मुख्यमंत्री संविधान हत्या दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में हुए शामिल: आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित प्रदर्शनी का किया अवलोकन
रायपुर, 25 जून 2025
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय आज राजधानी रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित संविधान हत्या दिवस कार्यक्रम में शामिल हुए।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि यह अत्यंत आवश्यक है कि लोकतंत्र की हत्या के उस काले दिन को हमारी भावी पीढ़ी भी जाने, समझे और उससे सीख ले। आपातकाल के दौर को याद करते हुए भावुक हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वह कालखंड मेरे जीवन से गहराई से जुड़ा है। यह मेरे लिए मात्र एक घटना नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत पीड़ा है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि उनके बड़े पिताजी स्वर्गीय श्री नरहरि प्रसाद साय आपातकाल के दौरान 19 माह तक जेल में रहे। उस समय लोकतंत्र सेनानियों के घरों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी—कई बार घर में चूल्हा तक नहीं जलता था। ऐसे अनेक परिवारों को मैंने स्वयं देखा है। उन्होंने कहा कि निरंकुश सत्ता ने उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दिया था, नागरिक अधिकार छीन लिए गए थे। वास्तव में, वह लोकतंत्र का काला दिन था, जिसका दंश हमारे परिवार ने झेला है और जिसे मैंने स्वयं जिया है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कार्यक्रम के दौरान लोकतंत्र सेनानी परिवारों के सदस्यों से भेंट कर उन्हें सम्मानित किया तथा शॉल, श्रीफल एवं प्रतीक चिन्ह भेंट किए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार लोकतंत्र सेनानी परिवारों को सम्मान देने का कार्य कर रही है। इन परिवारों को प्रतिमाह 10 हजार से 25 हजार रुपए तक की सम्मान राशि दी जा रही है—यह उनके संघर्ष और बलिदान को नमन करने का एक विनम्र प्रयास है।
कार्यक्रम में उपस्थित छात्र-छात्राओं और युवाओं को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि संविधान की रक्षा हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे आपातकाल के इतिहास को जानें, पढ़ें और समझें कि किस प्रकार उस कालखंड में संविधान को कुचला गया था। लोकतंत्र को जीवित रखने और सशक्त करने के लिए जन-जागरूकता और सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि भारत के संविधान और लोकतंत्र पर आपातकाल एक ऐसा कलंक है, जिसे इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज किया गया है। आपातकाल थोपकर न केवल संविधान को निष्क्रिय कर दिया गया, बल्कि मौलिक अधिकारों को समाप्त कर लोकतंत्र की आत्मा को कुचल दिया गया। उन्होंने कहा कि उस समय देश को एक खुली जेल में बदल दिया गया था, जिसमें भय और आतंक का वातावरण था। एक लाख से अधिक लोगों को बिना न्यायिक प्रक्रिया के जेलों में बंद कर दिया गया, और उन्हें यातनाएं दी गईं। यह केवल राजनीतिक दमन का दौर नहीं था, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक चेतना को समाप्त करने का सुनियोजित प्रयास था। डॉ. सिंह ने युवाओं से आह्वान किया कि वे आपातकाल के विषय में शोध करें, पढ़ें और समझें कि लोकतंत्र की रक्षा हेतु कितने लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। भविष्य में लोकतंत्र को सुरक्षित बनाए रखने के लिए हमें सदैव जागरूक और सजग रहना होगा।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र का सबसे शर्मनाक और काला दिन था। इस दिन संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को जिस तरह से कुचला गया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में नहीं मिलता। संविधान में मनमाने ढंग से संशोधन किए गए, जिससे देश की आत्मचेतना और नागरिक अधिकारों का दमन हुआ।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री साय ने आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित जनजागरूकता रैली में भी भाग लिया।
मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष ने आपातकाल पर आयोजित विशेष प्रदर्शनी का किया अवलोकन
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आधारित विशेष प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस प्रदर्शनी में आपातकाल के दौरान की दमनकारी नीतियों, मानवाधिकारों के उल्लंघन और लोकतंत्र के हनन को चित्रों एवं दस्तावेजों के माध्यम से दर्शाया गया।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय है, जिसे विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए। ऐसी प्रदर्शनी नई पीढ़ी को लोकतंत्र और संविधान के महत्व को समझाने में सहायक सिद्ध होगी।
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रदर्शनी लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वालों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
इस अवसर पर उद्योग मंत्री श्री लखन लाल देवांगन, विधायकगण श्री पुरंदर मिश्रा, गुरु खुशवंत साहेब, श्री मोतीलाल साहू, सीएसआईडीसी के अध्यक्ष श्री राजीव अग्रवाल, छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के अध्यक्ष श्री नीलू शर्मा, लोकतंत्र सेनानी संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सच्चिदानंद उपासने, प्रदेश अध्यक्ष श्री दिवाकर तिवारी, छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री शशांक शर्मा तथा संचालक संस्कृति श्री विवेक आचार्य सहित बड़ी संख्या में विद्वान, लोकतंत्र सेनानी और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
वर्ष 1925 में प्रारंभ हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा इस वर्ष विजयादशमी पर अपनी शताब्दी का मील का पत्थर प्राप्त करेगी। आज संघ सबसे अनूठा, व्यापक और राष्ट्रव्यापी संगठन बन गया है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के बाद संघ का जो संकल्प और आह्वान सामने आया, उसमें इस यात्रा के मूल्यांकन, आत्ममंथन और संघ के मूल विचार के प्रति पुनः समर्पण का आह्वान किया गया है। संघ की कार्यप्रणाली कैसी है और इसके आयाम क्या हैं? वे कौन से मोड़ थे, वे कौन सी घटनाएं थीं, जिनसे गुजरकर संघ आज इस रूप में हमारे सामने खड़ा है। संघ के विरोधी क्या सोचते हैं और संघ अपने विरोधियों के बारे में क्या सोचता है? संघ आज क्या है और संघ कल क्या होगा? इन सभी सवालों और आगे की राह जानने के लिए, ऑर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर, पांचजन्य संपादक हितेश शंकर, मराठी साप्ताहिक विवेक की संपादक अश्विनी मयेकर और मलयालम दैनिक जन्मभूमि के सह संपादक एम. बालाकृष्णन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत से विस्तृत बातचीत की। (यह बातचीत 21-23 मार्च, 2025 को आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की पृष्ठभूमि में और ऑपरेशन सिंदूर से पहले की गई थी)। संपादित अंश —
प्र – आप संघ के एक स्वयंसेवक एवं सरसंघचालक के नाते संघ की 100 वर्ष की यात्रा को कैसे देखते हैं?
डॉ. हेडगेवार जी ने संघ का कार्य बहुत सोच समझकर शुरू किया । देश के सामने जो कठिनाईयाँ दिखती हैं, उनका क्या उपाय करना चाहिए यह प्रयोगों के आधार पर निश्चित किया गया और वह उपाय अचूक रहा । संघ की कार्य पद्धति से काम हो सकता है और मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को पार कर संघ आगे बढ़ सकता है, यह अनुभव से सिद्ध होने को 1950 तक का समय लग गया । उसके बाद संघ का देशव्यापी विस्तार और उसके स्वयंसेवकों का समाज में अभिसरण शुरू हुआ । आगे चार दशक तक संघ के स्वयंसेवकों ने समाज जीवन के अन्यान्य क्षेत्रों में उत्तम रीति से कार्य करते हुए अपने कर्तृत्व, अपनत्व तथा शील के आधार पर समाज का विश्वास अर्जित किया तथा 1990 के पश्चात इस विचार एवं गुण संपदा के आधार पर देश को चलाया जा सकता है, यह सिद्ध कर दिखाया। अब इसके आगे हमारे लिए करणीय कार्य यह है कि इसी गुणवत्ता का तथा विचार का अवलंबन कर पूरा समाज सब भेद भूलकर प्रामाणिकता व नि:स्वार्थ बुद्धि से देश के लिए स्वयं कार्य करने लगे, और देश को बड़ा बनाए।
प्र – 100 वर्ष की इस यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव क्या थे?
