श्री राम जन्मभूमि मंदिर ध्वजारोहण समारोह प्रथम दिवस पूजन

अयोध्या, 21 नवम्बर। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में होने वाले ऐतिहासिक ध्वजारोहण कार्यक्रम के लिए विधिविधान से पूजन अर्चन शुरू हुआ। इस अवसर पर पूर्ण वैदिक रीति से विभिन्न पूज्य देवताओं का आवाहन किया गया।

गुरुवार को हुई श्रद्धाभक्ति से परिपूर्ण सफल कलश यात्रा के बाद शुक्रवार सुबह से क्रमशः वैदिक मर्मज्ञ आचार्यों द्वारा गणपति पूजन, पंचांग पूजन, षोडष मातृका पूजन के बाद मंडप प्रवेश पूजन कराया गया। इसके बाद योगिनी पूजन, क्षेत्रपाल पूजन, वास्तु पूजन, नवग्रह पूजन, और प्रधान मंडल के रूप में रामभक्त मंडल व अन्य समस्त पूज्य मंडलों का आवाहन पूजन हुआ।

तदोपरान्त अरणि मंथन से अग्निकुण्ड में मंत्रोच्चार के साथ अग्नि स्थापना की गई। यजमान डॉ. अनिल मिश्र ने अर्द्धांगिनी सहित पूजन किया। इस अवसर पर मुख्य आचार्य चंद्रभान शर्मा, उप-आचार्य रविंद्र पैठणे, यज्ञ के ब्रह्मा व आचार्य पंकज शर्मा ने पूजन संपन्न कराया। पूजन व्यवस्था प्रमुख आचार्य इंद्रदेव मिश्र व आचार्य पंकज कौशिक की देखरेख में संपन्न हुई।

अतिथियों के लिए सात स्थानों पर संचालति होंगे भोजनालय

श्री राम जन्मभूमि मन्दिर ध्वजारोहण समारोह में आने वाले अतिथियों के लिए श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की ओर से अलग-अलग सात स्थानों पर आठ भोजनालय स्थापित किए गए हैं। आमंत्रित अतिथियों को भोजनालयों में जलपान के लिए पहुंचाया जाएगा। संपूर्ण परीक्षण के बाद ही यहां से आगे गोल्फ कोर्ट से कार्यक्रम में भेजा जाएगा। इसके लिए पानी की व्यवस्था की जा रही है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र द्वारा संचालित सीता रसोई के संचालक व विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मंत्री राजेंद्र सिहं “पंकज” के अनुसार सीता रसोई के अतिरिक्त देश के विभिन्न क्षेत्र में अन्न क्षेत्र चलाने वाले भक्त संगठन भी भोजनालयों में सहयोग कर रहे हैं।

चयनित स्थानों में कारसेवकपुरम में सीता रसोई के साथ पंजाब अमृतसर के दुर्ग्याना मंदिर की ओर से भोजन सेवा होगी। इसकी क्षमता 2 से 2.5 हजार आगंतुकों की है। इसके अतिरिक्त रामसेवकपुरम में सीता रसोई द्वारा 800 से एक हजार क्षमता वाले, कार्यशाला में जम्मू कश्मीर कटरा स्थित हनुमान मंदिर की ओर से भोजनालय संचालित होगा। यहां आने वाले सभी भक्तों को प्रसाद मिलेगा, संख्या का निर्धारण नहीं है। कनक महल में एक हजार की क्षमता का भोजनालय संचालित होगा। तीर्थक्षेत्रपुरम् में दो भोजनालयों का संचालन होगा। यहां की क्षमता भी लगभग ढाई हजार है। तीर्थक्षेत्र भवन में 800 से एक हजार क्षमता का भोजनालय संचालित होगा। इसके अतिरिक्त अंगद टीला में हरियाणा कैथल के भक्तों व सीता रसोई द्वारा यहां पहुंचने वाले समस्त श्रद्धालुओं को प्रसाद का वितरण होगा।

केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने किया छत्तीसकला ब्राण्ड एवं डिजिटल फाइनेंस बुकलेट का किया विमोचन

ग्रामीण महिला उत्पादों को मिला राज्य का पहला एकीकृत ब्राण्ड ‘छत्तीसकला’

      राज्य की ग्रामीण गरीब महिलाओं द्वारा निर्मित गुणवत्तापूर्ण उत्पादों को एक ही पहचान और एकीकृत बाजार मंच प्रदान करने के उद्देश्य से राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) ने ‘छत्तीसकला’ ब्राण्ड की शुरुआत की है। इस ब्रांड के अंतर्गत वर्तमान में मिलेट्स आधारित खाद्य उत्पाद, चाय, अचार, स्नैक्स, हैंडलूम एवं हस्तशिल्प निर्मित ढोकरा आर्ट, बांस शिल्प, मिट्टी एवं लकड़ी उत्पाद, अगरबत्ती एवं पूजा सामग्री जैसे विविध उत्पादों पर मानकीकरण, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के साथ व्यापक बाजार उपलब्ध कराने की योजना है। केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने कहा कि छत्तीसकला ब्रांड ग्रामीण महिलाओं की मेहनत, हुनर और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनेगा। यह ब्राण्ड उनके उत्पादों को राज्य से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक ले जाएगा।

48 बीसी सखियों की सफलता की गाथा का डिजिटल फाइनान्स बुकलेट का हुआ विमोचन

         कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने डिजिटल फायनान्स बुकलेट का भी विमोचन किया गया,  जिसमें राज्यभर की 48 बैंकिंग कोरेस्पोंडेंट सखियों (बीसी सखियों) की प्रेरणादायक सफलताओं को दर्ज किया गया है। 

3775 बीसी सखियाँ सक्रिय रूप  बैंकिंग सेवाएँ दे रही

       वर्तमान छत्तीसगढ़ में कुल 3775 बीसी सखियाँ सक्रिय रूप से घर-घर बैंकिंग सेवाएँ दे रही हैं और पिछले चार वर्षों में 3033.48 करोड़ से अधिक का वित्तीय लेन-देन कर चुकी हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जो महिलाएँ कभी घरों से बाहर निकलने में संकोच करती थीं, आज वही महिलाएँ गाँव-गाँव वित्तीय सेवाएँ पहुँचाकर सामाजिक व आर्थिक परिवर्तन की राह बना रही हैं।

