वंदे मातरम् – राष्ट्र चेतना का अमर मंत्र

राष्ट्र गीत “वंदे मातरम्” ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और यह 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था। “वंदे मातरम्” संस्कृत पद है, जिसका अर्थ “मैं तेरी वंदना करता हूँ, हे मातृभूमि” अथवा “हे माँ, मैं तुझे नमन करता हूँ”, है।

अभी हाल ही में जबलपुर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने मातृभूमि की आराधना और राष्ट्र जीवन में चेतना का संचार करने वाले इस दिव्य मंत्र वंदे मातरम् की रचना के 150वें वर्ष पर इसके रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए कृतज्ञ श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस पावन अवसर पर संघ ने सभी स्वयंसेवकों एवं देशवासियों से आह्वान किया है कि वे अपने हृदय में वंदे मातरम् की प्रेरणा जागृत करें और “स्व” की भावना पर आधारित राष्ट्र पुनर्निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लें। सरकार्यवाह जी ने कहा कि इस प्रेरणादायी यात्रा में सभी जन उत्साहपूर्वक सहभागी बनें, जिससे यह भावी पीढ़ियों के लिए राष्ट्रीय एकता, समर्पण और गौरव का प्रकाश स्तंभ बनी रहे।

1875 में रचित वंदे मातरम् भारत जागरण की घोषणा बन गया। 1896 में कोलकाता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने स्वरबद्ध कर गाया, जिससे पूरा सभागार देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत हो उठा। उस क्षण से वंदे मातरम् मात्र एक गीत नहीं रहा – यह भारत माता की आराधना का मंत्र, राष्ट्रीय उद्घोष, राष्ट्रीय चेतना की वाणी और राष्ट्रात्मा की अनुगूंज बन गया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदे मातरम् ने स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों और सामान्य जन को उत्साह और बलिदान की भावना से एक सूत्र में बांध दिया। बंग-भंग आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक, यह उद्घोष हर देशभक्त की प्रेरणा बना रहा।

इसका व्यापक प्रभाव इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि महर्षि अरविंद, मैडम भीकाजी कामा, महाकवि सुब्रह्मण्य भारती, लाला हरदयाल और लाला लाजपत राय जैसे महान व्यक्तित्वों ने अपने पत्र-पत्रिकाओं में वंदे मातरम् को अपनाया। महात्मा गांधी भी वर्षों तक अपने पत्रों का समापन वंदे मातरम् से करते थे।

राष्ट्रात्मा का गीत

वंदे मातरम् केवल शब्दों का संग्रह नहीं – यह राष्ट्रात्मा का गीत है, जो हर भारतीय हृदय को प्रेरित करता है। इसकी दिव्य अनुगूंज आज भी समाज में मातृभूमि के प्रति समर्पण, एकता और गौरव की भावना भरती है, यहाँ तक कि 150 वर्षों के बाद भी।

जब क्षेत्र, भाषा और जाति के आधार पर विभाजन बढ़ते दिखाई देते हैं, तब वंदे मातरम् वह एक सूत्र है जो संपूर्ण समाज को “भारतत्व” की एक ही भावना में जोड़ता है। यह भारत के सभी प्रांतों, समुदायों और भाषाओं में समान रूप से स्वीकार्य है – इसीलिए यह राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक एकात्मता का सशक्त प्रतीक बन गया है।

राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रनिर्माण के पुनर्जागरण काल में वंदे मातरम् की भावना को आत्मसात कर जीवन में उतारना आवश्यक है। इसका उच्चारण केवल वाणी का कार्य नहीं, बल्कि यह देशभक्ति का आध्यात्मिक साधन और सांस्कृतिक मूल्यों का स्रोत है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर जी) के लिए वंदे मातरम् केवल नारा नहीं, बल्कि देशभक्ति, संगठन और स्वतंत्रता का मूल मंत्र था।

नागपुर में छात्र जीवन के आरंभिक काल से ही डॉक्टर जी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से गहराई से प्रभावित थे। उस समय ब्रिटिश शासन में वंदे मातरम् कहना अपराध माना जाता था। किंतु डॉक्टर जी के नेतृत्व में विद्यार्थियों ने एक ब्रिटिश निरीक्षक का स्वागत “वंदे मातरम्” के उद्घोष से किया। इस कार्य के लिए उन्हें विद्यालय से निलंबित कर दिया गया और सरकारी विद्यालयों में प्रवेश पर रोक लगा दी गई – यही वह क्षण था जब उनके भीतर राष्ट्रीयता की ज्वाला प्रज्वलित हुई, जिसने आगे चलकर एक महान संगठन की स्थापना की राह दिखाई।

1925 में जब डॉक्टर जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, तब वंदे मातरम् की भावना संघ की प्रत्येक गतिविधि, प्रार्थना और अनुशासन का अभिन्न अंग बन गई। उनका दृढ़ विश्वास था – “हमारा राष्ट्र केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, वह हमारी माता है। वंदे मातरम् उसके प्रति हमारी श्रद्धा की वाणी है।”

अपने प्रारंभ से लेकर आज तक वंदे मातरम् को प्रत्येक स्वयंसेवक के जीवन में राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान का स्थान प्राप्त है। आज भी कई कार्यक्रमों और सभाओं का समापन स्वयंसेवकों द्वारा इसके श्रद्धापूर्ण गायन से होता है। खेल और प्रशिक्षण के समय भी गण-शिक्षक (प्रशिक्षक) स्वयंसेवकों के साथ मिलकर वंदे मातरम् का सामूहिक उच्चारण कराते हैं – यह अनुशासन, एकता और मातृभूमि के प्रति प्रेम का प्रतीक है। इसके माध्यम से संघ निरंतर देशभक्ति, सेवा और अनुशासन की भावना का विकास करता आ रहा है।

डॉ. हेडगेवार के लिए वंदे मातरम् केवल क्रांति का प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आध्यात्मिक आधारशिला थी। वे इसे राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्र की जीवंत आत्मा के जागरण के रूप में देखते थे।

डॉक्टर जी स्वयंसेवकों से कहा करते थे कि यह पवित्र उद्घोष प्रत्येक भारतीय हृदय में भक्ति, अनुशासन और त्याग की भावना जागृत करे। उनका विश्वास था कि जब तक भारतीयों के हृदय से वंदे मातरम् की गूंज उठती रहेगी, तब तक भारत की आत्मा जीवित रहेगी।

आज जब हम वंदे मातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने का उत्सव मना रहे हैं, तब डॉ. हेडगेवार का यह वाक्य स्मरणीय है – “हमारा कर्तव्य केवल वंदे मातरम् गाना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में जीना है।”

हमारी यही प्रार्थना और प्रेरणा है कि –

हर मुख से एक स्वर में वंदे मातरम् की गूंज उठे।

इस अनादि प्रेरणा से हर नागरिक समर्पित देशभक्त बने, और एक सशक्त, एकात्म व आत्मनिर्भर भारत की रचना में योगदान दे।

हर हृदय और भारत के हर कोने से एक ही स्वर उठे —

वंदे मातरम्! भारत माता की जय!

बिनन्दा खुन्द्राकपम

सह प्रान्त प्रचारक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मणिपुर प्रान्त

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