व विशेष रूप से प्रतीत होता है..! ‘इंडिया’ से, आज के इस बदले हुए ‘भारत’ को खड़ा करने में, संघ का विशेष योगदान है।

लालच-धोखे से धर्म परिवर्तन सामाजिक एकता के लिए खतरा, जनजातीय समाज की परंपरा की रक्षा करना संवैधानिक

रायपुर, छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में जनजातीय गांवों में पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने वाले बोर्डों के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय ने जनजातीय समाज को जबरन या लालच देकर किए जाने वाले धर्मांतरण से बचाने के लिए लगाए बोर्डों को असंवैधानिक मानने से इंकार कर दिया।

कांकेर जिले के आठ जनजातीय गांवों में लगे बोर्डों पर सवाल उठाने वाली याचिका को न्यायालय ने खारिज कर दिया और कहा कि इन बोर्डों का मकसद धर्म विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक एकता की रक्षा करना है।

कांकेर जिले के दिग्बल टांडी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मांग की थी कि गांवों में लगे इन बोर्डों को हटाया जाए। उनका आरोप था कि ये बोर्ड पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों को गांव में प्रवेश करने से रोकते हैं और धार्मिक भेदभाव करते हैं। ये बोर्ड कुदल, पारवी, जुनवानी, घोटा, हबेचुर, घोटिया, मुसुरपुट्टा और सुलागी जैसे जनजातीय गांवों में लगाए गए थे। याचिकाकर्ता ने पंचायत विभाग पर आरोप लगाया कि उसने इन गांवों को पत्र जारी कर ‘हमारी परंपरा, हमारी विरासत’ के नाम पर ऐसे बोर्ड लगाने को कहा।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभुदत्त गुरु की पीठ ने कहा कि बोर्डों में ईसाई धर्म के खिलाफ कुछ भी नहीं लिखा गया है। वे केवल उन पादरियों के प्रवेश को रोकते हैं, जिन पर लालच और धोखे से धर्मांतरण कराने के आरोप हैं। “ये बोर्ड जनजातीय लोगों ने अपनी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत बचाने के उद्देश्य से लगाए हैं। यह अवैध धर्मांतरण के खिलाफ एहतियाती कदम है, न कि किसी धर्म के खिलाफ भेदभाव।”

न्यायालय ने कहा कि अवैध धर्मांतरण से सामाजिक सद्भाव पर बुरा असर पड़ता है। मिशनरियों द्वारा गरीब, अशिक्षित और पिछड़े समुदायों को बेहतर जीवन, शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर लालच देकर धर्म बदलवाने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हुए न्यायालय ने कहा कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक विभाजन को जन्म देता है।

“ईसाई मिशनरियों पर जनजातीय समाज को बहला-फुसलाकर धर्मांतरण कराने के आरोप लगते हैं। यह प्रक्रिया न केवल जनजातीय परंपराओं को तोड़ती है, बल्कि समुदायों के अंदर गहरे मतभेद पैदा करती है।”

न्यायालय ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। इसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता के दायरे में ही माना जाएगा। इसीलिए कई राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं, ताकि धोखे, दबाव या लालच से होने वाले धर्मांतरण को रोका जा सके।

“भारत का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना सह-अस्तित्व और विविधता के सम्मान पर आधारित है।” लेकिन लालच देकर धर्मांतरण करवाना न केवल धर्म का अपमान है, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव भी पैदा करता है। कई बार ऐसे धर्मांतरण विवादों के बाद हिंसा की घटनाएं भी सामने आती हैं।