हजारों स्व-सहायता समूह को मिला वित्तीय सशक्तिकरण

     इस भव्य कार्यक्रम से ग्रामीण महिला समूहों को बड़ी वित्तीय सहायता प्रदान की गई है। जिसके अंतर्गत 1080 स्व-सहायता समूहों को 1.62 करोड़ रुपए की रिवॉल्विंग निधि एवं 8340 स्व-सहायता समूहों को 50.04 करोड़ रूपए की सामुदायिक निवेश निधि, बैंक लिंकेज के रूप में 229.74 करोड़ रूपये प्रदान किये गए। इसके साथ ही 1533 महिला उद्यमियों को 6.23 करोड़ रुपए का उद्यमिता ऋण भी प्रदान किया गया है। इन वित्तीय प्रावधानों से ग्रामीण महिलाओं की आय में वृद्धि एवं नए उद्यमों की स्थापना और आर्थिक स्वावलंबन को मजबूती मिलेगी।

ग्रामीण समृद्धि, महिला नेतृत्व और आत्मनिर्भरता की नई दिशा

        धमतरी में हुआ यह आयोजन न केवल आर्थिक सहायता का वितरण था, बल्कि ‘आत्मनिर्भर ग्रामीण छत्तीसगढ़’ के संकल्प को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है। ‘छत्तीसकला’ ब्राण्ड, बीसी सखी मॉडल और व्यापक वित्तीय समर्थन तीनों मिलकर ग्रामीण आजीविका की दशा और दिशा बदलने वाले साबित होंगे।

भारत के उत्थान के लिए “भारत प्रथम” के सिद्धांत पर चलना अनिवार्य

गुवाहाटी, 19 नवम्बर 2025।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने असम और सम्पूर्ण पूर्वोत्तर के युवाओं से अपील की कि वे संघ के बारे में किसी प्रकार की पूर्वाग्रही धारणाओं या प्रायोजित प्रचार के आधार पर राय न बनाएं। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को संघ को नज़दीक से देखना और समझना चाहिए।

बुधवार को शहर के बरबाड़ी स्थित सुदर्शनालय में आयोजित युवा नेतृत्व सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों से आए सौ से अधिक युवा प्रतिनिधियों के समक्ष उन्होंने संघ के सिद्धांतों, आदर्शों और कार्यपद्धति पर विस्तार से रखा और संगठन के बारे में चल रही बहसों पर भी प्रकाश डाला।

दो दिवसीय असम प्रवास के तहत कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज संघ एक व्यापक चर्चा का विषय बन चुका है। “लेकिन चर्चाएँ तथ्यों पर आधारित हों।”

अंतरराष्ट्रीय मंचों और कई डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध आरएसएस संबंधी जानकारी का 50 प्रतिशत हिस्सा या तो गलत होता है या अधूरा। “विभिन्न मीडिया संस्थानों द्वारा संघ के खिलाफ सुनियोजित दुष्प्रचार भी चलाया जाता है।”

कार्यक्रम की शुरुआत गायक शरत राग द्वारा प्रस्तुत एक देशभक्ति गीत से हुई। आयोजन को पूरे पूर्वोत्तर के युवाओं के लिए संघ को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

सरसंघचालक जी ने संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की दृष्टि का उल्लेख करते हुए बताया कि संघ का मूल उद्देश्य भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाना है। राष्ट्र तभी उठता है, जब समाज उठता है। और प्रगतिशील भारत के लिए एक संगठित, गुणवान और गुणवत्तापूर्ण समाज का निर्माण आवश्यक है। उन्होंने विकसित देशों के इतिहास का अध्ययन करने की आवश्यकता बताई और कहा कि उन देशों ने पहली सौ वर्षों की यात्रा में समाज को एकजुट और मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दिया। “भारतीय समाज को भी इसी प्रकार विकसित होना होगा।”संघ के शताब्दी वर्ष पर घोषित पांच सामाजिक परिवर्तन सिद्धांत (पंच परिवर्तन) इसी भावना को व्यक्त करते हैं। सरसंघचालक जी ने कहा कि भाषा, क्षेत्र और विचारों की विविधताओं का सम्मान करना भारत की प्राचीन परंपरा है। “दुनिया के कई देशों में यह मानसिकता नहीं मिलती।”

भारत की परंपरा कहती है – “मेरा मार्ग सही है, लेकिन तुम्हारी परिस्थिति में तुम्हारा मार्ग भी सही हो सकता है।” उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जो लोग भारत से अलग हुए, उनकी विविधताएँ समाप्त होती गईं, जैसे पाकिस्तान में पंजाबी और सिंधी समाज अब उर्दू अपनाने पर विवश है। उन्होंने कहा कि विविधता का सम्मान करने वाला समाज हिन्दू समाज ही है और ऐसा समाज निर्मित करना ही संघ का प्रमुख उद्देश्य है। “जब तक भारतीय समाज संगठित और गुणयुक्त नहीं होगा, देश की नियति नहीं बदलेगी।”

उन्होंने गुरु नानक और श्रीमंत शंकरदेव का स्मरण करते हुए कहा कि इन महान संतों ने विविधता का सम्मान किया और समाज को एकता का संदेश दिया।

मोहन भागवत जी ने कहा कि आरएसएस एक आदर्श मनुष्य-निर्माण पद्धति है। संगठन का उद्देश्य जमीनी स्तर पर ग़ैर राजनीतिक सामाजिक नेतृत्व तैयार करना है। व्यक्ति के निर्माण से समाज बदलता है और समाज बदलता है तो व्यवस्था स्वयं बदल जाती है। उन्होंने युवाओं को आमंत्रित किया कि वे संघ की शाखाओं में प्रत्यक्ष अनुभव लें कि वहां किस प्रकार व्यक्तित्व का निर्माण, चरित्र का विकास और गुणों का संवर्धन किया जाता है।

उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार का अंत कानून से नहीं होगा, बल्कि चरित्र निर्माण से होगा। इसी प्रकार, गौ-संरक्षण केवल कानूनी प्रावधानों से संभव नहीं है; इसके लिए समाज में जागरूकता भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि भारत के उत्थान के लिए “भारत प्रथम” के सिद्धांत पर चलना अनिवार्य है। भारत को किसी भी विदेशी देश के प्रति न तो पक्षपाती होना चाहिए और न ही विरोधी। अमेरिका और चीन अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर चलते हैं, और उनकी आपसी प्रतिस्पर्धा भी इन्हीं हितों का परिणाम है, चाहे वे वैश्विक भाईचारे की कितनी ही बातें क्यों न करें। हमारी नीति बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए – भारत की विदेश नीति पूर्णतः ‘प्रो-भारत’ होनी चाहिए, न कि अमेरिका या चीन के पक्ष या विपक्ष में। जब हम अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हैं, तो वैश्विक कल्याण अपने-आप सुनिश्चित होता है। एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होगा और भविष्य में विश्व में उत्पन्न विभिन्न संघर्षों को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए एक अधिक सौहार्दपूर्ण वैश्विक व्यवस्था स्थापित कर सकेगा।

युवाओं से आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि वे अपनी रुचि, समय, क्षमता और अवसर के अनुसार संघ की गतिविधियों से जुड़ें। संघ समाज का अविभाज्य हिस्सा है और पूर्वोत्तर भारत में इसका आधार लगातार मजबूत होता जा रहा है।

जनजातीय गौरव दिवस समारोह का ऐतिहासिक क्षण : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु को भेंट की धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की बस्तर आर्ट प्रतिमा

रायपुर : जनजातीय गौरव दिवस समारोह का ऐतिहासिक क्षण : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु को भेंट की धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की बस्तर आर्ट प्रतिमा

रायपुर, 20 नवंबर 2025
जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर अंबिकापुर में आयोजित कार्यक्रम में एक प्रेरक एवं गरिमामय क्षण देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु को बस्तर आर्ट में निर्मित धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा स्मृति-चिह्न के रूप में भेंट की। यह प्रतिमा जनजातीय विरासत, शौर्य और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक मानी जाती है।
मुख्यमंत्री श्री साय द्वारा भेंट की गई यह मूर्ति भगवान बिरसा मुंडा के बलिदान और जनजातीय समाज की गौरवपूर्ण परंपराओं को सम्मानपूर्वक स्मरण कराने वाला एक सशक्त प्रतीक है। कार्यक्रम स्थल पर मौजूद दर्शकों ने इस भावनात्मक क्षण का गर्मजोशी से स्वागत किया।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि राज्य सरकार आदिवासी समाज की समृद्ध परंपराओं, कला, इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार जनजातीय समाज की विरासत, संस्कृति और अमूल्य योगदान को संजोने, संरक्षित करने और सशक्त रूप से आगे बढ़ाने के लिए पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। 
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि हमारा संकल्प है कि आदिवासी समाज के स्वाभिमान को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया जाए, ताकि उनकी गौरवशाली पहचान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा बने।
6048

संस्कृत विषय के प्रमाणपत्रीय पाठ्यक्रम का उद्‌घाटन एवं दीक्षारंभ समारोह का हुआ आयोजन

पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा IKS में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के द्वारा संस्कृत भाषा में एक सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स शुरू किया गया है l इसी समबन्ध में प्रमाण पत्रीय पाठ्यक्रम का उद्घाटन एवं दीक्षारंभ कार्यक्रम का आयोजन हुआ l

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० साच्चिदानन्द शुक्ला , तथा कार्य परिषद के वरिष्ठ सदस्य एवं विप्र महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ० मेघेश तिवारी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।समारोह में मुख्य वक्ता श्री दुधाधारी महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ० प्रवीण कुमार झारी थे।

कुलपति प्रो० साच्चिदानन्द शुक्लान कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक विरासत की मूलधारा है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल भारत की लगभग सभी महान ग्रंथ— वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत, रामायण, पुराण, आयुर्वेद, योग, ज्योतिष, वास्तु, दर्शनशास्त्र—सब संस्कृत में हैं। इन ग्रंथों की सही समझ केवल संस्कृत के माध्यम से ही संभव है। संस्कृत विज्ञान और गणित की प्राचीन तथा उन्नत भाषा है l संस्कृत में वैज्ञानिक भाषा की सबसे बड़ी विशेषता है: स्पष्टता (Precision) , बिना भ्रम के अभिव्यक्ति, कंप्यूटर-फ्रेंडली संरचना l NASA और कई विश्व के भाषाविदों ने इसे सबसे लॉजिकल और स्ट्रक्चर्ड लैंग्वेज माना है। संस्कृत भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत 80% से अधिक भारतीय भाषाओं की आधारभूत भाषा है।
यदि संस्कृत मजबूत होगी, तो हिन्दी, मराठी, बंगाली, उड़िया, कन्नड़, सभी भाषाएं समृद्ध होंगी। यह योग व आयुर्वेद की प्रामाणिक भाषा है l आज पूरी दुनिया योग और आयुर्वेद अपना रही है, पर उनकी असली व्याख्या और सूत्र संस्कृत में ही हैं।
उदाहरण: पतंजलि योगसूत्र, चरक-संहिता, सुश्रुत-संहिता आदि l संस्कृत भाषाई कौशल को बढ़ाती है संस्कृत सीखने से: तर्कशक्ति विकसित होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है, उच्चारण सुधरता है, व्याकरण और भाषा-ज्ञान में गहराई आती हैl संस्कृत राष्ट्र की एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है l भारत विविध भाषाओं वाला देश है। संस्कृत एक ऐसी भाषा है जो सभी क्षेत्रों को कुल-धर्म भाषा (Pan-Indian Language) की तरह जोड़ सकती हैl आज दुनिया भर में संस्कृत के