संघ के पास कुछ नहीं था। विचार की मान्यता नहीं थी, प्रचार का साधन नहीं था, समाज में उपेक्षा और विरोध ही था। कार्यकर्ता भी नहीं थे। संगणक में इस जानकारी को डालते तो, वह भविष्यवाणी करता कि यह जन्मते ही मर जाने वाला है। लेकिन देश विभाजन के समय हिंदुओं की रक्षा की चुनौती व संघ पर प्रतिबन्ध की कठिन विपत्तियों में से संघ सफल होकर निकला और 1950 तक यह सिद्ध हो गया कि संघ का काम चलेगा, बढ़ेगा। इस पद्धति से हिन्दू समाज को संगठित किया जा सकता है। आगे संघ का पहले से भी अधिक विस्तार हो गया। इस संघ शक्ति का महत्त्व 1975 के आपातकाल में संघ की जो भूमिका रही, उसके कारण समाज के ध्यान में आया। आगे एकात्मता रथ यात्रा, कश्मीर के सम्बन्ध में समाज में जनजागरण तथा श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन व विवेकानंद सार्धशति जैसे अभियानों के माध्यमों से तथा सेवा कार्यों के प्रचंड विस्तार से संघ विचार तथा संघ के प्रति विश्वसनीयता का भाव समाज में अच्छी मात्रा में विस्तारित हुआ।
प्र – 1948 और 1975 में संघ पर जो संकट आए, संगठन ने उससे क्या सीखा?
यह दोनों प्रतिबन्ध लगने के पीछे राजनीति थी। प्रतिबन्ध लगाने वाले भी जानते थे कि संघ से नुकसान कुछ नहीं, अपितु संघ से लाभ ही है। इतने बड़े समाज में स्वाभाविक ही चलने वाली विचारों की प्रतिस्पर्धा में अपना राजनैतिक वर्चस्व बनाए रखने का प्रयास करने वाले सत्तारूढ़ लोगों ने संघ पर प्रतिबन्ध लगाया। पहले प्रतिबन्ध में सभी बातें संघ के विपरीत थीं। संघ को समाप्त हो जाना था। परन्तु सब विपरीतता के बावजूद संघ उस प्रतिबन्ध में से बाहर आया और आगे 15-20 वर्षों में पूर्ववत होकर पूर्व से भी आगे बढ़ गया। संघ के स्वयंसेवक जो केवल शाखाएं चलाते थे, समाज के क्रियाकलापों में बड़ी भूमिका नहीं रखते थे, वे समाज के अन्यान्य क्रियाकलापों में सहभागी होकर वहां अपनी भूमिका सुनिश्चित करने लगे। 1948 के प्रतिबन्ध से संघ को यह लाभ हुआ कि हमने अपने सामर्थ्य को जाना और समाज में और व्यवस्थाओं में परिवर्तन लाने की ओर स्वयंसेवक योजना बनाकर अग्रसर हुए। संघ के विचार में पहले से तय था कि संघ कार्य केवल एक घंटे की शाखा तक मर्यादित नहीं है, बल्कि शेष 23 घंटे के अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सार्वजनिक तथा आजीविका के क्रियाकलापों में संघ के संस्कारों की अभिव्यक्ति भी करनी है। आगे चलकर 1975 के प्रतिबन्ध में समाज ने संघ के इस बढ़े हुए दायरे की शक्ति का अनुभव किया। जब अच्छे-अच्छे लोग निराश होकर बैठ गए थे, तब सामान्य स्वयंसेवक भी यह संकट जाएगा और इसमें से हम सब सही सलामत बाहर आएंगे, ऐसा विश्वासपूर्वक सोचता था। 1975 के आपातकाल के समय अपने प्रतिबन्ध को मुद्दा न बनाते हुए संघ ने प्रजातंत्र की रक्षा के लिए काम किया, संघ के ऊपर टीका टिप्पणी करने वालों का भी साथ दिया। उस समय समाज में, विशेष कर समाज के विचारशील लोगों में एक विश्वासपात्र वैचारिक ध्रुव के नाते संघ का स्थान बना। आपातकाल के पश्चात संघ कई गुना अधिक बलशाली होकर बाहर आया।
प्र – भौगोलिक और संख्यात्मक दृष्टि से संघ बढ़ता गया है। इसके बावजूद गुणवत्तापूर्ण कार्य व स्वयंसेवकों का गुणवत्ता प्रशिक्षण करने में संघ सफल रहा है। इसके क्या कारण है?
गुणवत्ता और संख्या में आप केवल गुणवत्ता बढ़ाएंगे और संख्या नहीं बढ़ाएंगे अथवा केवल संख्या बढ़ाएंगे और गुणवत्ता नहीं बढ़ाएंगे तो गुणवत्ता का बढ़ना या संख्या का टिकना यह संभव नहीं। इसी बात को समझकर संघ ने पहले से इस पर ध्यान रखा है कि संघ को सम्पूर्ण समाज को संगठित करना है, लेकिन संगठित करना इसका एक अर्थ है। एक व्यक्ति को कैसे तैयार करना है, इन सब व्यक्तियों का गठबंधन या संगठन कैसा होना चाहिए, ‘हम’ भावना कैसी होनी चाहिए, इसके लिए पहले से कुछ मानक तय किये हैं। उन मानकों को तोड़े बिना संख्या बढ़ानी है और मानकों पर समझौता नहीं करना है, इसका अर्थ लोगों को संगठन के बाहर रखना नहीं। एक उदाहरण है, एक बड़े संगठन के प्रारम्भ के दिनों का। उस संगठन में मूल समाजवादी विचारधारा के एक व्यक्ति कार्यकर्ता बने। उनको लगातार सिगरेट पीने की आदत थी। पहली बार वो अभ्यास वर्ग में आए। सिगरेट तो छोड़िये, वहां सुपारी खाने वाला भी कोई नहीं था। वे दिन भर तड़पते रहे। रात को बिस्तर पर लेटे तो नींद नहीं आ रही थी। इतने में संगठन मंत्री आये और कहा कि नींद नहीं आ रही है तो बाहर चलो। थोड़ा टहल आते हैं। बाहर ले जाकर उन्होंने उस नए व्यक्ति को यह भी कहा कि उधर चौक पर सिगरेट मिलेगी। मन भरकर पी लो और वापस आ जाओ। वर्ग के अन्दर सिगरेट नहीं मिलेगी। वे नए कार्यकर्ता टिक गए, बहुत अच्छे कार्यकर्ता बने और सिगरेट भी छूट गयी। उस संगठन को उन्होंने उस प्रदेश में बहुत ऊँचाई तक पहुंचाया। व्यक्ति जैसा है, वैसा स्वीकार करना है। यह लचीलापन हम रखते हैं। परन्तु हमें जैसा चाहिए, वैसा उसको बनाने वाली आत्मीयता की कला भी हम रखते हैं। यह हिम्मत और ताकत हम रखते हैं। इस कारण संख्या बढ़ाने के साथ ही गुणवत्ता कायम रही। हमें संगठन में गुणवत्ता चाहिए, लेकिन हमें पूरे समाज को ही गुणवत्तापूर्ण बनाना है, इसका भान हम रखते हैं।
प्र – संघ आज भी डॉक्टर हेडगेवार जी एवं श्री गुरुजी के मूल विचारों के अनुरूप चल रहा है। परिस्थिति की आवश्यकता के अनुरूप इस में कैसे रूपांतरण किया है?
डॉक्टर साहब, श्री गुरूजी या बाळासाहब के विचार सनातन परम्परा या संस्कृति से अलग नहीं हैं। प्रगाढ़ चिंतन व कार्यकर्ताओं के प्रत्यक्ष प्रयोगों के अनुभव से संघ की पद्धति पक्की हुई और चल रही है। पहले से ही उसमें पोथी निष्ठा, व्यक्ति निष्ठा व अंधानुकरण की कोई जगह नहीं है। हम तत्वप्रधान हैं। महापुरुषों के गुणों का, उनकी बताई दिशा का अनुसरण करना है, परन्तु हर देश-काल-परिस्थिति में अपना मार्ग स्वयं बनाकर चलना है। इसलिए नित्यानित्य विवेक होना चाहिए। संघ में नित्य क्या है? एक बार बाळासाहब ने कहा था कि ‘हिन्दुस्थान हिन्दू राष्ट्र है’, इस बात को छोड़कर बाकी सब कुछ संघ में बदल सकता है। सम्पूर्ण हिन्दू समाज इस देश के प्रति उत्तरदायी समाज है। इस देश का स्वभाव व संस्कृति हिन्दुओं की संस्कृति है। इसलिए यह हिन्दू राष्ट्र है। इस बात को पक्का रखकर सब करना है। इसलिए स्वयंसेवक की प्रतिज्ञा में “अपना पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति व हिन्दू समाज का संरक्षण करते हुए हिन्दू राष्ट्र के सर्वांगीण उन्नति” की बात कही गयी है। हिन्दू की अपनी व्याख्या भी व्यापक है। उसकी चौखट में अपनी दिशा कायम रखते हुए देश-काल-परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन करते हुए चलने का पर्याप्त अवसर है। प्रतिज्ञा में “मैं संघ का घटक हूँ”, यह भी कहा जाता है। घटक यानी संघ को गढ़ने वाला, संघ का लघुरूप और संघ का अभिन्न अंग, इसलिए अलग-अलग मत होने पर भी चर्चा में उनकी अभिव्यक्ति का पूर्ण स्वातंत्र्य है। एक बार सहमति बनकर निर्णय होने पर सब लोग अपना-अपना मत उस निर्णय में विलीन कर एक दिशा में चलते हैं। जो निर्णय होता है उसको मानना है। इसलिए सबको कार्य करने की स्वतंत्रता भी है और सबकी दिशा भी एक है। नित्य को हम कायम रखते हैं और अनित्य को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बदलकर चलते है।
प्र – संघ को जो बाहर से देखते हैं, जिन्होंने अनुभव नहीं किया है, उन्हें संगठन का ढांचा समझ में आता है, लेकिन इतनी लंबी यात्रा में विचार-विमर्श और आत्मचिंतन की प्रक्रिया कैसी रहती है!
