बस्तर की धरती के सेवाव्रती डॉ. रामचंद्र और सुनीता ताई गोडबोले

छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल अपनी सघन वनराशि, विशिष्ट जनजातीय संस्कृति और प्रकृति से आत्मीय संबंध के लिए जाना जाता है। किंतु बीते कई दशकों से यह क्षेत्र नक्सल हिंसा, सशस्त्र संघर्ष, भय और अविश्वास के वातावरण से भी जूझता रहा है। ऐसे कठिन हालात में यदि कोई व्यक्ति अपना संपूर्ण जीवन निःस्वार्थ भाव से जनजाति समाज की सेवा में अर्पित कर दे, तो वह केवल चिकित्सक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संवाहक बन जाता है। ऐसे ही प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी सहधर्मचारिणी सुनीता ताई – जिन्होंने बस्तर को ही अपना कर्मक्षेत्र और घर बना लिया।

महाराष्ट्र के सतारा जिले में जन्मे डॉ. गोडबोले ने आयुर्वेदिक चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। लगभग 18–19 वर्ष की आयु में अल्बर्ट श्वाइत्ज़र के जीवन पर आधारित एक पुस्तक पढ़ी, जिसने उनके सोचने की दिशा ही बदल दी। युवावस्था में ही उनके मन में समाज सेवा का बीज अंकुरित हो गया था। डॉ. गोडबोले ने तय कर लिया कि चिकित्सा उनके लिए आजीविका नहीं, बल्कि साधना होगी।

पढ़ाई पूरी करने के बाद वे वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े और नासिक जिले के कनाशी स्थान पर निवास करने वाले भील जनजाति समाज के बीच स्वास्थ्य सेवा का कार्य प्रारंभ किया। कुछ वर्षों बाद, मात्र 28 वर्ष की आयु में, उन्हें छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बारसूर गांव भेजा गया, जहां एक स्वास्थ्य केंद्र लंबे समय से बंद पड़ा था। यही स्थान उनकी स्थायी कर्मभूमि बन गया।

कल्याण आश्रम ने उन्हें अकेले न जाने की सलाह दी और पहले विवाह करने का सुझाव दिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात पुणे की सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता पुराणिक से हुई, जो महिला सशक्तिकरण और साक्षरता अभियानों में सक्रिय थीं। सुनीता ताई भी वनवासी कल्याण आश्रम के रायगढ़ जिले में स्थित जांभिवली केंद्र पर कार्य कर रही थी। दोनों के विचार और सेवा-भावना में समानता थी। विवाह के मात्र दो सप्ताह बाद ही दोनों सुदूर क्षेत्र बस्तर पहुंच गए और जनजाति समाज के साथ जीवन को आत्मसात कर लिया।

आज डॉ. गोडबोले और उनकी पत्नी बारसूर गांव में एक साधारण दो-कमरे के मकान में रहते हैं – ईंट की दीवारें, टीन की छत और चारों ओर फैला घना जंगल। उनके घर से कुछ दूरी पर खड़ी एम्बुलेंस उनकी सेवा-प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

डॉ. गोडबोले कहते हैं, – “यहां के लोगों के पास दवाइयों के पैसे भी मुश्किल से होते हैं, परिवहन की व्यवस्था तो लगभग नहीं के बराबर है। इसलिए यह जिम्मेदारी हमें स्वयं उठानी पड़ी।”

शुरुआती वर्षों में जनजाति समाज में आधुनिक चिकित्सा के प्रति गहरा संदेह था। बीमार होने पर पहले मांत्रिकों और ओझा-गुनियों से उपचार कराया जाता था। जब वे असफल होते, तब डॉक्टर को बुलाया जाता। वह भी सीधे क्लिनिक आने की परंपरा नहीं थी – जंगल में आग जलाकर धुआं किया जाता, ताकि डॉक्टर उस संकेत को देखकर मरीज तक पहुंचे। बाहरी दुनिया का भय इतना गहरा था कि एक बार डॉ. गोडबोले एक मरीज को इलाज के लिए जगदलपुर ले गए, तो वह फिर कभी गांव नहीं लौटा। बाद में पता चला कि शहर उनके लिए किसी अनजान देश जैसा था – भाषा, कागजी प्रक्रिया और पैसों की कमी उन्हें डरा देती थी।

इन्हीं अनुभवों से डॉ. गोडबोले निष्कर्ष पर पहुंचे कि स्वास्थ्य सेवा गांव में ही, सरल और न्यूनतम खर्च पर उपलब्ध कराना ही एकमात्र व्यवहारिक समाधान है। उन्होंने स्थानीय हलबी भाषा सीखी, लोगों के साथ समय बिताया और धैर्यपूर्वक विश्वास अर्जित किया। धीरे-धीरे उनके क्लिनिक में नियमित मरीज आने लगे। इसी दौरान सुनीता गोडबोले ने जनजाति महिलाओं का एक समूह गठित किया, जो महुआ, इमली, कच्चे आम जैसे वनोपज को उचित मूल्य पर बेचने में सहायक बना।

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