  • विश्वविद्यालय,
  • शोध केंद्र,
  • डिजिटल प्रोजेक्ट
  • भाषावैज्ञानिक अध्ययन
    तेजी से बढ़ रहे हैं। जिससे विश्व में संस्कृत भाषा की प्रतिष्ठा बढ़ रही है l
    यह इसकी वैश्विक महत्ता को प्रमाणित करता है l संस्कृत भारत की पहचान, बौद्धिक शक्ति, सांस्कृतिक मूल, वैज्ञानिक दृष्टि और आत्मगौरव की भाषा है। इसे अपनाना भारत की आत्मा को अपनाना है l

प्रो. ब्रम्हे ने बताया कि कार्यक्रम में 100 से अधिक विद्यार्थि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन केंन्द्र की शिक्षिका निशा मिश्रा ने किया। डॉ. मेघेश तिवारी ने छात्रों के लिए संस्निकृत के नियमित अध्ययन के साथ संस्कृत में प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम को उपयोगी बताया। विवि० के कुलअनुषासक प्रो. आशीष कुमार श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापित कर कार्यक्रम का समापन किया।

भारत का भविष्य केवल अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि संस्कृति, चरित्र और समन्वित ज्ञान से निर्धारित होगा – सुनील आंबेकर जी

काशी, 16 नवम्बर। काशी में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले साहित्यिक समागम “काशी शब्दोत्सव” के तृतीय संस्करण का शुभारम्भ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन सभागार में हुआ। समागम के उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी, मुख्य अतिथि श्रीहनुमन्निवास अयोध्या के श्रीमहंत आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत चतुर्वेदी थे।

सुनील आंबेकर जी ने कहा कि काशी में आधुनिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा का जो अद्वितीय संगम दिखाई देता है, वह हमारे राष्ट्र की वास्तविक शक्ति और दृष्टि का प्रतीक है। भारत की सांस्कृतिक धारा में नवीनता और परंपरा कभी परस्पर विरोधी नहीं रही; बल्कि नई परिस्थितियों के अनुरूप पुराने ज्ञान का पुनर्मूल्यांकन ही हमारी परंपरा का स्वभाव रहा है। समय चाहे कितना भी बदल जाए, भारत ने हमेशा यही दृष्टि रखी है कि पुराना और नया अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही प्रवाह के दो आयाम हैं। इसी विमर्श हेतु काशी में आयोजित काशी शब्दोत्सव आधुनिक विश्व के कल्याण का मंत्र देगा।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के समय भी यही भावना केंद्रीय थी- भारत के पारंपरिक ज्ञान को दुनिया के किसी भी कोने से आने वाले आधुनिक विज्ञान और तकनीक से जोड़कर एक समन्वित शिक्षा प्रणाली का निर्माण। इसी समन्वय ने पूरे देश में राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की और महाराष्ट्र सहित देश के कई भागों में राष्ट्रीय विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना हुई।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार स्वयं इसी राष्ट्रीय शिक्षा परंपरा का हिस्सा रहे। अंग्रेज़ी शासन के नील सिटी विद्यालय से वंदे मातरम् कहने पर निकाले जाने के बाद उनकी शिक्षा यवतमाल के राष्ट्रीय विद्यालय में हुई। आगे चलकर उन्होंने कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज में भी अध्ययन किया। जहाँ भारतीय परंपरा और विश्व के नवीनतम ज्ञान का संगम था। यह दर्शाता है कि, भारत ने दुनिया के नए ज्ञान को अपनाते हुए भी अपनी स्वयं की ज्ञानधारा को कभी छोड़ा नहीं, बल्कि उसे और समृद्ध किया।

इसी समन्वित दृष्टि के कारण भारत में ज्ञान की अनेक शाखाएँ विदेशी आक्रमणों और कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहीं। यदि यह प्रयास न होते, तो पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों का वह षड्यंत्र सफल होता जो भारतीय ज्ञान और संस्कृति को पूरी तरह समाप्त करना चाहते थे। परंतु हमारी परंपरा की शक्ति के कारण सरस्वती की धारा पुनः प्रवाहित हुई और आज भी हम उसके लाभार्थी हैं। काशी विश्वविद्यालय इसी अखंड परंपरा का सशक्त वाहक है।

आज दुनिया अत्याधुनिक तकनीकों – विशेषतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में प्रवेश कर चुकी है। पिछले तीन सौ वर्षों में तकनीक, मशीनों और बाज़ारों ने मानव जीवन को सुविधा तो दी, परंतु अनेक स्थानों पर मनुष्य और प्रकृति के बीच की संवेदनशीलता को क्षीण भी किया। दुनिया के कई देशों में ‘पारिवारिक ढाँचे, सामाजिक रिश्ते और पर्यावरण’ गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। मानव जीवन का मूल प्रश्न केवल तकनीकी उन्नति नहीं है, बल्कि यह है कि, तकनीक को नियंत्रित कौन करेगा? क्या मनुष्य तकनीक का चयन करेगा, या तकनीक और बाज़ार मनुष्य के जीवन का निर्धारण करेंगे? यही आगामी शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

भारत के सामने यह चुनौती है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाते हुए भी वह अपने ‘सांस्कृतिक मूल्यों – सात्विकता, करुणा, वसुधैव कुटुंबकम् और संतुलित जीवन’ को बनाए रखे। हमारी परंपरा में शक्ति और सात्विकता का मेल ही जीवन को कल्याणकारी बनाता है। शक्ति बिना सात्विकता के विनाश का कारण बनती है; परंतु शक्ति का उपयोग यदि नैतिकता, संयम और विश्व-कल्याण के लिए किया जाए, तो वह सृजन का आधार बनता है।