उसकी एक पद्धति बनायी है, जिसमें उद्देश्य और आशय निश्चित है। लेकिन उनको देने की पद्धति अलग-अलग हो सकती है। ढांचा तो बदल सकता है, लेकिन ढांचे के अन्दर क्या है वह पक्का है। परिस्थिति के साथ-साथ मनस्थिति का भी महत्त्व है। इसलिए हमारे प्रशिक्षणों में देश की स्थिति, चुनौतियाँ आदि बहुत सारा विचार रहता है। जिसके साथ-साथ ही उनके सन्दर्भ में स्वयंसेवक को कैसे होना चाहिए, संगठन किन गुणों के आधार पर बनाता है, स्वयं में उन गुणों का विकास करने के लिए हम क्या करते हैं, आदि बातों का भी विचार होता है। प्रार्थना में हमारे सामूहिक संकल्प का और प्रतिज्ञा में प्रत्येक स्वयंसेवक का व्यक्तिगत संकल्प नित्य प्रतिदिन स्मरण किया जाता है। स्वयंसेवक का अर्थ ही स्वयं से प्रारम्भ करने वाला, यह है। संघ का घटक शब्द का अर्थ है ‘जैसा मैं हूँ, वैसा संघ है और जैसा संघ है, वैसा मैं हूँ’। जैसे समुद्र की हर बूंद समुद्र जैसी है और सब बूंदों से मिलकर ही समुद्र बनता है। यह ‘एक’ और ‘पूर्ण’ का सबंध संघ में प्रारम्भ से ही चल रहा है। स्वयंसेवक का आत्मचिंतन सतत चलता है। सफलता का श्रेय पूरे संघ का होता है। असफलता की स्थिति में ‘मैं कहाँ कम पड़ा’ इसको हर स्वयंसेवक सोचता है। यही प्रशिक्षण स्वयंसेवकों का होता है।
प्र – समाज बदला, जीवनशैली बदली, क्या आज की परिस्थिति में संघ की दैनिक शाखा का मॉडल उतना ही प्रभावी है या इसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी है?
शाखा के कार्यक्रमों के विकल्प हो सकते हैं, और उसको हम स्वीकार करते हैं। लेकिन शाखा जो तत्व है – इकट्ठा आना, सद्गुणों की सामूहिक उपासना करना और प्रतिदिन मन में इस संकल्प को जाग्रत करना कि हम मातृभूमि के लिए काम कर रहे हैं, परमवैभव के लिए काम कर रहे हैं। यह जो आधार है, मिलना-जुलना, एक-दूसरे का सहयोग, यह मूल है। इसका विकल्प नहीं है। सामान्य आदमी सामान्य है। वह असामान्य तब होता है, जब वह जुड़ा रहता है। और फिर सामान्य व्यक्ति भी असामान्य कार्य कर डालता है, असामान्य त्याग भी करता है। लेकिन, उसके लिए एक वातावरण होना चाहिए और फिर उस वातावरण से जुड़ना। उदाहरण और आत्मीयता, यह परिवर्तन के कारक हैं और कोई नहीं। दुनिया में कहीं भी जाओ, कभी भी परिवर्तन होता है तो कोई एक मॉडल रहता है, जिसमें पहले अपने आपको परिवर्तन करना पड़ता है, उसको देखकर लोगों में परिवर्तन होता है। यह दूर रहकर नहीं चलता, वह आप्त होना पड़ता है, पास होना पड़ता है। महापुरुष बहुत हैं, उन्हें जानते भी है । उनके प्रति हमारी श्रद्धा है, सम्मान है। लेकिन मैं जिसकी संगति में हूं, वह जैसा चलता है, मैं वैसा चलता हूं। करता मैं वही हूं, जिसकी संगति मुझे है। मेरा अपना मित्र, लेकिन मेरे से थोड़ा अच्छा है, उसी का अनुसरण करता हूं। यह परिवर्तन की सिद्ध पद्धति है। इसमें कहीं बदल नहीं हुआ है, तब तक तो शाखा का दूसरा मॉडल नहीं है। कार्यक्रम और बाकी सब बदल सकता है। शाखा का समय बदलता है, वेश बदलता है। शाखा में तरह-तरह के कार्यक्रम करने की अनुमति पहले से है, लेकिन शाखा का विकल्प नहीं है। शाखा कभी अप्रासंगिक नहीं होती। आज हमारे शाखा मॉडल के बारे में प्रगत देशों के लोग आकर अध्ययन कर रहे हैं, उसके बारे में पूछ रहे हैं। हर दस साल पर हम चिंतन करते हैं कि क्या दूसरा कोई विकल्प है? ऐसे चिंतनों में मैं आज तक 6-7 बार उपस्थित रहा हूं, लेकिन जो हमको करना है, उसको करने वाला कोई विकल्प अभी तक नहीं मिला है।
प्र – संघ वनवासी क्षेत्रों में कैसे बढ़ रहा है?
वनवासी क्षेत्रों में पहला काम है कि जनजातीय बंधुओं को सशक्त करना। उनकी सेवा करना । बाद में यह भी जुड़ गया कि उनके हितों की रक्षा के लिए प्रयास करना । हम चाहते हैं कि जनजातीय समाज में से ही उनका ऐसा नेतृत्व खड़ा हो जो अपने जनजातीय समाज की चिंता करे और सम्पूर्ण राष्ट्र जीवन का वह एक अंग है, यह समझकर उनको आगे बढ़ाए। इन क्षेत्रों में काम करने वाले स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ रही है । जनजाति क्या है, उनकी जड़ें कहाँ हैं, जनजातीय समाज से निकले महापुरुष, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले जनजातीय समाज के नायक, इन सब बातों के बारे में उनको शिक्षित करते हुए धीरे धीरे राष्ट्रीय स्वर में बोलने वाले, योगदान करने वाले कार्यकर्ता व नेतृत्व वहां खड़ा हो, इसका प्रयास चल रहा है। पूर्वोत्तर के साथ ही अन्य जनजातीय क्षेत्रों में संघ की शाखाएं बढ़ रही हैं।
प्र – भारत के पड़ोसी देशों में हिन्दुओं का उत्पीड़न हो रहा है, उनके विरुद्ध हिंसा हो रही है । विश्व में मानवाधिकार की चिंता करने वाले क्या हिन्दुओं की वैसी चिंता कर रहे हैं? संघ की प्रतिनिधि सभा में भी यह विषय उठा है । आपका इस पर क्या मत है?
हिन्दू की चिंता तब होगी, जब हिन्दू इतना सशक्त बनेगा – क्योंकि हिन्दू समाज और भारत देश जुड़े हैं, हिन्दू समाज का बहुत अच्छा स्वरूप भारत को भी बहुत अच्छा देश बनाएगा – जो अपने आप को भारत में हिन्दू नहीं कहते उनको भी साथ लेकर चल सकेगा क्योंकि वे भी हिन्दू ही थे। भारत का हिन्दू समाज सामर्थ्यवान होगा तो विश्व भर के हिन्दुओं को अपने आप सामर्थ्य लाभ होगा । यह काम चल रहा है, परन्तु पूरा नहीं हुआ है । धीरे-धीरे वह स्थिति आ रही है । बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार पर आक्रोश का प्रकटीकरण इस बार जितना हुआ है, वैसा पहले नहीं होता था। यही नहीं, वहां के हिन्दुओं ने यह भी कहा है कि वे भागेंगे नहीं, बल्कि वहीं रहकर अपने अधिकार प्राप्त करेंगे । अब हिन्दू समाज का आतंरिक सामर्थ्य बढ़ रहा है । एक तरह से संगठन बढ़ रहा है, उसका परिणाम अपने आप आएगा । तब तक इसके लिए लड़ना पड़ेगा । दुनिया में जहां-जहां भी हिन्दू हैं, उनके लिए हिन्दू संगठन के नाते अपनी मर्यादा में रहकर जो कुछ कर सकते हैं वो सब कुछ करेंगे, उसी के लिए संघ है । स्वयंसेवक की प्रतिज्ञा ही ‘धर्म, संस्कृति और समाज का संरक्षण कर राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति’ करना है।
प्र – वैश्विक व्यवस्था में सैन्य शक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक ताकत का अपना एक महत्व है। संघ इसके बारे में क्या सोचता है?