भारत ने कोविड-19 महामारी के समय इसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिया। विश्व के अनेक शक्तिशाली और सम्पन्न राष्ट्र वैक्सीन को बाज़ार और लाभ के दृष्टिकोण से देखते रहे, वहीं भारत ने उसे सेवा और मानवता के दृष्टिकोण से दुनिया के लिए उपलब्ध कराया। यह हमारे सांस्कृतिक संस्कारों का ही परिणाम था।

सुनील जी ने कहा कि आज भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार में निरंतर प्रगति हो रही है। लेकिन आर्थिक प्रगति के साथ-साथ एक नया विकास मॉडल तैयार करना आवश्यक है। जो केवल GDP आधारित न होकर संस्कृति, पर्यावरण, परिवार, नैतिकता और मानवता पर आधारित हो। पश्चिम के कई देशों ने यह भूल की है कि आर्थिक उन्नति ही जीवन का अंतिम उद्देश्य है और आज वे उसके दुष्परिणाम भोग रहे हैं। भारत को यह भूल दोहरानी नहीं चाहिए।

हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों तक समृद्धि और उत्कृष्ट संस्कृति – दोनों को साथ रखकर दिखाया था। आज हमें पुनः वही अवसर प्राप्त हो रहा है। इस अवसर को तभी सार्थक बनाया जा सकता है, जब हम तकनीकी प्रगति को भारतीय जीवन मूल्यों से जोड़ें। इस प्रक्रिया में चरित्र निर्माण सर्वोपरि है। चरित्रहीनता किसी भी समाज, संगठन या राष्ट्र की एकता को नष्ट कर देती है। अच्छे चरित्र का निर्माण भी किसी अन्य कौशल की तरह अभ्यास से ही होता है जो बचपन से शुरू होकर आजीवन चलता है।

भारत हजारों वर्षों तक विविधताओं के बावजूद इसलिए एकजुट रहा, क्योंकि उसके लोगों में उच्च चरित्र और नैतिकता थी। यदि आज समाज में तनाव, विभाजन और प्रवंचना दिखाई देती है, तो उसका मूल कारण चरित्र और संस्कारों की कमी है। इसलिए ‘व्यक्ति का चरित्र और राष्ट्र की आराधना’ दोनों साथ-साथ चलते हैं।

IIT मुंबई में चल रहा एआई और भारतीय ज्ञान–परंपरा का संयुक्त प्रकल्प इस बात का प्रमाण है कि भारत आधुनिक तकनीक को भी सांस्कृतिक दृष्टि से एकात्म करने की क्षमता रखता है। धर्म और संस्कृति को आधुनिक संदर्भ में समझना भी आज अत्यंत आवश्यक है। भारतीय संस्कृति बाइनरी या विभाजनकारी दृष्टि पर आधारित नहीं है। हम मुकाबले में नहीं, बल्कि परस्पर-पूरक दृष्टि में विश्वास रखते हैं। शहर-गाँव, पुरुष-स्त्री, परंपरा-आधुनिकता, विज्ञान-अध्यात्म, भाषा, ये सब विरोध नहीं, बल्कि एक ही अखंड संस्कृति के विविध रूप हैं।

उन्होंने कहा कि संवाद ही हमारी संस्कृति का मूल है। बिना संवाद परिवार, समाज और राष्ट्र नहीं टिक सकते। आज दुनिया में अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ केवल राजनीतिक संतुलन ढूँढती हैं। परंतु शांति का वास्तविक आधार संवाद, समझ और सहानुभूति ही है। भाषाई विवाद, क्षेत्रीय राजनीति, जातीय विभाजन – ये सब भारत की एकता के विरुद्ध षड्यंत्र हैं। काशी–तमिल संगम जैसी पहल यह दर्शाती है कि संवाद और संस्कृति के माध्यम से भारत की एकात्मता और अखंडता और अधिक सुदृढ़ हो सकती है।

अतः आधुनिक विकास और भारतीय संस्कृति को अलग-अलग देखना एक गंभीर भूल होगी। दोनों को जोड़कर ही भारत दुनिया को एक नया मानवीय, संतुलित और कल्याणकारी विकास मॉडल दे सकता है। इसी दिशा में काशी का यह उत्सव- भारतीय विचार, संस्कृति, संवाद और आधुनिक दृष्टि-सभी को एक मंच पर लाकर हमें मार्गदर्शन देता है और बताता है कि, भारत का भविष्य केवल अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि संस्कृति, चरित्र और समन्वित ज्ञान से निर्धारित होगा।

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि एवं अयोध्या हनुमन्ननिवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदनी शरण जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति “शब्दों में साँस लेती है”। कोई भी समाज अपने शब्दों को सहेजकर अपनी पहचान सुरक्षित रखता है। कबीर और रामानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि इनके माध्यम से काशी से समरसता का संदेश गया। आज की पीढ़ी अक्सर शब्दों को उतना महत्व नहीं देती, जितना देना चाहिए। हर शब्द की अपनी गर्माहट और शीतलता होती है, और शब्दोत्सव इन सूक्ष्मताओं को पुनः अनुभव कराने में सहायक है।

बीएचयू के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि यह उत्सव भारतीय संस्कृति के पुनरोद्धार और उसकी उन्नति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। उन्होंने प्रख्यात उड़िया रचनाकार उपेंद्र भज्ज के कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज के समाज को सांस्कृतिक दृष्टा चाहिए। इसी तरह के विमर्श से समाज को अगला कबीर और अगला शंकराचार्य मिलेगा जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन, और ज्ञानवर्धन करेगा। उन्होंने कहा कि शब्दोत्सव समाज को शब्दों, विचारों और भारत की शाश्वत सांस्कृतिक धरोहर को गहराई से जोड़ता है।

कार्यक्रम के संयोजक डॉ. हरेंद्र कुमार राय ने मंचस्थ सभी अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मंगलाचरण, द्वीप प्रज्ज्वलन एवं बीएचयू के छात्रों द्वारा कुलगीत की प्रस्तुति से हुआ। कार्यक्रम का संचालन डॉ. शुचिता त्रिपाठी ने किया।