बल संपन्न होना ही पड़ेगा । संघ प्रार्थना की पंक्ति ही है –अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम् – हमें कोई जीत ना सके इतना सामर्थ्य होना ही चाहिए । अपना स्वयं का बल ही वास्तविक बल है । सुरक्षा के मामले में हम किसी पर निर्भर न हों, हम अपनी सुरक्षा स्वयं कर लें, हमें कोई जीत न सके, सारी दुनिया मिलकर भी हमें जीत न सके, इतना सामर्थ्य संपन्न हमको होना ही है। क्योंकि विश्व में कुछ दुष्ट लोग हैं जो स्वभाव से आक्रामक हैं । सज्जन व्यक्ति केवल सज्जनता के कारण सुरक्षित नहीं रहता। सज्जनता के साथ शक्ति चाहिए। केवल अकेली शक्ति दिशाहीन होकर हिंसा का कारण बन सकती है। इसलिए उसके साथ ही सज्जनता चाहिए। इन दोनों की आराधना हमको करनी पड़ेगी। भारतवर्ष अजेय बने। ‘परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम्’ ऐसा सामर्थ्य हो । कोई उपाय नहीं चलेगा, तब दुष्टता को बलपूर्वक नष्ट करना ही पड़ेगा । परन्तु साथ में स्वभाव की सज्जनता है तो रावण को नष्ट कर उस जगह विभीषण को राजा बनाकर वापस आ जाएंगे । यह सारा, सारे विश्व के कारोबार पर हमारी छाया पड़े, इसलिए हम नहीं कर रहे । सभी का जीवन निरामय हो, समर्थ हो, इसलिए कर रहे हैं । हमें शक्ति संपन्न होना ही पड़ेगा क्योंकि दुष्ट लोगों की दुष्टता का अनुभव हम अपनी सभी सीमाओं पर ले रहे हैं।
प्र – भारत की भाषिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए संघ समावेशता को कैसे बढ़ावा दे रहा है?
संघ में आकर देखिये। सब भाषाओं के, पंथ संप्रदायों के लोग बहुत आनंद के साथ मिलकर संघ में काम करते हैं । संघ के गीत केवल हिंदी में नहीं हैं । बल्कि अनेक भाषाओं में हैं । हर भाषा में संघ गीत गाने वाले गीत गायक, गीतों की रचना करने वाले कवि, संगीत रचनाकार हैं । फिर भी सब लोग संघ शिक्षा वर्गों में जो तीन गीत दिए जाते हैं, वह भारत वर्ष में सर्वत्र गाते हैं । सभी लोग अपनी अपनी विशिष्टताओं को कायम रखकर अपने एक राष्ट्रीयत्व का सम्मान तथा सम्पूर्ण समाज की एकता का भान सुरक्षित रखकर चल रहे हैं। यही संघ है । इतनी विविधताओं से भरे समाज को एक सूत्र में पिरोने वाला सूत्र ही हम देते हैं ।
प्र – संघ सामाजिक समरसता की बात करता है और उसके लिए काम भी करता है। मगर कुछ लोग हैं जो समानता की बात करते हैं। आप इन दोनों में भेद कैसे देखते हैं?
समानता आर्थिक है, राजनैतिक है और सामाजिक समानता आनी चाहिए । नहीं तो इनका कोई अर्थ नहीं रहेगा । बंधुभाव ही समरसता है । स्वातंत्र्य और समता दोनों का आधार बंधुता है । समता बिना स्वतंत्रता के संकोच लाती है और टिकाऊ होनी है तो बंधुभाव का आधार चाहिए । यह बंधुभाव ही समरसता है । वह समता की पूर्व शर्त है । जात-पात और छुआ-छूत के विरोध में कानून होने के पश्चात भी विषमता नहीं जाती क्योंकि उसका निवास मन में रहता है । उसे मन से निकालना है । सब अपने हैं, इसलिए हम सब समान हैं, ये मानना है । दिखने में समान नहीं हैं तो भी हम एक-दूसरे के हैं, अपनत्व में बंधे हैं, इसी को समरसता कहते हैं । प्रेमभाव, बंधुभाव को ही समरसता कहते हैं ।
प्र – संघ में महिलाओं की भागीदारी को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। उसके बारे में आप क्या कहेंगे?
संघ के प्रारम्भिक दिनों में, 1933 के आस पास, यह व्यवस्था बनी कि महिलाओं में व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का काम राष्ट्र सेविका समिति के द्वारा ही होगा । वह व्यवस्था चल रही है । जब राष्ट्र सेविका समिति कहेगी कि संघ भी महिलाओं में यह काम करे, तभी हम उसमें जाएंगे । दूसरी बात ये है कि संघ की शाखा का कार्यक्रम पुरुषों के लिए है । उन कार्यक्रमों को देखने के लिए महिलाएं आ सकती हैं और आती भी हैं । परन्तु संघ का कार्य केवल कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं चलता । हमारी माता-बहनों का हाथ लगता है, तभी संघ चलता है । संघ के स्वयंसेवक के घर में जितनी भी महिलाएं हैं, उतनी महिलाएं संघ में हैं । विभिन्न संगठनों में भी महिलाएं संघ के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर काम करती हैं । संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में भी उनका प्रतिनिधित्व और सक्रिय सहभागिता है । इन महिलाओं ने पहली बार भारत के महिला जगत का व्यापक सर्वेक्षण किया, जिसको शासन ने भी स्वीकारा है । उन्हीं के द्वारा पिछले वर्ष सारे देश में बहुत बड़े महिला सम्मलेन हुए, जिनमें लाखों महिलाओं ने भाग लिया । इन सब कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन व सहयोग रहा । हम यह मानते हैं कि महिलाओं का उद्धार पुरुष नहीं कर सकते । महिलाएं स्वयं अपना उद्धार करेंगी, उसमें सबका उद्धार हो जाएगा । इसलिए हम उन्हीं को प्रमुखता देते हैं और जो वे करना चाहती हैं, उसके लिए उनको सशक्त बनाते हैं।
प्र – संघ के शताब्दी वर्ष में पंच परिवर्तन का संकल्प आया है। इसे लेकर कोई कार्य योजना बनाई है, इस के आधार पर आगे क्या कर सकते हैं?
आचरण के परिवर्तन के लिए आवश्यक बात है मन का भाव। जो काम करने से मन का भाव बदलता है, स्वभाव परिवर्तित हो जाता है, वह काम देना है। और जीवन भी ठीक हो जाता है। इसलिए पंच परिवर्तन की बात है। एक तो समरसता की बात है, अपने समाज में प्रेम उत्पन्न हो। विविध प्रकार का समाज है, विविध अवस्था में है, विविध भौगोलिक क्षेत्रों में है, समस्याएं हैं। एक नियम आपके लिए बना है, मेरे लिए ठीक होगा ही, ऐसा नहीं है। इतना बड़ा देश है। इसमें से अगर रास्ता निकालना है, तो जो भी प्रावधान करने पड़ेंगे, वे प्रावधान मन से होंगे तो सुरक्षित रहेंगे और प्रेम बढ़ेगा। सामाजिक समरसता का व्यवहार करना है। उसमें सामाजिक समरसता का प्रचार अभिप्रेत नहीं है। प्रत्यक्ष समाज के बाहर जितने प्रकार माने जाते हैं, हम तो एक मानते हैं, सब प्रकार के मेरे मित्र होने चाहिए, मेरे कुटुंब के मित्र होने चाहिए। जहां अपना प्रभाव है वहां मंदिर, पानी, श्मशान एक हों, यह प्रारंभ है, इसको बढ़ाते जाना है। ऐसे ही कुटुंब प्रबोधन है। जो संसार को राहत देने वाली बातें हैं, जिन आवश्यक परंपरागत संस्कारों से आती हैं, हमारी कुल-रीति में हैं और देश की रीति-नीति में भी हैं। उन पर बैठ कर चर्चा करना और उस पर सहमति बनाकर परिवार के आचरण में लाना, यह कुटुंब प्रबोधन है। पर्यावरण के लिए तो आंदोलन सहित बहुत सारी बातें चलती हैं। लेकिन, आदमी अपने घर में पानी व्यर्थ जाता है, चिंता नहीं करता। पहले करो। पेड़ लगाओ, प्लास्टिक हटाओ, पानी बचाओ। यह करने से समझ विकसित होती है, वह सोचने लगता है। ऐसे ही स्व के आधार पर करो। अपने स्व के आधार पर व्यवहार करना चाहिए। हमारा सबका जो राष्ट्रीय स्व है, उस के आधार पर चलो। अपने घर के अंदर भाषा, भूषा, भोजन, भजन, भ्रमण यह अपना होना चाहिए। घर की चौखट के बाहर परिस्थिति के अनुसार करना पड़ता है। घर में तो हम हैं, वो रहेगा तो उसके कारण संस्कार भी बचेंगे। स्व-निर्भर देश को होना है तो हम बने तक अपने देश की वस्तुओं में काम चलाएं। इसकी आदत रखें। इसका अर्थ यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बंद करो। उसका एक संतुलन है, मेरा चल सकता है उसको चलाऊँगा। देश की आवश्यकता है, कोई जीवनावश्यक काम है और बाहर देश से लाना पड़ेगा तो लाओ, लेकिन अपनी शर्तों पर, किसी के दबाव में नहीं। यह सब बातें बनेंगी, स्व का आचरण। कानून, संविधान, सामाजिक भद्रता का पालन। ये पांच बातें लेकर स्वयंसेवक उस पथ पर आगे बढ़ेंगे और शताब्दी वर्ष समाप्त होने के बाद इसको शाखाओं के द्वारा समाज में ले जाएंगे। यह आचरण बनेगा तो वातावरण बनेगा, और वातावरण बनने से परिवर्तन आएगा। और बहुत सी बातें आगे की हैं, वो यहां से जाएंगी धीरे-धीरे शुरू होकर। ऐसा सोचा है। देखते हैं क्या होता है।
प्र – आने वाले 25 वर्ष के लिए क्या संकल्प है?
संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करना और देश को परमवैभव संपन्न बनाना, उसके आगे एक अनकही बात है कि सम्पूर्ण विश्व को ऐसा बनाना है । डॉ. हेडगेवार के समय से ही यह दृष्टि है । उन्होंने 1920 में प्रस्ताव दिया था कि ‘भारत का सम्पूर्ण स्वातंत्र्य हमारा ध्येय है और स्वतन्त्र भारत दुनिया के देशों को पूंजीवाद के चंगुल से मुक्त करेगा’ ऐसा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को कहना चाहिए ।
प्र – संघ के 100 वर्ष होना और देश की आजादी के 100 वर्ष 2047 में पूरे होंगे । भारत विश्व गुरु कैसे बनेगा! कुछ लोग तरह-तरह से भेद उत्पन्न करने का प्रयास करेंगे । इन सबको कैसे देखते हैं?
जो हमारी प्रक्रिया है, उसमें इन सब बातों की चिंता की गयी है । आत्मविस्मृति, स्वार्थ और भेद इन तीन बातों से लड़ते-लड़ते हम बढ़ रहे हैं। आज समाज के विश्वासपात्र बने हैं । यही प्रक्रिया आगे चलेगी । अपनत्व के आधार पर समाज के सभी लोग एक मानसिकता में आ जाएंगे । एक और एक मिलकर दो होने के बजाय ग्यारह होगा । भारतवर्ष को संगठित और बल संपन्न बनाने का काम 2047 तक सर्वत्र व्याप्त हो जाएगा और चलते रहेगा । समरस, सामर्थ्य संपन्न भारत के विश्व जीवन में समृद्ध योगदान को देखकर सब लोग उसके उदाहरण का अनुकरण करने के लिए आगे बढ़ेंगे । 1992 में हमारे एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा था कि “इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देखकर दुनिया के अन्यान्य देशों के लोग उस देश का अपना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खड़ा करेंगे। जिससे पूरे विश्व के जीवन में परिवर्तन आएगा”। यह प्रक्रिया 2047 के बाद प्रारम्भ होगी और इसे पूरा होने में 100 वर्ष नहीं लगेंगे । अगले 20-30 वर्षों में यह पूरी हो जाएगी।
प्र – शताब्दी वर्ष में जो हिन्दू-हितैषी वर्ग है, संघ का शुभचिंतक वर्ग है, इस राष्ट्र का हित चिंतक वर्ग है । उसके लिए आपका संदेश क्या होगा?
हिन्दू समाज को अब जागृत होना ही पड़ेगा । अपने सारे भेद और स्वार्थ भूलकर हिन्दुत्व के शाश्वत धर्म मूल्यों के आधार पर अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और आजीविका के जीवन को आकार देकर एक सामर्थ्य संपन्न, नीति संपन्न तथा सब प्रकार से वैभव संपन्न भारत खड़ा करना पड़ेगा क्योंकि विश्व को नई राह की प्रतिक्षा है और उसको देना यह भारत का यानी हिन्दू समाज का ईश्वर प्रदत्त कर्तव्य है। कृषि क्रांति हो गयी, उद्योग क्रांति हो गयी, विज्ञान और तकनीक की क्रांति हो गयी, अब धर्म क्रान्ति की आवश्यकता है । मैं रिलीजन की बात नहीं कर रहा हूँ। सत्य, शुचिता, करुणा व तपस के आधार पर मानव जीवन की पुनर्रचना हो, इसकी विश्व को आवश्यकता है और भारत उसका पथ प्रदर्शक हो, यह अपरिहार्य है। संघ कार्य के महत्त्व को हम समझें, ‘मैं और मेरा परिवार’ के दायरे से बाहर आकर और अपने जीवन को उदाहरण बनाकर सक्रिय होकर हम सबको साथ में आगे बढ़ना चाहिए, इसकी आवश्यकता है। सरसंघचालक
मानसिक तनाव और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के दौर में योग, शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शान्ति का माध्यम बनकर उभर रहा है. ऐसे वातावरण में, 21 जून को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में 11वें अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन, बहुत से लोगों के लिए निश्चित रूप से राहत का अवसर था. शुक्रवार की शाम, यूएन परिसर का उत्तरी बाग़ीचा, एक खुले योग स्टूडियो में तब्दील हो गया, जहाँ विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों, यूएन कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने एक विशाल सभा के रूप में, योग के ज़रिए आन्तरिक सन्तुलन और वैश्विक एकता की अनुभूति की…
संघर्षों, बीमारियों, जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं व मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों के इस दौर में हम, योग पद्धति को अपना कर, न केवल अपने जीवन में शान्ति का अनुभव कर सकते हैं, बल्कि इससे समुदायों व पृथ्वी के साथ भी एक समरसतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने में मदद मिल सकती है. हर वर्ष 21 जून को मनाए जाने वाले ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’ के अवसर पर शुक्रवार को न्यूयॉर्क स्थित यूएन मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान शान्ति व समरसता के इसी सन्देश की गूँज सुनाई दी.
यूएन मुख्यालय परिसर में नॉर्थ लॉन को, एक बार फिर खुली हवा में एक योग स्टूडियो के रूप में तब्दील कर दिया गया, और कुछ दिनों से घिरे बादलों व बारिश के बाद नज़र आई खुली धूप ने योग के लिए उत्सुक लोगों का स्वागत किया.
विभिन्न देशों के प्रतिनिधि, यूएन अधिकारी, कर्मचारी व न्यूयॉर्क के अन्य हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग यहाँ जुटे, जिन्होंने बेहतर शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली इस प्रक्रिया में हिस्सा लिया.
पीटर रोजिना, शान्ति प्रकाश नामक एक परियोजना के संस्थापक हैं, और यूएन मुख्यालय में इस सत्र के लिए आना उनके लिए सुखद अनुभव था. उन्होंने 2019 में आयोजित कार्यक्रम को याद किया जब बारिश के कारण योग सत्र को यूएन महासभा हॉल में किया गया था.
“इतनी बड़ी संख्या में लोगों के साथ योग प्रक्रिया का अवसर मुझे बहुत पसंद है. यहाँ बहुत अधिक ऊर्जा है…और मेरे साथ मेरा बेटा भी आया है. मैं उसे यह अनुभव कराने के लिए रोमांचित हूँ.”
बौद्ध शिक्षक लामा आरिया ड्रोल्मा भी हर साल योग कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए यूएन पहुँचती हैं. कभी कॉरपोरेट जगत में मॉडलिंग के बाद अब वह आन्तरिक शान्ति व आध्यात्म की राह पर हैं.