लोकहित प्रकाशन लखनऊ द्वारा प्रकाशित पुस्तकों –  “कृतिरूप संघ दर्शन” के साथ ही “हिन्दू, हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति”, प्रो. उदय प्रताप सिंह की पुस्तक ”भक्त कालीन साहित्य और चित्तिमूलक विमर्श”, प्रो. रचना शर्मा की पुस्तक ”आजादी के रणबांकुरे और काशी”, डॉ. लहरीराम मीणा की पुस्तक “The Hope I left with” का लोकार्पण हुआ।

रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने ‘पंडुम कैफे’ का किया शुभारंभ

पंडुम कैफे का शुभारंभ बस्तर में नक्सल उन्मूलन की दिशा में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का प्रेरक प्रतीक – मुख्यमंत्री श्री साय

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने बस्तर में सामाजिक-आर्थिक बदलाव के नए अध्याय की शुरुआत करते हुए आज जगदलपुर में ‘पंडुम कैफ़े’ का शुभारंभ किया। यह कैफ़े नक्सली हिंसा के पीड़ितों और समर्पण कर चुके सदस्यों के पुनर्वास हेतु छत्तीसगढ़ सरकार की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसने हिंसा का मार्ग छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वालों को सम्मानजनक और स्थायी आजीविका प्रदान करने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है। यह अनूठी पहल संघर्ष से सहयोग तक के प्रेरणादायक सफर को दर्शाती है।‘पंडुम कैफ़े’ जगदलपुर के पुलिस लाइन परिसर में स्थित है।

 मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने 'पंडुम कैफे' का किया शुभारंभ

मुख्यमंत्री श्री साय ने ‘पंडुम कैफे’   में कार्यरत नारायणपुर की फगनी, सुकमा की पुष्पा ठाकुर, बीरेंद्र ठाकुर, बस्तर की आशमती और प्रेमिला बघेल के साथ सौहार्दपूर्ण बातचीत की। उन्होंने नई शुरुआत के लिए उनका हौसला बढ़ाया और ‘पंडुम कैफ़े’ के बेहतर संचालन के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं भी दीं।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि पंडुम कैफ़े का शुभारंभ बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का एक प्रेरक प्रतीक है। मुख्यमंत्री ने श्री साय ने कहा कि पंडुम कैफे आशा, प्रगति और शांति का उज्ज्वल प्रतीक है। कैफे में कार्यरत युवा, जो नक्सली हिंसा के पीड़ित तथा हिंसा का मार्ग छोड़ चुके सदस्य हैं, अब शांति के पथ पर अग्रसर हो चुके हैं। जिला प्रशासन और पुलिस के सहयोग से उन्हें आतिथ्य सेवाओं, कैफ़े प्रबंधन, ग्राहक सेवा, स्वच्छता मानकों, खाद्य सुरक्षा और उद्यमिता कौशल का गहन प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।

हिंसा का मार्ग छोड़कर शांति के पथ पर लौटे और कैफ़े में कार्यरत एक महिला ने इस अवसर पर भावुक होकर इस पुनर्वास पहल से हुए बदलाव की बात दोहराई। एक पूर्व माओवादी कैडर ने कहा कि,“हमने अपने अतीत में अंधेरा देखा था। आज हमें समाज की सेवा करने का यह अवसर मिला है, यह हमारे लिए एक नया जन्म है। बारूद की जगह कॉफी परोसना और अपनी मेहनत की कमाई से जीना—यह एहसास हमें शांति और सम्मान दे रहा है।”

एक अन्य सहयोगी ने अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि,“पहले हम अपने परिवार को सम्मानजनक जीवन देने का सपना भी नहीं देख सकते थे। अब हम अपनी मेहनत से कमाए पैसों से घर के सदस्यों का भविष्य संवार सकते हैं। यह सब प्रशासन और इस कैफ़े की वजह से संभव हुआ है।”

एक अन्य सदस्य ने समुदाय के सहयोग पर जोर देते हुए कहा कि,“हमें लगा था कि मुख्यधारा में लौटना आसान नहीं होगा, लेकिन पुलिस और जिला प्रशासन ने हमें प्रशिक्षण दिया और हमारा विश्वास जीता। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अब पीड़ितों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे हमें अपने अतीत के अपराधों को सुधारने और शांति स्थापित करने का अवसर मिला है।”

उन्होंने यह भी बताया कि ‘पंडुम’ बस्तर की सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाता है, और इसकी टैगलाइन “जहाँ हर कप एक कहानी कहता है” इस बात का प्रतीक है कि यहाँ परोसी गई कॉफी सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष पर विजय और एक नई शुरुआत की कहानी भी अपने साथ लेकर आती है।

इस अवसर पर वन मंत्री श्री केदार कश्यप, शिक्षा मंत्री श्री गजेन्द्र यादव, सांसद श्री महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक श्री किरण सिंह देव, चित्रकोट विधायक श्री विनायक गोयल, बेवरेज कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष श्री श्रीनिवास राव मद्दी, अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष श्री रूपसिंह मंडावी, जगदलपुर महापौर श्री संजय पांडे, जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती वेदवती कश्यप, संभागायुक्त श्री डोमन सिंह, पुलिस महानिरीक्षक श्री सुन्दरराज पी., कलेक्टर श्री हरिस एस., पुलिस अधीक्षक श्री शलभ सिन्हा सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण एवं वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारीगण भी उपस्थित थे।

रायपुर : 48वां रावत नाचा महोत्सव : लाल बहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय

रावत नाचा सांस्कृतिक एकता का प्रतीक — मुख्यमंत्री श्री साय

बिलासपुर के लाल बहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में 48वें रावत नाचा महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। नाचा महोत्सव में शामिल होने मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय लाल बहादुर शास्त्री शाला प्रांगण पहुंचे। आगमन पर महोत्सव के संरक्षक श्री कालीचरण यादव एवं समिति के पदाधिकारियों द्वारा पुष्पहार पहनाकर मुख्यमंत्री का आत्मीय स्वागत किया गया। इसके पश्चात मुख्यमंत्री एवं अतिथियों ने भगवान श्रीकृष्ण के छायाचित्र पर माल्यार्पण कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया।

कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री श्री तोखन साहू, उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव, स्कूल शिक्षा मंत्री श्री गजेंद्र यादव, तखतपुर विधायक श्री धर्मजीत सिंह, बिल्हा विधायक श्री धरमलाल कौशिक, बेलतरा विधायक श्री सुशांत शुक्ला, चंद्रपुर विधायक श्री रामकुमार यादव, कोटा विधायक श्री अटल श्रीवास्तव, मस्तूरी विधायक श्री दिलीप लहरिया तथा महापौर सुश्री पूजा विधानी सहित अनेक जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक एवं बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय पारंपरिक रावत नाचा वेशभूषा में मंच पर पहुंचे और कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। उन्होंने कहा कि “यदुवंशी समाज वह समाज है, जहां प्रभु श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। छत्तीसगढ़ की नृत्य–गायन परंपरा हमारी सांस्कृतिक समृद्धि और एकता का सजीव प्रतीक है।” मुख्यमंत्री ने ‘तेल फूल में लइका बाढ़े…’ दोहा गाकर यदुवंशी समाज एवं नर्तन दलों को आशीर्वचन भी दिया।

केंद्रीय राज्य मंत्री श्री तोखन साहू ने रावत नाचा को यदुवंशी समाज के शौर्य, संस्कृति और कला का अप्रतिम प्रदर्शन बताया तथा मंच से दोहे गाकर सभी को शुभकामनाएँ दीं। उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव ने कहा कि “48 वर्षों से इस गौरवशाली परंपरा को बनाए रखना समाज की एकजुटता, अनुशासन और सांस्कृतिक गर्व का प्रमाण है।” उन्होंने समस्त समाज एवं नर्तक दलों को शुभकामनाएँ दीं।

बिलासपुर विधायक श्री अमर अग्रवाल ने अपने संबोधन में कहा कि “रावत नाचा बिलासपुर की 48 वर्षों की गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर है, जिसका संरक्षण समिति द्वारा निरंतर किया जा रहा है। समाज के मंगल और सद्भाव के लिए यदि कोई समाज सतत प्रयासरत है, तो वह यादव समाज है।” उन्होंने सभी को महोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं।

स्कूल शिक्षा मंत्री श्री गजेंद्र यादव ने कहा कि “बिलासा की पावन धरा पर रावत नाचा महोत्सव का आयोजन होना सौभाग्य की बात है। यदुवंशी समाज के लोग घर–घर जाकर सर्व समाज की मंगलकामना करते हैं।” उन्होंने कार्यक्रम में शामिल होने हेतु मुख्यमंत्री का आभार जताया।

महोत्सव के संरक्षक डॉ. कालीचरण यादव ने स्वागत उद्बोधन देते हुए रावत नाचा की गौरवशाली परंपरा पर प्रकाश डाला और कहा कि पिछले 47 वर्षों से रावत नाचा महोत्सव यदुवंशी समाज की संस्कृति, सम्मान और सांस्कृतिक पहचान का मजबूत प्रतीक बना हुआ है।

पारंपरिक वेशभूषा में नर्तक दलों के बीच पहुंचे मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय पारंपरिक वेशभूषा में राउत नाचा दलों के बीच पहुंचे और ढोल–नगाड़ों की गूंजती धुन पर उनके साथ झूमकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाया। उन्होंने नर्तक दलों की मनमोहक प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि रावत नाचा जैसी सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी और हमारी परंपराओं को सदैव जीवित रखेगी।

सनातन विचार ही एकात्म मानव दर्शन है – डॉ. मोहन भागवत जी

जयपुर, 15 नवम्बर। आज एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान की ओर से आयोजित दीनदयाल स्मृति व्याख्यान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि सनातन विचार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने देश, काल, परिस्थिति के अनुसार एकात्म मानव दर्शन का नया नाम देकर लोगों के समक्ष रखा। यह विचार नया नहीं है, 60 वर्ष बाद भी वर्तमान समय में यह एकात्म मानव दर्शन पूरे विश्व के लिए प्रासंगिक है।

एकात्म मानव दर्शन को एक शब्द में समझना है तो वह शब्द है धर्म। इस धर्म का अर्थ रिलिजन, मत, पंथ, संप्रदाय नहीं है। इस धर्म का तात्पर्य गंतव्य से है, सब की धारणा करने वाला धर्म है। वर्तमान समय में दुनिया को इसी एकात्म मानव दर्शन के धर्म से चलना होगा। सरसंघचालक जी ने कहा कि भारतीय जब भी बाहर गए किसी को लूटा नहीं, किसी को पीटा नहीं, सबको सुखी किया।

भारत में भी पिछले कई दशकों में रहन-सहन, खानपान, वेशभूषा सब बदला होगा, किंतु सनातन विचार नहीं बदला। वह सनातन विचार ही एकात्म मानव दर्शन है और उसका आधार यह है कि सुख बाहर नहीं, हमारे भीतर ही होता है। हम अंदर का सुख देखते हैं, तब समझ में आता है कि पूरा विश्व एकात्म है। इस एकात्म मानव दर्शन में अतिवाद नहीं है।

उन्होंने कहा कि सत्ता की भी मर्यादा है। सबका हित साधते हुए अपना विकास करना यह वर्तमान समय की आवश्यकता है। पूरे विश्व में अनेक बार आर्थिक उठापटक होती हैं, लेकिन भारत पर इसका असर सबसे कम होता है क्योंकि भारत के अर्थतंत्र का आधार यहां की परिवार व्यवस्था है।

डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि वर्तमान में विज्ञान की प्रगति चरम पर जा रही है। विज्ञान के आधार पर सबका जीवन भौतिक सुविधाओं से संपन्न हो, ऐसे प्रयास हो रहे हैं। लेकिन क्या मनुष्य के मन में शांति और संतोष भी बढ़ रहा है। विज्ञान की प्रगति के कारण बहुत सी नई दवाइयां बनी हैं, किंतु क्या स्वास्थ्य पहले की तुलना में अधिक ठीक हुआ है। कुछ बीमारियों का तो कारण ही कुछ दवाइयां हैं।