उन्होंने बताया कि, “मैं जब भारत में बड़ी हो रही थी, तो योग आसन किया करती थी. इसने न केवल मेरे शरीर को बल्कि मेरी आत्मा को छुआ. यह ध्यान में भी सहायक है. मैं योग को सबसे स्वस्थ विकल्पों में मानती हूँ, जिनके ज़रिए हम अपने स्वास्थ्य की देखभाल कर सकते हैं.”
सम्पूर्ण जगत, एक परिवार
योग का सन्देश निजी कल्याण से परे तक जाता है और यह सम्पूर्ण जगत के स्वास्थ्य को साथ में लेकर चलने में अहम भूमिका निभा सकता है.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई मिशन ने यूएन सचिवालय के सहयोग से इस अन्तरराष्ट्रीय दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किया, जिसकी थीम है: एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग.
भारत के स्थाई प्रतिनिधि, राजदूत पी. हरीश ने अपने सन्देश में कहा कि योग एक महत्वपूर्ण सत्य को परिलक्षित करता है. निजी कल्याण और हमारे ग्रह का स्वास्थ्य, आपस में गहराई तक जुड़े हुए हैं.
“अपनी देखभाल करने में, हम पृथ्वी की देखभाल करते हैं, और यह चिरस्थाई भारतीय मूल्य, वसुधैव कुटुम्बकम को दर्शाता है, कि सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है.”
“योग दिवस का यह 11वाँ संस्करण, हमें यह चिन्तन करने का एक अवसर प्रदान करता है कि योग किस तरह से वैश्विक कल्याण की एक शक्ति के रूप में उभरा है, जिसने आयु समूहों, भौगोलिक क्षेत्रों और जीवन के हर पहलु में लोगों को छुआ है.”
आनन्द मार्ग महिला कल्याण केन्द्र की दीदी आनन्द राधिका आचार्य ने बताया कि योग, केवल अभ्यास से कहीं बढ़कर है. यह अपने को प्रकृति व सम्पूर्ण विश्व से जोड़ने का माध्यम है.
“बाहर से देखने पर हमारा शरीर नज़र आता है, भीतर हमारा मस्तिष्क है. मगर यदि आप और भीतर जाएं, तो कुछ ऐसा है, जो सदैव हमें देख रहा है, परख रहा है. वह हमारी आत्मा है. योग के ज़रिए, हम उस भीतरी स्थल तक पहुँच सकते हैं. जब हम अपने मस्तिष्क की गहराइयों में उतरते हैं, तो हम महसूस कर पाते हैं कि हम सभी एक दूसरे से कितनी मज़बूती से जुड़े हुए हैं.”
आशा का प्रतीक
यह कार्यक्रम क़रीब डेढ़ घंटे तक चला, जिसमें आर्ट ऑफ़ लिविंग के योग विशेषज्ञों ने प्राणायाम तकनीक, विभिन्न योग मुद्राओं व आसनों के साथ लोगों को इसके लाभ बताए. सत्र का एक मुख्य आकर्षण, स्वास्थ्य के प्रति समग्र दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाले डॉक्टर दीपक चोपड़ा रहे, जिन्होंने एक ध्यान सत्र को निर्देशित किया.
न्यूयॉर्क में शिवानन्द योग वेदांत केन्द्र की मार्ता शेडलेट्स्की इस कार्यक्रम में एक समुदाय के एहसास, भरोसे और इस आस्था को पाने के लिए पहुँची कि शान्ति हासिल करना सम्भव है. और इस सत्र का यूएन मुख्यालय में आयोजित होना उनके लिए ख़ास था.
उन्होंने कहा कि फ़िलहाल दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है, जितनी भी उथलपुथल, युद्ध हो रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि में यह स्थान एक बेहतर भविष्य के लिए आशा और शान्ति की सम्भावनाओं का प्रतीक है.
सीरिया के इदलिब की एक युवती सिला की उम्र उस समय तीन साल थी जब एक दिन सुबह उनकी नीन्द मिसाइलों के हमलों के भयावह शोर में खुली. ये मिसाइल हमले सिला के घर के आसपास हो रहे थे, जिनके कारण सिला और उनके परिवार को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों के लिए भागना पड़ा.
सिला ने बुधवार को सीरिया से वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए सुरक्षा परिषद को बताया, “उस दिन के बाद से, हमारा घर एक ‘यात्रा बैग’ बन गया और वो विस्थापन हमारा रास्ता बन गया… मेरा बचपन भय और चिन्ता से भरा था और मैं अपने प्रियजन से वंचित थी.”
सिला की उम्र अब 17 वर्ष हो चुकी है. उन्होंने सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान अपने अनुभव बुधवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक में साझा किए. यह बैठक बच्चों और सशस्त्र संघर्ष पर महासचिव की नवीनतम रिपोर्ट के निष्कर्षों पर चर्चा करने के लिए आयोजित की गई.
रिपोर्ट में 2024 में बच्चों के ख़िलाफ़ मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघनों में 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो इसके 20 साल के इतिहास में अब तक दर्ज की गई सबसे बड़ी संख्या है.
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) में बाल संरक्षण की निदेशक शीमा सेन गुप्ता ने सुरक्षा परिषद में कहा, “महासचिव की इस वर्ष की रिपोर्ट एक बार फिर इस बात की पुष्टि करती है और जिसे बहुत से बच्चे पहले से ही जानते हैं – कि दुनिया उन्हें युद्ध की भयावहता से बचाने में विफल हो रही है.”
“दुनिया भर के हर देश में बच्चों के ख़िलाफ़ हर मानवाधिकार उल्लंघन, एक नैतिक विफलता का मामला है.”
नुक़सान का असल दायरा
सुरक्षा परिषद में प्रस्तुत की जाने वाली यह रिपोर्ट, युद्ध से प्रभावित बच्चों के ख़िलाफ़ मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघनों का रिकॉर्ड दर्ज करने के लिए, हर साल प्रकाशित की जाती है.
यह रिपोर्ट पूरी तरह से संयुक्त राष्ट्र द्वारा संकलित और सत्यापित डेटा पर निर्भर होती है. इसका अर्थ है कि वास्तविक संख्या, दर्ज आँकड़ों से कहीं अधिक होने की सम्भावना है.
2024 में, रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्लंघन के रिकॉर्ड 41 हज़ार 370 मामले दर्ज किए गए – जिनमें हत्या और अपंगता, बलात्कार, अपहरण और बच्चों का समर्थन करने वाले स्कूलों जैसे बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया जाना शामिल है.
यह रिपोर्ट, बच्चों व सशस्त्र टकराव के लिए विशेष प्रतिनिधि वर्जीनिया गाम्बा के कार्यालय ने तैयार की है. वर्जीनिया गाम्बा का कहना था, “इन हमलों से पीड़ित प्रत्येक बच्चा अपने साथ एक कहानी, एक छीना हुआ जीवन, एक टूटा हुआ सपना, एक ऐसा भविष्य लेकर चलता है जो बेमतलब हिंसा और लम्बे टकराव से धूमिल हो गया है.”
रिपोर्ट कहती है कि वैसे तो इनमें से कई मानवाधिकार उल्लंघन, संघर्ष व टकराव के दौरान हुए, ख़ासतौर पर जब शहरी युद्ध बढ़ रहा है, मगर गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघन, टकराव समाप्त होने के बाद भी जारी रह सकते हैं.
ये मानवाधिकार उल्लंघन अब भी ज़मीन पर बिखरे पड़े बिना फटे विस्फोटकों के रूप में क़ायम हैं.
सीमा सेन गुप्ता ने कहा, “किसी भी खेत, स्कूल के प्रांगण या गली में छोड़ा गया प्रत्येक अप्रयुक्त आयुध, मौत की एक सज़ा की तरह हैं, जो बच्चों को किसी भी क्षण अपनी चपेट में ले सकती है.”
और ये हालात, आघात और चोटों के रूप में बरक़रार हैं जो जीवन भर बच्चे को कभी भी, पूरी तरह से नहीं छोड़ते हैं.
घाव जो कभी नहीं भरते
जो बच्चे, गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघनों से बच भी जाते हैं, तो भी वो गहरी चोट से नहीं बच पाते हैं, अगर वे हिंसा के शिकार हुए होते हैं, तो उसके घाव, जीवन भर उनके साथ रहते हैं.
और अगर वे घायल नहीं भी हुए, तो भी उनकी ज़िन्दगी में सदमा बना रहता है.