उन्होंने कहा कि हमारे यहां प्रारंभ से ही अनेक विषयों में विविधता रही है, लेकिन हमारे यहां की विविधता कभी झगड़े का कारण नहीं बनी। अपितु हमारे यहां की विविधता उत्सव का विषय बनी। हमारे यहां पहले से अनेक देवी देवता थे, कुछ और भी आ गए तो हमें कोई समस्या नहीं हुई। उन्होंने कहा कि दुनिया यह तो जानती है कि शरीर, बुद्धि और मन का सुख होता है। लेकिन उसे एक साथ कैसे प्राप्त किया जाए, यह दुनिया नहीं जानती। यह केवल भारत जानता है क्योंकि भारत में शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा सभी के सुख का विचार है।

कार्यक्रम की प्रस्तावना एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा ने रखी। उन्होंने कहा कि संपूर्ण सृष्टि एकात्म है। सृष्टि का एक कण भी हिलता है तो संपूर्ण सृष्टि पर असर दिखता है। इस समय वंदे मातरम् की रचना का 150वां वर्ष चल रहा है और वर्तमान परिस्थितियों में पूरा वंदे मातरम् गाना अत्यंत आवश्यक है।

स्वास्थ्य कल्याण ग्रुप के निदेशक डॉ. एस.एस. अग्रवाल ने आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया एवं डॉ. नर्बदा इंदौरिया ने कार्यक्रम का संचालन किया।

ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म की सामग्री का नियमन हो

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि समाज की गरिमा और नैतिकता को नष्ट करने की छूट दी जाए

17वां राष्ट्रीय अधिवेशन, 7, 8, 9 नवंबर 2025 – रीवा

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के रीवा अधिवेशन -2025 में पारित प्रस्ताव

परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई, और परोपकराय सताम् विभूतयः की मान्यता पर आधारित हमारी संस्कृति आज अति भौतिकता से प्रभावित होकर बाजारवाद का संत्रास झेल रही है। आज हम जिस घोर व्यावसायिक समय में जी रहे हैं, उसने जीवन के मूलभूत संसाधनों को व्यापार में परिवर्तित कर दिया है। तकनीकों पर बाजारवादी शक्तियों का नियंत्रण है। इसी की परिणति है कि डिजिटल मीडिया का एक अति विशाल उद्योगतंत्र खड़ा हो गया है तथा पारंपरिक प्रसारण माध्यमों की जगह ऑनलाइन स्ट्रीमिंग ने ले ली है। ओवर-द-टॉप (ओटीटी) के सभी प्लेटफॉर्म और गेमिंग एप्स पर अधिकांश मनोरंजन की सामग्री का स्वरूप बदलकर नकारात्मक एवं जीवन मूल्यों रहित होता जा रहा है।

मनोरंजन के नाम पर इनके द्वारा जो हिंसक, अश्लील एवं मर्यादाहीन सामग्रियां परोसी जा रही हैं, वे अत्यंत लज्जास्पद एवं निंदनीय हैं। ये युवावर्ग और बालमन व मस्तिष्क में उग्रता, अश्लीलता, विकृत यौनाचार और नशाखोरी जैसे दुराचारों को महिमा मंडित कर उन्हें अधोपतन की ओर अग्रसित कर रही हैं। इन माध्यमों में प्रदर्शित अधिकांश दृश्य, वोकिज़्म और नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाली होती हैं। आज इस तरह के प्लेटफॉर्म और गेमिंग एप्स युवाओं को आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रहे हैं। साथ ही अधिकांश प्लेटफॉर्म भारत के सांस्कृतिक मूल्यों एवं परम्पराओं पर आघात कर उनको विकृत रूप में चित्रित करती हैं। इनका अनियंत्रित प्रसारण समाज एवं राष्ट्र जीवन के लिए अत्यधिक घातक है।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जो भारतीय साहित्य, संस्कृति और चिंतन के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए समर्पित है, इस गंभीर स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। परिषद का यह मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि समाज की गरिमा और नैतिकता को नष्ट करने की छूट दी जाए। स्वतंत्रता और अनुशासन, सृजन और मर्यादा, ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

अतः यह अधिवेशन भारत सरकार तथा सभी राज्य सरकारों से मांग करता है कि –

  1. ओ.टी.टी. प्लेटफॉर्म एवं गेमिंग एप्स पर प्रसारित होने वाली प्रत्येक सामग्री के परीक्षण, नियमन, और वर्गीकरण हेतु शासन द्वरा एक सशक्त, स्वायत्त विधायी नियामक संस्था का गठन किया जाए।
  2. डिजिटल माध्यमों में प्रस्तुत किसी भी दृश्य, संवाद या विचार जो भारत की संविधानिक गरिमा, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक मूल्यों या सामाजिक मर्यादा और सनातन परंपरा को आहत करते हों, उन पर कड़ी निगरानी रखी जाए।
  3. किशोरों और युवाओं के लिए उपयुक्त सामग्री के आयु आधारित नियंत्रण तंत्र को अनिवार्य बनाया जाए।
  4. जो मंच या माध्यम अश्लीलता, हिंसा, नशाखोरी या विकृत जीवन मूल्यों का प्रचार करते हैं, उनके विरुद्ध कठोर कानूनी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
  5. भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संवर्धन हेतु भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक मनोरंजन माध्यमों को प्रोत्साहित किया जाए।

अंत में, अखिल भारतीय साहित्य परिषद का मानना है कि साहित्य, संस्कृति और समाज की शुचिता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब जनमानस में सजगता, संवेदनशीलता और नैतिकता बनी रहे। अतः अखिल भारतीय साहित्य परिषद भारत सरकार तथा सभी राज्य सरकारों से यह मांग करती है कि उपर्युक्त सभी विषयों का संज्ञान लेकर इस दिशा में उचित कदम उठाए।