वर्जीनिया गाम्बा ने कहा, “जीवित बचे लोगों के लिए शारीरिक और मनोवैज्ञानिक घाव जीवन भर बने रहते हैं, जो परिवारों, समुदायों और समाज के मूल ढाँचे को प्रभावित करते हैं.”
यही कारण है कि यूनीसेफ़ और उसके साझीदारों ने मानवाधिकारों के गम्भीर उल्लंघनों के शिकार बच्चों के लिए, पुनर्मिलन कार्यक्रम और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करने के लिए काम किया है.
सिला ने कहा कि उनके बचपन का सदमा अब भी उनके साथ है, और इसने उन्हें अशान्ति में बच्चों के लिए एक पैरोकार बनने के लिए प्रेरित किया है.
सिला ने कहा, “उस पल के बाद, मेरे जीवन में कुछ भी सामान्य नहीं लगता. मुझे किसी भी ऐसी आवाज़ से डर लगने लगा है जो विमान, अन्धेरे और यहाँ तक कि मौन से भी मिलती-जुलती हो.”
‘उन्हें निराशा से निकालें’
वर्जीनिया गाम्बा ने रिपोर्ट में पेश किए गए चिन्ताजनक रुझानों को उलटने के लिए, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से “अटूट निन्दा और तत्काल कार्रवाई” का आहवान किया.
उन्होंने कहा, “हम उस अन्धकार युग में वापस नहीं जा सकते, जहाँ बच्चे सशस्त्र टकराव के अदृश्य और बेआवाज़ पीड़ित थे… कृपया उन्हें निराशा की छाया में वापस नहीं जाने दें.”
दिसम्बर 1967 में, संगीत की अलग-अलग परम्पराओं के दो महारथियों ने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र महासभा हॉल में मंच को साझा किया. भारतीय सितार वादक पंडित रवि शंकर और ब्रिटिश-अमेरिकी वायलिन वादक येहूदी मेनुहिन ने जब विश्व नेताओं के समक्ष अपनी कला का प्रदर्शन किया, तो यूएन टीवी के कैमरे ने उस ऐतिहासिक पल को रिकॉर्ड कर लिया. यह मात्र एक संगीत प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि सांस्कृतिक विरासतों के बीच एक आत्मिक सम्वाद भी था, जहाँ सुरों के ज़रिए एकता, सम्मान और शान्ति का सन्देश दिया गया. (वीडियो)
डब्लूएमओ की महासचिव सैलेस्टे साउलो ने बताया, “रिपोर्ट के निष्कर्ष बेहद गम्भीर हैं. इस क्षेत्र में कई देशों में 2023 साल का सबसे गर्म वर्ष रहा और सूखे व तापलहर से लेकर बाढ़ एवं तूफ़ान जैसी अनगिनत चरम मौसम घटनाएँ देखने को मिलीं.”
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी घटनाओं की आवृत्ति और गम्भीरता बढ़ी है, जिनसे समाज, अर्थव्यवस्था और सबसे महत्वपूर्ण रूप से मानव जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है.
साल 2023 के दौरान मौसम, जलवायु व जल सम्बन्धी संकटों के कारण एशिया, विश्व का सर्वाधिक आपदा-प्रभावित क्षेत्र रहा. विश्व मौसम संगठन (WMO) की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में सबसे ज़्यादा तबाही, तूफ़ान और बाढ़ ने मचाई.
औसत से तेज़
1960-1990 के बाद से तापमान वृद्धि का रुझान लगभग दोगुना होने कारण, एशिया में वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेज़ी से तापमान वृद्धि हुई है. बाढ़, तूफ़ान और तीव्र तापलहरों से हताहतों की संख्या एवं आर्थिक हानि बढ़ रही है.
2023 में, उत्तर पश्चिमी प्रशान्त महासागर में समुद्र की सतह का तापमान रिकॉर्ड पर सबसे अधिक दर्ज हुआ. यहाँ तक कि आर्कटिक महासागर को भी समुद्री तापलहरों का सामना करना पड़ा.
रिपोर्ट में बैरेंट्स सागर को “जलवायु परिवर्तन का केन्द्र” बताया गया है.
थर्मल विस्तार और हिमनदों, बर्फ़ की चोटियों व बर्फ़ की चादरों के पिघलने से विश्व स्तर पर समुद्री स्तर बढ़ना जारी रहा. हालाँकि, 1993 से 2023 के बीच एशिया में इस बढ़ोत्तरी की दरें वैश्विक औसत से अधिक रहीं.
आपात स्थिति की घटनाओं पर प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, साल 2023 में एशियाई महाद्वीप में 79 जल सम्बन्धित आपदाएँ देखी गईं, जिनमें से 80 प्रतिशत से अधिक बाढ़ और तूफ़ान से सम्बन्धित थीं. इसके परिणामस्वरूप 2,000 से अधिक लोगों की मौतें हुईं और 90 लाख लोगों पर सीधा असर पड़ा.
तापमान वृद्धि, वर्षा में कमी
क्षेत्र के कई हिस्सों में 2023 में अत्यधिक गर्मी का अनुभव हुआ एशिया में वार्षिक औसत सतही तापमान, 1991-2020 के औसत से 0.91 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज हुआ, जो रिकॉर्ड में दूसरा सबसे अधिक था.
पश्चिमी साइबेरिया से मध्य एशिया और पूर्वी चीन से जापान तक, विशेष रूप से उच्च तापमान देखा गया. जापान और कज़ाख़स्तान में रिकॉर्ड गर्म वर्ष का अनुभव हुआ.
इस बीच, तुरान तराई क्षेत्र (तुर्क़मेनिस्तान, उज़बेकिस्तान, कज़ाख़स्तान), हिंदुकुश (अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान) और हिमालय के बड़े हिस्सों के साथ-साथ, गंगा के आसपास तथा ब्रह्मपुत्र नदियों (भारत व बांग्लादेश) के निचले हिस्से में वर्षा का स्तर सामान्य से नीचे रहा.
म्याँमार में अराकान पर्वत और मेकाँग नदी के निचले इलाक़ों में भी सामान्य से कम वर्षा देखी गई है, जबकि दक्षिण-पश्चिम चीन में, 2023 के लगभग हर एक महीने में वर्षा का स्तर सामान्य से नीचे रहने के कारण, सूखे का कहर देखने को मिला.
लेकिन वर्षा का स्तर कम होने के बावजूद, कई चरम मौसम घटनाएँ हुईं, जैसेकि मई में म्याँमार में भारी वर्षा; जून व जुलाई में भारत, पाकिस्तान और नेपाल में बाढ़ व तूफ़ान, तथा सितम्बर में हाँगकाँग में प्रति घंटा रिकॉर्ड वर्षा.
सिकुड़ते हिमनद
उच्च-पर्वतीय एशिया क्षेत्र, जिसके केन्द्र में तिब्बती पठार है, ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद सबसे अधिक बर्फ़ का घर है. यहाँ लगभग एक लाख वर्ग किलोमीटर लम्बे क्षेत्र में हिमनद स्थित हैं. पिछले कई दशकों में, उनमें से अधिकाँश तेज़ गति से पीछे हटते जा रहे हैं. अध्ययन किए गए 22 में से 20 हिमनदों का पिंड लगातार कम हो रहा है, जिससे रिकॉर्ड तोड़ उच्च तापमान एवं सूखे के हालात पैदा हो रहे हैं.
UN Nepal/Narendra Shrestha
पर्माफ्रॉस्ट यानि वो मिट्टी जो लगातार दो या उससे ज़्यादा वर्षों तक 0 डिग्री सेल्सियस तापमान से नीचे रहती है, उसमें भी आर्कटिक के बढ़ते वायु तापमान के कारण कमी आ रही है. एशिया में पर्माफ्रॉस्ट का सबसे तीव्र विगलन, ध्रुवीय उराल और पश्चिमी साइबेरिया के पश्चिमी क्षेत्रों में देखा जा रहा है.
धूल भरी भयंकर आँधी, बिजली की गड़गड़ाहट, ठंड की तीव्र लहरें और घना कोहरा भी उन चरम घटनाओं में से हैं, जिन्होंने पूरे एशिया में लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है.
सर्वजन के लिए प्रारम्भिक चेतावनी प्रणाली
रिपोर्ट में कहा गया है कि 1970 से 2021 तक, मौसम, जलवायु और जल सम्बन्धी चरम मौसम घटनाओं के कारण 3 हज़ार 612 आपदाएँ हुईं, जिनमें 9 लाख 84 हज़ार 263 मौतें हुईं और 1.4 खरब डॉलर का आर्थिक नुक़सान हुआ.
दुनिया भर में प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली कुल मौतों में से 47 प्रतिशत इसी क्षेत्र में हुई हैं, जिनमें उष्णकटिबंधीय चक्रवात सर्वाधिक मौतों का कारण बनें.
इन प्रभावों को कम करने के लिए, WMO और साझीदारों ने, जीवन बचाने और जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य के आर्थिक संकटों की रोकथाम के लिए एक मज़बूत प्रारम्भिक चेतावनी एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण प्रणाली स्थापित करने की सिफ़ारिश की है.
रिपोर्ट तैयार करने में भागीदार, यूएन आर्थिक व सामाजिक आयोग (ESCAP) की कार्यकारी सचिव, अर्मिदा साल्सिया अलिसजाबाना ने कहा, “प्रारम्भिक चेतावनी और बेहतर तैयारियों ने हज़ारों लोगों की जान बचाई है.”
उन्होंने आश्वासन देते हुए कहा, “एक साथ काम करते हुए, ESCAP और WMO, जलवायु महत्वाकाँक्षा में वृद्धि और ठोस नीति के कार्यान्वयन में तेज़ी लाने हेतु निवेश जारी रखेंगे. इसमें क्षेत्र में सर्वजन को प्रारम्भिक चेतावनी प्रणाली उपलब्ध करवाना शामिल होगा, ताकि लगातार बढ़ते जलवायु परिवर्तन संकट के बीच, कोई भी पीछे न छूट जाए.”
अगस्त–सितंबर 2024 में लगभग 15 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में समुद्री हीटवेव्स देखे गए—जोकि पृथ्वी की महासागरीय सतह का लगभग 10% है dawn.com+1timesofindia.indiatimes.com+1।
🏔️ 5. ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्रस्तर बढ़ रहा है
हिमालय व तियान शान की 24 में से 23 ग्लेशियरों का द्रव्यमान घटा ।
मध्य-तटीय क्षेत्र में समुद्रस्तर की वृद्धि वैश्विक औसत से तेज रही, जिससे तटवर्ती देशों को खतरा बढ़ा ।
🌪️ 6. चरम मौसम और सामाजिक–आर्थिक प्रभाव
चक्रवात (“Yagi” सहित), बाढ़, सूखे, और भारी वर्षा जैसी घटनाओं से जीवन, कृषि, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिक तंत्र पर भारी प्रभाव पड़ा ।
भारत में हीटवेव, बाढ़ और भूस्खलन ने सैकड़ों जानें लीं, और स्थिति कमजोर क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी ।
🧭 निष्कर्ष
एशिया का ताप वृद्धि की रफ्तार वैश्विक औसत से लगभग दो गुनी तेज़ है — भूमि के ऊपर और समुद्र के नीचे दोनों इसका स्पष्ट संकेत देते हैं।
इस तेज़ गर्मी का परिणाम ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्रस्तर का बढ़ना, चरम मौसम, और मानव/प्राकृतिक प्रणाली पर दबाव का रूप लेकर सामने आया है।
WMO की यह रिपोर्ट सुझाव देती है कि जलवायु अनुकूलन (climate adaptation) और पूर्व चेतावनी प्रणालियों (early warning systems) में निवेश बढ़ाना अब पहले से भी ज्यादा अनिवार्य है ।
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उत्तरप्रदेश के वाराणसी में आयोजित मध्य क्षेत्रीय परिषद की 25वीं बैठक में मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि यह परिषद केन्द्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय का सशक्त मंच बन चुकी है, जिसके माध्यम से छत्तीसगढ़ सहित मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विकास को नई दिशा मिली है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में मध्य क्षेत्रीय परिषद ने ठोस योगदान दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य की अर्थव्यवस्था, आंतरिक सुरक्षा, सांस्कृतिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास में परिषद की भूमिका निर्णायक रही है।
नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक बढ़त, बस्तर में विकास का नया युग
मुख्यमंत्री श्री साय ने नक्सल समस्या पर बोलते हुए कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह की दृढ़ इच्छाशक्ति और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय से छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के विरुद्ध बड़ी सफलता मिली है। बसवराजू और सुधाकर जैसे शीर्ष नक्सली नेताओं के न्यूट्रलाइज होने को उन्होंने नक्सलवाद की रीढ़ टूटने जैसा करार दिया। उन्होंने बताया कि बस्तर के विकास के लिए बोधघाट-महानदी इंद्रावती लिंक जैसी कई हजार करोड़ की परियोजनाओं पर भी हम काम कर रहे हैं। रावघाट-जगदलपुर रेललाइन परियोजना को मिली मंजूरी भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
विकास और सुशासन की दिशा में ठोस कार्य
मुख्यमंत्री ने परिषद को अवगत कराया कि पिछली बैठक में दिए गए सुझावों पर तेजी से अमल हुआ है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 28 नई बैंक शाखाएं, डॉयल-112 सेवा का विस्तार, 82 हजार से अधिक बच्चों को कुपोषण से बाहर निकालना जैसी उपलब्धियाँ राज्य के विकास के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों ने स्थानीय खेल और सांस्कृतिक प्रतिभाओं को मंच दिया है। आयुष्मान भारत योजना के तहत 87.2 प्रतिशत नागरिकों को कार्ड वितरित किए जा चुके हैं, और 1075 में से 1033 शासकीय अस्पताल इससे जोड़े जा चुके हैं।
ऊर्जा, निवेश और औद्योगिक विकास में राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर छत्तीसगढ़
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि नई औद्योगिक नीति लागू होने के बाद राज्य को अब तक 5.5 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिनमें 3.5 लाख करोड़ पावर सेक्टर से हैं। छत्तीसगढ़ देश में विद्युत उत्पादन में दूसरे स्थान पर है और 2030 तक प्रथम स्थान का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में 23 घंटे 27 मिनट और शहरी क्षेत्रों में 23 घंटे 51 मिनट की औसत विद्युत आपूर्ति राज्य के ऊर्जा प्रबंधन की दक्षता को दर्शाता है। प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत 6 लाख घरों को सौर ऊर्जा से जोड़ने का कार्य प्रगति पर है।
सुगम सेवाएँ, सशक्त पंचायतें और नई श्वेत क्रांति
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ में डेढ़ लाख से अधिक सोलर कृषि पंप किसानों को सिंचाई सुविधा प्रदान कर रहे हैं। एनडीडीबी के साथ हुए एमओयू से राज्य में दुग्ध उत्पादन में नया विस्तार होगा। अटल डिजिटल सुविधा केंद्र पंचायतों में डिजिटल सुशासन के सेतु बन रहे हैं और लोक सेवा गारंटी अधिनियम 2011 के प्रभावी क्रियान्वयन से सेवाओं की पारदर्शी और समयबद्ध डिलीवरी सुनिश्चित हुई है।
विकास और सुशासन में छत्तीसगढ़ बना मॉडल राज्य
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के नेतृत्व में भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के अभियान में पूरी निष्ठा से सहभागी है। मध्य क्षेत्रीय परिषद के माध्यम से संवाद और समन्वय का यह मंच छत्तीसगढ़ को और भी आगे ले जाने में सहायक सिद्ध हो रहा है।
रायपुर : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं मंत्रिमंडल का चिंतन शिविर 2.0 शुरू
आईआईएम रायपुर में दो दिवसीय शिविर का आयोजन रायपुर, 8 जून 2025
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों का दो दिवसीय चिंतन शिविर 2.0 आज आईआईएम रायपुर में प्रारंभ हो गया है। छत्तीसगढ़ शासन के सुशासन एवं अभिसरण विभाग द्वारा भारतीय प्रबंधन संस्थान, रायपुर (आईआईएम) के सहयोग से दो दिवसीय चिंतन शिविर 2.0 का आयोजन किया गया है। कार्यक्रम के शुभारंभ के पश्चात आज ‘परिवर्तनकारी नेतृत्व और दूरदर्शी शासन’, संस्कृति, सुशासन और राष्ट्र निर्माण तथा सक्षमता से सततता तक: विकास के लिए सार्वजनिक वित्त पर पुनर्विचार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सत्र का आयोजित किया जा रहा है। दो दिवसीय शिविर के दौरान भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे, प्रो. हिमांशु राय (डायरेक्टर आईआईएम इंदौर), डॉ. रविंद्र ढोलकिया (आईआईएम अहमदाबाद), श्री संजीव सान्याल (प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद सदस्य), पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक उदय माहुरकर, ग्लोबल डिजिटल स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र प्रताप गुप्ता जैसे ख्यातिप्राप्त विशेषज्ञ विभिन्न सत्रों को संबोधित करेंगे। 1368